भारत संहिता

शिव चालीसा

शिवस्तुति चालीसा

कैलास पर्वत पर विराजमान शिव जी, पार्वती जी और गणेश जी, सामने बैठे नंदी जी
चित्र: R. Varma

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भूमिका

शिव चालीसा भगवान शिव की स्तुति है। भक्त इसमें शिव जी को सीधे 'तुम' कहकर पुकारते हैं; केवल पहला दोहा गणेश जी की वंदना है। इसमें आरंभ में एक दोहा, फिर इकतालीस चौपाइयाँ और अंत में दो दोहे हैं। यहाँ पाठ तेजकुमार बुकडिपो, लखनऊ की पुस्तिका 'शिवस्तुति चालीसा' से अक्षरशः लिया गया है, जो किसी पद पर क्रमांक नहीं देती। आज की कई छपाइयों में कुछ शब्द और एक पंक्ति अलग हैं, और गीता प्रेस की 'श्रीशिवचालीसा' ('जय शिव शंकर औढरदानी') एक अलग रचना है।

पहले दोहे में कवि गणेश जी से अभय का वरदान माँगते हैं। फिर चौपाइयाँ शिव जी के रूप का वर्णन करती हैं: माथे पर चन्द्रमा, सिर पर गंगा, मुंडमाला और बाघम्बर, बाईं ओर पार्वती जी, हाथ में त्रिशूल, और साथ में नंदी, गण, कार्त्तिक जी और गणेश जी। इसके बाद शिव जी के काम आते हैं: षडानन जी को भेजकर तारकासुर का वध, जलंधर और त्रिपुरासुर का संहार, भागीरथ की प्रतिज्ञा पूरी करना, समुद्र-मंथन की ज्वाला से सबको बचाकर नीलकंठ कहलाना, और राम जी के सहस्र कमलों वाले पूजन की परीक्षा। फिर भक्त अपने संकट कहते हैं, रक्षा और क्षमा माँगते हैं और शिव जी की महिमा गाते हैं।

अंत में चालीसा स्वयं अपने पाठ का फल बताती है। उसके शब्दों में, जो मन लगाकर इसका पाठ करता है, शंभु जी उसके सहायक होते हैं; ऋणी और पुत्र चाहने वाले के लिए भी वह फल कहती है, त्रयोदशी के व्रत और होम की बात करती है, और कहती है कि जो शंकर जी के सामने पाठ सुनाता और मन, कर्म, वचन से ध्यान लगाता है, उसके जन्म-जन्म के पाप नष्ट होते हैं और अंत में उसे शिवपुर में वास मिलता है। पहले समापन-दोहे में भक्त कहते हैं कि वे नित्य नियम से प्रातः पाठ करते हैं, और जगदीश जी से अपनी मनोकामना पूरी करने को कहते हैं।

पहले दोहे ('कहत अयोध्यादास') और अंतिम चौपाई ('कहै अयोध्या') में कवि का नाम अयोध्यादास आता है। छपाइयों में उनके बारे में और कुछ नहीं मिलता; वे कौन थे और कब हुए, यह प्रमाणित नहीं है। अंतिम दोहा बताता है कि यह स्तुति मगसर (मार्गशीर्ष) की छठ को, हिमवंत (हेमंत) ऋतु में, 'संवत चौंसठ' में पूरी हुई। शताब्दी पाठ में नहीं दी गई है; सबसे संभावित पढ़त विक्रम संवत १९६४ (सन् १९०७ ई.) है, पर यह पढ़त प्रमाणित नहीं है।

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दोहा

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हे गणेश, गिरिजा (पार्वती) के पुत्र, मंगल के मूल और सुजान (ज्ञानी), (तुम्हारी) जय हो। अयोध्यादास कहते हैं: (तुम मुझे) अपना अभय (निर्भयता) का वरदान दो।

चौपाई

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हे गिरिजापति (पार्वती के पति), हे दीनदयाल (दीनों पर दया करने वाले), (तुम्हारी) जय हो। (तुम) सदा संतों का प्रतिपालन (पालन और रक्षा) करते हो।

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(तुम्हारे) माथे पर चन्द्रमा सुंदर शोभा देता है, (और) कानों में फन वाले नागों के कुंडल (हैं)।

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(तुम्हारा) अंग गोरा है, सिर पर गंगा बहाए हुए (हो), मुंडों की माला (पहने हो) और तन पर छार (भस्म) लगाए हुए (हो)।

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(तुम्हारा) वस्त्र, खाल का बाघम्बर (बाघ-चर्म), शोभा देता है; (इस) छवि को देखकर नाग और मुनि मोहित हो जाते हैं।

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(जो) मैना माता की दुलारी (बेटी) हैं, (उन पार्वती की) भारी (अपार) छवि (तुम्हारे) बाएँ अंग में शोभा देती है।

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(तुम्हारे) हाथ में त्रिशूल शोभा देता है, (जिसकी) छवि निराली है; (वह) सदा शत्रुओं का क्षय (नाश) करता है।

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नंदी और गण कैसे शोभा देते हैं? जैसे सागर के बीच कमल (शोभा देता) है।

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कार्त्तिक (कार्तिकेय), श्याम और गणराऊ (गणों के राजा, गणेश) (भी साथ हैं); इस छवि का वर्णन किसी से नहीं किया जाता।

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देवताओं ने जब भी जाकर (तुम्हें) पुकारा, तभी, हे प्रभु, (तुमने) स्वयं (उनका) दुःख दूर किया।

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तारक (असुर) ने भारी उपद्रव किया, (तब) सब देवताओं ने मिलकर तुम्हें जुहारा (प्रणाम करके विनती की)।

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(तुमने) स्वयं तुरंत षडानन (छह मुखों वाले, कार्तिकेय) को भेजा, (जिन्होंने उसे) लव निमेष (पल भर) में मार गिराया।

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(तुमने) स्वयं जलंधर असुर का संहार किया; तुम्हारा सुयश संसार में विदित (प्रसिद्ध) है।

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(तुमने) त्रिपुरासुर से युद्ध छेड़ा और कृपा करके सबको बचा लिया।

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भागीरथ ने भारी तप किया, (तब) पुरारी (त्रिपुर के शत्रु, शिव) ने उसकी प्रतिज्ञा पूरी की।

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दानियों में तुम्हारे समान कोई नहीं है; सेवक सदा (तुम्हारी) स्तुति करते हैं।

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वेदों ने तुम्हारे नाम की महिमा गाई है; (पर तुम्हारा) अकथ (जिसे कहा न जा सके) (और) अनादि (जिसका आदि न हो) भेद (वे) नहीं पा सके।

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उदधि (समुद्र) के मथन (मंथन) में ज्वाला प्रकट हुई, (जिससे) जलते हुए देवता और असुर बेहाल हो गए।

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(तुमने) वहाँ दया की (और) सहायता की; तुम्हारा नाम नीलकंठ (नीले कंठ वाला) कहलाया।

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जब रामचन्द्र ने (तुम्हारा) पूजन किया, (तब उन्होंने) लंका जीतकर विभीषण को दे दी।

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(राम) सहस (हज़ार) कमलों (की पूजा) में लगे हुए थे, तभी पुरारी ने (उनकी) परीक्षा ली।

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प्रभु (शिव) ने जो एक कमल (छिपाकर) रख लिया था, उसी (की जगह) कमलनैन (कमल जैसे नेत्रों वाले राम) ने (अपने नेत्र से) पूजा करनी चाही।

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प्रभु शंकर ने (राम की) कठिन भक्ति देखी, (तो वे) प्रसन्न हुए (और उन्हें) मनचाहा वर दिया।

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हे अनंत (अन्त-रहित), हे अविनासी (नाश-रहित), (तुम्हारी) जय हो, जय हो, जय हो। सबके घट (हृदय) में बसने वाले, (तुम) कृपा करते हो।

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सारे दुष्ट मुझे नित (रोज़) सताते हैं; (मैं) भटकता रहता हूँ, मुझे चैन नहीं आता।

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हे नाथ, मैं 'त्राहि-त्राहि' (बचाओ, बचाओ) पुकारता हूँ; इस अवसर पर (तुम) आकर मुझे उबारो।

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त्रिशूल लेकर (मेरे) शत्रुओं को मारो, (और) आकर मुझे संकट से उबारो।

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माता, पिता, भाई, सब कोई (हैं), (पर) संकट में कोई नहीं पूछता।

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हे स्वामी, (मुझे) एक तुम्हारी (ही) आस है; अब आकर (मेरा) भारी संकट हरो।

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(तुम) निर्धन को सदा धन देते हो; जो कोई (तुमसे) माँगता है, वह फल पाता है।

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(मैं) किस विधि से तुम्हारी स्तुति करूँ? हे नाथ, अब हमारी चूक क्षमा करो।

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हे शंकर, (तुम) संकट के नाशक हो, विघ्नों के विनाशक (और) मंगल के कारण (हो)।

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जोगी, यती (संन्यासी), मुनि (तुम्हारा) ध्यान लगाते हैं; शारद (सरस्वती), नारद (तुम्हें) सिर झुकाते हैं।

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(तुम्हें) नमस्कार है, नमस्कार है, जय हो, शिव को नमस्कार है; ब्रह्मा आदि देवता (भी तुम्हारा) पार नहीं पा सके।

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जो (कोई) मन लगाकर यह पाठ करता है, उस पर शंभु (शिव) सहायक होते हैं।

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जो कोई ऋणी (कर्ज़दार) हो, (वह भी पाठ का) अधिकारी (है); (जो) पाठ करे, वह (फल) पाने वाला (होता है)।

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पुत्र होने की जो इच्छा (हो), (वह) निश्चय ही शिव के प्रसाद (कृपा) से (पूरी) होती है।

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(भक्त) त्रयोदशी को पण्डित (को) बुलाए (और) ध्यानपूर्वक होम कराए।

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(जो) हमेशा त्रयोदशी का व्रत करे, उसके तन में (कोई) क्लेश नहीं रहता।

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(जो) शंकर के सम्मुख पाठ सुनाए, (और) जो मन, कर्म (और) वचन से (उनका) ध्यान लगाए।

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(वह) जन्म-जन्म के पाप नष्ट करता है (और) अन्त में शिवपुर में वास पाता है।

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अयोध्या (कवि अयोध्यादास) कहता है: (मुझे) तुम्हारी (ही) आशा है, (यह) जानकर हमारे सारे दुख हरो।

दोहा

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(मैं) नित्य नियम से प्रातः ही चालीस (चौपाइयों) का पाठ करता हूँ; हे जगदीश (जगत के स्वामी), तुम मेरी मनकामना (मनोकामना) पूरी करो।

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मगसर (मार्गशीर्ष मास) की छठ, हिमवंत (हेमन्त) ऋतु, संवत चौंसठ जानो; (कवि ने) शिव की (यह) स्तुति-चालीसा कल्याण (के लिए) पूरी की।

मूल पाठ: Its opening doha and last chaupai name अयोध्यादास, and its closing doha dates it संवत चौंसठ, most likely VS 1964 (1907); poet and date unverified. Traditional text, following word for word the printing शिवस्तुति चालीसा of Tej Kumar Book Depot, Lucknow (undated), pp. 3 to 20; checked line by line against four other printings: शिवस्तुति चालीसा (Naval Kishore Press Book Depot, Lucknow, undated); 51 चालीसा संग्रह आरतियों सहित (Randhir Prakashan, Haridwar, 2004), pp. 17 to 20; श्री शिव चालीसा (Randhir Book Sales, Haridwar, undated); and शिव चालीसा (Shri Sangameshwar Mahadev Mandir, Pehowa; 2007 per archive.org, unverified). Their readings are recorded in shiv-chalisa.notes.md। डिजिटल पाठ: Bharat Samhita (bharatsamhita.com): transcribed by Claude (AI) and checked line by line against the printings named in the edition; not yet reviewed by an editor (Public domain, unverified)।