॥ १ ॥
अब हम द्विव्रणीयचिकित्सित (दो प्रकार के व्रणों की चिकित्सा वाले अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
अध्याय २५
दो प्रकार के व्रण (घाव) की चिकित्सा
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चरक संहिता के चिकित्सास्थान का यह पच्चीसवाँ अध्याय 'द्विव्रणीयचिकित्सित' है, यानी दो प्रकार के व्रण (घाव) की चिकित्सा। अध्याय की शुरुआत में शिष्य अग्निवेश अपने गुरु आत्रेय से आग्रह करते हैं कि रोगों की सूची में जिन दो व्रणों का उल्लेख पहले हुआ था, उनके लक्षण और चिकित्सा बताएँ। आत्रेय उत्तर देते हैं और अध्याय का नाम इन्हीं दो व्रणों से पड़ा है: एक निज, जो शरीर के अपने दोषों से उत्पन्न होता है, और दूसरा आगन्तुज, जो बाहरी कारण से होता है।
आत्रेय पहले दोनों व्रणों के कारण और लक्षण बताते हैं: आगन्तुज के कारण (मारना, बाँधना, गिरना, दाँत-नाखून के क्षत, विष, अग्नि और शस्त्र) और वात, पित्त तथा कफ से बने निज व्रणों के अलग-अलग लक्षण और उपाय। फिर वे व्रणों की गिनती देते हैं: बीस प्रकार के व्रण, तीन प्रकार की परीक्षा, बारह प्रदुष्ट व्रण, आठ स्थान, आठ गन्ध, चौदह परिस्राव, सोलह उपद्रव और छत्तीस उपक्रम। इसके बाद व्रण के सुखसाध्य, कृच्छ्र और असाध्य होने के लक्षण बताए गए हैं।
अध्याय का बड़ा भाग छत्तीस उपक्रमों के विस्तार का है, और वह क्रम से चलता है। पहले शोधन और सूजन (शोफ) को शान्त करने वाले लेप आते हैं। फिर सूजन के पकने की पहचान, उसे चीरने के उपाय और छह प्रकार के शस्त्रकर्म बताए गए हैं। इसके बाद दबाने, टटोलने (एषण), शुद्ध करने और भरने (रोपण) वाले काढ़ों, लेपों और तेलों का वर्णन है। टूटी हड्डी और हटे हुए जोड़ को पट्टी से बाँधने की रीति, व्रण वाले के लिए हितकर और अहितकर अन्न-पान, अग्निकर्म और धूपन भी इसी क्रम में आते हैं। अन्त में त्वचा का रंग और रोम लौटाने वाले योग बताए गए हैं।
पाठक के लिए ध्यान देने की बातें ये हैं: चरक संहिता व्रण को कारण के आधार पर निज और आगन्तुज में बाँटती है, और दोष के अनुसार उसकी पहचान तथा चिकित्सा अलग मानती है। चिकित्सा का क्रम शोधन से रोपण और फिर वर्ण की वापसी तक चलता है। जिन उपद्रवों की चिकित्सा यहाँ नहीं दी गई, उनके लिए पाठ कहता है कि वह उनके अपने-अपने चिकित्सा-अध्यायों में बताई गई है। अध्याय के अन्त में दो श्लोकों में नौ विषयों का सार दिया गया है, जिसे मुनि आत्रेय ने बुद्धिमान् अग्निवेश से कहा।
तत्र श्लोकौ-द्वौ व्रणौ व्रणभेदाश्च परीक्षा दुष्टिरेव च।स्थानानि गन्धाः स्रावाश्च सोपसर्गाः क्रियाश्च याः॥
श्लोक १२० →इस विषय में दो श्लोक (ये हैं)- दो प्रकार के घाव, घावों के भेद, परीक्षा, दुष्टि, स्थान, गन्ध, स्राव, उपसर्गों (उपद्रवों) सहित (घाव) और जो क्रियाएँ (चिकित्सा-कर्म) हैं
व्रणाधिकारे सप्रश्नमेतन्नवकमुक्तवान्।मुनिर्व्याससमासाभ्यामग्निवेशाय धीमते॥
श्लोक १२१ →व्रण के प्रकरण में प्रश्न सहित इस नौ (विषयों) के समूह को मुनि ने विस्तार और संक्षेप से बुद्धिमान् अग्निवेश को कहा।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।
अर्थ: औषध, उपचार।
चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
अर्थ: कारण।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।
शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।
अर्थ: रोग दूर करने का साधन।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।
अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।
चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।
सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।
चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।
चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।
सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।
चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
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॥ १ ॥
अब हम द्विव्रणीयचिकित्सित (दो प्रकार के व्रणों की चिकित्सा वाले अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
भगवान् आत्रेय ने ऐसा कहा था।
। ॥ ३ ॥
अग्निवेश ने अपने गुरु आत्रेय से, जो पर और अवर के ज्ञाता तथा अभिमान, मद और व्यथा से रहित हैं, उचित समय पर विनयपूर्वक यह कहा।
! । !॥ ४ ॥
हे भगवन्! रोगों के संग्रह में पहले जिन दो व्रणों का उल्लेख किया गया है, हे सुख देने वाले! उन दोनों के लक्षण और चिकित्सा आप कहने योग्य हैं (कृपया कहें)।
। ॥ ५ ॥
इस प्रकार अग्निवेश के वचन सुनकर गुरु ने कहा। जो दो व्रण पहले बताए गए थे, निज और आगन्तुज
! । ॥ ६ ॥
हे सौम्य! उन दोनों के लक्षण और औषध विधिपूर्वक सुनो। निज व्रण शरीर के दोषों से उत्पन्न होता है और आगन्तुज व्रण बाहरी कारण से उत्पन्न होता है।
। ॥ ७ ॥
वध (मारने), बन्धन, ऊँचाई से गिरने, दाढ़, दाँत और नाखून से हुए क्षत (चोट) से, तथा इसी प्रकार विष के स्पर्श, अग्नि और शस्त्र से उत्पन्न व्रण आगन्तुज होते हैं।
। ॥ ८ ॥
वे (आगन्तुज व्रण) मन्त्र, अगद, प्रलेप आदि औषधों से, कारणों से तथा लक्षणों के एक अंश से बताए गए हैं, और निज व्रणों से विपरीत हैं।
। ॥ ९ ॥
निज हेतुओं से युक्त होकर शान्त न होने वाले आगन्तुज व्रणों में दोषों के बल को देखने वाला वैद्य निज व्रणों की औषध के समान चिकित्सा करे।
। ॥ १० ॥
अपने-अपने कारणों से दूषित हुए वात, पित्त और कफ मनुष्यों में बाहर के मार्ग का आश्रय लेकर निज व्रणों को उत्पन्न करते हैं।
। ॥ ११ ॥
वात से उत्पन्न व्रण स्तब्ध (जकड़ा हुआ), छूने में कठोर, कम स्राव वाला और अत्यन्त तीव्र पीड़ा वाला होता है; उसमें तोद (चुभन) और स्फुरण (फड़कन) होता है और वह श्याव (गहरे भूरे रंग का) होता है।
। ॥ १२ ॥
सम्पूरण (भरने वाले उपायों), स्नेहपान, स्निग्ध स्वेद और उपनाहन, ग्रदेहों (सम्भवतः प्रदेह, लेप) और परिषेक के द्वारा वातजन्य व्रण की चिकित्सा करे।
। ॥ १३ ॥
तृष्णा, मोह, ज्वर, स्वेद (क्लेद), दाह, दुष्टि और अवदारण से, तथा दुर्गन्ध और दुर्गन्धयुक्त स्रावों से व्रण को पित्त से उत्पन्न जाने।
। ॥ १४ ॥
शीतल, मधुर और तिक्त (द्रव्यों) से, प्रदेह और परिषेचन से, घी के पान और विरेचन से पित्तजन्य व्रण को शान्त करे।
। ॥ १५ ॥
कफ का व्रण बहुत पिच्छिल (चिपचिपा), भारी, स्निग्ध, स्तिमित (जड़-सा), मन्द पीड़ा वाला, पाण्डु वर्ण का, कम संक्लेद (गीलेपन) वाला और देर लगाने वाला होता है।
। ॥ १६ ॥
कषाय, कटु, रूक्ष और उष्ण (द्रव्यों) से, प्रदेह और परिषेचन से, तथा लङ्घन और पाचन से कफजन्य व्रण को शान्त करे।
। , ॥ १७ ॥
वे दोनों (व्रण) नानात्व (विविधता) के भेद से बीस व्रण कहे गए हैं। उनकी परीक्षा तीन प्रकार की है, और (उनमें) बारह प्रदुष्ट माने गए हैं।
, । ॥ १८ ॥
आठ स्थान, उसी प्रकार आठ गन्ध, चौदह परिस्राव, सोलह उपद्रव और चौबीस दोष
। ॥ १९ ॥
और छत्तीस सिद्ध उपक्रम (चिकित्सा के उपाय) कहे गए हैं। इन सबको, जैसा कहा गया है उसी प्रकार, विभाग करके कहे जाते हुए मुझसे सुनो।
। ॥ २० ॥
कृत्य, उत्कृत्य तथा दुष्ट, अदुष्ट, मर्म में स्थित और (मर्म में स्थित) न (होने वाला), संवृत, दारुण, स्रावी, सविष, विषम स्थान में स्थित
। ॥ २१ ॥
उत्सङ्गी और उत्सन्न। और इनके विपरीत से भी व्रणों को जानना चाहिए। इस प्रकार नानात्व के भेद से बीस व्रण कहे गए हैं।
। ॥ २२ ॥
दर्शन, प्रश्न और स्पर्श से तीन प्रकार की परीक्षा कही गई है। आयु, वर्ण, शरीर और इन्द्रियों की (परीक्षा) देखने से
। ॥ २३ ॥
विद्वान् (वैद्यों) द्वारा (रोगी के) कथन से हेतु, वेदना, सात्म्य, अग्नि और बल की परीक्षा की जानी चाहिए; और स्पर्श से मृदुता और शीतलता, अपने विपरीत (कठोरता और उष्णता) सहित, परीक्षा के योग्य हैं।
। ॥ २४ ॥
श्वेत, धँसे किनारों वाला, बहुत मोटे किनारों वाला, अत्यन्त पीला-भूरा, नीला, श्याव, अत्यधिक फुन्सियों वाला, लाल, काला, अत्यन्त दुर्गन्ध वाला
। ॥ २५ ॥
रोप्य और कुम्भीमुख - इस प्रकार बारह प्रदुष्ट व्रण हैं। दूसरी गणना (कल्पान्तर) से दोष चौबीस बताए गए हैं।
। ॥ २६ ॥
त्वचा, सिरा, मांस, मेद, अस्थि, स्नायु, मर्म और अन्तर (भीतरी भाग) के आश्रय वाले - व्रण के ये आठ स्थान संग्रह (संक्षेप) में बताए गए हैं।
। ॥ २७ ॥
घी, तेल, वसा, मवाद, रक्त, श्याव, अम्ल और पूति (सड़न) जैसी - व्रणों की ये आठ गन्ध व्रण की गन्ध जानने वालों ने बताई हैं।
।॥ २८ ॥
लसीका, जल, मवाद, रक्त, हल्दी के रंग का, अरुण (लाल-भूरा), पिञ्जर (पीला-भूरा), कषाय, नीला, हरा, स्निग्ध, रूक्ष, सफेद और काला
। ॥ २९ ॥
इस प्रकार रूपों से चौदह व्रणस्राव बताए गए हैं। विसर्प, पक्षघात, सिराओं का स्तम्भ, अपतानक
। ॥ ३० ॥
मोह, उन्माद, व्रण की पीड़ा, ज्वर, तृष्णा, हनुग्रह, कास, छर्दि, अतीसार, हिक्का, श्वास और कम्पन
।॥ ३१ ॥
व्रणों के विषय में विचार करने वाले (चिकित्सकों) ने व्रणों के सोलह उपद्रव (जटिलताएँ) बताए हैं - स्नायु के गलने से, सिराओं के गलने से, गहराई से, कृमियों के खाने से,
। ॥ ३२ ॥
हड्डी के टूटने से, शल्य (भीतर घुसी बाहरी वस्तु) के रहने से, विष के साथ होने से, फैलने से, नख या काष्ठ से (व्रण के) फट जाने से, त्वचा और रोमों के अत्यधिक रगड़ खाने से,
। ॥ ३३ ॥
गलत बाँधने से, अधिक स्नेह (चिकनाई) से, औषध के अधिक कर्षण (खींचने या क्षीण करने) से, अजीर्ण से, अधिक खा लेने से, और विरुद्ध तथा असात्म्य (अनुकूल न पड़ने वाले) भोजन से,
। ॥ ३४ ॥
शोक से, क्रोध से, दिन में सोने से, व्यायाम से तथा मैथुन से और देहधारियों के निष्क्रिय रहने से भी व्रण शान्त नहीं होते।
। ॥ ३५ ॥
अधिक स्राव से, दुर्गन्ध से, दोष से और उपद्रवों के साथ होने से बहुत दोषों वाले व्रणों में कृच्छ्रता (कठिनाई से ठीक होना) भी उत्पन्न होती है।
। ॥ ३६ ॥
जो व्रण त्वचा और मांस में उत्पन्न हो, सुखकर (सुगम) स्थान में हो, तरुण (युवा) का हो, उपद्रवों से रहित हो, बुद्धिमान् (रोगी) का हो, नया हो और (उचित) काल में हो, वह व्रण सुखसाध्य (सरलता से ठीक होने वाला) माना गया है।
। ॥ ३७ ॥
(सुखसाध्य के) गुणों में से किसी एक से भी हीन होने पर व्रण कृच्छ्र (कठिनाई से ठीक होने वाला) माना गया है, और सब (गुणों) से हीन व्रण असाध्य तथा निरुपक्रम (जिसका कोई उपचार नहीं) जानना चाहिए।
। ॥ ३८ ॥
व्रणों का शोधन आरम्भ में ही, जो मार्ग निकट हो उसी से करना चाहिए - ऊपर के भागों से, नीचे के भागों से, शस्त्रों से और बस्तियों से भी।
। ॥ ३९ ॥
जिनका शरीर तुरन्त शुद्ध हो गया है, उनके व्रण शान्त हो जाते हैं। अब इसके बाद क्रम से सब उपक्रमों (उपचारों) को सुनो।
। ॥ ४० ॥
शोफ (सूजन) को नष्ट करने वाला (उपक्रम) छह प्रकार का है; और शस्त्रकर्म, अवपीडन, विर्वापण, सन्धान सहित (उपचार), स्वेद, शमन और एषण,
। ॥ ४१ ॥
शोधन करने वाले और रोपण (भरने) वाले दो कषाय, प्रलेपन सहित; उन्हीं गुणों वाले दो तैल; पत्र; दो छादन (ढकने के साधन) और दो बन्धन,
। ॥ ४२ ॥
भोज्य (भोजन), उत्सादन, दो प्रकार का दाह, अवसादन सहित; कठोरता और मृदुता करने वाले दो उपाय; और धूपन तथा आलेपन, ये दो शुभ (हितकारी),
। ॥ ४३ ॥
व्रण पर चूर्ण छिड़कना, वर्ण्य (रंग सुधारने वाला), रोपण (भरने वाला) और लोमरोहण (रोम उगाने वाला) - इस प्रकार व्रणों के छत्तीस उपक्रम बताए गए हैं।
। ॥ ४४ ॥
वैद्य व्रणों के पूर्वरूप, अर्थात् शोफ (सूजन), को आरम्भ में ही जानकर, जिस व्रण का अभी जन्म नहीं हुआ उसकी शान्ति के लिए रक्तावसेचन करे।
। ॥ ४५ ॥
बहुत दोष वालों का शोधन करे, कम दोष वालों का लङ्घन कराए; अथवा वातप्रधान (व्रणों) को पहले कषाय और घृत से जीते।
। ॥ ४६ ॥
व्यग्रोध (बरगद), उदुम्बर (गूलर), अश्वत्थ (पीपल), प्लक्ष (पाकड़) और वेतस की छालों से, घी मिलाकर बनाया गया प्रलेप (लेप) शोफ (सूजन) को शान्त करने में अत्यन्त उत्तम होता है।
। ॥ ४७ ॥
विजया, मधुक, वीरा, बिसग्रन्थि, शतावरी, नीलोत्पल और नागपुष्प का चन्दन सहित प्रदेह (मोटा लेप) होता है।
। ॥ ४८ ॥
सक्तु (भुने जौ का आटा), मधुक और घी का शर्करा सहित प्रदेह होना चाहिए; और शोफ में अविदाही अन्न (भोजन) उत्तम औषध है।
। ॥ ४९ ॥
यदि इस प्रकार उपचार करने पर भी वह शोफ शान्त न हो, तो उपनाहों (पुल्टिसों) से उसके पक जाने पर पाटन (चीरा लगाना) हितकर कहा जाता है।
। ॥ ५० ॥
तेल से, या घी से, या दोनों से बनी सक्तु की पिण्डिका (लोई), सुखोष्ण (सहने योग्य गरम) होने पर, शोफ को पकाने के लिए उपनाह के रूप में प्रशस्त है।
। ॥ ५१ ॥
तिल सहित, अलसी के बीज सहित, दही की खटाई से युक्त, तथा किण्व, कुष्ठ और लवण सहित सक्तु की पिण्डिका उपनाहन (पुल्टिस बाँधने) में उत्तम होती है।
। ॥ ५२ ॥
रुजा (पीड़ा), दाह (जलन), राग (लालिमा) और तोद (चुभन) से शोफ को विदग्ध (पकने की अवस्था वाला) जानना चाहिए; और सम्पक्व (पूरा पका हुआ) शोफ जलबस्ति (पानी की थैली) जैसे स्पर्श वाला, दबाने पर उभरने वाला होता है।
। ॥ ५३ ॥
उमा, गुग्गुलु, सौध (सुधा से सम्बन्धित) दूध, दक्ष और कपोत की विष्ठा, पलाश से बना क्षार, हेमक्षीरी और मुकूलक
।, ॥ ५४ ॥
यह औषध-समूह पके हुए शोथ को फोड़ने वाला कहा गया है; सुकुमार (कोमल) और कृच्छ्र (कठिन) के लिए, परन्तु शस्त्र (शस्त्र-कर्म) सर्वोत्तम कहा जाता है।
। ॥ ५५ ॥
पाटन, व्यधन, छेदन, लेपन, प्रच्छन और सीवन, इस प्रकार वह शस्त्रकर्म छः प्रकार का है।
। ॥ ५६ ॥
नाडीव्रण, पके हुए शोथ, क्षत, गुद और उदर (के रोग), और जो अन्तःशल्य वाले शोफ हैं, तथा जो उनके समान हैं, वे पाट्य (चीरने योग्य) हैं।
। ॥ ५७ ॥
दकोदर (जलोदर), पके हुए गुल्म, और जो-जो रक्त से उत्पन्न हैं, शोणित के रोग तथा विसर्प, पिडका आदि, ये व्यध्य (बेधने योग्य) हैं।
। ॥ ५८ ॥
उद्वृत्त (उलटे किनारे वाले), मोटे किनारों वाले, उत्सन्न (उभरे हुए), कठिन (कड़े) व्रणों को, तथा अर्श आदि और अधिमांस को, छेदन (काटने) से ठीक करना चाहिए।
। ॥ ५९ ॥
बुद्धिमान् (वैद्य) लेख्य (खुरचने योग्य) किलास, कुष्ठ सहित, वात और रक्त से बनी ग्रन्थि और पिडकाएँ, कोठ सहित, और रक्तमण्डल को खुरचे।
। ॥ ६० ॥
कुष्ठों, चोट खाए हुए अंग और शोथों का वैद्य प्रच्छन करे; और कुक्षि, उदर आदि का जो गहरा, चीरा हुआ (घाव) हो, वह सीने योग्य है।
। ॥ ६१ ॥
इस प्रकार मनीषियों (विद्वानों) ने छह प्रकार का शस्त्रकर्म बताया है। जिन व्रणों (घावों) के मुख सूक्ष्म (बहुत छोटे) हैं और जो कोषवान् (भीतर थैली जैसी गुहा वाले) हैं, उन्हें दबाना चाहिए (मवाद आदि निकालने के लिए)।
। ॥ ६२ ॥
कलाय, मसूर, गेहूँ और हरेणु को कल्क (पीसकर लुगदी) बनाकर, स्नेह (घी-तेल) के बिना, व्रण को दबाने के लिए उत्तम कहा जाता है।
। ॥ ६३ ॥
शाल्मली (सेमल) की छाल और बला की जड़, तथा न्यग्रोध (बरगद) के नए पत्ते। न्यग्रोध आदि (वर्ग) बताया गया है, अथवा बला आदि (वर्ग)।
। ॥ ६४ ॥
उसे आलेपन और निर्वपण के रूप में जानना चाहिए, और उन्हीं से सेचन भी (जानना चाहिए); घी से, सौ बार धोए (घी) से, दूध से, या मधुक (मुलेठी) के जल से।
। ॥ ६५ ॥
रक्त और पित्त की प्रधानता वाले व्रणों को अत्यन्त ठंडे (द्रव्य) से शान्त करना चाहिए। लटके हुए व्रणमांस (घाव के मांस) पर मधु और घी का लेप करके,
। ॥ ६६ ॥
वैद्य (उसे) बराबर जोड़े और बन्धनों से (ठीक से) सँभाले। उन्हें समान और भली-भाँति स्थित जानकर फलिनी, लोध्र और कट्फल से,
। ॥ ६७ ॥
समङ्गा और धातकी से युक्त, पिसे हुए (चूर्णों) से अवचूर्णन करे (ऊपर से छिड़के); अथवा शुक्ति के चूर्ण से मिले हुए पञ्चवल्कल के चूर्णों से,
। ॥ ६८ ॥
या धातकी और लोध्र के चूर्णों से; तब वे व्रण भर जाते हैं। टूटी हुई हड्डी और अपने स्थान से हटी हुई सन्धि को फिर बराबर जोड़ दे,
। ॥ ६९ ॥
चतुर (वैद्य) समान दूसरे अङ्ग के साथ (उस) अङ्ग को बराबर करके, स्थिर कवलिका-बन्धों और कुशिकाओं से टिकाए हुए (अङ्ग को),
। ॥ ७० ॥
प्रचुर घी वाले पट्टों से उसे दृढ़ता से और सुख से बाँधे; और जलन न करने वाले, आटे से बने अन्नों से उसकी सेवा (उपचार) करे।
। ॥ ७१ ॥
ग्लानि (थकावट या शिथिलता) उसके लिए हितकर नहीं है, क्योंकि वह सन्धि को अलग करने वाली होती है। विच्युत (अपनी जगह से हटे) और अभिहत (चोट खाए) अङ्गों वाले (व्यक्तियों) के विसर्प आदि उपद्रवों का
। । ॥ ७२ ॥
समय को जानने वाला (वैद्य) समयानुसार, अपने-अपने चिकित्सित (चिकित्सा-वर्णन) के अनुसार उपचार करे। जो व्रण सूखे, बहुत पीड़ा वाले, स्तब्ध (जकड़े हुए) और वात-प्रधान हैं, वे सङ्कर-कल्प से तथा कृशर और पायस से स्वेदन करने योग्य हैं।
। ॥ ७३ ॥
ग्राम्य, बैल, अम्बुज और आनूप (प्राणियों के मांस) से तैयार किए गए वैशवारों से, तथा गर्म उत्कारिकाओं से, व्रण वाला (व्यक्ति) सुखी होता है।
। ॥ ७४ ॥
जो व्रण दाह और वेदना वाले तथा वात-प्रधान हैं, उनके लिए उमा (अलसी) और दूध में बुझाए हुए भुने तिल,
। ॥ ७५ ॥
उसी दूध से पीसकर वैद्य आलेपन करे। बला, गुडूची, मधुक (मुलेठी), पृश्निपर्णी, शतावरी,
। ॥ ७६ ॥
जीवन्ती, शर्करा, दूध, तैल, मछली की वसा और घृत - इन्हें मधूच्छिष्ट (मोम) के साथ भली-भाँति पकाकर बनाई हुई स्नेहशर्करा शूल (पीड़ा) को नष्ट करने वाली है।
। ॥ ७७ ॥
द्विपञ्चमूल (दशमूल) के काढ़े के जल से, अथवा दूध से, या तैल मिले हुए घृत से, थोड़ा गुनगुना करके परिषेचन (सेचन, धार से धोना) करना चाहिए।
। ॥ ७८ ॥
जौ का चूर्ण, मुलेठी (मधुक) और तिल के साथ, घृत में मिलाकर, थोड़ा गुनगुना लेप दाह और शूल की शान्ति के लिए देना चाहिए।
। ॥ ७९ ॥
तिल मिली हुई मूँग की खीर का उपनाह (पुल्टिस) बाँधना चाहिए; यह रुज (पीड़ा) और दाह (जलन) को शान्त करने वाला है। व्रणों में यह विधि हितकर है।
। ॥ ८० ॥
जो व्रण छोटे मुख वाले, बहुत स्राव वाले और कोष (थैली जैसी गुहा) वाले हों, और मर्म में आश्रित न हों, उनके लिए एषण (शलाका से टटोलकर जाँचना) हितकर कहा जाता है।
। ॥ ८१ ॥
एषणी (एषण का साधन) दो प्रकार की जाननी चाहिए - मृदु और कठिन भी: वनस्पतियों के कोमल नालों से (मृदु), अथवा लोहों (धातुओं) की शलाका से (कठिन)।
। ॥ ८२ ॥
गहरे और मांसल स्थान में (स्थित) व्रण को लोहे की शलाका से पाट्य (चीरने या खोलने योग्य) जाने; वैद्य इससे विपरीत (उथले) व्रण को नालों से एष्य (टटोलने योग्य) जाने।
। ॥ ८३ ॥
दुर्गन्ध वाले, विकृत रंग वाले, बहुत स्राव वाले और बहुत पीड़ा वाले व्रणों को अशुद्ध जानकर वैद्य शोधन (शुद्ध करने वाले) उपायों से उनकी चिकित्सा करे।
। ॥ ८४ ॥
त्रिफला, खदिर, दार्वी, व्यग्रोधादि (गण), बला, कुश, तथा नीम और कोलक के पत्ते - इनके कषाय (काढ़े) शोधन करने वाले माने गए हैं।
। ॥ ८५ ॥
नमक सहित तिल का कल्क (पिसा हुआ लेप), दोनों हरिद्रा (हल्दी और दारुहल्दी), त्रिवृत् (निशोथ) और घृत, मधुक (मुलेठी), नीम के पत्ते - यह व्रण को शुद्ध करने वाला प्रलेप है।
। ॥ ८६ ॥
जो व्रण न बहुत लाल हो, न बहुत पीला, न बहुत श्याव (काला-नीला), और न बहुत पीड़ा वाला; न उत्सन्न (उभरा हुआ) हो और न उत्सङ्गी (भीतर गुहा या जेब वाला) - ऐसा शुद्ध व्रण आगे रोपण (भरने) के योग्य है।
। ॥ ८७ ॥
न्यग्रोध (वट), उदुम्बर (गूलर), अश्वत्थ (पीपल), कदम्ब, प्लक्ष, वेतस, करवीर (कनेर), अर्क (आक) और कुटज - इनके कषाय (काढ़े) व्रण को भरने वाले हैं।
। ॥ ८८ ॥
चन्दन, कमल का केसर, दार्वी की छाल, नीलोत्पल, दोनों मेदा, मूर्वा, समङ्गा और यष्टि (मुलेठी) - ये व्रण को भरने वाले हैं।
। ॥ ८९ ॥
प्रपौण्डरीक, जीवन्ती, गोजिह्वा, धातकी और बला - इनका रोपण करने वाला प्रलेप तिल और घृत के साथ व्रण पर देना चाहिए।
। ॥ ९० ॥
कम्पिल्लक, विडङ्ग, वत्सक, त्रिफला, बला, पटोल, पिचुमर्द (नीम), लोध्र, मुस्त और प्रियङ्गुक
। ॥ ९१ ॥
खदिर, धातकी, सर्ज, एला तथा अगुरु और चन्दन को पीसकर तेल सिद्ध करना चाहिए; वह उत्तम व्रणरोपण (घाव भरने वाला) है।
। ॥ ९२ ॥
प्रपौण्डरीक, मधुक, दोनों काकोली और दोनों चन्दन - इन सबको समान मात्रा में लेकर सिद्ध किया हुआ तेल उत्तम व्रणरोपण (घाव भरने वाला) होता है।
। ॥ ९३ ॥
दूर्वा के स्वरस (निचोड़े रस) में सिद्ध किया हुआ तेल, अथवा कम्पिल्लक से (सिद्ध तेल), अथवा दार्वी की छाल के कल्क से (सिद्ध तेल) व्रण को भरने वाला प्रधान (श्रेष्ठ) है।
। ॥ ९४ ॥
जिस विधि से तेल (सिद्ध किया जाता है), उसी विधि से घृत भी सिद्ध करे; घाव में रक्त और पित्त की प्रधानता देखकर वैद्य रोपणीय (भरने योग्य) व्रण का (घृत से उपचार करे)।
। ॥ ९५ ॥
व्रण को ढकने के लिए विद्वान् (वैद्य) कदम्ब, अर्जुन, निम्ब, पाटली और पीपल के तथा अर्क (आक) के पत्तों का निर्देश करे।
। ॥ ९६ ॥
वृक्ष (की छाल) का, अथवा चर्म का, या क्षौम (अलसी या सन के रेशे के वस्त्र) का पट्ट व्रण के लिए हितकर कहा गया है; और व्रणों के लिए बन्ध दो प्रकार का, सव्य और दक्षिण, श्रेष्ठ है।
। ॥ ९७ ॥
व्रण वाला व्यक्ति नमकीन, खट्टे, कड़वे-तीखे (कटु) और गरम, विदाही और भारी अन्न-पान, तथा मैथुन का भी त्याग करे।
। ॥ ९८ ॥
व्रण के अनुसार ऐसा अन्न-पान, जो अति शीत, भारी और चिकना न हो तथा विदाही न हो, व्रण के लिए हितकर है; और दिन में न सोना (भी) हितकर है।
। ॥ ९९ ॥
जो स्तन्य (दूध बढ़ाने वाले), जीवनीय और बृंहणीय (पुष्टिकारक) द्रव्य हैं, उन्हें निम्न (गहरे, धँसे हुए) व्रणों को उत्सादन (उभारने) के लिए प्रयुक्त करे।
। ॥ १०० ॥
भूर्ज की ग्रन्थि, अश्मकासीस और अधोभाग (द्रव्य), तथा गुग्गुलु, उसी प्रकार कलविङ्क (गौरैया) और कपोत (कबूतर) की विष्ठा, व्रण को दबाने (अवसादन) वाले हैं।
। ॥ १०१ ॥
अत्यधिक रक्त बहने में, छिन्न (कटे हुए) और छेदने योग्य (अंगों) में, अधिमांस (बढ़े हुए मांस) में, कफ की ग्रन्थियों में, गण्डों में, वात के स्तम्भ और वात-पीड़ाओं में...
। ॥ १०२ ॥
गूढ (भीतर छिपे) पूय और लसीका वाले (घावों) में, गम्भीर और स्थिर (कड़े) में, और निर्दिष्ट अङ्ग-प्रदेशों में अग्नि का कर्म (अग्निकर्म) प्रशस्त है।
। ॥ १०३ ॥
दाह (दागने) की विशेषताओं का जानकार मधूच्छिष्ट (मोम), तेल, मज्जा, शहद, वसा और घृत से, अथवा तपाए हुए अनेक प्रकार के लोहों (धातुओं) से दागे।
। ॥ १०४ ॥
रूखे और सुकुमार (कोमल) लोगों के, गम्भीर और वात-प्रधान (व्रणों) को स्नेह, मधूच्छिष्ट और लोहों से दागे; इससे भिन्न (दशा में) क्षौद्र (शहद) आदि से।
। ॥ १०५ ॥
बालक, दुर्बल और वृद्ध के, गर्भवती के, रक्तपित्त के रोगियों के, तृष्णा और ज्वर से घिरे हुए के, बलहीन और विषाद करने वालों के...
। ॥ १०६ ॥
स्नायु और मर्म के घावों में, विषयुक्त शल्य वाले घावों में तथा आँख और कुष्ठ के घावों में अग्निकर्म (दाग देकर जलाने की क्रिया) का उपदेश नहीं करना चाहिए।
। ॥ १०७ ॥
रोग, दोष और बल का विचार करने वाला तथा मात्रा, काल और अग्नि का जानकार (वैद्य) शस्त्रकर्म और अग्निकर्म के कार्यों में क्षार का भी प्रयोग करे।
। ॥ १०८ ॥
गन्ध वाले द्रव्यों और सार (सारभूत काष्ठ) द्रव्यों से धूप दिए गए घाव कठोरता को प्राप्त होते हैं, और घी, मज्जा तथा वसा की धूप से घाव शिथिलता (ढीलेपन) को प्राप्त होते हैं।
। ॥ १०९ ॥
घाव में रहने वाली पीड़ा, स्राव, दुर्गन्ध और कृमि, तथा शिथिलता और मृदुता भी धूपन से शान्त होती हैं।
। ॥ ११० ॥
लोध्र, न्यग्रोध की कोंपलें, खदिर, त्रिफला और घृत - इनका प्रलेप घाव की शिथिलता और सुकुमारता को ठीक करने वाला है।
। ॥ १११ ॥
जो घाव पीड़ा वाले, कठोर, जकड़े हुए और स्राव रहित हों, उन पर घी मिले जौ के चूर्णों का बार-बार लेप करे।
। ॥ ११२ ॥
मूँग, षष्टिक और शालि चावलों की खीरों से, अथवा घी सहित जीवनीय (द्रव्यों) से, क्रम के अनुसार उन (घाव वाले रोगियों) को बार-बार तृप्त करे।
। ॥ ११३ ॥
ककुभ, उदुम्बर, अश्वत्थ, लोध्र, जाम्बव और कट्फल की छाल के चूर्णों से चूर्ण किए गए घाव त्वचा को शीघ्र ही पकड़ लेते हैं।
। ॥ ११४ ॥
मनःशिला, एला, मञ्जिष्ठा, लाक्षा और दो रजनी (हल्दी और दारुहल्दी) - घी और शहद सहित यह प्रलेप त्वचा को शुद्ध करने में उत्तम है।
। ॥ ११५ ॥
लोहे का चूर्ण, कासीस और त्रिफला के फूल - इनका लेप नई त्वचा पर तुरन्त ही कालापन कर देता है।
। ॥ ११६ ॥
कालीयक, नत, ताम्र, अस्थि, हेम, कान्ता, रस और उत्तम (द्रव्यों) से बना, गोमय के रस सहित लेप त्वचा को समान वर्ण का करने वाला उत्तम है।
। ॥ ११७ ॥
ध्यामक, अश्वत्थ और निचुल की जड़, गेरू सहित लाक्षा, हेम सहित अमृतासङ्ग और कासीस - ये वर्ण करने वाले (त्वचा का रंग लाने वाले) हैं।
। ॥ ११८ ॥
चौपायों की त्वचा, रोम, खुर, सींग और हड्डी की भस्म से चूर्ण की गई तथा तेल लगी हुई भूमि (घाव का स्थान) फिर से रोम वाली हो जाती है।
। ॥ ११९ ॥
घावों के जो सोलह उपद्रव बताए गए हैं, उनकी चिकित्सा अपने-अपने चिकित्सा (प्रकरण) में बता दी गई है।
- । ॥ १२० ॥
इस विषय में दो श्लोक (ये हैं)- दो प्रकार के घाव, घावों के भेद, परीक्षा, दुष्टि, स्थान, गन्ध, स्राव, उपसर्गों (उपद्रवों) सहित (घाव) और जो क्रियाएँ (चिकित्सा-कर्म) हैं
। ॥ १२१ ॥
व्रण के प्रकरण में प्रश्न सहित इस नौ (विषयों) के समूह को मुनि ने विस्तार और संक्षेप से बुद्धिमान् अग्निवेश को कहा।
॥॥
इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संशोधित और दृढबल द्वारा पूर्ण किए गए तन्त्र के चिकित्सास्थान में द्विव्रणीयचिकित्सित (दो प्रकार के घाव की चिकित्सा) नामक पच्चीसवाँ अध्याय (समाप्त) हुआ। २५।