भारत संहिता

जय गणेश जय गणेश देवा

आरती श्री गणेश जी की

छत्र के नीचे सिंहासन पर विराजमान गणेश जी, दोनों ओर उनकी पत्नियाँ और आसपास सेविकाएँ
चित्र: Wellcome Collection

इस पृष्ठ का हिन्दी पाठ AI (Claude) द्वारा तैयार किया गया ड्राफ्ट है। चिह्न वाले अंशों की सम्पादक द्वारा जाँच अभी बाकी है।

भूमिका

यह भगवान् गणेश की आरती है, जो उन्हीं को सम्बोधित करके 'जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा' से शुरू होती है। इसमें दो पंक्तियों की एक टेक (वे पंक्तियाँ जिन पर आरती बार-बार लौटती है) है, और उसके बाद दो-दो पंक्तियों के चार पद।

टेक गणेश जी की जय बोलती है और उनके माता-पिता, पार्वती जी और महादेव जी, का नाम लेती है। पहला पद उनका रूप बताता है: एक दाँत, चार भुजाएँ, मस्तक पर सिन्दूर और चूहे की सवारी। दूसरे पद में आरती कहती है कि वे अन्धों को आँखें, कोढ़ियों को काया, बाँझ स्त्रियों को पुत्र और निर्धनों को धन देते हैं। तीसरा पद उनकी पूजा का चित्र है: लड्डुओं का भोग, सन्तों की सेवा, और पान, फूल और मेवे का चढ़ावा। चौथे पद में भक्त उनसे दीनों की लाज रखने और कामना पूरी करने की विनती करते हैं।

यहाँ का पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर के 'श्रीआरती-संग्रह' के अनुसार है। पाठ मिलाने के लिए देखे गए छपे संस्करणों में से किसी में रचयिता का नाम नहीं है; इसके रचयिता और रचना-काल की पुष्टि नहीं हो सकी है।

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गणेश आ. टेक

। ॥

जय हो गणेश, जय हो गणेश, जय हो गणेश देव, जिनकी माता पार्वती हैं और पिता महादेव (शिव) हैं।

। ॥

(गणेश) एकदन्त (एक दाँत वाले), दयावान और चार भुजाएँ धारण करने वाले हैं; (उनके) मस्तक पर सिन्दूर शोभा देता है और (उनकी) सवारी चूहे की है।

। ॥

(वे) अन्धों को आँखें देते हैं, कोढ़ियों को (स्वस्थ) काया, बाँझ स्त्रियों को पुत्र देते हैं और निर्धनों को धन-सम्पत्ति।

। ॥

(उन्हें) लड्डुओं का भोग लगता है, सन्त (उनकी) सेवा करते हैं; पान चढ़ते हैं, फूल चढ़ते हैं और मेवे चढ़ते हैं।

। ॥

दीनों की लाज रखो, हे शम्भु-सुत (शिव के पुत्र), (मैं तुम पर) न्योछावर (हूँ); कामना पूरी करो, जग (तुम पर) न्योछावर है।

मूल पाठ: Traditional aarti, author unverified. Text as printed in श्रीआरती-संग्रह (Gita Press, Gorakhpur, ed. Hanuman Prasad Poddar, 80th reprint, Samvat 2075), p. 11; every line checked against 51 चालीसा संग्रह आरतियों सहित (Randhir Prakashan, Haridwar, first edition 2000), p. 11, and compared with the आरती संग्रह of Hari Darshan Prakashan Mandir, Delhi (undated) and an undated Aarti Sangrah booklet from Bhopal, p. 7। डिजिटल पाठ: Bharat Samhita (bharatsamhita.com): transcribed by Claude (AI) and checked line by line against the printings named in the edition; not yet reviewed by an editor (Public domain)।