॥ १ ॥
अब इसलिए हम ज्वरचिकित्सित (ज्वर की चिकित्सा सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।
अध्याय ३
ज्वर की चिकित्सा
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ज्वरचिकित्सित अध्याय चरक संहिता के चिकित्सास्थान का तीसरा अध्याय है, और इसका विषय इसके नाम में ही है: ज्वर, यानी बुखार, की चिकित्सा। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है, जिन्हें यहाँ उनके दूसरे नाम पुनर्वसु से भी पुकारा गया है। अध्याय इस दृश्य से आरम्भ होता है कि एकान्त में शान्त बैठे पुनर्वसु से उनके शिष्य अग्निवेश हाथ जोड़कर ज्वर के विषय में अपना संदेह पूछते हैं। वे याद दिलाते हैं कि ज्वर शरीर, इन्द्रियों और मन, तीनों को तपाता है, सब रोगों में पहले जन्मा है और रोगों में प्रधान कहा गया है; फिर जगत् के हित के लिए वे प्रश्नों की एक लम्बी सूची रखते हैं: ज्वर की प्रकृति, प्रवृत्ति (संसार में उसकी पहली उत्पत्ति), प्रभाव और कारण, उसका पूर्वरूप, अधिष्ठान, बल-काल और अपना लक्षण, उसके भेदों की आकृति, आम और जीर्ण ज्वर के लक्षण, औषध सहित चिकित्सा का क्रम, ज्वर के छूटने और शान्त होने के चिह्न, ज्वर से छूटे व्यक्ति की रक्षा, ज्वर के लौटने के कारण, और लौटे हुए ज्वर की चिकित्सा। पूरा अध्याय इन्हीं प्रश्नों का क्रम से उत्तर है।
आत्रेय पहले बताते हैं कि ज्वर, विकार, रोग, व्याधि और आतङ्क एक ही अर्थ के नाम हैं, और ज्वर की प्रकृति शरीर और मन के दोष हैं: दोष से रहित देहधारी को ज्वर नहीं पकड़ता। उसकी प्रवृत्ति के लिए अध्याय परिग्रह और रुद्र के कोप का नाम लेता है, और एक कथा कहता है। दूसरे युग में शिव जी ने क्रोध न करने का व्रत लिया था; असुरों ने उनके तप में विघ्न डाला, दक्ष प्रजापति ने समर्थ होते हुए भी उपेक्षा की, और फिर अपने यज्ञ में शिव जी का नियत भाग नहीं रखा। व्रत पूरा होने पर शिव जी ने रौद्र भाव धारण करके ललाट पर नेत्र प्रकट किया, असुरों को जला दिया और अपने क्रोध की अग्नि से एक प्राणी रचा, जिसने दक्ष के यज्ञ का नाश किया। देवताओं और सप्तर्षियों की स्तुति से शिव जी फिर शान्त हुए, और तब उन्होंने उस प्राणी से कहा कि वह संसार में ज्वर बनेगा और जन्म के समय, मृत्यु के समय और अनुचित आचरण के अवसरों पर रहेगा। इसके बाद अध्याय ज्वर का प्रभाव (संताप, अरुचि, प्यास, बदन टूटना और हृदय में व्यथा), उसका पूर्वरूप, उसका अधिष्ठान (मन सहित पूरा शरीर) और उसका अपना लक्षण, शरीर और मन का संताप, बताता है। फिर भेद आते हैं: शारीर और मानस, सौम्य और आग्नेय, अन्तर्वेग और बहिर्वेग, प्राकृत (वसन्त और शरद् में ऋतु के स्वभाव से होने वाला) और वैकृत, साध्य और असाध्य; दोष और काल के बल-अबल से पाँच, संतत, सतत, अन्येद्युष्क, तृतीयक और चतुर्थक; धातुओं के आश्रय से सात; और कारण से आठ।
अध्याय इन भेदों को विस्तार से समझाता है। विषमज्वर बीच में छूटकर फिर क्यों लौटता है, इसके लिए एक उपमा दी गई है: जैसे बीज भूमि में पड़ा रहकर समय आने पर उगता है, वैसे ही दोष धातु में छिपा रहकर अपने समय पर फिर कुपित होता है। रस से शुक्र तक हर धातु में स्थित ज्वर के लक्षण गिनाए गए हैं, और कहा गया है कि रस, रक्त, मांस और मेद का ज्वर साध्य है, अस्थि और मज्जा का कठिनाई से साध्य, और शुक्र में पहुँचा ज्वर ठीक नहीं होता। दो-दो दोषों के मेल से होने वाले ज्वरों के, और तीनों दोषों के मेल, सन्निपात, के तेरह भेदों के लक्षण अलग-अलग दिए गए हैं। आठवाँ, आगन्तु ज्वर, बाहरी कारण से होता है: चोट से, काम, शोक, भय और क्रोध से, भूतों के आवेश से, विष से, और अभिचार तथा शाप से। अध्याय के अनुसार मन और शरीर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं, इसलिए ज्वर पूरा बल तभी पाता है जब दोनों प्रभावित हों, और आगन्तु ज्वर आगे चलकर दोषों से होने वाले निज ज्वरों के लक्षणों से मिल जाते हैं।
चिकित्सा का भाग ज्वर की अवस्थाओं से आरम्भ होता है: आम (कच्चे) ज्वर, पकते हुए ज्वर और निराम ज्वर के लक्षण। अध्याय के अनुसार नए ज्वर में दिन में सोना, स्नान, अभ्यङ्ग, अन्न, मैथुन, क्रोध, तेज हवा, व्यायाम और कसैले द्रव्य त्यागे जाते हैं, और आरम्भ में लङ्घन ही बताया गया है, सिवाय क्षय, वात, भय, क्रोध, काम, शोक और श्रम से हुए ज्वरों के; पर लङ्घन ऐसा हो जो बल को नष्ट न करे, क्योंकि आरोग्य बल पर टिका है। फिर उपचारों का एक क्रम आता है: दोष के अनुसार गरम जल या तिक्त द्रव्यों से पकाकर ठंडा किया जल, आरम्भ से यवागू और पेया जैसे पतले आहार, जो अग्नि (पाचन-शक्ति) को वैसे ही जगाते हैं जैसे समिधाएँ आग को, छह दिन बाद दोषों को पकाने या शान्त करने वाला कषाय (काढ़ा), दोष पक जाने पर घी, और अवस्था के अनुसार दूध, वमन, विरेचन, निरूह और अनुवासन बस्ति, सिर का विरेचन, और अभ्यङ्ग, लेप, स्नान, धूपन और अञ्जन जैसे बाहरी उपचार। इसके बाद ज्वर के रोगी का अन्न-पान (पुराने चावल, पेया, यूष, शाक और मांसरस) और औषधों की लम्बी सूची आती है: अनेक कषाय, घृत, वमन और विरेचन के योग, दूध के प्रयोग और बस्तियाँ; जलन वाले दाहज्वर के लिए चन्दनाद्य तैल और ठण्डक देने वाले उपाय, और ठण्ड वाले शीतज्वर के लिए अगुर्वाद्य तैल और गरमी देने वाले उपाय। दोषों के पकने की बात एक और उपमा से समझाई गई है: जैसे हवा से बाहर धकेली गई आग बर्तन का भात नहीं पकाती, वैसे ही दोषों द्वारा अपने स्थान से हटाई गई शरीर की ऊष्मा भोजन को ठीक से नहीं पचाती; और अध्याय के अनुसार धातुओं में गए दोष सात दिन में पकते हैं, इसलिए ज्वर प्रायः आठवें दिन निराम होता है।
फिर विशेष स्थितियों की चिकित्सा आती है: वे ज्वर जिनमें लङ्घन हितकर नहीं, पुराना ज्वर, जिसमें बल देने वाला आहार बताया गया है, और विषमज्वर, जिसमें प्रायः किसी बाहरी कारण का अनुबन्ध रहता है। विषमज्वर के लिए प्रधान दोष के अनुसार उपचार और अनेक विशेष योगों के साथ मणि और ओषधि धारण करना, शिव जी और उमा जी, विष्णु जी, ब्रह्मा जी, इन्द्र जी और दूसरे देवताओं की पूजा, माता, पिता और गुरुओं का आदर, ब्रह्मचर्य, तप, सत्य, जप, होम, दान और साधुओं का दर्शन भी गिनाए गए हैं। ज्वर जिस धातु में हो उसके अनुसार, और चोट, काम, शोक, भय और क्रोध से हुए ज्वरों के अलग उपाय हैं: मन के भावों से हुए ज्वर आश्वासन, मनचाही वस्तु, अच्छे वचनों और विरोधी भाव से शान्त होते हैं। अन्त में अध्याय ज्वर के छूटने के समय के लक्षण, ज्वर से मुक्त व्यक्ति की पहचान, और बल लौटने तक व्यायाम, मैथुन, स्नान और अधिक घूमने-फिरने का निषेध बताता है, क्योंकि ठीक से न निकले दोष थोड़ी-सी भूल से भी ज्वर को लौटा देते हैं और लौटा हुआ ज्वर दुर्बल रोगी को जल्दी मार डालता है; इसलिए वह कहता है कि ज्वर समाप्त होने पर भी बचे हुए दोष निकाले या शान्त किए जाएँ। ज्वर को रोगों का राजा कहकर, और यह बताकर कि आत्रेय ने यह उपदेश अग्निवेश के प्रश्नों के क्रम से प्राणियों के हित के लिए दिया, अध्याय समाप्त होता है। इससे साथ ले जाने योग्य बातें ये हैं: चरक संहिता के अनुसार ज्वर दोषों से ही होता है और शरीर तथा मन दोनों को तपाता है; उसकी चिकित्सा एक क्रम से चलती है, जिसमें पहले लङ्घन और हल्का आहार दोषों को पकने देते हैं और साथ-साथ बल की रक्षा होती है; उपचार दोष, धातु, काल, बल और रोगी की अवस्था के अनुसार बदलता है; और ज्वर उतरने के बाद की सावधानी भी उतनी ही आवश्यक है, क्योंकि बचे हुए दोष उसे लौटा देते हैं।
तत्र श्लोकः-यथाक्रमं यथाप्रश्नमुक्तं ज्वरचिकित्सितम्।आत्रेयेणाग्निवेशाय भूतानां हितकाम्यया॥
श्लोक ३४६ →इस विषय में (यह) श्लोक है: प्राणियों के हित की कामना से आत्रेय द्वारा अग्निवेश को क्रम के अनुसार और प्रश्नों के अनुसार ज्वरचिकित्सित (ज्वर की चिकित्सा) कहा गया।
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।
चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।
अर्थ: रोग दूर करने का साधन।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।
चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।
अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।
चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।
व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।
अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।
चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।
सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।
शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।
चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।
अर्थ: कारण।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।
चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।
शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।
अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।
चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।
शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।
अर्थ: औषध, उपचार।
चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।
आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।
अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।
चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।
शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।
चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।
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॥ १ ॥
अब इसलिए हम ज्वरचिकित्सित (ज्वर की चिकित्सा सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।
। ॥ ३ ॥
हाथ जोड़े हुए अग्निवेश ने, एकान्त स्थान में शान्त भाव से बैठे, ज्वर से रहित पुनर्वसु से ज्वर के विषय में (अपना) संदेह पूछा।
। ॥ ४ ॥
शरीर, इन्द्रियों और मन को तपाने वाले, सब रोगों में सबसे पहले जन्मे, बलवान् ज्वर को (आप) भगवान् ने पहले रोगों में प्रधान कहा है।
। ॥ ५ ॥
प्राणियों के शत्रु, और प्रलय (मृत्यु) तथा उदय (जन्म) में निश्चित रूप से रहने वाले उस (ज्वर) की प्रकृति, प्रवृत्ति, प्रभाव और कारण
। ॥ ६ ॥
(उसका) पूर्वरूप, अधिष्ठान, बल, काल और आत्मलक्षण, और विस्तार से तथा प्रकार के भेद से अलग-अलग बँटे हुए (ज्वर) की आकृति
। ॥ ७ ॥
आम (कच्चे) और जीर्ण (पुराने) (ज्वर) का लिङ्ग, औषध सहित उपचार का क्रम, और छोड़ते हुए तथा शान्त हो चुके (ज्वर) के जो अलग-अलग चिह्न (हैं)
। ॥ ८ ॥
और ज्वर से छूटे हुए (व्यक्ति) की जितने समय तक और जिन-जिन (बातों) से रक्षा करनी चाहिए, और शान्त हुआ ज्वर जिन कारणों से फिर लौट आता है
। ! ॥ ९ ॥
और वे क्रियाएँ (उपचार) भी, जो फिर लौटे हुए उस (ज्वर) को शान्त करती हैं: हे भगवन्! जगत् के हित के लिए वह सब (आप) कहने की कृपा करें।
। ! ॥ १० ॥
अग्निवेश का वह वचन सुनकर गुरु ने कहा: हे सौम्य! ज्वर के प्रकरण में जो कहने योग्य है, वह सब सुनो।
। ॥ ११ ॥
ज्वर, विकार, रोग, व्याधि और आतङ्क: एक ही अर्थ अनेक प्रकार के पर्याय-नामों से कहा जाता है।
। ॥ १२ ॥
उस (ज्वर) की प्रकृति शारीरिक और मानसिक दोष बताई गई है, क्योंकि ज्वर दोष से रहित देहधारी को नहीं पकड़ता।
। ॥ १३ ॥
क्षय, तम, ज्वर, पाप्मा और मृत्यु यमात्मक (यम के स्वरूप वाले) कहे गए हैं, क्योंकि (ये) अपने कर्म से क्लेश पाते मनुष्यों के पञ्चत्व (मृत्यु) के कारण हैं।
। ॥ १४ ॥
इस प्रकार इस (ज्वर) की प्रकृति कही गई। इसकी प्रवृत्ति (पहली उत्पत्ति) तो परिग्रह से, और भयंकर रुद्र-कोप से (हुई), जो पहले निदान (स्थान) में बताई गई है।
। ॥ १५ ॥
दूसरे युग में, अक्रोध (क्रोध न करने) का व्रत धारण किए हुए शर्व पर असुरों ने दिव्य हज़ार वर्षों तक आक्रमण किया।
। ॥ १६ ॥
तप में विघ्न डालकर जीने वाले (असुरों) को उन महात्मा के तप में विघ्न डालते देखकर भी, समर्थ होते हुए भी, दक्ष प्रजापति ने उपेक्षा की।
। ॥ १७ ॥
फिर दक्ष प्रजापति ने, देवताओं के कहने पर भी, यज्ञ में महेश्वर का ध्रुव (नियत) भाग नहीं रखा।
। ॥ १८ ॥
पशुपति (शिव) की जो ऋचाएँ हैं, और जो शैव (शिव सम्बन्धी) आहुतियाँ हैं, जो यज्ञ की सिद्धि देने वाली हैं, उनसे रहित ही उस (दक्ष) ने यज्ञ किया।
। ॥ १९ ॥
तब व्रत पूरा कर चुके, आत्मा को जानने वाले देव रुद्र ने, दक्ष का व्यतिक्रम (मर्यादा का उल्लंघन) जानकर, अपने रौद्र भाव को आगे करके
। ॥ २० ॥
ललाट पर नेत्र रचकर, उन असुरों को जलाकर, प्रभु ने क्रोध की अग्नि से तपे हुए, सत्र (यज्ञ) का नाश करने वाले (एक) बालक को रचा।
। ॥ २१ ॥
तब वह यज्ञ नष्ट हो गया, और देवता व्याकुल हो उठे, और जलन तथा पीड़ा से घिरे भूतगण दिशाओं में भटकने लगे।
। ॥ २२ ॥
तब देवगण ने सप्तर्षियों के साथ उन विभु (सर्वव्यापी) ईश्वर की ऋचाओं से तब तक स्तुति की, जब तक शिव शैव (कल्याणकारी) भाव में स्थित न हो गए।
। ॥ २३ ॥
शिव को प्राणियों के कल्याण के लिए (फिर से शान्त भाव में) स्थित जानकर, भय के कारण हाथ जोड़े हुए, भस्म जिसका अस्त्र था, तीन सिरों वाला और नौ आँखों वाला (वह)
। ॥ २४ ॥
ज्वालाओं की मालाओं से घिरे, रौद्र (भयंकर), छोटी पिंडलियों और छोटे पेट वाले उस क्रोध की अग्नि (से बने प्राणी) ने फिर (क्रम से) देव से कहा: मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?
। ॥ २५ ॥
ईश्वर (शिव) ने उस क्रोध से कहा: तुम लोक में ज्वर होगे; जन्म के समय और मृत्यु के समय, और अपचार (अनुचित आचरण) के अवसरों पर भी तुम (रहोगे)।
।, ॥ २६ ॥
संताप (शरीर का तपना), साथ में अरुचि, तृष्णा (प्यास), साथ में अङ्गमर्द (बदन टूटना), और हृदय में व्यथा: यह ज्वर का प्रभाव है; जन्म के समय और मृत्यु के समय (यह) सबसे अधिक होता है।
। ॥ २७ ॥
(इस प्रकार ज्वर की) प्रकृति, प्रवृत्ति और प्रभाव दिखा दिए गए। (उसके) आठ कारण निदान(स्थान) में विभाग करके पहले ही कहे जा चुके हैं।
।॥ २८ ॥
आलस्य, आँसुओं से भरी आँखें, जम्हाई, (शरीर का) भारीपन, क्रम (सम्भवतः क्लम, यानी थकान), और अग्नि, धूप, हवा तथा जल के प्रति अस्थिर इच्छा और अरुचि
। ॥ २९ ॥
अपच और मुँह का स्वाद बिगड़ना, बल और वर्ण (रंगत) की हानि, और शील (स्वभाव) में थोड़ा बदलाव: (यह सब) ज्वर का पहले उत्पन्न होने वाला लक्षण (पूर्वरूप) है।
।, ॥ ३० ॥
मन सहित सम्पूर्ण शरीर ज्वर का अधिष्ठान (आश्रय-स्थान) कहा जाता है; (ज्वर का) बल-काल तो निदान(स्थान) में दिखाया जा चुका है।
। ॥ ३१ ॥
ज्वर का प्रत्यात्मिक (अपना विशेष) लिङ्ग शरीर और मन का संताप है; क्योंकि ज्वर के प्रवेश करने पर ऐसा कोई प्राणी नहीं जो संतप्त न होता हो।
। ॥ ३२ ॥
प्रकार के भेद से ज्वर दो प्रकार का है: शारीर (शरीर का) और मानस (मन का)। फिर (वह) दो प्रकार का और देखा गया है: सौम्य (शीतल स्वभाव वाला) या आग्नेय (उष्ण स्वभाव वाला)।
। ॥ ३३ ॥
फिर (ज्वर) दो प्रकार का कहा जाता है: अन्तर्वेग (भीतरी वेग वाला) और बहिर्वेग (बाहरी वेग वाला); (इसी प्रकार) प्राकृत (स्वाभाविक) और वैकृत (अस्वाभाविक) भी, तथा साध्य और असाध्य भी।
। ॥ ३४ ॥
फिर दोष और काल के बल-अबल (बलवान् या दुर्बल होने) के अनुसार (ज्वर) पाँच प्रकार का देखा गया है: संतत, सतत, अन्येद्युः (अन्येद्युष्क), तृतीयक और चतुर्थक।
। ॥ ३५ ॥
फिर धातुओं के आश्रय के भेद से (ज्वर) सात प्रकार का माना गया है; और कारण के भेद से बाँटा गया ज्वर फिर आठ प्रकार का है।
, ।॥ ३६ ॥
शारीर (ज्वर) पहले देह में उत्पन्न होता है, (और) मानस (ज्वर) मन में। वैचित्त्य (मन का स्थिर न रहना), अरति (कहीं मन न लगना) और ग्लानि (थकान और खिन्नता) मन के ताप के लक्षण हैं।
। ॥ ३७ ॥
और इन्द्रियों का विकार (भी) संताप का लक्षण जानना चाहिए। वात-पित्त स्वभाव वाला (ज्वर) शीत (ठंडक) को, और वात-कफ स्वभाव वाला उष्ण (गर्मी) को
। ॥ ३८ ॥
चाहता है; परन्तु व्यामिश्र (मिले-जुले) लक्षणों वाला ज्वर इन दोनों को (चाहता है)। वायु तो सबसे बढ़कर योगवाह है; संयोग से वह दोनों प्रकार के कार्य करने वाला होता है।
, । ॥ ३९ ॥
तेज (अग्नि तत्त्व) से युक्त होकर (वायु) दाह (जलन) करने वाला होता है, और सोम (शीतल तत्त्व) के आश्रय से शीत करने वाला। अधिक अन्तर्दाह (भीतरी जलन), तृष्णा (प्यास), प्रलाप (बड़बड़ाना), श्वसन (साँस का तेज चलना), भ्रम (चक्कर)
। ॥ ४० ॥
जोड़ों और हड्डियों में शूल (दर्द), पसीना न आना, और दोषों तथा मल का रुक जाना: ज्वर के इन (लक्षणों) को अन्तर्वेग के लिङ्ग समझना चाहिए।
। ॥ ४१ ॥
बाहरी संताप का बहुत अधिक होना, तृष्णा आदि (लक्षणों) की मृदुता (हल्कापन), और सुख से साध्य होना (आसानी से ठीक हो जाना) भी: (ये) बहिर्वेग (ज्वर) के लिङ्ग हैं।
। ॥ ४२ ॥
वसन्त और शरद् (ऋतु) में उत्पन्न होने वाला प्राकृत (ज्वर) तो सुख से साध्य (आसानी से ठीक होने वाला) है। उष्ण पित्त उष्णता से बढ़कर शरद् (ऋतु) में कुपित होता है।
।॥ ४३ ॥
और इसी प्रकार शीत (ऋतु) में संचित हुआ कफ वसन्त में उभर आता (कुपित होता) है। वर्षा (ऋतु) में अम्ल विपाक वाले जल तथा ओषधियों (वनस्पतियों) से
। ॥ ४४ ॥
(इस प्रकार) संचित हुआ पित्त शरद् (ऋतु) में सूर्य के तेज से बढ़कर शीघ्र ज्वर उत्पन्न करता है, और कफ उसका अनुबल (सहायक दोष) होता है।
। ॥ ४५ ॥
विसर्ग (काल) के स्वभाव से ही वहाँ (शरद् के उस ज्वर में) अनशन (उपवास) से भय नहीं होता। और मधुर जलों तथा ओषधियों (वनस्पतियों) से कफ संचित होता है
, । ॥ ४६ ॥
(यह संचय) हेमन्त (ऋतु) में (होता है); सूर्य से तपकर वह (कफ) वसन्त में प्रकुपित होता है। इसलिए वसन्त में श्लेष्मा (कफ) से ज्वर उत्पन्न होता है।
। ॥ ४७ ॥
आदान (काल) के मध्य में (होने के कारण) उस (वसन्त के ज्वर) के भी अनु (पीछे साथ देने वाले) वात और पित्त होते हैं। आदि में, अन्त में और मध्य में दोषों के बल और अबल (दुर्बलता) को जानकर
। ॥ ४८ ॥
विद्वान् (वैद्य) शरद् और वसन्त में ज्वर का प्रतिकार (चिकित्सा) करे। काल (ऋतु) की प्रकृति (स्वभाव) को आधार बनाकर प्राकृत ज्वर बताया गया है।
। ॥ ४९ ॥
अनिल (वात) से उत्पन्न (ज्वर) प्रायः कठिन (कठिनाई से ठीक होने वाला) होता है। अन्य कालों में (होने वाला ज्वर) वैकृत (विकार से उत्पन्न) होता है। उसके विविध हेतु (कारण) निदान (स्थान) में दिखाए गए हैं।
। ॥ ५० ॥
बलवान् और अल्प (थोड़े) दोष वाले (रोगियों) में उपद्रव-रहित ज्वर साध्य (ठीक होने योग्य) है। बहुत से बलवान् हेतुओं (कारणों) से उत्पन्न, बहुत लक्षणों वाला
। ॥ ५१ ॥
ज्वर प्राणों का अन्त करने वाला होता है, और (वह ज्वर भी) जो शीघ्र ही इन्द्रियों का नाश करने वाला है। सात दिन में, या दस दिन में, और वैसे ही बारह दिन में
। ॥ ५२ ॥
प्रलाप, भ्रम और श्वास के साथ (होने वाला) तीक्ष्ण ज्वर मनुष्य को मार सकता है। क्षीण (दुर्बल हो चुके) और शून (सूजन वाले) (रोगी) का गम्भीर और दैर्घरात्रिक (बहुत समय से चलता आ रहा) ज्वर
। ॥ ५३ ॥
असाध्य होता है, और जो बलवान् ज्वर केशों में सीमन्त (माँग जैसी रेखा) बना देता है, (वह भी)। रस को वहन करने वाले स्रोतों (नलिकाओं) से फैले हुए गुरु (भारी) दोष
। ॥ ५४ ॥
पूरे शरीर में व्याप्त और स्तब्ध (जमे हुए) होकर सन्तत (लगातार रहने वाला) ज्वर उत्पन्न करते हैं। दस दिन, बारह दिन या सात दिन (तक) अत्यन्त दुःसह (कठिनाई से सहा जाने वाला)
। ॥ ५५ ॥
वह (ज्वर) शीघ्रकारी (तेज़ी से काम करने वाला) होने के कारण शीघ्र ही प्रशम (शान्ति) को प्राप्त होता है या (रोगी को) मार डालता है। क्योंकि काल, दूष्य और प्रकृति के साथ तुल्य (समान) हुआ दोष सन्तत (ज्वर) को
। ॥ ५६ ॥
निष्प्रत्यनीक (बिना किसी विरोधी शक्ति के) होकर उत्पन्न करता है; इसलिए (उसे) अत्यन्त दुःसह जानना चाहिए। जैसे धातुओं को, वैसे ही मूत्र और पुरीष (मल) को अनिल (वात) आदि (दोष)
। ॥ ५७ ॥
और सन्तत ज्वर में नियम से (अवश्य ही) एक साथ (उनमें) पहुँच जाते हैं। वह (सन्तत ज्वर) रस आदि (धातुओं) की पूरी शुद्धि से या अशुद्धि से
। ॥ ५८ ॥
सात दिन आदि के कालों में शान्त हो जाता है या (रोगी को) मार डालता है। परन्तु जब (वे) बहुत शुद्ध नहीं होते, या पूरी तरह शुद्ध नहीं होते
। ॥ ५९ ॥
ये बारह सन्तत (ज्वर) के आश्रय बताए गए हैं; तब (वह ज्वर) बारहवें दिन अव्यक्त (अस्पष्ट) लक्षणों वाला विसर्ग (ज्वर का छूटना) करके
। ॥ ६० ॥
कठिनाई से शान्त होने वाला (होकर) लम्बे काल तक भी चलता रहता है। ऐसा जानकर वैद्य सन्तत ज्वर का उपक्रम (चिकित्सा) करे
। ॥ ६१ ॥
क्रिया-क्रम (उपचार के क्रम) की विधि में तत्पर रहकर, प्रायः पहले अपतर्पणों (शरीर को हल्का करने वाले उपायों) से। रक्त धातु में आश्रय लिए हुए दोष प्रायः सततक ज्वर को
। ॥ ६२ ॥
सप्रत्यनीक (विरोधी शक्ति के रहते) होकर उत्पन्न करता है, जो काल के अनुसार बढ़ने और घटने के स्वभाव वाला होता है। सततक (ज्वर) एक अहोरात्र (दिन-रात) में दो कालों में चलता है (दो बार आता है)।
। ॥ ६३ ॥
काल, प्रकृति और दूष्य में से किसी एक से ही बल पाकर, मेद (चर्बी) को वहन करने वाली सिराओं को रोककर, दोष अन्येद्युष्क ज्वर को
। ॥ ६४ ॥
सप्रत्यनीक (विरोधी शक्ति के रहते) होकर दिन-रात में एक काल (एक बार) उत्पन्न करता है। अस्थि और मज्जा में पहुँचा हुआ दोष तृतीयक और चतुर्थक (ज्वरों) को उत्पन्न करता है।
। ॥‘ । ,
दोष की दो दिन और एक दिन के अन्तर वाली, और अगले दिन (होने वाली) गति को दूसरों ने अन्य प्रकार से कहा है। (उनके अनुसार दोष) शोणित (रक्त) का आश्रय लेकर भी अन्येद्युष्क ज्वर उत्पन्न कर सकता है। (टिप्पणी:) 'अन्येद्युः, (अर्थात्) अन्येद्युष्क ज्वर में। यह उपलक्षण है, तृतीयक और चतुर्थक (ज्वरों) का भी', ऐसा योगीन्द्रनाथ सेन (कहते हैं)।
। ॥‘ ‘ ।
मांस (धातु) के स्रोतों में पहुँचा हुआ (दोष) तो तृतीयक (ज्वर) उत्पन्न करता है, और मेद के मार्ग का आश्रय लिया हुआ दोष चतुर्थक (ज्वर) को भी। (टिप्पणी:) 'गतिर्द्व्येकान्तरा' से आरम्भ होकर 'दोषश्चापि चतुर्थकम्' पर समाप्त होने वाले पाठ को गङ्गाधर नहीं पढ़ते।
। ॥ ६७ ॥
अन्येद्युष्क (ज्वर) प्रतिदिन (आता है); एक दिन छोड़कर (आने वाला) तृतीयक (है); जो दो दिन विश्राम करके लौट आता है, वह चतुर्थक (है)।
। ॥ ६८ ॥
जैसे बीज भूमि में पड़ा रहता है और (उचित) समय पर उगता है, वैसे ही दोष धातु में पड़ा रहता है और (अपने) समय पर कुपित होता है।
। ॥ ६९ ॥
वह दोष वृद्धि और (अपने) बल का समय पाकर, तथा प्रत्यनीक (विरोधी शक्ति) का बल क्षीण हो जाने से, तृतीयक और चतुर्थक (ज्वर) उत्पन्न करता है।
। ॥ ७० ॥
वेग (ज्वर का दौरा) उत्पन्न करके बल खो चुके मल (दोष) अपने-अपने स्थान में ठहर जाते हैं; (फिर) अपने समय पर पुनः बढ़कर (वे) मनुष्य को ज्वर से पीड़ित करते हैं।
। ॥ ७१ ॥
कफ और पित्त से (होने वाला तृतीयक) त्रिक (कमर के निचले भाग) को जकड़ता है; वात-कफ स्वरूप वाला पीठ से (आरम्भ होता है); वात और पित्त से (होने वाला) सिर को जकड़ता है; (इस प्रकार) तृतीयक तीन प्रकार का होता है।
। ॥ ७२ ॥
चतुर्थक ज्वर दो प्रकार का प्रभाव दिखाता है; श्लैष्मिक (कफ से होने वाला) पहले दोनों जङ्घाओं (पिंडलियों) से (आरम्भ होता है), और अनिल (वात) से उत्पन्न (पहले) सिर से।
। ॥ ७३ ॥
चतुर्थकविपर्यय (चतुर्थक का उलटा रूप) भी एक अन्य विषमज्वर ही है, जिसे तीन प्रकार के धातुओं (सम्भवतः दोषों) में से एक-एक (अकेला ही) दो धातुओं में स्थित होकर उत्पन्न करता है।
। ॥ ७४ ॥
पाँच प्रकार का ज्वर प्रायः सन्निपात (तीनों दोषों के मेल) से (होता) देखा गया है; परन्तु सन्निपात में जो (दोष) अधिक (प्रबल) होता है, वही (उस ज्वर का) दोष कहा गया है।
। ॥ ७५ ॥
ऋतु, दिन-रात और दोषों के, तथा मन के बल-अबल (प्रबल या निर्बल होने) से, और अर्थवश (सम्भवतः विषयों के प्रभाव) से भी, ज्वर उस-उस (अपने विशेष) काल को प्राप्त होता है।
। ॥ ७६ ॥
रस (धातु) में स्थित (ज्वर) में भारीपन, दैन्य (उदासी), उद्वेग (बेचैनी), सदन (अंगों का शिथिल होना), छर्दि (उल्टी) और अरोचक (भोजन में अरुचि), अङ्गमर्द (बदन टूटना) सहित बाहर (शरीर पर) ताप, और जम्भाई (होते हैं)।
। ॥ ७७ ॥
रक्त (धातु) में स्थित (ज्वर) में लाल और गरम पिडकाएँ (फुंसियाँ), तृष्णा (प्यास), बार-बार रक्त सहित थूकना, दाह (जलन), राग (लालिमा), भ्रम (चक्कर), मद (नशे जैसी दशा) और प्रलाप (बड़बड़ाना) (होते हैं)।
। ॥ ७८ ॥
मांस (धातु) में स्थित ज्वर में तृष्णा (प्यास) और मोह (बेसुधी) के साथ भीतरी दाह (जलन), ग्लानि (थकावट) के साथ मल का खुलकर निकलना, दुर्गन्ध और अंगों को इधर-उधर पटकना होता है।
। ॥ ७९ ॥
मेद (धातु) में स्थित (ज्वर) में स्वेद (पसीना), तीव्र प्यास, प्रलाप (बड़बड़ाना), बार-बार वमन (उल्टी), अपनी (देह की) गन्ध को सहन न कर पाना, ग्लानि (थकावट) और अरोचक (भोजन में अरुचि) (होते हैं)।
। ॥ ८० ॥
अस्थि (धातु) में पहुँचे ज्वर में विरेक (दस्त) और वमन (उल्टी) दोनों, अस्थियों के टूटने (जैसी पीड़ा) के साथ कराहना, अंगों को इधर-उधर पटकना, और श्वास (साँस फूलना) (होते हैं)।
। ॥ ८१ ॥
मज्जा (धातु) में पहुँचे (ज्वर) में हिक्का (हिचकी), श्वास (साँस फूलना), कास (खाँसी), (आँखों के आगे) अत्यधिक अन्धकार दिखना, मर्मों में काटने जैसी पीड़ा, बाहर शीतलता और भीतर दाह (जलन) (होते हैं)।
। ॥ ८२ ॥
शुक्र के स्थान में पहुँचा हुआ वह विभु (प्रबल ज्वर) शुक्र का मोक्ष (स्खलन) कराकर और प्राण को नष्ट करके, वायु, अग्नि और सोम के साथ चला जाता है।
। ॥ ८३ ॥
रस और रक्त में आश्रित (ज्वर) साध्य (चिकित्सा से ठीक हो सकने वाला) है, और वह भी जो मेद और मांस में गया है; अस्थि और मज्जा में गया (ज्वर) कृच्छ्र (कठिनाई से ठीक होने वाला) है; शुक्र में स्थित (ज्वर) ठीक होता ही नहीं।
। ॥ ८४ ॥
आठ प्रकार का ज्वर (अपने) हेतुओं (कारणों) और लक्षणों के साथ पहले कहा जा चुका है; संक्षेप में बताए गए (उस ज्वर) के लक्षण (अब) विस्तार से सुनो।
। ॥ ८५ ॥
सिर में पीड़ा, पर्वों (जोड़ों) में टूटन, दाह (जलन), रोमों का खड़ा होना, कण्ठ और मुख का सूखना, वमथु (उल्टी), तृष्णा (प्यास), मूर्च्छा, भ्रम (चक्कर), अरुचि
। ॥ ८६ ॥
नींद का नाश, अत्यधिक बोलना और जम्भाई, (ये) वातपित्त ज्वर की आकृति (लक्षण) हैं। शीतक (ठण्ड लगना), गौरव (भारीपन), तन्द्रा (ऊँघ), स्तैमित्य (शरीर का जड़ और जकड़ा-सा रहना) और पर्वों (जोड़ों) में पीड़ा
। ॥ ८७ ॥
सिर का जकड़ना, प्रतिश्याय (जुकाम), कास (खाँसी), स्वेद (पसीने) का न निकलना, सन्ताप (शरीर का तपना) और मध्यम वेग, (ये) वातश्लेष्म (वात-कफ) ज्वर की आकृति (लक्षण) हैं।
। ॥ ८८ ॥
बार-बार दाह (जलन), बार-बार शीत (ठण्ड), बार-बार स्वेद (पसीना) और (उसका) स्तम्भ (रुकना), मोह (बेसुधी), कास (खाँसी), अरुचि, तृष्णा (प्यास), श्लेष्मा (कफ) और पित्त का (बाहर) निकलना
। ॥ ८९ ॥
मुँह का (मानो कुछ) लिपा हुआ-सा और कड़वा होना, और तन्द्रा - (यह) श्लेष्म-पित्त ज्वर की आकृति (पहचान) है। इस प्रकार ये द्वन्द्वज (दो दोषों से उत्पन्न ज्वर) कहे गए; (अब) सन्निपातज (ज्वर) कहा जाता है।
। ॥ ९० ॥
अब इसके आगे, पहले सूत्र रूप में (संक्षेप में) कहे गए तेरह प्रकार के सन्निपात ज्वर का लक्षण मैं अलग-अलग ही कहूँगा।
। ॥ ९१ ॥
भ्रम (चक्कर), पिपासा (प्यास), दाह (जलन), गौरव (भारीपन) और सिर में अत्यधिक पीड़ा - इन्हें वात और पित्त की प्रबलता वाले तथा मन्द (कम) कफ वाले ज्वर का लिङ्ग (लक्षण) जानना चाहिए।
। ॥ ९२ ॥
शैत्य (ठण्ड लगना), कास (खाँसी), अरुचि, तन्द्रा, पिपासा, दाह, रुक् और व्यथा (पीड़ा) - (जानकार) इन्हें वात और श्लेष्मा की प्रबलता वाले तथा पित्त के कम होने वाले रोग में लिङ्ग जानते हैं।
। ॥ ९३ ॥
छर्दि (उल्टी), शैत्य, बार-बार दाह, तृष्णा (प्यास), मोह (चेतना का धुँधलाना) और अस्थियों में वेदना - (जानकार) मन्द वात वाले तथा पित्त और कफ की प्रबलता वाले (ज्वर) में इसे लिङ्ग निश्चित करते हैं।
। ॥ ९४ ॥
सन्धियों, अस्थियों और सिर में शूल (तेज़ दर्द), प्रलाप (बड़बड़ाना), गौरव, भ्रम, तृष्णा और कण्ठ व मुख का सूखना - (ये) वात की प्रबलता वाले और (शेष) दो (दोषों) के उसके पीछे चलने वाले (ज्वर) में होते हैं।
। ॥ ९५ ॥
मल और मूत्र का रक्त (लाल) होना, दाह, स्वेद (पसीना), तृष्णा, बल का क्षय और मूर्च्छा - ये त्रिदोष (सन्निपात) में पित्त के सबसे प्रबल होने पर लिङ्ग होते हैं।
। ॥ ९६ ॥
आलस्य, अरुचि, हृल्लास (जी मिचलाना), दाह, वमि (उल्टी), अरति (बेचैनी), भ्रम और तन्द्रा व कास (खाँसी) से (वैद्य) कफ की प्रबलता वाला सन्निपात बताए।
। ॥ ९७ ॥
प्रतिश्या (जुकाम), छर्दि (उल्टी), आलस्य, तन्द्रा, अरुचि और अग्नि की मन्दता - (यह) हीन (कम) वात, मध्यम पित्त और अधिक श्लेष्मा वाले (सन्निपात) में लिङ्ग माना गया है।
। ॥ ९८ ॥
मूत्र और नेत्रों का हल्दी जैसा (पीला) होना, दाह, तृष्णा, भ्रम और अरुचि - (यह) हीन वात, मध्यम कफ और अधिक पित्त वाले (सन्निपात) में लिङ्ग माना गया है।
। ॥ ९९ ॥
सिर में पीड़ा, वेपथु (कँपकँपी), श्वास (साँस फूलना), प्रलाप, छर्दि और अरोचक (अरुचि) - (यह) हीन पित्त, मध्यम कफ और अधिक मारुत (वात) वाले (सन्निपात) में लिङ्ग होता है।
। ॥ १०० ॥
शीतक (ठण्ड लगना), गौरव, तन्द्रा, प्रलाप और अस्थियों व सिर में अत्यधिक पीड़ा - (जानकार) इन्हें हीन पित्त, मध्यम वात और अधिक श्लेष्मा वाले (सन्निपात) का लिङ्ग जानते हैं।
। ॥ १०१ ॥
श्वास, कास, प्रतिश्याय (जुकाम), मुख का सूखना और पार्श्वों (बगलों) में अत्यधिक पीड़ा - (यह) हीन कफ, मध्यम पित्त और अधिक वात वाले (सन्निपात) में लिङ्ग माना गया है।
। ॥ १०२ ॥
वर्चोभेद (मल का पतला होकर निकलना), अग्नि की दुर्बलता, तृष्णा, दाह, अरुचि और भ्रम - (जानकार) इन्हें हीन कफ, मध्यम वात और अधिक पित्त वाले (सन्निपात) का लिङ्ग जानते हैं।
। ॥ १०३ ॥
अब इसके आगे मैं सन्निपात ज्वर का लक्षण कहूँगा: क्षण में दाह, क्षण में शीत (ठण्ड), अस्थियों, सन्धियों और सिर में पीड़ा
। ॥ १०४ ॥
दोनों आँखें स्राव (पानी बहने) वाली, मैली, लाल और टेढ़ी (विकृत) भी (हो जाती हैं); दोनों कान आवाज़ (गूँज) और पीड़ा वाले (होते हैं); कण्ठ मानो शूकों (अनाज की बालियों के नुकीले रेशों) से ढका हुआ (लगता है)
। ॥ १०५ ॥
तन्द्रा, मोह, प्रलाप, कास, श्वास, अरुचि और भ्रम; जीभ जली हुई-सी और छूने में खुरदुरी; अंगों का अत्यधिक ढीला पड़ जाना
। ॥ १०६ ॥
कफ से मिले हुए रक्तपित्त (पित्त से दूषित रक्त) का थूकना, सिर का इधर-उधर लुढ़कना, तृष्णा, निद्रा का नाश और हृदय में व्यथा
। ॥ १०७ ॥
स्वेद (पसीना), मूत्र और पुरीष (मल) का देर से और थोड़ा-थोड़ा दिखाई देना (निकलना), अंगों का बहुत अधिक कृश (दुबला) न होना, कण्ठ में लगातार कूजन (घरघराहट)
। ॥ १०८ ॥
श्याव (काले-भूरे) और लाल कोठों (चकत्तों) और मण्डलों (गोल धब्बों) का दिखाई देना, मूकता (बोल न पाना), स्रोतों का पाक (पकना) और उदर का भारीपन
। ॥ १०९ ॥
और दोषों का देर से पकना - (यह) सन्निपात ज्वर की आकृति (पहचान) है। दोष के विबद्ध (बँधकर रुका हुआ) होने पर और अग्नि के नष्ट हो जाने पर, सब लक्षणों से पूर्ण
। ॥ ११० ॥
(ऐसा) सन्निपात ज्वर असाध्य है; इससे अन्यथा (होने पर वह) कृच्छ्रसाध्य (कठिनाई से साध्य) है। निदान (स्थान) में एक-एक दोष से उत्पन्न ज्वरों की जो आकृति (पहचान) तीन प्रकार की कही गई है
। ॥ १११ ॥
उसी (वर्णन) से संसर्ग और सन्निपात (ज्वरों) का अपना लक्षण भी कहा गया है। और जो आठवाँ, आगन्तु (बाहरी कारण से होने वाला ज्वर) है, वह चार प्रकार का बताया गया है।
।॥ ११२ ॥
(वह) अभिघात और अभिषङ्ग से, (तथा) अभिचार और अभिशाप से (होता है)। शस्त्र, लोष्ट (मिट्टी का ढेला), कशा (चाबुक), काष्ठ (लकड़ी), मुष्टि (मुक्का), अरत्नि (कोहनी), तल (हथेली) और द्विज (दाँत) से
। ॥ ११३ ॥
और इसी प्रकार की (अन्य वस्तुओं) से शरीर के आहत होने पर अभिघातज (चोट से उत्पन्न) ज्वर होता है। उस अभिघातज (ज्वर) में वायु प्रायः रक्त को दूषित करता हुआ
। ॥ ११४ ॥
व्यथा, शोफ (सूजन) और वैवर्ण्य (रंग का बदलना) सहित, रुजा (पीड़ा) सहित ज्वर उत्पन्न करता है। काम, शोक, भय और क्रोध से अभिषक्त (ग्रस्त) (व्यक्ति) का जो ज्वर है
।, , ॥ ११५ ॥
वह ज्वर अभिषङ्ग से (उत्पन्न) जानना चाहिए, और जो भूताभिषङ्ग (भूतों के आवेश) से उत्पन्न है (वह भी)। काम, शोक और भय से वायु, क्रोध से पित्त, (और) तीनों मल
। ॥ ११६ ॥
भूताभिषङ्ग (भूतों के आवेश) से (तीनों मल) कुपित होते हैं, (और ज्वर में) भूत-आवेश के सामान्य लक्षण होते हैं। उसके आठ प्रकार के लक्षण भूतों वाले प्रकरण में समझाए गए हैं।
। ॥ ११७ ॥
कुछ (आचार्य) विषवृक्ष (विषैले वृक्ष) की वायु के स्पर्श से, तथा विष से उत्पन्न अन्य (पदार्थों) से अभिषक्त (ग्रस्त) (व्यक्ति) के ज्वर को भी अभिषङ्गज कहते हैं।
। ॥ ११८ ॥
वह मनुष्य विष को नष्ट करने वाली चिकित्सा से ही शान्ति पाता है। सिद्धों के अभिचार और अभिशाप से जो (ज्वर) उत्पन्न होता है
। ॥ ११९ ॥
उसे घोर (भयंकर) और अत्यन्त दुःसह (कठिनता से सहा जाने वाला) सन्निपात ज्वर जानना चाहिए। सन्निपात ज्वर का जो लक्षण कहा गया है, वही उसका (लक्षण) माना गया है।
। ॥ १२० ॥
और (इसमें) चित्त, इन्द्रियों और शरीर की अनेक प्रकार की अन्य पीड़ाएँ (भी होती हैं)। अभिचार के और शाप के भी प्रयोग को देखकर
। ॥ १२१ ॥
(या) स्वयं सुनकर, अनुमान से, अथवा प्रशम (शान्त होने) से (यह ज्वर) पहचाना जाता है। अभिचार और शाप के अनेक प्रकार होने के कारण उस प्रकार के (ज्वर) में
। ॥ १२२ ॥
कर्म (की गई क्रिया) के प्रयोग के अनुसार लक्षण अलग-अलग प्रकार का होता है। कामज्वर में ध्यान (मन ही मन चिन्तन) और निःश्वास (लम्बी साँसों) की अधिकता वाला लक्षण माना गया है।
। ॥ १२३ ॥
शोकज (ज्वर) में आँसुओं की अधिकता वाला, भयज्वर में त्रास (घबराहट) की प्रधानता वाला, क्रोधज (ज्वर) में बहुत संरम्भ (उत्तेजना) वाला, और भूतावेश (भूतों के आवेश) में अमानुष (मनुष्य जैसा नहीं) (लक्षण होता है)।
। ॥ १२४ ॥
विषसम्भव (विष से उत्पन्न ज्वर) में मूर्च्छा, मोह, मद और ग्लानि की प्रधानता वाला (लक्षण होता है)। कुछ (ज्वरों) में संताप (ज्वर का ताप) इन लक्षणों से पहले उत्पन्न होता है।
। ॥ १२५ ॥
पर इन कामज्वर आदि में से कुछ में (संताप) बाद में (या) साथ-साथ (होता है)। काम आदि से उत्पन्न ज्वरों का जो विशेषण (पहचान की विशेषता) बताया गया है
। ॥ १२६ ॥
वही (विशेषण) काम आदि से उत्पन्न अन्य रोगों का भी माना गया है। जब मन पहले काम आदि से आहत होता है, तो (ज्वर) उतना बल नहीं
। ॥ १२७ ॥
ज्वर (उतना बल नहीं) पाता, जब तक देह वात आदि से दूषित नहीं होती। और जब देह पहले वात आदि से आहत (पाठान्तर: अभिद्रुत, यानी आक्रान्त) होती है, तो (ज्वर) उतना बल नहीं
। ॥ १२८ ॥
ज्वर (उतना बल नहीं) पाता, जब तक मन काम आदि से दूषित नहीं होता। वे (आगन्तु ज्वर) पहले केवल (अकेले), (और) बाद में निज (ज्वरों) से मिले-जुले लक्षणों वाले
। ॥ १२९ ॥
और आगन्तु ज्वर हेतु (कारण) और औषध (चिकित्सा) में (निज ज्वरों से) भिन्न होते हैं। संसृष्ट (दो-दो मिले हुए), सन्निपतित (तीनों एक साथ मिले हुए) अथवा अलग-अलग कुपित हुए मल
। ॥ १३० ॥
रस नामक धातु में पहुँचकर, और पक्ति (पाचक अग्नि) को (उसके) स्थान से हटाकर, और अपनी उसी ऊष्मा से देह की ऊष्मा को बलवान बनाकर
। ॥ १३१ ॥
स्रोतों को रोककर, सम्पूर्ण देह में फैले हुए, बढ़े हुए (वे मल) देह में अधिक संताप उत्पन्न करते हैं। तब मनुष्य
। ॥ १३२ ॥
अत्यन्त गरम सब अङ्गों वाला हो जाता है, और इसी कारण ज्वरित (ज्वर से ग्रस्त) कहा जाता है। स्रोतों के पूरी तरह रुक जाने के कारण मनुष्य को स्वेद (पसीना) नहीं आता।
। ॥ १३३ ॥
और अपने स्थान से अग्नि के हट जाने पर, प्रायः तरुण (नए) ज्वर में अरुचि, अविपाक (भोजन का न पचना) और पेट का भारीपन
। ॥ १३४ ॥
हृदय की अविशुद्धि, तन्द्रा और आलस्य भी, न छूटने वाला बलवान् ज्वर, दोषों का प्रवृत्त न होना (बाहर न निकलना)
। ॥ १३५ ॥
लार का बहना, हृल्लास (जी मिचलाना), भूख का नष्ट होना, मुख का विरस (बेस्वाद) होना, अंगों का स्तब्ध (जकड़ा हुआ), सुप्त (सुन्न) और भारी होना, और बहुत मूत्र आना
। ॥ १३६ ॥
मल का पचा हुआ न होना, और ग्लानि का न होना, (ये) आम ज्वर के लक्षण हैं। ज्वर के वेग का अधिक होना, तृष्णा (प्यास), प्रलाप (बड़बड़ाना), श्वसन (तेज साँस) और भ्रम (चक्कर)
। ॥ १३७ ॥
मलों की प्रवृत्ति (बाहर निकलना) और उत्क्लेश, (ये) पच्यमान (पकते हुए) ज्वर के लक्षण हैं। भूख, क्षामता (दुबलापन), अंगों का हल्कापन और ज्वर की मृदुता
। ॥ १३८ ॥
दोषों की प्रवृत्ति (बाहर निकलना) और आठ दिन (का बीत जाना), (ये) निराम ज्वर के लक्षण हैं। नए ज्वर में दिन में सोना, स्नान, अभ्यङ्ग (तेल की मालिश), अन्न और मैथुन
। ॥ १३९ ॥
और क्रोध, प्रवात (तेज हवा), व्यायाम तथा कषायों (कसैले द्रव्यों) को भी त्याग दे। ज्वर में आरम्भ में लङ्घन ही बताया गया है, सिवाय उस ज्वर के
। ॥‘ऽ
जो क्षय (क्षीणता), अनिल (वात), भय, क्रोध, काम, शोक और श्रम से उत्पन्न हुआ हो। लङ्घन से दोष के क्षीण हो जाने पर और अनल (अग्नि) के प्रदीप्त हो जाने पर
। ॥ १४१ ॥
(तब) इसमें ज्वर से मुक्ति, हल्कापन और भूख भी उत्पन्न होती है। और इसे ऐसे लङ्घन से युक्त करे (ऐसा लङ्घन कराए) जो प्राण का विरोधी न हो।
। ॥ १४२ ॥
आरोग्य बल पर आधारित है, जिसके लिए यह क्रिया-क्रम (चिकित्सा का पूरा क्रम) है। लङ्घन, स्वेदन, काल, यवागू (अन्न से बना पतला पेय), तिक्त रस
। ॥ १४३ ॥
और अपक्व दोषों के पाचन (पचाने वाले उपाय), (ये) तरुण ज्वर में (हितकर हैं)। और वात-कफ ज्वर में प्यासे (रोगी) को गरम जल दे।
। ॥ १४४ ॥
और फिर मद्य से उत्पन्न (ज्वर) में और पैत्तिक (ज्वर) में तिक्त द्रव्यों से पकाया हुआ शीतल (जल दे)। क्योंकि वे दोनों दीपन, पाचन और ज्वर को नष्ट करने वाले भी हैं
।॥ १४५ ॥
स्रोतों का शोधन करने वाले, बल देने वाले, रुचि और स्वेद (पसीना) लाने वाले तथा कल्याणकारी हैं। मुस्ता (नागरमोथा), पर्पटक, उशीर (खस), चन्दन, उदीच्य और नागर (सोंठ) से
। ॥ १४६ ॥
पकाकर ठंडा किया हुआ जल प्यास और ज्वर की शान्ति के लिए दे। कफ-प्रधान, उत्क्लिष्ट (उभरे हुए), आमाशय में स्थित दोषों को
। ॥ १४७ ॥
ज्वर उत्पन्न करने वाले जानकर, वमन के योग्य (रोगियों) के (उन दोषों को) उचित समय पर वमनों द्वारा निकाल दे। जिनके दोष (बाहर निकलने को) उपस्थित नहीं हुए, उनको तरुण ज्वर में (कराया गया) वमन
। ॥ १४८ ॥
हृद्रोग, श्वास, आनाह और मोह को बहुत अधिक उत्पन्न कर सकता है। पूरे शरीर में फैले हुए, साम (आम से युक्त), धातुओं में स्थित, सरलता से न निकलने वाले
। ॥ १४९ ॥
दोष कच्चे फलों के स्वरस (अपने रस) की भाँति (निकालने में) संकट वाले होते हैं। वमन कराए गए, लङ्घन कराए गए (रोगी) की उचित समय पर यवागुओं से चिकित्सा करे
। ॥ १५० ॥
जो अपनी-अपनी (उचित) औषधों से सिद्ध हों और जिनमें पहले मण्ड हो, (ऐसी यवागुओं से) विचक्षण (वैद्य) आरम्भ से ही, ज्वर के मृदु होने तक, अथवा छह दिन तक (चिकित्सा करे)।
। ॥ १५१ ॥
उन (यवागुओं) से उसकी अग्नि वैसे ही प्रदीप्त होती है जैसे समिधाओं (ईंधन की लकड़ियों) से पावक (आग)। और वे (यवागुएँ) औषधों के संयोग से और लघुता (हल्केपन) के कारण अग्नि को दीप्त करने वाली हैं
। ॥ १५२ ॥
और वात, मूत्र, पुरीष (मल) तथा दोषों का अनुलोमन करने वाली हैं; द्रव और उष्ण होने से स्वेदन (पसीना लाने) के लिए, और द्रव होने से तृष्णा की शान्ति के लिए (हैं)
। ॥ १५३ ॥
आहार होने से प्राण (जीवन-शक्ति) के लिए, और सर होने से लाघव (हल्केपन) के लिए (हैं), और ज्वर के लिए सात्म्य (अनुकूल) होने से ज्वर को नष्ट करने वाली हैं। इसलिए आरम्भ से ही पेयाओं द्वारा
। ॥ १५४ ॥
बुद्धिमान् (वैद्य) ज्वरों की चिकित्सा करे, मद्य से उत्पन्न (ज्वर) को छोड़कर। मदात्यय में, नित्य मद्य पीने वाले में, ग्रीष्म (ऋतु) में, पित्त और कफ की अधिकता वाले (ज्वर) में
। ॥ १५५ ॥
और ऊर्ध्वग (ऊपर की ओर जाने वाले) रक्तपित्त में, ज्वर में यवागू (अन्न से बना पतला पेय) हितकर नहीं है। वहाँ (इन स्थितियों में) पहले लाजा (खील) के सत्तू से तर्पण ही प्रयोग करना चाहिए
। ॥ १५६ ॥
(वह तर्पण) ज्वर को दूर करने वाले फलों के रसों से युक्त हो, और मधु (शहद) तथा शर्करा (शक्कर) सहित हो। फिर सात्म्य और बल का ध्यान रखने वाला (वैद्य), जिसका तर्पण पच चुका हो, (उस रोगी को) भोजन कराए
। ॥ १५७ ॥
पतले मुद्ग (मूँग) के यूष से, अथवा जाङ्गल (सूखे प्रदेश के) पशु-पक्षियों के मांसरस से। और भोजन के समयों पर इस (रोगी) के लिए दन्तधावन (दाँतों की सफ़ाई) भी करना चाहिए।
। ॥ १५८ ॥
इसके मुख का जो स्वाद हो, उससे विपरीत और (इसे) प्रिय जो (द्रव्य) हो, वह इसके मुख में विशदता (स्वच्छता) और अन्न-पान (भोजन और पेय) की इच्छा
। ॥ १५९ ॥
उत्पन्न करता है; (वह) जो अलग-अलग रसों (स्वादों) को पहचानने की क्षमता उत्पन्न करता है। वृक्षों की टहनियों के अग्रभागों (दातुन) से मुख को शुद्ध करके और (उसे) बार-बार धोकर
। ॥ १६० ॥
मस्तु (दही का पानी), इक्षुरस (गन्ने का रस), मद्य आदि से, जिससे (रोगी) आहार ग्रहण कर सके। वैद्य (उसे) पाचन अथवा शमनीय कषाय (काढ़ा) पिलाए
। ॥ १६१ ॥
ज्वर-पीड़ित को, छह दिन बीत जाने पर, जब उसे हल्का अन्न खिलाया जा चुका हो। (दोष) जकड़ जाते हैं, पकते नहीं और विषमज्वर उत्पन्न करते हैं
। ॥ १६२ ॥
(जब) तरुण (नए) ज्वर में दोष कषाय से, (उसके) स्तम्भी (जकड़ने वाला) होने के कारण, बँध जाते हैं। परन्तु कल्पना (औषध बनाने की विधि) के विचार से कषाय का निषेध नहीं किया जाता।
। ॥ १६३ ॥
जो कषाय (काढ़ा) कषाय (कसैले स्वाद वाला) हो, वह तरुण (नए) ज्वर में त्याग देना चाहिए। खट्टे या बिना खटाई वाले यूषों से, अथवा जाङ्गल (पशु-पक्षियों) के हितकर मांसरसों से
। ॥ १६४ ॥
ज्वर की शान्ति के लिए (रोगी) दस दिन तक हल्का अन्न खाए। इसके बाद, कफ के मन्द होने पर, वात-पित्त की प्रधानता वाले ज्वर में
। ॥ १६५ ॥
दोषों के पूरी तरह पक जाने पर घी पीना अमृत के समान है। दस दिन बीत जाने पर भी, (रोगी को) कफ-प्रधान और अलङ्घित (जिसका लङ्घन न हुआ हो) जानकर
। ॥ १६६ ॥
वैद्य (उसे) घी न पिलाए; कषायों (काढ़ों) से उसकी चिकित्सा करे, जब तक (शरीर में) हल्कापन (न आ जाए), और मांसरस के साथ भोजन दे।
, । ॥ १६७ ॥
क्योंकि बल दोषों को दबाने में समर्थ है, और वह (मांसरस) बल देने वाला है। दाह (जलन) और तृष्णा (प्यास) से घिरे (रोगी) के वात-पित्त-प्रधान ज्वर को
। ॥ १६८ ॥
अथवा बँधे हुए या (अपने स्थान से) छूटे हुए दोषों वाले, निराम (आम से रहित) (ज्वर) को दूध से जीते। जब इन उपचारों से ज्वर शान्त नहीं होता
। ॥ १६९ ॥
(तब) जिसके बल, मांस और अग्नि क्षीण न हुए हों, (उस रोगी के) उस (ज्वर) को विरेचनों से शान्त करे। ज्वर से क्षीण हुए (रोगी) के लिए न वमन हितकर है, न विरेचन।
। ॥ १७० ॥
परन्तु (वैद्य) चाहे तो उसके मलों को दूध से या निरूहों (काढ़े की बस्तियों) से निकाले। निरूह बल, अग्नि, ज्वर से मुक्ति, प्रसन्नता और रुचि
। ॥ १७१ ॥
दोषों के पूरी तरह पक जाने पर प्रयोग किया गया (निरूह) शीघ्र ला देता है। पित्ताशय में स्थित पित्त को या कफ-पित्त को
, । ॥ १७२ ॥
स्रंसन (एक प्रकार का विरेचन) निकालता है; बस्ति पक्वाशय में स्थित तीनों मलों को निकालती है। पुराने ज्वर में, कफ और पित्त के क्षीण हो जाने पर, दृढ़ (प्रबल) अग्नि वाले
। ॥ १७३ ॥
रूखे और बँधे हुए मल वाले (रोगी) को अनुवासन (स्नेह की बस्ति) दे। सिर के भारीपन में, (सिर के) शूल (दर्द) में, और इन्द्रियों के अवरुद्ध होने पर
। ॥ १७४ ॥
जीर्ण (पुराने) ज्वर में रुचि उत्पन्न करने वाला मूर्धविरेचन (सिर का शोधन) करे। और अभ्यङ्ग (तेल आदि की मालिश), प्रदेह (गाढ़े लेप), परिषेक (शरीर पर द्रव डालना) और अवगाहन (द्रव में बैठकर स्नान)
। ॥ १७५ ॥
वैद्य जीर्ण (पुराने) ज्वर में (इन्हें) शीत और उष्ण (रूपों) में बाँटकर करे। उनसे बहिर्मार्ग (बाहरी मार्ग) में स्थित ज्वर शीघ्र शान्त हो जाता है।
। ॥ १७६ ॥
(इनसे) अङ्ग सुख पाते हैं, और बल तथा वर्ण (शरीर की रंगत) बढ़ते हैं। और धूपन (धुआँ देना) तथा अञ्जन (आँखों में औषधि लगाना) के प्रयोगों से जीर्ण (पुराने) ज्वर शान्त हो जाते हैं
। ॥ १७७ ॥
(धूपन और अञ्जन के प्रयोगों से वे जीर्ण ज्वर भी शान्त होते हैं) जो केवल त्वचा तक शेष रह गए हों, और जिनका सम्बन्ध आगन्तु (बाहर से आए कारण) से हो। इस प्रकार ज्वर को नष्ट करने वाला, सिद्ध (परखा हुआ) क्रियाक्रम (चिकित्सा का क्रम) भली-भाँति बता दिया गया।
। ॥ १७८ ॥
यह क्रम जिन (द्रव्यों) का है, उन द्रव्यों को तो अब इसके आगे सुनो। पुराने रक्तशालि आदि (चावल), षष्टिक (साठी चावल) के साथ, प्रशस्त (हितकर) हैं
। ॥ १७९ ॥
ज्वर के रोगियों के लिए यवागू, ओदन (भात) और लाजा (खील) बनाने में; (ये) ज्वर को दूर करने वाले हैं। सुख से पचने वाली, पिप्पली और नागर (सोंठ) से पकाई हुई लाजा की पेया
। ॥ १८० ॥
जिसे भूख लगी हो (पर) जिसकी अग्नि मन्द हो, वह ज्वर-रोगी आरम्भ में ज्वर को हरने वाली (वह पेया) पिए। खट्टे की इच्छा वाला (रोगी) उसी (पेया) को दाडिम (अनार) से खट्टी की हुई और नागर (सोंठ) सहित (पिए)।
। ॥ १८१ ॥
जिसका मल ढीला (खुलकर) निकल रहा हो, या जो पैत्तिक (पित्त की अधिकता वाला) हो, वह तो (उस पेया को) ठंडी और मधु मिलाई हुई पिए। अथवा पार्श्व (पसलियों के बगल), बस्ति (पेड़ू) और सिर में पीड़ा होने पर रक्तशालि (लाल शालि चावल) की पेया
। ॥ १८२ ॥
श्वदंष्ट्रा (गोखरू) और कण्टकारी (कटेरी) से सिद्ध की हुई, ज्वर को हरने वाली (वह पेया) पिए। अथवा ज्वर और अतिसार से पीड़ित मनुष्य (ऐसी) पेया पिए जो खटाई सहित पकाई गई हो
। ॥ १८३ ॥
(वह) पृश्निपर्णी, बला, बिल्व (बेल), नागर (सोंठ), उत्पल और धान्यक (धनिया) से (पकाई गई हो)। विदारीगन्धा आदि (द्रव्यों) से पकाई हुई, दीपन (अग्नि को जगाने वाली) और स्वेदन (पसीना लाने वाली) (यवागू) वह मनुष्य
। ॥ १८४ ॥
जो कास (खाँसी), श्वास (साँस फूलना) और हिक्का (हिचकी) से पीड़ित ज्वर-रोगी हो, (वह यह) यवागू पिए। जिसका मल बँधा हो, (वह ज्वर-रोगी) यव (जौ) सहित, पिप्पली और आमलक (आँवला) से पकाई हुई
। ॥ १८५ ॥
घी मिली हुई, दोषों का अनुलोमन करने वाली पेया (वह) ज्वर-रोगी पिए। कोष्ठ (पेट) के बँध जाने और उसमें पीड़ा होने पर ज्वर-रोगी (ऐसी) पेया पिए जो पकाई गई हो
। ॥ १८६ ॥
(वह) मृद्वीका (अंगूर), पिप्पलीमूल, चव्य, आमलक (आँवला) और नागर (सोंठ) से (पकाई गई हो)। अथवा परिकर्तिका (गुदा में काटने जैसी पीड़ा) वाले ज्वर में बिल्व (बेल) सहित पेया पिए।
। ॥ १८७ ॥
जिसे पसीना और नींद न आती हो और जो प्यास से पीड़ित हो, वह बला, वृक्षाम्ल, कोलाम्ल, कलशी और धावनी से पकाई हुई, शर्करा (शक्कर) सहित पेया पिए।
। ॥ १८८ ॥
(अथवा) नागर (सोंठ) और आमलक (आँवला) से सिद्ध की हुई, घी में भुनी हुई, ज्वर को दूर करने वाली (पेया पिए)। मुद्ग (मूँग), मसूर, चणक (चना), कुलत्थ (कुलथी) और मकुष्टक (मोठ) को
। ॥ १८९ ॥
यूष के लिए, उन ज्वर-रोगियों को दिलवाए जिन्हें यूष सात्म्य (अनुकूल) हो। फल सहित पटोल (परवल) के पत्ते, कुलक, पापचेलिका
। ॥ १९० ॥
कर्कोटक (ककोड़ा) और कठिल्ल, (इन सबको) ज्वर में हितकर शाक जानना चाहिए। लाव, कपिञ्जल, एण, चकोर और उपचक्रक (को)
। ॥ १९१ ॥
कुरङ्ग, कालपुच्छ, हरिण, पृषत (चित्तीदार हिरन) और शश (खरगोश) को, (जो) ज्वर को दूर करने वाले (हैं), जिसे मांस सात्म्य (अनुकूल) हो उस ज्वर-रोगी को दे
। ॥ १९२ ॥
(इन्हें) विचक्षण (कुशल वैद्य) उचित समय पर थोड़े खट्टे या बिना खट्टे रसों (मांस-रसों) के रूप में (दे)। कुक्कुट (मुर्गा), मयूर (मोर), तित्तिरि (तीतर), क्रौञ्च और वर्तक (इन पक्षियों) को
। ॥ १९३ ॥
गुरु (भारी) और उष्ण (गरम) होने के कारण कुछ चिकित्सक (इन्हें) ज्वर में प्रशस्त नहीं बताते। (परन्तु) यदि ज्वर में लङ्घन के कारण अनिल (वात) का बल अधिक हो जाए
। ॥ १९४ ॥
(तो) मात्रा के विकल्पों को जानने वाला और काल (उचित समय) को जानने वाला वैद्य उन्हें भी दे। और प्यासे (रोगी) को अनुपान के लिए घर्माम्बु (गरम जल) दिलवाए
। ॥ १९५ ॥
अथवा जिसे मद्य सात्म्य (अनुकूल) हो, उसे दोष के अनुसार और बल के अनुसार मद्य (दिलवाए)। नव ज्वर (नए ज्वर) में गुरु (भारी), उष्ण (गरम), स्निग्ध (चिकने), मधुर (मीठे) और कषाय (कसैले)
। ॥ १९६ ॥
आहारों को दोषों के पाक (पकने) के लिए प्रायः त्याग दे। (इस प्रकार) ज्वर को नष्ट करने वाला, सिद्ध (परखा हुआ) अन्न-पान का क्रम भली-भाँति बता दिया गया।
। ॥ १९७ ॥
इसके आगे ज्वर का नाश करने वाले कषाय (काढ़े) कहे जाएँगे। मुस्त (नागरमोथा) और पर्पटक का पाक्य (पकाकर बनाया गया कषाय) या शीतकषाय (बिना पकाए भिगोकर बनाया गया कषाय) पिए।
। ॥ १९८ ॥
अथवा पर्पटक को नागर (सोंठ) सहित या दुरालभा सहित पिए। (अथवा) किराततिक्तक (चिरायता), मुस्त (नागरमोथा), गुडूची (गिलोय) और विश्वभेषज (सोंठ) (पिए)।
। ॥ १९९ ॥
अथवा ज्वर की शान्ति के लिए उदीच्य सहित पाठा और उशीर (खस) (का कषाय) पिए। ये कषाय ज्वर को नष्ट करने वाले, दीपन (जठराग्नि को जगाने वाले) और दोषों का पाचन करने वाले
। ॥ २०० ॥
तृष्णा (प्यास) और अरुचि को शान्त करने वाले, मुख की विरसता (बेस्वादपन) को नष्ट करने वाले हैं। कलिङ्गक (इन्द्रजौ), पटोल (परवल) का पत्ता और कटुकरोहिणी (कुटकी)
। ॥ २०१ ॥
पटोल (परवल), सारिवा, मुस्त (नागरमोथा), पाठा और कटुकरोहिणी (कुटकी); निम्ब (नीम), पटोल, त्रिफला, मृद्वीका (अंगूर), मुस्त और वत्सक
। ॥ २०२ ॥
किराततिक्त (चिरायता), अमृता, चन्दन और विश्वभेषज (सोंठ); गुडूची (गिलोय), आमलक (आँवला) और मुस्त (नागरमोथा): (ये) आधे-आधे श्लोक में पूरे होने वाले
। ॥ २०३ ॥
(ये) पाँच कषाय पाँच प्रकार के ज्वरों को शीघ्र शान्त करते हैं: संतत, सतत, अन्येद्युष्क, तृतीयक और चतुर्थक को।
। ॥ २०४ ॥
वत्सक और आरग्वध (अमलतास), पाठा, षड्ग्रन्था, कटुरोहिणी (कुटकी), अतिविषा (अतीस) सहित मूर्वा, निम्ब (नीम), पटोल (परवल), धन्वयासक
। ॥ २०५ ॥
वचा (बच), मुस्त (नागरमोथा) और उशीर (खस), मधुक (मुलेठी), त्रिफला और बला: मनुष्य (इन सब द्रव्यों का) ज्वर को हरने वाला पाक्य (पकाकर बनाया गया कषाय) अथवा शीतकषाय पिए।
। ॥ २०६ ॥
मधूक, मुस्त (नागरमोथा), मृद्वीका (अंगूर), काश्मर्य (गम्भारी), परूषक (फालसा), त्रायमाणा और उशीर (खस), त्रिफला, कटुरोहिणी (कुटकी)
। ॥ २०७ ॥
(इनका कषाय) रात भर रखा हुआ पीकर प्राणी ज्वर से शीघ्र मुक्त हो जाता है। जाती, आमलक (आँवला) और मुस्त (नागरमोथा), (तथा) धन्वयवासक (भी) उसी प्रकार (प्रयोग किए जाते हैं)।
। ॥ २०८ ॥
विबद्ध (रुके हुए) दोषों वाला ज्वर-पीड़ित (व्यक्ति) त्रिफला, त्रायमाणा, मृद्वीका (अंगूर) और कटुरोहिणी (कुटकी) का कषाय गुड़ सहित पिए।
। ॥ २०९ ॥
यह कषाय तो पित्त और श्लेष्मा (कफ) को हरने वाला है, और निश्चय ही आनुलोमिक (मल और दोषों को नीचे की ओर प्रवृत्त करने वाला) है। त्रिवृत् (निशोथ) और शर्करा से युक्त (होकर यह) पित्तश्लेष्मज्वर (पित्त और कफ से होने वाले ज्वर) को दूर करता है।
। ॥ २१० ॥
दोनों बृहती, वत्सक, मुस्त (नागरमोथा), देवदारु, महौषध (सोंठ) और कोलवल्ली: यह योग संनिपात ज्वर को दूर करता है।
। ॥ २११ ॥
शटी (कचूर) और पुष्करमूल, व्याघ्री (कण्टकारी), शृङ्गी, दुरालभा, गुडूची (गिलोय), नागर (सोंठ), पाठा, किरात (चिरायता), कटुरोहिणी (कुटकी)
। ॥ २१२ ॥
यह शट्यादि (शटी आदि का) वर्ग सन्निपात ज्वर को दूर करता है; कास (खाँसी), हृद्ग्रह (हृदय की जकड़न), पार्श्वार्ति (पसलियों की पीड़ा), श्वास (साँस फूलना) और तन्द्रा (ऊँघ) में (यह) प्रशस्त माना जाता है।
। ॥ २१३ ॥
दोनों बृहती, पौष्कर (पुष्करमूल), भार्गी (भारंगी), शटी (कचूर), शृङ्गी, दुरालभा, और वत्सक के बीज, पटोल (परवल), कटुरोहिणी (कुटकी)
। ॥ २१४ ॥
(यह) बृहत्यादि गण सन्निपात ज्वर को दूर करने वाला कहा गया है। (वैद्य इसे) कास (खाँसी) आदि सभी (कष्टों) में, और उपद्रवों सहित (स्थितियों) में भी दे।
। ॥ २१५ ॥
पिपासा (प्यास) और ज्वर को नष्ट करने वाले कषाय और यवागू भेषजाध्याय में बताए गए हैं; वैद्य उनका भी प्रयोग करे।
। ॥ २१६ ॥
रूक्ष (रूखे शरीर वाले) व्यक्ति के जो ज्वर कषायों, वमन, लङ्घन और लघु (हल्के) भोजन से शान्त नहीं होते, उनकी औषध सर्पि (घी) है।
। ॥ २१७ ॥
रूक्ष तेज (ताप) ज्वर उत्पन्न करने वाला है; और तेज से रूक्ष किए गए (व्यक्ति) की जो धातु अनुबल (साथ देने वाली) हो, वह अनिल (वात) है, और (वह) स्नेह से जीता जाने वाला है।
। ॥ २१८ ॥
ये सब के सब कषाय सर्पि (घी) के साथ मिलाकर ज्वर की शान्ति के लिए प्रयोग किए जाने चाहिए; (ये) अग्नि को प्रदीप्त करने वाले (और) शिव (हितकारी) हैं।
। ॥ २१९ ॥
पिप्पली, चन्दन, मुस्त (नागरमोथा), उशीर (खस), कटुरोहिणी (कुटकी), कलिङ्गक (इन्द्रजौ), तामलकी, सारिवा, अतिविषा (अतीस), स्थिरा (शालपर्णी)
। ॥ २२० ॥
द्राक्षा (अंगूर), आमलक (आँवला) और बिल्व (बेल), त्रायमाणा, निदिग्धिका: इनसे सिद्ध किया (पकाया) हुआ घी जीर्ण (पुराने) ज्वर को तुरन्त दूर करता है।
। ॥ २२१ ॥
(यह घृत) क्षय, कास (खाँसी), शिरःशूल (सिर का दर्द), पार्श्वशूल (पसलियों का दर्द), हलीमक, अंसाभिताप (कन्धों की जलन) और विषम (अनियमित) अग्नि को भी वश में करता है।
। ॥ २२२ ॥
वसा (चर्बी; सम्भवतः 'वासा', यानी अडूसा), गुडूची (गिलोय), त्रिफला, त्रायमाणा और यवासक (जवासा) को पकाकर, उस कषाय (काढ़े) से और दुगुने दूध से
। ॥ २२३ ॥
और पिप्पली, मुस्त (नागरमोथा), मृद्वीका (अंगूर), चन्दन, उत्पल और नागर (सोंठ) को कल्क (पिसी हुई लुगदी) बनाकर, (उनके साथ) जीर्ण ज्वर को दूर करने वाला घृत पकाए।
। ॥ २२४ ॥
बला, श्वदंष्ट्रा (गोखरू), बृहती (बड़ी कटेरी), कलसी, धावनी, स्थिरा (शालपर्णी), निम्ब (नीम), पर्पटक, मुस्त (नागरमोथा), त्रायमाणा और दुरालभा को
। ॥ २२५ ॥
(इनका) कषाय (काढ़ा) बनाकर, पीसने (कल्क) के लिए तामलकी, शटी, द्राक्षा (अंगूर), पुष्करमूल, मेदा और आमलक (आँवले) डाले
।॥ २२६ ॥
(और) घी और दूध (डाले)। इस प्रकार सिद्ध किया हुआ वह घृत ज्वर को हरने में श्रेष्ठ है, और क्षय, कास (खाँसी), शिरःशूल (सिर का दर्द), पार्श्वशूल (पसलियों का दर्द) और अंसताप (कन्धों की जलन) को दूर करता है।
। ॥ २२७ ॥
बुद्धिमान् (वैद्य) बहुत बढ़े हुए दोषों वाले ज्वर के रोगियों को उचित समय पर ऊपर की ओर और नीचे की ओर भी (दोष निकालने वाला) संशोधन दे, जो कल्प (कल्पस्थान) में बताया जाएगा।
। ॥ २२८ ॥
ज्वर की शान्ति के लिए मदन (मैनफल) को पिप्पली के साथ, या कलिङ्ग (इन्द्रयव) के साथ, या मधुक (मुलेठी) के साथ मिलाकर, गरम पानी से वमन (उल्टी कराने वाले योग) के रूप में पीना चाहिए।
। ॥ २२९ ॥
ज्वर में शहद मिले पानी से, या ईख (गन्ने) के रस से, अथवा नमक मिले पानी से, या मद्यों से, या तर्पण से प्रच्छर्दन (वमन) प्रशस्त (उचित) है।
। ॥ २३० ॥
या मृद्वीका (अंगूर) और आमलक (आँवले) का रस प्रस्कन्दन (विरेचन) के रूप में पिए; या आँवलों का घी में भुना हुआ रस (पिए), जो ज्वर को दूर करता है।
। ॥ २३१ ॥
या त्रिवृत् (निशोथ) का चूर्ण मधु और घी के साथ मिलाकर चाटे; या घी सहित त्रिफला का रस, (उसमें) शहद डालकर, पिए।
। ॥ २३२ ॥
ज्वर का रोगी आरग्वध (अमलतास) को दूध के साथ या मृद्वीका (अंगूर) के रस के साथ पिए; या त्रिवृत् (निशोथ) अथवा त्रायमाणा को दूध के साथ पिए।
। ॥ २३३ ॥
मृद्वीका (अंगूर) के साथ अभया (हरीतकी) पीकर, (उसके बाद) अनुपान के रूप में गरम दूध या द्राक्षा (अंगूर) का रस पीकर मनुष्य ज्वर से मुक्त हो जाता है।
। ॥ २३४ ॥
पञ्चमूल (पाँच जड़ों के समूह) के साथ उबाला हुआ दूध पीकर ज्वर का रोगी कास (खाँसी), श्वास (साँस फूलना), शिरःशूल (सिर का दर्द), पार्श्वशूल (पसलियों का दर्द) और चिरज्वर (पुराने ज्वर) से मुक्त हो जाता है।
। ॥ २३५ ॥
एरण्ड (अरंड) की जड़ के साथ उबाला हुआ दूध पीकर (रोगी) परिकर्तिका वाले ज्वर से मुक्त हो जाता है; उसी प्रकार बिल्व (बेल) के कच्चे फलों के साथ (उबाला हुआ दूध पीकर भी)।
। ॥ २३६ ॥
त्रिकण्टक (गोखरू), बला, व्याघ्री (छोटी कटेरी), गुड़ और नागर (सोंठ) के साथ सिद्ध किया (पकाया) हुआ दूध मल और मूत्र की रुकावट को नष्ट करता है, और शोफ (सूजन) तथा ज्वर को हरता है।
। ॥ २३७ ॥
नागर (सोंठ), मृद्वीका (अंगूर) और खर्जूर (खजूर) के साथ उबाला हुआ, घी, शहद और शक्कर सहित दूध प्यास और ज्वर को नष्ट करता है।
। ॥ २३८ ॥
या चार गुने जल के साथ उबाला हुआ दूध ज्वर को हरता है। या धारोष्ण (दुहते ही गरम) दूध वात-पित्त ज्वर को शीघ्र ही जीत लेता है।
। ॥ २३९ ॥
सभी जीर्ण ज्वरों का दूध श्रेष्ठ प्रशमन (शान्त करने वाला) है। उसे, अपने-अपने (ज्वर के) अनुसार भेषजों (औषधियों) के साथ उबालकर, गरम या ठण्डा पीना चाहिए।
। ॥ २४० ॥
दोष के पक्वाशय में पहुँच जाने पर (वैद्य) ज्वर को हरने वाले निरूह, अनुवासन सहित, प्रयोग करे, जो सिद्धि (सिद्धिस्थान) में भी बताए जाएँगे।
। ॥ २४१ ॥
पटोल (परवल) और अरिष्ट (नीम) के पत्ते, उशीर (खस) सहित चतुरङ्गुल (अमलतास), ह्रीबेर, रोहिणी, तिक्ता, श्वदंष्ट्रा (गोखरू) और मदन (मैनफल)
। ॥ २४२ ॥
और स्थिरा (शालपर्णी) तथा बला; यह सब आधे जल वाले दूध में उबाला हुआ, (जल उड़कर) केवल दूध शेष रहने तक (पकाया गया) निर्यूह (काढ़ा), मधु और घी से युक्त
। ॥ २४३ ॥
मदन (मैनफल) और मुस्त (नागरमोथा), पिप्पली, मधुक (मुलेठी) और वत्सक (कुटज) के कल्कों से युक्त, ज्वर को दूर करने वाली बस्ति दे।
। ॥ २४४ ॥
मार्ग के शुद्ध हो जाने पर, दोष के निकाल दिए जाने पर और धातुओं के प्रसन्न (निर्मल) हो जाने पर, (रोगी) अङ्गों के दर्द से छूटकर, हल्के अङ्गों वाला (होकर) तुरन्त ज्वर से मुक्त हो जाता है।
। ॥ २४५ ॥
आरग्वध (अमलतास) और उशीर (खस), तथा मदन (मैनफल) का फल, और चारों पर्णिनियाँ भी: (इनका) निर्यूह (क्वाथ) तैयार करे।
। ॥ २४६ ॥
प्रियङ्गु, मदन (मैनफल), मुस्त (नागरमोथा), शताह्वा और मधुयष्टिका (मुलेठी) का कल्क, घी, गुड़ (और) क्षौद्र (मधु): (यह) ज्वर को नष्ट करने वाली उत्तम बस्ति है।
। ॥ २४७ ॥
गुडूची (गिलोय) और त्रायमाणा, चन्दन, मधुक (मुलेठी), वृष (अडूसा), स्थिरा (शालपर्णी), बला, पृश्निपर्णी और मदन (मैनफल): इन (सबको पकाकर) सिद्ध करे।
। ॥ २४८ ॥
वैद्य जाङ्गल (सूखे प्रदेश के पशु-पक्षियों के) मांस के रस को (उन औषधियों के) रस के साथ मिलाकर, पिप्पली, फल और मुस्त (नागरमोथा) तथा मधुक (मुलेठी) के कल्क के साथ
। ॥ २४९ ॥
थोड़ा नमक मिलाकर, मधु और घी के साथ, युक्ति से (यह) निरूह दे, जो ज्वर को शान्त करने वाला और बल, स्वेद (पसीना) तथा रुचि देने वाला है।
। ॥ २५० ॥
जीवन्ती, मधुक (मुलेठी), मेदा, पिप्पली, मदन (मैनफल), वचा (वच), ऋद्धि, रास्ना, बला, विश्व (सोंठ), शतपुष्पा (सोआ) और शतावरी को
। ॥ २५१ ॥
(इन्हें) पीसकर वैद्य दूध, जल, घी और तेल को पकाए। इस आनुवासनिक (अनुवासन बस्ति के योग्य) स्नेह को ज्वर दूर करने वाला जाने।
। ॥ २५२ ॥
पटोल (परवल) और पिचुमर्द (नीम) से, गुडूची (गिलोय) और मधुक (मुलेठी) से, और मदन (मैनफल) से पकाया गया स्नेह ज्वर को नष्ट करने वाला अनुवासन है।
। ॥ २५३ ॥
चन्दन, अगुरु (अगर), काश्मर्य, पटोल (परवल), मधुक (मुलेठी) और उत्पल (कमल जैसे जलपुष्प) से सिद्ध किया गया, ज्वर को हरने वाला स्नेह स्नेहबस्ति (के रूप में) प्रशंसित है।
। ॥ २५४ ॥
भेषज-अध्याय में (और) विमान (स्थान) में रोगभेषज (अध्याय) में जो शिरोविरेचन कहा गया है, युक्ति को जानने वाला (वैद्य) उस ज्वर दूर करने वाले (शिरोविरेचन) को करे।
। ॥ २५५ ॥
और जो नावनिक (नस्य के लिए) तेल, और जो धूमवर्तियाँ (धूमपान की बत्तियाँ) पहले मात्राशितीय (अध्याय) में बताई गई हैं, वे ज्वरों में भी प्रयोग करने योग्य हैं।
। ॥ २५६ ॥
ज्वर को शीत और उष्ण, (इन) दो प्रकारों में बाँटकर, (रोगी की) जैसी इच्छा हो (वैसे), (वैद्य) अभ्यङ्ग, प्रदेह और परिषेक कराए।
। ॥ २५७ ॥
वैद्य दाहज्वर (जलन वाले ज्वर) को शान्त करने वाला अभ्यञ्जन (मालिश का स्नेह) दे: सहस्रधौत (हज़ार बार धोया हुआ) घी, या चन्दनादिक (चन्दन आदि से बना) तेल।
। । । । ॥ ॥ २५८ ॥
अब हम चन्दनाद्य (चन्दन से आरम्भ होने वाला) तैल बताएँगे - चन्दन, भद्रश्री, कालानुसार्य, कालीयक, पद्मा, पद्मक, उशीर (खस), सारिवा, मधुक, प्रपौण्डरीक, नागपुष्प, उदीच्य, वन्य, पद्म, उत्पल, नलिन, कुमुद, सौगन्धिक, पुण्डरीक, शतपत्र, बिस, मृणाल, शालूक, शैवाल, कशेरुक (कसेरू), अनन्ता, कुश, काश, इक्षु (ईख), दर्भ, शर, नल और शालि के मूल (जड़ें), जम्बु (जामुन), वेतस, वानीर, गुन्द्रा, ककुभ (अर्जुन), असन, अश्वकर्ण, स्यन्दन, वातपोथ, शाल (साल), ताल (ताड़), धव, तिनिश, खदिर (खैर), कदर, कदम्ब, काश्मर्य का फल, सर्ज, प्लक्ष (पाकड़), वट, कपीतन, उदुम्बर (गूलर), अश्वत्थ (पीपल), न्यग्रोध (बरगद), धातकी (धाय), दूर्वा (दूब), इत्कट, शृङ्गाटक (सिंघाड़ा), मञ्जिष्ठा (मजीठ), ज्योतिष्मती, पुष्कर (कमल) के बीज, क्रौञ्चादन, बदरी (बेर), कोविदार (कचनार), कदली (केला), संवर्तक, अरिष्ट, शतपर्वा, शीतकुम्भिका, शतावरी, श्रीपर्णी, श्रावणी, महाश्रावणी, रोहिणी, शीतपाकी, ओदनपाकी, काला, बला, पयस्या, विदारी, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, मधुरसा, ऋष्यप्रोक्ता, तृणशून्य, मोचरस, अटरूषक (अडूसा), बकुल (मौलसिरी), कुटज, पटोल (परवल), निम्ब (नीम), शाल्मली (सेमल), नारिकेल (नारियल), खर्जूर (खजूर), मृद्वीका (अंगूर), प्रियाल (चिरौंजी), प्रियङ्गु, धन्वन, आत्मगुप्ता (कौंच) और मधूक (महुआ) - इनका, और अन्य शीतवीर्य (ठण्डक देने वाली शक्ति वाले) औषधों का, जितने मिल सकें, कषाय (काढ़ा) बनवाए। उस कषाय से, दुगुने दूध के साथ, और उन्हीं (औषधों) के कल्क (पिसी हुई लुगदी) से, कषाय की आधी मात्रा वाले तैल को मन्द अग्नि पर सिद्ध करे (पकाए)। यह तैल अभ्यङ्ग (मालिश) से तुरन्त दाहज्वर को दूर करता है। और इन्हीं औषधों से, बारीक न पीसकर (मोटा पीसकर) और खूब ठण्डा करके, प्रदेह (लेप) लगवाए। और इन्हीं (औषधों) के साथ पकाकर ठण्डा किया हुआ जल अवगाह (जल में बैठकर स्नान) और परिषेक (शरीर पर जल की धार डालने) के लिए प्रयोग करे। इस प्रकार चन्दनाद्य तैल (कहा गया)।
॥ २५९ ॥
मधु (शहद), आरनाल (काञ्जी), दूध, दही, घी और जल के सेक (शरीर पर सींचना) और अवगाह (उनमें डूबकर बैठना) भी, छूने में शीतल होने के कारण, तुरन्त दाहज्वर को दूर करते हैं।
- । ॥ २६० ॥
और यहाँ (इस विषय में ये श्लोक) हैं - खूब ठण्डे पौष्कर (सम्भवतः कमल के पत्तों) पर, पद्म और उत्पल (कमल और नीले कमल) की पंखुड़ियों पर, कदली (केले) के पत्तों पर, और स्वच्छ क्षौम (अलसी के रेशों से बने) वस्त्रों पर
। ॥ २६१ ॥
(उन) चन्दन के जल से ठण्डे किए हुए (पत्तों और वस्त्रों) पर, अथवा ठण्डे धारागृह (जल की धाराओं वाले कक्ष) में भी, (अथवा) हिम-जैसे ठण्डे जल से सींचे हुए घर में, दाह (जलन) से पीड़ित (रोगी) सुखपूर्वक लेटे।
। ॥ २६२ ॥
(रोगी) चन्दन के जल से ठण्डे किए हुए सोने, शङ्ख, प्रवाल (मूँगे), मणियों और मोती के संस्पर्श के अनुरसों (उन्हें छूने से मिलने वाली सुखद ठण्डक) को स्पर्श करे।
।॥ २६३ ॥
मालाओं से, नील उत्पलों (नीले कमलों) से, पद्मों (कमलों) से, और ठण्डी हवा लाने वाले तथा चन्दन का जल बरसाने वाले अनेक प्रकार के व्यजनों (पंखों) से भी (रोगी को) हवा करे।
। ॥ २६४ ॥
स्वच्छ जल वाली नदियाँ, तडाग (तालाब), पद्मिनियाँ (कमलों से भरे सरोवर) और ह्रद (गहरे जलाशय) अवगाह (जल में डूबकर स्नान) में हितकर हैं, (और) दाह, तृष्णा, ग्लानि और ज्वर को दूर करने वाले हैं।
। ॥ २६५ ॥
प्रिय, अनुकूल आचरण करने वाली, चन्दन (के जल) से सींची हुई और मणि तथा मोतियों के आभूषण पहनी हुई प्रमदाएँ (युवा स्त्रियाँ) उत्तम मनभावन सुखों से (रोगी को) सान्त्वना दें।
। ॥ २६६ ॥
शीतल अन्न-पान, शीतल उपवन, और शीतल वायु तथा चन्द्रमा की किरणें दाहज्वर को दूर करने वाले हैं।
, । , ; , ॥ ।
अब उष्ण (गरमी) चाहने वाले ज्वर-रोगियों के अभ्यङ्ग आदि उपक्रम (उपचार) बताएँगे - अगुरु (अगर), कुष्ठ, तगर, पत्र, नलद, शैलेय, ध्यामक, हरेणुका, स्थौणेयक, क्षेमक, एला (इलायची), वराङ्ग, दल, पुर, तमालपत्र, भूतीक, रोहिष, सरल, शल्लकी, देवदारु, अग्निमन्थ, बिल्व (बेल), स्योनाक, काश्मर्य, पाटला, पुनर्नवा, वृश्चीर, कण्टकारी, बृहती, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, माषपर्णी, मुद्गपर्णी, गोक्षुरक, एरण्ड (अरण्ड), शोभाञ्जनक, वरुण, अर्क (आक), चिरबिल्व, तिल्वक, शटी, पुष्करमूल, गण्डीर, उरुबूक, पत्तूर, अक्षीव, अश्मान्तक, शिग्रु (सहजन), मातुलुङ्ग, पीलुक, मूलकपर्णी, तिलपर्णी, पीलुपर्णी, मेषशृङ्गी, हिंस्रा, दन्तशठ, ऐरावतक, भल्लातक, आस्फोता, काण्डीर, आत्मजा, एकेषीका, करञ्ज, धान्यक (धनिया), अजमोदा, पृथ्वीका, सुमुख, सुरस, कुठेरक, कालमालक, पर्णास, क्षवक, फणिज्झक, भूस्तृण, शृङ्गवेर (अदरक), पिप्पली, सर्षप (सरसों), अश्वगन्धा, रास्ना, रुहा, रोहा, वचा, बला, अतिबला, गुडूची (गिलोय), शतपुष्पा, शीतवल्ली, नाकुली, गन्धनाकुली, श्वेता, ज्योतिष्मती, चित्रक, अध्यण्डा, अम्लचाङ्गेरी, तिल, बदर (बेर), कुलत्थ (कुलथी) और माष (उड़द), इनके और इसी प्रकार के अन्य उष्णवीर्य औषधों में से जितने मिल सकें, उनका कषाय (काढ़ा) बनवाए; उस कषाय से और उन्हीं (औषधों) के कल्क से, जिसमें सुरा, सौवीरक, तुषोदक, मैरेय, मेदक, दधिमण्ड, आरनाल और कट्वर मिलाए गए हों, एक पात्र तेल पकाए। उस सुखोष्ण (सुहाते गरम) तेल से उष्ण चाहने वाले ज्वर-रोगी का अभ्यङ्ग करे; इस प्रकार शीतज्वर शान्त होता है। इन्हीं औषधों को बारीक पीसकर, सुखोष्ण (करके) उनका प्रदेह (लेप) लगवाए; और इन्हीं से पकाया हुआ सुखोष्ण जल शीतज्वर को शान्त करने के लिए अवगाहन और परिषेक के लिए प्रयोग करे। इस प्रकार अगुर्वाद्य तैल (कहा गया)।
- । ॥ २६८ ॥
और इस विषय में (ये श्लोक) हैं - स्वेदाध्याय में दिखाया गया तेरह प्रकार का स्वेद, मात्रा और काल जानने वाले (वैद्य) द्वारा प्रयोग किया जाए, तो वह भी शीतज्वर को दूर करने वाला है।
। ॥ २६९ ॥
वह कुटी, वह शय्या और वह ओढ़ना, और अगुरु से उठने वाले घने धूप (सुगन्धित धुएँ) शीत ज्वर को शीघ्र शान्त करते हैं।
। ॥ २७० ॥
और सुन्दर तथा भरे-पूरे अंगों वाली तरुण प्रमदाएँ (युवा स्त्रियाँ) (अपने) यौवन की ऊष्मा से, आलिङ्गन के द्वारा, शिशिरज्वर (ठण्ड वाले ज्वर) को शीघ्र शान्त करती हैं।
। ॥ २७१ ॥
वात और श्लेष्मा (कफ) को हरने वाले स्वेदन (पसीना लाने के उपाय) और अन्न-पान, (दोषों के) संसर्ग और बल के अनुसार प्रयोग किए जाने से, शीतज्वर को शीघ्र जीत लेते हैं।
। ॥ २७२ ॥
वातज (वात से उत्पन्न), श्रमज (थकान से उत्पन्न), पुराने और क्षतज (चोट या घाव से उत्पन्न) ज्वर में लङ्घन को हितकर न जाने; उन (ज्वरों) का शमन (शान्त करने वाले उपायों) से उपचार करे।
। ॥ २७३ ॥
क्योंकि दोष आमाशय की ऊष्मा को (उसके स्थान से) हटाकर, मनुष्यों के रस (धातु) में जाकर ज्वर उत्पन्न करते हैं, इसलिए अग्नि का बल घट जाता है।
। ॥ २७४ ॥
जैसे प्रज्वलित अग्नि, ईंधन से युक्त होने पर भी, वायु द्वारा बाहर की ओर धकेली जाने पर स्थाली (पकाने के बर्तन) में रखे ओदन (भात) को ठीक से नहीं पकाती
। ॥ २७५ ॥
उसी प्रकार दोषों द्वारा पक्तिस्थान (पाचन के स्थान) से बाहर फेंकी गई मनुष्यों की ऊष्मा खाए हुए (भोजन) को नहीं पचाती, या हल्के (भोजन) को (भी) कठिनाई से पचाती है।
। ॥ २७६ ॥
इसलिए अग्नि के बल की रक्षा के लिए लङ्घन आदि का क्रम हितकर है; क्योंकि सात धातुओं में गए हुए मल सात दिन में पकते हैं।
। ॥ २७७ ॥
इसीलिए ज्वर प्रायः आठवें दिन निराम (आम से रहित) हुआ कहा गया है। परन्तु उदीर्ण (उभरे हुए) दोषों वाला और मन्द अग्नि वाला (मनुष्य), विशेष रूप से गुरु (भारी भोजन) खाता हुआ
। ॥ २७८ ॥
(वह) मनुष्य अचानक प्राणों से छूट जाता है (मर जाता है), या बहुत समय तक कष्ट पाता है। इस कारण से विद्वान् (वैद्य) वातिक ज्वर में भी आरम्भ से
। ॥ २७९ ॥
मनुष्य को अचानक न बहुत भारी और न बहुत स्निग्ध (चिकनाई वाला भोजन) खिलाए। परन्तु मारुतज (वात से उत्पन्न) ज्वर में तो आरम्भ में ही, (लङ्घन आदि के) क्रम की अपेक्षा न करके भी
। ॥ २८० ॥
अनुबन्ध-रहित (वातज ज्वरों) के लिए अभ्यङ्ग आदि उपक्रम करे, और कषाय पिलाकर रस के साथ भोजन कराए।
। ॥ २८१ ॥
और जीर्णज्वर (पुराने ज्वर) को हरने वाला उपक्रम भी सब प्रकार से करे। श्लेष्मल (कफ-प्रधान) और वात-रहित (लोगों) का, कफ की अधिकता वाला, अनुष्ण (कम गर्मी वाला) ज्वर
। ॥ २८२ ॥
मृदु (हल्की) ऊष्मा वाले (उन लोगों का यह ज्वर) सात दिन में भी परिपाक (पूरे पकने) को नहीं पहुँचता। उस (ज्वर) का, जैसा कहा गया है उस क्रम से, लङ्घन, अल्प भोजन आदि द्वारा
। ॥ २८३ ॥
दस दिन तक उपचार करके (फिर) कषाय आदि से उपचार करे। जो साम (आम सहित) ज्वर हैं, और जो कफज (कफ से उत्पन्न) हैं, और जो कफ-पित्त के ज्वर हैं
। ॥ २८४ ॥
उन (ज्वरों) में, हर एक के अनुसार, वह लङ्घन करना चाहिए जो लङ्घनीय (लङ्घन के योग्य रोगियों) के लिए कहा गया है, और यथाक्रम वमन, विरेचन और बस्ति से भी।
। ॥ २८५ ॥
बुद्धिमान् (वैद्य) कफ, पित्त और अनिल (वात) से उत्पन्न, संसृष्ट (दो दोषों के मेल वाले) और सन्निपतित (तीनों दोषों के मेल वाले) ज्वरों का, (दोषों के) तर-तम (कम-अधिक) और सम (बराबर) होने को समझकर, उपचार करे।
। ॥ २८६ ॥
दोषों के क्रम का ध्यान रखने वाला (वैद्य) ज्वरों को, जैसी कही गई हैं उन औषधियों से, एक दोष को बढ़ाकर, या उभरे हुए (दोष) को घटाकर जीते।
। ॥ २८७ ॥
या कफ के स्थान के क्रम से सन्निपात ज्वर को जीते। सन्निपात ज्वर के अन्त में कान की जड़ में अत्यन्त दारुण (भयानक)
। ॥ २८८ ॥
शोथ (सूजन) उत्पन्न होता है; उससे कोई विरला ही छूट पाता है। उसे रक्तावसेचन (रक्त निकालने) से और सर्पिष्पान (घी पीने) से शीघ्र जीते।
। ॥ २८९ ॥
कफ और पित्त को नष्ट करने वाले प्रदेहों (लेपों), नावनों (नस्य) और कवलग्रहों से, (तथा) शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष आदि (उपायों) से जिसका ज्वर शान्त नहीं होता
। ॥‘ ।
शाखानुसारी (शाखाओं में फैला हुआ) वह (ज्वर) रक्त के अवसेक (रक्त निकालने) से शान्त होता है। और जो ज्वर विसर्प, अभिघात (चोट) और विस्फोटकों (फफोलों) से (होता है); 'उसकी भुजाओं की सिरा (नस) शीघ्र क्रम से खोले', यह योगीन्द्रनाथ सेन द्वारा स्वीकृत पाठ है।
। ॥ २९१ ॥
उसमें पहले घी का पान (कराया जाए), यदि (वह ज्वर) कफ-पित्त की अधिकता वाला न हो। शरीर की धातुओं की दुर्बलता से जीर्ण (पुराना) ज्वर बना रहता है।
। ॥ २९२ ॥
इसलिए बल देने वाले और बृंहण (पुष्ट करने वाले) आहारों से उसका उपचार करे। साधारण कर्म (चिकित्सा) तृतीयक और चतुर्थक (ज्वरों) को दूर करे।
। ॥ २९३ ॥
क्योंकि विषमज्वर में प्रायः आगन्तु (बाहरी कारण) का अनुबन्ध (जुड़ाव) रहता है। वात-प्रधान (विषमज्वर) को (विभिन्न) घी (के योगों) से, और अनुवासन सहित बस्तियों से
। ॥ २९४ ॥
और स्निग्ध (चिकने) तथा उष्ण (गरम) अन्न-पान से विषमज्वर को शान्त करे। (पित्त-प्रधान विषमज्वर को) विरेचन से, दूध से और संस्कृत (औषधियों से सिद्ध किए गए) घी से
। ॥ २९५ ॥
और तिक्त (कड़वे) तथा शीत (ठण्डे पदार्थों) से पित्त-प्रधान विषमज्वर को जीते। वमन, पाचन, रूक्ष (रूखा) अन्न-पान, विलङ्घन
। ॥ २९६ ॥
और कषाय (कसैले) तथा उष्ण (गरम पदार्थ) कफ-प्रधान विषमज्वर में प्रशस्त (हितकर) हैं। (अब) विषमज्वर को नष्ट करने वाले श्रेष्ठ योग कहे जाएँगे।
। ॥ २९७ ॥
बुद्धिमान (वैद्य) को दोष आदि का भली-भाँति भेद करके उन (योगों) का प्रयोग करना चाहिए। पीने के लिए मण्ड सहित सुरा, (और) खाने के लिए चरणायुध (मुर्गा)
। ॥ २९८ ॥
(तथा) तित्तिरि (तीतर) और मयूर (मोर) विषमज्वर में प्रयोग किए जाने चाहिए। अथवा षट्पल घी पिए, या अभया (हरीतकी) का प्रयोग करे।
। ॥ २९९ ॥
अथवा त्रिफला का कषाय (काढ़ा), या गुडूची (गिलोय) का रस ही; (अथवा) नीलिनी (नील), अजगन्धा, त्रिवृता (निशोथ) और कटुरोहिणी (कुटकी) को
। ॥ ३०० ॥
स्नेह और स्वेद से तैयार किया गया (रोगी इन्हें) ज्वर आने के समय युक्ति से (उचित रीति से) पिए। अथवा घी की बड़ी मात्रा पीकर फिर वमन करे।
। ॥ ३०१ ॥
अथवा प्रचुर अन्न-पान का सेवन करके फिर (उसे) उल्टी करके निकाल दे। अथवा अन्न के साथ प्रचुर मद्य पीकर ज्वर आने के समय सो जाए।
। ॥ ३०२ ॥
विषमज्वर में आस्थापन या यापन (बस्ति) कराए। अथवा उस दिन (रोगी) वृषदंश (बिलाव) का मल दूध के साथ पिए
। ॥ ३०३ ॥
या वृष (बैल) का (मल) सैन्धव (सेंधा नमक) सहित दधिमण्ड (दही के पानी) या सुरा के साथ (पिए)। पिप्पली, त्रिफला, दही, तक्र (छाछ) और घी का
। ॥ ३०४ ॥
पञ्चगव्य और दूध का प्रयोग विषमज्वर में (बताया गया है)। भोजन से पहले तैल सहित रसोन (लहसुन) का सेवन
। ॥ ३०५ ॥
और मेद्य (चर्बी वाले) तथा उष्णवीर्य मांसों का भक्षण (भी बताया गया है)। और हिङ्गु (हींग) के बराबर (मात्रा वाली), सैन्धव सहित वैयाघ्री (बाघ की) वसा नस्य (के रूप में दी जाए)।
। ॥ ३०६ ॥
पुराना घी, और उसी प्रकार सैन्धव सहित सिंह की वसा (भी नस्य के रूप में दी जाए)। सैन्धव (सेंधा नमक), और मनःशिला (मैनसिल) सहित पिप्पली के तण्डुल (दाने)
। ॥ ३०७ ॥
(इन्हें) तैल में पीसकर बनाया गया नेत्राञ्जन (आँख का अञ्जन) विषमज्वर में प्रशस्त माना जाता है। पलङ्कषा, निम्ब (नीम) के पत्ते, वचा (वच), कुष्ठ (कूठ), हरीतकी (हरड़)
। ॥ ३०८ ॥
यव (जौ) सहित सर्षप (सरसों) और घी, (इनका) धूपन ज्वर को नष्ट करने वाला है। जो धूम, जो धूपन, जो नावन (नस्य) और जो अञ्जन
। ॥ ३०९ ॥
मनोविकार (मन के रोगों) में बताया गया है, वह (सब) विषमज्वर में करना चाहिए। मणियों, ओषधियों, मङ्गल्य (मङ्गलकारी) वस्तुओं और विष के
। ॥ ३१० ॥
धारण से, और अगदों (विषनाशक औषधियों) के सेवन से ज्वर नहीं होता। उमा सहित, अनुचरों सहित और मातृगण सहित देव ईश्वर (शिव) की
। ॥ ३११ ॥
पूजा करता हुआ प्रयत (संयमी और पवित्र) (मनुष्य) विषमज्वर से शीघ्र मुक्त हो जाता है। सहस्र सिरों वाले, चर-अचर (जगत्) के स्वामी, विभु (सर्वव्यापक) विष्णु की
। ॥ ३१२ ॥
सहस्र नामों से स्तुति करता हुआ (मनुष्य) सब ज्वरों को दूर कर देता है। ब्रह्मा, (दोनों) अश्विनों, इन्द्र, हुतभक्ष (अग्नि), हिमाचल (हिमालय)
। ॥ ३१३ ॥
गङ्गा और मरुद्गणों की इष्टि (यज्ञ) से पूजा करता हुआ (मनुष्य) ज्वरों को जीत लेता है। माता और पिता की भक्ति से, और गुरुओं के पूजन से
। ॥ ३१४ ॥
ब्रह्मचर्य से, तप से, सत्य से और नियम से, जप, होम और दान से, और वेदों के श्रवण से
। ॥ ३१५ ॥
और साधुओं (सज्जनों) के दर्शन से (मनुष्य) ज्वर से शीघ्र मुक्त हो जाता है। रस (धातु) में स्थित ज्वर में वमन और उपवास कराना चाहिए।
। ॥ ३१६ ॥
रक्त में स्थित (ज्वर) में सेक (शरीर पर द्रव की धार डालना) और प्रदेह (गाढ़ा लेप), तथा संशमन (दोषों को शान्त करने वाले उपाय) भी (कराने चाहिए)। मांस और मेद में स्थित (ज्वर) में उपवास सहित विरेचन हितकर है।
। ॥ ३१७ ॥
अस्थि और मज्जा में पहुँचे (ज्वर) में अनुवासन सहित निरूह (बस्तियाँ) देनी चाहिए। शाप और अभिचार से, और भूतों के अभिषङ्ग (आवेश) से जो ज्वर (होता है)
। ॥ ३१८ ॥
उसमें सारी दैवव्यपाश्रय (दैवी उपायों पर आधारित) औषध (चिकित्सा) अभीष्ट है। अभिघात (चोट) से हुआ ज्वर घी के पान और अभ्यङ्ग (मालिश) से नष्ट हो जाता है
। ॥ ३१९ ॥
और रक्तावसेक (रक्त निकालने) से, सात्म्य (अनुकूल) मद्यों से, तथा मांसरस और ओदन (भात) से (भी)। मद्य जिनके लिए सात्म्य है, उनका आनाह (पेट का फूलना) सहित (ज्वर) मदिरा और रस के साथ भोजन से (नष्ट होता है)।
। ॥ ३२० ॥
क्षत (चोट से घायल) और व्रणित (घाव वाले) लोगों का (ज्वर) क्षत और व्रण की चिकित्सा से (नष्ट होता है)। आश्वासन (ढाढ़स) से, इष्ट (मनचाही वस्तु) की प्राप्ति से और वायु (वात) के प्रशमन (शान्त करने) से
। ॥ ३२१ ॥
और हर्षण (मन को प्रसन्न करने वाले उपायों) से काम, शोक और भय से होने वाले ज्वर शान्त हो जाते हैं। मनचाहे और मन को भाने वाले विषयों से, और पित्त को नष्ट करने वाले उपक्रमों (उपचारों) से भी
। ॥ ३२२ ॥
और सद्वाक्यों (अच्छे वचनों) से क्रोध से उत्पन्न ज्वर शान्त हो जाता है। काम से क्रोधज्वर (क्रोध से हुआ ज्वर), और क्रोध से कामसमुद्भव (काम से उत्पन्न ज्वर) नाश को
। ॥ ३२३ ॥
प्राप्त होता है, और भय तथा शोक से उत्पन्न (ज्वर) उन दोनों (काम और क्रोध) से (नष्ट होता है)। परन्तु जो (व्यक्ति) ज्वर के वेग (दौरे) और (उसके आने के) समय का चिन्तन करता हुआ ज्वरग्रस्त होता है
। ॥ ३२४ ॥
ज्वर के छूटने के समय मनुष्य कराहता हुआ वमन करता है और छटपटाता है; हाँफता हुआ, विवर्ण (फीका पड़ा हुआ) और पसीने से भीगे अंगों वाला (वह) काँपता है और बार-बार निढाल-सा हो जाता है।
। ॥ ३२५ ॥
सारे अंग गरम रहते (वह) प्रलाप करता है (असम्बद्ध बोलता है), और ठंडे अंगों वाला भी हो जाता है; विसंज्ञ (बेसुध) और ज्वर के वेग से पीड़ित (वह) क्रोध में भरा-सा दिखाई देता है।
। ॥ ३२६ ॥
और दोषों सहित, आवाज़ के साथ, पतला मल वेग से निकलता है। विचक्षण (कुशल वैद्य) ज्वरमोक्ष (ज्वर के छूटने) में इन लक्षणों को जाने।
। ॥ ३२७ ॥
बहुत दोषों वाले (रोगी) का बलवान् और प्रायः नया ज्वर, यदि सत्क्रिया (उचित चिकित्सा) और दोषों के पाक (पकने) से छोड़ता है, तो अत्यन्त दारुण (कष्टदायक) ढंग से (छोड़ता है)।
। ॥ ३२८ ॥
जो (ज्वर) दोषों के अनुसार (अपना) वेग दिखाकर क्रम से (धीरे-धीरे) शान्त हो जाते हैं, उन चिरकारी (धीरे-धीरे चलने वाले) ज्वरों का मोक्ष (छूटना) अदारुण (कष्टरहित) होता है।
। ॥ ३२९ ॥
जिसकी क्लम (थकान) और संताप (जलन) दूर हो गए हों, जो व्यथा (पीड़ा) से रहित हो, जिसकी इन्द्रियाँ निर्मल हों और जो प्रकृतिस्थ सत्त्व (अपनी स्वाभाविक अवस्था वाले मन) से युक्त हो, उस मनुष्य को ज्वर रहित जानना चाहिए।
। ॥ ३३० ॥
ज्वर वाला और ज्वर से मुक्त हुआ (व्यक्ति) विदाही (जलन उत्पन्न करने वाले), गुरु (भारी), असात्म्य (प्रतिकूल) और विरुद्ध (परस्पर विरोधी) अन्न-पान को त्याग दे
। ॥ ३३१ ॥
व्यवाय (मैथुन), अति चेष्टा (अधिक श्रम), स्नान और अति भोजन को (भी)। इस प्रकार ज्वर शान्त होता है, और शान्त होकर (फिर) उत्पन्न नहीं होता।
। ॥ ३३२ ॥
ज्वर से मुक्त हुआ (व्यक्ति), जब तक बलवान् न हो जाए, (तब तक) व्यायाम, व्यवाय (मैथुन), स्नान और चङ्क्रमण (इधर-उधर घूमना) का सेवन न करे।
। ॥ ३३३ ॥
परन्तु जो मनुष्य ज्वर से मुक्त होकर, (अभी) बल उत्पन्न न होने पर ही, इस वर्ज्य (त्यागने योग्य) का सेवन करता है, उसका ज्वर फिर लौट आता है।
। ॥ ३३४ ॥
या फिर, दोषों के ठीक से न निकाले जाने पर जिसका (ज्वर) उतर जाता है, उसका (ज्वर) थोड़े-से अपचार से भी फिर लौट आता है।
। ॥ ३३५ ॥
फिर से आया हुआ वह (ज्वर) बहुत समय से कष्ट पाए हुए, दुर्बल और हीन तेज वाले (व्यक्ति) को थोड़े ही समय में मार डालता है।
। ॥ ३३६ ॥
अथवा मल क्रम से (धीरे-धीरे) धातुओं में ही परीपाक (पूरे पकने) को प्राप्त होते हैं; ज्वर न करते हुए वे तो भी (शरीर का) अपकार (हानि) करते हैं।
। ॥ ३३७ ॥
वे (मल) दीनता (उदासी), श्वयथु (सूजन), ग्लानि (थकावट), पाण्डुता (फीका-पीला रंग), भोजन की इच्छा का न होना, कण्डू (खुजली), उत्कोठ (उभरे चकत्ते) और पिडकाएँ (फुंसियाँ) उत्पन्न करते हैं, और अग्नि को मृदु (मन्द) कर देते हैं।
। ॥ ३३८ ॥
और इसी प्रकार मनुष्यों के दूसरे रोग भी, चले जाने के बाद, दोषों के पूरी तरह न निकाले जाने के कारण, थोड़े-से अहित (सेवन) से भी फिर लौट आते हैं।
। ॥ ३३९ ॥
इसलिए ज्वर के समाप्त हो जाने पर भी (वैद्य) (रोगी की) अवस्था के अनुसार, बल के अनुसार और प्राण (जीवन-शक्ति) के अनुसार दोष को (शरीर से) निकाले, अथवा (औषधियों के) प्रयोगों से (उसे) शान्त करे।
। ॥ ३४० ॥
मृदु (हल्के) शोधनों से शुद्धि (की जाए); यापन बस्तियाँ हितकर हैं; और लघु (हल्के) यूष तथा जाङ्गल (सूखे प्रदेश के पशु-पक्षियों के) मांस से बने रस हितकर हैं।
। ॥ ३४१ ॥
ज्वर के फिर से लौट आने पर अभ्यङ्ग (तेल आदि की मालिश), उद्वर्तन (उबटन), स्नान, धूपन (औषधियों का धुआँ देना) और अञ्जन (आँखों में लगाने की औषधि) हितकर हैं, और तिक्त घृत (कड़वी औषधियों से सिद्ध घी) भी।
। ॥ ३४२ ॥
गुरु (भारी), अभिष्यन्दी (स्रोतों को रोकने वाले) और असात्म्य (प्रतिकूल) (पदार्थों) के भोजन से (ज्वर के) फिर लौट आने पर लङ्घन, उष्ण (गरम) उपचार आदि का क्रम भी पहले की तरह करना चाहिए।
। ॥ ३४३ ॥
किराततिक्तक (चिरायता), तिक्ता, मुस्त (नागरमोथा), पर्पटक और अमृता (गुडूची), पिए जाने पर और (उनके) अभ्यास (नियमित सेवन) से, पुनरावर्तक (बार-बार लौटने वाले) ज्वर को नष्ट करते हैं।
। ॥ ३४४ ॥
ज्वर से पीड़ित (रोगियों) की उस-उस अवस्था में, ज्वर की चिकित्सा के क्रम को ध्यान में रखने वाला विचक्षण (कुशल वैद्य) उस-उस (अवस्था के अनुरूप) चिकित्सा करे।
। ॥ ३४५ ॥
ज्वर रोगों का राजा है, सभी प्राणियों का अन्त करने वाला और दारुण (भयंकर) है। इसलिए वैद्य उसके प्रशमन (शान्त करने) में विशेष रूप से यत्न करे।
- । ॥ ३४६ ॥
इस विषय में (यह) श्लोक है: प्राणियों के हित की कामना से आत्रेय द्वारा अग्निवेश को क्रम के अनुसार और प्रश्नों के अनुसार ज्वरचिकित्सित (ज्वर की चिकित्सा) कहा गया।
॥॥
इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र (ग्रन्थ) के चिकित्सास्थान में ज्वरचिकित्सित (ज्वर की चिकित्सा) नामक तीसरा अध्याय (पूरा हुआ)।