भारत संहिता

हनुमान चालीसा

श्रीहनुमानचालीसा

राम दरबार: सिंहासन पर विराजमान राम जी और सीता जी के सामने हाथ जोड़े खड़े हनुमान जी
चित्र: Raja Ravi Varma

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भूमिका

श्रीहनुमानचालीसा हनुमान जी की स्तुति है। कवि इसमें हनुमान जी को सीधे सम्बोधित करते हैं: उनकी जय बोलते हैं, उनके रूप और गुण गाते हैं, राम-कथा में उनके कामों को याद करते हैं और उनसे कृपा माँगते हैं। रचना में आरम्भ के दो दोहे हैं, फिर चालीस चौपाइयाँ, और अन्त में एक दोहा। चालीस चौपाइयों से ही इसका नाम है; चौपाई ३९ में पाठ स्वयं को 'हनुमान चलीसा' कहता है।

पहले दोहे में कवि गुरु के चरणों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को साफ़ करके रघुबर (श्रीराम) का निर्मल यश कहने का संकल्प करते हैं, और दूसरे में अपने को बुद्धिहीन मानकर पवन-कुमार (हनुमान जी) से बल, बुद्धि और विद्या माँगते हैं। पहली आठ चौपाइयाँ हनुमान जी के नाम, रूप, गुण और राम-भक्ति का वर्णन करती हैं। चौपाई ९ से २० तक राम-कथा के प्रसंग आते हैं, जैसे सीता जी से भेंट, लंका-दहन, लखन जी के लिए संजीवनी लाना, सुग्रीव और बिभीषन की सहायता, बचपन में सूर्य को फल समझकर निगलना, और राम जी की अँगूठी मुँह में रखकर समुद्र लाँघना।

चौपाई २१ से ३५ तक हनुमान जी को राम जी के द्वार का रखवाला और भक्तों का रक्षक कहा गया है, और चालीसा अपने शब्दों में कहती है कि उनका नाम और भजन संकट, रोग, पीड़ा और भूत-पिसाच को दूर करता है और राम जी तक पहुँचाता है। अन्तिम चौपाइयों में फिर जय और कृपा की प्रार्थना है, और चालीसा की अपनी फलश्रुति है: जो इसका सौ बार पाठ करे वह बन्धन से छूटे, और जो इसे पढ़े उसे सिद्धि मिले, जिसके साक्षी गौरीसा (शिव जी) हैं। अन्त के दोहे में पवनतनय (हनुमान जी) से प्रार्थना है कि वे राम जी, लखन जी और सीता जी के साथ हृदय में बसें।

अन्तिम चौपाई 'तुलसीदास सदा हरि चेरा' में कवि का नाम हस्ताक्षर की तरह आता है। परम्परा से यह गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानी जाती है; इस मान्यता पर विद्वानों के मत यहाँ जाँचे नहीं गए हैं। जिन मुद्रित संस्करणों से यह पाठ मिलाया गया है, उनमें से किसी में इसकी रचना का समय नहीं दिया गया।

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दोहा

। ॥

श्रीगुरु के चरण-कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को स्वच्छ करके, मैं रघुबर (रघुकुल में श्रेष्ठ श्रीराम) के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल देने वाला है।

। ॥

(अपने) तन को बुद्धिहीन जानकर मैं पवन-कुमार (पवन के पुत्र हनुमान) का स्मरण करता हूँ। मुझे बल, बुद्धि और विद्या दो, और (मेरे) क्लेश और विकार हर लो।

चौपाई

हनु. चा. १

। ॥ १ ॥

हे हनुमान, तुम्हारी जय हो; तुम ज्ञान और गुणों के सागर हो। हे कपीस (वानरों के स्वामी), तुम्हारी जय हो; तुम तीनों लोकों में उजागर (प्रसिद्ध) हो।

हनु. चा. २

। ॥ २ ॥

(तुम) राम के दूत हो और अतुलित (जिसकी तुलना न हो सके, ऐसे) बल के धाम हो। तुम अंजनि-पुत्र और पवनसुत (पवन के पुत्र) नाम से (जाने जाते) हो।

हनु. चा. ३

। ॥ ३ ॥

(तुम) महाबीर (महान वीर), पराक्रमी और बजरंगी (वज्र जैसे अंगों वाले) हो। (तुम) कुमति (बुरी बुद्धि) को दूर करने वाले और सुमति (अच्छी बुद्धि) के साथी हो।

हनु. चा. ४

। ॥ ४ ॥

तुम्हारा वर्ण (रंग) कंचन (सोने) जैसा है और तुम सुन्दर वेश में शोभित हो। तुम्हारे कानों में कुंडल हैं और केश घुँघराले हैं।

हनु. चा. ५

। ॥ ५ ॥

तुम्हारे हाथ में वज्र और ध्वजा शोभित हैं, और कंधे पर मूँज का जनेऊ सजा है।

हनु. चा. ६

। ॥ ६ ॥

(तुम) संकर (शंकर) के सुवन (पुत्र) और केसरीनंदन (केसरी के पुत्र) हो। तुम्हारा तेज और प्रताप महान है, (और) सारा जग (तुम्हारी) वंदना करता है।

हनु. चा. ७

। ॥ ७ ॥

(तुम) विद्यावान, गुणी और अत्यन्त चतुर हो, (और) राम का काम करने को आतुर (उत्सुक) रहते हो।

हनु. चा. ८

। ॥ ८ ॥

(तुम) प्रभु (श्रीराम) के चरित्र सुनने के रसिया (प्रेमी) हो। राम, लखन (लक्ष्मण) और सीता (तुम्हारे) मन में बसे हैं।

हनु. चा. ९

। ॥ ९ ॥

(तुमने) सूक्ष्म (बहुत छोटा) रूप धारण करके सिय (सीता) को (अपने को) दिखाया, और बिकट (भयंकर) रूप धारण करके लंका को जलाया।

हनु. चा. १०

। ॥ १० ॥

(तुमने) भीम (भयानक) रूप धारण करके असुरों का संहार किया, और रामचन्द्र के काम सँवारे (पूरे किए)।

हनु. चा. ११

। ॥ ११ ॥

(तुमने) सजीवन (संजीवनी बूटी) लाकर लखन (लक्ष्मण) को जीवित किया, (तब) श्रीरघुबीर (श्रीराम) ने हर्षित होकर (तुम्हें) हृदय से लगा लिया।

हनु. चा. १२

। ॥ १२ ॥

रघुपति (श्रीराम) ने (तुम्हारी) बहुत बड़ाई (प्रशंसा) की, (और कहा कि) तुम मुझे भरत के समान प्रिय भाई हो।

हनु. चा. १३

। ॥ १३ ॥

'सहस बदन (हज़ार मुखों वाले) तुम्हारा यश गाते हैं', ऐसा कहकर श्रीपति (श्रीराम) (तुम्हें) गले लगाते हैं।

हनु. चा. १४

। ॥ १४ ॥

सनकादिक (सनक आदि ऋषि), ब्रह्मा आदि (देवता), मुनीस (श्रेष्ठ मुनि), नारद, सारद (सरस्वती) और अहीस (शेषनाग) भी (तुम्हारे यश का पूरा वर्णन नहीं कर पाते)।

हनु. चा. १५

। ॥ १५ ॥

जम (यम), कुबेर और दिक्पाल (दिशाओं के रक्षक देवता) भी जहाँ (तुम्हारे यश का पार नहीं पाते), वहाँ कवि और विद्वान उसे कहाँ तक कह सकते हैं?

हनु. चा. १६

। ॥ १६ ॥

तुमने सुग्रीव पर उपकार किया: (उन्हें) राम से मिलाकर राज-पद दिया।

हनु. चा. १७

। ॥ १७ ॥

बिभीषन (विभीषण) ने तुम्हारा मन्त्र (परामर्श) माना, (और वे) लंकेस्वर (लंका के राजा) बने; यह सारे जग ने जाना।

हनु. चा. १८

। ॥ १८ ॥

जुग सहस्त्र योजन (की दूरी) पर (स्थित) भानु (सूर्य) को (तुमने) मीठा फल जानकर निगल लिया।

हनु. चा. १९

। ॥ १९ ॥

प्रभु (श्रीराम) की मुद्रिका (अँगूठी) मुख में रखकर (तुम) जलधि (समुद्र) लाँघ गए, (इसमें) कोई अचरज नहीं।

हनु. चा. २०

। ॥ २० ॥

जगत के जितने दुर्गम (कठिन) काम हैं, वे सब तुम्हारे अनुग्रह (कृपा) से सुगम (आसान) हैं।

हनु. चा. २१

। ॥ २१ ॥

राम के द्वार के रखवाले तुम हो; (तुम्हारी) आज्ञा के बिना (वहाँ किसी का) प्रवेश नहीं होता।

हनु. चा. २२

। ॥ २२ ॥

तुम्हारी शरण (में आने वाला) सब सुख पाता है; (जब) तुम रक्षक हो, (तब) किसी का डर नहीं (रहता)।

हनु. चा. २३

। ॥ २३ ॥

अपने तेज को तुम स्वयं ही सँभालते हो; (तुम्हारी) हाँक से तीनों लोक काँप उठते हैं।

हनु. चा. २४

। ॥ २४ ॥

जब (कोई) महाबीर (हनुमान) का नाम सुनाता है, (तब) भूत-पिशाच पास नहीं आते।

हनु. चा. २५

। ॥ २५ ॥

वीर हनुमान का निरंतर जप करने पर (वे) रोग का नाश करते हैं और सारी पीड़ा हर लेते हैं।

हनु. चा. २६

। ॥ २६ ॥

जो मन, कर्म और वचन से (हनुमान का) ध्यान लगाता है, उसे हनुमान संकट से छुड़ाते हैं।

हनु. चा. २७

। ॥ २७ ॥

तपस्वी राजा राम सबके ऊपर (सर्वश्रेष्ठ) हैं; उनके सब काम तुमने सँवारे (पूरे किए)।

हनु. चा. २८

। ॥ २८ ॥

जो कोई (तुम्हारे पास) और कोई भी मनोरथ लाता है, वही अमित (असीम) जीवन-फल पाता है।

हनु. चा. २९

। ॥ २९ ॥

तुम्हारा प्रताप चारों युगों में (फैला) है; वह प्रसिद्ध है और जगत का उजाला है।

हनु. चा. ३०

। ॥ ३० ॥

तुम साधु-संतों के रखवाले हो, असुरों का नाश करने वाले हो और राम के दुलारे हो।

हनु. चा. ३१

। ॥ ३१ ॥

तुम आठ सिद्धियों और नौ निधियों के दाता (देने वाले) हो; ऐसा वर (तुम्हें) जानकी माता (सीता) ने दिया।

हनु. चा. ३२

। ॥ ३२ ॥

राम-रूपी रसायन तुम्हारे पास है; तुम सदा रघुपति (राम) के दास रहते हो।

हनु. चा. ३३

। ॥ ३३ ॥

तुम्हारे भजन से (भक्त) राम को पाता है और जन्म-जन्म के दुःख भूल जाता है।

हनु. चा. ३४

। ॥ ३४ ॥

(ऐसा भक्त) अंत समय में रघुबर (राम) के धाम को जाता है, जहाँ जन्म लेकर (वह) हरि-भक्त कहलाता है।

हनु. चा. ३५

। ॥ ३५ ॥

और (किसी) देवता को चित्त में न धरे, (तब भी भक्त) हनुमान की सेवा करके सब सुख पाता है।

हनु. चा. ३६

। ॥ ३६ ॥

जो बलबीर (बलवान वीर) हनुमान का सुमिरन करता है, उसके संकट कट जाते हैं और सारी पीड़ा मिट जाती है।

हनु. चा. ३७

। ॥ ३७ ॥

हे हनुमान गोसाईं (स्वामी)! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो; गुरुदेव की तरह (मुझ पर) कृपा करो।

हनु. चा. ३८

। ॥ ३८ ॥

जो कोई (इसका) सौ बार पाठ करे, (वह) बंधन से छूट जाता है और (उसे) महान सुख होता है।

हनु. चा. ३९

। ॥ ३९ ॥

जो यह हनुमान चालीसा पढ़े, उसे सिद्धि होती है; (इसके) साक्षी गौरीस (गौरी के पति शिव) हैं।

हनु. चा. ४०

। ॥ ४० ॥

तुलसीदास सदा हरि का चेरा (सेवक) है; हे नाथ! (मेरे) हृदय में डेरा (निवास) कीजिए।

दोहा

। ॥

हे पवनतनय (पवन के पुत्र), संकट हरने वाले, मंगल-मूर्ति रूप वाले! हे सुर-भूप (देवताओं के राजा)! राम, लखन (लक्ष्मण) और सीता सहित (मेरे) हृदय में बसो।

मूल पाठ: Attributed to Goswami Tulsidas, whom its last chaupai names (authorship not checked against scholarship). Traditional text as printed by Gita Press, Gorakhpur (book 1094, samvat 2080 reprint), checked line by line against a Gita Press pocket edition (signature 1917), Ram Naam Lekhan evam Sankirtan Mandal, Bareilly, Shri Thakur Prasad Pustak Bhandar, Varanasi (ed. Shivdatt Mishra Shastri, 2004) and the Tulsi Peeth critical text (ed. Rambhadracharya, 2011)। डिजिटल पाठ: Bharat Samhita (bharatsamhita.com): transcribed by Claude (AI) and checked line by line against the printings named in the edition; not yet reviewed by an editor (Public domain)।