भूमिका
आयुर्वेदसमुत्थानीय पाद चरक संहिता के चिकित्सास्थान के पहले अध्याय, रसायन अध्याय, का चौथा और अन्तिम पाद है; यह अध्याय चार पादों (भागों) में बँटा है। रसायन वह चिकित्सा है जिसे चरक संहिता आयु, बल, बुद्धि और यौवन को बनाए रखने और बढ़ाने वाली बताती है। पाद का नाम 'आयुर्वेद का समुत्थान', यानी उद्भव, से पड़ा है: यह उस कथा से आरम्भ होता है जिसमें हिमालय पर गए ऋषियों को इन्द्र जी आयुर्वेद का उपदेश देते हैं, और इसका अन्तिम सार-श्लोक भी कहता है कि इन्द्र जी ने सिद्ध ब्रह्मचारियों से जो कुछ कहा, वह सब इस पाद में प्रकाशित किया गया है। पाद के आरम्भ के अनुसार इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है।
कथा यह है कि एक समय शालीन (घर बनाकर एक स्थान पर रहने वाले) और यायावर (घूमते रहने वाले) ऋषि गाँव में रहते हुए और ग्राम्य ओषधियों का आहार करते हुए मन्द चेष्टा वाले हो गए और बहुत स्वस्थ नहीं रहे, यहाँ तक कि अपने कर्तव्य भी पूरे न कर सके। इसे ग्राम-वास से आया दोष मानकर भृगु, अङ्गिरा, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, अगस्त्य आदि महर्षि अपने पुराने निवास हिमालय पर चले गए, जिसका वर्णन पाद बड़े आदर से करता है। वहाँ इन्द्र जी ने उनका स्वागत किया, ग्राम-वास से होने वाली ग्लानि और स्वर तथा वर्ण के बिगड़ने जैसे कष्ट गिनाए, और कहा कि अब अपने शरीर की देखभाल का और आयुर्वेद के उपदेश का समय है। वे आयुर्वेद की परम्परा बताते हैं: ब्रह्मा जी से प्रजापति जी को, प्रजापति जी से अश्विनीकुमारों को, और अश्विनीकुमारों से स्वयं इन्द्र जी को। लोगों की आयु छोटी और जरा तथा रोगों से भरी है, इसलिए वे ऋषियों से कहते हैं कि वे आयुर्वेद सुनें, उसे धारण करें और लोगों के हित के लिए प्रकाशित करें। ऋषियों ने ऋचाओं से इन्द्र जी की स्तुति की और प्रसन्न होकर उनके वचन का अभिनन्दन किया।
फिर इन्द्र जी ऋषियों को आयुर्वेद रूपी अमृत सौंपते हैं और रसायन के प्रयोग बताते हैं। पहला प्रयोग हिमालय में उगने वाली दिव्य ओषधियों का है, जैसे ऐन्द्री, ब्राह्मी, शतावरी, पुनर्नवा, वचा, मेदा और दूसरी जीवनीय ओषधियाँ; पाद के अनुसार ये दूध के साथ लेने पर छह मास में परम आयु, युवावस्था, आरोग्य, स्वर और वर्ण की सम्पदा, मेधा, स्मृति और उत्तम बल देती हैं। फिर ब्रह्मसुवर्चला, आदित्यपर्णी, सोम आदि नौ और दिव्य ओषधियाँ अपनी पहचान के चिह्नों के साथ आती हैं, और उनके सेवन की एक असाधारण विधि, जिसमें पाद के अनुसार सेवन करने वाला पलाश की लकड़ी की द्रोणी में लेटकर छह मास में फिर से उत्पन्न होता है और देवताओं जैसा हो जाता है। इन ओषधियों का प्रभाव ऋषियों जैसे संयमी लोग ही सह सकते हैं, पर संयमी वानप्रस्थ और गृहस्थ भी इनका सेवन कर सकते हैं। जो इन्हें खोज न सकें या इनका प्रयोग न कर सकें, उनके लिए इन्द्र जी दूसरा रसायन बताते हैं: अनेक वनस्पतियों के रस, दूध, तिल का तेल और घी साथ पकाकर, उसमें आँवले का चूर्ण, मधु, शर्करा, वंशलोचन और पिप्पली मिलाकर यह बनता है, और इसकी मात्रा में सोने, चाँदी, मोती, मूँगे आदि के चूर्ण डाले जाते हैं। पाद इसे सब रोगों को शान्त करने वाला, वृष्य, आयुष्य, और मन, स्मृति, बुद्धि और इन्द्रियों को बल देने वाला कहता है।
इसके बाद पाद बताता है कि रसायन किस विधि से और किस आचरण के साथ लिया जाए। समर्थ, नीरोग, संयमी और साधन-सम्पन्न लोगों के लिए कुटी-प्रवेश की विधि हितकर कही गई है, और दूसरों के लिए सौर्यमारुतिक, यानी धूप और हवा वाली, विधि; पहली अधिक श्रेष्ठ है, पर बहुत कठिन। फिर आचार रसायन आता है: सत्य बोलना, क्रोध न करना, मद्य और मैथुन से दूर रहना, हिंसा न करना, दान, तप, दया, जागने और सोने में सन्तुलन, वृद्धों और आस्तिकों की सेवा, और ऐसे ही दूसरे गुण। पाद के अनुसार ऐसे मनुष्य को 'नित्य रसायन' जानना चाहिए, और इन गुणों के साथ रसायन लेने वाला उसके सब लाभ पाता है। पाद यह भी कहता है कि शरीर और मन के दोषों को निकाले बिना रसायन के गुण नहीं मिलते, कि रसायन के योग मन और शरीर से शुद्ध और संयमी लोगों में ही सफल होते हैं, और कि यह ज्ञान किन लोगों को नहीं बताया जाना चाहिए।
पाद का अन्तिम भाग वैद्य के बारे में है। रसायन, वृष्य योग और रोगों की औषध, सब वैद्य के आश्रित हैं, इसलिए पाद कहता है कि समझदार व्यक्ति वैद्य का, जिसे यहाँ प्राणाचार्य (प्राणों का आचार्य) कहा गया है, वैसे ही आदर करे जैसे इन्द्र जी अश्विनीकुमारों का करते हैं। अश्विनीकुमार देवताओं के वैद्य हैं, और पाद उनकी चिकित्साएँ गिनाता है: यज्ञ का कटा सिर जोड़ना, पूषा जी के दाँत, भग जी के नेत्र और इन्द्र जी की जकड़ी भुजा की चिकित्सा, चन्द्र देव का राजयक्ष्मा दूर करना, और बूढ़े च्यवन ऋषि को फिर से युवा बनाना। पाद का तर्क है कि जब अजर-अमर देवता भी वैद्यों को पूजते हैं, तो मृत्यु, रोग और बुढ़ापे के वश में रहने वाले मनुष्यों के लिए वैद्य और भी पूज्य हैं। विद्या पूरी होने पर वैद्य का दूसरा जन्म माना गया है। पाद के अनुसार जो रोगी ठीक होकर वैद्य को बदले में कुछ नहीं देता, उसकी निष्कृति (छुटकारा) नहीं है, और वैद्य भी सब रोगियों की अपने पुत्रों की तरह रक्षा करे। महर्षियों ने आयुर्वेद को धर्म के लिए, और अर्थ तथा काम के लिए भी, प्रकाशित किया; पर पाद के अनुसार जो वैद्य धन या काम के लिए नहीं, बल्कि प्राणियों पर दया से चिकित्सा करता है, वह सबसे बढ़कर है, और जो चिकित्सा को बेचता है, वह सोने का ढेर छोड़कर धूल के ढेर को अपनाता है। इस पाद से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि यहाँ रसायन केवल ओषधियों का नहीं, आचरण का भी विषय है, और आयुर्वेद के उद्भव की कथा इस उपदेश पर समाप्त होती है कि जीवन-दान से बढ़कर कोई दान नहीं, और प्राणियों पर दया ही परम धर्म है।