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दुष्टों का दलन करने वाले, रघुनाथ (श्रीराम) की कला (अंश, शक्ति), हनुमान लला (लाड़ले हनुमान) की आरती कीजिए।
श्री हनुमान जी की आरती

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यह हनुमान जी की आरती है, जिसकी पहली पंक्ति है 'आरती कीजै हनुमान लला की'। यह हनुमान जी को सीधे सम्बोधित नहीं करती: यह भक्तों से उनकी आरती करने को कहती है और उनके बल और कामों का वर्णन करती है। यहाँ इसका पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर के 'श्रीआरती-संग्रह' के अनुसार है; दूसरी छपी प्रतियों में कहीं-कहीं शब्द अलग हैं।
इसमें सबसे पहले दो पंक्तियों की टेक (आरती का मुखड़ा) है, फिर दो-दो पंक्तियों के ग्यारह पद।
टेक भक्तों से हनुमान लला की आरती करने को कहती है। पहले दो पद उनके बल और स्वभाव का वर्णन करते हैं। अगले पाँच पद रामकथा से जुड़े उनके कामों को याद करते हैं: श्रीराम का उन्हें भेजना, लंका पहुँचना और जलाना, असुरों को मारना, सीता जी की सुधि लाना, सजीवन लाकर मूर्छित लक्ष्मण जी के प्राण बचाना, और पाताल में अहिरावन की भुजाएँ उखाड़ना। आठवाँ पद उनकी दोनों भुजाओं का चित्र देता है, और नौवाँ और दसवाँ देवताओं, मनुष्यों, मुनियों और माता अंजना की आरती का। अन्तिम पद में आरती कहती है कि जो हनुमान जी की आरती गाता है, वह बैकुंठ में बसकर परम पद पाता है।
इसके रचयिता और रचना-काल अपुष्ट हैं। कुछ विद्वानों ने इसे स्वामी रामानन्द का पद बताया है, पर इसका पुष्ट प्रमाण नहीं मिला है। कुछ छपी प्रतियों में इसका एक लम्बा पाठ मिलता है, जिसकी अन्तिम पंक्ति में तुलसीदास जी का नाम आता है; केवल इस पंक्ति से रचयिता सिद्ध नहीं होता। अब तक देखी गई छपी प्रतियों में सबसे पुरानी लगभग सन् १९०० की है।
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दुष्टों का दलन करने वाले, रघुनाथ (श्रीराम) की कला (अंश, शक्ति), हनुमान लला (लाड़ले हनुमान) की आरती कीजिए।
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जिनके बल से बड़े-बड़े पर्वत काँपते हैं, (और) रोग (और) दोष जिनके निकट नहीं फटकते।
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अंजनि-पुत्र (माता अंजनि के पुत्र) महान बल देने वाले हैं; (वे) संतों के प्रभु (और) सदा सहायक हैं।
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रघुनाथ (श्रीराम) ने (उन्हें) बीड़ा देकर भेजा, (और वे) लंका जलाकर सीय (सीता) की सुधि (समाचार) ले आए।
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लंका जैसा कोट (किला), समुद्र जैसी खाई, (फिर भी) पवन-सुत (पवन देव के पुत्र हनुमान) ने (वहाँ) जाने में देर नहीं लगाई।
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(उन्होंने) लंका जलाकर असुरों का संहार किया (और) सीता-राम जी के काम सँवारे (पूरे किए)।
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लक्ष्मण सवेरे (के समय) मूर्छित पड़े थे; (हनुमान ने) सजीवन (संजीवनी बूटी) लाकर (उनके) प्राण बचाए।
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(हनुमान ने) पाताल में घुसकर, जम-कारे (सम्भवतः यम जैसे काले राक्षस) तोड़कर अहिरावन की भुजाएँ उखाड़ दीं।
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(उन्होंने) बाईं भुजा से असुरों के दल को मारा (और) दाहिनी भुजा से संतजनों को तारा (उनका उद्धार किया)।
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देवताओं, मनुष्यों (और) मुनियों ने (हनुमान जी की) आरती उतारी (और) 'जय जय जय हनुमान' का उच्चारण किया।
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सोने के थाल में कपूर की लौ छाई है; माता अंजना (हनुमान की माता) आरती कर रही हैं।
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जो हनुमान जी की आरती गाता है, (वह) बैकुंठ में बसकर परम पद पाता है।
मूल पाठ: Traditional aarti, author unverified. Wording of Gita Press, Gorakhpur, Shri Aarti-Sangrah (book 153, 80th reprint, VS 2075), p. 54, spacing and hyphens as printed; checked line by line against the Shiv Prakashan Mandir, Agarwal Book House, Hari Darshan and Tej Kumar Book Depot printings, and compared with the longer Khemraj (Bombay), Thakur Prasad (Banaras) and Cawnpore VS 1957 printings। डिजिटल पाठ: Bharat Samhita (bharatsamhita.com): transcribed by Claude (AI) and checked line by line against the printings named in the edition; not yet reviewed by an editor (Public domain)।