भारत संहिता

अध्याय ६

प्रमेहचिकित्सितम्

प्रमेह की चिकित्सा

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भूमिका

प्रमेहचिकित्सित चरक संहिता के चिकित्सास्थान का छठा अध्याय है, और इसका नाम इसके विषय से बना है: प्रमेह की चिकित्सा। प्रमेह मूत्र से जुड़े रोगों का एक समूह है, जिनमें बिगड़े हुए दोष के अनुसार मूत्र का रंग, गाढ़ापन, स्वाद और गन्ध बदल जाते हैं। अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय का है: आरम्भ में कहा गया है कि मोह, मान और अनुशय से रहित, कामनाओं से मुक्त और ज्ञान तथा तप में महान् पुनर्वसु (आत्रेय) ने अपने शिष्य अग्निवेश को मेहों के हेतु, लक्षण और उनका शमन बताया।

अध्याय पहले कारण गिनाता है: बैठे रहने और सोने का सुख, दही, ग्राम्य, औदक और आनूप प्राणियों के मांस-रस, दूध, नया अन्न-पान, गुड़ से बने पदार्थ, और जो कुछ भी कफ बढ़ाए। फिर वह रोग का बनना बताता है: कफ, और उष्ण चीज़ों से बढ़ा पित्त, मेद, मांस और शरीर के क्लेद (नमी) को दूषित करके मेह उत्पन्न करते हैं, और दोषों के क्षीण होने पर वात धातुओं को बस्ति (मूत्राशय) में खींच लाता है। उसके अनुसार मेह बीस हैं: कफ के दस साध्य, पित्त के छह याप्य (जो केवल नियन्त्रण में रखे जा सकते हैं) और वात के चार असाध्य। ये मूत्र के रूप से पहचाने जाते हैं, जैसे जल या गन्ने के रस जैसा, गाढ़ा, क्षार जैसा, हल्दी या मजीठ के रंग का, या मज्जा, ओज, वसा अथवा लसीका से युक्त मूत्र। पसीना, शरीर की गन्ध, मुँह में मिठास, हाथ-पैरों में जलन और मूत्र पर चींटियों का दौड़ आना जैसे पूर्वरूप भी गिनाए गए हैं।

चिकित्सा रोगी के बल से आरम्भ होती है। प्रमेही दो प्रकार के बताए गए हैं: स्थूल और बलवान्, और कृश और दुर्बल। दुबले के लिए संबृंहण (पोषण देकर बल बढ़ाना) कहा गया है; जिसमें दोष और बल अधिक हों, उसके लिए स्नेहन के बाद वमन और विरेचन से संशोधन (शुद्धि), और उसके बाद संतर्पण, क्योंकि अध्याय के अनुसार अपतर्पण (अधिक घटाने) से प्रमेही को गुल्म, क्षय, शूल और मूत्र का रुकना हो सकते हैं। जो संशोधन के योग्य न हो, उसके लिए संशमन है। आहार में यव (जौ) प्रधान है: जौ का भात, सत्तू, पूए और अनेक भक्ष्य, और साथ में जाङ्गल प्राणियों के मांस-रस, पुराना शालि चावल, मूँग का यूष और कड़वे शाक।

फिर औषधियों के योग आते हैं: कफ के प्रमेहों के लिए दस और पित्त के प्रमेहों के लिए दस कषाय (काढ़े), जिनमें से हर एक श्लोक के एक पाद में कहा गया है और जो मधु मिलाकर दिए जाते हैं; वात से जुड़े मेहों के लिए कषायों के साथ पकाए गए तैल और घृत; फूलों के चूर्ण और कल्क; और मध्वासव तथा उसी ढंग के दो और आसव। व्यायाम, उबटन, स्नान और सुगन्धित लेप भी गिनाए गए हैं। अन्त में कुछ सावधानियाँ हैं: जिन हेतुओं से मेह हुआ हो, उनसे बचना उत्पन्न रोग की चिकित्सा के समान ही विहित है; बिना पूर्वरूपों के पीला या लाल मूत्र प्रमेह नहीं, रक्त और पित्त का प्रकोप है; मीठा, मधु जैसा मूत्र दोषों की क्षीणता से वात का भी हो सकता है और संतर्पण से कफ का भी; जन्म से या मधुमेही माता-पिता से मिला प्रमेह बीज के दोष से होने के कारण असाध्य कहा गया है, वैसे ही जैसे वंश में चले आने वाले सब विकार; और प्रमेह की सात पिडकाओं (फोड़ों) की चिकित्सा कुशल शल्यविदों को सौंपी गई है। सार के श्लोक अध्याय के विषय गिनाते हैं, और पुष्पिका के साथ अध्याय पूरा होता है।

इस अध्याय से साथ ले जाने योग्य बातें ये हैं: चरक संहिता प्रमेह को कफ बढ़ाने वाले आहार और आराम की आदतों से जोड़ती है, और बढ़े हुए क्लेद, मेद और कफ को उसका कारण मानती है; उसके अनुसार चिकित्सा रोगी के बल के साथ बदलती है, दुबले के लिए पोषण और बलवान् के लिए शुद्धि; जौ प्रमेही के आहार का केन्द्र है; और कारण से बचना भी चिकित्सा का ही अंग है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ५९-६१)

तत्र श्लोकाः-हेतुर्दोषो दूष्यं मेहानां साध्यतानुरूपश्च।मेही द्विविधस्त्रिविधं भिषग्जितमतिक्षपणदोषः॥‘द्विविधंऽ योगीन्द्रनाथसेनसंमतः पाठः

श्लोक ५९ →

इस विषय में (सार के) श्लोक (हैं): मेहों (प्रमेहों) के हेतु (कारण), दोष, दूष्य और साध्यता के अनुरूप (उनका विभाग), दो प्रकार का मेही (प्रमेह का रोगी), तीन प्रकार की चिकित्सा, अति-क्षपण (अत्यधिक घटाने) का दोष; 'द्विविधं' (दो प्रकार का), यह योगीन्द्रनाथ सेन द्वारा स्वीकृत पाठ है।

आद्या यवान्नविकृतिर्मन्था मेहापहाः कषायाश्च।तैलघृतलेहयोगा भक्ष्याः प्रवरासवाः सिद्धाः॥

श्लोक ६० →

पहले, जौ के अन्न से बने पदार्थ, प्रमेहों को दूर करने वाले मन्थ और कषाय, तैल, घृत और लेह के योग, भक्ष्य (खाद्य पदार्थ), (और) सिद्ध (परखे हुए) उत्तम आसव

व्यायामविधिर्विविधः स्नानान्युद्वर्तनानि गन्धाश्च।मेहानां प्रशमार्थं चिकित्सिते दिष्टमेतावत्॥

श्लोक ६१ →

विविध व्यायाम-विधि, स्नान, उद्वर्तन (उबटन) और गन्ध (सुगन्धित द्रव्य): मेहों (प्रमेहों) को शान्त करने के लिए चिकित्सा (के इस अध्याय) में इतना बताया गया है।

मुख्य शब्द (१३) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

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च. चि. ६/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम प्रमेहचिकित्सित (प्रमेह की चिकित्सा सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. चि. ६/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. चि. ६/३

। ॥ ३ ॥

मोह, मान और अनुशय से रहित, आशा (कामनाओं) से रहित, ज्ञान और तप में महान् पुनर्वसु ने उचित समय पर अग्निवेश को हेतु (कारण) और लिङ्ग (लक्षण) सहित मेहों (प्रमेहों) के विषय में बताया, और उनका शमन (उपचार) भी (बताया)।

च. चि. ६/४

। ॥ ४ ॥

बैठे रहने का सुख, सोने का सुख, दही, ग्राम्य, औदक और आनूप (प्राणियों के मांस) के रस, दूध, नया अन्न और पान (पेय), गुड़ से बने पदार्थ, और जो कुछ कफ बढ़ाता है, वह सब प्रमेह का कारण है।

च. चि. ६/५

। ॥ ५ ॥

कफ, बस्ति (मूत्राशय) में पहुँचे मेद, मांस और शरीर में उत्पन्न क्लेद को दूषित करके, मेहों को उत्पन्न करता है। और उष्ण (चीज़ों) से बढ़ा हुआ पित्त भी उन्हीं को दूषित करके (मेह उत्पन्न करता है)।

च. चि. ६/६

। ॥ ६ ॥

दोषों के क्षीण होने पर अनिल (वात) धातुओं को बस्ति में खींच लाकर प्रमेह उत्पन्न करता है। क्योंकि (कोई भी) दोष बस्ति में पहुँचकर और मूत्र को दूषित करके अपने-अपने (स्वभाव के) अनुसार मेह उत्पन्न करता है।

च. चि. ६/७

, , । ॥ ७ ॥

कफ से उत्पन्न दस (प्रमेह) साध्य हैं, पित्त से उत्पन्न छह याप्य हैं, और पवन (वात) से (उत्पन्न) चार का समूह साध्य नहीं है। वे क्रमशः समक्रियत्व (चिकित्सा के एक-सी होने), विषमक्रियत्व (चिकित्सा के विषम होने) और महात्ययत्व (बड़ा संकट होने) के कारण (ऐसे) हैं।

च. चि. ६/८

। , ॥ ८ ॥

प्रमेह के रोगियों के दोष पित्त सहित कफ, और पवन (वात) हैं; और (उनके) दूष्य मेद, अस्र (रक्त), शुक्र, अम्बु (जल), वसा, लसीका, मज्जा, रस, ओज और पिशित (मांस) हैं। मेह बीस ही हैं।

च. चि. ६/९

। ॥ ९ ॥

(मूत्र) जल जैसा, और इक्षुरस (गन्ने के रस) जैसा, या गाढ़ा, और गाढ़ा पर ऊपर से स्वच्छ, सफ़ेद, शुक्र सहित, ठण्डा, या धीरे-धीरे (निकलने वाला), या लार जैसा, या बालू से युक्त

च. चि. ६/१०

। ॥ १० ॥

इन दस को कफ से उत्पन्न प्रमेह जानना चाहिए। क्षार जैसा, काला और नीला भी, हारिद्र (हल्दी जैसा पीला) और माञ्जिष्ठ (मजीठ जैसा लाल), और रक्त (लाल) भी, इन छह प्रमेहों को (आचार्य) पित्त से (उत्पन्न) कहते हैं।

च. चि. ६/११

। ॥ ११ ॥

मज्जा या ओज से, या वसा से युक्त, या लसीका से लगातार बँधा हुआ, (ऐसा) चार प्रकार का मूत्र (रोगी) यहाँ वात के कारण त्यागता है, जब शेष धातु (वात द्वारा) खींच लिए जाते हैं।

च. चि. ६/१२

। ॥ १२ ॥

प्रमेह अपने-अपने दोष के अनुसार वर्ण (रंग), रस (स्वाद), स्पर्श और गन्ध भी ग्रहण करता है। वात से उत्पन्न (प्रमेह) श्याव-अरुण (धूसर-लाल) और शूल (पीड़ा) सहित होता है; वह मज्जा आदि के समान गुणों को प्राप्त होता है और असाध्य है।

च. चि. ६/१३

। ॥ १३ ॥

स्वेद (पसीना), शरीर की गन्ध, अङ्गों का शिथिल (ढीला) होना, और बिस्तर, आसन और नींद के सुख में रुचि, हृदय, नेत्र, जीभ और कानों पर उपदेह (लेप-सा जमना), अङ्गों का घन (ठोस, भारी) होना, बालों और नाखूनों का बहुत बढ़ना

च. चि. ६/१४

। ॥ १४ ॥

शीत (ठंडी वस्तुओं) का प्रिय लगना, गले और तालु का सूखना, मुख में मिठास, हाथों और पैरों में जलन, (ये) होने वाले मेह-रोग का रूप (पूर्वरूप) हैं; और मूत्र पर चींटियाँ दौड़ी आती हैं।

च. चि. ६/१५

। ॥ १५ ॥

यहाँ (प्रमेहियों में) एक प्रमेही स्थूल (मोटा) और बलवान् होता है, तथा एक कृश (दुबला) और अत्यन्त दुर्बल। उनमें कृश (रोगी) का संबृंहण (पोषण देकर बल बढ़ाना) करना चाहिए, और दोषों तथा बल की अधिकता वाले (रोगी) का संशोधन (शरीर की शुद्धि)।

च. चि. ६/१६

। ॥ १६ ॥

स्निग्ध (स्नेहन किए हुए) (रोगी) के लिए मलों के शोधन हेतु कल्प (कल्पस्थान) में बताए गए विविध योगों का प्रयोग करना चाहिए। ऊपर (के मार्ग से) तथा नीचे (के मार्ग से) मल निकाल दिए जाने पर, मेहों में संतर्पण ही करना चाहिए।

च. चि. ६/१७

। , ॥ १७ ॥

अपतर्पण से प्रमेही को गुल्म, क्षय, मेहन (लिङ्ग) और बस्ति (मूत्राशय) में शूल, और मूत्रग्रह (मूत्र का रुकना) भी हो सकते हैं; (इसलिए) उसकी अग्नि (पाचन-शक्ति) को भली-भाँति परखकर उसके लिए परितर्पण (पोषण देने वाले उपचार) करने चाहिए।

च. चि. ६/१८

। ॥ १८ ॥

जो प्रमेही संशोधन के योग्य नहीं है, उसके लिए संशमनी (दोषों को शान्त करने वाली) चिकित्सा का प्रयोग करना चाहिए। प्रमेह की शान्ति के लिए मन्थ, कषाय (काढ़े), यव (जौ) के चूर्ण के लेह (चाटने की औषधियाँ), और हल्के भक्ष्य (खाने के पदार्थ) (दिए जाएँ)।

च. चि. ६/१९

। ॥ १९ ॥

जो विष्किर और जो प्रतुद पक्षी हैं, उनके जाङ्गल (सूखे प्रदेश) में उत्पन्न स्वादिष्ट (मांस-)रसों के साथ (प्रमेही) रूखा यवौदन (पके हुए जौ) अथवा वाट्य (भुने जौ का व्यंजन) खाए, और सक्तु (सत्तू) सहित अपूप (पूए) भी।

च. चि. ६/२०

। ॥ २० ॥

प्रमेही पुराने शालि (चावल) का ओदन (भात) मुद्ग (मूँग) आदि के यूषों के साथ अथवा तिक्त (कड़वे) शाकों के साथ ले, (जो) दन्ती और इङ्गुदी के तैल से युक्त हो, तथा अतसी (अलसी) और सर्षप (सरसों) के तैल से युक्त हो।

च. चि. ६/२१

। ॥ २१ ॥

(प्रमेही का) अन्न षष्टिक (साठी चावल) सहित तृणधान्य हो, परन्तु प्रमेही यव-प्रधान (जौ को मुख्य रखने वाला) हो। कफ-प्रमेही उसी प्रकार मधु मिलाए हुए यव (जौ) के विविध भक्ष्य खाए।

च. चि. ६/२२

। ॥ २२ ॥

रात भर त्रिफला के कषाय (काढ़े) में रखे हुए यवों (जौ) के क्षौद्र (मधु) मिले तर्पण (बनाए) जाएँ; प्रमेही मेह को नष्ट करने के लिए ही उन प्रायोगिक (नियमित प्रयोग वाले) (तर्पणों) को सीधु मिलाकर पिए।

च. चि. ६/२३

। ॥ २३ ॥

श्लेष्म-मेह (कफज प्रमेह) में जो कषाय बताए गए हैं, उनसे अलग-अलग भावित (भावना दिए हुए) यवों (जौ) के सक्तु (सत्तू) और अपूप (पूए), गुड़ सहित और धाना (भुने दानों) सहित, तथा अन्य विविध भक्ष्य भी (प्रमेही) खाए।

च. चि. ६/२४

। ॥ २४ ॥

इसी प्रकार गधे, घोड़े, गाय, हंस और पृषत् (चित्तीदार हिरन) को खिलाए गए यवों (जौ) के विविध भक्ष्य भी देने चाहिए; तथा यवों की विधि से (बनाए गए) वेणुयव (बाँस के बीज) और गोधूम (गेहूँ) से बने भक्ष्य भी (देने चाहिए)।

च. चि. ६/२५

। ॥ २५ ॥

उचित समय पर प्रयोग किए गए संशोधन, उल्लेखन (वमन) और लङ्घन कफ के प्रमेहों को जीत लेते हैं; पित्त से उत्पन्न (प्रमेहों) को विरेचन तथा संतर्पण और संशमन विधि (जीतते हैं)।

च. चि. ६/२६

। ॥ २६ ॥

प्रमेह का रोगी दार्वी (दारुहल्दी), सुराह्वा और मुस्ता (नागरमोथा) सहित त्रिफला का कषाय (काढ़ा) उबालकर पिए; अथवा क्षौद्र (मधु) मिली हुई हरिद्रा (हल्दी) को आमलकी (आँवले) के फलों के रस के साथ पिए।

च. चि. ६/२७

। ॥ २७ ॥

हरीतकी (हरड़), कट्फल (कायफल), मुस्त (नागरमोथा) और लोध्र (लोध); पाठा, विडङ्ग (वायविडंग), अर्जुन और धन्वन; दोनों हरिद्रा, तगर और विडङ्ग; तथा कदम्ब, शाल (साल), अर्जुन और दीप्यक

च. चि. ६/२८

। ॥ २८ ॥

दार्वी (दारुहल्दी), विडङ्ग (वायविडंग), खदिर (खैर) और धव; सुराह्व (देवदारु), कुष्ठ (कूठ), अगुरु (अगर) और चन्दन; दार्वी और अग्निमन्थ, पाठा सहित त्रिफला; तथा पाठा, मूर्वा और श्वदंष्ट्रा (गोखरू)

च. चि. ६/२९

। ॥ २९ ॥

यवानी (अजवायन), उशीर (खस), अभया (हरड़) और गुडूची (गिलोय); चव्य, अभया, चित्रक और सप्तपर्ण: कफ के मेह वाले रोगियों के लिए ये दस कषाय, मधु मिलाए हुए, (श्लोक के) पादों में (एक-एक करके) बताए गए हैं।

च. चि. ६/३०

। ॥ ३० ॥

उशीर (खस), लोध्र (लोध), अञ्जन और चन्दन के; उशीर, मुस्ता (नागरमोथा), आमलक (आँवला) और अभया (हरड़) के; पटोल (परवल), निम्ब (नीम), आमलक और अमृता (गिलोय) के; मुस्ता, अभया, पद्मक और वृक्षक के

च. चि. ६/३१

। ॥ ३१ ॥

लोध्र, अम्बु, कालीयक और धातकी के; निम्ब (नीम), अर्जुन, आम्रात, निशा (हल्दी) और उत्पल के; शिरीष (सिरस), सर्ज, अर्जुन और केशर के; प्रियङ्गु, पद्म (कमल), उत्पल और किंशुक (ढाक) के

च. चि. ६/३२

। ॥ ३२ ॥

अश्वत्थ (पीपल), पाठा, असन और वेतस के; कटङ्कटेरी, उत्पल और मुस्तक के: पित्त से होने वाले मेहों में (ये) दस कषाय, मधु मिलाए हुए, (श्लोक के) पादों में (एक-एक करके) बताए गए हैं।

च. चि. ६/३३

। ॥ ३३ ॥

पहले के दो कषाय-योग तो सभी मेहों में (उपयोगी) माने गए हैं; और (ऊपर) बताए गए सभी (कषाय) मन्थ के पीने में, यवों की भावना में, भोजन में, पीने की विधि में और अलग से भी (प्रयुक्त) हों।

च. चि. ६/३४

। ॥ ३४ ॥

वात-स्वरूप मेहों में सिद्ध (औषधों के साथ पकाए गए) तैल और घृत भी देने चाहिए। कषाय-योगों से उन (रोगियों) के मेद और कफ, और स्नेहों से वायु शान्त हो जाते हैं।

च. चि. ६/३५

। ॥ ३५ ॥

कफ और पित्त के मेह का रोगी कम्पिल्ल (कमीला), सप्तच्छद और शाल (साल) से उत्पन्न (फूलों), बिभीतक (बहेड़ा), रोहितक और कुटज के (फूलों), और कपित्थ (कैथ) के फूलों को चूर्ण करके क्षौद्र (मधु) के साथ चाटे।

च. चि. ६/३६

। ॥ ३६ ॥

और (इन्हीं को) कल्क बनाकर, अक्ष भर (की मात्रा) में, उचित समय पर आमलक (आँवले) के रस के साथ भी पिए। और (उसके) पच जाने पर मेह का रोगी जाङ्गल प्रदेश (के प्राणियों) से प्राप्त रुचिकर रसों (मांस-रसों) के साथ पुराना अन्न खाए।

च. चि. ६/३७

। ॥ ३७ ॥

पवन (वात) से कफ या पित्त का अनुबन्ध (जुड़ाव) देखकर स्नेह की विधि (उसी के अनुसार) चुननी चाहिए: कफ में अपने (कफ के) कषायों से सिद्ध तैल हो, और पित्त में पित्त को हरने वाले कषायों से (सिद्ध) घृत।

च. चि. ६/३८

। ॥ ३८ ॥

त्रिकण्टक (गोखरू), अश्मन्तक, सोमवल्क और भल्लातक (भिलावा) से, अतिविषा (अतीस) सहित और लोध्र (लोध) सहित, वचा (बच), पटोल (परवल), अर्जुन, निम्ब (नीम) और मुस्ता (नागरमोथा) से, हरिद्रा (हल्दी) से, और पद्मक तथा दीप्यक से

च. चि. ६/३९

। , , ॥ ३९ ॥

और मञ्जिष्ठा (मजीठ) से, तथा अगुरु (अगर) और चन्दन से, इन सबको एक साथ मिलाकर, कफ और वात से उत्पन्न मेहों में तैल पकाए, परन्तु पैत्तिक (पित्त से उत्पन्न मेहों) में घृत, और तीनों (दोषों के) लक्षण होने पर मिश्र (तैल और घृत मिलाकर)।

च. चि. ६/४०

। ॥ ४० ॥

फलत्रिक (त्रिफला), दारुनिशा (दारुहल्दी), विशाला और मुस्ता (नागरमोथा) का क्वाथ बनाकर, (उसमें) निशा (हल्दी) को कल्क के रूप में (मिलाकर), मधु मिलाए हुए उस कषाय को सब प्रमेहों के बहुत बढ़ जाने पर पिए।

च. चि. ६/४१

। ॥ ४१ ॥

लोध्र (लोध), शटी, पुष्करमूल, एला (इलायची), मूर्वा, विडङ्ग (वायविडंग), त्रिफला, यमानी (अजवायन), चव्य, प्रियङ्गु, क्रमुक, विशाला, किराततिक्त (चिरायता) और कटुरोहिणी (कुटकी)

च. चि. ६/४२

। ॥ ४२ ॥

भार्ङ्गी, नत, कुष्ठ (कूठ), अतिविषा (अतीस) और पाठा सहित चित्रक और पिप्पली का मूल, कलिङ्गक (इन्द्रजौ), केशर, इन्द्रसाह्वा, पत्र सहित नख, मरिच (काली मिर्च) और प्लव

च. चि. ६/४३

। ॥ ४३ ॥

(इन सबको) एक-एक कर्ष के बराबर लेकर एक द्रोण जल में पकाकर, छाने हुए रस में, जिसमें जल का चौथाई भाग शेष रहा हो, मधु का आधा भाग डालकर, (इसे) घृत के पात्र में रखकर एक पक्ष तक रख देना चाहिए।

च. चि. ६/४४

। ॥ ।

यह मध्वासव दो पल के प्रयोग से कफ और पित्त के मेहों को शीघ्र नष्ट कर देता है, (और) पाण्डु रोग, अर्श, अरुचि, ग्रहणी के दोष, किलास और अनेक प्रकार के कुष्ठ को भी। इस प्रकार मध्वासव (पूरा हुआ)।

च. चि. ६/४५

। ॥ ४५ ॥

क्वाथ वही (मध्वासव वाला) हो, और (उसमें) दन्ती का आठ पल और भल्लातकों (भिलावों) का चार पल हो; परन्तु विशेष यह है कि सितोपला (मिश्री) आठ पल हो, और क्षौद्र (मधु) भी उतना ही। वे दोनों अलग-अलग आसव हैं।

च. चि. ६/४६

। ॥ ४६ ॥

प्रमेह का रोगी सारोदक (वृक्षों के सार से बना जल), या फिर कुशोदक (कुश से बना जल), या मधूदक (मधु मिला जल), या त्रिफला का रस पिए; या वह निगद सीधु पिए, या बहुत समय तक रखा हुआ उत्तम माध्वीक।

च. चि. ६/४७

। ॥ ४७ ॥

(प्रमेह का रोगी) मृगों (जंगली पशुओं) और पक्षियों के शूल्य (सीख पर भुने हुए) मांस, और जौ के अनेक प्रकार के भक्ष्य (खाद्य पदार्थ) खाए। संतर्पण से उत्पन्न प्रमेहों को संशोधन, अरिष्ट, कषाय और लेह से शान्त करे।

च. चि. ६/४८

। ॥ ४८ ॥

भुने हुए यव (जौ) और सूखे सक्तु (सत्तू) नियमित प्रयोग से खाने वाले को मेह (प्रमेह) नहीं होते, और न श्वित्र, कृच्छ्र और कफ से उत्पन्न कुष्ठ (होते हैं); इसी प्रकार मूँग और आमलक (आँवला) के प्रयोगों (को खाने वाले को भी ये नहीं होते)।

च. चि. ६/४९

। ॥ ४९ ॥

संतर्पण (अधिक पोषण) से उत्पन्न रोगों में, और मेदस्वी (अधिक मेद वाले) लोगों के लिए, जो सिद्ध (परखे हुए) योग मैंने बताए हैं, वे विरूक्षण (शरीर को रूखा करने) के लिए कफ और पित्त से उत्पन्न प्रमेहों में भी प्रयोग किए जाने चाहिए।

च. चि. ६/५०

। ॥ ५० ॥

विविध व्यायामों के प्रयोग से, प्रगाढ (जोर देकर किए गए) उद्वर्तनों (उबटन मलने) से, स्नान और जल के अवसेक (शरीर पर जल डालने) से, और सेव्य (खस), त्वक् (दालचीनी), एला (इलायची), अगुरु और चन्दन आदि (द्रव्यों) के विलेपनों (लेपों) से मेह शीघ्र ही नहीं रहते।

च. चि. ६/५१

। ॥ ५१ ॥

बढ़ा हुआ क्लेद, मेद और कफ प्रमेह का कारण है; इसलिए (इसे) भली-भाँति देखकर वैद्य को कफ और पित्त से उत्पन्न मेहों में पहले अपतर्पण (शरीर को घटाने वाले उपाय) करने चाहिए।

च. चि. ६/५२

। ॥ ५२ ॥

वात के मेहों के लिए जो क्रिया (चिकित्सा) पहले कही गई है, वह वात की अधिकता वाले (रोगियों) के लिए विहित है। क्योंकि मेहों में अत्यधिक कृश (दुबले) हो गए (रोगियों) का वायु कुपित हो जाता है; असाध्य (मेहों) के प्रति कोई चिन्ता नहीं है।

च. चि. ६/५३

। ॥ ५३ ॥

जिन हेतुओं (कारणों) से जो मेह उत्पन्न होते हैं, उन प्रमेहों में वे (हेतु) सेवन नहीं किए जाने चाहिए। हेतु का सेवन न करना उसी प्रकार विहित है, जिस प्रकार उत्पन्न हुए रोग की चिकित्सा होती है।

च. चि. ६/५४

। ॥ ५४ ॥

जो (व्यक्ति) प्रमेह के पूर्वरूपों के बिना ही हल्दी के रंग का और रक्त जैसा लाल मूत्र त्यागे, उसे प्रमेह (का रोगी) न कहे; क्योंकि वह रक्त और पित्त का प्रकोप है।

च. चि. ६/५५

। ॥ ५५ ॥

मधुर, पिच्छा सहित (चिपचिपे) और मधु के समान प्रमेह (मूत्र) को देखकर दो प्रकार का विचार होना चाहिए: दोषों के क्षीण होने पर (वह) अनिलात्मक (वात-स्वभाव वाला) हो सकता है, या संतर्पण (अधिक पोषण) से (वह) कफ से उत्पन्न हो सकता है।

च. चि. ६/५६

। , , ॥ ५६ ॥

जो कफ और पित्त के मेह पूर्वरूपों सहित हों, और जो मेह क्रम से वात से उत्पन्न (हो गए) हों, वे साध्य नहीं हैं; पित्त से उत्पन्न (मेह) तो याप्य हैं; और यदि मेद दूषित न हुआ हो तो (मेह) साध्य हैं।

च. चि. ६/५७

। ॥ ५७ ॥

जो जन्म से ही प्रमेही हो, या मधुमेही (माता-पिता) से जन्मा हो, वह साध्य नहीं कहा गया है, क्योंकि वह (रोग) बीज के दोष से है। और जो कोई भी विकार कुलज (वंश में चले आने वाले) होते हैं, उन्हें भी (विद्वान्) असाध्य कहते हैं।

च. चि. ६/५८

। ॥ ५८ ॥

प्रमेह के रोगियों की जो सात पिडकाएँ (फोड़े) मैंने रोगों के प्रकरण में अलग से ही कही हैं, उनकी चिकित्सा कुशल शल्यविदों (शल्य-चिकित्सा जानने वालों) द्वारा शस्त्र से, और संशोधन तथा रोपण (के उपायों) से की जानी चाहिए।

च. चि. ६/५९

- । ॥‘

इस विषय में (सार के) श्लोक (हैं): मेहों (प्रमेहों) के हेतु (कारण), दोष, दूष्य और साध्यता के अनुरूप (उनका विभाग), दो प्रकार का मेही (प्रमेह का रोगी), तीन प्रकार की चिकित्सा, अति-क्षपण (अत्यधिक घटाने) का दोष; 'द्विविधं' (दो प्रकार का), यह योगीन्द्रनाथ सेन द्वारा स्वीकृत पाठ है।

च. चि. ६/६०

। ॥ ६० ॥

पहले, जौ के अन्न से बने पदार्थ, प्रमेहों को दूर करने वाले मन्थ और कषाय, तैल, घृत और लेह के योग, भक्ष्य (खाद्य पदार्थ), (और) सिद्ध (परखे हुए) उत्तम आसव

च. चि. ६/६१

। ॥ ६१ ॥

विविध व्यायाम-विधि, स्नान, उद्वर्तन (उबटन) और गन्ध (सुगन्धित द्रव्य): मेहों (प्रमेहों) को शान्त करने के लिए चिकित्सा (के इस अध्याय) में इतना बताया गया है।

च. चि. ६

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र (ग्रन्थ) के चिकित्सितस्थान (चिकित्सास्थान) में प्रमेहचिकित्सित (प्रमेह की चिकित्सा) नामक छठा अध्याय (पूरा हुआ)।