भूमिका
संयोगशरमूलीय पाद चरक संहिता के चिकित्सास्थान के दूसरे अध्याय, वाजीकरण अध्याय, का पहला पाद है; यह अध्याय चार पादों (भागों) में बँटा है। वाजीकरण का शब्दार्थ है 'वाजी (घोड़े) जैसा बनाना'; चरक संहिता में यह चिकित्सा की वह शाखा है जो पुरुष का शुक्र (वीर्य), यौन-सामर्थ्य और सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति बढ़ाने से जुड़ी है। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। पाद के नाम के दोनों शब्द, 'संयोग' (कई द्रव्यों को मिलाकर बनाया गया औषध-योग) और 'शरमूल' (शर नामक घास की जड़), उस श्लोक में आते हैं जहाँ भगवान् आत्रेय वाजीकरण के संयोग बताना आरम्भ करते हैं, और उनके पहले योग की सूची शरमूल से ही शुरू होती है। पाद के अन्त का सार-श्लोक इसे संक्षेप में 'शरमूलीय पाद' कहता है।
पाद वाजीकरण के महत्त्व से आरम्भ होता है। वह कहता है कि आत्मवान् (संयमी) पुरुष सदा वाजीकरण को अपनाए, क्योंकि धर्म, अर्थ, प्रीति और यश उस पर निर्भर हैं: उससे पुत्र होता है, और ये गुण पुत्र पर टिके हैं। फिर पाद कहता है कि सबसे श्रेष्ठ वाजीकरण वह स्त्री है जो पुरुष को हर्षित करे। उसे क्षेत्र (खेत) कहा गया है, क्योंकि सन्तान उसी में उत्पन्न होती है; और इन्द्रियों के जो विषय अलग-अलग भी सुख देते हैं, वे सब स्त्री में एक साथ मिलते हैं। सबसे वृष्य (हर्ष, यौन शक्ति और वीर्य बढ़ाने वाली) स्त्री हर पुरुष के लिए अलग है, क्योंकि मनुष्यों की रुचियाँ भिन्न होती हैं और दैव (भाग्य) का भी संयोग होता है। पाद उसका लम्बा वर्णन करता है: जो आयु, रूप, वाणी और हाव-भाव से किसी पुरुष के लिए श्रेष्ठ हो, उसके समान मन वाली और अनुकूल हो, जिससे बिछुड़कर उसे संसार सूना लगे, और जिसके पास बार-बार जाकर भी वह तृप्त न हो। सन्तान चाहने वाले निरोगी पुरुष के लिए पाद कहता है कि वह भिन्न गोत्र की, प्रसन्न, रोग और कष्ट से रहित, और शुद्ध होकर स्नान की हुई स्त्री के पास जाए।
इसके बाद पाद सन्तान-रहित और बहुत सन्तानों वाले पुरुष की तुलना करता है। सन्तान-रहित पुरुष के लिए उपमाएँ दी गई हैं: छाया-रहित, एक शाखा वाला और फल-रहित वृक्ष, चित्र में बना दीपक, सूखा सरोवर, और घास का ऐसा पुतला जिसे पुरुष का आकार दे दिया गया हो। इसके उलट बहुत सन्तानों वाला पुरुष अनेक रूपों, मुखों, आँखों और आत्माओं वाला कहा गया है, और लोग उसे मंगलमय, धन्य और अनेक शाखाओं वाला कहकर उसकी स्तुति करते हैं। पाद के अनुसार प्रीति, बल, सुख, जीविका, बड़ा कुल, यश और तुष्टि सब सन्तान पर आश्रित हैं; इसलिए वह कहता है कि जो पुरुष सन्तान, उस पर आश्रित ये गुण और काम के सुख चाहता है, वह सदा वाजीकरण में लगा रहे।
फिर भगवान् आत्रेय वाजीकरण के संयोग बताते हैं। पहला योग बृंहणी गुटिका है: शरमूल, इक्षुमूल, शतावरी, विदारी, जीवक, ऋषभक, आत्मगुप्ता (कौंच) जैसी अनेक वनस्पतियों और उड़द के काढ़े में दूध, रस और घृत पकाकर, उसमें शर्करा, मधु और मसालों के चूर्ण मिलाकर एक-एक पल की गोलियाँ बनाई जाती हैं। दूसरा वाजीकरण घृत है, जो उड़द और कौंच के बीजों तथा कई वनस्पतियों के रस में घृत, दूध और ईख का रस पकाकर बनता है, और जिसे भोजन से पहले चाटने को कहा गया है। इनके बाद मांसरस (मांस के शोरबे) के योग आते हैं: मुर्गे के मीठे रस में मसलकर डाली गई उत्कारिका से बना पिण्डरस, जो मोर, तीतर और हंस के रस से भी बनता है; बकरे के अण्डकोष और उड़द के साथ भैंसे के मांसरस में बना माहिष रस; एक पक्षी को दूसरे पक्षी के रस में पकाकर बनाए गए रस; और चटक (गौरैया) का मांस, उड़द के यूष के साथ घी वाला साठी चावल का भात, मगर के रेतस् में तला मुर्गे का मांस, और मछली तथा पक्षियों के अण्डों के प्रयोग। पाद इन्हें वृष्य, बल बढ़ाने वाला और शरीर को पुष्ट करने वाला कहता है, और इनके फल घोड़े और साँड की उपमाओं से बताता है; अन्त का सार-श्लोक कहता है कि इस पाद में ऐसे पन्द्रह संयोग कहे गए हैं।
पाद का अन्त दो श्लोकों से होता है, जो बताते हैं कि ये योग कब फल देते हैं। उनके अनुसार जब स्रोत (शरीर के भीतर के मार्ग) शुद्ध हों और शरीर मल-रहित हो, तब उचित समय पर नपी-तुली मात्रा में लिया गया वृष्य द्रव्य पुरुष को साँड जैसा प्रबल बनाता है; इसलिए पहले व्यक्ति के बल के अनुरूप शोधन (शरीर की शुद्धि) करने को कहा गया है, क्योंकि मलिन शरीर में वृष्य योग वैसे ही सफल नहीं होते जैसे मैले कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता। इस पाद से साथ ले जाने योग्य बातें ये हैं: चरक संहिता वाजीकरण को केवल सुख का साधन नहीं, सन्तान और उससे जुड़े धर्म, अर्थ, यश और कुल का आधार मानती है; वह सबसे श्रेष्ठ वाजीकरण किसी औषध को नहीं, अनुकूल और प्रिय स्त्री को कहती है; और उसके अनुसार वृष्य योग तभी फल देते हैं जब शरीर पहले शुद्ध किया गया हो।