भारत संहिता

आरती कुंजबिहारी की

भगवान् कुंजबिहारी

नदी किनारे पेड़ों की छाँव में मुरली बजाते हुए श्रीकृष्ण, और पास बैठकर मुरली सुनतीं राधा जी
चित्र: Chitrashala Press, Poona

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भूमिका

'आरती कुंजबिहारी की' ब्रजभाषा में श्रीकृष्ण की आरती है। इसमें कृष्ण जी को कुंजबिहारी (ब्रज के कुंजों में विहार करने वाले), गिरधर, मुरारी, नंदलाला, बनमाली और बनवारी जैसे नामों से पुकारा गया है; अधिकतर यह उनके रूप का वर्णन करती है और अंत में उनसे सीधी विनती करती है। यहाँ इसका पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर की छपाई के अनुसार दिया गया है।

आरती एक टेक (बार-बार लौटने वाली पंक्ति) से शुरू होती है और उसके बाद पाँच पद हैं। हर पद टेक के दूसरे आधे, 'श्रीगिरधर कृष्नमुरारीकी', पर समाप्त होता है, और अंतिम पद के बाद पूरी टेक फिर से आती है।

पहले पद में कृष्ण जी का शृंगार है: वैजयन्ती माला, मुरली और कुंडल। दूसरे में साँवले कृष्ण जी के साथ चमकती राधा जी की छवि है, और तीसरे में मोर-मुकुट, देवताओं की लालसा, फूलों की वर्षा और ग्वालिनों के संग बजते बाजे। चौथा पद गंगा जी का है, जिनके बारे में आरती कहती है कि वे श्रीबनवारी के चरणों से प्रकट हुईं। पाँचवाँ पद वृन्दावन की चाँदनी रात का दृश्य दिखाकर दीन-दुखी की पुकार सुनने की विनती पर समाप्त होता है।

इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है: जिन छपाइयों से यह पाठ मिलाया गया, उनमें से किसी में कवि का नाम नहीं है। इसके एक भिन्न और छोटे (तीन पदों वाले) रूप में 'श्रीधर' नाम की एक पंक्ति मिलती है, पर वह नाम किसका है और क्या वह इस आरती के रचयिता की ओर संकेत करता है, यह प्रमाणित नहीं है। रचना-काल भी अज्ञात है: वह छोटा रूप नवंबर १९४१ के बाद छपे एक मराठी भक्ति-संकलन में मिलता है, और यह पाठ, जैसा यहाँ है, सन् १९९३ की एक छपाई में मिलता है।

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कुंज. आ. टेक

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(यह) कुंजबिहारी (ब्रज के कुंजों में विहार करने वाले कृष्ण) की आरती (है), श्रीगिरधर (गोवर्धन पर्वत उठाने वाले) कृष्ण मुरारी (मुर दैत्य के शत्रु) की (आरती)।

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(उनके) गले में वैजयन्ती माला (है), मधुर बालक (कृष्ण) मुरली बजाते हैं। कानों में कुंडल झिलमिला रहे (हैं), (वे) नंद के आनंद, नंदलाला (नंद के दुलारे बेटे) (हैं)। श्रीगिरधर कृष्ण मुरारी की (आरती)।

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(उनके) अंगों की कांति आकाश के समान काली (है), सखी राधिका चमक रही (हैं), लताओं में बनमाली (वनमाला पहनने वाले कृष्ण) खड़े (हैं)। भौंरे जैसी (काली) अलकें, कस्तूरी का तिलक, चंद्रमा जैसी झलक, (यह) प्यारी श्यामा (राधा) की सुंदर छवि (है)। श्रीगिरधर कृष्ण मुरारी की (आरती)।

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सोने का मोर-मुकुट (मोरपंखों वाला मुकुट) शोभा दे रहा है, देवता (उनके) दर्शन को तरसते हैं, आकाश से फूलों की राशि बरसती है। मुरचंग (मुँह से बजने वाला एक बाजा), मधुर मृदंग बज रहे हैं, ग्वालिनों के संग, गोपकुमारी (ग्वाल-कन्या) का अतुलनीय प्रेम (है)। श्रीगिरधर कृष्ण मुरारी की (आरती)।

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जहाँ से गंगा प्रकट हुईं, (वे) सारे मल हरने वाली श्रीगंगा, (जिनके) स्मरण से मोह टूट जाता है, (जो) शिव के सिर पर, जटाओं के बीच बसीं, (जो) पाप का कीचड़ हरती हैं, (वह) श्रीबनवारी (कृष्ण) के चरणों की छवि (है)। श्रीगिरधर कृष्ण मुरारी की (आरती)।

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तट की उजली रेत चमक रही (है), वृन्दावन में बाँसुरी बज रही (है), चारों दिशाओं में गोपियाँ, ग्वाल (और) गायें (हैं)। (कृष्ण) कोमल, मंद-मंद हँस रहे (हैं), चाँदनी (और) चंद्रमा (की शोभा है), भव (संसार) के फंदे कट रहे (हैं)। (हे प्रभु,) दीन-दुखी की पुकार सुनो। श्रीगिरधर कृष्ण मुरारी की (आरती)। कुंजबिहारी की आरती, श्रीगिरधर कृष्ण मुरारी की (आरती)।

मूल पाठ: Traditional aarti, author unverified. Text as printed in श्रीआरती-संग्रह (Gita Press, Gorakhpur, ed. Hanuman Prasad Poddar, 80th reprint, Samvat 2075), pp. 34-35, the stanza-1 refrain written out as in Gita Press's pocket आरती-संग्रह (pp. 54-55); every line checked against श्रीपूर्णवैष्णवाऽऽर्योदय पुष्पांजलि (Shri Guru Purnagiri Sansthan, Lakhanpur, Jammu, 1993), pp. 117-118, Khemraj Shrikrishnadas's Shri Krishna Chalisa (Shri Venkateshwar Press, Mumbai, April 2009), pp. 22-24, Shiv Prakashan Mandir's आरती संग्रह (undated), p. 15, and the Faizpur Aarti Sangrah BK 0265 (undated), pp. 28-29; compared with Hari Darshan Prakashan Mandir, Delhi (undated, damaged) and the shorter Marathi-region recension in Bhaktimarga Pradip (18th or later edition), pp. 78-79। डिजिटल पाठ: Bharat Samhita (bharatsamhita.com): transcribed by Claude (AI) and checked line by line against the printings named in the edition; not yet reviewed by an editor (Public domain)।