भारत संहिता

पाद १

संयोगशरमूलीयः पादः

संयोगशरमूल (वाजीकरण के योग)

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भूमिका

संयोगशरमूलीय पाद चरक संहिता के चिकित्सास्थान के दूसरे अध्याय, वाजीकरण अध्याय, का पहला पाद है; यह अध्याय चार पादों (भागों) में बँटा है। वाजीकरण का शब्दार्थ है 'वाजी (घोड़े) जैसा बनाना'; चरक संहिता में यह चिकित्सा की वह शाखा है जो पुरुष का शुक्र (वीर्य), यौन-सामर्थ्य और सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति बढ़ाने से जुड़ी है। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। पाद के नाम के दोनों शब्द, 'संयोग' (कई द्रव्यों को मिलाकर बनाया गया औषध-योग) और 'शरमूल' (शर नामक घास की जड़), उस श्लोक में आते हैं जहाँ भगवान् आत्रेय वाजीकरण के संयोग बताना आरम्भ करते हैं, और उनके पहले योग की सूची शरमूल से ही शुरू होती है। पाद के अन्त का सार-श्लोक इसे संक्षेप में 'शरमूलीय पाद' कहता है।

पाद वाजीकरण के महत्त्व से आरम्भ होता है। वह कहता है कि आत्मवान् (संयमी) पुरुष सदा वाजीकरण को अपनाए, क्योंकि धर्म, अर्थ, प्रीति और यश उस पर निर्भर हैं: उससे पुत्र होता है, और ये गुण पुत्र पर टिके हैं। फिर पाद कहता है कि सबसे श्रेष्ठ वाजीकरण वह स्त्री है जो पुरुष को हर्षित करे। उसे क्षेत्र (खेत) कहा गया है, क्योंकि सन्तान उसी में उत्पन्न होती है; और इन्द्रियों के जो विषय अलग-अलग भी सुख देते हैं, वे सब स्त्री में एक साथ मिलते हैं। सबसे वृष्य (हर्ष, यौन शक्ति और वीर्य बढ़ाने वाली) स्त्री हर पुरुष के लिए अलग है, क्योंकि मनुष्यों की रुचियाँ भिन्न होती हैं और दैव (भाग्य) का भी संयोग होता है। पाद उसका लम्बा वर्णन करता है: जो आयु, रूप, वाणी और हाव-भाव से किसी पुरुष के लिए श्रेष्ठ हो, उसके समान मन वाली और अनुकूल हो, जिससे बिछुड़कर उसे संसार सूना लगे, और जिसके पास बार-बार जाकर भी वह तृप्त न हो। सन्तान चाहने वाले निरोगी पुरुष के लिए पाद कहता है कि वह भिन्न गोत्र की, प्रसन्न, रोग और कष्ट से रहित, और शुद्ध होकर स्नान की हुई स्त्री के पास जाए।

इसके बाद पाद सन्तान-रहित और बहुत सन्तानों वाले पुरुष की तुलना करता है। सन्तान-रहित पुरुष के लिए उपमाएँ दी गई हैं: छाया-रहित, एक शाखा वाला और फल-रहित वृक्ष, चित्र में बना दीपक, सूखा सरोवर, और घास का ऐसा पुतला जिसे पुरुष का आकार दे दिया गया हो। इसके उलट बहुत सन्तानों वाला पुरुष अनेक रूपों, मुखों, आँखों और आत्माओं वाला कहा गया है, और लोग उसे मंगलमय, धन्य और अनेक शाखाओं वाला कहकर उसकी स्तुति करते हैं। पाद के अनुसार प्रीति, बल, सुख, जीविका, बड़ा कुल, यश और तुष्टि सब सन्तान पर आश्रित हैं; इसलिए वह कहता है कि जो पुरुष सन्तान, उस पर आश्रित ये गुण और काम के सुख चाहता है, वह सदा वाजीकरण में लगा रहे।

फिर भगवान् आत्रेय वाजीकरण के संयोग बताते हैं। पहला योग बृंहणी गुटिका है: शरमूल, इक्षुमूल, शतावरी, विदारी, जीवक, ऋषभक, आत्मगुप्ता (कौंच) जैसी अनेक वनस्पतियों और उड़द के काढ़े में दूध, रस और घृत पकाकर, उसमें शर्करा, मधु और मसालों के चूर्ण मिलाकर एक-एक पल की गोलियाँ बनाई जाती हैं। दूसरा वाजीकरण घृत है, जो उड़द और कौंच के बीजों तथा कई वनस्पतियों के रस में घृत, दूध और ईख का रस पकाकर बनता है, और जिसे भोजन से पहले चाटने को कहा गया है। इनके बाद मांसरस (मांस के शोरबे) के योग आते हैं: मुर्गे के मीठे रस में मसलकर डाली गई उत्कारिका से बना पिण्डरस, जो मोर, तीतर और हंस के रस से भी बनता है; बकरे के अण्डकोष और उड़द के साथ भैंसे के मांसरस में बना माहिष रस; एक पक्षी को दूसरे पक्षी के रस में पकाकर बनाए गए रस; और चटक (गौरैया) का मांस, उड़द के यूष के साथ घी वाला साठी चावल का भात, मगर के रेतस् में तला मुर्गे का मांस, और मछली तथा पक्षियों के अण्डों के प्रयोग। पाद इन्हें वृष्य, बल बढ़ाने वाला और शरीर को पुष्ट करने वाला कहता है, और इनके फल घोड़े और साँड की उपमाओं से बताता है; अन्त का सार-श्लोक कहता है कि इस पाद में ऐसे पन्द्रह संयोग कहे गए हैं।

पाद का अन्त दो श्लोकों से होता है, जो बताते हैं कि ये योग कब फल देते हैं। उनके अनुसार जब स्रोत (शरीर के भीतर के मार्ग) शुद्ध हों और शरीर मल-रहित हो, तब उचित समय पर नपी-तुली मात्रा में लिया गया वृष्य द्रव्य पुरुष को साँड जैसा प्रबल बनाता है; इसलिए पहले व्यक्ति के बल के अनुरूप शोधन (शरीर की शुद्धि) करने को कहा गया है, क्योंकि मलिन शरीर में वृष्य योग वैसे ही सफल नहीं होते जैसे मैले कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता। इस पाद से साथ ले जाने योग्य बातें ये हैं: चरक संहिता वाजीकरण को केवल सुख का साधन नहीं, सन्तान और उससे जुड़े धर्म, अर्थ, यश और कुल का आधार मानती है; वह सबसे श्रेष्ठ वाजीकरण किसी औषध को नहीं, अनुकूल और प्रिय स्त्री को कहती है; और उसके अनुसार वृष्य योग तभी फल देते हैं जब शरीर पहले शुद्ध किया गया हो।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ५२-५३)

तत्र श्लोकौ-वाजीकरणसामर्थ्यं क्षेत्रं स्त्री यस्य चैव या।ये दोषा निरपत्यानां गुणाः पुत्रवतां च ये॥

श्लोक ५२ →

इस विषय में (सार के) दो श्लोक (हैं): वाजीकरण का सामर्थ्य, क्षेत्र (रूपी) स्त्री और किस (पुरुष) की कौन-सी (स्त्री सबसे वृष्य है), सन्तानहीन लोगों के जो दोष (हैं) और पुत्र वालों के जो गुण (हैं),

दश पञ्च च संयोगा वीर्यापत्यविवर्धनाः।उक्तास्ते शरमूलीये पादे पुष्टिबलप्रदाः॥

श्लोक ५३ →

(और) वीर्य तथा अपत्य (सन्तान) को बढ़ाने वाले, पुष्टि और बल देने वाले दस और पाँच (अर्थात् पन्द्रह) संयोग (योग), ये (सब) शरमूलीय पाद में कहे गए।

मुख्य शब्द (११) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. चि. २.१/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम संयोगशरमूलीय (शरमूल वाले योगों सम्बन्धी) वाजीकरण पाद की व्याख्या करेंगे।

च. चि. २.१/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. चि. २.१/३

। ॥ ३ ॥

आत्मवान् (संयमी) पुरुष सदा वाजीकरण को खोजे (अपनाए), क्योंकि धर्म और अर्थ, प्रीति (सुख) और यश भी उसी पर निर्भर हैं।

च. चि. २.१/४

। ॥ ४ ॥

क्योंकि यह (वाजीकरण) पुत्र का आधार है, और ये गुण पुत्र पर आश्रित हैं। और सबसे श्रेष्ठ वाजीकरण है क्षेत्र (सन्तान उत्पन्न होने का स्थान) रूपी वह स्त्री, जो (पुरुष को) हर्षित करने वाली हो।

च. चि. २.१/५

। ॥( ।)

क्योंकि (इन्द्रियों के) प्रिय विषय एक-एक करके (अलग-अलग) भी अत्यन्त प्रसन्नता देने वाले माने गए हैं; फिर उन (विषयों) का क्या कहना जो स्त्री के शरीर में एक साथ मिलकर स्थित हैं। (क्योंकि इन्द्रियों के विषयों का एक साथ मिलना स्त्रियों में पाया जाता है, और कहीं नहीं।)

च. चि. २.१/६

। ॥ ६ ॥

क्योंकि इन्द्रियों का जो विषय स्त्री पर आश्रित है, वह अधिक प्रसन्नता उत्पन्न करने वाला होता है। प्रीति (प्रसन्नता) विशेष रूप से स्त्रियों में है, (और) सन्तान स्त्रियों में स्थित है।

च. चि. २.१/७

। ॥ ७ ॥

धर्म और अर्थ तथा लक्ष्मी (समृद्धि) स्त्रियों में (स्थित हैं), लोक स्त्रियों में स्थित हैं। जो सुन्दर रूप वाली है, जो यौवन में स्थित है, जो (शुभ) लक्षणों से सुशोभित है

च. चि. २.१/८

। ॥ ८ ॥

जो वश में रहने वाली (अनुकूल) है और जो सुशिक्षित है, वह स्त्री सबसे अधिक वृष्य मानी गई है। परन्तु लोगों की रुचि अनेक प्रकार की होने से, और दैव (भाग्य) के संयोग से, स्त्रियों के

च. चि. २.१/९

। ॥ ९ ॥

रूप आदि गुण उस-उस (विशेष) पुरुष को पाकर बढ़ जाते हैं। जो स्त्री (अपनी) आयु, रूप, वाणी और हाव-भाव के कारण जिस (पुरुष) के लिए श्रेष्ठ नारी है

च. चि. २.१/१०

। ॥ १० ॥

(जो) दैव (भाग्य) से या (अपने) कर्म से भी, शीघ्र (उसके) हृदय में प्रवेश कर जाती है; जो हृदय के उत्सव जैसी है; जो (उसके) समान कामना वाली है

च. चि. २.१/११

। ॥ ११ ॥

जो समान सत्त्व (मन और स्वभाव) वाली है, जो वश में रहने वाली (अनुकूल) है; जो जिस (पुरुष) के प्रिय (व्यवहारों) से प्रसन्न होती है; जो (अपने) उत्तम गुणों से सब इन्द्रियों के लिए पाश (फन्दा) बनी हुई है

च. चि. २.१/१२

। ॥ १२ ॥

जिससे बिछुड़कर (पुरुष) उदास होकर संसार को स्त्री से रहित (सूना) मानता है; जिसके बिना पुरुष (अपने) शरीर को मानो इन्द्रियों से रहित (सूना) धारण करता है

च. चि. २.१/१३

। ॥ १३ ॥

जिसे देखकर (पुरुष) शोक, उद्वेग (बेचैनी), अरति (उदासी) और भय से अभिभूत नहीं होता; जिसे पाकर वह विस्रम्भ (विश्वास और निश्चिन्तता) पाता है; जिसे देखकर वह अत्यन्त हर्षित होता है

च. चि. २.१/१४

। ॥ १४ ॥

जिसके पास वह हर्ष के अत्यधिक वेग से सदा ऐसे जाता है मानो वह अपूर्व (पहली बार मिली) हो; जिसके पास बार-बार, बहुत बार जाकर भी वह कभी तृप्ति नहीं पाता

च. चि. २.१/१५

। ॥ १५ ॥

वह स्त्री उस (पुरुष) के लिए सबसे अधिक वृष्य है, क्योंकि मनुष्य अलग-अलग स्वभाव वाले होते हैं। भिन्न गोत्र वाली, वृष्य, प्रसन्न और उपद्रव (रोग या कष्ट) से रहित

च. चि. २.१/१६

। ॥ १६ ॥

सन्तान चाहने वाला, निरोगी (पुरुष) शुद्ध होकर स्नान की हुई नारी के पास जाए। जैसे छाया-रहित, एक ही शाखा वाला और फल-रहित वृक्ष

च. चि. २.१/१७

। ॥ १७ ॥

और अप्रिय गन्ध वाला तथा अकेला (होता है), वैसा ही सन्तान-रहित पुरुष (होता है)। (वह) चित्र में बना दीपक, सूखा सरोवर, (और) धातु जैसा दिखने वाला अधातु (जो धातु नहीं है) है।

च. चि. २.१/१८

। ॥ १८ ॥

सन्तान-रहित (पुरुष) को पुरुष के आकार वाला तृणपूली (घास का पूला, पुतला) समझना चाहिए। और (वह) पुरुष अप्रतिष्ठ (आधार-रहित), नग्न, शून्य (खाली) और एक (ही) इन्द्रिय वाला

च. चि. २.१/१९

। ॥ १९ ॥

और जिसकी सन्तान नहीं होती, (उसे) निष्क्रिय भी समझना चाहिए। अनेक रूपों वाला, अनेक मुखों वाला, अनेक व्यूहों वाला, अनेक कर्मों वाला

च. चि. २.१/२०

। ॥ २० ॥

अनेक आँखों वाला, अनेक ज्ञानों वाला और अनेक आत्माओं वाला (होता है) बहुत सन्तानों वाला (पुरुष)। यह मंगलमय है, यह प्रशंसनीय है, यह धन्य है, यह वीर्यवान् है

च. चि. २.१/२१

। ॥ २१ ॥

यह अनेक शाखाओं वाला है, इस प्रकार भी बहुत सन्तानों वाले पुरुष की स्तुति की जाती है। प्रीति (प्रसन्नता), बल, सुख, वृत्ति (जीविका), विस्तार, बड़ा कुल

च. चि. २.१/२२

। ॥ २२ ॥

यश, सुखद परिणाम वाले लोक और तुष्टि (सन्तोष), (ये सब) सन्तान पर आश्रित हैं। इसलिए सन्तान की, और सन्तान पर आश्रित गुणों की इच्छा करता हुआ

च. चि. २.१/२३

। ॥ २३ ॥

और काम (रति) के सुखों को चाहता हुआ (पुरुष) सदा वाजीकरण (के सेवन) में लगा रहे। उपयोग में सुखद, सिद्ध (परखे हुए), वीर्य और सन्तान को बढ़ाने वाले

च. चि. २.१/२४

। ॥ २४ ॥

वाजीकरण के संयोगों (योगों) को (मैं) इसके बाद कहूँगा। शर के मूल (जड़ें) और इक्षु (ईख) के मूल, काण्डेक्षु, और इक्षुवालिका,

च. चि. २.१/२५

। ॥ २५ ॥

शतावरी, पयस्या और विदारी, कण्टकारिका (कटेरी), जीवन्ती, जीवक, मेदा, वीरा और ऋषभक, बला,

च. चि. २.१/२६

। ॥ २६ ॥

ऋद्धि, गोक्षुरक (गोखरू), रास्ना, और आत्मगुप्ता (कौंच), पुनर्नवा - इनके तीन-तीन पल के भाग, (और) नए माषों (उड़द) का एक आढक

च. चि. २.१/२७

। ॥ २७ ॥

(इन्हें) एक द्रोण जल में अच्छी तरह पकाए और चौथाई भाग शेष रखे। उसमें पीसकर डाले जाने वाले (द्रव्य ये हैं): मधुक (मुलेठी), द्राक्षा (अंगूर), फल्गु, पिप्पली,

च. चि. २.१/२८

। ॥ २८ ॥

आत्मगुप्ता (कौंच), मधूक (महुआ), खर्जूर (खजूर), शतावरी; और विदारी, आमलक (आँवले) और इक्षु (ईख) के रस का अलग-अलग

च. चि. २.१/२९

। ॥ २९ ॥

और घृत का एक आढक डाले, और दूध का एक द्रोण; वैद्य उसे (तब तक) पकाए (जब तक) घृत ही शेष रहे, और अच्छी तरह छाने हुए (उस घृत) को फिर मिलाए

च. चि. २.१/३०

। ॥ ३० ॥

शर्करा (शक्कर) और तुगाक्षीरी के चूर्णों से, जो अलग-अलग एक-एक प्रस्थ मात्रा के हों, मागधी (पिप्पली) के चार पलों से और मरिच (काली मिर्च) के एक पल से,

च. चि. २.१/३१

। ॥ ३१ ॥

और त्वक् (दालचीनी), एला (इलायची) और केशर के आधे-आधे पल मात्रा वाले चूर्णों से, और मधु (शहद) के दो कुडवों से (मिलाकर) वैद्य उसे बनवाए

च. चि. २.१/३२

। ॥‘ ।

एक-एक पल की गोलियाँ, जो गाढ़ी (जमी हुई) हों; उन्हें (सेवन करने वाले की) अग्नि (पाचन-शक्ति) के अनुसार प्रयोग करे। यह परम वृष्य, बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाला) और बल बढ़ाने वाला योग है। (टिप्पणी:) 'कृत्वा' (बनाकर), ऐसा (भी) पाठ (है)।

च. चि. २.१/३३

।( ।) ॥ ३३ ॥

इससे बलवान् (पुरुष) घोड़े की तरह उत्तेजित होकर (स्त्री में) लिङ्ग का समर्पण (प्रवेश) कर सकता है। (यह बृंहणी गुटिका है।) माषों (उड़द) और आत्मगुप्ता (कौंच) के नए बीजों का एक आढक,

च. चि. २.१/३४

। ॥ ३४ ॥

(उनके साथ) जीवक और ऋषभक, वीरा, मेदा, ऋद्धि, शतावरी, और मधुक (मुलेठी) और अश्वगन्धा को, (हर एक) एक कुडव मात्रा में (लेकर), पकाए।

च. चि. २.१/३५

। ॥ ३५ ॥

उस रस (काढ़े) में घृत का एक प्रस्थ, गाय का दस गुना दूध, विदारी के रस का एक प्रस्थ और इक्षु-रस (ईख के रस) का एक प्रस्थ

च. चि. २.१/३६

। ॥ ३६ ॥

(इन्हें) डालकर मृदु अग्नि (धीमी आँच) पर पकाना चाहिए; सिद्ध (पूरी तरह पके हुए) घृत को रख दे। शर्करा (शक्कर), तुगाक्षीरी और क्षौद्र (मधु) के अलग-अलग

च. चि. २.१/३७

। ॥ ३७ ॥

(इनके) चार-चार पल के भाग और पिप्पली का एक पल उसमें डाले। इसमें से पहले एक पल चाटकर, फिर अन्न (भोजन) का सेवन करे

च. चि. २.१/३८

।( ।) ॥ ३८ ॥

(वह पुरुष,) जो अक्षय (कभी क्षीण न होने वाला) शुक्र और शेफ (लिङ्ग) का उत्तम बल चाहे। (यह वाजीकरण घृत है।) शर्करा (शक्कर), माष (उड़द) की दाल, तुगाक्षीरी, दूध, घृत,

च. चि. २.१/३९

। ॥ ३९ ॥

(इन द्रव्यों से,) जिनमें छठा गेहूँ का आटा हो, घृत में उत्कारिका पकाए। उस (उत्कारिका) को, जो बहुत अधिक पकी न हो, मसलकर मुर्गे के (मांस के) मधुर रस में,

च. चि. २.१/४०

। ॥ ४० ॥

जो सुगन्धित और गरम हो, डाले, जिससे रस गाढ़ा हो जाए। यह पिण्डरस वृष्य, पौष्टिक और बल बढ़ाने वाला है।

च. चि. २.१/४१

। । ॥ ४१ ॥

इससे बलवान् (पुरुष) घोड़े की तरह उत्तेजित होकर (स्त्री में) लिङ्ग का समर्पण (प्रवेश) कर सकता है। इसी प्रकार शिखी (मोर), तित्तिरि (तीतर) और हंस (के मांस-रस) का (भी) पिण्डरस माना गया है; वह बल, वर्ण (रंग-रूप) और स्वर को बढ़ाने वाला है; उससे पुरुष वृष (साँड) की तरह (समर्थ) हो जाता है।

च. चि. २.१/४२

। ॥ ४२ ॥

घृत, और बस्त (बकरे) के अण्डकोषों सहित माषों (उड़द) को महिष (भैंसे) के (मांस के) रस में पकाए; उस छाने हुए और (खट्टे) फलों से खट्टे किए हुए रस को नए घृत में भूने (छौंके)

च. चि. २.१/४३

। ॥( ।)

(उस रस को) थोड़ा नमक डालकर और धान्य (धनिया), जीरक (जीरा) तथा नागर (सोंठ) से युक्त करके (भूने)। यह उत्तम रस वृष्य, बल्य (बल देने वाला) और बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाला) है। (इस प्रकार यह वृष्य माहिष रस है।)

च. चि. २.१/४४

। ॥ ४४ ॥

चटकों (गौरैयों) को तित्तिरि (तीतर) के रस में, तित्तिरियों को कुक्कुट (मुर्गे) के रस में, कुक्कुटों को बार्हिण (मोर के) रस में और बार्हिण (मोर) को हांस (हंस के) रस में

च. चि. २.१/४५

। ॥( ।)

नए घृत (घी) में भली-भाँति तपाए हुए, फलों से खट्टे किए हुए, अथवा (व्यक्ति के) सात्म्य के अनुसार मधुर (मीठे), सुगन्ध से भरपूर और बल बढ़ाने वाले रस बनवाए। (इस प्रकार ये अन्य वृष्य रस हैं।)

च. चि. २.१/४६

। ॥( ।)

जो चटक (गौरैया) के मांस से तृप्त होकर (भरपेट खाकर) बाद में दूध पिए, उसके लिङ्ग (शिश्न) में शिथिलता नहीं होगी, और न रात में (उसके) शुक्र का क्षय (होगा)। (इस प्रकार यह वृष्य मांस है।)

च. चि. २.१/४७

। ॥( ।)

जो माष (उड़द) के यूष के साथ घृत (घी) से भरपूर षष्टिक (साठी चावल) का ओदन (भात) खाकर दूध पीता है, वह वेगवान् (वेग से भरा) होकर पूरी रात जागता है। (इस प्रकार यह वृष्य माष योग है।)

च. चि. २.१/४८

। ॥ ४८ ॥

नक्र (मगर) के रेतस् (वीर्य) में तले हुए कुक्कुट (मुर्गे) के मांस से तृप्त पुरुष, सदा तने हुए शेफ (शिश्न) के साथ, रातों में सोता नहीं।

च. चि. २.१/४९

। ॥( ।)

मत्स्य (मछली) के अण्डों का रस निकालकर, घृत (घी) में तला हुआ (वह रस) खाए। इसी प्रकार हंस, बर्हिण (मोर) और दक्ष (पक्षी) के अण्डे खाए। (इस प्रकार यह वृष्य अण्ड रस है।)

च. चि. २.१/५०

- । ॥ ५० ॥

और इस विषय में (ये दो श्लोक) हैं: स्रोतों (शरीर के मार्गों) के शुद्ध और शरीर के निर्मल (मल-रहित) होने पर, जब पुरुष उचित समय पर नपी-तुली मात्रा में वृष्य (द्रव्य) खाता है, तब उससे वह मनुष्य अत्यन्त वृष (साँड) के समान (प्रबल काम-शक्ति वाला) हो जाता है; और वह (वृष्य) बृंहण (पुष्ट करने वाला) और बल देने वाला भी होता है।

च. चि. २.१/५१

। ॥ ५१ ॥

इसलिए पहले (व्यक्ति के) बल के अनुरूप शोधन ही करना चाहिए, क्योंकि मलिन (मल से भरे) शरीर में प्रयोग किए गए वृष्य योग सफल नहीं होते, जैसे मैले कपड़े पर रंगने के योग (सफल नहीं होते)।

च. चि. २.१/५२

- । ॥ ५२ ॥

इस विषय में (सार के) दो श्लोक (हैं): वाजीकरण का सामर्थ्य, क्षेत्र (रूपी) स्त्री और किस (पुरुष) की कौन-सी (स्त्री सबसे वृष्य है), सन्तानहीन लोगों के जो दोष (हैं) और पुत्र वालों के जो गुण (हैं),

च. चि. २.१/५३

। ॥ ५३ ॥

(और) वीर्य तथा अपत्य (सन्तान) को बढ़ाने वाले, पुष्टि और बल देने वाले दस और पाँच (अर्थात् पन्द्रह) संयोग (योग), ये (सब) शरमूलीय पाद में कहे गए।

च. चि. २.१

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र (ग्रन्थ) के चिकित्सास्थान में, वाजीकरण अध्याय में, संयोगशरमूलीय नामक पहला वाजीकरण-पाद (पूरा हुआ)।