भारत संहिता

ॐ जय जगदीश हरे

भगवान् जगदीश्वर

जल पर शेषनाग के आसन पर विराजमान भगवान विष्णु, दोनों ओर उनकी दो पत्नियाँ
चित्र: Raja Ravi Varma

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भूमिका

'ॐ जय जगदीश हरे' एक आरती है, जिसमें भक्त जगदीश (जगत् के स्वामी) हरि जी को पुकारते हैं और उनकी जय बोलते हैं; 'हरि' भगवान् विष्णु का एक नाम है। आरती उन्हें परमात्मा, अन्तर्यामी, पारब्रह्म और सबका स्वामी भी कहती है। यहाँ का पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर के 'आरती-संग्रह' से शब्दशः लिया गया है, जहाँ यह 'भगवान् जगदीश्वर' शीर्षक के नीचे छपी है।

आरती एक टेक (मुख्य पंक्तियाँ; गीता प्रेस की छपाई हर पद के बाद इन्हें दोहराने का संकेत देती है) और सात पदों में है। टेक भी और हर पद भी दो तुकान्त पंक्तियों का है। टेक में हरि जी की जय है, जो भक्तों के संकट पल भर में दूर करते हैं। पहला पद बताता है कि उनका ध्यान करने वाले को क्या मिलता है। अगले तीन पदों में भक्त उन्हें अपने माता-पिता, पूर्ण परमात्मा और करुणा का सागर कहते हैं, और अपने को मूर्ख, दुष्ट और कामी मानकर कृपा माँगते हैं। पाँचवें पद में वे पूछते हैं कि वे अगोचर प्रभु से कैसे मिलें, छठे में वे उनके द्वार पर पड़े उनसे हाथ उठाने को कहते हैं, और सातवें में विकार और पाप मिटाने तथा श्रद्धा, भक्ति और संतों की सेवा बढ़ाने की प्रार्थना करते हैं। कुछ दूसरी छपाइयों में इसके बाद 'तन, मन, धन' वाला एक और पद मिलता है; गीता प्रेस की छपाई में वह नहीं है, इसलिए यहाँ भी नहीं है।

गीता प्रेस की छपाई में, और जिन दूसरी छपाइयों से इसका मिलान किया गया उनमें भी, आरती के साथ रचयिता का नाम नहीं है। यह पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी की रचना मानी जाती है: उनकी पुस्तक 'सत्यामृत प्रवाह' के सन् १९६५ के संस्करण की भूमिका कहती है कि यह प्रार्थना उनकी पुस्तक 'सत्यधर्ममुक्तावली' में है और उनके आरम्भिक काल की रचना है। 'सत्यधर्ममुक्तावली' देखी नहीं जा सकी, इसलिए उसका पाठ इस पाठ से मिलता है या नहीं, यह पुष्ट नहीं है; रचना का वर्ष भी नहीं मिला। उसी भूमिका के अनुसार फिल्लौरी का जन्म संवत् १८९४ (सन् १८३७) में फिल्लौर में हुआ था। उनके देहान्त के वर्ष पर स्रोत एकमत नहीं हैं: उसी पुस्तक के सम्पादक संवत् १९३७ देते हैं, और प्रचलित विवरण सन् १८८१।

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जगदीश आ. टेक

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ॐ! हे जगदीश (जगत् के स्वामी) हरि, (तुम्हारी) जय हो; हे प्रभु! हे जगदीश हरि, (तुम्हारी) जय हो, (जो) भक्तजनों के संकट क्षण भर में दूर करते हैं।

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जो (तुम्हारा) ध्यान करता है, (वह) फल पाता है (और उसके) मन का दुख नष्ट हो जाता है। (उसके) घर में सुख और सम्पत्ति आती है (और) शरीर का कष्ट मिट जाता है।

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तुम मेरे माता-पिता हो, (तुम्हें छोड़) मैं किसकी शरण लूँ? तुम्हारे बिना कोई और दूसरा नहीं है, जिसकी मैं आस करूँ।

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तुम पूर्ण परमात्मा हो, तुम अन्तर्यामी (सबके मन की जानने वाले) हो। (तुम) पारब्रह्म (सर्वोच्च ब्रह्म) (और) परमेश्वर हो, तुम सबके स्वामी हो।

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तुम करुणा के सागर हो, तुम पालन-कर्ता हो। मैं मूर्ख, दुष्ट (और) कामी हूँ; हे भर्ता (पालनहार स्वामी)! (मुझ पर) कृपा करो।

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तुम एक हो, अगोचर (इन्द्रियों से परे) हो, सबके प्राणपति (प्राणों के स्वामी) हो। हे दयामय! मैं कुमति (बुरी बुद्धि वाला) किस विधि से तुमसे मिलूँ?

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तुम दीनबन्धु (दीनों के सहायक), दुखहर्ता (दुख हरने वाले) (और) मेरे ठाकुर (स्वामी) हो। अपने हाथ उठाओ, (मैं) तुम्हारे द्वार पर पड़ा हूँ।

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हे देव! (मेरे) विषय-विकार (इन्द्रियों के विषयों से उपजे मन के दोष) मिटाओ, पाप हर लो। श्रद्धा और भक्ति बढ़ाओ, (और) संतों की सेवा (बढ़ाओ)।

मूल पाठ: By Pandit Shardha Ram Phillauri (d. 1880 or 1881), as a 1965 edition of his सत्यामृत प्रवाह attributes it. The aarti as sung and printed, following Gita Press, Gorakhpur, Aarti-Sangrah (book 153, ed. Hanuman Prasad Poddar, 80th reprint, VS 2075), p. 12; checked line by line against a second Gita Press setting (pp. 9-10) and three independent printings: Khemraj Shrikrishnadas, Bombay; Hari Darshan Prakashan Mandir, Delhi; Atul Kumar Gupta, Bhopal। डिजिटल पाठ: Bharat Samhita (bharatsamhita.com): transcribed by Claude (AI) and checked line by line against the printings named in the edition; not yet reviewed by an editor (Public domain)।