॥ १ ॥
अब इसके बाद हम ऊरुस्तम्भचिकित्सित (ऊरुस्तम्भ अर्थात् जाँघों की जकड़न की चिकित्सा) अध्याय की व्याख्या करेंगे।
अध्याय २७
ऊरुस्तम्भ (जाँघों की जकड़न) की चिकित्सा
इस पृष्ठ का हिन्दी पाठ AI (Claude) द्वारा तैयार किया गया ड्राफ्ट है। चिह्न वाले अंशों की सम्पादक द्वारा जाँच अभी बाकी है।
यह चरक संहिता के चिकित्सास्थान का सत्ताईसवाँ अध्याय है, ऊरुस्तम्भचिकित्सित, यानी ऊरुस्तम्भ (जाँघों की जकड़न) की चिकित्सा। अध्याय का नाम इसके विषय से ही बना है: ऊरु का अर्थ जाँघ है और स्तम्भ का अर्थ जकड़ जाना। हर अध्याय की तरह यह भगवान् आत्रेय का उपदेश है, और इसे अग्निवेश के प्रश्न पर कहा गया है।
अध्याय अग्निवेश के संशय से खुलता है। वे अपने गुरु से कहते हैं कि वमन आदि पाँच कर्म सब मिलाकर भी और अलग-अलग भी सभी रोगों की औषध बताए गए हैं, तो क्या कोई दोष से उत्पन्न और चिकित्सा से साध्य ऐसा रोग है जिसे शान्त करने में वे समर्थ न हों। उत्तर में भगवान् आत्रेय ऊरुस्तम्भ का नाम लेते हैं, और फिर अग्निवेश के पूछने पर उसके कारण, लक्षण और औषध बताते हैं।
वे पहले कारण गिनाते हैं: स्निग्ध, उष्ण, लघु और शीत पदार्थों का साथ-साथ सेवन, दही, दूध और अनेक प्रकार के मांस, पिष्ट और बिगड़ी हुई मदिरा, दिन में सोना और रात में जागना, उपवास, थकान, भय और वेगों को रोकना। इनसे चिकनाई के कारण कोष्ठ में इकट्ठा हुआ आम, मेद के साथ दोषों को रोककर, दोनों ऊरुओं में पहुँचता है और वहाँ कफ भरे हुए सरोवर के ठहरे जल की तरह स्थिर हो जाता है। इसके बाद पूर्वरूप, लक्षण और यह भेद बताया जाता है कि कौन-सा रूप साध्य है और कौन-सा प्राण लेने वाला।
चिकित्सा का मोड़ यह है कि आत्रेय यहाँ स्नेहन, बस्ति, विरेचन और वमन, इन चारों का निषेध करते हैं, और उसका कारण भी समझाते हैं। उनके अनुसार इसके स्थान में गया दोष आम और मेद से जकड़ा हुआ है, इसलिए वह इन साधनों से सहज नहीं निकलता; वहाँ संशमन, क्षपण और शोषण का मार्ग बताया गया है। आगे रूखे अन्न और कड़वे शाकों, द्रव्यों के अनेक योगों और तेलों का वर्णन है, फिर बाहरी उपचार: उत्सादन, प्रलेप, सेचन, सम्भव व्यायाम और तैरना। अध्याय के अन्त का संग्रह-श्लोक इन्हीं बातों को गिनाता है: हेतु, पूर्वरूप, लक्षण, कर्म की अयोग्यता का कारण और दो प्रकार की औषध।
पाठक के लिए ध्यान देने की बात यह है कि चरक संहिता के अनुसार शोधन के साधन हर रोग में एक-से नहीं चलते; कफ और आम की अधिकता में उपचार का क्रम बदल जाता है। यह भी कि उपचार का उद्देश्य कफ को घटाना है, पर इस तरह कि वात न बढ़े और शरीर, बल और अग्नि की रक्षा होती रहे। अध्याय में आए योग ग्रन्थ का कथन हैं, किसी के लिए चिकित्सा-सलाह नहीं।
तत्र श्लोकः-हेतुः प्राग्रूपलिङ्गानि कर्मायोग्यत्वकारणम्।द्विविधं भेषजं चोक्तमूरुस्तम्भचिकित्सिते॥
श्लोक ६२ →उस विषय में श्लोक (यह है)- ऊरुस्तम्भ की चिकित्सा में हेतु, पूर्वरूप और लक्षण, कर्म की अयोग्यता का कारण, और दो प्रकार की औषध कही गई है।
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।
अर्थ: औषध, उपचार।
चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।
अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।
चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।
सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।
शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।
चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।
शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।
शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।
अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।
चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।
चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
अर्थ: कारण।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।
मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।
॥ १ ॥
अब इसके बाद हम ऊरुस्तम्भचिकित्सित (ऊरुस्तम्भ अर्थात् जाँघों की जकड़न की चिकित्सा) अध्याय की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।
। ॥ ३ ॥
परम ब्राह्मी श्री (ब्रह्म-ज्ञान की शोभा) और श्रेष्ठ तप की शोभा से युक्त, चन्द्रमा और सूर्य से कभी हीन न होने वाले सुमेरु पर्वत के समान (गुरु को)
। ॥ ४ ॥
बुद्धि, धैर्य, स्मृति, विज्ञान, ज्ञान, कीर्ति और क्षमा के आश्रय (उन गुरु) से अग्निवेश ने उचित समय पर अपना संशय पूछा।
। ॥ ५ ॥
हे भगवन्! पाँच कर्म (वमन आदि) सब मिलाकर तथा अलग-अलग भी बताए गए हैं, क्योंकि वे सभी रोगों की ही औषध हैं।
!। ॥ ६ ॥
हे भिषग्वर (वैद्यों में श्रेष्ठ)! क्या कोई दोष से उत्पन्न ऐसा रोग है, जो चिकित्सा से साध्य होते हुए भी ऐसा हो कि उसकी शान्ति करने में वे (पाँच कर्म) समर्थ न हों?
। ॥ ७ ॥
(अग्निवेश के पूछने पर) गुरु ने 'ऊरुस्तम्भ है' ऐसा कहा; फिर उस (अग्निवेश) द्वारा उसके कारण, तथा लक्षण और औषध सहित (चिकित्सा) के बारे में पूछे जाने पर गुरु ने कहा।
।॥ ८ ॥
स्निग्ध, उष्ण, लघु और शीत (गुणों वाले पदार्थों) को पचे हुए तथा न पचे हुए (भोजन की अवस्था में) एक साथ खाने वाले का, तथा द्रव, शुष्क, दही, दूध, ग्राम्य, आनूप और औदक (पशुओं) के मांस के सेवन से
।॥ ९ ॥
पिष्ट (आटे आदि से बने पदार्थ), बिगड़ी हुई मदिरा, दिन में अत्यधिक सोने और रात में अत्यधिक जागने से, तथा लङ्घन (उपवास), मार्ग की थकान, आयास (श्रम), भय और वेगों को रोकने से
। ॥ १० ॥
स्नेह (चिकने पदार्थों के सेवन) से कोष्ठ में संचित हुआ आम (कच्चा, अपक्व अन्नरस), वात आदि (दोषों) को मेद के साथ शीघ्र रोककर, भारीपन के कारण, नीचे की ओर जाने वाली सिरा आदि (मार्गों) से दोनों ऊरुओं में पहुँचता है
। ॥ ११ ॥
सक्थि, जङ्घा और ऊरु को भरता हुआ, मेद के बल से उत्कट (बढ़ा हुआ) दोष (अंग को) ऐसा बना देता है जिसकी गति वश में नहीं रहती और जिसमें सामर्थ्य थोड़ा रह जाता है।
। ॥ १२ ॥
जैसे बड़े और गहरे, भरे हुए सरोवर में जल स्थिर और अक्षुब्ध होकर ठहरा रहता है, वैसे ही ऊरु में गया हुआ कफ (स्थिर और अक्षुब्ध रहता है)।
। ॥ १३ ॥
गौरव (भारीपन), आयास (थकान), सङ्कोच (सिकुड़न), दाह (जलन), रुक् (पीड़ा), सुप्ति (सुन्नता), कम्पन, भेद (टूटने जैसी पीड़ा), स्फुरण (फड़कन) और तोद (चुभन) से युक्त (वह कफ) देह को और प्राणों को नष्ट कर देता है।
। ॥ १४ ॥
मेद सहित कफ, वात और पित्त को दबाकर दोनों ऊरुओं को स्थिरता और शीतलता से जकड़ देता है; इसीलिए वह ऊरुस्तम्भ (कहलाता है)।
। ॥ १५ ॥
पूर्वरूप (रोग के पहले के लक्षण) ये हैं: ध्यान (चिन्तन), निद्रा, अत्यन्त स्तैमित्य (जड़ता), अरोचक (भोजन में अरुचि), ज्वर (बुखार), लोमहर्ष (रोंगटे खड़े होना), छर्दि (वमन), तथा जङ्घा और ऊरु में सदन (शिथिलता)।
। ॥ १६ ॥
वात की शंका करने वाले (वैद्यों) द्वारा अज्ञानवश उसका फिर स्नेहन करने से पैरों में सदन (शिथिलता), सुप्ति (सुन्नता) तथा कठिनाई से (पैर का) उठना होता है।
। ॥ १७ ॥
पिंडली और जाँघ में अत्यन्त शिथिलता और थकावट (ग्लानि) रहती है, निरन्तर बिना जलन की पीड़ा होती है; पैर रखने पर दुखता है, और (रोगी) ठण्डे स्पर्श को नहीं जानता (अनुभव नहीं करता)।
। ॥ १८ ॥
(ऐसा रोगी) खड़े होने में, दबाने में, चलने में और (अंग) हिलाने में असमर्थ होता है; वह अपनी जाँघों और पैरों को टूटा हुआ तथा दूसरे के द्वारा ले जाने योग्य (उठाकर रखे जाने योग्य) मानता है।
। ॥ १९ ॥
जब पुरुष जलन, पीड़ा और चुभन से पीड़ित तथा काँपने वाला हो, तब ऊरुस्तम्भ (उसे) मार डालता है; अन्यथा नए (ऊरुस्तम्भ) का उपचार किया जाए।
। ॥ २० ॥
उस (रोगी) का न स्नेहन करना चाहिए, न बस्ति, न विरेचन और न वमन; जिस कारण से (ऐसा है), उस कारण को सुनो।
। ॥ २१ ॥
स्नेहन और बस्तिकर्म सदा कफ की वृद्धि के लिए होते हैं (कफ को बढ़ाते हैं); और वहाँ स्थित (दोष) को निकालने में विरेचन समर्थ नहीं है।
। ॥ २२ ॥
कफ को, और कफ के स्थान में गए पित्त को वमन से सुखपूर्वक निकाला जा सकता है, तथा आमाशय में स्थित उन दोनों को विरेचन से भी (निकाला जा सकता है)
। ॥ २३ ॥
पक्वाशय में स्थित सभी (दोष) बस्तियों से, जड़ से जीत लिए जाने के कारण, (निकाले जा) सकते हैं; किन्तु आम और मेद के कारण जकड़े हुए, जाँघ और पिंडली में स्थित (दोष) नहीं (निकाले जा सकते)।
। ॥ २४ ॥
क्योंकि वात के स्थान में उसकी शीतलता से और दोनों की जकड़न से वहाँ पहुँचे हुए (दोष) को सहज ही नहीं निकाला जा सकता, जैसे नीची भूमि से जल।
। ॥ २५ ॥
उस (रोगी) का, कफ और आम की अधिकता होने से, वैद्य को सदा युक्ति का ध्यान रखते हुए संशमन, क्षपण (क्षीण करना) तथा शोषण (सुखाना) करना चाहिए।
।॥ २६ ॥
सदा रूखे उपचार के लिए जौ, श्यामाक और कोदो को, बिना नमक वाले तथा जल और तेल से पकाए हुए शाकों के साथ दे
। ॥ २७ ॥
सुनिषण्णक, नीम, अर्क (आक), वेत्र और आरग्वध (अमलतास) के पत्तों से, तथा वायसी और वास्तुक से, अन्य कड़वे (शाकों) से और कुलक आदि से (बने शाकों के साथ)।
। ॥ २८ ॥
क्षार और अरिष्ट के प्रयोग, और हरीतकी का, शहद मिले जल का तथा पिप्पली का (प्रयोग) भी, ऊरुस्तम्भ का नाश करने वाले हैं।
। ॥ २९ ॥
मनुष्य समङ्गा, शाल्मली और बिल्व को शहद के साथ पिए; तथा श्रीवेष्टक, उदीच्य, देवदारु और नत भी।
। ॥ ३० ॥
चन्दन, धातकी, कुष्ठ, तालीस, नलद तथा मुस्त, हरीतकी, लोध्र, पद्मक और तिक्तरोहिणी
। ॥ ३१ ॥
देवदारु, दो हरिद्रा, वचा, कटुकरोहिणी, पिप्पली, पिप्पलीमूल, सरल और देवदारु
। ॥ ३२ ॥
चव्य, चित्रक की जड़ें, देवदारु, हरीतकी, भल्लातक, और जड़ सहित पिप्पली; उन पाँचों को पिए।
। ॥ ३३ ॥
आधे श्लोक में कहे गए, ऊरुग्रह (जाँघों की जकड़न) को दूर करने वाले कल्कों को शहद के साथ - शार्ङ्गेष्टा, मदन (मैनफल), दन्ती, वत्सक का फल और वचा
। ॥ ३४ ॥
मूर्वा, आरग्वध (अमलतास), पाठा, करञ्ज और कुलक (को) बराबर मात्रा में लेकर शहद मिलाकर पिए, अथवा (उनका) चूर्ण पानी में भिगोकर (पिए)
। ॥ ३५ ॥
(वह चूर्ण) शहद के साथ, अथवा दही के मण्ड के साथ भी, ऊरुस्तम्भ का नाश करने वाला है। मूर्वा, अतिविषा, कुष्ठ, चित्रक, कटुरोहिणी
। ॥ ३६ ॥
पहले की तरह गुग्गुलु को मूत्र में रात भर रखा हुआ (लें), अथवा भी; या फिर स्वर्णक्षीरी, अतिविषा, मुस्त, तेजोवती और वचा
। ॥ ३७ ॥
सुराह्व, चित्रक, कुष्ठ, पाठा और कटुकरोहिणी के चूर्ण को शहद के साथ चटाए, अथवा शहद मिलाकर, जल में भिगोकर (दे)।
। ॥ ३८ ॥
फली, व्याघ्रनख और हेम को शहद मिलाकर पिए; अथवा त्रिफला, पिप्पली, मुस्त, चव्य और कटुकरोहिणी
। ॥ ३९ ॥
(इनका) चूर्ण ऊरुस्तम्भ से पीड़ित मनुष्य शहद के साथ चाटे। यदि दोष अपतर्पण (भोजन आदि की कमी) से उत्पन्न हो, तो उसे तृप्त (पुष्ट) करे
।॥ ४० ॥
युक्ति से जाङ्गल (शुष्क देश के पशुओं के) मांस और पुराने शालि चावलों से (तृप्त करे)। यदि रूक्षण (रूखेपन) से वात का प्रकोप हुआ हो, जिसमें पहले नींद का नाश और पीड़ा हो,
। ॥ ४१ ॥
वहाँ वातरोगों को दूर करने वाला स्नेहन और स्वेदन का क्रम करना चाहिए। पीलुपर्णी, पयस्या, रास्ना, गोक्षुरक और वचा
। ॥ ४२ ॥
सरला, अगुरु और पाठा - इनके साथ तेल पकाए। उसमें से एक प्रसृत (हथेली भर), अथवा एक अञ्जलि शहद मिलाकर मनुष्य पिए।
। ॥ ४३ ॥
कुष्ठ, श्रीवेष्टक, उदीच्य, सरल, दारु, केशर, अजगन्धा और अश्वगन्धा - इनके साथ सरसों का तेल पकाए।
।( ॥)
ऊरुस्तम्भ से पीड़ित (रोगी) उस (तेल) को भी शहद मिलाकर उचित मात्रा में पिए। (वह रौक्ष्य (रूखेपन) से मुक्त होता है और उसके बाद ऊरुस्तम्भ से भी मुक्त हो जाता है।)
। ॥ ४५ ॥
सैन्धव (नमक) दो पल, शुण्ठी (सोंठ) पाँच पल, ग्रन्थिक और चित्रक दो-दो (पल), भल्लातक की गुठलियाँ बीस, तथा दो आढक
।॥ ४६ ॥
आरनाल से, तेल का एक प्रस्थ पकाए। इनके साथ (बना तेल) सन्तान देने वाला है, और गृध्रसी, ऊरुग्रह, अर्श की पीड़ा तथा सभी वात-विकारों को दूर करने वाला है।
। ॥।
दो-दो पल पिप्पलीमूल और सोंठ (नागर) से (बनने वाला) अष्टकट्वर (नामक तेल): एक प्रस्थ तेल, उसके बराबर दही के साथ, गृध्रसी और ऊरुग्रह को दूर करने वाला है। यह अष्टकट्वर तेल है।
। ॥ ४८ ॥
इस प्रकार ऊरुस्तम्भ की आभ्यन्तर (भीतरी) औषध बताई गई। अब कफ को घटाने वाली दूसरी, बाह्य (बाहरी) चिकित्सा सुनो।
। ॥ ४९ ॥
वल्मीक (दीमक की बाँबी) की मिट्टी, करञ्ज की जड़, फल और छाल, और फिर ईंटों के चूर्णों से (वैद्य) खूब उत्सादन (उबटन से मलना) करे।
। ॥ ५० ॥
वैद्य अश्वगन्धा की जड़ों से, या अर्क (आक, मदार) की जड़ों से, या पिचुमर्द (नीम) की जड़ों से, अथवा देवदारु की जड़ों से
। ॥ ५१ ॥
वैद्य शहद, सरसों और वल्मीक की मिट्टी मिली (उन जड़ों) से ऊरुस्तम्भ में गाढ़ा उत्सादन और प्रलेपन करे।
।॥ ५२ ॥
बुद्धिमान् (वैद्य) दन्ती, द्रवन्ती, सुरसा और सरसों से भी, तथा तर्कारी, शिग्रु, सुरसा, विश्व (सोंठ), वत्सक और निम्ब से उत्पन्न (पत्र आदि) से
। ॥ ५३ ॥
पत्तों, जड़ों और फलों से पकाया हुआ गरम जल सेचन (सींचना) है। और मूत्र में रखी हुई पिसी सरसों प्रलेपन (लेप) होना चाहिए।
। ॥ ५४ ॥
वत्सक, सुरस, कुष्ठ, गन्ध (सुगन्धित द्रव्य), तुम्बुरु और शिग्रु, हिंस्रा, अर्क की जड़, वल्मीक की मिट्टी, कुठेरक के सहित
।( ॥)
इनसे दही और सैन्धव नमक मिलाकर प्रलेप करना चाहिए। (ऊरुस्तम्भ के नाश के लिए, क्रम को जानने वाले वैद्य द्वारा।)
।॥ ५६ ॥
श्योनाक, खदिर, बिल्व, दोनों बृहती, सरल और असन, शोभाञ्जन, तर्कारी, श्वदंष्ट्रा, सुरस और अर्जक को
। ॥ ५७ ॥
अग्निमन्थ और करञ्ज को भी जल से उबालकर सींचे। अथवा मूत्र में पीसे हुए (इन्हीं) से बना प्रलेप ऊरुस्तम्भ को दूर करने वाला है।
। ॥ ५८ ॥
कफ के क्षय के लिए (रोगी को) उन व्यायामों में लगाए जो किए जा सकें। (समर्थ रोगी को) भूमि, कंकड़ और बालू पर चलवाए।
। ॥ ५९ ॥
ठण्डे जल वाली, कल्याणकारी नदी को बार-बार धारा के विपरीत तैरकर पार करवाए, और निर्मल, ठण्डे, ठहरे हुए जल वाले सरोवर को भी।
। ॥ ६० ॥
इस प्रकार इसका कफ सूख जाने पर ऊरुग्रह शान्ति को प्राप्त होता है। जो (उपाय) कफ को घटाने वाला हो और वात को न बढ़ाए,
। ॥ ६१ ॥
वह सब, ऊरुस्तम्भ की औषध, सदा करना चाहिए। शरीर, बल और अग्नि की रक्षा करने वाले (वैद्य) द्वारा यही चिकित्सा करनी चाहिए।
- । ॥ ६२ ॥
उस विषय में श्लोक (यह है)- ऊरुस्तम्भ की चिकित्सा में हेतु, पूर्वरूप और लक्षण, कर्म की अयोग्यता का कारण, और दो प्रकार की औषध कही गई है।
॥॥
इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संशोधित (प्रतिसंस्कृत) तन्त्र में, जो (भाग) अप्राप्त था और दृढबल द्वारा पूरा किया गया, चिकित्सास्थान में ऊरुस्तम्भचिकित्सित नामक सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ। २७।