भूमिका
प्राणकामीय पाद चरक संहिता के चिकित्सास्थान के पहले अध्याय, रसायन अध्याय, का दूसरा पाद है; यह अध्याय चार पादों (भागों) में बँटा है। पाद का नाम उसके उपदेश के आरम्भ से पड़ा है: भगवान् पुनर्वसु आत्रेय 'प्राणकाम' लोगों को, यानी प्राण (जीवन) की कामना करने वालों को, सम्बोधित करके रसायन-विधान ध्यान से सुनने को कहते हैं। रसायन वह चिकित्सा है जिसका उद्देश्य आयु, आरोग्य, यौवन और बल को बनाए रखना और बढ़ाना है। आत्रेय इस विधान को मानो दूसरा अमृत कहते हैं और उसके गुण गिनाते हैं: यह आयु और आरोग्य देता है, युवा अवस्था को स्थिर रखता है, निद्रा, तन्द्रा, थकान, आलस्य और दुर्बलता को दूर करता है, वात, कफ और पित्त को सम करता है, ढीले मांस को हटाता है, भीतर की अग्नि (पाचन-शक्ति) को प्रदीप्त करता है, और प्रभा, वर्ण और स्वर को उत्तम बनाता है। पाद के अनुसार इसी विधान से च्यवन आदि महर्षियों ने फिर से यौवन पाया।
फिर आत्रेय बताते हैं कि रसायन की आवश्यकता क्यों पड़ती है। पाद के अनुसार शरीर के सब दोष ग्राम्य आहार से होते हैं, उन लोगों में जो अम्ल, लवण, कटु और क्षार पदार्थ, सूखे शाक, मांस, तिल और आटे से बने पदार्थ खाते हैं; जो अंकुरित और नया अन्न, या विरुद्ध, असात्म्य, रूखा, भारी, दुर्गन्ध वाला और बासी भोजन करते हैं; जो प्रायः अनियमित भोजन करते हैं और पहला भोजन पचने से पहले फिर खा लेते हैं; जो नित्य दिन में सोते हैं और स्त्री-संग और मद्य में लगे रहते हैं; जिनका शरीर अनियमित और अत्यधिक व्यायाम से क्षुब्ध है; और जिनमें भय, क्रोध, शोक, लोभ और मोह अधिक हैं। इससे मांस शिथिल हो जाता है, सन्धियाँ खुल जाती हैं, रक्त विदग्ध होता है, मेद पिघलकर बहने लगता है, अस्थियों में मज्जा नहीं भरती, शुक्र प्रवृत्त नहीं होता और ओज क्षीण हो जाता है; ऐसा मनुष्य म्लान, आलसी और उत्साहहीन रहता है, उसकी स्मृति, बुद्धि और कान्ति नष्ट होती है, वह रोगों का घर बन जाता है और पूरी आयु नहीं पाता। इसलिए, पाद कहता है, इन दोषों को देखते हुए अहितकर आहार-विहार को त्यागकर रसायनों का प्रयोग करना चाहिए।
इसके बाद भगवान् आत्रेय रसायन के योग बताते हैं, पहले आमलक (आँवले) के। आमलक घृत में घी को क्रम से आमलक के स्वरस, विदारी के स्वरस, और दूध तथा बला-अतिबला के काढ़े में पकाया जाता है, पुनर्नवा, जीवन्ती और शतावरी के कल्क के साथ; पाद के अनुसार इसके प्रयोग से सौ वर्ष तक अवस्था जरा-रहित रहती है, पढ़ा-सुना याद रहता है, सब रोग शान्त होते हैं और मनुष्य सन्तानवान् होता है, और दो श्लोक इसके फल में विशाल और दृढ़ शरीर, बलवान् इन्द्रियाँ, सुन्दर रूप और मेघों की गर्जना जैसा स्वर भी गिनाते हैं। फिर आमलक अवलेह आता है, जिसमें आमलक और पिप्पली पलाश के क्षार-जल में रखे जाते हैं, और फिर छाया में सुखाकर, चूर्ण बनाकर और मधु और घी में मिलाकर छह महीने भूमि के भीतर रखे जाते हैं; फिर आमलक चूर्ण और विडङ्ग अवलेह, जिन्हें वर्षा ऋतु में राख के ढेर में रखा जाता है; और फिर एक दूसरा आमलक अवलेह, जिसमें आमलकों को पलाश की द्रोणी में भाप देकर पकाया जाता है। इन योगों के फल के लिए पाद बार-बार एक ही बात कहता है: इनके प्रयोग से सौ वर्ष तक बुढ़ापा नहीं आता, और फल पहले वाले योग के समान है। फिर नागबला की जड़ का रसायन आता है, जिसके लिए पाद बताता है कि जड़ें कैसी भूमि से, किस मास में और किस शुद्धि और पूजा के साथ उखाड़ी जाएँ। बला, अतिबला, चन्दन, अगुरु, खदिर आदि के स्वरसों और पुनर्नवा तक की दस ओषधियों को पाद नागबला के वर्णन से ही बताया हुआ मानता है, और साथ में यह विधि देता है कि ताज़ा स्वरस न मिले तो चूर्ण को बराबर जल में एक दिन-रात रखकर, मसलकर और छानकर स्वरस की तरह प्रयोग किया जाए।
फिर पाद भल्लातक (भिलावे) पर आता है। भल्लातक शुचि या शुक्र मास में इकट्ठे करके चार महीने जौ या उड़द के ढेर में रखे जाते हैं, और सहस् या सहस्य मास में उनका प्रयोग आरम्भ होता है; प्रयोग करने वाले का शरीर पहले शीत, स्निग्ध और मधुर द्रव्यों से तैयार किया गया हो। भल्लातक क्षीर में भल्लातकों का काढ़ा दूध के साथ पिया जाता है, मुँह के भीतर घी लगाकर, और भल्लातकों की संख्या दस से एक-एक करके तीस तक बढ़ाई और घटाई जाती है। फिर भल्लातक क्षौद्र आता है, जिसमें भाप से निकाले गए भल्लातक के रस में मधु और घी मिलाया जाता है, और भल्लातक तैल, जिसे दूध और मधुक के कल्क के साथ सौ बार पकाया जाता है। फिर भल्लातक के दस प्रयोगों के नाम गिनाए जाते हैं: घी, दूध, मधु, गुड़, यूष, तैल, पलल, सत्तू, लवण और तर्पण के साथ। अगले श्लोक कहते हैं कि भल्लातक तीक्ष्ण और अग्नि के समान हैं, पर विधि के अनुसार प्रयोग किए जाने पर अमृत के समान हो जाते हैं; कि रोग, प्रकृति और सात्म्य को जानने वाला वैद्य इन प्रयोगों की योजना करे; और कि कफ से उत्पन्न ऐसा कोई रोग नहीं, और न कोई विबन्ध (रुकावट), जिसे भल्लातक शीघ्र नष्ट न करे।
पाद का अन्त रसायन की महिमा से होता है। प्राचीन काल में बूढ़े हो चुके च्यवन आदि महर्षि, जो प्राण की कामना करते थे, इन कल्याणकारी रसायनों से असीम आयु वाले हो गए, और उस लम्बी आयु में ब्रह्म सम्बन्धी तप, ब्रह्मचर्य और अध्यात्म का ध्यान संचित करके स्वर्ग को गए। इसलिए, पाद कहता है, प्राण और सुख चाहने वालों को आयु के उत्कर्ष के लिए, भली-भाँति समाहित रहकर, विधि के अनुसार रसायन-विधि का सेवन करना चाहिए। अन्त का सार-श्लोक बताता है कि इस पाद में प्राणियों का हित चाहने वाले महर्षि ने रसायनों के सैंतीस सिद्ध संयोग बताए हैं। इस पाद से यह बात साथ ले जाने योग्य है कि यहाँ रसायन को उस क्षय के उपाय के रूप में रखा गया है जिसका कारण पाद ग्राम्य आहार-विहार को बताता है; कि रसायन से पहले अहितकर आहार-विहार का त्याग आता है; और कि भल्लातक जैसे तीक्ष्ण द्रव्य भी, पाद के अनुसार, विधि से प्रयोग किए जाने पर अमृत के समान होते हैं, और उनकी योजना वैद्य व्यक्ति के रोग, प्रकृति और सात्म्य को जानकर करता है।