भारत संहिता

दुर्गा चालीसा

श्रीदुर्गाचालीसा

सिंह पर सवार, महिषासुर का वध करती हुईं दशभुजा दुर्गा जी; साथ में लक्ष्मी जी, सरस्वती जी, गणेश जी और कार्तिकेय जी
चित्र: Calcutta Art Studio

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भूमिका

दुर्गा चालीसा देवी दुर्गा की स्तुति है। भक्त इसमें देवी को सीधे 'तुम' कहकर संबोधित करते हैं और उन्हें दुर्गा, अंबा, भवानी और जगदंबा जैसे नामों से पुकारते हैं। यहाँ इसका पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर की पुस्तिका से, अक्षरशः, लिया गया है।

'चालीसा' नाम चालीस पदों की रचना का है, पर गीता प्रेस के पाठ में इकतालीस चौपाइयाँ हैं, बिना क्रमांक के और बिना किसी दोहे के। कुछ दूसरी छपाइयों के अंत में एक दोहा भी मिलता है; गीता प्रेस उसे नहीं छापता, इसलिए वह यहाँ नहीं है।

चालीसा नमस्कार से शुरू होती है और देवी की निराकार ज्योति और उनके मुख का वर्णन करती है। फिर वह बताती है कि अन्नपूर्णा जी, गौरी जी, सरस्वती जी, नरसिंह जी और लक्ष्मी जी सब देवी के ही रूप हैं, हिंगलाज और नगरकोट के तीर्थों और मातंगी, तारा जैसे रूपों के नाम लेती है, और सिंह पर सवार, खड्ग और त्रिशूल धारण किए देवी का चित्र खींचती है। इसके बाद शुंभ-निशुंभ, रक्तबीज और महिषासुर जैसे दैत्यों के संहार और संतों की सहायता की बात है। फिर 'संकर आचारज' (शंकराचार्य) की कथा आती है, जिन्होंने शिव जी का ध्यान तो किया पर देवी का स्मरण नहीं किया, शक्ति चली जाने पर पछताए, और शरण में आने पर देवी से फिर शक्ति पाई। अंत में भक्त अपने कष्टों, आशा-तृष्णा और शत्रुओं से छुटकारे और ऋद्धि-सिद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं।

चालीसा स्वयं कहती है कि जो प्रेम और भक्ति से देवी का यश गाता है, दुख और दरिद्रता उसके निकट नहीं आते; जो मन लगाकर उनका ध्यान करता है, उसका जन्म-मरण छूट जाता है; और जो दुर्गा चालीसा गाता है, वह सब सुख भोगकर परम पद पाता है। अंतिम चौपाई में 'देवीदास' नाम आता है। यह कवि का नाम हो सकता है, या 'देवी का दास' के अर्थ में साधारण शब्द भी। प्रायः देवीदास जी को ही इसका रचयिता कहा जाता है, पर वे कौन थे और चालीसा कब रची गई, यह प्रमाणित नहीं है।

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चौपाई

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हे सुख देने वाली दुर्गा, (तुम्हें) नमस्कार है, नमस्कार है। हे दुख हरने वाली अंबा (माँ), (तुम्हें) नमस्कार है, नमस्कार है।

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तुम्हारी ज्योति निरंकार (आकार से रहित) है, (उसका) उजाला तीनों लोकों में फैला है।

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(तुम्हारे) ललाट पर चंद्रमा है, मुख अत्यंत विशाल है, नेत्र लाल हैं और भौंहें विकराल (भयानक) हैं।

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माता का रूप बहुत सुहावना लगता है; (उनके) दर्शन करते हुए लोग अत्यंत सुख पाते हैं।

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तुमने संसार को (अपनी) शक्ति में लय (लीन) किया, (और उसके) पालन के लिए अन्न और धन दिया।

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तुमने अन्नपूर्णा बनकर जगत का पालन किया; तुम ही आदि (आरंभ से विद्यमान) सुंदरी बाला (कन्या) हो।

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(तुम) प्रलय के समय सब का नाश करने वाली हो; तुम (ही) शिव-शंकर की प्यारी गौरी हो।

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सिवजोगी (योगी शिव) तुम्हारे गुण गाते हैं; ब्रह्मा और विष्णु नित्य तुम्हारा ध्यान करते हैं।

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तुमने सरस्वती का रूप धारण किया (और) सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि) देकर ऋषियों और मुनियों का उद्धार किया।

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अंबा (माता) ने नरसिंह का रूप धारण किया (और) खंभा फाड़कर प्रकट हुईं।

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(तुमने) रक्षा करके प्रह्लाद को बचाया (और) हिरनाकुस (हिरण्यकशिपु) को स्वर्ग भेज दिया।

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(तुमने) जगत में लक्ष्मी का रूप धारण किया (और तुम) श्री नारायण के अंग में समाई रहती हो।

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(तुम) क्षीरसागर (दूध के सागर) में विहार करती हो; हे दया के सागर, (मेरे) मन की आशा (पूरी कर) दीजिए।

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हे भवानी, हिंगलाज में तुम्हीं (विराजती) हो; (तुम्हारी) महिमा अपार है, (उसका) वर्णन नहीं किया जा सकता।

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(तुम ही) मातंगी, धूमावती माता, भुवनेश्वरी और बगला हो, (तुम) सुख देने वाली हो।

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(तुम ही) श्री भैरव (संभवतः भैरवी) और जगत को तारने वाली तारा हो; (तुम ही) संसार के दुख दूर करने वाली छिन्नभाल हो।

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भवानी केहरि (सिंह) के वाहन पर शोभा पाती हैं (और) वीर लांगुर (उनके) आगे-आगे चलता है।

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(तुम्हारे) हाथ में खप्पर (और) खड्ग शोभा पाते हैं, जिसे देखकर काल (मृत्यु) डर से भाग जाता है।

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(तुम्हारे हाथ में) अस्त्र और त्रिशूल शोभा पाते हैं, जिससे शत्रु के हृदय में शूल (तीखी पीड़ा) उठता है।

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नगरकोट में तुम्हीं विराजती हो; तीनों लोकों में (तुम्हारा) डंका बजता है।

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तुमने सुंभ और निसुंभ दानवों को मारा, (और) रक्तबीज (के) संखन (शंखों, यानी अनगिनत रूपों) का संहार किया।

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महिषासुर (नाम का) राजा बहुत अभिमानी (था), जिसके पापों के भार से पृथ्वी व्याकुल हो उठी।

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तुमने काली का कराल (भयानक) रूप धारण किया, और सेना सहित उसका (महिषासुर का) संहार किया।

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जब-जब संतों पर संकट पड़ा, तब-तब, हे माता, तुम (उनकी) सहायक बनीं।

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अमर पुरी (देवताओं की नगरी) और अन्य सब लोक, तुम्हारी महिमा (से) सब शोक-रहित रहते हैं।

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ज्वाला में तुम्हारी ज्योति है; नर-नारी सदा तुम्हें पूजते हैं।

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जो प्रेम और भक्ति से (तुम्हारा) जस (यश) गाता है, दुख और दरिद्रता (उसके) निकट नहीं आते।

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जो मनुष्य मन लगाकर तुम्हारा ध्यान करता है, उसका जन्म-मरण छूट जाता है।

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जोगी (योगी), सुर (देवता) और मुनि पुकारकर कहते हैं: तुम्हारी सक्ति (शक्ति) के बिना जोग (योग) नहीं होता।

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संकर आचारज (शंकराचार्य) ने तप किया, और काम, क्रोध, सबको जीत लिया।

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(उन्होंने) रात-दिन संकर (शिव) का ध्यान किया, (पर) किसी भी समय तुम्हारा स्मरण नहीं किया।

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(उन्होंने) सक्ति (शक्ति) के रूप का मरम (भेद) नहीं पाया; (जब) सक्ति चली गई, तब (उनका) मन पछताया।

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शरणागत होकर (उन्होंने तुम्हारी) कीर्ति का बखान किया: जय हो, जय हो, जय हो, हे जगदंब (जगत की माता) भवानी।

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आदि जगदंबा (जगत की आदि माता) प्रसन्न हुईं; (उन्होंने) सक्ति दी और बिलंब (देर) नहीं किया।

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हे माता, कष्ट ने मुझे बहुत घेर लिया है; तुम्हारे बिना मेरा दुख कौन हरेगा?

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आशा और तृष्णा (मुझे) बहुत सताती हैं, (और) मूर्ख शत्रु मुझे बहुत डराता है।

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हे महरानी (महारानी), (मेरे) शत्रु का नाश कीजिए; हे भवानी, मैं एकचित्त होकर तुम्हारा स्मरण करता हूँ।

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हे दयालु माता, कृपा करो; ऋद्धि और सिद्धि देकर (मुझे) निहाल करो।

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जब तक (मैं) जीऊँ, (तुम्हारी) दया का फल पाऊँ, (और) मैं सदा तुम्हारा जस (यश) सुनाऊँ।

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जो कोई दुर्गा चालीसा गाता है, (वह) सब सुख भोगकर परम पद पाता है।

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हे जगदंब (जगत की माता) भवानी, देवीदास को अपनी शरण में आया जानकर (उस पर) कृपा करो।

मूल पाठ: Traditional; its last chaupai names देवीदास, whose identity and date are unverified. Text follows श्रीदुर्गाचालीसा, Gita Press, Gorakhpur, booklet 1033, pp. 3-9, word for word (spelling, word division and punctuation as printed), read from the page images. Checked against the Durga Saptashati with Durga Chalisa of Lakshmi Publication, pp. 292-295; 51 चालीसा संग्रह आरतियों सहित, Randhir Prakashan, Haridwar, 2004, pp. 173-176; an undated pocket booklet (Shri Durga Pustakbhandar, 1980s, both per the archive.org uploader, unverified); and Sanskrit Wikisource revision 415580. Their differences are recorded as variants in durga-chalisa.notes.md। डिजिटल पाठ: Bharat Samhita (bharatsamhita.com): transcribed by Claude (AI) from Gita Press 1033, starting from Sanskrit Wikisource's transcription by its contributors; not yet reviewed by an editor (Public domain, unverified; transcription CC BY-SA 4.0)।