भारत संहिता

पाद ४

आयुर्वेदसमुत्थानीयः पादः

आयुर्वेद का उद्भव

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भूमिका

आयुर्वेदसमुत्थानीय पाद चरक संहिता के चिकित्सास्थान के पहले अध्याय, रसायन अध्याय, का चौथा और अन्तिम पाद है; यह अध्याय चार पादों (भागों) में बँटा है। रसायन वह चिकित्सा है जिसे चरक संहिता आयु, बल, बुद्धि और यौवन को बनाए रखने और बढ़ाने वाली बताती है। पाद का नाम 'आयुर्वेद का समुत्थान', यानी उद्भव, से पड़ा है: यह उस कथा से आरम्भ होता है जिसमें हिमालय पर गए ऋषियों को इन्द्र जी आयुर्वेद का उपदेश देते हैं, और इसका अन्तिम सार-श्लोक भी कहता है कि इन्द्र जी ने सिद्ध ब्रह्मचारियों से जो कुछ कहा, वह सब इस पाद में प्रकाशित किया गया है। पाद के आरम्भ के अनुसार इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है।

कथा यह है कि एक समय शालीन (घर बनाकर एक स्थान पर रहने वाले) और यायावर (घूमते रहने वाले) ऋषि गाँव में रहते हुए और ग्राम्य ओषधियों का आहार करते हुए मन्द चेष्टा वाले हो गए और बहुत स्वस्थ नहीं रहे, यहाँ तक कि अपने कर्तव्य भी पूरे न कर सके। इसे ग्राम-वास से आया दोष मानकर भृगु, अङ्गिरा, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, अगस्त्य आदि महर्षि अपने पुराने निवास हिमालय पर चले गए, जिसका वर्णन पाद बड़े आदर से करता है। वहाँ इन्द्र जी ने उनका स्वागत किया, ग्राम-वास से होने वाली ग्लानि और स्वर तथा वर्ण के बिगड़ने जैसे कष्ट गिनाए, और कहा कि अब अपने शरीर की देखभाल का और आयुर्वेद के उपदेश का समय है। वे आयुर्वेद की परम्परा बताते हैं: ब्रह्मा जी से प्रजापति जी को, प्रजापति जी से अश्विनीकुमारों को, और अश्विनीकुमारों से स्वयं इन्द्र जी को। लोगों की आयु छोटी और जरा तथा रोगों से भरी है, इसलिए वे ऋषियों से कहते हैं कि वे आयुर्वेद सुनें, उसे धारण करें और लोगों के हित के लिए प्रकाशित करें। ऋषियों ने ऋचाओं से इन्द्र जी की स्तुति की और प्रसन्न होकर उनके वचन का अभिनन्दन किया।

फिर इन्द्र जी ऋषियों को आयुर्वेद रूपी अमृत सौंपते हैं और रसायन के प्रयोग बताते हैं। पहला प्रयोग हिमालय में उगने वाली दिव्य ओषधियों का है, जैसे ऐन्द्री, ब्राह्मी, शतावरी, पुनर्नवा, वचा, मेदा और दूसरी जीवनीय ओषधियाँ; पाद के अनुसार ये दूध के साथ लेने पर छह मास में परम आयु, युवावस्था, आरोग्य, स्वर और वर्ण की सम्पदा, मेधा, स्मृति और उत्तम बल देती हैं। फिर ब्रह्मसुवर्चला, आदित्यपर्णी, सोम आदि नौ और दिव्य ओषधियाँ अपनी पहचान के चिह्नों के साथ आती हैं, और उनके सेवन की एक असाधारण विधि, जिसमें पाद के अनुसार सेवन करने वाला पलाश की लकड़ी की द्रोणी में लेटकर छह मास में फिर से उत्पन्न होता है और देवताओं जैसा हो जाता है। इन ओषधियों का प्रभाव ऋषियों जैसे संयमी लोग ही सह सकते हैं, पर संयमी वानप्रस्थ और गृहस्थ भी इनका सेवन कर सकते हैं। जो इन्हें खोज न सकें या इनका प्रयोग न कर सकें, उनके लिए इन्द्र जी दूसरा रसायन बताते हैं: अनेक वनस्पतियों के रस, दूध, तिल का तेल और घी साथ पकाकर, उसमें आँवले का चूर्ण, मधु, शर्करा, वंशलोचन और पिप्पली मिलाकर यह बनता है, और इसकी मात्रा में सोने, चाँदी, मोती, मूँगे आदि के चूर्ण डाले जाते हैं। पाद इसे सब रोगों को शान्त करने वाला, वृष्य, आयुष्य, और मन, स्मृति, बुद्धि और इन्द्रियों को बल देने वाला कहता है।

इसके बाद पाद बताता है कि रसायन किस विधि से और किस आचरण के साथ लिया जाए। समर्थ, नीरोग, संयमी और साधन-सम्पन्न लोगों के लिए कुटी-प्रवेश की विधि हितकर कही गई है, और दूसरों के लिए सौर्यमारुतिक, यानी धूप और हवा वाली, विधि; पहली अधिक श्रेष्ठ है, पर बहुत कठिन। फिर आचार रसायन आता है: सत्य बोलना, क्रोध न करना, मद्य और मैथुन से दूर रहना, हिंसा न करना, दान, तप, दया, जागने और सोने में सन्तुलन, वृद्धों और आस्तिकों की सेवा, और ऐसे ही दूसरे गुण। पाद के अनुसार ऐसे मनुष्य को 'नित्य रसायन' जानना चाहिए, और इन गुणों के साथ रसायन लेने वाला उसके सब लाभ पाता है। पाद यह भी कहता है कि शरीर और मन के दोषों को निकाले बिना रसायन के गुण नहीं मिलते, कि रसायन के योग मन और शरीर से शुद्ध और संयमी लोगों में ही सफल होते हैं, और कि यह ज्ञान किन लोगों को नहीं बताया जाना चाहिए।

पाद का अन्तिम भाग वैद्य के बारे में है। रसायन, वृष्य योग और रोगों की औषध, सब वैद्य के आश्रित हैं, इसलिए पाद कहता है कि समझदार व्यक्ति वैद्य का, जिसे यहाँ प्राणाचार्य (प्राणों का आचार्य) कहा गया है, वैसे ही आदर करे जैसे इन्द्र जी अश्विनीकुमारों का करते हैं। अश्विनीकुमार देवताओं के वैद्य हैं, और पाद उनकी चिकित्साएँ गिनाता है: यज्ञ का कटा सिर जोड़ना, पूषा जी के दाँत, भग जी के नेत्र और इन्द्र जी की जकड़ी भुजा की चिकित्सा, चन्द्र देव का राजयक्ष्मा दूर करना, और बूढ़े च्यवन ऋषि को फिर से युवा बनाना। पाद का तर्क है कि जब अजर-अमर देवता भी वैद्यों को पूजते हैं, तो मृत्यु, रोग और बुढ़ापे के वश में रहने वाले मनुष्यों के लिए वैद्य और भी पूज्य हैं। विद्या पूरी होने पर वैद्य का दूसरा जन्म माना गया है। पाद के अनुसार जो रोगी ठीक होकर वैद्य को बदले में कुछ नहीं देता, उसकी निष्कृति (छुटकारा) नहीं है, और वैद्य भी सब रोगियों की अपने पुत्रों की तरह रक्षा करे। महर्षियों ने आयुर्वेद को धर्म के लिए, और अर्थ तथा काम के लिए भी, प्रकाशित किया; पर पाद के अनुसार जो वैद्य धन या काम के लिए नहीं, बल्कि प्राणियों पर दया से चिकित्सा करता है, वह सबसे बढ़कर है, और जो चिकित्सा को बेचता है, वह सोने का ढेर छोड़कर धूल के ढेर को अपनाता है। इस पाद से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि यहाँ रसायन केवल ओषधियों का नहीं, आचरण का भी विषय है, और आयुर्वेद के उद्भव की कथा इस उपदेश पर समाप्त होती है कि जीवन-दान से बढ़कर कोई दान नहीं, और प्राणियों पर दया ही परम धर्म है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ६३-६४)

तत्र श्लोकौ-आयुर्वेदसमुत्थानं दिव्यौषधिविधिं शुभम्।अमृताल्पान्तरगुणं सिद्धं रत्नरसायनम्॥

श्लोक ६३ →

इस विषय में (ये) दो श्लोक (हैं): आयुर्वेद का समुत्थान (उद्भव), दिव्य ओषधियों की शुभ विधि, (और) गुणों में अमृत से थोड़ा ही अन्तर रखने वाला (लगभग अमृत जैसा) सिद्ध रत्न-रसायन

सिद्धेभ्यो ब्रह्मचारिभ्यो यदुवाचामरेश्वरः।आयुर्वेदसमुत्थाने तत् सर्वं संप्रकाशितम्॥

श्लोक ६४ →

जो (कुछ) अमरेश्वर (देवताओं के स्वामी, इन्द्र) ने सिद्ध ब्रह्मचारियों (ऋषियों) से कहा, वह सब आयुर्वेदसमुत्थान (नामक इस पाद) में प्रकाशित किया गया है।

मुख्य शब्द (१६) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

आयुर्वेद
आयु का ज्ञान - जीवन और स्वास्थ्य का शास्त्र
विस्तार

शब्द-रचना: आयुस् (आयु, जीवन) + वेद (ज्ञान; √विद् 'जानना' से)।

अर्थ: आयु का वेद, अर्थात् जीवन का ज्ञान।

चरक संहिता में: आयुर्वेद वह शास्त्र है जिसमें हित और अहित, सुख और दुःख वाली आयु, आयु के लिए क्या हितकर और क्या अहितकर है, आयु का मान, और स्वयं आयु बताई गई हो (सू. १/४१)। इसलिए आयुर्वेद केवल रोगों की दवा नहीं, पूरे जीवन को स्वस्थ और सार्थक रखने की विद्या है।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

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च. चि. १.४/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम आयुर्वेदसमुत्थानीय (आयुर्वेद के उद्भव सम्बन्धी) रसायन-पाद की व्याख्या करेंगे।

च. चि. १.४/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. चि. १.४/३

। ॥‘ ; । । ।

एक समय ऋषि, शालीन (घर बनाकर एक स्थान पर रहने वाले) और यायावर (घूमते रहने वाले), ग्राम्य ओषधियों (गाँव में उगाई जाने वाली वनस्पतियों) का आहार करने वाले होकर प्रायः सांपन्निक (सम्पन्न), मन्द चेष्टा वाले (कम परिश्रम करने वाले) और बहुत स्वस्थ नहीं रह गए। भृगु, अङ्गिरा, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, अगस्त्य, पुलस्त्य, वामदेव, असित, गौतम आदि वे महर्षि सभी करने योग्य कर्तव्यों में असमर्थ होकर, और (अपनी इस दशा को) ग्राम में रहने से उत्पन्न अपना दोष मानकर, (अपने) पूर्व निवास हिमवान् (हिमालय) पर गए, जो ग्राम्य दोषों से रहित, कल्याणकारी, पुण्यमय, महान और शुद्ध है; जहाँ पुण्य कर्म न करने वाले नहीं पहुँच सकते; जो गङ्गा का उद्गम है; जहाँ देवता, गन्धर्व और किन्नर विचरते हैं; जो अनेक रत्नों का भण्डार है; जिसका प्रभाव अचिन्त्य और अद्भुत है; जहाँ ब्रह्मर्षि, सिद्ध और चारण विचरते हैं; जो दिव्य तीर्थों और ओषधियों का उद्गम है; जो अत्यन्त शरण देने वाला है; और जिसकी रक्षा देवताओं के अधिपति (इन्द्र) करते हैं। 'जो शाला (घर) में प्रवेश के योग्य हैं, वे शालीन हैं, अर्थात् जो घर बनाकर एक ही स्थान पर टिक कर रहते हैं। यायावर वे हैं जिनका स्वभाव बार-बार (एक स्थान से दूसरे स्थान) जाने का है। धन आदि की सम्पत्ति से सम्पन्न (लोग) ही सांपन्निक हैं', ऐसा योगीन्द्रनाथ सेन (कहते हैं)।

च. चि. १.४/४

। ; , , ; , , , ॥ ४ ॥

सहस्र नेत्रों वाले, देवताओं के गुरु इन्द्र ने उनसे कहा - ब्रह्म को जानने वाले, ज्ञान और तप रूपी धन वाले ब्रह्मर्षियों का स्वागत है। क्या आप लोगों में ग्राम में रहने से उत्पन्न ग्लानि, अप्रभावत्व (शक्ति और तेज की कमी), वैस्वर्य (स्वर का बिगड़ना) और वैवर्ण्य (रंग का बिगड़ना) नहीं हैं, जो दुःखदायी हैं और आगे भी दुःख से जुड़े रहते हैं? क्योंकि ग्राम का वास अशुभ (बातों) का मूल है। अतः (आप) पुण्य करने वालों द्वारा प्रजा पर अनुग्रह (तो) किया जा चुका है; (अब) अपने शरीर की देखभाल करने का समय है, और यह ब्रह्मर्षियों के लिए आयुर्वेद के उपदेश का भी समय है। अपने और प्रजा के अनुग्रह के लिए दोनों अश्विनों ने मुझे आयुर्वेद दिया, प्रजापति ने अश्विनों को, (और) ब्रह्मा ने प्रजापति को। प्रजा की आयु को अल्प, जरा और व्याधियों से भरी, दुःखमय और आगे भी दुःख से जुड़ी, और (आयु के) अल्प होने के कारण तप, दम, नियम, दान और अध्ययन के थोड़े संचय वाली मानकर, आप लोग मुझसे (उस आयुर्वेद को) सुनें, जो परम पुण्य, आयु को बढ़ाने वाला, जरा और व्याधि को शान्त करने वाला, ऊर्जा देने वाला, अमृत, शिव, शरण देने वाला और उदार है; फिर (उसे) धारण करें, और प्रजा के अनुग्रह के लिए प्रकाशित करें; (यह) आर्ष ब्रह्म के प्रति मैत्री और करुणा है, और अपने लिए अनुत्तम, पुण्य, उदार, ब्राह्म और अक्षय कर्म है।

च. चि. १.४/५

, ॥ ५ ॥

देवताओं के स्वामी (इन्द्र) का वह वचन सुनकर सब के सब ऋषियों ने ऋचाओं से देवताओं में श्रेष्ठ (इन्द्र) की स्तुति की, और अत्यन्त प्रसन्न होकर उस वचन का अभिनन्दन भी किया।

च. चि. १.४/६

, , ; , , , , , , , , , , , , , , , , , ॥( ।)

फिर इन्द्र ने वह आयुर्वेद रूपी अमृत ऋषियों को सौंपकर कहा - यह सब अनुष्ठेय (आचरण में लाने योग्य) है; और यह रसायनों का शिव (शुभ) काल है, और हिमालय में उत्पन्न दिव्य ओषधियाँ (इस समय) प्राप्तवीर्य (पूर्ण वीर्य से युक्त) हैं; जैसे - ऐन्द्री, ब्राह्मी, पयस्या, क्षीरपुष्पी, श्रावणी, महाश्रावणी, शतावरी, विदारी, जीवन्ती, पुनर्नवा, नागबला, स्थिरा, वचा, छत्रा, अतिच्छत्रा, मेदा, महामेदा और अन्य जीवनीय (ओषधियाँ); (ये) दूध के साथ प्रयोग की जाने पर, सिद्ध होकर, छह मास के बाद परम आयु, तरुण वय, अनामयत्व (रोगों से मुक्ति), स्वर और वर्ण की सम्पदा, उपचय (शरीर की पुष्टि), मेधा, स्मृति, उत्तम बल और अन्य इष्ट भाव लाती हैं। (इस प्रकार इन्द्र द्वारा कहा गया रसायन।)

च. चि. १.४/७

, , , , , , , , ; , , , ; , , , , ॥ ७ ॥

ब्रह्मसुवर्चला नाम की ओषधि, जिसका दूध (दूधिया रस) सोने जैसा है और पत्ते पुष्कर (कमल) जैसे हैं; आदित्यपर्णी नाम की ओषधि, जो 'सूर्यकान्ता' नाम से जानी जाती है, सुनहरे दूध वाली और सूर्य-मण्डल के आकार के फूलों वाली है; नारी नाम की ओषधि, जो 'अश्वबला' नाम से जानी जाती है, जिसके पत्ते बल्वज (घास) जैसे हैं; काष्ठगोधा नाम की ओषधि, जो गोधा (गोह) के आकार की है; सर्पा नाम की ओषधि, जो साँप के आकार की है; सोम नाम का ओषधियों का राजा, जो पन्द्रह पर्वों (गाँठों) वाला है, वह सोम (चन्द्रमा) की तरह घटता और बढ़ता है; पद्मा नाम की ओषधि, जो कमल के आकार की, कमल जैसी लाल और कमल जैसी गन्ध वाली है; अजा नाम की ओषधि, जो 'अजशृङ्गी' नाम से जानी जाती है; और नीला नाम की ओषधि, जो नीले दूध वाली, नीले फूलों वाली और लता के फैलते तन्तुओं से भरपूर है। इन ओषधियों में से जो-जो भी मिल जाए, उस-उस के स्वरस से तृप्ति तक पहुँचकर (व्यक्ति) स्नेह से भावित (तर की हुई), ढक्कन वाली, हरे पलाश (ढाक) की द्रोणी (लकड़ी की नाँद) में नग्न होकर लेटे; वहाँ वह प्रलीन (विलीन) हो जाता है, छह महीने में फिर से उत्पन्न होता है, (और) बकरी का दूध उसका प्रत्यवस्थापन (फिर से स्थिर और पुष्ट करने वाला) है; छह महीने में वह वय (यौवन), वर्ण, स्वर, आकृति, बल और प्रभा (कान्ति) में देवताओं के समान हो जाता है, वाणी में स्थित सब (ज्ञान) उसमें अपने-आप प्रकट हो जाते हैं, उसके नेत्र और कान दिव्य हो जाते हैं, (उसकी) गति हज़ार योजन (तक) होती है, और (उसकी) आयु दस हज़ार वर्ष की और उपद्रव-रहित होती है।

च. चि. १.४/८

- । ॥ ८ ॥

और यहाँ (इस विषय में ये श्लोक) हैं: दिव्य ओषधियों का जो प्रभाव है, वह आप जैसे (लोगों) द्वारा सहना सम्भव है, परन्तु अकृतात्मा (जिन्होंने अपने-आप को नहीं साधा, ऐसे लोगों) द्वारा (उसे) सहना असम्भव होगा।

च. चि. १.४/९

। ॥ ९ ॥

ओषधियों के प्रभाव से, और अपने कर्म में स्थित रहते हुए, आप लोगों का सम्पूर्ण कल्याण, सब कुछ ही, सिद्ध हो जाएगा।

च. चि. १.४/१०

। ॥ १० ॥

(अपने) प्रदेश में उत्पन्न ये ओषधियाँ निश्चय ही प्रयत (संयमी) और नियतात्मा (मन को वश में रखने वाले) वानप्रस्थों और गृहस्थों द्वारा (भी) सेवन की जा सकती हैं।

च. चि. १.४/११

। ॥ ११ ॥

परन्तु जो (ओषधियाँ) भूमि के गुणों से और उन (सेवन करने वालों) के मध्यम कर्म से अपेक्षाकृत मृदु (हल्के) वीर्य वाली हों, उनकी विधि तो वही जाननी चाहिए।

च. चि. १.४/१२

। ॥ १२ ॥

जो (लोग) उन (ओषधियों) को खोजने या (उनका) प्रयोग करने में असमर्थ हैं, (और) सुख चाहने वाले हैं, उनके लिए यह दूसरी रसायन-विधि प्रशंसित है।

च. चि. १.४/१३

। ॥ १३ ॥

बल्य (बल देने वाली), जीवनीय (जीवन-शक्ति देने वाली), और जो दस बृंहणीय (शरीर को पुष्ट करने वाली) हैं (उनके), और वयःस्थापन (वय को स्थिर रखने वाली ओषधियों) के, और खदिर (खैर) और असन के

च. चि. १.४/१४

। ॥ १४ ॥

खर्जूर (खजूर), मधूक (महुआ), मुस्ता (नागरमोथा) और उत्पल (कमल जैसा एक जलपुष्प) के, मृद्वीका (अंगूर), विडङ्ग (वायविडंग), वचा (वच) और चित्रक के

च. चि. १.४/१५

। ॥ १५ ॥

शतावरी, पयस्या, पिप्पली और जोङ्गक के, ऋद्धि, नागबला, द्वारदा और धव के

च. चि. १.४/१६

। ॥ १६ ॥

त्रिफला और कण्टकारी (कटेरी) के, विदारी और चन्दन के, इक्षु (ईख) के, शर की जड़ों के, श्रीपर्णी और तिनिश के

च. चि. १.४/१७

। ॥ १७ ॥

(इन सबके) रस अलग-अलग लेने चाहिए, और पलाश (ढाक) का क्षार भी। इन (रसों) के एक-एक पल के भाग, (और) चार गुना गाय का दूध

च. चि. १.४/१८

। ॥ १८ ॥

तिल के तेल के दो पात्र और गाय के घी के दो (पात्र); यह सब एक साथ पकाना चाहिए। भली-भाँति पक जाने पर स्नेह (तेल-घी) को उतार लेना चाहिए।

च. चि. १.४/१९

। ॥ १९ ॥

उस (स्नेह) में आमलक (आँवले) के चूर्ण का एक आढक, जिसे (आमलक के) अपने ही स्वरस से सौ बार भावित किया गया हो, डालना चाहिए, (और) नये मधु का

च. चि. १.४/२०

। ॥ २० ॥

और शर्करा के चूर्ण का एक पात्र, (तथा) पिप्पली सहित तुगाक्षीरी (वंशलोचन) का एक प्रस्थ डालना चाहिए। और उस (सब) को भली-भाँति मिलाकर रखना चाहिए

च. चि. १.४/२१

। ॥ २१ ॥

(उसे) बहुत स्वच्छ, घी से भावित मिट्टी के घड़े में आधे मास तक (रखना चाहिए)। उसके बाद उसकी, (व्यक्ति की) अग्नि के अनुरूप, मात्रा का प्रयोग करे।

च. चि. १.४/२२

। ॥ २२ ॥

सोने, ताँबे, प्रवाल (मूँगे), लोहे, स्फटिक, मोती, वैदूर्य, शङ्ख और चाँदी के चूर्णों का

च. चि. १.४/२३

। ॥ २३ ॥

(इन चूर्णों का) सोलहवाँ भाग मिलाकर, (और) परिश्रम तथा मैथुन को छोड़कर, (औषध के) हर बार पच जाने पर दूध और घी के साथ षष्टिक (साठी चावल) खाए।

च. चि. १.४/२४

।॥ २४ ॥

(यह रसायन) सब रोगों को शान्त करने वाला, वृष्य, आयुष्य (आयु के लिए हितकर), उत्तम, तथा सत्त्व (मन), स्मृति, शरीर, अग्नि, बुद्धि और इन्द्रियों को बल देने वाला (है)।

च. चि. १.४/२५

। ॥ २५ ॥

(यह) परम ऊर्जा (बल) देने वाला, तथा वर्ण और स्वर को (उत्तम) करने वाला, विष और अलक्ष्मी (दुर्भाग्य) को शान्त करने वाला, (और) वाणी में निहित सारा (ज्ञान) देने वाला (है)।

च. चि. १.४/२६

। ॥(।)

सिद्धार्थता (प्रयोजनों में सफलता), नया वय (यौवन), प्रजा का प्रिय होना और संसार में यश चाहने वालों को यह ब्राह्म, उदार वीर्य वाला (अत्यन्त प्रभावशाली) रसायन विधिपूर्वक प्रयोग करना चाहिए। (इस प्रकार यह इन्द्र द्वारा कहा गया दूसरा रसायन है।)

च. चि. १.४/२७

। ॥ २७ ॥

जो समर्थ, नीरोग, बुद्धिमान, संयमी (अपने मन को वश में रखने वाले), अवकाश वाले और साधन-सम्पन्न हैं, उनके लिए कुटी-प्रवेश (की विधि) हितकर है।

च. चि. १.४/२८

। ॥ २८ ॥

परन्तु जो इससे भिन्न (प्रकार के लोग) हैं, उनके लिए सौर्यमारुतिक (सूर्य और वायु वाली) विधि है। उन दोनों में पहली विधि अधिक श्रेष्ठ है, परन्तु वह बहुत कठिन है।

च. चि. १.४/२९

। ॥ २९ ॥

यदि रसायन की विधि (के पालन) में चूक होने से रोग उत्पन्न हो जाएँ, तो रसायन को छोड़कर उन (रोगों) में से हर एक का, उसके अपने अनुरूप, औषध करना चाहिए।

च. चि. १.४/३०

। ॥ ३० ॥

सत्य बोलने वाले, क्रोध न करने वाले, मद्य और मैथुन से दूर रहने वाले, हिंसा न करने वाले, अति परिश्रम न करने वाले, शान्त, (और) प्रिय बोलने वाले

च. चि. १.४/३१

। ॥ ३१ ॥

जप और शौच (पवित्रता) में लगे रहने वाले, धीर, नित्य दान करने वाले, तपस्वी, (और) देवताओं, गायों, ब्राह्मणों, आचार्यों, गुरुओं तथा वृद्धों की पूजा में लगे रहने वाले

च. चि. १.४/३२

। ॥ ३२ ॥

सदा अक्रूरता (दया) में लगे रहने वाले, सदा करुणा का अनुभव करने वाले, जागने और सोने में सम (सन्तुलित), (और) सदा दूध और घी का सेवन करने वाले

च. चि. १.४/३३

।॥ ३३ ॥

देश, काल और प्रमाण (मात्रा) को जानने वाले, युक्ति को जानने वाले, अहंकार-रहित, प्रशस्त आचरण वाले, असंकीर्ण (शुद्ध), (और) अध्यात्म की ओर झुकी इन्द्रियों वाले

च. चि. १.४/३४

। ॥ ३४ ॥

वृद्धों, आस्तिकों और जितात्मा (मन को जीतने वाले) लोगों की सेवा करने वाले, (और) धर्मशास्त्र में लगे रहने वाले (ऐसे) मनुष्य को नित्य रसायन (सेवन करने वाला) जानना चाहिए।

च. चि. १.४/३५

। ॥(।)

जो इन गुणों से युक्त होकर रसायन का प्रयोग करता है, वह (पहले) कहे गए रसायन के सब गुणों (लाभों) को प्राप्त करता है। (इस प्रकार यह आचार रसायन है।)

च. चि. १.४/३६

। ॥ ३६ ॥

शारीरिक और मानसिक दोषों को (उनकी) स्थूलता के अनुसार (बाहर) निकाले बिना, प्राणी रसायन के गुणों से कभी युक्त नहीं होता।

च. चि. १.४/३७

। ॥ ३७ ॥

क्योंकि आयु का उत्कर्ष (बढ़ाना) जिनका प्रयोजन है और जो जरा (बुढ़ापे) तथा रोगों को नष्ट करते हैं, वे (रसायन के) योग उन्हीं के लिए सिद्ध (सफल) होते हैं जो मन और शरीर से शुद्ध हैं और प्रयतात्मा (संयमी) हैं।

च. चि. १.४/३८

। ॥ ३८ ॥

यह सारा का सारा (ज्ञान) हतात्मा (बिगड़े मन वाले) लोगों को, रोग-रहित लोगों को, अद्विजातियों (जो द्विज नहीं हैं, उन) को, और जिनमें शुश्रूषा (सुनने-सीखने की इच्छा) नहीं है, उन्हें भी नहीं बताना चाहिए।

च. चि. १.४/३९

। ॥ ३९ ॥

जो रसायन के संयोग (योग) हैं, और जो वृष्य (वीर्य बढ़ाने वाले) योग माने गए हैं, और विकारों (रोगों) की जो औषध है, वह सब वैद्य के आश्रित है।

च. चि. १.४/४०

। ॥ ४० ॥

इसलिए समझदार व्यक्ति बुद्धिमान् और वेद के पारगामी प्राणाचार्य (प्राणों के आचार्य, यानी वैद्य) की अपनी शक्ति से भी बढ़कर वैसे ही पूजा करे, जैसे देवेन्द्र (इन्द्र) दोनों अश्विनों की (करते हैं)।

च. चि. १.४/४१

। ॥ ४१ ॥

दोनों अश्विन देवताओं के वैद्य और 'यज्ञवाह' (यज्ञ को वहन करने वाले) माने गए हैं; क्योंकि यज्ञ का कटा हुआ सिर उन दोनों के द्वारा फिर से जोड़ा गया था।

च. चि. १.४/४२

। ॥ ४२ ॥

पूषा के टूटकर गिरे हुए दाँत, भग के नष्ट हुए दोनों नेत्र, और वज्री (इन्द्र) की भुजा का स्तम्भ (जकड़ जाना), (इन सबकी) चिकित्सा उन्हीं दोनों ने की थी।

च. चि. १.४/४३

। ॥ ४३ ॥

और राजयक्ष्मा से ग्रस्त शीतांशु (चन्द्रमा) की भी चिकित्सा (उन्हीं ने की थी); सोमाभिपतित (सोम से आक्रान्त) चन्द्रमा उन दोनों के द्वारा फिर से सुखी किया गया।

च. चि. १.४/४४

। ॥ ४४ ॥

भार्गव (भृगु के वंशज) च्यवन, जो कामी (भोग की इच्छा रखने वाले) थे, बूढ़े होकर विकृति (जर्जर अवस्था) को प्राप्त हो गए थे और उनके वर्ण (शरीर की कान्ति) तथा स्वर जाते रहे थे; उन दोनों के द्वारा वे फिर से युवा बना दिए गए।

च. चि. १.४/४५

। ॥ ४५ ॥

इन और दूसरे बहुत से कर्मों के कारण वे दोनों श्रेष्ठ वैद्य इन्द्र आदि महात्माओं के लिए अत्यन्त पूज्य हो गए।

च. चि. १.४/४६

। ॥ ४६ ॥

द्विजातियों द्वारा उन दोनों के लिए ग्रह (सोम-रस के पात्र), स्तोत्र, मन्त्र, तरह-तरह के हवि और धूम्र (धुएँ जैसे रंग वाले) पशु भी निर्धारित किए जाते हैं।

च. चि. १.४/४७

। ॥ ४७ ॥

और प्रातःकाल के सवन (सोम निचोड़ने के अनुष्ठान) में शक्र (इन्द्र) दोनों अश्विनों के साथ सोम का पान करते हैं; और सौत्रामणी (यज्ञ) में भगवान् (इन्द्र) दोनों अश्विनों के साथ आनन्द मनाते हैं।

च. चि. १.४/४८

। ॥ ४८ ॥

इन्द्र और अग्नि, और दोनों अश्विन भी, द्विजों द्वारा प्रायः स्तुति किए जाते हैं; वेद के वाक्यों में (इनकी) स्तुति की जाती है, दूसरे देवताओं की तो वैसी (स्तुति) नहीं होती।

च. चि. १.४/४९

। ॥ ४९ ॥

(जब) जरा-रहित, अमर और ध्रुव (अविनाशी) विबुधों (देवताओं) द्वारा भी, (उनके) अधिपति सहित, प्रयत (संयमी) होकर, दोनों अश्विन 'ये वैद्य हैं' ऐसा (मानकर) इस प्रकार पूजे जाते हैं,

च. चि. १.४/५०

। ॥ ५० ॥

तो फिर मृत्यु, व्याधि (रोग) और जरा (बुढ़ापे) के वश में रहने वाले, अधिकतर दुःख से घिरे और सुख चाहने वाले मर्त्यों (मनुष्यों) द्वारा वैद्य अपनी शक्ति से भी बढ़कर (पूज्य) क्यों न हों?

च. चि. १.४/५१

। पूज्यः ॥ ५१ ॥

शीलवान्, मतिमान् (बुद्धिमान्), युक्त (अपने कर्म में तत्पर), द्विजाति और शास्त्र का पारगामी (वैद्य) प्राणियों द्वारा गुरु के समान पूज्य है; क्योंकि वह प्राणाचार्य माना गया है।

च. चि. १.४/५२

। ॥ ५२ ॥

विद्या पूरी होने पर वैद्य का दूसरा जन्म कहा जाता है; क्योंकि (तभी वह) 'वैद्य' नाम पाता है, पहले जन्म से (कोई) वैद्य नहीं होता।

च. चि. १.४/५३

। ॥‘ , , ; ।

विद्या पूरी होने पर ज्ञान के कारण (वैद्य में) ब्राह्म अथवा आर्ष सत्त्व निश्चय ही प्रवेश करता है; इसलिए वैद्य द्विज (दो बार जन्मा) माना गया है। 'पहला जन्म माता के गर्भ से जन्म है, दूसरा जन्म उपनयन से, और तीसरा वैद्य की विद्या पूरी होने पर; इसलिए शास्त्र में पारंगत वैद्य विद्या की समाप्ति रूपी तीसरे जन्म के कारण त्रिज (तीन बार जन्मा) कहलाता है', ऐसा योगीन्द्रनाथ सेन (कहते हैं)।

च. चि. १.४/५४

। ॥ ५४ ॥

अनित्वर (टिकाऊ, लम्बी) आयु चाहने वाला कोई भी समझदार व्यक्ति प्राणाचार्य का न तो बुरा सोचे, न उसे कटु वचन कहे, और न उसका अहित करे।

च. चि. १.४/५५

। ॥‘ ।

परन्तु जो मनुष्य चिकित्सा पा लेने पर, (पहले) वचन देकर या वचन दिए बिना, वैद्य को (बदले में कुछ) नहीं देता, उसकी यहाँ (इस लोक में) निष्कृति (छुटकारा) नहीं है। 'जो मनुष्य वैद्य द्वारा चिकित्सा किए जाने पर रोग से मुक्त होकर, वैद्य को वचन देकर, यानी प्रतिज्ञा करके, या वचन दिए बिना, (उसे) नहीं देता, यानी धन आदि नहीं देता, उसकी इस लोक में और परलोक में भी निष्कृति, यानी निस्तार (छुटकारा), नहीं है', ऐसा योगीन्द्रनाथ सेन (कहते हैं)।

च. चि. १.४/५६

। ॥ ५६ ॥

वैद्य को भी, सर्वोत्तम धर्म की इच्छा रखते हुए, यत्नपूर्वक सभी रोगियों की, अपने पुत्रों की तरह, पीड़ाओं से निश्चय ही रक्षा करनी चाहिए।

च. चि. १.४/५७

। ॥ ५७ ॥

धर्म में लगे रहने वाले और अक्षर (अविनाशी) स्थान की इच्छा रखने वाले महर्षियों ने आयुर्वेद को धर्म के लिए, और अर्थ तथा काम के लिए (भी), प्रकाशित किया।

च. चि. १.४/५८

। ॥ ५८ ॥

जो न तो अर्थ (धन) के लिए, और न ही काम (भोग की इच्छा) के लिए, बल्कि प्राणियों पर दया के लिए चिकित्सा में लगा रहता है, वह सबको पार कर जाता है (सबसे बढ़कर होता है)।

च. चि. १.४/५९

। ॥ ५९ ॥

परन्तु जो जीविका के लिए चिकित्सा को पण्य (बिकाऊ माल) बनाकर उसका विक्रय करते हैं, वे सोने का ढेर छोड़कर धूल के ढेर की उपासना करते हैं।

च. चि. १.४/६०

। ॥ ६० ॥

भयंकर रोगों द्वारा वैवस्वत (यम) के घर की ओर खींचे जा रहे (लोगों) को, वैवस्वत (यम) के पाशों को काटकर, जो जीवन देता है

च. चि. १.४/६१

। ॥ ६१ ॥

उसके समान धर्म और अर्थ का दाता यहाँ (इस लोक में) नहीं मिलता, क्योंकि जीवन-दान से बढ़कर निश्चय ही कोई दूसरा दान नहीं है।

च. चि. १.४/६२

। ॥ ६२ ॥

प्राणियों पर दया परम धर्म है, ऐसा मानकर जो चिकित्सा (का कार्य) करता है, वह सिद्धार्थ (सफल-मनोरथ) होकर अत्यन्त सुख पाता है।

च. चि. १.४/६३

- । ॥ ६३ ॥

इस विषय में (ये) दो श्लोक (हैं): आयुर्वेद का समुत्थान (उद्भव), दिव्य ओषधियों की शुभ विधि, (और) गुणों में अमृत से थोड़ा ही अन्तर रखने वाला (लगभग अमृत जैसा) सिद्ध रत्न-रसायन

च. चि. १.४/६४

। ॥ ६४ ॥

जो (कुछ) अमरेश्वर (देवताओं के स्वामी, इन्द्र) ने सिद्ध ब्रह्मचारियों (ऋषियों) से कहा, वह सब आयुर्वेदसमुत्थान (नामक इस पाद) में प्रकाशित किया गया है।

च. चि. १.४

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र (ग्रन्थ) के चिकित्सास्थान में, रसायन अध्याय में, आयुर्वेदसमुत्थानीय नामक चौथा रसायन-पाद (पूरा हुआ)।