भूमिका
कुष्ठचिकित्सित चरक संहिता के चिकित्सास्थान का सातवाँ अध्याय है, और इसका नाम इसके विषय से बना है: कुष्ठ की चिकित्सा। अन्त के सार-श्लोक इसे 'कुष्ठनाशन' अध्याय भी कहते हैं। यहाँ कुष्ठ किसी एक रोग का नहीं, त्वचा के अनेक रोगों का सामूहिक नाम है, जिनके अठारह भेद गिनाए गए हैं; अध्याय के अन्तिम भाग में किलास भी आता है, त्वचा पर सफ़ेद दाग वाला रोग, जिसे यहाँ श्वित्र भी कहा गया है। उपदेश भगवान् आत्रेय का है: वे अपने शिष्य अग्निवेश को सम्बोधित करके स्पर्शन (स्पर्श की इन्द्रिय, त्वचा) को नष्ट करने वाले कुष्ठों के हेतु (कारण), द्रव्य, लिङ्ग (लक्षण), आश्रय और प्रशमन (शान्त करने के उपाय) भली-भाँति और विस्तार से सुनने को कहते हैं।
अध्याय पहले कारण गिनाता है। इनमें आहार की भूलें हैं: विरोधी अन्न-पान, पतले, चिकने और भारी पदार्थ, पहला भोजन पचे बिना फिर खाना, और नया अन्न, दही, मछली, अधिक नमक और खटाई, उड़द, मूली, पिसे अन्न से बने पदार्थ, तिल, दूध और गुड़ का लगातार सेवन। दिनचर्या की भूलें हैं: छर्दि (उल्टी) और दूसरे वेगों को रोकना, अधिक खाकर व्यायाम करना या तेज़ गर्मी में रहना, शीत, उष्ण, उपवास और भोजन का क्रम छोड़ देना, धूप, थकान या भय से बेहाल होते ही ठंडा जल लेना, पञ्चकर्म में अनुचित आचरण, भोजन पचने से पहले सहवास और दिन में सोना। और आचरण की भूलें हैं: विप्रों और गुरुओं का तिरस्कार और पाप कर्म। इनसे वात, पित्त और कफ, तीनों दोष दूषित होकर त्वचा, रक्त, मांस और अम्बु (शरीर के जलीय अंश) को दूषित करते हैं; ये सात ही कुष्ठों का 'द्रव्य-संग्रह' हैं। इसी से कुष्ठ सात और ग्यारह प्रकार के होते हैं, और अध्याय के अनुसार कोई भी कुष्ठ केवल एक दोष से नहीं होता। फिर वे लक्षण आते हैं जो रोग के पूरी तरह प्रकट होने से पहले दिखते हैं (अध्याय इन्हें 'अग्रज' कहता है): स्पर्श का ज्ञान न होना, बहुत पसीना आना या बिल्कुल न आना, त्वचा का रंग बदलना, चकत्ते उभरना, रोंगटे खड़े होना, खुजली, चुभन, थकान, घावों में अधिक पीड़ा, उनका जल्दी होना और देर तक बने रहना, जलन और अंगों का सुन्न होना।
इसके बाद अठारहों कुष्ठों के लक्षण एक-एक करके बताए गए हैं। सात महाकुष्ठ हैं: कापाल, औदुम्बर, मण्डल, ऋष्यजिह्व, पुण्डरीक, सिध्म और काकण। इनमें से कई के नाम उनके रूप से हैं: कपाल जैसा, उदुम्बर (गूलर) के फल जैसा, गोल मण्डलों (चकत्तों) वाला, ऋष्य मृग की जीभ जैसा, श्वेत कमल की पंखुड़ी जैसा; और काकण, जो तीनों दोषों के लक्षणों वाला है, कभी ठीक न होने वाला कहा गया है। ग्यारह क्षुद्रकुष्ठ हैं: एककुष्ठ, चर्माख्य, किटिम, वैपादिक, अलसक, दद्रु, चर्मदल, पामा, विस्फोट, शतारु और विचर्चिका। फिर अध्याय बताता है कि किस कुष्ठ में कौन-सा दोष प्रायः अधिक रहता है, पर साथ ही यह भी कि सब कुष्ठ त्रिदोषज हैं, इसलिए हर दोष के अपने लक्षणों से उनका बल-अबल जानकर चिकित्सा की जाती है। कुष्ठ में वात के लक्षण रूखापन, सूखना, चुभन, पीड़ा, सिकुड़न और खुरदरापन हैं; पित्त के जलन, लाली, रिसाव, पकना, कच्चे मांस जैसी गन्ध और अंगों का गिरना; और कफ के सफ़ेदी, ठण्डक, खुजली, स्थिरता, उभार, भारीपन और चिकनाई। अध्याय कहता है कि जो रोगी सब लक्षणों से युक्त, दुर्बल, प्यास और जलन से घिरा, बुझी हुई अग्नि वाला और कृमियों से खाया गया हो, उसे बुद्धिमान वैद्य छोड़ दे; और कफ-पित्त या वात-पित्त की प्रबलता वाले कुष्ठ कठिनाई से ठीक होने वाले बताए गए हैं।
चिकित्सा का पहला नियम यह है कि पहले उस दोष का शमन हो जिसका विशेष लक्षण सबसे उभरा हो, फिर उसके साथ जुड़े दोष का। अध्याय के अनुसार वात-प्रधान कुष्ठ में घी, कफ-प्रधान में वमन, और पित्त-प्रधान में रक्त निकालना और विरेचन उचित हैं; वमन और विरेचन के योग कल्प में कहे गए हैं, और छोटे कुष्ठ में प्रच्छन (छोटे चीरे) और बड़े में सिरा बेधकर रक्त निकालने को कहा गया है। बहुत दोषों वाले रोगी का शोधन बार-बार, उसके प्राणों की रक्षा करते हुए, करने को कहा गया है, क्योंकि दोष अधिक निकल जाने पर वायु दुर्बल रोगी को शीघ्र मार सकता है; और शोधन के बाद स्नेह पिलाने को। फिर बस्ति, नस्य और सिर के लिए धूम आते हैं; कठोर चकत्तों पर स्वेद देकर रगड़ना और खुरचना; सींग, तुम्बी या जोंक से रक्त निकालना; जहाँ शस्त्र काम न करे वहाँ क्षार; और बहुत पुराने, कठोर और सुन्न कुष्ठ पर, अगद (विषनाशक औषध) पिलाकर, विषों का लेप। इसके बाद ऐसे उपाय दिए गए हैं जो किसी एक दोष तक सीमित नहीं हैं, क्योंकि त्वचा के रोगों में बहुत कुछ समान है: मुस्तादि चूर्ण, मध्वासव, कनकबिन्दु अरिष्ट और त्रिफलासव जैसे योग; पथ्य में हल्का अन्न, कड़वे शाक, पुराना अनाज, जाङ्गल मांस और परवल के साथ मूँग, और जो हितकर नहीं हैं उनमें भारी और खट्टे पदार्थ, दूध, दही, आनूप मांस, मछली, गुड़ और तिल; अनेक लेप, स्नान और कषाय; श्वेतकरवीराद्य, तिक्तेक्ष्वाक्वादि और कनकक्षीरी जैसे तैल; और तिक्तषट्पलक, महातिक्तक और महाखदिर घृत। कृमि को नष्ट करने में विडङ्ग और कुष्ठ को नष्ट करने में खदिर सबसे बढ़कर कहे गए हैं। अध्याय के अनुसार दोष निकाल दिए जाएँ, रक्त निकाला जाए, बाहरी और भीतरी शमन हो और समय पर स्नेह दिया जाए, तो साध्य कुष्ठ बना नहीं रहता।
अन्तिम भाग श्वित्र, यानी किलास, का है। उसके लिए गुड़ के साथ मलपू के रस से विरेचन कहा गया है, जिसके बाद रोगी धूप ले, उठे फफोलों को काँटे से फोड़ा जाए और एक पक्ष तक सुबह काढ़ा या क्षार पिया जाए; फिर कुष्ठ के सब उपाय, खदिर के जल के साथ, और अनेक लेप। किलास के तीन नाम बताए गए हैं, दारुण, चारुण और श्वित्र, और वह प्रायः त्रिदोषज कहा गया है। दोष रक्त में आश्रित हो तो वह लाल, मांस में ताँबे के रंग का और मेद में सफ़ेद होता है, और इसी क्रम में अधिक कठिन। जो आपस में मिल गया हो, बहुत हो, जिसके रोम लाल हों और जो बरसों पुराना हो, वह ठीक नहीं होता; जिसके रोम लाल न हों, जो पतला, पाण्डु रंग का और बहुत पुराना न हो, वह साध्य है। इसके हेतु असत्य वचन, कृतघ्नता, देवताओं की निन्दा, गुरुओं का तिरस्कार, पाप-कर्म, पहले किए कर्म और विरोधी अन्न बताए गए हैं, और अध्याय कहता है कि शोधन, रक्त निकालने, रूखा करने और सत्तू खाने से भी किसी-किसी ऐसे रोगी का ही श्वित्र जाता है जिसके पाप क्षीण हो चुके हों। सार के श्लोक, जो महर्षि ने शिष्य हुताशवेश (अग्निवेश) की स्मृति और बुद्धि बढ़ाने के लिए कहे, अध्याय के विषय दोहराते हैं, और पुष्पिका के साथ अध्याय पूरा होता है। इस अध्याय से साथ ले जाने योग्य बातें ये हैं: चरक संहिता कुष्ठ को तीनों दोषों और त्वचा, रक्त, मांस और अम्बु के दूषित होने से जोड़ती है; उसकी चिकित्सा प्रबल दोष से आरम्भ होकर शोधन, रक्त निकालने और भीतरी तथा बाहरी उपायों तक जाती है, और शोधन में रोगी के बल की रक्षा पर ज़ोर देती है; और कुष्ठ और किलास, दोनों के कारणों में आहार के साथ आचरण भी गिना गया है।