भारत संहिता

अध्याय १३

उदरचिकित्सितम्

उदर रोगों की चिकित्सा

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भूमिका

उदरचिकित्सित चरक संहिता के चिकित्सास्थान का तेरहवाँ अध्याय है, और इसका नाम इसके विषय से बना है: 'उदर रोगों की चिकित्सा'। 'उदर' का शब्दार्थ पेट है, पर यहाँ यह उन रोगों का नाम है जिनमें पेट फूलकर बढ़ जाता है। अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय का है। आरम्भ में बताया गया है कि कैलास पर, जो सिद्धों और विद्याधरों से भरा और नन्दन वन के समान है, तप कर रहे पुनर्वसु से उनके शिष्य अग्निवेश प्रश्न करते हैं। वे पहले उदर रोगियों की दशा बताते हैं: उनका मुख सूखा, अंग दुबले और पेट फूला रहता है, उनकी अग्नि (पाचन-शक्ति), बल और आहार नष्ट हो जाते हैं, और उपचार न मिलने पर वे अनाथों की तरह प्राण छोड़ देते हैं। फिर अग्निवेश इन रोगों का कारण, उनकी संख्या, पूर्वरूप, लक्षण और औषध जानना चाहते हैं, और पुनर्वसु सब प्राणियों के हित के लिए उत्तर देना आरम्भ करते हैं।

पुनर्वसु के अनुसार उदर रोगों की जड़ अग्नि का दोष है। जब अग्नि मन्द हो और दूषित पदार्थ खाए जाएँ, तो वे पचते नहीं और दोष (वात, पित्त और कफ) जमा होने लगते हैं; ये प्राण, अग्नि और अपान को दूषित करते हैं, ऊपर और नीचे के मार्गों को और स्वेद तथा जल ले जाने वाले स्रोतों (शरीर के भीतर के मार्गों) को रोकते हैं, और त्वचा और मांस के बीच पहुँचकर पेट को फुला देते हैं। कारणों की लम्बी सूची दी गई है, जिसमें बहुत गरम, नमकीन, खारे, जलन करने वाले और खट्टे पदार्थ, गर (एक प्रकार का विष), रूखा, विरुद्ध और अशुद्ध भोजन, प्लीहा, अर्श और ग्रहणी के रोगों से आई दुर्बलता, वेगों को रोकना, आम, पेट को बहुत भर लेना, बाल, मल या अर्श से मार्ग का रुकना, आँत का फटना, और पाप कर्म भी गिने गए हैं; मन्द अग्नि वालों में ये रोग विशेष रूप से होते हैं। पूर्वरूप में भूख मिट जाती है, भारी भोजन देर से पचता है, थोड़े भोजन से भी पेट तन जाता है, उस पर धारियाँ उभरती हैं और उसकी सिलवटें मिट जाती हैं। उदर आठ प्रकार के बताए गए हैं: वात, पित्त और कफ से अलग-अलग, तीनों दोषों के एक साथ बिगड़ने से (सन्निपातोदर), और प्लीहा (तिल्ली) के बढ़ने से, गुद का मार्ग बँध जाने से (बद्धगुदोदर), आँत में छेद होने से (छिद्रोदर) और जल भरने से (उदकोदर)। हर एक के कारण और लक्षण अलग से दिए गए हैं, और यकृत् (जिगर) के बढ़ने से होने वाले उदर को, कारण, लक्षण और औषध समान होने से, प्लीहोदर में ही गिना गया है।

फिर अध्याय बताता है कि यह रोग कितना कठिन है। उसके अनुसार हर उदर अपनी उत्पत्ति से ही प्रायः अत्यन्त कष्टसाध्य है; बद्धगुद उदर एक पक्ष के बाद, और आँत में छेद वाला तथा जल भर चुका हर उदर, प्रायः प्राण ले लेता है; और कुछ लक्षणों वाले रोगी को वैद्य के छोड़ देने योग्य कहा गया है। बलवान् रोगी का नया उदर, जिसमें अभी जल न बना हो, प्रयत्न से साध्य बताया गया है, इसलिए अध्याय ऐसे उदर की चिकित्सा शीघ्र करने को कहता है, समझाता है कि उपेक्षा करने पर दोष पतले होकर पेट में जल कैसे बनाते हैं, और जल बनने से पहले और बाद के लक्षण अलग-अलग देता है। चिकित्सा का क्रम हर प्रकार के लिए अलग है। वातोदर में पहले स्नेह (घी, तेल जैसे चिकने पदार्थ) और स्वेद (सेंक), फिर स्नेह वाला विरेचन, और दोष निकल जाने पर पेट को कपड़े से लपेटना कहा गया है; क्योंकि उदर दोषों के बहुत जमने और स्रोतों के रुकने से होता है, इसलिए अध्याय नित्य विरेचन कहता है, और उसके बाद बल के लिए दूध और बस्ति (गुदा मार्ग से दी जाने वाली औषध)। जो विरेचन के योग्य न हों, जैसे दुर्बल, वृद्ध और बालक, उनके लिए शमन बताया गया है, यानी दोषों को भीतर ही शान्त करने वाले उपाय। पित्तोदर में विरेचन, दूध और बस्ति का क्रम, कफोदर में कटु और क्षार वाला आहार, गोमूत्र, अरिष्ट और चूर्ण, प्लीहोदर में दोष के अनुसार उपाय, बाँह की सिरा का वेध और अग्निकर्म, बद्धोदर में निरूह, अनुवासन और तीक्ष्ण विरेचन, छिद्रोदर में स्वेद छोड़कर श्लेष्मोदर जैसी चिकित्सा, और उदकोदर में तीक्ष्ण, क्षार और मूत्र वाले औषध, और जल आदि द्रवों को क्रम से रोकना आता है। सन्निपातोदर में ये सब क्रियाएँ कही गई हैं, पर उपद्रवों के साथ पूरी तरह बन चुके रोग को छोड़ देने योग्य बताया गया है।

इसके बाद आहार और योगों (नुस्खों) का बड़ा भाग आता है। अध्याय के अनुसार प्रायः सभी उदर दोषों के मेल से होते हैं, इसलिए हर उदर में तीनों दोषों को शान्त करने वाली चिकित्सा कही गई है, और अग्नि को जगाने वाला हल्का भोजन; किन पदार्थों और कामों से बचना है, यह भी गिनाया गया है। हर प्रकार के उदर के लिए अलग द्रव्यों वाला तक्र (छाछ) बताया गया है, और वात और कफ से पीड़ितों के लिए तक्र को अमृत के समान कहा गया है; फिर ऊँटनी, गाय, बकरी और भैंस का दूध, पेट पर लेप और सिंचन, और आठ मूत्रों का प्रयोग आते हैं। अनेक घृत, पटोलाद्य, नारायण, हपुषाद्य और नीलिन्याद्य चूर्ण, स्नुही (थूहर) के दूध से बने घृत, क्षार और तैल गिनाए गए हैं; नारायण चूर्ण के बारे में कहा गया है कि रोग उससे वैसे ही पार नहीं पाते जैसे असुर विष्णु जी से, और अलग-अलग रोगों में उसके अलग-अलग अनुपान बताए गए हैं। जो त्रिदोषज उदर किसी चिकित्सा से शान्त न हो, उसके लिए अध्याय एक अन्तिम उपाय रखता है: वैद्य रोगी के सम्बन्धियों, मित्रों, पत्नी, ब्राह्मणों, राजा और गुरुओं से अनुमति लेकर, और यह साफ़ कहकर कि चिकित्सा न करने पर मृत्यु निश्चित है और करने पर भी संशय है, भोजन-पान में मिलाकर, या ऐसे फल में जिसमें क्रुद्ध साँप ने विष छोड़ा हो, विष देता है, ताकि जमे हुए दोष टूटकर निकल जाएँ; उसके बाद दूध या यवागू, और एक महीने तक बिना अन्न के शाक का आहार। यह ग्रन्थ का वर्णन है, कोई परामर्श नहीं। बँधी हुई और छिदी हुई आँत वाले उदर के लिए पेट चीरकर आँत को मुक्त करने, उसके छेदों को बड़ी चींटियों से कटवाकर जोड़ने और घाव सीने की विधि दी गई है, जिसे अनुभवी शल्यहर्ताओं (शल्य चिकित्सकों) का काम बताया गया है; और जल भरे उदर के लिए नली लगाकर जल निकालना, पेट को लपेटना, और फिर छह महीने का दूध वाला आहार, जिससे अध्याय के अनुसार एक वर्ष में जलोदर जीता जाता है। अध्याय दो संग्रह-श्लोकों से समाप्त होता है, जो उसके विषय गिनाते हैं और कहते हैं कि ऋषि ने यह सब संक्षेप और विस्तार से कहा।

इस अध्याय से साथ ले जाने योग्य बातें ये हैं: चरक संहिता उदर रोग की जड़ मन्द अग्नि में देखती है, जिससे दोष जमते हैं, स्रोत रुकते हैं और अन्त में पेट में जल बन जाता है; इसीलिए अध्याय जल बनने से पहले, रोग के नया रहते, शीघ्र चिकित्सा पर बल देता है। उसकी चिकित्सा का केन्द्र दोषों को बार-बार बाहर निकालना है, विरेचन और बस्ति से, और साथ में रोगी के बल को बचाए रखना; अध्याय कहता है कि सब प्रयोगों के बाद दूध दिया जाए, क्योंकि वह दोषों को लौटने से रोकता है और बल को स्थिर करता है, और जिसकी सब धातुएँ क्षीण हों, उसके लिए दूध वैसा है जैसा देवताओं के लिए अमृत। और अध्याय अपनी सीमाएँ भी स्पष्ट रखता है: वह असाध्य लक्षणों वाले रोगियों को छोड़ देने को कहता है, अन्तिम उपाय से पहले अपनों की अनुमति और संशय की स्पष्ट घोषणा माँगता है, और शस्त्र-कर्म अनुभवी शल्य चिकित्सकों पर छोड़ता है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक १९५-१९६)

तत्र श्लोकौ-हेतुं प्राग्रूपमष्टानां लिङ्गं व्याससमासतः।उपद्रवान् गरीयस्त्वं साध्यासाध्यत्वमेव च॥

श्लोक १९५ →

इस विषय में (संग्रह के) दो श्लोक (हैं): हेतु (कारण), प्राग्रूप (रोग प्रकट होने से पहले के लक्षण), आठों (उदरों) के लिङ्ग (लक्षण) व्यास (विस्तार) और समास (संक्षेप) से, उपद्रव, गरीयस्त्व (कौन अधिक कठिन है) और साध्यता-असाध्यता भी,

जाताजाताम्बुलिङ्गानि चिकित्सां चोक्तवानृषिः।समासव्यासनिर्देशैरुदराणां चिकित्सिते॥

श्लोक १९६ →

जल बन चुके और न बने (उदरों) के लिङ्ग (लक्षण), और चिकित्सा: (ये सब) ऋषि ने उदरों के चिकित्सित (चिकित्सा के अध्याय) में समास (संक्षेप) और व्यास (विस्तार) वाले निर्देशों से कहे।

मुख्य शब्द (२६) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
आयुर्वेद
आयु का ज्ञान - जीवन और स्वास्थ्य का शास्त्र
विस्तार

शब्द-रचना: आयुस् (आयु, जीवन) + वेद (ज्ञान; √विद् 'जानना' से)।

अर्थ: आयु का वेद, अर्थात् जीवन का ज्ञान।

चरक संहिता में: आयुर्वेद वह शास्त्र है जिसमें हित और अहित, सुख और दुःख वाली आयु, आयु के लिए क्या हितकर और क्या अहितकर है, आयु का मान, और स्वयं आयु बताई गई हो (सू. १/४१)। इसलिए आयुर्वेद केवल रोगों की दवा नहीं, पूरे जीवन को स्वस्थ और सार्थक रखने की विद्या है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. चि. १३/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम उदरचिकित्सित (उदर रोगों की चिकित्सा सम्बन्धी अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. चि. १३/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. चि. १३/३

। ॥ ३ ॥

सिद्धों और विद्याधरों से भरे हुए, नन्दन (वन) के समान कैलास पर, तीव्र तप करते हुए, मानो साक्षात् धर्म (के रूप में) स्थित

च. चि. १३/४

। ॥ ४ ॥

आयुर्वेद के जानने वालों में श्रेष्ठ, भिषग्विद्या (चिकित्सा-विद्या) के प्रवर्तक (और) जितात्मा (मन को जीतने वाले) पुनर्वसु से अग्निवेश ने (यह) वचन कहा।

च. चि. १३/५

। ॥ ५ ॥

हे भगवन्, मनुष्य सचमुच दुःख देने वाले उदर (रोगों) से पीड़ित दिखाई देते हैं, (जिनके) मुख सूखे हुए, अंग कृश (दुबले) और उदर तथा कुक्षि फूले हुए होते हैं

च. चि. १३/६

। ॥ ६ ॥

(उनकी) अग्नि, बल और आहार नष्ट हो चुके होते हैं, (वे) सब चेष्टाओं (कामों) में असमर्थ और दीन होते हैं, और प्रतिक्रिया (उपचार) के अभाव में अनाथों की तरह प्राण छोड़ते हुए (दिखाई देते हैं)।

च. चि. १३/७

। ॥ ७ ॥

मैं उनका आयतन (कारण), संख्या, प्राग्रूप (पूर्वरूप), आकृति (लक्षण) और भेषज (औषध), गुरु (आप) के द्वारा भली-भाँति कहा हुआ, यथावत् (ठीक-ठीक) सुनना चाहता हूँ।

च. चि. १३/८

। ॥ ८ ॥

शिष्य के द्वारा इस प्रकार प्रेरित किए जाने पर ऋषि (पुनर्वसु) ने सब प्राणियों के हित के लिए, सब प्राणियों का हित करने वाला वचन कहना आरम्भ किया।

च. चि. १३/९

। ॥ ९ ॥

अग्नि के दोष (विकार) से मनुष्यों में मलों की वृद्धि के द्वारा अलग-अलग प्रकार के रोगों के समूह उत्पन्न होते हैं, परन्तु उदर (रोग) तो विशेष रूप से (इसी से होते हैं)।

च. चि. १३/१०

। ॥ १० ॥

अग्नि के मन्द होने पर, खाए हुए मलिन (दूषित) पदार्थों से (और उनके) न पचने से दोषों का संचय (होता है, जो) प्राण, अग्नि और अपान को दूषित करके, नीचे और ऊपर के मार्गों को रोककर

च. चि. १३/११

। ॥ ११ ॥

त्वचा और मांस के बीच (के स्थान) में पहुँचकर, कुक्षि (पेट) को बहुत फुलाते हुए, उदर (रोग) को उत्पन्न करता है। उसका हेतु (कारण) लक्षणों सहित सुनो।

च. चि. १३/१२

।॥ १२ ॥

अत्यधिक उष्ण (गरम), लवण (नमकीन), क्षार, विदाही (जलन पैदा करने वाले) और अम्ल (खट्टे) पदार्थों तथा गर (विष) के सेवन से; मिथ्या (गलत ढंग से किए गए) संसर्जन से; रूक्ष (रूखे), विरुद्ध और अशुचि (अपवित्र) भोजन से

च. चि. १३/१३

।॥ १३ ॥

प्लीहा (तिल्ली), अर्श और ग्रहणीदोष (के रोगों) से (होने वाले) कर्शन (दुबलेपन) से; कर्म (चिकित्सा-कर्म) में विभ्रम (भूल) से; (रोग से) पीड़ित लोगों का प्रतीकार (उपचार) न होने से; रौक्ष्य (रूखेपन) से; वेगों को रोकने से

च. चि. १३/१४

।॥ १४ ॥

स्रोतों के दूषित होने से; आम से; संक्षोभ (झटके) से; अतिपूरण (पेट के बहुत अधिक भर जाने) से; अर्श, बाल और शकृत् (मल) से (मार्ग के) रुकने से; अन्त्रों (आँतों) के फटने और छिदने से

च. चि. १३/१५

। ॥ १५ ॥

जिनके दोष अत्यधिक संचित (जमा) हो गए हों और जो पाप कर्म करते हों, उनमें उदर (रोग) उत्पन्न होते हैं, विशेष रूप से मन्द अग्नि वालों में।

च. चि. १३/१६

। ॥ १६ ॥

भूख का नाश (होता है); स्वादु (मधुर), अति स्निग्ध (चिकना) और गुरु (भारी) अन्न देर से पचता है; खाया हुआ सब (अन्न) विदग्ध होता है (जलन करता है); और (व्यक्ति) नहीं जानता कि (भोजन) पच गया है या नहीं पचा

च. चि. १३/१७

। ॥ १७ ॥

(वह) अति सौहित्य (बहुत अधिक भरपेट खाने) को नहीं सह पाता, और पैरों में थोड़ा शोफ (सूजन), निरन्तर बल का क्षय, (और) थोड़े व्यायाम (परिश्रम) में भी (वह) श्वास (साँस फूलने) को प्राप्त होता है,

च. चि. १३/१८

। ॥ १८ ॥

रूक्ष (पदार्थों) और उदावर्त के कारण होने वाली वृद्धि, पुरीष (मल) का संचय, बस्ति की सन्धि में रुक् (पीड़ा) और आध्मान (अफारा) बढ़ता है, और (वह स्थान) फटता-सा भी है,

च. चि. १३/१९

। ॥ १९ ॥

और हल्के तथा थोड़े भोजन से भी जठर (पेट) तन जाता है, राजियों (धारियों) का उभरना (और) वलियों (पेट की सिलवटों) का मिटना: इस प्रकार (ये) होने वाले (उदर रोगों) के लिङ्ग (पहचान के चिह्न) हैं।

च. चि. १३/२०

। ॥ २० ॥

संचित हुए दोष स्वेद (पसीना) और अम्बु (जल) का वहन करने वाले स्रोतों को रोककर, (और) प्राण (वायु), अग्नि और अपान (वायु) को दूषित करके, मनुष्यों में उदर (रोग) उत्पन्न करते हैं।

च. चि. १३/२१

। ॥ २१ ॥

कुक्षि (पेट) का आध्मान (फूलना), आटोप (गुड़गुड़ाहट), पैरों और हाथों का शोफ (सूजन), मन्द अग्नि, गालों का श्लक्ष्ण (चिकना) होना, और कार्श्य (दुबलापन): (यह) उदर (रोग) का लक्षण है।

च. चि. १३/२२

। ॥ २२ ॥

दोषों से अलग-अलग, और सब (दोषों) के मिलने से, (तथा) प्लीहा, बद्ध, क्षत और उदक (जल) से, आठ उदर (रोग) उत्पन्न होते हैं। उनके लक्षण अलग-अलग सुनो।

च. चि. १३/२३

। ॥ २३ ॥

रूक्ष और अल्प भोजन, आयास (परिश्रम), वेगों के उदावर्त और कर्शन (शरीर को कृश करने वाले उपायों) से प्रकुपित हुआ वायु, कुक्षि (पेट), हृदय, बस्ति (मूत्राशय) और गुद के मार्गों में जाता हुआ,

च. चि. १३/२४

। ॥ २४ ॥

अग्नि को नष्ट करके, कफ को उभारकर, (और) तब उस (कफ) से अपनी गति रुक जाने पर, त्वचा और मांस के बीच (के स्थान) का आश्रय लेकर (वह वायु) प्राणी के उदर को भर देता है।

च. चि. १३/२५

, , , , , , , , , , ॥ २५ ॥

उसके रूप (लक्षण ये हैं): कुक्षि (पेट), हाथों, पैरों और वृषण (अण्डकोष) में श्वयथु (सूजन); उदर का विपाटन (फटना-सा); और अनियत (बिना नियम के) वृद्धि और ह्रास (बढ़ना और घटना); कुक्षि और पार्श्व (बगल) में शूल (दर्द), उदावर्त, अङ्गमर्द (अंगों का टूटना-सा), पर्वभेद (जोड़ों में भेदने जैसी पीड़ा), सूखी कास (खाँसी), कार्श्य (दुबलापन), दौर्बल्य (कमज़ोरी), अरोचक (अरुचि) और अविपाक (भोजन का न पचना); नीचे (के भाग) में भारीपन; वात (अपान वायु), मल और मूत्र का रुकना; और नख, नयन (आँखों), वदन (मुख), त्वचा, मूत्र और मल का श्याव (कालापन लिए भूरा) और अरुण (लाल-भूरा) होना; और उदर पतली काली राजियों (धारियों) और सिराओं (नसों) से ढका होता है, ठोकने पर (वह) हवा से फूली दृति (चमड़े की मशक) जैसी आवाज़ वाला होता है; और वायु शूल और शब्द (आवाज़) के साथ ऊपर, नीचे और तिरछा चलता है: इसे वातोदर जानना चाहिए।

च. चि. १३/२६

। ॥ २६ ॥

कटु (तीखे), अम्ल (खट्टे), लवण (नमकीन), अति उष्ण (बहुत गरम) और तीक्ष्ण (पदार्थों) के, तथा अग्नि और आतप (धूप) के सेवन से, और विदाही (जलन पैदा करने वाले पदार्थों), अध्यशन (पहला भोजन पचने से पहले फिर खाने) और अजीर्ण (अपच) से शीघ्र संचित हुआ पित्त,

च. चि. १३/२७

। ॥ २७ ॥

अनिल (वात) और कफ तक पहुँचकर, मार्ग को रोककर, उन्मार्ग (उलटे मार्ग) में स्थित हुआ (वह पित्त) आमाशय में वह्नि (अग्नि) को नष्ट कर देता है, (और) तब उदर (रोग) उत्पन्न करता है।

च. चि. १३/२८

, , , , , , , , , , ; ॥ २८ ॥

उसके (पित्तोदर के) लक्षण ये हैं - दाह (जलन), ज्वर, प्यास, मूर्छा, अतिसार और भ्रम (चक्कर); मुँह का स्वाद कटु होना; और नाखून, आँखें, मुख, त्वचा, मूत्र और मल का हरा और हल्दी जैसा पीला होना; और उदर (पेट) भी नीली, पीली, हल्दी जैसी, हरी और ताँबे जैसी लाल रेखाओं और सिराओं से ढका रहता है, वह जलता है, भीतर से तपता है, उसमें से धुआँ-सा उठता है, वह भाप-सी छोड़ता है, पसीजता है, गीला होता है, छूने में कोमल और जल्दी पकने वाला होता है; इसे पित्तोदर जानना चाहिए।

च. चि. १३/२९

।॥ २९ ॥

व्यायाम न करने, दिन में सोने और स्वादु (मधुर), अत्यधिक स्निग्ध तथा पिच्छिल (चिपचिपे) पदार्थों से, और दही, दूध तथा औदक (जल में रहने वाले) और आनूप (दलदली प्रदेश के) प्राणियों के मांस का भी अत्यधिक सेवन करने से

च. चि. १३/३०

। ॥ ३० ॥

कुपित कफ से स्रोतों के ढक जाने पर, (उनमें) घिरा हुआ वात उसी (कफ) को दबाता हुआ और आँतों के बाहर चलता हुआ उदर रोग उत्पन्न करता है।

च. चि. १३/३१

, , , , ; , , , , ; ॥ ३१ ॥

उसके (श्लेष्मोदर के) लक्षण ये हैं - भारीपन, अरोचक (भोजन में अरुचि), अविपाक (भोजन का ठीक से न पचना) और अङ्गमर्द (अंगों में टूटन); सुप्ति (सुन्नपन); हाथों, पैरों, अण्डकोषों और जाँघों में शोफ (सूजन); उत्क्लेश (जी मिचलाना), निद्रा, कास (खाँसी) और श्वास (साँस फूलना); और नाखून, आँखें, मुख, त्वचा, मूत्र और मल की सफ़ेदी; और उदर (पेट) भी सफ़ेद रेखाओं और सिराओं से भरा, भारी, स्तिमित, स्थिर और कठोर होता है; इसे श्लेष्मोदर जानना चाहिए।

च. चि. १३/३२

। ॥ ३२ ॥

दुर्बल अग्नि वाले (व्यक्ति) के अपथ्य, आम (कच्चे), विरोधी (विरुद्ध) और भारी भोजनों से, और स्त्रियों द्वारा दिए गए रज (मासिक स्राव), रोम (बाल), विष्ठा, मूत्र, अस्थि (हड्डी), नाखून आदि से

च. चि. १३/३३

। ॥ ३३ ॥

और मन्द (हल्के) विषों से वात आदि तीनों (दोष) कुपित होकर, धीरे-धीरे कोष्ठ में संचय करते हुए मनुष्यों में उदर रोग उत्पन्न करते हैं।

च. चि. १३/३४

, , ; ॥ ३४ ॥

उसके (सन्निपातोदर के) लक्षण ये हैं - सभी दोषों के सम्पूर्ण लक्षण पाए जाते हैं, और नाखून आदि में सभी (दोषों के) रंग (दिखते हैं), और उदर भी अनेक रंगों की रेखाओं और सिराओं से भरा होता है; इसे सन्निपातोदर जानना चाहिए।

च. चि. १३/३५

।॥ ३५ ॥

भोजन किए हुए (व्यक्ति) के यानयान (सवारी से यात्रा) और अत्यधिक चेष्टा (परिश्रम) के कारण अत्यधिक हिलने-डुलने से, और अत्यधिक मैथुन, भार (ढोने), मार्ग (चलने), वमन और रोग से हुई कृशता से

च. चि. १३/३६

। ॥ ३६ ॥

बाईं ओर के पार्श्व (बगल) में स्थित प्लीहा (तिल्ली) अपने स्थान से हटकर बढ़ जाती है; अथवा रस आदि से बढ़ा हुआ शोणित (रक्त) उसे बढ़ा देता है।

च. चि. १३/३७

; ॥ ३७ ॥

उस (रोगी) की प्लीहा आरम्भ में अष्ठीला (गोल पत्थर) की तरह कठोर, और बढ़ती हुई कछुए के आकार की पाई जाती है; और उपेक्षा किए जाने पर वह धीरे-धीरे कुक्षि, जठर और अग्नि के अधिष्ठान (स्थान) को घेरती हुई उदर रोग उत्पन्न कर देती है।

च. चि. १३/३८

, ; , ; ॥ ३८ ॥

उसके रूप (लक्षण) ये हैं: दुर्बलता, अरोचक (भोजन में अरुचि), अविपाक (भोजन का न पचना), मल और मूत्र का रुकना, तमःप्रवेश (आँखों के आगे अँधेरा छाना), प्यास, अङ्गमर्द (अंगों में टूटन), छर्दि (उलटी), मूर्च्छा, अङ्गसाद (अंगों की शिथिलता), कास, श्वास, हल्का ज्वर, आनाह, अग्नि का नाश, कृशता, मुख का बिगड़ा स्वाद, पर्वभेद (जोड़ों में टूटने जैसी पीड़ा) और कोष्ठ में वात से शूल; और पेट अरुण (लालिमा लिए) रंग का या विवर्ण (बदले रंग का) होता है, और उस पर नीली, हरी और हल्दी जैसी पीली रेखाएँ होती हैं; इसी प्रकार दाहिनी बगल में स्थित यकृत् (जिगर) भी (उदर रोग) उत्पन्न कर सकता है, पर कारण, लक्षण और औषध समान होने से उसका समावेश प्लीहोदर में ही (किया गया है); इसे प्लीहोदर जानना चाहिए।

च. चि. १३/३९

। ॥ ३९ ॥

अन्न के साथ खाए गए पक्ष्म (पलकों के बाल) और बालों से गुद का मार्ग बँध जाने पर, उसी प्रकार उदावर्तों से, अर्श (बवासीर) से, या आँतों के संमूर्च्छन (आपस में उलझ जाने) से (उसका मार्ग रुक जाने पर)

च. चि. १३/४०

। ॥ ४० ॥

मार्ग रुक जाने से कुपित हुआ अपान अनिल (वायु) अग्नि को नष्ट करके, और वर्चस् (मल), पित्त तथा कफ को रोककर, तब उदर (रोग) उत्पन्न करता है।

च. चि. १३/४१

, ; ॥ ४१ ॥

उसके रूप (लक्षण) ये हैं: प्यास, दाह (जलन), ज्वर, मुख और तालु का सूखना, ऊरुसाद (जाँघों की शिथिलता), कास, श्वास, दुर्बलता, अरोचक, अविपाक, मल और मूत्र का रुकना, आध्मान (पेट का फूलना), छर्दि, क्षवथु (छींक) और सिर, हृदय, नाभि तथा गुद में शूल; और पेट मूढवात (जिसमें वायु रुककर अटकी हो), स्थिर और अरुण (लालिमा लिए) होता है, नीली रेखाओं वाला या सिराओं (नसों) से बँधी रेखाओं वाला, और प्रायः नाभि के ऊपर गाय की पूँछ की तरह उभरता है; इसे बद्धगुदोदर जानना चाहिए।

च. चि. १३/४२

। ॥ ४२ ॥

जब अन्न के साथ मिले हुए और खाए गए शर्करा (कंकड़ी), तिनकों, लकड़ी, हड्डी और काँटों से, जम्हाई से, या अत्यधिक भोजन से आँत फट (छिद) जाए

च. चि. १३/४३

। ॥ ४३ ॥

(और वह आँत) पाक को प्राप्त हो (पक जाए), तब उन छिद्रों से बाहर रिसता हुआ रस गुद और आँत को भरता हुआ उदर (रोग) उत्पन्न करता है।

च. चि. १३/४४

, , , ; ॥ ४४ ॥

उसके रूप (लक्षण) ये हैं: वह (उदर) प्रायः नाभि के नीचे बढ़ता हुआ उदकोदर (जल भरा उदर) बन जाता है, और दोषों के बल के अनुसार उनके रूप (लक्षण) दिखाता है; और रोगी रक्त-मिला, नीला, पीला, चिपचिपा, शव जैसी गन्ध वाला आम (कच्चा) मल त्यागता है, और हिक्का, श्वास, कास, प्यास, प्रमेह, अरोचक, अविपाक और दुर्बलता से घिरा रहता है; इसे छिद्रोदर जानना चाहिए।

च. चि. १३/४५

। ॥ ४५ ॥

स्नेह पिए हुए, मन्द अग्नि वाले, क्षीण या अत्यन्त कृश (दुबले मनुष्य) के बहुत अधिक जल पी लेने से (उसकी) अग्नि नष्ट हो जाने पर, क्लोम में स्थित मारुत (वायु)

च. चि. १३/४६

। ॥ ४६ ॥

स्रोतों के मार्ग रुक जाने पर, (वह वात) और जल से मूर्च्छित (बढ़ा हुआ) कफ, ये दोनों उसी जल को उसके अपने स्थान से उदर (रोग) के लिए बढ़ाते हैं।

च. चि. १३/४७

, , ॥ ४७ ॥

उसके लक्षण (ये हैं): अन्न की इच्छा न होना, प्यास, गुदा से स्राव, शूल, श्वास, कास और दुर्बलता; और पेट अनेक रंगों की रेखाओं और सिराओं से व्याप्त होता है, और छूने पर जल से भरी दृति (मशक) के हिलने जैसा (लगता) है; (वैद्य) इसे उदकोदर (जलोदर) जाने।

च. चि. १३/४८

; , ; ।। , , ॥ ४८ ॥

उनमें से जो उदर (रोग) अभी हाल में उत्पन्न हुआ हो, उपद्रवों से रहित हो, जल रहित हो और (आगे की अवस्था तक) न पहुँचा हो, उसकी चिकित्सा (वैद्य) शीघ्रता करते हुए करे; क्योंकि इनकी उपेक्षा किए जाने पर दोष अपने स्थान से हटकर, परिपाक से द्रव होकर, सन्धियों और स्रोतों को उपक्लिन्न (गीला) कर देते हैं, और स्वेद बाहरी स्रोतों में गति रुक जाने से तिरछा ठहरता हुआ उसी जल को बढ़ाता है; तब पिच्छा (चिपचिपे द्रव) के बनने पर पेट गोल, भारी, स्तिमित, ठोकने पर शब्दरहित, छूने में मृदु और रेखाओं से रहित (हो जाता है), और दबाने पर नाभि में ही सरकता है। उसके बाद जल का प्रादुर्भाव (प्रकट होना) होता है। उसके लक्षण (ये हैं): कुक्षि (पेट) का बहुत अधिक बढ़ना, सिराओं का छिप जाना, और छूने पर जल से भरी दृति (मशक) के हिलने जैसा लगना।

च. चि. १३/४९

; ॥ ४९ ॥

तब रोगी को उपद्रव आ घेरते हैं: छर्दि, अतीसार, तमक (श्वास), तृष्णा, श्वास, कास, हिक्का, दुर्बलता, पार्श्वशूल, अरुचि, स्वरभेद, मूत्र का रुकना आदि; ऐसे (रोगी) को (वैद्य) अचिकित्स्य जाने।

च. चि. १३/५०

- । ॥ ५० ॥

और यहाँ (इस विषय में ये श्लोक) हैं: वात से, पित्त से, कफ से, प्लीहा से, सन्निपात से और उसी प्रकार जल से (होने वाले) उदर को वैद्य उत्तरोत्तर (हर बाद वाले को पहले वाले से) अधिक कष्टसाध्य बताए।

च. चि. १३/५१

। ॥ ५१ ॥

बद्धगुद (उदर) तो पक्ष (पन्द्रह दिन) के बाद, उसी प्रकार हर जातोदक (जिसमें जल उत्पन्न हो चुका हो) (उदर), और छिद्रान्त्र (आँत में छेद वाला) उदर प्रायः मनुष्यों के अभाव (मृत्यु) के लिए होते हैं।

च. चि. १३/५२

। ॥ ५२ ॥

जिसकी आँखें सूजी हों, उपस्थ टेढ़ा हो, त्वचा उपक्लिन्न (गीली) और पतली हो, और जो बल, शोणित, मांस और अग्नि से क्षीण हो, (ऐसे उदर रोगी को वैद्य) वर्जित करे।

च. चि. १३/५३

। ॥ ५३ ॥

सब मर्मों में उठी श्वयथु (सूजन), श्वास, हिक्का, तृष्णा सहित अरुचि, मूर्च्छा, छर्दि और अतीसार उदर रोगी मनुष्य को मार डालते हैं।

च. चि. १३/५४

। ॥ ५४ ॥

सभी उदर (रोग) अपनी उत्पत्ति से ही प्रायः कृच्छ्रतम (अत्यन्त कष्टसाध्य) माने गए हैं। बलवान् (रोगी) का वह (उदर), जिसमें जल उत्पन्न न हुआ हो और जो नया उठा हो, यत्नसाध्य (प्रयत्न से ठीक होने वाला) है।

च. चि. १३/५५

। ॥ ५५ ॥

(जिस उदर में) शोथ (सूजन) उत्पन्न नहीं हुआ है, जो अरुण (ललाई लिए) है, जिसमें शब्द (आवाज़) होता है, जो बहुत भारी नहीं है, जो सदा गुड़गुड़ाता रहता है और सिराओं के जाल से जाली जैसा दिखता है

च. चि. १३/५६

।॥ ५६ ॥

(वायु) नाभि को जकड़कर, फिर गुदा में वेग उत्पन्न करके लुप्त हो जाती है; (ऐसे रोगी का, जिसे) हृदय, नाभि, वङ्क्षण (जाँघ और पेट का जोड़), कटि (कमर) और गुदा, इनमें से प्रत्येक में शूल होता है

च. चि. १३/५७

। ॥ ५७ ॥

(जो) कर्कश वात (अधोवायु) छोड़ता है, (भोजन के लिए) उत्सुक रहता है, और (जिसकी) अग्नि बहुत मन्द नहीं है, मुख बेस्वाद नहीं है, मूत्र अल्प है और मल संहत (गाढ़ा, बँधा हुआ) है

च. चि. १३/५८

।॥ ५८ ॥

इन लक्षणों से (उदर को) तत्त्वतः (ठीक-ठीक) 'अजातोदक' (जिसमें जल उत्पन्न नहीं हुआ) जानकर, दोष, बल और काल की विशेषताओं को जानने वाला वैद्य (उसकी) चिकित्सा करे।

च. चि. १३/५९

। ॥ ५९ ॥

बलवान् (रोगी) के वातोदर की चिकित्सा पहले स्नेहों से करे। (फिर) स्नेहन किए गए और जिसके अङ्गों का स्वेदन किया गया हो, (ऐसे रोगी) को स्नेह-विरेचन दे।

च. चि. १३/६०

। ॥ ६० ॥

दोष निकल जाने पर (जब) पेट ढीला पड़ जाए, (तब) उसे वस्त्र से लपेट दे; इस प्रकार (पेट में) जगह न रहने से वायु उसे फिर से नहीं फुलाएगी।

च. चि. १३/६१

। ॥ ६१ ॥

दोषों के अत्यधिक सञ्चय से और स्रोतों के मार्गों के रुक जाने से उदर (रोग) उत्पन्न होता है; इसलिए (रोगी को) नित्य ही विरेचन दे।

च. चि. १३/६२

। ॥ ६२ ॥

शुद्ध हुए (रोगी) को संसर्जन (क्रम से भोजन पर लौटाना) कराकर बल के लिए उसे दूध पिलाए; और उत्क्लेश (दोषों के उभरने) से पहले, बल प्राप्त हो जाने पर, दूध को क्रम से बन्द करना चाहिए।

च. चि. १३/६३

। ॥ ६३ ॥

जिसकी अग्नि हल्के खट्टे और नमकीन यूषों या (मांस-)रसों से बढ़ाई गई हो, (ऐसे) मनुष्य को, यदि उसे उदावर्त हो, फिर से स्नेहन और स्वेदन करके आस्थापन (बस्ति) दे।

च. चि. १३/६४

। ॥ ६४ ॥

स्फुरण (फड़कन), आक्षेप (ऐंठन), तथा सन्धियों, अस्थियों, पार्श्वों (बगलों), पीठ और त्रिक की पीड़ा में, जिसकी अग्नि प्रदीप्त हो और मल तथा वात रुके हुए हों, (ऐसे रोगी को) रूक्ष होने पर भी अनुवासन (बस्ति) दे।

च. चि. १३/६५

।॥ ६५ ॥

इसके लिए तीक्ष्ण अधोभाग (विरेचक) द्रव्यों से युक्त, दशमूल से बना निरूह (बस्ति) (हितकर है), और वात को नष्ट करने वाले तथा अम्ल (द्रव्यों) के साथ पकाए गए एरण्ड (अरंडी) और तिल के तेल से अनुवासन।

च. चि. १३/६६

। ॥ ६६ ॥

परन्तु जिसे (वैद्य) विरेचन के अयोग्य जाने, (जैसे) दुर्बल, वृद्ध, बालक, सुकुमार, प्रकृति से अल्प दोष वाला, या फिर जिसका वात बढ़ा हुआ हो

च. चि. १३/६७

। ॥ ६७ ॥

उसकी चिकित्सा बुद्धिमान् वैद्य शमन (दोषों को शान्त करने वाले) घी, यूष, मांसरस और ओदन (भात) से, बस्ति, अभ्यङ्ग और अनुवासन से, और दूध से करे।

च. चि. १३/६८

। ॥ ६८ ॥

पित्तोदर में तो बलवान् (रोगी) को पहले ही विरेचन दे; परन्तु दुर्बल (रोगी) को आरम्भ में अनुवासन देकर क्षीरबस्ति से (उसका) शोधन करे।

च. चि. १३/६९

। ॥ ६९ ॥

जब (रोगी के) बल और कायाग्नि (फिर से) उत्पन्न हो जाएँ, तब उसे फिर स्नेहन करके विरेचन दे: त्रिवृत् (निशोथ) के कल्क से युक्त दूध से, या उरुबूक (एरण्ड) के साथ पकाए गए (दूध) से

च. चि. १३/७०

। ॥ ७० ॥

(या) सातला और त्रायमाणा के साथ पकाए हुए, या आरग्वध (अमलतास) के साथ (पकाए हुए दूध से विरेचन कराए); या कफ भी साथ हो तो मूत्र मिले (दूध) से, और वात साथ हो तो तिक्त सर्पि (कड़वे द्रव्यों से सिद्ध घी) से।

च. चि. १३/७१

। ॥ ७१ ॥

फिर, क्षीर (दूध) का प्रयोग, बस्तिकर्म और विरेचन, (इन्हें) क्रम से अपनाते हुए युक्त (सावधान वैद्य) निश्चय ही पित्तोदर को जीत ले।

च. चि. १३/७२

। ॥ ७२ ॥

कफोदर के रोगी को तो, जब वह स्निग्ध (स्नेहन किया हुआ), स्विन्न (स्वेदन किया हुआ) और विशुद्ध (शोधन से शुद्ध) हो जाए, कटु और क्षार से युक्त, कफ को दूर करने वाले अन्नों से संसर्जन कराए (धीरे-धीरे भोजन पर लौटाए)।

च. चि. १३/७३

। ॥ ७३ ॥

और गोमूत्र तथा अरिष्ट के पान से, तथा चूर्णों और अयस्कृतियों से, और क्षार मिले तैल-पानों (तेल पिलाने) से कफोदर को शान्त करे।

च. चि. १३/७४

। ॥ ७४ ॥

सन्निपातोदर में, जैसी कही गई हैं, वे सभी क्रियाएँ (चिकित्साएँ) कराए। परन्तु उपद्रवों के साथ पूरी तरह बन चुके (सन्निपातोदर) को जानकार (वैद्य) प्रत्याख्येय (असाध्य कहकर छोड़ देने योग्य) माने।

च. चि. १३/७५

। ॥ ७५ ॥

उदावर्त, रुजा (पीड़ा) और आनाह से, दाह, मोह, तृषा और ज्वर से, और गौरव (भारीपन), अरुचि और काठिन्य (कठोरता) से, क्रमशः अनिल (वात) आदि (दोषों) को

च. चि. १३/७६

। ॥ ७६ ॥

(इन) लक्षणों से (उन्हें) प्लीहा (तिल्ली) में बढ़ा हुआ देखकर, और रक्त को भी उसके अपने लक्षणों से (पहचानकर), दोष के अनुसार और बल के अनुसार भली-भाँति चिकित्सा करे।

च. चि. १३/७७

। ॥ ७७ ॥

स्नेह, स्वेद, विरेक (विरेचन), निरूह और अनुवासन, (इन्हें) भली-भाँति परखकर कराए; या बाईं बाँह में सिरा (नस) का वेध करे।

च. चि. १३/७८

। ॥ ७८ ॥

षट्पल सर्पि (घी) पिलाए, या पिप्पलियों का प्रयोग कराए, या गुड़ सहित अभया (हरीतकी) का भी, और इसी प्रकार क्षारों और अरिष्टों के गणों (समूहों) का।

च. चि. १३/७९

। ॥ ७९ ॥

यह चिकित्सा का क्रम कहा गया; (अब) संशमन (दोषों को भीतर ही शान्त करने वाले) योगों को सुनो। पिप्पली, नागर (सोंठ), दन्ती, चित्रक, (इनसे) दुगुनी अभया (हरीतकी) वाला,

च. चि. १३/८०

। ॥ ८० ॥

(और) विडङ्ग (वायविडंग) के एक भाग से युक्त, यह चूर्ण गरम पानी के साथ पिए। विडङ्ग, चित्रक, घी सहित शुण्ठी (सोंठ), सैन्धव (सेंधा नमक) और वचा (वच) को

च. चि. १३/८१

। ॥ ८१ ॥

कपाल (खप्पर) में जलाकर, गुल्म और प्लीहा (के रोग) को दूर करने वाला (यह योग) दूध के साथ पिए। और रोहीतक की लताओं के काण्डकों (टुकड़ों) को अभया (हरीतकी) के जल में

च. चि. १३/८२

।॥ ८२ ॥

या मूत्र में डुबोकर रखे, और सात रात रखे रहने के बाद उसे पिए। कामला, गुल्म, मेह, अर्श, प्लीहा (के रोग), सभी उदर रोगों और क्रिमियों को

च. चि. १३/८३

। ॥ ८३ ॥

वह (योग) (इन्हें) नष्ट करता है। और इसमें (औषध के) पच जाने पर जाङ्गल (पशु-पक्षियों के मांस के) रसों के साथ भोजन हो। रोहीतक की छाल के पच्चीस पल लेकर,

च. चि. १३/८४

। ॥ ८४ ॥

दो प्रस्थ कोल (बेर) मिलाकर कषाय (काढ़ा) तैयार करे। (फिर) एक-एक पल पञ्चकोल (के द्रव्यों) से, और उन सबके बराबर (मात्रा वाली)

च. चि. १३/८५

। ॥ ८५ ॥

रोहीतक की छाल से और पीसे हुए (पञ्चकोल के द्रव्यों) से एक प्रस्थ घृत पकाए। प्रयोग किया गया यह (घृत) प्लीहा की वृद्धि को शीघ्र शान्त करता है,

च. चि. १३/८६

। ॥ ८६ ॥

उसी प्रकार (यह) गुल्म, उदर, श्वास, क्रिमि, पाण्डुत्व और कामला को भी (शान्त करता है)। वात और कफ की प्रबलता वाले (प्लीहा रोग) में वैद्य अग्निकर्म (दागने की चिकित्सा) भी करे।

च. चि. १३/८७

। ॥ ८७ ॥

पैत्तिक (प्लीहा रोग) में जीवनीय सर्पि (घृत), क्षीरबस्तियाँ (दूध से दी जाने वाली बस्तियाँ), रक्तावसेक (रक्त निकालना), संशुद्धि (शोधन) और क्षीरपान (दूध पीना) प्रशस्त हैं,

च. चि. १३/८८

। ॥ ८८ ॥

और दीपनीय (द्रव्यों) से युक्त यूषों और मांसरसों से भी (चिकित्सा प्रशस्त है)। यकृत् (के रोग) में, (दोनों की) समानता के कारण, सारी औषध प्लीहा (के रोग) की तरह ही मानी गई है।

च. चि. १३/८९

। ॥ ८९ ॥

प्लीहोदर में वैद्य लघु (हल्के) अन्नों को मिलाकर दे। स्वेदन कराए हुए बद्धोदर के रोगी को मूत्र और तीक्ष्ण औषधों से युक्त,

च. चि. १३/९०

। ॥ ९० ॥

तैल और लवण सहित निरूह, अनुवासन के साथ, दे; और परिस्रंसी (मल को सरकाने वाले) अन्न तथा तीक्ष्ण विरेचन भी (दे)।

च. चि. १३/९१

। ॥ ९१ ॥

उदावर्त को दूर करने वाला और वात को नष्ट करने वाला कर्म (चिकित्सा) भी करना चाहिए। छिद्रोदर की (चिकित्सा) स्वेद को छोड़कर श्लेष्मोदर की तरह करे।

च. चि. १३/९२

। ॥ ९२ ॥

(पेट में) जब-जब जल उत्पन्न (जमा) हो, (तब-तब उसे) निकालना चाहिए; इस प्रकार वैद्य उस (रोग) का यापन करे। परन्तु तृष्णा, कास और ज्वर से पीड़ित, जिसका मांस, अग्नि और भोजन क्षीण हो गए हों,

च. चि. १३/९३

। ॥ ९३ ॥

(वैद्य उसे) छोड़ दे, और उसी प्रकार श्वास के रोगी को, शूल वाले को और दुर्बल इन्द्रियों वाले को भी। उदकोदर में आरम्भ में जल के दोष को हरने वाले (औषध) दे,

च. चि. १३/९४

। ॥ ९४ ॥

जो मूत्र से युक्त, तीक्ष्ण और अनेक प्रकार के क्षारों वाले हों। (वैद्य) उस (रोगी) की दीपनीय और कफ को नष्ट करने वाले आहारों से चिकित्सा करे।

च. चि. १३/९५

। ॥ ९५ ॥

और (रोगी को) जल आदि द्रवों से क्रमशः रोके। सभी उदर (रोग) प्रायः दोषों के संघात (मेल) से उत्पन्न माने गए हैं।

च. चि. १३/९६

। ॥ ९६ ॥

इसलिए सब जगह (हर उदर रोग में) त्रिदोषों को शान्त करने वाली क्रिया (चिकित्सा) कराए। क्योंकि दोषों से कुक्षि (पेट) के भर जाने पर अग्नि मन्द हो जाती है।

च. चि. १३/९७

। ॥ ९७ ॥

इसलिए भोजन ऐसे खाने चाहिए जो दीपन (अग्नि को जगाने वाले) और लघु (हल्के) हों। रक्तशालि (लाल शालि चावल), यव (जौ), मुद्ग (मूँग) और जाङ्गल (सूखे प्रदेश के) मृगों और पक्षियों (के मांस),

च. चि. १३/९८

। ॥ ९८ ॥

दूध, मूत्र, आसव, अरिष्ट, मधु, सीधु तथा सुरा (का सेवन करे), और यवागू या ओदन (भात) भी यूषों के साथ या रसों (मांसरसों) के साथ खाए,

च. चि. १३/९९

। ॥ ९९ ॥

जो थोड़े अम्ल, स्नेह और कटु (द्रव्यों) से युक्त हों और पञ्चमूल से तैयार किए गए हों। औदक (जलचर) और आनूप (दलदली प्रदेश के) प्राणियों का मांस, शाक, पिष्ट (आटे) से बने (पदार्थ) और तिल,

च. चि. १३/१००

। ॥ १०० ॥

व्यायाम, अध्व (मार्ग चलना), दिन में सोना और सवारी से यात्रा करना त्याग दे; तथा उष्ण (गरम), लवण (नमकीन), अम्ल (खट्टे), विदाही (जलन करने वाले) और गुरु (भारी) (पदार्थों को) भी (त्याग दे)।

च. चि. १३/१०१

। ॥ १०१ ॥

जठरी (उदर रोगी) अन्न न खाए और जल पीना त्याग दे। पीने के लिए वह तक्र (छाछ) हितकर है जो न बहुत गाढ़ा हो, स्वादु (मधुर) हो और पतला न हो।

च. चि. १३/१०२

। ॥ १०२ ॥

निचयोदरी (निचयोदर का रोगी) तो त्र्यूषण (त्रिकटु), क्षार और लवण (नमक) से युक्त (तक्र पिए), (और) वातोदरी (वातोदर का रोगी) पिप्पली और लवण से युक्त तक्र (छाछ) पिए।

च. चि. १३/१०३

। ॥ १०३ ॥

पित्तोदरी (पित्तोदर का रोगी) शर्करा (शक्कर) और मधुक (मुलेठी) से युक्त स्वादु (मधुर तक्र) पिए। कफोदरी (कफोदर का रोगी) यवानी (अजवायन), सैन्धव (सेंधा नमक), अजाजी और व्योष (त्रिकटु) से युक्त

च. चि. १३/१०४

।॥ १०४ ॥

मधु (शहद) मिला हुआ, कवोष्ण (गुनगुना) (और) बहुत पतला नहीं, (ऐसा) तक्र (छाछ) पिए। मधु, तैल (तेल), वचा (वच), शुण्ठी (सोंठ), शताह्वा, कुष्ठ (कूठ) और सैन्धव (सेंधा नमक) से

च. चि. १३/१०५

। ॥ १०५ ॥

युक्त (तक्र) प्लीहोदरी (प्लीहोदर का रोगी पिए)। उदकोदरी (उदकोदर का रोगी) तो व्योष (त्रिकटु) सहित जात (तक्र पिए)। बद्धोदरी (बद्धोदर का रोगी) तो हपुषा, यवानी (अजवायन), अजाजी और सैन्धव (सेंधा नमक) से (युक्त तक्र),

च. चि. १३/१०६

। ॥ १०६ ॥

छिद्रोदरी (छिद्रोदर का रोगी) पिप्पली और क्षौद्र (मधु) से युक्त तक्र (छाछ) पिए। गौरव (भारीपन) और अरोचक (अरुचि) से पीड़ित (रोगियों) के लिए, मन्द अग्नि सहित अतिसार वालों के लिए,

च. चि. १३/१०७

। ॥ १०७ ॥

(और) वात तथा कफ से पीड़ित (रोगियों) के लिए तक्र (छाछ) अमृत (के समान) हो जाता है। शोफ (सूजन), आनाह (अफारा), आर्ति (पीड़ा), तृष्णा (प्यास) और मूर्च्छा (बेहोशी) से पीड़ित (रोगी) के लिए कारभ (ऊँटनी का) दूध (हितकर है)।

च. चि. १३/१०८

।॥ १०८ ॥

शुद्ध (शोधन से शुद्ध हुए) और क्षीण देह वाले (रोगियों) के लिए गाय का, बकरी का और भैंस का भी (दूध हितकर है)। देवदारु, पलाश (ढाक), अर्क (आक), हस्तिपिप्पली और शिग्रुक से,

च. चि. १३/१०९

। ॥ १०९ ॥

अश्वगन्धा सहित और गोमूत्र सहित, समान (मात्रा वाले इन द्रव्यों) से उदर (पेट) पर प्रदेह (लेप) करे। वृश्चिकाली, वचा (वच), कुष्ठ (कूठ), पञ्चमूली (पञ्चमूल) और पुनर्नवा,

च. चि. १३/११०

। ॥ ११० ॥

भूतीक, नागर (सोंठ) और धान्य को जल में पकाकर (उस जल से उदर पर) अवसेचन (सिंचन) करे। पलाश (ढाक), कत्तृण और रास्ना को उसी प्रकार (जल में) पकाकर अवसेचन करे।

च. चि. १३/१११

। ॥ १११ ॥

उदर रोगियों के लिए आठ मूत्रों को सेक (शरीर पर डालने) में और पान (पीने) में प्रयोग करे। रूक्ष (रूखे शरीर वाले), बहुत वात वाले तथा संशोधन (शरीर-शुद्धि) चाहने वाले (उदर रोगियों) के लिए

च. चि. १३/११२

।॥ ११२ ॥

दीपनीय (अग्नि को जगाने वाले) और जठर (उदर रोग) को नष्ट करने वाले सर्पि (घृत के योग) हम बताते हैं। पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और नागर (सोंठ) से,

च. चि. १३/११३

। ॥ ११३ ॥

क्षार सहित, आधा-आधा पल (मात्रा वाले इन द्रव्यों) से दो प्रस्थ सर्पि (घृत) पकाए: (इनके) कल्कों से, और द्विपञ्चमूल के आधी तुला स्वरस से,

च. चि. १३/११४

। ॥ ११४ ॥

(और) एक आढक दधिमण्ड (दही के पानी) से युक्त (करके पकाया गया) वह सर्पि (घृत) जठर (उदर रोग) को दूर करने वाला है, और श्वयथु (सूजन), वातविष्टम्भ (वात की रुकावट), गुल्म और अर्श (बवासीर) को नष्ट करता है।

च. चि. १३/११५

। ॥ ११५ ॥

नागर (सोंठ) और त्रिफला का एक प्रस्थ, घृत और तैल (तेल) का उसी प्रकार (एक प्रस्थ), (और) मस्तु (दही के पानी) का एक आढक: इन्हें सिद्ध करके (पकाकर), सब उदर रोगों को दूर करने वाला यह (योग) पिए।

च. चि. १३/११६

। ॥ ११६ ॥

कफ और वात से उत्पन्न गुल्म में भी यह (पिछले श्लोक का योग) प्रशस्त (उत्तम) माना जाता है। चार गुने जल में, दो गुने मूत्र में, और चित्रक के एक पल (भर)

च. चि. १३/११७

। ॥ ११७ ॥

कल्क में पकाया हुआ एक प्रस्थ घी, क्षार मिलाकर, जठरी (उदर रोगी) पिए। और जौ, कोल (बेर) और कुलत्थ (कुलथी) के तथा पञ्चमूल के रस से

च. चि. १३/११८

। ॥ ११८ ॥

और सुरा तथा सौवीरक से पकाया हुआ घी भी पिए। इन (घृतों) से स्निग्ध हुए (रोगी) को, बल उत्पन्न हो जाने पर और वात के शान्त हो जाने पर,

च. चि. १३/११९

। ॥ ११९ ॥

(और) दोषाशय (दोषों का स्थान) ढीला हो जाने पर, कल्प में बताया गया विरेचन दे। पटोल की जड़, रजनी (हल्दी), रजनी, विडङ्ग (वायविडंग), त्रिफला का छिलका,

च. चि. १३/१२०

। ॥ १२० ॥

कम्पिल्लक, नीलिनी और त्रिवृत् (निशोथ), इन सबको चूर्ण करे: पहले छह (द्रव्य) एक-एक कर्ष, और अन्तिम तीन (क्रम से) दो, तीन और चार गुने।

च. चि. १३/१२१

। ॥ १२१ ॥

चूर्ण बनाकर, इसमें से एक मुट्ठी मनुष्य गायों के मूत्र के साथ पिए। विरेचन हो जाने पर (वह) जाङ्गल (पशुओं के मांस के) रसों के साथ मृदु (हल्का) भोजन करे।

च. चि. १३/१२२

। ॥ १२२ ॥

मण्ड और पेया पीकर, मनुष्य छह दिन तक व्योष (त्रिकटु) के साथ उबाला हुआ दूध पिए; फिर चूर्ण पिए, और इसी प्रकार बार-बार (पिए)।

च. चि. १३/१२३

। ॥ १२३ ॥

यह चूर्ण सब उदर रोगों को, जातोदक (जिनमें जल भर गया हो उन) को भी, नष्ट करता है; और कामला (पीलिया), पाण्डुरोग और श्वयथु (सूजन) को भी दूर करता है।

च. चि. १३/१२४

। ॥ १२४ ॥

यह पटोलाद्य (पटोल से आरम्भ होने वाला) चूर्ण उदर रोगों में अत्यन्त प्रशंसित है। गवाक्षी, शङ्खिनी, दन्ती, तिल्वक की छाल (और) वचा (वच) को

च. चि. १३/१२५

। ॥ १२५ ॥

द्राक्षा (अंगूर) के जल, गोमूत्र, कोल, कर्कन्धु और सीधु के साथ पिए। यवानी (अजवायन), हपुषा, धान्य, त्रिफला और उपकुञ्चिका,

च. चि. १३/१२६

। ॥ १२६ ॥

कारवी, पिप्पलीमूल, अजगन्धा, शटी, वचा (वच), शताह्वा, जीरक (जीरा), व्योष (त्रिकटु), स्वर्णक्षीरी और चित्रक,

च. चि. १३/१२७

। ॥ १२७ ॥

दोनों क्षार, पुष्कर का मूल, कुष्ठ (कूठ), पाँचों लवण और विडङ्ग (वायविडंग), ये सब समान भाग, और उसी प्रकार दन्ती के तीन भाग।

च. चि. १३/१२८

। ॥ १२८ ॥

त्रिवृत् (निशोथ) और विशाला दो गुनी, (और) सातला चार गुनी हो। यह नारायण नाम का चूर्ण रोगों के समूह को दूर करने वाला है।

च. चि. १३/१२९

। ॥ १२९ ॥

इस (चूर्ण) के सामने आकर रोग इससे पार नहीं पाते, जैसे असुर विष्णु से (पार नहीं पाते)। उदर के रोगियों को इसे तक्र (छाछ) के साथ पीना चाहिए, गुल्म के रोगियों को बदर (बेर) के जल के साथ,

च. चि. १३/१३०

। ॥ १३० ॥

आनद्धवात (वायु के बँधकर रुक जाने) में सुरा के साथ, वात रोग में प्रसन्ना के साथ, विट्सङ्ग (मल के रुकने) में दधिमण्ड (दही के पानी) के साथ, (और) अर्श (बवासीर) के रोगियों को दाडिम (अनार) के जल के साथ,

च. चि. १३/१३१

। ॥ १३१ ॥

परिकर्त (गुदा में कतरने जैसी पीड़ा) में वृक्षाम्ल सहित, अजीर्ण (अपच) में गरम जल के साथ, (और) भगन्दर, पाण्डु रोग, श्वास, कास (और) गलग्रह (गले की जकड़न) में,

च. चि. १३/१३२

। ॥ १३२ ॥

हृद्रोग, ग्रहणी दोष, कुष्ठ, मन्द अग्नि (धीमी पाचन शक्ति), ज्वर, दंष्ट्रा विष (दाँत वाले जीवों के काटने का विष), मूल विष (जड़ों का विष) (और) गर सहित कृत्रिम विष में,

च. चि. १३/१३३

। । ॥ १३३ ॥

स्निग्ध कोष्ठ वाले (व्यक्ति) को यह विरेचन यथायोग्य पीना चाहिए। इस प्रकार नारायण चूर्ण (कहा गया)। हपुषा, काञ्चनक्षीरी, त्रिफला, कटुरोहिणी (कुटकी),

च. चि. १३/१३४

। ॥ १३४ ॥

नीलिनी (नील) और त्रायमाणा, सातला, त्रिवृत् (निशोथ), वचा, सैन्धव (सेंधा नमक), काललवण और पिप्पली, इन (सबका) चूर्ण बनाए।

च. चि. १३/१३५

। ॥ १३५ ॥

यह (योग) दाडिम (अनार), त्रिफला, मांसरस, मूत्र और सुखोदक (गुनगुने जल) के साथ सभी गुल्मों में, प्लीहा (तिल्ली के रोग) में और सभी उदर रोगों में पीना चाहिए,

च. चि. १३/१३६

। ॥ १३६ ॥

श्वित्र (सफेद दाग) में, पीड़ा और वात सहित कुष्ठ में, विषम अग्नि (अनियमित पाचन शक्ति) की अवस्थाओं में, शोथ (सूजन), अर्श (बवासीर) और पाण्डु रोगों में, कामला (पीलिया) में और हलीमक में (भी इसे पीना चाहिए)।

च. चि. १३/१३७

। । ॥ १३७ ॥

(यह चूर्ण) विरेक (विरेचन) से वात, पित्त और कफ को शीघ्र ही भली-भाँति ठीक कर देता है। इस प्रकार हपुषाद्य चूर्ण (कहा गया)। नीलिनी (नील), निचुल, व्योष (त्रिकटु), दो क्षार और लवण,

च. चि. १३/१३८

। । ॥ १३८ ॥

और चित्रक, (इन सबका) उदर और गुल्म को दूर करने वाला चूर्ण सर्पिस् (घी) के साथ पीए। इस प्रकार नीलिन्याद्य चूर्ण (कहा गया)। एक द्रोण क्षीर (दूध) में आधा प्रस्थ सुधा-क्षीर (स्नुही का दूध) मिलाकर (बनाया गया) दधि (दही),

च. चि. १३/१३९

। ॥ १३९ ॥

जम जाने पर उसे युक्ति से (उचित रीति से) मथकर, (उससे मिला) घृत त्रिवृत् के साथ सिद्ध करके पीए। उसी प्रकार आठ गुने पयस् (दूध) में सिद्ध किया हुआ एक प्रस्थ घृत पीए,

च. चि. १३/१४०

। ॥ ।

(जो) एक पल स्नुही-क्षीर (थूहर के दूध) के कल्क और छह पल त्रिवृत् (के कल्क) के साथ (सिद्ध हो), गुल्मों, गर दोषों और उदर रोगों की शान्ति के लिए। इस प्रकार स्नुहीक्षीर घृत (कहा गया)।

च. चि. १३/१४१

। ॥ १४१ ॥

उसी प्रकार जठर (उदर रोग) की शान्ति के लिए, एक आढक दधिमण्ड (दही के पानी) में सिद्ध किए गए, एक पल स्नुही-क्षीर के कल्क वाले एक प्रस्थ घृत में से (उचित) मात्रा पीए।

च. चि. १३/१४२

। ॥ १४२ ॥

और इन (घृतों) के बाद पेया, या पयस् (दूध), या स्वादु (मधुर) रस पीए। घृत के जीर्ण हो जाने (पच जाने) पर, विरेचन हो चुका (व्यक्ति) तो नागरक (सोंठ) के साथ उबाला हुआ गुनगुना

च. चि. १३/१४३

। ॥ १४३ ॥

जल पीए, उसके बाद पेया, फिर कौलत्थक (कुलथी का) यूष (पीए)। रूक्ष (हुआ व्यक्ति) तो इसी प्रकार तीन दिन, या उससे अधिक, प्रतिभोजित (उचित आहार दिया गया) होकर पीए।

च. चि. १३/१४४

। ॥ १४४ ॥

(वह) बार-बार सर्पिस् (घृत) पीए, और उसी आनुपूर्वी (क्रम) से। कुशल भिषक् (वैद्य) इन सिद्ध घृतों का विधान करे।

च. चि. १३/१४५

। ॥ १४५ ॥

(ये घृत) गुल्मों, गर-दोषों और उदर रोगों की शान्ति के लिए (हैं)। अथवा पिलु के कल्क के साथ सिद्ध किया हुआ, आनाह को तोड़ने वाला घृत

च. चि. १३/१४६

। ।

गुल्म को नष्ट करने वाला नीलिनी (नील) का सर्पि (घृत), या मिश्रक स्नेह पीए। जिनके दोष क्रम से निकाल दिए गए हैं और जो (उसके बाद) जाङ्गल (मांस) का भोजन कर रहे हैं, उनके

च. चि. १३/१४७

। ॥ १४७ ॥

बचे हुए दोषों की निवृत्ति के लिए इसके आगे (मैं) योग कहूँगा। मनुष्य चित्रक और अमरदारु (देवदारु) का कल्क दूध के साथ पीए

च. चि. १३/१४८

। ॥ १४८ ॥

एक मास तक, नियम से लगा रहकर। उसी प्रकार हस्तिपिप्पली, विश्वभेषज (सोंठ), विडङ्ग (वायविडंग), चित्रक, दन्ती, चव्य और व्योष (त्रिकटु), इनके (कल्कों के) साथ दूध

च. चि. १३/१४९

। ॥ १४९ ॥

कोल (बेर) के बराबर (मात्रा वाले) कल्कों के साथ पीकर (मनुष्य) बढ़े हुए उदर (रोग) को जीत ले। त्रिफला, दन्ती और रोहितक से पकाया हुआ कषाय (काढ़ा) पीए

च. चि. १३/१५०

। ॥ १५० ॥

व्योष और क्षार मिलाकर। (उसके) पच जाने पर (रोगी) जाङ्गल (पशु-पक्षियों के मांस) के रसों के साथ (भोजन) खाए, अथवा मांस (खाए)। भोजन सुधा के क्षीर (दूधिया रस) और घृत से युक्त करके खाया जाए।

च. चि. १३/१५१

। ॥ १५१ ॥

अथवा गोमूत्र के साथ अभया (हरीतकी) का प्रयोग कराए, जिसके बाद अनुपान में दूध (दिया जाए)। अन्न न खाते हुए (रोगी) सात दिन तक भैंस का मूत्र और दूध पीए।

च. चि. १३/१५२

। ॥ १५२ ॥

एक मास तक ऊँटनी का दूध, (या) तीन मास तक व्योष मिलाया हुआ बकरी का (दूध) (पीए)। अथवा दूध का आहार लेते हुए एक हज़ार हरीतकी, या शिलाजतु (का सेवन करे)।

च. चि. १३/१५३

। ॥ १५३ ॥

अथवा शिलाजतु की विधि से गुग्गुलु का प्रयोग करे। शृङ्गवेर-आर्द्रक (ताज़ी अदरक) का रस, बराबर मात्रा के दूध के साथ, पीने में हितकर है।

च. चि. १३/१५४

। ॥ १५४ ॥

अथवा उसी (अदरक के) रस से, (जो तैल से) दस गुना (हो), सिद्ध किया हुआ तैल (हितकर है)। दन्ती और द्रवन्ती के फलों से बना तैल दूष्योदर में हितकर है।

च. चि. १३/१५५

। ॥ १५५ ॥

शूल, आनाह और विबन्ध में, मस्तु, यूष, रस आदि के साथ, सरला और मधुशिग्रु के, और मूलक (मूली) के बीजों से (बने)

च. चि. १३/१५६

। ॥ १५६ ॥

तैल, अभ्यङ्ग (मालिश) और पीने के लिए, अनिलोदर (वात से हुए उदर रोग) में शूल को नष्ट करने वाले हैं। स्तैमित्य (जड़ता), अरुचि और हृल्लास (जी मिचलाने) में, अग्नि के मन्द होने पर, और मद्य पीने वाले के लिए

च. चि. १३/१५७

। ॥ १५७ ॥

(वैद्य) अरिष्ट दिलवाए। और कफ के गाढ़ा होकर स्थिर हो गए उदर रोग में, श्लेष्मा के विलय के लिए, श्रेष्ठ वैद्य दोष को परखकर क्षार (दिलवाए)।

च. चि. १३/१५८

। ॥ १५८ ॥

पिप्पली, तिल्वक, हिङ्गु (हींग), नागर (सोंठ), हस्तिपिप्पली, भल्लातक (भिलावा), शिग्रु (सहजन) का फल, त्रिफला, कटुरोहिणी (कुटकी),

च. चि. १३/१५९

। ॥ १५९ ॥

देवदारु, दोनों हरिद्रा, सरला और अतिविषा (अतीस), वचा (वच), कुष्ठ (कूठ), मुस्त (मोथा) तथा पाँच लवण (नमक), (इन सबको) तैयार करके

च. चि. १३/१६०

। ॥ १६० ॥

(इन सब द्रव्यों को) दही, घी, वसा, मज्जा और तेल मिलाकर जलाए। भोजन के बाद इस क्षार में से बिडालकपद (एक कर्ष) भर पिए

च. चि. १३/१६१

। ॥ १६१ ॥

मदिरा, दधिमण्ड (दही का पानी), गरम जल, अरिष्ट, सुरा या आसव के साथ। (यह क्षार) हृद्रोग, श्वयथु (सूजन), गुल्म, प्लीहा (तिल्ली का रोग), अर्श (बवासीर) और उदर रोगों को

च. चि. १३/१६२

। ॥ १६२ ॥

विसूचिका, उदावर्त और वाताष्ठीला को नष्ट करता है। और बकरी की मेंगनियों के छाने हुए क्षार को मूत्रों के साथ भली-भाँति पकाए

च. चि. १३/१६३

। ॥ १६३ ॥

(साथ में) एक कर्ष भर पिप्पलीमूल और पाँचों लवण, पिप्पली, चित्रक, शुण्ठी (सोंठ), त्रिफला, त्रिवृत् (निशोथ), वचा (वच),

च. चि. १३/१६४

। ॥ १६४ ॥

दो क्षार, सातला, दन्ती, स्वर्णक्षीरी और विषाणिका (मिलाकर बनाई गई) कोल (बेर) के बराबर गोली सौवीर (काँजी) के साथ पिए

च. चि. १३/१६५

। ॥ १६५ ॥

श्वयथु (सूजन) में, अविपाक (भोजन न पचने) में और बढ़े हुए दकोदर में। और गायों के मूत्र में भावित (भिगोकर सुखाए गए) षष्टिक (साठी) धान के चावलों से

च. चि. १३/१६६

। ॥ १६६ ॥

दूध में पकाई गई यवागू (पतली लपसी) मनुष्य को इच्छा भर खिलाए, और उसके बाद उदर रोगों की निवृत्ति के लिए (वह) इक्षुरस (गन्ने का रस) पिए।

च. चि. १३/१६७

।॥ १६७ ॥

और इस प्रकार पित्त, कफ और अनिल (वात) अपने-अपने स्थान को चले जाते हैं। शङ्खिनी, स्नुक् (थूहर), त्रिवृत् (निशोथ), दन्ती, चिरबिल्व आदि के पल्लवों (कोमल पत्तों) से (बना)

च. चि. १३/१६८

। ॥ १६८ ॥

शाक, वैद्य गाढ़े (कड़े) मल वाले (रोगी) को भोजन से पहले दिलाए। उसके बाद, जिसके मल और दोष ढीले हो गए हों, ऐसे इस (रोगी) को शास्त्र का ज्ञाता (वैद्य)

च. चि. १३/१६९

। ॥ १६९ ॥

मूत्र मिला हुआ दूध दे, जो बचे हुए दोषों को हरने वाला और हितकर है। मारुत (वात) पार्श्वशूल (बगल का दर्द), उपस्तम्भ (रुकावट) और हृद्ग्रह (हृदय की जकड़न) भी

च. चि. १३/१७०

।॥ १७० ॥

जिस (रोगी) में उत्पन्न करे, उसे (वैद्य) बिल्व (बेल) के क्षार के साथ तेल पिलाए। इसी प्रकार अग्निमन्थ, स्योनाक, पलाश और तिल के डण्ठलों से बने,

च. चि. १३/१७१

। ॥ १७१ ॥

(और) बला, कदली (केला) तथा अपामार्ग (चिरचिटा) के क्षारों से, जिनमें से प्रत्येक अलग-अलग छाना गया हो, तेल पकाकर वैद्य उदर रोगों की शान्ति के लिए दे।

च. चि. १३/१७२

। ॥ १७२ ॥

और (इससे) उदर रोगियों का अनिल (वात) से उत्पन्न हृद्ग्रह भी दूर हो जाता है। कफ के वात से, (या) पित्त से आवृत (ढके) होने पर, अथवा अनिल (वात) के उन दोनों (कफ और पित्त) से आवृत होने पर

च. चि. १३/१७३

। ॥ १७३ ॥

बलवान (रोगी) के लिए अपने (उपयुक्त) औषधों से युक्त एरण्ड (अरण्डी) का तेल हितकर है। परन्तु जो मनुष्य भली-भाँति विरेचन हो जाने पर (भी) फिर से आध्मापित (पेट फूला हुआ) हो जाए,

च. चि. १३/१७४

। ॥ १७४ ॥

उसकी चिकित्सा भली-भाँति स्निग्ध (चिकनाई वाले), खट्टे और नमकीन निरूहों से करे। अथवा उपस्तम्भ (रुकावट) सहित वायु जिस मनुष्य (के पेट) को फुला देता है,

च. चि. १३/१७५

। ॥ १७५ ॥

उसकी (उस मनुष्य की) तीक्ष्ण, क्षार और गोमूत्र से युक्त बस्तियों से चिकित्सा करे। और जब त्रिदोषज उदर (रोग) चिकित्सा की पहुँच से आगे निकल गया हो और शान्त न हो रहा हो, तब

च. चि. १३/१७६

। ॥ १७६ ॥

मित्रों सहित सम्बन्धियों, पत्नी, ब्राह्मणों, राजाओं और गुरुओं से अनुमति लेकर, (परिणाम का) संशय बताते हुए, वैद्य कर्म (उपचार) करे।

च. चि. १३/१७७

। ॥ १७७ ॥

चिकित्सा न करने पर मृत्यु निश्चित है, चिकित्सा करने पर संशय रहेगा। ऐसा बताकर, (और) उसके मित्र-समूह से इस (कर्म) की अनुमति पाकर, (वैद्य)

च. चि. १३/१७८

। ॥ १७८ ॥

इस (रोगी) को पेय और भोजन में मिलाया हुआ विष दे; अथवा जिस फल में क्रुद्ध साँप ने विष छोड़ा हो,

च. चि. १३/१७९

। ॥ १७९ ॥

श्रेष्ठ वैद्य भली-भाँति विचार करके वह (फल) उदर रोगी को खिलाए। उससे इसका स्थिर, लीन (भीतर गहरे में छिपा) और विमार्गग (गलत मार्ग में गया हुआ) दोष-समूह

च. चि. १३/१८०

। ॥ १८० ॥

विष के शीघ्र मथ डालने वाले स्वभाव के कारण, विष से टूटकर शीघ्र (बाहर) निकल पड़ता है। विष से जिसके दोष निकाल दिए गए हों और जिस पर ठंडा जल छिड़का गया हो, उस (रोगी) को

च. चि. १३/१८१

। ॥ १८१ ॥

वैद्य (उसे) बल के अनुसार दूध या यवागू पिलाए। और त्रिवृत् (निशोथ) और मण्डूकपर्णी का शाक, यव (जौ) और वास्तुक (बथुआ) सहित,

च. चि. १३/१८२

। ॥ १८२ ॥

खाए, अथवा स्वरस और जल में पकाया हुआ कालशाक (खाए); (वह शाक) खटाई, नमक और स्नेह के बिना और अधपका (हो), और (रोगी) अन्न न खाते हुए

च. चि. १३/१८३

। ॥ १८३ ॥

एक महीने तक (ऐसा करे); और तब प्यास लगने पर स्वरस ही पिए। इस प्रकार शाकों से दोष निकल जाने पर, एक महीने के बाद, तब

च. चि. १३/१८४

। ॥ १८४ ॥

दुर्बल (रोगी) को प्राणों को धारण कराने वाला कारभ (ऊँटनी का) दूध दे। परन्तु यह (आगे कहा जाने वाला) कर्म दृष्टकर्मा (कर्म के अनुभवी) शल्यहर्ताओं (शल्य चिकित्सकों) का हो।

च. चि. १३/१८५

। ॥ १८५ ॥

नाभि के नीचे बाईं कुक्षि (पेट के बाएँ भाग) में चार अङ्गुल नापकर, बुद्धिमान् वैद्य उचित माप वाले शस्त्र से (उसे) चीरे।

च. चि. १३/१८६

। ॥ १८६ ॥

(पेट को) चीरकर, फिर उसके बाद बद्ध (रुकी हुई) और क्षत (छिदी हुई) आँत वाले (दोनों उदरों) में आँत को देखकर, घी चुपड़कर, बाल आदि को पोंछकर (हटाकर), (आँत को) मुक्त करे।

च. चि. १३/१८७

। ॥ १८७ ॥

और जो आँत मूर्च्छन (उलझने) से संमूढ (उलझकर अटकी हुई) हो, उसे भी मुक्त करे। परन्तु आँत के छेदों को बड़ी चींटियों से कटवाकर,

च. चि. १३/१८८

। ॥ १८८ ॥

(छेदों को) बहुत बार (के दंशों से) पकड़ लिया गया जानकर, चींटियों को काटकर, प्रतियोगों (उपायों) से आँत को (भीतर) प्रवेश कराकर, फिर प्रेयों से घाव को सिए।

च. चि. १३/१८९

। ॥ १८९ ॥

उसी प्रकार, जिसमें जल उत्पन्न हो चुका हो, ऐसे हर उदर (रोग) को वैद्य बाएँ पार्श्व में नाभि के नीचे वेधे, और नाडी (नली) लगाकर (जल) बहा दे।

च. चि. १३/१९०

। ॥ १९० ॥

और (जल को) बहाकर निकाल देने के बाद, इसे (पेट को) दबाकर (वैद्य) उदर (पेट) को वस्त्र से लपेट दे; उसी प्रकार वस्ति (बस्ति), विरेचन आदि से म्लान (ढीला और पिचका) हुए हर (पेट) को भी लपेटे।

च. चि. १३/१९१

। ॥ १९१ ॥

(जल के) निकल जाने पर, लङ्घन (उपवास) कराया गया (रोगी) बिना स्नेह (घी-तेल) और बिना नमक की पेया पिए। इसके बाद तो (वह) मनुष्य छह महीने तक क्षीरवृत्ति (दूध पर ही निर्वाह करने वाला) रहे।

च. चि. १३/१९२

। ॥ १९२ ॥

तीन महीने (वह) दूध के साथ पेया पिए, और (फिर) तीन (महीने) भी (उसे) दूध के साथ बिना नमक का हल्का श्यामाक (साँवा) या कोरदूष (कोदो) खिलाए।

च. चि. १३/१९३

। ॥ १९३ ॥

इस प्रकार मनुष्य एक संवत्सर (वर्ष) में प्राप्त (हो चुके) जलोदर को जीत ले। और सब प्रयोगों (उपचारों) के बाद दूध का प्रयोग करे।

च. चि. १३/१९४

। । ॥ १९४ ॥

दोषों के अनुबन्ध (फिर से लौट आने) से रक्षा के लिए और बल की स्थिरता के लिए भी, प्रयोगों (उपचारों) से जिनके अङ्ग क्षीण हो गए हैं, ऐसे उदर के रोगियों के लिए दूध निश्चय ही हितकर है। सब धातुओं के क्षय से पीड़ित (रोगियों) के लिए (दूध वैसा ही है) जैसा देवताओं के लिए अमृत।

च. चि. १३/१९५

- । ॥ १९५ ॥

इस विषय में (संग्रह के) दो श्लोक (हैं): हेतु (कारण), प्राग्रूप (रोग प्रकट होने से पहले के लक्षण), आठों (उदरों) के लिङ्ग (लक्षण) व्यास (विस्तार) और समास (संक्षेप) से, उपद्रव, गरीयस्त्व (कौन अधिक कठिन है) और साध्यता-असाध्यता भी,

च. चि. १३/१९६

। ॥ १९६ ॥

जल बन चुके और न बने (उदरों) के लिङ्ग (लक्षण), और चिकित्सा: (ये सब) ऋषि ने उदरों के चिकित्सित (चिकित्सा के अध्याय) में समास (संक्षेप) और व्यास (विस्तार) वाले निर्देशों से कहे।

च. चि. १३

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, और अप्राप्त (न मिलने) पर दृढबल द्वारा पूरे किए गए तन्त्र (ग्रन्थ) के चिकित्सास्थान में उदरचिकित्सित (उदर रोगों की चिकित्सा) नामक तेरहवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।