भूमिका
रक्तपित्तचिकित्सित चरक संहिता के चिकित्सास्थान का चौथा अध्याय है, और इसका नाम इसके विषय से बना है: रक्तपित्त की चिकित्सा। रक्तपित्त वह रोग है जिसमें बढ़ा हुआ पित्त रक्त को दूषित करता है और रक्त शरीर के द्वारों से बाहर बहने लगता है; पित्त आयुर्वेद के तीन दोषों (वात, पित्त, कफ) में से एक है, जो शरीर में पाचन और गर्मी से जुड़ा है। अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय का है। अग्निवेश अपने गुरु पुनर्वसु को प्रणाम करके कहते हैं कि रक्तपित्त के हेतु (कारण) और लक्षण कहे जा चुके हैं, और विनती करते हैं कि इसके आगे जो कहने योग्य है, वह गुरु बताएँ। गुरु का पहला उत्तर यह है कि रक्तपित्त महान् रोग है, बड़े वेग वाला है और अग्नि की तरह शीघ्र असर करता है, इसलिए हेतु और लक्षण जानने वाला वैद्य इसकी चिकित्सा शीघ्र करे।
फिर गुरु रोग को संक्षेप में समझाते हैं। उष्ण, तीक्ष्ण, खट्टे, चरपरे और नमकीन पदार्थों, धूप की तपन और भोजन से होने वाली जलन से भड़का हुआ पित्त रक्त में पहुँचता है; रक्त उसकी योनि (उत्पत्ति-स्थान) है, इसलिए वहाँ पहुँचकर वह रक्त को दूषित करता हुआ बढ़ता है। रक्त से मिलने, उसे दूषित करने और उसकी गन्ध और रंग अपना लेने के कारण विद्वान इस पित्त को 'रक्तपित्त' कहते हैं। इसका आधार प्लीहा (तिल्ली) और यकृत् (जिगर) हैं, क्योंकि रक्त को बहाने वाले स्रोतों का मूल वही हैं। कफ, वात और पित्त के अनुसार निकलने वाले रक्त के रूप अलग बताए गए हैं: कफ वाला गाढ़ा, फीका, चिकना और लसलसा; वात वाला साँवला-लाल, झागदार, पतला और रूखा; और पित्त वाला काला, गोमूत्र जैसा, कालिख या काजल जैसा। रक्तपित्त की दो गतियाँ हैं: ऊपर की ओर, सिर के सात छिद्रों से, और नीचे की ओर, दो द्वारों से। अध्याय के अनुसार ऊपर जाने वाला साध्य (ठीक होने योग्य) है, नीचे जाने वाला याप्य (केवल सँभाले रखने योग्य), और दोनों मार्गों से निकलने वाला असाध्य; जब रक्त सभी छिद्रों और रोमकूपों से भी बहने लगे, तो वह गति मृत्यु लाने वाली कही गई है। इसी प्रकार एक दोष वाला रक्तपित्त साध्य, दो दोषों वाला याप्य और तीनों दोषों वाला असाध्य है, और रोगी की दशा, जैसे मन्द अग्नि (पाचन-शक्ति), दुर्बल शरीर, बुढ़ापा या भोजन न करना, भी इस निर्णय में गिनी गई है। ऊपर जाने वाले रक्तपित्त के साथ प्रायः कफ जुड़ा होता है और नीचे जाने वाले के साथ वात।
चिकित्सा का पहला नियम एक चेतावनी है: जिस रोगी का बल और मांस क्षीण न हुआ हो, उसके उभरे हुए रक्तपित्त को आरम्भ में ही स्तम्भन से, यानी बहते रक्त को रोकने वाली चिकित्सा से, न रोका जाए। अध्याय के अनुसार ऐसा करने से गलग्रह, ज्वर, गुल्म, किलास, कुष्ठ, अर्श, भगन्दर और इन्द्रियों के अवरोध जैसे अनेक रोग हो सकते हैं। आरम्भ में, रक्त के मार्ग, साथ जुड़े दोष और रोग के कारण को देखकर, लङ्घन (शरीर को हल्का करने वाली चिकित्सा) या तर्पण (तृप्ति देने वाला आहार) बताया गया है: ऊपर जाने वाले में पहले तर्पण और नीचे जाने वाले में पहले पेया (पतली लपसी)। फिर रोगी के आहार का विस्तार आता है: शालि, षष्टिक और कोरदूष जैसे अन्न; मूँग, मसूर और चने जैसी दालें; परवल, नीम और कचनार के फूल जैसे शाक; कबूतर, खरगोश और हिरन जैसे पशु-पक्षियों के मांस-रस; और कमल के केसर, चन्दन, खस आदि के रस में पकाई गई यवागू और पेया, जो ठण्डी करके मधु और शर्करा के साथ दी जाती हैं। प्यासे रोगी के लिए औषधियों के साथ उबाला हुआ, या उबालकर ठण्डा किया हुआ, जल कहा गया है, और यह भी कि जीवन और आरोग्य चाहने वाले रोगी रक्तपित्त के कारणों का सेवन न करें।
इसके बाद अध्याय दो राहें बताता है। जिस बलवान रोगी का रक्तपित्त भारी पोषक आहार से उठा हो और जिसमें दोष बहुत हों, उसके लिए संशोधन, यानी दोषों को शरीर से बाहर निकालना, कहा गया है, और उसका नियम उल्टे मार्ग का है: ऊपर जाने वाले रक्तपित्त में विरेचन (दस्त कराकर दोष निकालना) और नीचे जाने वाले में वमन (उल्टी कराकर दोष निकालना)। जो रोगी दुर्बल, गर्भवती, वृद्ध या बालक हो, शोक, बोझ या राह चलने से कृश हो गया हो, या वमन और विरेचन के योग्य न हो, उसके लिए संशमन, यानी दोषों को शरीर के भीतर ही शान्त करने वाली चिकित्सा, प्रशस्त कही गई है। संशमन में अध्याय पहले अटरूषक (अडूसा) आदि के काढ़े, मधु के साथ चाटने के योग और ठण्डे पेय गिनाता है। यदि इन कषाय योगों से अग्नि प्रदीप्त हो जाए और कफ जीत लिया जाए, फिर भी रक्तपित्त शान्त न हो, तो अध्याय उसमें वात का होना मानता है, और उसके बाद औषधियों के साथ पकाए दूध के प्रयोग आते हैं, जिनमें बकरी का दूध सबसे उत्तम कहा गया है। फिर वासाघृत और शतावर्यादि घृत जैसे औषधीय घी, कण्ठ में जमे कफ-युक्त रक्त के लिए उत्पल की नाल आदि के क्षार, और नाक से बहते रक्त के लिए नस्य आते हैं। नस्य के साथ एक सावधानी भी दी गई है: दूषित रक्त को उसके दोष निकलने से पहले ही नाक में औषधि डालकर रोक देने पर बिगड़ा हुआ जुकाम, दुर्गन्ध और सूँघने की शक्ति का नाश जैसे विकार हो सकते हैं।
अध्याय का अन्तिम भाग बाहर से और मन से ठण्डक पहुँचाने वाले उपाय गिनाता है: भद्रश्री (चन्दन) आदि द्रव्यों का लेप, परिषेचन, अवगाह (स्नान) और उनसे सिद्ध घी-तेल; धारागृह, ठण्डा भूमिगृह और रमणीय वन; शय्या और आसन पर बिछाने के लिए कमल और केले के पत्ते; चन्दन से लिप्त प्रिय स्त्रियों का स्पर्श; और नदियों, हिमालय की गुफाओं, चन्द्रोदय और कमल-सरोवरों की मन को भाने वाली कथाएँ, जिनके बारे में अध्याय कहता है कि वे भी रक्तपित्त को शान्त करती हैं। अन्त के दो श्लोक पूरे अध्याय के विषयों का संग्रह देते हैं। इस अध्याय से पाठक तीन बातें साथ ले जा सकता है: रक्तपित्त शीघ्र बढ़ने वाला रोग है, फिर भी बलवान रोगी में उसे आरम्भ में ही रोकना हानिकर बताया गया है; रक्त किस मार्ग से निकलता है और उसके साथ कौन-सा दोष जुड़ा है, इसी से चिकित्सा का क्रम तय होता है; और रोगी के बल के अनुसार दोषों को बाहर निकालने या भीतर शान्त करने की राह चुनी जाती है, जिसमें आहार, औषध, रहने का स्थान और मन की बातें, सब ठण्डक देने वाली बताई गई हैं।