भारत संहिता

पाद ३

करप्रचितीयः पादः

हाथ से चुने (आँवले)

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भूमिका

करप्रचितीय पाद चरक संहिता के चिकित्सास्थान के पहले अध्याय, रसायन अध्याय, का तीसरा पाद (भाग) है। इसका नाम इसके पहले योग के शब्द 'करप्रचित' से पड़ा है, यानी हाथ से चुने गए, जो वहाँ आमलक (आँवले) के फलों के लिए आया है। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। रसायन वह औषध या विधि है जिसे चरक संहिता बुढ़ापे और रोग को दूर रखकर आयु, बल और बुद्धि बढ़ाने वाला बताती है। पाद के अन्त का सार-श्लोक कहता है कि इसमें महर्षि ने सिद्ध (परखे हुए) रसायनों के सोलह योग बताए हैं; ये आमलक, धातुओं, कुछ वनस्पतियों, पिप्पली, त्रिफला और शिलाजतु (शिलाजीत) से बनते हैं।

पाद आमलकायस ब्राह्म रसायन से आरम्भ होता है: हाथ से चुने आँवलों का चूर्ण उनके अपने स्वरस से इक्कीस बार तर करके सुखाया जाता है, फिर जीवनीय, बृंहणीय, वयःस्थापन आदि औषध-गणों और हरड़, बहेड़ा, पिप्पली आदि के काढ़े में पकाया जाता है, और उसमें आठवाँ भाग लोह-चूर्ण मिलाकर, अग्नि (पाचन-शक्ति) के बल को देखकर, मधु और घी के साथ उसका प्रयोग बताया गया है। पाद के अनुसार इसे ब्रह्मा जी ने बनाया था, और वसिष्ठ, कश्यप, अङ्गिरा, जमदग्नि, भरद्वाज और भृगु जैसे ऋषि इसके प्रयोग से श्रम, रोग और बुढ़ापे के भय से मुक्त होकर जब तक चाहा तप करते रहे। फिर पाद एक चेतावनी देता है: महर्षि तप, ब्रह्मचर्य, ध्यान, मन की शान्ति और रसायन के विधिपूर्वक प्रयोग से लम्बे समय तक जीवित रहे, पर जो लोग दूसरे कामों में लगे और असंयमी हैं, उनके लिए कोई रसायन सिद्ध नहीं होता। अगला योग, केवल आमलक का रसायन, इसी संयम पर टिका है: साधक एक वर्ष तक गायों के बीच केवल दूध पर रहकर सावित्री का ध्यान करता है, फिर तीन दिन उपवास करके आँवले के वन में एक पेड़ पर चढ़ता है और फल हाथ में पकड़कर तब तक जप करता है जब तक उसमें अमृत न आ जाए।

इसके बाद धातुओं और वनस्पतियों के योग आते हैं। लौह रसायन में तीक्ष्ण लोहे के पतले पत्र आग में तपाकर त्रिफला के रस, गोमूत्र और क्षारों में क्रम से साधित किए जाते हैं, और उनका बारीक चूर्ण मधु और आँवले के रस के साथ घी से भावित घड़े में एक वर्ष रखा जाता है; पाद कहता है कि सोने और चाँदी का प्रयोग भी इसी विधि से सिद्ध है। ऐन्द्र रसायन में ऐन्द्री, ब्राह्मी, वचा, शङ्खपुष्पी आदि वनस्पतियों के साथ सोना, नमक, घी और बहुत थोड़ी मात्रा में विष मिलता है, और पाद इसे ओज बढ़ाने वाला बताता है। फिर चार मेध्य रसायन, यानी मेधा (बुद्धि) के लिए हितकर योग, आते हैं: मण्डूकपर्णी का स्वरस, दूध के साथ मुलेठी का चूर्ण, गुडूची (गिलोय) का रस और शङ्खपुष्पी का कल्क; इनमें शङ्खपुष्पी को विशेष रूप से मेध्य कहा गया है।

फिर पिप्पली और त्रिफला के योग हैं। पिप्पली मधु और घी के साथ एक वर्ष तक ली जाती है, या किंशुक (पलाश) के क्षार से भावित करके और घी में भूनकर मधु के साथ, और पाद इसे कास, श्वास, हिक्का, अर्श और गुल्म जैसे रोगों को जीतने वाला बताता है। पिप्पली-वर्धमान योग में पिप्पली की संख्या दूध के साथ दस दिन तक रोज़ बढ़ाई और फिर उसी क्रम से घटाई जाती है, और वह पीसकर, उबालकर या चूर्ण बनाकर, किस रूप में ली जाए, यह व्यक्ति के बल पर छोड़ा गया है। त्रिफला, यानी हरड़, बहेड़ा और आँवला, के चार योग हैं; पहले में तीनों फल दिन में अलग-अलग समय पर लिए जाते हैं, और पाद के अनुसार एक वर्ष के प्रयोग से व्यक्ति बुढ़ापे और रोग से रहित होकर सौ वर्ष जीता है।

अन्त में पाद शिलाजतु का विस्तार से वर्णन करता है। उसके अनुसार सूर्य की गर्मी से तपकर पर्वत की सोना, चाँदी, ताँबा और काला लोहा, ये चार धातुएँ लाख जैसा कोमल स्राव बहाती हैं, और वही शिलाजतु है; उसकी चार जातियाँ स्वाद, रंग और विपाक से पहचानी जाती हैं, और रसायन के लिए लोहे वाली जाति सबसे श्रेष्ठ कही गई है। उसे दोषों को शान्त करने वाले काढ़ों में सात दिन भावित करके दूध के साथ लेने को कहा गया है; प्रयोग सात, तीन या एक सप्ताह का होता है, और उसके साथ जलन करने वाला और भारी भोजन, और कुलथी तो सदा, वर्जित है। पाद कहता है कि पृथ्वी पर ऐसा कोई साध्य रोग नहीं जिसे शिलाजतु न जीत ले। इस पाद से यह बात साथ ले जाने योग्य है कि यहाँ रसायन केवल औषध नहीं है: उसकी सफलता सेवन करने वाले के संयम पर टिकी है, और उसकी मात्रा और रूप व्यक्ति के बल और पाचन-शक्ति को देखकर तय किए जाते हैं।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ६६)

तत्र श्लोकः-करप्रचितिके पादे दश षट् च महर्षिणा।रसायनानां सिद्धानां संयोगाः समुदाहृताः॥

श्लोक ६६ →

इस विषय में (यह) श्लोक है: करप्रचितिक (करप्रचितीय नामक) पाद में महर्षि द्वारा सिद्ध रसायनों के दस और छह (यानी सोलह) संयोग बताए गए हैं।

मुख्य शब्द (१६) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

स्वस्थ
स्वस्थ - अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित; निरोगी
विस्तार

शब्द-रचना: स्व (अपने) + स्थ (स्थित)।

अर्थ: जो अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो, अर्थात् निरोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ का भी आश्रय है (सू. १/२४), और कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त - स्वास्थ्य की रक्षा - के लिए माने गए हैं (सू. १/६७)।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. चि. १.३/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम करप्रचितीय (हाथ से चुने गए आँवलों सम्बन्धी) रसायन-पाद की व्याख्या करेंगे।

च. चि. १.३/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. चि. १.३/३

, , , , , ॥ ३ ॥

हाथ से चुने गए, जैसे कहे गए हैं वैसे गुणों वाले, गुठली निकाले हुए, सुखाकर चूर्ण किए गए, फिर माघ या फाल्गुन मास में इक्कीस (तीन बार सात) बार (अपने ही) स्वरस से तर किए गए, और फिर सुखाकर चूर्ण किए गए आमलकों (आँवलों) का एक आढक ले। फिर षड्विरेचनशताश्रितीय (अध्याय) में कहे गए जीवनीय, बृंहणीय, स्तन्यजनन, शुक्रजनन और वयःस्थापन औषध-गणों का, छोटे-छोटे टुकड़ों में कटे हुए चन्दन, अगुरु (अगर), धव, तिनिश, खदिर (खैर), शिंशपा (शीशम) और असन के सार (भीतरी कठोर लकड़ी) का, और अभया (हरड़), बिभीतक (बहेड़ा), पिप्पली, वचा (वच), चव्य, चित्रक और विडङ्ग (वायविडंग) का, इन सबका मिलाकर एक आढक दस गुने जल में पकाए। जब वह रस (काढ़ा) एक आढक शेष रह जाए और अच्छी तरह छान लिया जाए, तब उसमें वे आमलक-चूर्ण डालकर, गोबर (के उपलों) की आग से, या बाँस की खपच्चियों, शर और तेजन की आग से, तब तक पकाए जब तक रस (पूरी तरह) सूख न जाए। उसे जलने से पहले ही उतारकर, लोहे की थालियों में फैलाकर सुखाए। अच्छी तरह सूखे हुए उसे काले मृग के चर्म के ऊपर (रखी) सिल पर बारीक पीसकर, लोहे की स्थाली (पात्र) में ठीक से रखवा दे। उस चूर्ण को आठवें भाग लोह-चूर्ण से मिलाकर, अग्नि-बल (पाचन-शक्ति) को भली-भाँति देखकर, मधु और सर्पि (घी) के साथ प्रयोग करे - ऐसा (विधान है)।

च. चि. १.३/४

- । ॥ ४ ॥

और इस विषय में (ये श्लोक) हैं - पहले (प्राचीन काल में) वसिष्ठ, कश्यप, अङ्गिरा, जमदग्नि, भरद्वाज, भृगु और उन जैसे अन्य (ऋषि) इस रसायन का

च. चि. १.३/५

।॥ ५ ॥

प्रयोग करके, प्रयत (संयमी) रहकर, श्रम, व्याधि और जरा (बुढ़ापे) के भय से मुक्त हो गए, और उसके प्रभाव से महान् बल वाले (होकर उन्होंने) जब तक चाहा, तप किया।

च. चि. १.३/६

। ॥( ।)

ब्रह्मा ने यह रसायन बनाया, जो हजार वर्ष (की आयु) देने वाला, जरा (बुढ़ापे) और व्याधि को शान्त करने वाला, और बुद्धि, इन्द्रियों तथा बल को देने वाला है। (यह आमलकायस ब्राह्म रसायन है।)

च. चि. १.३/७

। ॥ ७ ॥

तप, ब्रह्मचर्य, ध्यान और प्रशम (मन की शान्ति) से, उचित समय पर किए गए रसायन-विधान से, और आयु के साथ

च. चि. १.३/८

, । ॥ ८ ॥

महर्षि पहले (प्राचीन काल में) स्थित रहे (जीवित रहे)। क्योंकि जो ग्राम्य (बस्ती का साधारण जीवन जीने वाले) हैं, जिनके काम दूसरे हैं, और जिनका मन प्रयत (संयमी) नहीं है, उनके लिए कोई भी रसायन सिद्ध नहीं होता।

च. चि. १.३/९

। ॥ ९ ॥

एक वर्ष तक (केवल) दूध पर निर्वाह करते हुए, मन से सावित्री (मन्त्र) का ध्यान करते हुए, ब्रह्मचारी और यतेन्द्रिय (इन्द्रियों को वश में रखने वाला) होकर, (साधक) सदा गायों के बीच रहे।

च. चि. १.३/१०

। ॥ १० ॥

वर्ष के अन्त में, पौष, माघ या फाल्गुन (मास) के शुक्ल (पक्ष) की तिथि को, तीन दिन का उपवास करके, आमलकी (आँवले) के वन में प्रवेश करके

च. चि. १.३/११

। ॥ ११ ॥

(फिर) बड़े फलों से भरे (आमलकी के) वृक्ष पर चढ़कर, शाखा पर लगे फल को हाथ से पकड़कर, ब्रह्म (वेद-मन्त्र) का जप करते हुए अमृत के आने तक (वहीं) खड़ा रहे।

च. चि. १.३/१२

। ॥ १२ ॥

क्योंकि उस समय अमृत निश्चय ही क्षण भर के लिए आमलक (आँवले) में वास करता है। (तब वे फल) शर्करा और मधु जैसे, स्नेह से युक्त और मृदु

च. चि. १.३/१३

। ॥ १३ ॥

अमृत के संयोग से (ऐसे) हो जाते हैं। उनमें से (वह) जितने (फल) खाए, उतने हज़ार वर्ष तक, यौवन को प्राप्त होकर, जीवित रहे।

च. चि. १.३/१४

। ॥( ।)

इनसे पूरी तृप्ति पाकर तो (वह) अमर (देवता) के समान हो जाता है। और श्री, वेद तथा रूप धारण की हुई वाक् (वाणी) स्वयं उसके पास उपस्थित होते हैं। (यह केवल आमलक का रसायन है।)

च. चि. १.३/१५

। ॥ १५ ॥

त्रिफला के रस में, गायों के मूत्र में, और लवण वाले क्षार में, और क्रम से इङ्गुदी के क्षार में तथा किंशुक (पलाश) के क्षार में भी

च. चि. १.३/१६

। ॥ १६ ॥

तीक्ष्ण आयस (लोहे) के, चार अङ्गुल लम्बे और तिल की मोटाई जितने पतले पत्रों (पत्तरों) को, अग्नि के रंग के (दहकते हुए, उन द्रवों में) साधित करे।

च. चि. १.३/१७

। ॥ १७ ॥

उन्हें अञ्जन (काजल) जैसा (हुआ) जानकर, (उनका) बारीक चूर्ण करवाए। वे चूर्ण मधु और आमलक (आँवले) के रस के साथ

च. चि. १.३/१८

कुम्भे । ॥ १८ ॥

लेह (चाटने योग्य गाढ़े मिश्रण) की तरह मिलाए गए (वे चूर्ण), घी से भावित कुम्भ (घड़े) में रखे हुए, एक वर्ष तक रखे जाने चाहिए, और वैसे ही जौ के ढेर में (भी)।

च. चि. १.३/१९

। ॥ १९ ॥

समझदार (व्यक्ति) महीने में (एक बार) सब ओर से चलाते हुए (उसे) आलोडन दे (अच्छी तरह मिलाए)। वर्ष बीतने पर मधु और सर्पि (घी) के साथ उसका प्रयोग

च. चि. १.३/२०

। ॥ २० ॥

प्रतिदिन प्रातः, (अपने) बल का ध्यान रखते हुए, (किया जाए), और (उसके) पच जाने पर सात्म्य भोजन (लिया जाए)। और लौहों का प्रयोग भी यही बताया गया है।

च. चि. १.३/२१

। ॥ २१ ॥

वह न अभिघातों (चोटों) से, न आतङ्कों (रोगों) और जरा (बुढ़ापे) से, और न मृत्यु से दबाया जा सकता है; (वह) हाथी जैसे प्राण वाला और सदा अत्यन्त बलवान् इन्द्रियों वाला होता है।

च. चि. १.३/२२

। समां ॥ २२ ॥

लौह रसायन का एक वर्ष तक प्रयोग करने वाला मनुष्य धीमान् (बुद्धिमान्), यशस्वी, वाणी में सिद्ध, सुने हुए (ज्ञान) को धारण करने वाला और महाधनी हो जाता है।

च. चि. १.३/२३

। ॥( ।)

इसी विधि से सोने और चाँदी का भी प्रयोग सिद्ध (परखा हुआ) है, जो आयु का प्रकर्ष (वृद्धि) करने वाला और सब रोगों को दूर करने वाला है। (यह लौह आदि का रसायन है।)

च. चि. १.३/२४

। ॥ २४ ॥

ऐन्द्री, मत्स्याख्यक, ब्राह्मी, वचा (वच), ब्रह्मसुवर्चला, पिप्पलियाँ, लवण (नमक), हेम (सोना), शङ्खपुष्पी, विष और घृत (घी)

च. चि. १.३/२५

। ॥ २५ ॥

इनमें से हेम (सोना), सर्पि (घी) और विष को छोड़कर (बाकी सबके) तीन-तीन यव के भाग (डाले); उसमें हेम (सोने) के तो दो यव, और विष का एक तिल (भर भाग) डाले।

च. चि. १.३/२६

। ॥ २६ ॥

और सर्पि (घी) का एक पल डाले; उस (सबको) एक साथ (मिलाकर) प्रयोग करे। और (उसके) पच जाने पर घी से भरपूर, क्षौद्र (मधु) सहित अन्न प्रशस्त (उत्तम) माना जाता है।

च. चि. १.३/२७

। ॥ २७ ॥

(यह) जरा (बुढ़ापे) और व्याधियों को शान्त करने वाला, स्मृति और मेधा देने वाला श्रेष्ठ (रसायन), आयुष्य (आयु के लिए हितकर), पौष्टिक, धन्य (कल्याणकारी) और स्वर तथा वर्ण को निर्मल करने वाला

च. चि. १.३/२८

। ॥ २८ ॥

और यह सिद्ध ऐन्द्र रसायन अत्यन्त ओजस्कर (ओज देने वाला) है। इसे न कृत्या (अभिचार) दबा सकती है, न अलक्ष्मी, न विष और न रुक् (रोग)।

च. चि. १.३/२९

। ॥( ।)

कुष्ठ सहित श्वित्र, जठर (उदर-रोग), गुल्म, प्लीहा (तिल्ली का रोग), पुराना विषमज्वर, और मेधा, स्मृति तथा ज्ञान को हरने वाले रोग, और अत्यन्त बलवान् वात (-विकार) इस (रसायन) से शान्त हो जाते हैं। (यह ऐन्द्र रसायन है।)

च. चि. १.३/३०

। ॥ ३० ॥

मण्डूकपर्णी का स्वरस प्रयोग करने योग्य है; दूध के साथ यष्टीमधुक (मुलेठी) का चूर्ण; और मूल तथा पुष्प सहित गुडूची (गिलोय) का रस; और शङ्खपुष्पी का कल्क निश्चय ही प्रयोग करने योग्य है।

च. चि. १.३/३१

। ॥( ।)

ये रसायन आयु देने वाले, रोगों का नाश करने वाले, बल, अग्नि, वर्ण और स्वर को बढ़ाने वाले, और मेध्य (मेधा अर्थात् बुद्धि के लिए हितकर) हैं; और (इनमें) शङ्खपुष्पी विशेष रूप से मेध्य है। (ये मेध्य रसायन हैं।)

च. चि. १.३/३२

। ॥ ३२ ॥

रसायन के गुण चाहने वाला (व्यक्ति) पाँच, आठ, सात या दस पिप्पलियाँ मधु और घी के साथ एक वर्ष (तक) प्रयोग करे।

च. चि. १.३/३३

। ॥ ३३ ॥

किंशुक (पलाश) के क्षार से भावित (उसमें भिगोकर तैयार की गई) (और) घी में भूनी हुई पिप्पलियाँ, तीन-तीन (की संख्या में), पूर्वाह्ण (दिन के पहले भाग) में, भोजन करके और भोजन से पहले

च. चि. १.३/३४

। ॥ ३४ ॥

रसायन के गुण चाहने वाले (व्यक्ति) को (ये पिप्पलियाँ) मधु में मिलाकर प्रयोग करनी चाहिए, (इन रोगों को) जीतने के लिए: कास (खाँसी), क्षय, शोष, श्वास, हिक्का (हिचकी), गले के रोग

च. चि. १.३/३५

। ॥( ।)

अर्श (बवासीर), ग्रहणी-दोष, पाण्डुता, विषमज्वर, वैस्वर्य (आवाज़ का बिगड़ना), पीनस, शोफ (सूजन), गुल्म (और) वातबलासक (को भी)। (यह पिप्पली रसायन है।)

च. चि. १.३/३६

। ॥ ३६ ॥

क्रम से बढ़ाते हुए दस दिन तक, प्रतिदिन दस पिप्पली (के हिसाब से), दूध के साथ (मात्रा) बढ़ाए; फिर उसी प्रकार घटाए।

च. चि. १.३/३७

। ॥ ३७ ॥

और (पिप्पली के) हर बार पच जाने पर दूध और घी के साथ षष्टिक (साठी चावल) खाए। पिप्पलियों के हज़ार (की संख्या) का यह प्रयोग रसायन है।

च. चि. १.३/३८

, । ॥ ३८ ॥

पीसी हुई वे (पिप्पलियाँ) बलवानों को सेवन करनी चाहिए, उबाली हुई मध्यम बल वाले मनुष्यों को, (और) चूर्ण की हुई कम बल वालों को, दोषों और रोगों के प्रति (उन्हें देखते हुए) प्रयोग करनी चाहिए।

च. चि. १.३/३९

। ॥‘ ।

दस पिप्पली वाला (प्रयोग) श्रेष्ठ है, छः (पिप्पली वाला) मध्यम कहा गया है; जो प्रयोग तीन तक का है, वह सबसे छोटा है, और वह निर्बलों (के लिए) है। (टिप्पणी:) 'षट् (यानी) छः पिप्पली वाला योग', ऐसा योगीन्द्रनाथ सेन (कहते हैं)।

च. चि. १.३/४०

। ॥( ।)

पिप्पलियों का (यह) रसायन बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाला), स्वर के लिए हितकर, आयु के लिए हितकर, प्लीहोदर (तिल्ली बढ़ने से होने वाले उदर रोग) का नाश करने वाला, वय (यौवन) को स्थिर रखने वाला (और) मेध्य है। (यह पिप्पली-वर्धमान रसायन है।)

च. चि. १.३/४१

। ॥ ४१ ॥

जरण (पिछले भोजन के पचने) के अन्त में एक अभया (हरीतकी), भोजन से पहले दो बिभीतक, और भोजन करके मधु और घी के साथ चार आमलक (आँवले)

च. चि. १.३/४२

। ॥( ।)

(इस प्रकार) एक वर्ष तक त्रिफला के (इस) रसायन का प्रयोग करता हुआ (व्यक्ति) जरा (बुढ़ापे) से रहित और रोग से रहित होकर पूरे सौ वर्ष जीवित रहे। (यह त्रिफला रसायन है।)

च. चि. १.३/४३

। ॥ ४३ ॥

लोहे की नई पात्री (बर्तन) पर त्रिफला के कल्क का लेप करे; एक दिन-रात (रखे गए) उस लेप को क्षौद्र (मधु) और जल में घोलकर पिए।

च. चि. १.३/४४

। ॥( ।)

उस (प्रयोग) में, (पिया हुआ लेप) पच जाने पर, प्रचुर स्नेह वाला भोजन प्रशस्त (उत्तम) माना जाता है। वर्ष भर के अभ्यास से (व्यक्ति) जरा (बुढ़ापे) से रहित (और) रोग से रहित होकर सौ वर्ष जीवित रहे। (यह एक और त्रिफला रसायन है।)

च. चि. १.३/४५

। ॥( ।)

मधुक (मुलेठी), तुगाक्षीरी (वंशलोचन), पिप्पली, क्षौद्र (मधु) और सर्पि (घी), तथा सिता (सफ़ेद शक्कर) से भी युक्त त्रिफला (एक) सिद्ध रसायन है। (यह एक और त्रिफला रसायन है।)

च. चि. १.३/४६

। ॥‘ ।

सब लौहों (धातुओं), सुवर्ण (सोने), वचा (वच), मधु और सर्पि (घी), विडङ्ग और पिप्पली, तथा लवण (नमक) के साथ (प्रयुक्त) त्रिफला (टिप्पणी:) 'सब लोहों से, (अर्थात्) त्रपु (राँगा), सीस (सीसा), ताम्र (ताँबा), रूप्य (चाँदी) और कृष्णलोह (काले लोहे) से', ऐसा योगीन्द्रनाथ सेन (कहते हैं)।

च. चि. १.३/४७

। ॥( ।)

एक संवत्सर (वर्ष) तक प्रयोग करने से (वह त्रिफला) मेधा, स्मृति और बल देने वाली, आयु देने वाली, धन्य (कल्याणकारी) और जरा (बुढ़ापे) तथा रोगों को नष्ट करने वाली होती है। (यह एक और त्रिफला रसायन है।)

च. चि. १.३/४८

। ॥ ४८ ॥

शिलाजतु (शिलाजीत) अनम्ल (खट्टा नहीं), कषाय और विपाक में कटु होता है; (वह) न अधिक उष्ण है, न अधिक शीत। उसकी उत्पत्ति चार धातुओं से होती है।

च. चि. १.३/४९

। ॥ ४९ ॥

सोने से, चाँदी से, ताँबे से और श्रेष्ठ कृष्णायस (काले लोहे) से भी (शिलाजतु उत्पन्न होता है)। उसकी (प्रयोग-) विधियों से (सेवन करने पर) वह रसायन है, वह वृष्य है और वह रोगों को दूर करने वाला है।

च. चि. १.३/५०

। ॥ ५० ॥

और वात, पित्त और कफ को नष्ट करने वाले निर्यूहों (काढ़ों) से, सब (निर्यूहों) से एक साथ या एक-एक से भी, भली-भाँति भावित (भावना दिया हुआ) वह (शिलाजतु) वीर्य (शक्ति) के परम उत्कर्ष को प्राप्त होता है।

च. चि. १.३/५१

। ॥‘ । । () ।

(निर्यूह में) डालकर निकाले गए इस (शिलाजतु) को भी फिर से कुछ गरम रस (निर्यूह) में डाले; इस विधि से सात दिन तक उसकी भावना (की जाती है)। (टिप्पणी:) 'शिलाजतु को वातहर आदि (द्रव्यों) के कुछ गरम क्वाथ में डालकर, फिर इसे धूप में सुखाए। उस क्वाथ को सोख चुके (शिलाजतु) को निकालकर फिर से उसे (उसी) रस में, (अर्थात्) क्वाथ में, डाले। इस विधि से सात दिन (सात बार) उसकी भावना (होती है)', ऐसा गङ्गाधर (कहते हैं)।

च. चि. १.३/५२

। पीतं ॥ ५२ ॥

पहले कही गई विधि से, चूर्ण किए हुए लोहों (धातुओं) के साथ, दूध से पिया गया वह (शिलाजतु) सुख से युक्त दीर्घ आयु देता है।

च. चि. १.३/५३

करं । प्रयोजयेत्॥ ५३ ॥

(वह) जरा (बुढ़ापे) और व्याधि (रोग) को शान्त करने वाला, देह को परम दृढ़ता देने वाला, मेधा और स्मृति को बढ़ाने वाला और धन्य (कल्याणकारी) है; दूध का आहार लेने वाला (व्यक्ति) उसका प्रयोग करे।

च. चि. १.३/५४

। ॥ ५४ ॥

उसका (शिलाजतु का) प्रयोग तीन प्रकार का बताया गया है: पर (उत्तम), मध्य और अवर (हीन); (ये क्रमशः) सात सप्ताह, तीन (सप्ताह) और एक सप्ताह के हैं।

च. चि. १.३/५५

। ॥ ५५ ॥

उसकी मात्रा तीन प्रकार की मानी गई है: एक पल, आधा पल (और) एक कर्ष। इसके बाद मैं विधि सहित उसकी जाति (प्रकार) का भेद कहूँगा।

च. चि. १.३/५६

। ॥ ५६ ॥

सूर्य (की गर्मी) से तपकर हेम (सोना) आदि पर्वत की धातुएँ (अपना मल) बहाती हैं; लाख के समान, मृदु (कोमल) और मिट्टी से रहित स्वच्छ जो मल है, वह शिलाजतु है।

च. चि. १.३/५७

। ॥ ५७ ॥

जो (शिलाजतु) मधुर और तिक्त-युक्त (कुछ कड़वा भी) है, जपा (गुड़हल) के फूल जैसा (लाल) है, विपाक में कटु है और शीत है, वह सुवर्ण (सोने) का स्राव है।

च. चि. १.३/५८

। ॥ ५८ ॥

रूप्य (चाँदी) का (स्राव) कटु, श्वेत और शीत होता है, (और) मधुर (रूप में) पचता है। ताम्र (ताँबे) का (स्राव) मोर के कण्ठ जैसी आभा वाला, तिक्त और उष्ण होता है, (और) कटु (रूप में) पचता है।

च. चि. १.३/५९

। ॥ ५९ ॥

परन्तु जो (शिलाजतु) गुग्गुलु जैसा दिखता है, तिक्त है, लवण (रस) से युक्त है, विपाक में कटु और शीत है, वह सबसे श्रेष्ठ है और वह लोहे का (स्राव) है।

च. चि. १.३/६०

। ॥ ६० ॥

सभी (शिलाजतु) गोमूत्र जैसी गन्ध वाले होते हैं (और) सब कर्मों में प्रयोग के योग्य हैं; परन्तु रसायन के प्रयोगों में अन्तिम (लोहे वाला) श्रेष्ठ माना जाता है।

च. चि. १.३/६१

। ॥ ६१ ॥

हेम (सोना) आदि धातुओं से उत्पन्न (ये) मल (शिलाजतु) क्रम से वात-पित्त में, श्लेष्मा (कफ) और पित्त में, कफ में (और) तीनों (दोषों) में विशेष रूप से प्रशंसित हैं।

च. चि. १.३/६२

। ॥ ६२ ॥

शिलाजतु के प्रयोगों में विदाही और गुरु (पदार्थों) को छोड़ दे; परन्तु कुलत्थ (कुलथी) को सदा पूरी तरह छोड़ दे।

च. चि. १.३/६३

। ॥ ६३ ॥

क्योंकि अत्यन्त विरुद्ध होने के कारण वे (कुलत्थ) लोक में पत्थर को अत्यधिक तोड़ने वाले देखे गए हैं; इसलिए (शिलाजतु के प्रयोग में) उनका प्रयोग निषिद्ध है।

च. चि. १.३/६४

। ॥‘ ।

दूध, तक्र (छाछ), यूष के साथ रस, जल, और मूत्र के साथ अनेक प्रकार के कषाय (काढ़े), (ये) गिरिज (शिलाजतु) को घोलने के लिए प्रशस्त हैं; कार्य (प्रयोजन) को भली-भाँति देखकर वे-वे (द्रव) प्रयोग किए जाने चाहिए। (टिप्पणी:) 'शुक्तानि' (ऐसा भी) पाठ (है)।

च. चि. १.३/६५

। ॥( ।)

पृथ्वी पर ऐसा कोई साध्य (उपचार से ठीक हो सकने वाला) रोग नहीं है जिसे शिलाह्वय (शिलाजतु) बलपूर्वक न जीत ले। (उचित) काल और योगों तथा विधियों के साथ प्रयोग किया गया वह स्वस्थ व्यक्ति को भी प्रचुर ऊर्जा (बल) देता है। (यह शिलाजतु-रसायन है।)

च. चि. १.३/६६

- । ॥ ६६ ॥

इस विषय में (यह) श्लोक है: करप्रचितिक (करप्रचितीय नामक) पाद में महर्षि द्वारा सिद्ध रसायनों के दस और छह (यानी सोलह) संयोग बताए गए हैं।

च. चि. १.३

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के चिकित्सास्थान में, रसायन अध्याय में, करप्रचितीय नामक तीसरा रसायन-पाद (पूरा हुआ)।

च. चि. १.३

॥॥

और यह रसायन अध्याय समाप्त हुआ।