भारत संहिता

पाद २

प्राणकामीयः पादः

प्राण की कामना

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भूमिका

प्राणकामीय पाद चरक संहिता के चिकित्सास्थान के पहले अध्याय, रसायन अध्याय, का दूसरा पाद है; यह अध्याय चार पादों (भागों) में बँटा है। पाद का नाम उसके उपदेश के आरम्भ से पड़ा है: भगवान् पुनर्वसु आत्रेय 'प्राणकाम' लोगों को, यानी प्राण (जीवन) की कामना करने वालों को, सम्बोधित करके रसायन-विधान ध्यान से सुनने को कहते हैं। रसायन वह चिकित्सा है जिसका उद्देश्य आयु, आरोग्य, यौवन और बल को बनाए रखना और बढ़ाना है। आत्रेय इस विधान को मानो दूसरा अमृत कहते हैं और उसके गुण गिनाते हैं: यह आयु और आरोग्य देता है, युवा अवस्था को स्थिर रखता है, निद्रा, तन्द्रा, थकान, आलस्य और दुर्बलता को दूर करता है, वात, कफ और पित्त को सम करता है, ढीले मांस को हटाता है, भीतर की अग्नि (पाचन-शक्ति) को प्रदीप्त करता है, और प्रभा, वर्ण और स्वर को उत्तम बनाता है। पाद के अनुसार इसी विधान से च्यवन आदि महर्षियों ने फिर से यौवन पाया।

फिर आत्रेय बताते हैं कि रसायन की आवश्यकता क्यों पड़ती है। पाद के अनुसार शरीर के सब दोष ग्राम्य आहार से होते हैं, उन लोगों में जो अम्ल, लवण, कटु और क्षार पदार्थ, सूखे शाक, मांस, तिल और आटे से बने पदार्थ खाते हैं; जो अंकुरित और नया अन्न, या विरुद्ध, असात्म्य, रूखा, भारी, दुर्गन्ध वाला और बासी भोजन करते हैं; जो प्रायः अनियमित भोजन करते हैं और पहला भोजन पचने से पहले फिर खा लेते हैं; जो नित्य दिन में सोते हैं और स्त्री-संग और मद्य में लगे रहते हैं; जिनका शरीर अनियमित और अत्यधिक व्यायाम से क्षुब्ध है; और जिनमें भय, क्रोध, शोक, लोभ और मोह अधिक हैं। इससे मांस शिथिल हो जाता है, सन्धियाँ खुल जाती हैं, रक्त विदग्ध होता है, मेद पिघलकर बहने लगता है, अस्थियों में मज्जा नहीं भरती, शुक्र प्रवृत्त नहीं होता और ओज क्षीण हो जाता है; ऐसा मनुष्य म्लान, आलसी और उत्साहहीन रहता है, उसकी स्मृति, बुद्धि और कान्ति नष्ट होती है, वह रोगों का घर बन जाता है और पूरी आयु नहीं पाता। इसलिए, पाद कहता है, इन दोषों को देखते हुए अहितकर आहार-विहार को त्यागकर रसायनों का प्रयोग करना चाहिए।

इसके बाद भगवान् आत्रेय रसायन के योग बताते हैं, पहले आमलक (आँवले) के। आमलक घृत में घी को क्रम से आमलक के स्वरस, विदारी के स्वरस, और दूध तथा बला-अतिबला के काढ़े में पकाया जाता है, पुनर्नवा, जीवन्ती और शतावरी के कल्क के साथ; पाद के अनुसार इसके प्रयोग से सौ वर्ष तक अवस्था जरा-रहित रहती है, पढ़ा-सुना याद रहता है, सब रोग शान्त होते हैं और मनुष्य सन्तानवान् होता है, और दो श्लोक इसके फल में विशाल और दृढ़ शरीर, बलवान् इन्द्रियाँ, सुन्दर रूप और मेघों की गर्जना जैसा स्वर भी गिनाते हैं। फिर आमलक अवलेह आता है, जिसमें आमलक और पिप्पली पलाश के क्षार-जल में रखे जाते हैं, और फिर छाया में सुखाकर, चूर्ण बनाकर और मधु और घी में मिलाकर छह महीने भूमि के भीतर रखे जाते हैं; फिर आमलक चूर्ण और विडङ्ग अवलेह, जिन्हें वर्षा ऋतु में राख के ढेर में रखा जाता है; और फिर एक दूसरा आमलक अवलेह, जिसमें आमलकों को पलाश की द्रोणी में भाप देकर पकाया जाता है। इन योगों के फल के लिए पाद बार-बार एक ही बात कहता है: इनके प्रयोग से सौ वर्ष तक बुढ़ापा नहीं आता, और फल पहले वाले योग के समान है। फिर नागबला की जड़ का रसायन आता है, जिसके लिए पाद बताता है कि जड़ें कैसी भूमि से, किस मास में और किस शुद्धि और पूजा के साथ उखाड़ी जाएँ। बला, अतिबला, चन्दन, अगुरु, खदिर आदि के स्वरसों और पुनर्नवा तक की दस ओषधियों को पाद नागबला के वर्णन से ही बताया हुआ मानता है, और साथ में यह विधि देता है कि ताज़ा स्वरस न मिले तो चूर्ण को बराबर जल में एक दिन-रात रखकर, मसलकर और छानकर स्वरस की तरह प्रयोग किया जाए।

फिर पाद भल्लातक (भिलावे) पर आता है। भल्लातक शुचि या शुक्र मास में इकट्ठे करके चार महीने जौ या उड़द के ढेर में रखे जाते हैं, और सहस् या सहस्य मास में उनका प्रयोग आरम्भ होता है; प्रयोग करने वाले का शरीर पहले शीत, स्निग्ध और मधुर द्रव्यों से तैयार किया गया हो। भल्लातक क्षीर में भल्लातकों का काढ़ा दूध के साथ पिया जाता है, मुँह के भीतर घी लगाकर, और भल्लातकों की संख्या दस से एक-एक करके तीस तक बढ़ाई और घटाई जाती है। फिर भल्लातक क्षौद्र आता है, जिसमें भाप से निकाले गए भल्लातक के रस में मधु और घी मिलाया जाता है, और भल्लातक तैल, जिसे दूध और मधुक के कल्क के साथ सौ बार पकाया जाता है। फिर भल्लातक के दस प्रयोगों के नाम गिनाए जाते हैं: घी, दूध, मधु, गुड़, यूष, तैल, पलल, सत्तू, लवण और तर्पण के साथ। अगले श्लोक कहते हैं कि भल्लातक तीक्ष्ण और अग्नि के समान हैं, पर विधि के अनुसार प्रयोग किए जाने पर अमृत के समान हो जाते हैं; कि रोग, प्रकृति और सात्म्य को जानने वाला वैद्य इन प्रयोगों की योजना करे; और कि कफ से उत्पन्न ऐसा कोई रोग नहीं, और न कोई विबन्ध (रुकावट), जिसे भल्लातक शीघ्र नष्ट न करे।

पाद का अन्त रसायन की महिमा से होता है। प्राचीन काल में बूढ़े हो चुके च्यवन आदि महर्षि, जो प्राण की कामना करते थे, इन कल्याणकारी रसायनों से असीम आयु वाले हो गए, और उस लम्बी आयु में ब्रह्म सम्बन्धी तप, ब्रह्मचर्य और अध्यात्म का ध्यान संचित करके स्वर्ग को गए। इसलिए, पाद कहता है, प्राण और सुख चाहने वालों को आयु के उत्कर्ष के लिए, भली-भाँति समाहित रहकर, विधि के अनुसार रसायन-विधि का सेवन करना चाहिए। अन्त का सार-श्लोक बताता है कि इस पाद में प्राणियों का हित चाहने वाले महर्षि ने रसायनों के सैंतीस सिद्ध संयोग बताए हैं। इस पाद से यह बात साथ ले जाने योग्य है कि यहाँ रसायन को उस क्षय के उपाय के रूप में रखा गया है जिसका कारण पाद ग्राम्य आहार-विहार को बताता है; कि रसायन से पहले अहितकर आहार-विहार का त्याग आता है; और कि भल्लातक जैसे तीक्ष्ण द्रव्य भी, पाद के अनुसार, विधि से प्रयोग किए जाने पर अमृत के समान होते हैं, और उनकी योजना वैद्य व्यक्ति के रोग, प्रकृति और सात्म्य को जानकर करता है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २३)

तत्र श्लोकः-रसायनानां संयोगाः सिद्धा भूतहितैषिणा।निर्दिष्टाः प्राणकामीये सप्तत्रिंशन्महर्षिणा॥

श्लोक २३ →

इस विषय में (सार रूप) श्लोक (है): प्राणियों का हित चाहने वाले महर्षि ने प्राणकामीय (पाद) में रसायनों के सैंतीस सिद्ध (परखे हुए) संयोग (योग) बताए हैं।

मुख्य शब्द (१०) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
आरोग्य
आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार

शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।

अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।

चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

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च. चि. १.२/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम प्राणकामीय (प्राण की कामना सम्बन्धी) रसायन-पाद की व्याख्या करेंगे।

च. चि. १.२/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. चि. १.२/३

। , , , , , । ; , , , , , , ; , , , , । -॥ ३ ॥

हे प्राण (जीवन) की कामना करने वालो, (अब) कहे जा रहे इस रसायन-विधान को ध्यान से सुनो, जो मानो एक दूसरा अमृत है, अदिति के पुत्रों (देवताओं) का हित करने वाला है, अचिन्त्य और अद्भुत प्रभाव वाला है, आयु बढ़ाने वाला और आरोग्य देने वाला है, वय (युवा अवस्था) को स्थिर रखने वाला है, निद्रा, तन्द्रा, श्रम, क्लम, आलस्य और दुर्बलता को दूर करने वाला है, अनिल (वात), कफ और पित्त को सम करने वाला है, स्थिरता देने वाला है, अबद्ध (ढीले) मांस को हटाने वाला है, भीतर की अग्नि को प्रदीप्त करने वाला है, और प्रभा, वर्ण तथा स्वर को उत्तम बनाने वाला है। इसी से च्यवन आदि महर्षियों ने फिर से यौवन पाया और वे स्त्रियों के अत्यन्त प्रिय हो गए; वे स्थिर, सम और सुविभक्त (सुडौल) मांस वाले, सुगठित और स्थिर शरीर वाले, अत्यन्त प्रसन्न (निर्मल) बल, वर्ण और इन्द्रियों वाले, सब जगह अप्रतिहत (न रुकने वाले) पराक्रम वाले और क्लेश सहने वाले (हो गए)। शरीर के सब दोष ग्राम्य आहार से होते हैं, उन लोगों में जो अम्ल, लवण, कटु, क्षार, सूखे शाक, मांस, तिल, पलल और पिष्टान्न खाते हैं; जो अंकुरित अन्न, नये शूकधान्य और शमीधान्य, तथा विरुद्ध, असात्म्य, रूक्ष, क्षार और अभिष्यन्दी (पदार्थ) खाते हैं; जो गीला-गला, गुरु, दुर्गन्ध वाला और बासी (भोजन) खाते हैं; जो प्रायः विषम भोजन और अध्यशन करते हैं; जो दिन में सोना, स्त्री-संग और मद्य नित्य करते हैं; जिनके शरीर विषम और अत्यधिक व्यायाम से क्षुब्ध हो गए हैं; और जिनमें भय, क्रोध, शोक, लोभ, मोह और आयास अधिक होते हैं। इसी कारण मांस शिथिल हो जाते हैं, सन्धियाँ खुल जाती हैं, रक्त विदग्ध हो जाता है, बहुत सा मेद पिघलकर बहने लगता है, अस्थियों में मज्जा नहीं भरती, शुक्र प्रवृत्त नहीं होता, और ओज क्षीण हो जाता है; ऐसी दशा को प्राप्त वह (मनुष्य) म्लान हो जाता है, अवसन्न हो जाता है, निद्रा, तन्द्रा और आलस्य से युक्त और उत्साहहीन होकर हाँफता है, शारीरिक और मानसिक चेष्टाओं में असमर्थ हो जाता है, उसकी स्मृति, बुद्धि और छाया (कान्ति) नष्ट हो जाती है, और रोगों का अधिष्ठान (घर) बना हुआ वह पूरी आयु नहीं पाता। इसलिए इन दोषों को देखते हुए, जैसे कहे गए हैं उन सब अहितकर आहार-विहारों को त्यागकर (मनुष्य को) रसायनों का प्रयोग करना चाहिए, ऐसा कहकर भगवान् पुनर्वसु आत्रेय बोले -

च. चि. १.२/४

, , ; ; , । , , , , ॥ ४ ॥

अच्छी भूमि में उत्पन्न, उचित समय (ऋतु) में उत्पन्न, जिनकी गन्ध, वर्ण और रस बिगड़े न हों, और जो रस, आकार तथा वीर्य से भरपूर हों, ऐसे आमलकों (आँवलों) के स्वरस से, जिसमें चौथाई भाग पुनर्नवा का कल्क मिला हो, एक आढक सर्पि (घी) पकाए; इसके बाद (उसे) विदारी के स्वरस से, जिसमें जीवन्ती का कल्क मिला हो, (पकाए); इसके बाद चार गुने दूध से और बला तथा अतिबला के कषाय (काढ़े) से, जिसमें शतावरी का कल्क मिला हो, (पकाए)। इस क्रम से एक-एक करके सौ बार या हजार बार पकाए गए (घी) को, चौथाई भाग शर्करा और क्षौद्र (मधु) मिलाकर, सोने, चाँदी या मिट्टी के शुद्ध, मज़बूत और घी से भावित कुम्भ (घड़े) में रखे। कही गई विधि से, अग्नि (पाचन-शक्ति) के अनुसार, प्रतिदिन प्रातः उसका प्रयोग करे, और (उसके) पच जाने पर दूध और घी के साथ शालि और षष्टिक (चावल) खाए। इसके प्रयोग से सौ वर्ष तक अवस्था जरा-रहित बनी रहती है, सुना-सीखा (स्मृति में) टिका रहता है, सब रोग शान्त हो जाते हैं, स्त्रियों में (उसकी) गति अबाधित रहती है, (और वह) सन्तानवान् होता है।

च. चि. १.२/५

- । ॥ ५ ॥

और इस विषय में (ये दो श्लोक) हैं: (इस योग का सेवन करने वाले मनुष्य का) शरीर विशाल, पर्वत के सार जैसी दृढ़ता वाला, स्थिर इन्द्रियों वाला और अत्यन्त बलवान् इन्द्रियों वाला भी, दूसरों से न दबाया जा सकने वाला, अत्यन्त सुन्दर रूप वाला, और प्रशंसा, सम्मान, सुख तथा (प्रसन्न) चित्त का भागी

च. चि. १.२/६

। ॥(।)

इस योग का सेवन करने वाले मनुष्य का बल महान् होता है, वर्ण की निर्मलता श्रेष्ठ होती है, स्वर मेघों के समूह की गर्जना जैसा होता है, और सन्तान विपुल तथा स्थिर होती है। (यह आमलक घृत है।)

च. चि. १.२/७

, । , , । ॥(।)

एक हजार आमलक (आँवले), एक हजार पिप्पली के साथ, तरुण पलाश (ढाक) के क्षार-जल में, जो उनके ऊपर तक हो, रखे रहें; फिर क्षार-जल के (उनमें) समा जाने पर उन्हें धूप के बिना (छाया में) सुखाकर, गुठली निकालकर, चूर्ण करके, चार गुने मधु और घी में मिलाकर, चौथाई भाग शर्करा का चूर्ण मिलाकर, घी के पात्र में भरकर छह महीने तक भूमि के भीतर रखे। उसके बाद अग्नि के बल के अनुरूप मात्रा में (इसे) खाए; इसका प्रयोग पूर्वाह्न में होता है, अपराह्न में नहीं, और आहार की विधि सात्म्य के अनुसार होती है। इसके प्रयोग से सौ वर्ष तक अवस्था जरा-रहित बनी रहती है, यह (फल) पहले वाले (योग) के समान है। (यह आमलक अवलेह है।)

च. चि. १.२/८

; ; ॥(।)

आमलक (आँवले) के चूर्ण का एक आढक, जिसे इक्कीस रातों तक आमलक के स्वरस (ताज़े निचोड़े हुए रस) से भिगोया गया हो, मधु और घृत के दो आढकों के साथ एक किया (मिलाया) गया हो, जिसमें आठवाँ भाग पिप्पली हो और जो शर्करा के चूर्ण के चौथे भाग से युक्त हो, (उसे) घृत के पात्र में रखकर प्रावृट् (वर्षा ऋतु) में भस्म (राख) के ढेर में रख दे; वर्षा (ऋतु) के अन्त में सात्म्य और पथ्य भोजन करने वाला (व्यक्ति) उसका प्रयोग करे; इसके प्रयोग से सौ वर्ष तक आयु अजर (बुढ़ापे से रहित) बनी रहती है, यह (फल) पहले वाले (योग) के समान है। (यह आमलक चूर्ण है।)

च. चि. १.२/९

॥( ।)

विडङ्ग (वायविडंग) के तण्डुलों (बीजों) के चूर्ण का एक आढक, पिप्पली के तण्डुलों (दानों) का एक आढक, सितोपला (मिश्री) का डेढ़ आढक, (इन्हें) सर्पि (घी), तैल और मधु के छह आढकों के साथ एक करके (मिलाकर), घृत के पात्र में रखकर प्रावृट् (वर्षा ऋतु) में भस्म (राख) के ढेर में (रख दे); इस प्रकार आशीः (अन्त के फल-कथन) तक सब कुछ पहले वाले (योग) के समान है। (यह विडङ्ग अवलेह है।)

च. चि. १.२/१०

, , ; ॥(।)

पहले कहे गए गुणों वाले एक हजार आमलकों (आँवलों) को गीले (ताज़े) पलाश (ढाक) की ढक्कन वाली द्रोणी (कुण्ड जैसे पात्र) में, जो भाप को बाहर न निकलने दे, वन के गोमय (गोबर) की आग से भाप दे (उपस्वेदन करे); अच्छी तरह भाप में पके और ठण्डे हुए उन (आमलकों) की गुठलियाँ निकालकर, उन्हें कूटकर, पिप्पली के चूर्ण के एक आढक, विडङ्ग (वायविडंग) के तण्डुलों (बीजों) के चूर्ण के एक आढक, शर्करा के डेढ़ आढक, और तैल, मधु और सर्पि (घी) के दो-दो आढकों के साथ मिलाकर, स्वच्छ, मजबूत, घृत से भावित घड़े में इक्कीस रातों तक रखे; इसके बाद (इसका) प्रयोग (होता है); इसके प्रयोग से सौ वर्ष तक आयु अजर (बुढ़ापे से रहित) बनी रहती है, यह (फल) पहले वाले (योग) के समान है। (यह दूसरा आमलक अवलेह है।)

च. चि. १.२/११

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(मनुष्य) तपस् (माघ) या तपस्य (फाल्गुन) मास में, पवित्र और संयत होकर, देवताओं की पूजा करके और द्विजों (ब्राह्मणों) से स्वस्ति-वाचन करवाकर, चल शुभ मुहूर्त में नागबला की ऐसी जड़ें उखाड़े जो सूखे प्रदेश में ऐसे स्थान पर उगी हों जो कुश से ढका हो, जिसकी मिट्टी चिकनी, काली और मधुर हो या सुनहरे रंग की हो, जो विष, हिंस्र पशुओं, वायु, जल और अग्नि के दोषों (उपद्रवों) से रहित हो, जहाँ जुती हुई भूमि, बाँबी, श्मशान, चैत्य, ऊसर भूमि और बस्ती न हों, और जहाँ ऋतु के अनुसार सुखद वायु, जल और धूप मिलती हो; (जड़ें ऐसी हों) जिन्हें कोई क्षति न पहुँची हो, जिन पर (दूसरे पौधे) न चढ़े हों, जो न कच्ची हों न पुरानी, जिनमें पूरा वीर्य आ गया हो, और जिन (पौधों) के पुराने पत्ते झड़ गए हों और दूसरे पत्ते अभी न निकले हों। उन अच्छी तरह धोई हुई (जड़ों) की छाल का बारीक पिसा हुआ गोला, आम्र भर या अक्ष भर, दूध में घोलकर सुबह सेवन करे; या (जड़ों को) चूर्ण करके दूध के साथ पिए; या मधु और घी के साथ मिलाकर खाए; और (उसके) पच जाने पर दूध और घी के साथ शालि और षष्टिक चावल खाए। एक वर्ष तक इसका प्रयोग करने से सौ वर्ष तक वय (अवस्था) अजर (बुढ़ापे से रहित) बनी रहती है, यह (फल) पहले वाले (योग) के समान है। गङ्गाधर तो ... (यह नागबला रसायन है।)

च. चि. १.२/१२

। ॥ १२ ॥

बला, अतिबला, चन्दन, अगुरु (अगर), धव, तिनिश, खदिर (खैर), शिंशपा (शीशम) और असन के स्वरस (निचोड़ा हुआ रस), और पुनर्नवा जिनके अन्त में है ऐसी दस ओषधियाँ, नागबला (के वर्णन) से ही बता दी गई हैं। स्वरस न मिलें तो स्वरस की यह विधि है: चूर्णों का एक आढक (और) जल का एक आढक, एक दिन-रात रखा हुआ, मसलकर छाना हुआ, स्वरस की तरह प्रयोग करना चाहिए।

च. चि. १.२/१३

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बिना बिगड़े, रोग से रहित, रस, आकार और वीर्य से पूरे भरे हुए और पके जाम्बव (जामुन) जैसे दिखने वाले भल्लातकों (भिलावों) को शुचि या शुक्र मास में इकट्ठा करके यव (जौ) के ढेर में या माष (उड़द) के ढेर में रख दे; चार महीने रखे हुए उन (भल्लातकों) का प्रयोग सहस् या सहस्य मास में आरम्भ करे, (वह व्यक्ति) जिसका शरीर शीत, स्निग्ध और मधुर (द्रव्यों) से तैयार किया गया हो। पहले दस भल्लातकों को कूटकर आठ गुने जल में भली भाँति पकाए, (फिर) उनका रस, जब आठवाँ भाग शेष रह जाए, छानकर दूध के साथ पिए, (पहले) मुख के भीतर सर्पि (घी) लगाकर। वे दस भल्लातक, एक-एक भल्लातक बढ़ाते और घटाते हुए, तीस तक प्रयोग किए जाने चाहिए; इससे आगे वृद्धि नहीं (की जाती)। प्रयोग की विधि के अनुसार भल्लातक का प्रयोग अधिक से अधिक एक हजार (भल्लातकों) तक ही है। और (औषध के) पच जाने पर सर्पि (घी) मिले दूध के साथ शालि और षष्टिक (चावल) का भोजन उपचार (आहार की व्यवस्था) है, और प्रयोग के अन्त में उतने (समय) का दुगुना (समय) केवल दूध से ही उपचार है। उसके प्रयोग से सौ वर्ष तक वय (अवस्था) अजर (बुढ़ापे से रहित) बनी रहती है, यह (फल) पहले वाले (योग) के समान है। (यह भल्लातक क्षीर है।)

च. चि. १.२/१४

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कूटे हुए भल्लातकों (भिलावों) से पिष्टस्वेदन (आटे की वस्तुएँ भाप से पकाने का पात्र) भरकर, (उसे) भूमि में गले तक गाड़े हुए, स्नेह (चिकनाई) से भावित, मजबूत कुम्भ (घड़े) के ऊपर रखकर, उडुप (ढकने के पात्र) से ढककर, काली मिट्टी से लीपे हुए (उसको) गोमय (गोबर) की आग से भाप दे (उपस्वेदन करे); उन (भल्लातकों) का जो स्वरस (अपना रस) कुम्भ में पहुँचे, उसे आठवाँ भाग मधु और दुगुना घृत मिलाकर खाए; उसके प्रयोग से सौ वर्ष तक वय (अवस्था) अजर (बुढ़ापे से रहित) बनी रहती है, यह (फल) पहले वाले (योग) के समान है। (यह भल्लातक क्षौद्र है।)

च. चि. १.२/१५

॥( ।)

भल्लातक-तैल के एक पात्र को दूध के साथ, एक अक्ष भर मधुक के कल्क (पिसी हुई लुगदी) से, सौ बार पकाए (शतपाक करे); (शेष सब) पहले वाले (योग) के समान है। (यह भल्लातक तैल है।)

च. चि. १.२/१६

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भल्लातक (भिलावे) का सर्पि (घृत), भल्लातक-क्षीर (दूध), भल्लातक-क्षौद्र (मधु), गुड-भल्लातक, भल्लातक-यूष (रसा), भल्लातक-तैल, भल्लातक-पलल, भल्लातक-सक्तु (सत्तू), भल्लातक-लवण (नमक) और भल्लातक-तर्पण, इस प्रकार भल्लातक का विधान (प्रयोग की विधि) कहा गया है। योगीन्द्रनाथ सेन तो 'इसी प्रकार गुड-भल्लातक, भल्लातक-यूष, भल्लातक-सर्पि, भल्लातक-पलल' आदि पाठ पढ़ते हैं।

च. चि. १.२/१७

- । ॥ १७ ॥

और यहाँ (इस विषय पर ये श्लोक) हैं: भल्लातक तीक्ष्ण, पाकी (पाक करने वाले) और अग्नि के समान होते हैं; (फिर भी) विधि के अनुसार प्रयोग किए जाने पर वे अमृत के समान हो जाते हैं।

च. चि. १.२/१८

। ॥ १८ ॥

इनके (भल्लातकों के) ये दस प्रकार के प्रयोग बताए गए हैं; रोग, प्रकृति और सात्म्य को जानने वाला (वैद्य) उन प्रयोगों की योजना करे।

च. चि. १.२/१९

। ॥( ।)

ऐसा कोई कफज (कफ से उत्पन्न) रोग नहीं है, और न कोई विबन्ध (रुकावट) है, जिसे मेधा और अग्नि को बढ़ाने वाला भल्लातक शीघ्र नष्ट न कर दे। (यह भल्लातक-विधि है।)

च. चि. १.२/२०

। ॥ २० ॥

प्राचीन काल में प्राण (जीवन) की कामना करने वाले, वृद्ध हो चुके च्यवन आदि महर्षि इन कल्याणकारी रसायनों से अमित (असीम) आयु वाले हो गए।

च. चि. १.२/२१

। ॥ २१ ॥

दीर्घ आयु वाले (वे महर्षि) इच्छा के अनुसार ब्राह्म (ब्रह्म सम्बन्धी) तप, ब्रह्मचर्य और अध्यात्म का ध्यान भी संचित करके त्रिदिव (स्वर्ग) को गए।

च. चि. १.२/२२

। ॥ २२ ॥

इसलिए प्राण (जीवन) की कामना करने वाले और सुख चाहने वाले (लोगों) को आयु के प्रकर्ष (उत्कर्ष) के लिए, भली-भाँति समाहित (एकाग्र और संयमित) रहकर, विधि के अनुसार रसायन-विधि का सेवन करना चाहिए।

च. चि. १.२/२३

- । ॥ २३ ॥

इस विषय में (सार रूप) श्लोक (है): प्राणियों का हित चाहने वाले महर्षि ने प्राणकामीय (पाद) में रसायनों के सैंतीस सिद्ध (परखे हुए) संयोग (योग) बताए हैं।

च. चि. १.२

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र (ग्रन्थ) के चिकित्सास्थान में, रसायन अध्याय में, प्राणकामीय नामक दूसरा रसायन-पाद (पूरा हुआ)।