भारत संहिता

अध्याय ७

कुष्ठचिकित्सितम्

कुष्ठ की चिकित्सा

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भूमिका

कुष्ठचिकित्सित चरक संहिता के चिकित्सास्थान का सातवाँ अध्याय है, और इसका नाम इसके विषय से बना है: कुष्ठ की चिकित्सा। अन्त के सार-श्लोक इसे 'कुष्ठनाशन' अध्याय भी कहते हैं। यहाँ कुष्ठ किसी एक रोग का नहीं, त्वचा के अनेक रोगों का सामूहिक नाम है, जिनके अठारह भेद गिनाए गए हैं; अध्याय के अन्तिम भाग में किलास भी आता है, त्वचा पर सफ़ेद दाग वाला रोग, जिसे यहाँ श्वित्र भी कहा गया है। उपदेश भगवान् आत्रेय का है: वे अपने शिष्य अग्निवेश को सम्बोधित करके स्पर्शन (स्पर्श की इन्द्रिय, त्वचा) को नष्ट करने वाले कुष्ठों के हेतु (कारण), द्रव्य, लिङ्ग (लक्षण), आश्रय और प्रशमन (शान्त करने के उपाय) भली-भाँति और विस्तार से सुनने को कहते हैं।

अध्याय पहले कारण गिनाता है। इनमें आहार की भूलें हैं: विरोधी अन्न-पान, पतले, चिकने और भारी पदार्थ, पहला भोजन पचे बिना फिर खाना, और नया अन्न, दही, मछली, अधिक नमक और खटाई, उड़द, मूली, पिसे अन्न से बने पदार्थ, तिल, दूध और गुड़ का लगातार सेवन। दिनचर्या की भूलें हैं: छर्दि (उल्टी) और दूसरे वेगों को रोकना, अधिक खाकर व्यायाम करना या तेज़ गर्मी में रहना, शीत, उष्ण, उपवास और भोजन का क्रम छोड़ देना, धूप, थकान या भय से बेहाल होते ही ठंडा जल लेना, पञ्चकर्म में अनुचित आचरण, भोजन पचने से पहले सहवास और दिन में सोना। और आचरण की भूलें हैं: विप्रों और गुरुओं का तिरस्कार और पाप कर्म। इनसे वात, पित्त और कफ, तीनों दोष दूषित होकर त्वचा, रक्त, मांस और अम्बु (शरीर के जलीय अंश) को दूषित करते हैं; ये सात ही कुष्ठों का 'द्रव्य-संग्रह' हैं। इसी से कुष्ठ सात और ग्यारह प्रकार के होते हैं, और अध्याय के अनुसार कोई भी कुष्ठ केवल एक दोष से नहीं होता। फिर वे लक्षण आते हैं जो रोग के पूरी तरह प्रकट होने से पहले दिखते हैं (अध्याय इन्हें 'अग्रज' कहता है): स्पर्श का ज्ञान न होना, बहुत पसीना आना या बिल्कुल न आना, त्वचा का रंग बदलना, चकत्ते उभरना, रोंगटे खड़े होना, खुजली, चुभन, थकान, घावों में अधिक पीड़ा, उनका जल्दी होना और देर तक बने रहना, जलन और अंगों का सुन्न होना।

इसके बाद अठारहों कुष्ठों के लक्षण एक-एक करके बताए गए हैं। सात महाकुष्ठ हैं: कापाल, औदुम्बर, मण्डल, ऋष्यजिह्व, पुण्डरीक, सिध्म और काकण। इनमें से कई के नाम उनके रूप से हैं: कपाल जैसा, उदुम्बर (गूलर) के फल जैसा, गोल मण्डलों (चकत्तों) वाला, ऋष्य मृग की जीभ जैसा, श्वेत कमल की पंखुड़ी जैसा; और काकण, जो तीनों दोषों के लक्षणों वाला है, कभी ठीक न होने वाला कहा गया है। ग्यारह क्षुद्रकुष्ठ हैं: एककुष्ठ, चर्माख्य, किटिम, वैपादिक, अलसक, दद्रु, चर्मदल, पामा, विस्फोट, शतारु और विचर्चिका। फिर अध्याय बताता है कि किस कुष्ठ में कौन-सा दोष प्रायः अधिक रहता है, पर साथ ही यह भी कि सब कुष्ठ त्रिदोषज हैं, इसलिए हर दोष के अपने लक्षणों से उनका बल-अबल जानकर चिकित्सा की जाती है। कुष्ठ में वात के लक्षण रूखापन, सूखना, चुभन, पीड़ा, सिकुड़न और खुरदरापन हैं; पित्त के जलन, लाली, रिसाव, पकना, कच्चे मांस जैसी गन्ध और अंगों का गिरना; और कफ के सफ़ेदी, ठण्डक, खुजली, स्थिरता, उभार, भारीपन और चिकनाई। अध्याय कहता है कि जो रोगी सब लक्षणों से युक्त, दुर्बल, प्यास और जलन से घिरा, बुझी हुई अग्नि वाला और कृमियों से खाया गया हो, उसे बुद्धिमान वैद्य छोड़ दे; और कफ-पित्त या वात-पित्त की प्रबलता वाले कुष्ठ कठिनाई से ठीक होने वाले बताए गए हैं।

चिकित्सा का पहला नियम यह है कि पहले उस दोष का शमन हो जिसका विशेष लक्षण सबसे उभरा हो, फिर उसके साथ जुड़े दोष का। अध्याय के अनुसार वात-प्रधान कुष्ठ में घी, कफ-प्रधान में वमन, और पित्त-प्रधान में रक्त निकालना और विरेचन उचित हैं; वमन और विरेचन के योग कल्प में कहे गए हैं, और छोटे कुष्ठ में प्रच्छन (छोटे चीरे) और बड़े में सिरा बेधकर रक्त निकालने को कहा गया है। बहुत दोषों वाले रोगी का शोधन बार-बार, उसके प्राणों की रक्षा करते हुए, करने को कहा गया है, क्योंकि दोष अधिक निकल जाने पर वायु दुर्बल रोगी को शीघ्र मार सकता है; और शोधन के बाद स्नेह पिलाने को। फिर बस्ति, नस्य और सिर के लिए धूम आते हैं; कठोर चकत्तों पर स्वेद देकर रगड़ना और खुरचना; सींग, तुम्बी या जोंक से रक्त निकालना; जहाँ शस्त्र काम न करे वहाँ क्षार; और बहुत पुराने, कठोर और सुन्न कुष्ठ पर, अगद (विषनाशक औषध) पिलाकर, विषों का लेप। इसके बाद ऐसे उपाय दिए गए हैं जो किसी एक दोष तक सीमित नहीं हैं, क्योंकि त्वचा के रोगों में बहुत कुछ समान है: मुस्तादि चूर्ण, मध्वासव, कनकबिन्दु अरिष्ट और त्रिफलासव जैसे योग; पथ्य में हल्का अन्न, कड़वे शाक, पुराना अनाज, जाङ्गल मांस और परवल के साथ मूँग, और जो हितकर नहीं हैं उनमें भारी और खट्टे पदार्थ, दूध, दही, आनूप मांस, मछली, गुड़ और तिल; अनेक लेप, स्नान और कषाय; श्वेतकरवीराद्य, तिक्तेक्ष्वाक्वादि और कनकक्षीरी जैसे तैल; और तिक्तषट्पलक, महातिक्तक और महाखदिर घृत। कृमि को नष्ट करने में विडङ्ग और कुष्ठ को नष्ट करने में खदिर सबसे बढ़कर कहे गए हैं। अध्याय के अनुसार दोष निकाल दिए जाएँ, रक्त निकाला जाए, बाहरी और भीतरी शमन हो और समय पर स्नेह दिया जाए, तो साध्य कुष्ठ बना नहीं रहता।

अन्तिम भाग श्वित्र, यानी किलास, का है। उसके लिए गुड़ के साथ मलपू के रस से विरेचन कहा गया है, जिसके बाद रोगी धूप ले, उठे फफोलों को काँटे से फोड़ा जाए और एक पक्ष तक सुबह काढ़ा या क्षार पिया जाए; फिर कुष्ठ के सब उपाय, खदिर के जल के साथ, और अनेक लेप। किलास के तीन नाम बताए गए हैं, दारुण, चारुण और श्वित्र, और वह प्रायः त्रिदोषज कहा गया है। दोष रक्त में आश्रित हो तो वह लाल, मांस में ताँबे के रंग का और मेद में सफ़ेद होता है, और इसी क्रम में अधिक कठिन। जो आपस में मिल गया हो, बहुत हो, जिसके रोम लाल हों और जो बरसों पुराना हो, वह ठीक नहीं होता; जिसके रोम लाल न हों, जो पतला, पाण्डु रंग का और बहुत पुराना न हो, वह साध्य है। इसके हेतु असत्य वचन, कृतघ्नता, देवताओं की निन्दा, गुरुओं का तिरस्कार, पाप-कर्म, पहले किए कर्म और विरोधी अन्न बताए गए हैं, और अध्याय कहता है कि शोधन, रक्त निकालने, रूखा करने और सत्तू खाने से भी किसी-किसी ऐसे रोगी का ही श्वित्र जाता है जिसके पाप क्षीण हो चुके हों। सार के श्लोक, जो महर्षि ने शिष्य हुताशवेश (अग्निवेश) की स्मृति और बुद्धि बढ़ाने के लिए कहे, अध्याय के विषय दोहराते हैं, और पुष्पिका के साथ अध्याय पूरा होता है। इस अध्याय से साथ ले जाने योग्य बातें ये हैं: चरक संहिता कुष्ठ को तीनों दोषों और त्वचा, रक्त, मांस और अम्बु के दूषित होने से जोड़ती है; उसकी चिकित्सा प्रबल दोष से आरम्भ होकर शोधन, रक्त निकालने और भीतरी तथा बाहरी उपायों तक जाती है, और शोधन में रोगी के बल की रक्षा पर ज़ोर देती है; और कुष्ठ और किलास, दोनों के कारणों में आहार के साथ आचरण भी गिना गया है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक १७८-१८०)

तत्र श्लोकाः-हेतुर्द्रव्यं लिङ्गं विविधं ये येषु चाधिका दोषाः।कुष्ठेषु दोषलिङ्गं समासतो दोषनिर्देशः॥

श्लोक १७८ →

इस विषय में (सार के) श्लोक (हैं): (कुष्ठों के) हेतु, द्रव्य, अनेक प्रकार के लिङ्ग (लक्षण), कौन-से दोष किन (कुष्ठों) में अधिक होते हैं, कुष्ठों में दोषों के लक्षण, संक्षेप में दोषों का निर्देश,

साध्यमसाध्यं कृच्छ्रं कुष्ठं कुष्ठापहाश्च ये योगाः।सिद्धाः किलासहेतुर्लिङ्गं गुरुलाघवं तथा शान्तिः॥

श्लोक १७९ →

साध्य, असाध्य और कृच्छ्र (कठिनाई से ठीक होने वाला) कुष्ठ, और कुष्ठ को दूर करने वाले जो सिद्ध (परखे हुए) योग (हैं), किलास का हेतु, (उसके) लक्षण, (उसकी) गुरुता और लघुता, तथा (उसकी) शान्ति (चिकित्सा),

इति संग्रहः प्रणीतो महर्षिणा कुष्ठनाशनेऽध्याये।स्मृतिबुद्धिवर्धनार्थं शिष्याय हुताशवेशाय॥

श्लोक १८० →

इस प्रकार स्मृति और बुद्धि बढ़ाने के लिए, शिष्य हुताशवेश (अग्निवेश) के लिए, महर्षि द्वारा कुष्ठनाशन (कुष्ठ को नष्ट करने वाले) अध्याय में (यह) संग्रह रचा गया।

मुख्य शब्द (२२) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. चि. ७/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम कुष्ठचिकित्सित (कुष्ठ की चिकित्सा के अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. चि. ७/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. चि. ७/३

।! ॥ ३ ॥

हे अग्निवेश! स्पर्शन (स्पर्श की इन्द्रिय, त्वचा) को नष्ट करने वाले कुष्ठों के हेतु (कारण), द्रव्य, लिङ्ग (लक्षण), आश्रय और प्रशमन (रोग को शान्त करने के उपाय) को भली-भाँति और विशेष रूप से सुनो।

च. चि. ७/४

। ॥ ४ ॥

विरोधी अन्न-पान का तथा द्रव (पतले), स्निग्ध (चिकने) और गुरु (भारी) (पदार्थों) का सेवन करने वालों के, और आई हुई छर्दि (उल्टी) को तथा अन्य वेगों को रोकने वालों के,

च. चि. ७/५

। ॥ ५ ॥

अधिक भोजन करके व्यायाम का और अत्यधिक संताप (गर्मी) का सेवन करने वालों के, और शीत, उष्ण, लङ्घन (उपवास) तथा आहार का क्रम छोड़कर सेवन करने वालों के,

च. चि. ७/६

। ॥ ६ ॥

घर्म (धूप की गर्मी), श्रम (थकान) और भय से पीड़ित होकर तुरन्त ठंडे जल का सेवन करने वालों के, अजीर्ण (अपच) रहते हुए अध्यशन करने (पहला भोजन पचे बिना फिर खाने) वालों के, और पञ्चकर्म में अपचार (अनुचित आचरण) करने वालों के,

च. चि. ७/७

।॥ ७ ॥

नया अन्न, दधि (दही), मत्स्य (मछली), अधिक लवण (नमक) और अम्ल (खट्टे पदार्थों) का सेवन करने वालों के, और माष (उड़द), मूलक (मूली), पिष्टान्न (पिसे अन्न से बने पदार्थ), तिल, क्षीर (दूध) और गुड़ खाने वालों के,

च. चि. ७/८

। ॥ ८ ॥

अन्न न पचने पर भी व्यवाय (मैथुन) करने वालों के और दिन में सोने वालों के, विप्रों (ब्राह्मणों) और गुरुओं का तिरस्कार करने वालों के, और पाप कर्म करने वालों के,

च. चि. ७/९

। ॥ ९ ॥

(ऐसे लोगों के) वात आदि तीनों (दोष) दूषित होकर त्वचा, रक्त, मांस और अम्बु (शरीर के जलीय अंश) को दूषित करते हैं। यह कुष्ठों का सात (द्रव्यों) वाला द्रव्य-संग्रह है।

च. चि. ७/१०

। ॥ १० ॥

इसलिए कुष्ठ सात और ग्यारह ही (प्रकार के) उत्पन्न होते हैं। और केवल एक दोष से उत्पन्न कोई भी कुष्ठ नहीं पाया जाता।

च. चि. ७/११

। ॥ ११ ॥

स्पर्श का ज्ञान न होना, अति स्वेद (बहुत पसीना) आना या न आना, वैवर्ण्य (त्वचा का रंग बदलना), कोठों (त्वचा पर चकत्तों) का उभरना, लोमहर्ष (रोंगटे खड़े होना), कण्डू (खुजली), तोद (चुभन जैसी पीड़ा), श्रम (थकान), क्लम (शिथिलता),

च. चि. ७/१२

। ॥ १२ ॥

व्रणों (घावों) में अधिक शूल (पीड़ा), (उनका) शीघ्र उत्पन्न होना और देर तक बने रहना, दाह (जलन) और अंगों का सुप्त (सुन्न) होना, ये कुष्ठ के अग्रज (पहले प्रकट होने वाले) लक्षण हैं।

च. चि. ७/१३

॥ १३ ॥

इसके बाद हम कपाल, उदुम्बर, मण्डल, ऋष्यजिह्व, पुण्डरीक, सिध्म, काकणक, एककुष्ठ, चर्माख्य, किटिम, विपादिका, अलसक, दद्रु, चर्मदल, पामा, विस्कोटक, शतारु और विचर्चिका, इन अठारह कुष्ठों के लक्षण बताएँगे।

च. चि. ७/१४

। ॥ १४ ॥

जो (कुष्ठ) काले और अरुण (लाल) रंग के कपाल (ठीकरे) जैसा दिखता है, और रूखा, परुष (खुरदरा) तथा तनु (पतला) होता है, वह तोद (चुभन जैसी पीड़ा) से भरा और विषम कुष्ठ कापाल माना गया है।

च. चि. ७/१५

। ॥ १५ ॥

जो दाह (जलन), कण्डू (खुजली), रुजा (पीड़ा) और राग (लालिमा) से युक्त हो, जिसके रोम पिञ्जर (लाल-पीले) हों, और जो उदुम्बर (गूलर) के फल जैसा दिखे, उस कुष्ठ को (विद्वान्) औदुम्बर जानते हैं।

च. चि. ७/१६

। ॥ १६ ॥

जो कुष्ठ श्वेत (सफ़ेद) और रक्त (लाल) हो, स्थिर हो, स्त्यान (गाढ़ा, जमा हुआ) और स्निग्ध (चिकना) हो, जिसके मण्डल (गोल चकत्ते) उभरे हुए हों, जो कृच्छ्र (कठिनाई से ठीक होने वाला) हो और (जिसके मण्डल) एक-दूसरे से जुड़े हुए हों, वह कुष्ठ मण्डल कहलाता है।

च. चि. ७/१७

। ॥ १७ ॥

जो (कुष्ठ) कर्कश (खुरदरा) हो, जिसके किनारे लाल और भीतरी भाग श्याव (कालापन लिए भूरा) हो, जो वेदना (पीड़ा) सहित हो और जिसकी आकृति ऋष्य (एक प्रकार के मृग) की जीभ जैसी हो, वह ऋष्यजिह्व कहलाता है।

च. चि. ७/१८

। ॥ १८ ॥

जो (कुष्ठ) सफ़ेदी लिए हुए हो, जिसके किनारे लाल हों, जो पुण्डरीक (श्वेत कमल) की पंखुड़ी के समान हो, और उभार वाला और दाह (जलन) वाला हो, वह पुण्डरीक कहलाता है।

च. चि. ७/१९

। ॥ १९ ॥

जो (कुष्ठ) श्वेत (सफ़ेद) और ताम्र (ताँबे के रंग का) हो, पतला हो, और रगड़ने पर रज (धूल जैसा चूर्ण) छोड़ता हो, (तथा) जिसका रंग अलाबू (लौकी) के फूल जैसा हो, वह सिध्म है; और (यह) प्रायः छाती पर (होता है)।

च. चि. ७/२०

। ॥ ।

जो (कुष्ठ) काकणन्तिका (गुंजा) के (बीज के) रंग का हो, पकता न हो, तीव्र वेदना (पीड़ा) वाला हो और जिसमें तीनों दोषों के लक्षण हों, वह काकण कुष्ठ है; वह ठीक होता ही नहीं। इस प्रकार (ये) सात महाकुष्ठ (हुए)।

च. चि. ७/२१

।, ॥ २१ ॥

जिसमें पसीना न आता हो, जो बड़े क्षेत्र में फैला हो और जो मछली के शल्कों (छिलकों) जैसा हो, वह एककुष्ठ है; चर्माख्य (कुष्ठ) हाथी की चमड़ी की तरह मोटा होता है।

च. चि. ७/२२

। ॥ २२ ॥

जो (कुष्ठ) श्याव (कालापन लिए भूरा) हो, छूने में किण (घट्ठे) जैसा खुरदरा हो और परुष (कठोर, रूखा) हो, वह किटिम माना गया है। वैपादिक (में) हाथों और पैरों (की त्वचा) फटती है (और) तीव्र वेदना (पीड़ा) होती है।

च. चि. ७/२३

। ॥ २३ ॥

अलसक (कुष्ठ) खुजली वाले और लालिमा वाले गण्डों (गाँठ जैसे उभारों) से भरा होता है। दद्रु का मण्डल (गोल चकत्ता) खुजली, लालिमा और पिडकाओं (फुंसियों) सहित (और) उभरा हुआ होता है।

च. चि. ७/२४

। ॥ २४ ॥

जो (कुष्ठ) लाल हो, खुजली सहित और स्फोटों (फफोलों) सहित हो, पीड़ा सहित हो और फटता भी हो, वह चर्मदल कहा गया है; वह स्पर्श को सहन न करने वाला कहा जाता है।

च. चि. ७/२५

। ॥ २५ ॥

सफ़ेद, अरुण (लाल) और श्याव (कालापन लिए भूरे) रंग की, बहुत खुजली वाली पिडकाएँ (फुंसियाँ) पामा (कहलाती) हैं। सफ़ेद-लाल आभा वाले और पतली त्वचा वाले स्फोट (फफोले) विस्फोट होते हैं।

च. चि. ७/२६

। ॥ ।

जो (कुष्ठ) लाल और श्याव (कालापन लिए भूरा) हो, दाह (जलन) और पीड़ा सहित हो, और जिसमें बहुत से व्रण (घाव) हों, वह शतारु होता है। खुजली सहित, श्याव (रंग की) और बहुत स्राव (रिसाव) वाली पिडका (फुंसी) विचर्चिका (कहलाती) है। इस प्रकार (ये) ग्यारह क्षुद्रकुष्ठ (हुए)।

च. चि. ७/२७

। ॥ २७ ॥

वात के अधिक होने पर कापाल कुष्ठ, कफ के (अधिक होने) पर मण्डल, और पित्त के (अधिक होने) पर औदुम्बर (कुष्ठ) जाने; परन्तु काकण को त्रिदोषज (तीनों दोषों से उत्पन्न) (जाने)।

च. चि. ७/२८

। ॥ २८ ॥

वात-पित्त, श्लेष्म-पित्त (कफ-पित्त) और वात-श्लेष्म (वात-कफ) के अधिक होने पर (क्रमशः) ऋष्यजिह्व, पुण्डरीक और सिध्म कुष्ठ उत्पन्न होता है।

च. चि. ७/२९

। ॥ २९ ॥

चर्माख्य और एककुष्ठ, विपादिका सहित किटिम, और अलसक कुष्ठ को प्रायः वात और कफ की अधिकता वाला जानना चाहिए।

च. चि. ७/३०

। ॥ ३० ॥

पामा, शतारु, विस्फोट, दद्रु तथा चर्मदल प्रायः पित्त और श्लेष्मा (कफ) की अधिकता वाले होते हैं; विचर्चिका प्रायः कफ-प्रधान होती है।

च. चि. ७/३१

। ॥ ३१ ॥

सभी कुष्ठ त्रिदोषज (तीनों दोषों से उत्पन्न) होते हैं; परन्तु दोषों के बल-अबल (किसका बल अधिक और किसका कम है) को उनके अपने-अपने लक्षणों से जानकर कुष्ठों की चिकित्सा की जाती है।

च. चि. ७/३२

। ॥ ३२ ॥

कुष्ठों में (वैद्य) जिस दोष का विशेष लक्षण उभरा हुआ देखे, (पहले) उसी का शमन करे, और उसके बाद अनुबन्ध (साथ जुड़े गौण दोष) का।

च. चि. ७/३३

। ॥ ३३ ॥

कुष्ठों की विशेषताओं से दोष जाने जाते हैं, और फिर दोषों की विशेषताओं से कुष्ठ (जाने जाते हैं); उनसे हेतु (जाना जाता है), और हेतु उन्हें प्रकट करता है।

च. चि. ७/३४

। ॥ ३४ ॥

रूखापन, सूखना, तोद (सुई चुभने जैसी पीड़ा), शूल, सिकुड़न तथा आयाम (खिंचाव), कठोरता, खुरदरापन, हर्ष (रोमांच) और (त्वचा का) श्याव-अरुण (कालापन लिए भूरा और लाल) होना

च. चि. ७/३५

, । ॥ ३५ ॥

(ये) कुष्ठों में वात के लक्षण (हैं)। दाह (जलन), राग (लाली), परिस्रव (रिसाव), पाक (पकना), विस्र (कच्चे मांस जैसी) गन्ध, क्लेद (गीलापन) तथा अंगों का गिरना, (ये) पित्त से उत्पन्न (लक्षण) हैं।

च. चि. ७/३६

। ॥ ३६ ॥

सफेदी, ठण्डक, खुजली, स्थिरता, और उभार, भारीपन तथा चिकनाई, कृमियों द्वारा खाया जाना (और) क्लेद (गीलापन), (ये) तो कुष्ठों में कफ के लक्षण (हैं)।

च. चि. ७/३७

। ॥ ३७ ॥

सब लक्षणों से युक्त, दुर्बल, तृष्णा (प्यास) और दाह (जलन) से घिरे हुए, शान्त (बुझी हुई) अग्नि वाले और कृमियों द्वारा खाए गए (कुष्ठ रोगी) को बुद्धिमान (वैद्य) छोड़ दे।

च. चि. ७/३८

। ॥ ३८ ॥

जो (कुष्ठ) वात और कफ की प्रबलता वाला है, और जो एक ही दोष की अधिकता वाला है, वह कृच्छ्र (कठिन) नहीं है; परन्तु कफ-पित्त और वात-पित्त की प्रबलता वाले (कुष्ठ) कृच्छ्रसाध्य (कठिनाई से ठीक होने वाले) हैं।

च. चि. ७/३९

। ॥ ३९ ॥

वात-प्रधान कुष्ठों में सर्पि (घी), श्लेष्मा (कफ) प्रधान कुष्ठों में वमन, और पित्त-प्रधान (कुष्ठों) में पहले रक्त का मोक्षण (निकालना) और विरेचन (उचित हैं)।

च. चि. ७/४०

। ॥ ४० ॥

कल्प (स्थान) में कहे गए वमन और विरेचन के योग कुष्ठ रोगियों के लिए प्रयोग किए जाने चाहिए। छोटे कुष्ठ में प्रच्छन (छोटे चीरे लगाकर रक्त निकालना) और बड़े (कुष्ठ) में सिराव्यधन (शिरा बेधकर रक्त निकालना) प्रशस्त है।

च. चि. ७/४१

। ॥ ४१ ॥

बहुत दोषों वाले कुष्ठ रोगी का, (उसके) प्राणों की रक्षा करते हुए, बार-बार संशोधन करना चाहिए; क्योंकि दोष के अत्यधिक मात्रा में निकाल दिए जाने पर वायु दुर्बल (रोगी) को शीघ्र मार सकता है।

च. चि. ७/४२

। ॥ ४२ ॥

कोष्ठ के शुद्ध हो जाने और रक्त के बहा दिए जाने पर स्नेह का पान इष्ट (उचित) है; क्योंकि वायु शुद्ध कोष्ठ वाले दुर्बल कुष्ठ रोगी में शीघ्र प्रवेश करता है।

च. चि. ७/४३

। ॥ ४३ ॥

हृदय के दोषों से उत्क्लिष्ट होने पर (जब दोष उभरकर बाहर आने को हों), और ऊपरी भागों के कुष्ठों में, (रोगी को) पटोल (परवल) सहित और निम्ब (नीम) के रस से युक्त कुटज के फल, मदन (मैनफल) और मधुक से वमन कराना चाहिए।

च. चि. ७/४४

। ॥ ४४ ॥

शीतरस (ठण्डा रस), पक्वरस (पकाया हुआ रस), मधु (शहद) और मधुक वमन (कराने वाले) हैं। कुष्ठों में विरेचन के लिए त्रिवृत् (निशोथ), दन्ती और त्रिफला प्रशस्त हैं।

च. चि. ७/४५

। ॥ ४५ ॥

अधोहर (विरेचन की) औषधों को घोलने (आलोडन) के लिए (वैद्य) सौवीरक, तुषोदक, आसव और सीधु की प्रशंसा करते हैं; और विरेचन के अनुसार (आगे का) क्रम इष्ट है।

च. चि. ७/४६

। ॥ ४६ ॥

दार्वी (दारुहल्दी), बृहती (बड़ी कटेरी), सेव्य (खस), पटोल (परवल), पिचुमर्द (नीम), मदन (मैनफल) और कृतमाल (अमलतास) से, कलिङ्गयव और मुस्ता (नागरमोथा) सहित तथा स्नेह मिलाकर, कुष्ठ के रोगी को आस्थापन (बस्ति) देनी चाहिए।

च. चि. ७/४७

। ॥ ४७ ॥

यह देखकर कि (रोगी में) वात उल्बण (प्रबल) है, उसका विरेचन और निरूह हो चुका है और वह अनुवासन के योग्य है, फल (मदनफल), मधुक, निम्ब और कुटज से, पटोल सहित, स्नेह सिद्ध करे (पकाए)।

च. चि. ७/४८

। ॥ ४८ ॥

सैन्धव (सेंधा नमक), दन्ती, मरिच (काली मिर्च), फणिज्झक, पिप्पली और करञ्ज का फल, विडङ्ग सहित, (इनका) नस्य कृमि, कुष्ठ और कफ के प्रकोप को नष्ट करने वाला होगा।

च. चि. ७/४९

। ॥ ४९ ॥

श्लोकस्थान में बताए गए वैरेचनिक (सिर का शोधन करने वाले) धूमों का प्रयोग करने से उत्तमाङ्ग (सिर) में स्थित कृमि, कुष्ठ और किलास शान्त हो जाते हैं।

च. चि. ७/५०

। ॥ ५० ॥

जिन (कुष्ठों) के मण्डल (चकत्ते) स्थिर और कठोर हों, उन्हें प्रस्तर और प्रणाडी (स्वेदों) से स्विन्न करके (पसीना लाकर) और कूर्चों (कूँचियों) से रगड़कर, (उनका) रक्तोत्क्लेश (उभरा हुआ दूषित रक्त) निकाल देना चाहिए।

च. चि. ७/५१

। ॥ ५१ ॥

आनूप (दलदली प्रदेश के) और वारिज (जलचर) प्राणियों के मांस की सुखोष्ण (सहने योग्य गरम) पोटलियों से भी स्वेद देकर, उभरे हुए कुष्ठ को तीक्ष्ण शस्त्र से खुरचे (विलेखन करे)।

च. चि. ७/५२

। ॥ ५२ ॥

अथवा रक्त निकालने के लिए कुष्ठ पर शृङ्ग (सींग) और अलाबु (तुम्बी) लगाए; अथवा प्रच्छान किए हुए (हल्के चीरे लगाए हुए) छोटे कुष्ठ को जलौकाओं (जोंकों) से (रक्त निकालकर) शुद्ध करे।

च. चि. ७/५३

। ॥ ५३ ॥

जिन कुष्ठों का रक्त-दोष (दूषित रक्त) निकाल दिया गया हो और जिनके आशयों (भीतरी कोष्ठों) का शोधन हो चुका हो, उन कुष्ठों पर जो लेप लगाए जाते हैं, उनकी सिद्धि (सफलता) तुरन्त होगी।

च. चि. ७/५४

। ॥ ५४ ॥

जिन (कुष्ठों) में शस्त्र काम नहीं करता और जो स्पर्शेन्द्रिय (छूने की अनुभूति) को नष्ट करने वाले हों, उन पर रक्त और दोष को बहाकर (निकालकर) क्षार लगाना चाहिए।

च. चि. ७/५५

। ॥ ५५ ॥

पत्थर जैसे कठोर और खुरदरे, सुप्त (सुन्न), स्थिर और पुराने कुष्ठ में, जिस (रोगी) ने अगद (विषनाशक औषध) पी ली हो, उस पर विषों से प्रदेह (गाढ़ा लेप) करना चाहिए, और बाद में अगदों से (प्रदेह करना चाहिए)।

च. चि. ७/५६

।॥ ५६ ॥

जो कुष्ठ स्तब्ध (जकड़े हुए), अत्यन्त सुप्त (सुन्न), पसीने से रहित और खुजली वाले हों, (वे) दन्ती, त्रिवृता (निशोथ), करवीर (कनेर), करञ्ज और कुटज के कूर्चों (कूँचियों) से

च. चि. ७/५७

। ॥ ५७ ॥

अथवा जाती (चमेली), अर्क (आक) और निम्ब (नीम) के पत्तों से, शस्त्रों से, समुद्रफेन से या गोबर से रगड़े गए (उन कुष्ठों) पर उसके बाद प्रदेहों (गाढ़े लेपों) का लेप करना चाहिए।

च. चि. ७/५८

। ॥ ५८ ॥

मारुत (वात) और कफ के कुष्ठ को नष्ट करने वाला कर्म (उपचार) कहा जा चुका है। पित्त-कुष्ठ के रोगियों के लिए कफ, पित्त और रक्त का हरण (निकालना) तथा तिक्त (कड़वे) और कषाय (कसैले) द्रव्यों से प्रशमन (शान्त करना) करना चाहिए।

च. चि. ७/५९

। ॥ ५९ ॥

तिक्तक (कड़वे द्रव्यों वाले) घृत, और रक्तपित्त को दूर करने वाला जो भी अन्य बाहरी और भीतरी श्रेष्ठ कर्म (उपचार) है, वह पित्त-कुष्ठों में करना चाहिए।

च. चि. ७/६०

। ॥ ६० ॥

इस प्रकार दोषों की अधिकता के विभाग (भेद) के अनुसार कुष्ठ को दूर करने वाला यह कर्म (उपचार) कहा गया। परन्तु (अब), त्वचा के रोगों में प्रायः समानता होने के कारण, (सब कुष्ठों के लिए) कुष्ठ को शान्त करने वाला (उपचार) कहूँगा।

च. चि. ७/६१

। ॥ ६१ ॥

दार्वी (दारुहल्दी) या रसाञ्जन (रसौत) गोमूत्र के साथ कुष्ठ को दूर करता है। अथवा व्योष, गुड़ और तेल के साथ एक मास तक प्रयोग की गई अभया (हरीतकी) (कुष्ठ को दूर करती है)।

च. चि. ७/६२

। ॥ ६२ ॥

पटोल (परवल) की जड़ और इसी प्रकार गवाक्षी की (जड़), अलग-अलग एक-एक पल के भाग में, और त्रिफला के छिलके; त्रायमाणा और कटुरोहिणी (कुटकी) आधे-आधे भाग की हों, जिनके साथ चौथाई भाग नागर (सोंठ) हो।

च. चि. ७/६३

। ॥ ६३ ॥

फिर इन (सब) को एक साथ चूर्ण करके, (उसका) एक पल जल में पकाया हुआ, दोषों को हरने वाला (यह काढ़ा) मनुष्य पिए। (इसके) पच जाने पर धन्व (सूखे प्रदेश) के पशुओं और पक्षियों के (मांस-)रसों के साथ पुराने शालि चावल का भात खाए।

च. चि. ७/६४

। ॥ ६४ ॥

यह (योग) छह दिन के प्रयोग से कुष्ठों, शोफ (सूजन), ग्रहणी के विकार, अर्श (बवासीर), कृच्छ्रों (सम्भवतः मूत्रकृच्छ्र) और हलीमक को, तथा हृदय और बस्ति (मूत्राशय) के शूल (दर्द) और विषम ज्वर को नष्ट करता है।

च. चि. ७/६५

। ॥ ६५ ॥

मुस्त (नागरमोथा), व्योष, त्रिफला, मञ्जिष्ठा (मजीठ), दारु, दोनों पञ्चमूल, सप्तच्छद और निम्ब (नीम) की छाल, विशाला सहित चित्रक, (और) मूर्वा

च. चि. ७/६६

। ॥ ६६ ॥

(इन सबका) चूर्ण, तर्पण के नौ भागों के साथ मिलाकर, मधु और घी सहित, कुष्ठ को नष्ट करने वाला यह सिद्ध (परखा हुआ) प्रायोगिक (नियमित सेवन योग्य) भक्ष्य (खाने का पदार्थ) है।

च. चि. ७/६७

। ॥ ।

(यह) पाण्डु रोग सहित श्वयथु (सूजन) को, श्वित्र, ग्रहणी के विकार, अर्श (बवासीर), ब्रघ्न, भगन्दर, पिडका (फुंसियों), कण्डू (खुजली) और कोठों को नष्ट करता है। इस प्रकार मुस्तादि चूर्ण (कहा गया)।

च. चि. ७/६८

।॥ ६८ ॥

त्रिफला, अतिविषा (अतीस), कटुका (कुटकी), निम्ब (नीम), कलिङ्गक (इन्द्रजौ), वचा (वच) और पटोल (परवल) के, (तथा) मागधिका (पिप्पली), दोनों रजनी (हल्दी और दारुहल्दी), पद्मक, मूर्वा और विशाला के

च. चि. ७/६९

। ॥ ६९ ॥

(और) भूनिम्ब तथा पलाश के, दो पल डाले; उसके बाद त्रिवृत् (निशोथ) (उससे) दुगुनी, और फिर उस (त्रिवृत्) से (दुगुनी) ब्राह्मी। वह चूर्ण सुप्ति (सुन्नपन) को दूर करने वाला सर्वोत्तम (उपाय) है।

च. चि. ७/७०

। ॥ ७० ॥

जाती (चमेली) के रस के साथ, मधु सहित, लेलीतक का प्रयोग परम (सबसे श्रेष्ठ) है और सत्रह कुष्ठों को नष्ट करने वाला है; और (इसी प्रकार) मूत्र के साथ माक्षिक धातु (भी)।

च. चि. ७/७१

। ॥ ७१ ॥

गन्धक के योग से अथवा सुवर्णमाक्षिक के प्रयोग से श्रेष्ठ (बना), सब व्याधियों को नष्ट करने वाला, निगृहीत (वश में किया हुआ) रस (सम्भवतः पारद) भी कुष्ठ का रोगी खाए।

च. चि. ७/७२

। ॥ ७२ ॥

कुष्ठ का रोगी सब रोगों को शान्त करने वाले (उस रस को) वज्र और शिलाजतु (शिलाजीत) के साथ, अथवा योगराज के साथ मिलाकर, निगृहीत करके (वश में करके), और नित्य खाए।

च. चि. ७/७३

। ॥ ७३ ॥

खदिर (खैर) और सुरदारु (देवदारु) का सार (तने की भीतरी कठोर लकड़ी) पकाकर, उसके रस (काढ़े) से एक प्रस्थ क्षौद्र (शहद) में पानी का काम लेना चाहिए; और वे दोनों (सार) आठ-आठ पल के लेने चाहिए।

च. चि. ७/७४

। ॥ ७४ ॥

उस (मिश्रण) में आठ पल अयस् (लोहे) के चूर्ण डाले; तथा ये (भी): त्रिफला, एला (इलायची), त्वक्, मरिच (काली मिर्च), पत्र और कनक, (हर एक) एक-एक कर्ष भाग।

च. चि. ७/७५

। ॥ ।

(उसमें) शहद के बराबर मत्स्यण्डिका (कच्ची शक्कर) (डाले); लोहे के पात्र में (रखा) वह (मिश्रण) एक मास में तैयार हो जाता है। इस मध्वासव का सेवन करने वाले के कुष्ठ और किलास शान्त हो जाते हैं। इस प्रकार मध्वासव (का वर्णन पूरा हुआ)।

च. चि. ७/७६

। ॥ ७६ ॥

घी से भावित (घी लगे हुए) कुम्भ (घड़े) में एक द्रोण खदिर का कषाय (काढ़ा) डालकर, इसमें चूर्ण किए हुए (ये) द्रव्य भी छह-छह पल डालने चाहिए

च. चि. ७/७७

। ॥ ७७ ॥

त्रिफला, व्योष (सोंठ, काली मिर्च और पीपल), विडङ्ग (बायबिडंग), रजनी (हल्दी), मुस्ता (नागरमोथा), अटरूषक (अडूसा), इन्द्रयव (इन्द्रजौ), और सौवर्णी, तथा त्वक् और छिन्नरुहा, ये (द्रव्य); उस (मिश्रण) को एक मास

च. चि. ७/७८

। ॥ ७८ ॥

धान्य (अनाज) के बीच रखे; फिर प्रतिदिन प्रातःकाल युक्ति से (उचित मात्रा में) पिए। एक मास में यह महाकुष्ठ को निश्चय ही नष्ट करता है, और अल्प (कुष्ठ) को तो एक पक्ष (पन्द्रह दिन) में

च. चि. ७/७९

। ॥ ।

और अर्श, श्वास, भगन्दर, कास, किलास, प्रमेह और शोष को भी (नष्ट करता है)। कनकबिन्दु (नामक) अरिष्ट को पीकर मनुष्य कनक (सोने) के वर्ण वाला हो जाता है। इस प्रकार कनकबिन्दु अरिष्ट (का वर्णन पूरा हुआ)।

च. चि. ७/८०

। ॥ ८० ॥

वात (अनिल) और कफ से उत्पन्न कुष्ठों में (यह योग) इस प्रकार पीना चाहिए, और उसी तरह पित्त से उत्पन्न (कुष्ठों) में भी; और यह कृतमाल (अमलतास) का क्वाथ भी, विशेष रूप से कफ से उत्पन्न (कुष्ठों) में।

च. चि. ७/८१

।॥ ८१ ॥

और गुड़ से बना, चित्रक सहित त्रिफलासव, जो क्रमुक, दशमूल, दन्ती, वराङ्ग और मधु (शहद) के योग से युक्त हो, कुष्ठ रोग को नष्ट करने वाला है।

च. चि. ७/८२

। ॥ ८२ ॥

कुष्ठों में लघु (हल्के) अन्न और तिक्त (कड़वे) शाक हितकर जाने; और भल्लातक, त्रिफला और निम्ब से युक्त अन्न और घृत (घी) भी।

च. चि. ७/८३

।, ॥ ८३ ॥

पुराने धान्य (अनाज), तथा जाङ्गल (सूखे प्रदेश के प्राणियों के) मांस, और पटोल (परवल) के साथ मुद्ग (मूँग) प्रशस्त (हितकर) हैं; गुरु (भारी) और अम्ल (खट्टे) पदार्थ, दूध और दही नहीं, आनूप (दलदली प्रदेश के प्राणियों का मांस) और मछलियाँ नहीं, गुड़ और तिल भी नहीं।

च. चि. ७/८४

। ॥ ८४ ॥

एला (इलायची), कुष्ठ (कूठ नामक द्रव्य), दार्वी (दारुहल्दी), शतपुष्पा, चित्रक और विडङ्ग (बायबिडंग), तथा रसाञ्जन (रसौत) और अभया (हरीतकी) भी, यह कुष्ठ (रोग) के लिए इष्ट आलेपन (लेप) है।

च. चि. ७/८५

। ॥ ८५ ॥

चित्रक, एला (इलायची), बिम्बी, वृषक, त्रिवृत् (निशोथ), अर्क (आक) और नागरक, (इन्हें) चूर्ण करके (उस चूर्ण को) आठ दिन तक पलाश (ढाक) के (क्षार से) भावित करना चाहिए

च. चि. ७/८६

। ॥ ८६ ॥

गायों के मूत्र से छाने गए (पलाश के) क्षार से (उस चूर्ण को भावना दी जाए)। उस (औषध) से लेप किए गए और सूर्य (की धूप) से तपाए गए इस (रोगी) के मण्डल शीघ्र फूट जाते हैं और विलीन हो जाते हैं।

च. चि. ७/८७

। ॥ ८७ ॥

मांसी (जटामांसी), मरिच (काली मिर्च), लवण, रजनी (हल्दी), तगर, सुधा, घर का धुआँ, मूत्र, पित्त और पलाश का क्षार; (इनका) लेप कुष्ठ को नष्ट करने वाला है।

च. चि. ७/८८

। ॥ ८८ ॥

त्रपु (राँगा), सीसा और लोहे का चूर्ण मण्डलों को दूर करता है; फल्गु और चित्रक, बृहती (बड़ी कटेरी), नमक सहित गोधा (गोह) का रस, और दारु तथा मूत्र (भी) मण्डलों को दूर करते हैं।

च. चि. ७/८९

। ॥ ८९ ॥

मांसों में, पिष्ट (आटे) में और किण्व में जल का काम कदली (केला), पलाश, पाटलि और निचुल के निथरे हुए क्षार-जल से करना चाहिए।

च. चि. ७/९०

। ॥ ९० ॥

उन (पदार्थों) से मेदक भली-भाँति बनता है; (और) किण्वों से बनाया गया प्रलेप प्रशस्त है, जो धूप में स्थित (होकर लगाया जाने पर) मण्डल-कुष्ठ को नष्ट करने वाला और कृमियों को नष्ट करने वाला है।

च. चि. ७/९१

। ॥ ९१ ॥

मुस्त (नागरमोथा), मदन (मैनफल), त्रिफला, करञ्ज, आरग्वध (अमलतास), कलिङ्गयव और सप्तपर्ण सहित दार्वी (दारुहल्दी); यह सिद्धार्थक नाम का स्नान है।

च. चि. ७/९२

। ॥ ९२ ॥

यह कषाय वमन, विरेचन, वर्णक तथा उद्घर्ष (के रूप में काम आता) है; यह त्वचा के दोषों, कुष्ठ और शोफ को दूर करने वाला और पाण्डु रोग को नष्ट करने वाला है।

च. चि. ७/९३

।॥ ९३ ॥

कुष्ठ (कूठ), करञ्ज के बीज और एडगज (का) लेप कुष्ठ (रोग) को नष्ट करने वाला है; और प्रपुन्नाड के बीज, सैन्धव (सेंधा नमक), रसाञ्जन (रसौत), कपित्थ (कैथ) और लोध्र (भी)।

च. चि. ७/९४

। ॥ ९४ ॥

सफ़ेद करवीर (कनेर) की जड़, कुटज और करञ्ज का फल, दार्वी (दारुहल्दी) की छाल, (और) सुमनस् के प्रवाल (कोमल पत्तों) से युक्त लेप कुष्ठ को दूर करने वाला (और) सिद्ध है।

च. चि. ७/९५

। ॥ ९५ ॥

लोध्र, धातकी (धाय), वत्सक के बीज, नक्तमाल और मालती का कल्क कुष्ठ रोगों में उन्मर्दन (मलने) और आलेप (लेप) के रूप में (काम आता है)।

च. चि. ७/९६

। ॥ ।

शिरीष की छाल, कार्पासी (कपास) का फूल, राजवृक्ष के पत्ते और पिसी हुई काकमाची (मकोय); (यह) कुष्ठ को दूर करने वाला चार प्रकार का लेप है। इस प्रकार लेप (कहे गए)।

च. चि. ७/९७

। ॥ ९७ ॥

दार्वी और रसाञ्जन का, निम्ब और पटोल का, खदिर (खैर) के सार का, आरग्वध और वृक्षक का, त्रिफला का, (और) सप्तपर्ण का

च. चि. ७/९८

। ॥ ९८ ॥

इस प्रकार (ये) छह कषाय-योग कुष्ठ को नष्ट करने वाले हैं, और सातवाँ (योग) तिनिश का है; (ये) स्नान और पान में हितकर हैं; तथा आठवाँ (योग) अश्वमार (कनेर) का है।

च. चि. ७/९९

। ॥ ९९ ॥

आलेपन, प्रघर्षण और अवचूर्णन (में), तथा तेल और घी के पाक (पकाने) के योग में भी, कुष्ठ की शान्ति के लिए यही कषाय इष्ट हैं।

च. चि. ७/१००

। ॥ १०० ॥

त्रिफला, निम्ब (नीम) और पटोल (परवल), मञ्जिष्ठा (मजीठ), रोहिणी, वचा (वच) और रजनी (हल्दी): (लगातार) सेवन किया गया यह कषाय (काढ़ा) कफ और पित्त से उत्पन्न कुष्ठ को नष्ट करता है।

च. चि. ७/१०१

। ॥ १०१ ॥

और इन्हीं (द्रव्यों) से सिद्ध किया (पकाया) गया सर्पि (घी) वात की प्रधानता वाले कुष्ठ को जीत लेता है। और खदिर (खैर), असन, दारु और निम्ब (नीम) के लिए भी यही कल्प (बनाने की विधि) बताया गया है।

च. चि. ७/१०२

। ॥ १०२ ॥

कुष्ठ (कूठ), अर्क (आक), तुत्थ (नीला थोथा), कट्फल (कायफल) और मूलक (मूली) के बीज, रोहिणी कटुका (कुटकी), कुटज के फल, उत्पल, मुस्त (नागरमोथा), बृहती (बड़ी कटेरी), करवीर (कनेर) और कासीस (हीराकसीस)

च. चि. ७/१०३

। ॥ १०३ ॥

एडगज, निम्ब (नीम) और पाठा, दुरालभा, चित्रक (चीता) और विडङ्ग (वायविडंग), तिक्त अलाबु (कड़वी तुम्बी) के बीज, कम्पिल्लक (कमीला) और सर्षप (सरसों), वचा (वच) और दार्वी (दारुहल्दी)

च. चि. ७/१०४

। ॥ १०४ ॥

इन (द्रव्यों) से सिद्ध किया (पकाया) गया तैल कुष्ठ को नष्ट करने वाला है; और यही योग आलेप (लेप) भी है। उद्वर्तन (उबटन), प्रघर्षण (रगड़ना) और अवचूर्णन (चूर्ण बुरकना) के लिए भी यही (योग) इष्ट है।

च. चि. ७/१०५

। ॥ ।

श्वेत करवीरक (सफ़ेद कनेर) का रस, गोमूत्र, चित्रक (चीता) और विडङ्ग (वायविडंग): (इनसे) सिद्ध किया गया यह तैल-योग कुष्ठों में वैद्यों को मान्य है। इस प्रकार श्वेतकरवीराद्य तैल (कहा गया)।

च. चि. ७/१०६

। ॥ १०६ ॥

श्वेत करवीर (सफ़ेद कनेर) के पल्लव (कोमल पत्ते), जड़ और छाल, वत्सक (कुटज), विडङ्ग (वायविडंग), कुष्ठ (कूठ), अर्क (आक) की जड़, सर्षप (सरसों), शिग्रु (सहजन) की छाल और रोहिणी कटुका (कुटकी)

च. चि. ७/१०७

। ॥ ।

(तैल के) चौथाई भाग के बराबर इन (द्रव्यों) के कल्क (लुगदी) से, और तैल से चार गुना गायों का मूत्र डालकर, सिद्ध किया (पकाया) गया तैल अभ्यङ्ग (मालिश) से कुष्ठ और कण्डू (खुजली) को नष्ट करने वाला है। इस प्रकार श्वेतकरवीरपल्लवाद्य तैल (कहा गया)।

च. चि. ७/१०८

। ॥ १०८ ॥

तिक्त अलाबु (कड़वी तुम्बी) के बीज, दो (प्रकार के) तुत्थ, रोचना (गोरोचन), दो हरिद्रा, बृहती (बड़ी कटेरी) का फल, एरण्ड (अरंडी), विशाला सहित चित्रक (चीता) और मूर्वा

च. चि. ७/१०९

। ॥ १०९ ॥

कासीस (हीराकसीस), हिङ्गु (हींग), शिग्रु (सहजन), त्र्यूषण (सोंठ, काली मिर्च और पिप्पली), सुरदारु (देवदारु), तुम्बुरु और विडङ्ग (वायविडंग), लाङ्गलक, कुटज की छाल और कटुका नाम वाली रोहिणी (कुटकी) भी

च. चि. ७/११०

।॥ ।

इन (द्रव्यों) के कल्क (लुगदी) के साथ, (तैल से) चार गुने मूत्र में, सर्षप तैल (सरसों का तेल) सिद्ध करना (पकाना) चाहिए। यह अभ्यङ्ग (मालिश) से कण्डू (खुजली) और कुष्ठ को नष्ट करने वाला और मारुत (वात) तथा कफ को नष्ट करने वाला है। इस प्रकार तिक्तेक्ष्वाक्वादि तैल (कहा गया)।

च. चि. ७/१११

। ॥ १११ ॥

कनकक्षीरी, शैला, भार्गी (भारंगी), दन्ती के फल और जड़, जाती (चमेली) के प्रवाल (कोमल पत्ते), सर्षप (सरसों), लशुन (लहसुन), विडङ्ग (वायविडंग), करञ्ज की छाल

च. चि. ७/११२

। ॥ ११२ ॥

सप्तच्छद और अर्क (आक) के पल्लव (कोमल पत्ते), जड़ और छाल, निम्ब (नीम), चित्रक (चीता), आस्फोता, गुञ्जा (घुँघची), एरण्ड (अरंडी), बृहती (बड़ी कटेरी), मूलक (मूली), सुरसा और अर्जक के फल

च. चि. ७/११३

।॥ ११३ ॥

कुष्ठ (कूठ), पाठा, मुस्त (नागरमोथा), तुम्बुरु, मूर्वा और वचा (वच), षड्ग्रन्था सहित, एडगज, कुटज, शिग्रु (सहजन), त्र्यूषण (सोंठ, काली मिर्च और पिप्पली), भल्लातक (भिलावा) और क्षवक

च. चि. ७/११४

। ॥ ११४ ॥

हरिताल (हरताल), अवाक्पुष्पी, तुत्थ (नीला थोथा), कम्पिल्लक (कमीला), अमृता नाम वाला (द्रव्य), सौराष्ट्री, कासीस (हीरा कसीस), दार्वी (दारुहल्दी) की छाल और सर्जिका लवण (सज्जी खार)

च. चि. ७/११५

। ॥ ११५ ॥

इन (द्रव्यों) के कल्कों से करवीरक (कनेर) की जड़ और पत्तों के कषाय (क्वाथ) में तेल पकाना चाहिए; अथवा (इन्हीं से) चार गुने गोमूत्र के साथ सरसों का तेल पकाना चाहिए।

च. चि. ७/११६

। ॥ ।

पक जाने पर वह (तेल) कड़वी अलाबु (तुम्बी) में रखना चाहिए। उस (तेल) के अभ्यङ्ग से वैद्य शीघ्र ही मण्डलों को तोड़ दे, और कृमियों तथा खुजली को नष्ट कर दे। यह कनकक्षीरी तैल है।

च. चि. ७/११७

। ॥ ११७ ॥

कुष्ठ (कूठ), तमालपत्र और मरिच (काली मिर्च), मनःशिला (मैनसिल) और कासीस (हीरा कसीस) के साथ, तेल में मिलाकर ताँबे के पात्र में सात दिन तक रखा हुआ (यह योग)

च. चि. ७/११८

। ॥ ।

उस (योग) से लेप किया गया सिध्म, धूप में ठहरने वाले (रोगी) का, सात दिन में मिट जाता है; और जिसका शरीर शुद्ध हो चुका है, उसका नया किलास स्नान छोड़ देने पर एक महीने में (मिट जाता है)। यह सिध्म में लेप है।

च. चि. ७/११९

। ॥ ११९ ॥

सर्षप (सरसों), करञ्ज और कोषातकी के तेलों को, तथा इङ्गुदी (हिंगोट) के (तेल) को, और खदिर (खैर) के सार का जो तेल है उसे भी, (विद्वान) कुष्ठों में हितकर कहते हैं।

च. चि. ७/१२०

। ॥ १२० ॥

जीवन्ती, मञ्जिष्ठा (मजीठ), दार्वी (दारुहल्दी), कम्पिल्लक (कमीला), दूध और तुत्थ (नीला थोथा) - यह घी और तेल का सिद्ध (परखा हुआ) पाक है; और पक जाने पर सर्जरस (राल)

च. चि. ७/१२१

। ॥ ।

मधूच्छिष्ट (मोम) सहित डालना चाहिए। उस (घी या तेल) से अभ्यङ्ग करने पर विपादिका शान्त होती है; चर्म, एककुष्ठ और किटिम कुष्ठ तथा अलसक (भी) शान्त होता है। ये विपादिका को दूर करने वाले घृत और तैल हैं।

च. चि. ७/१२२

। ॥ १२२ ॥

किण्व (खमीर), वराह (सूअर) का रक्त, पृथ्वीका और सैन्धव (सेंधा नमक) - (इनका) लेप होना चाहिए। कुस्तुम्बुरु (धनिया) और कुष्ठ (कूठ) का लेप लगाना चाहिए; (यह) मण्डल को दूर करने वाला है।

च. चि. ७/१२३

। ॥ १२३ ॥

पूतीक, दारु और जटिला, पक्व सुरा, क्षौद्र (मधु) और मुद्गपर्णी - काकनासा सहित (इनका) लेप मण्डल कुष्ठ को दूर करने वाला और सिद्ध (परखा हुआ) है।

च. चि. ७/१२४

। ॥ १२४ ॥

चित्रक और शोभाञ्जनक (सहजन); गुडूची (गिलोय), अपामार्ग (चिरचिटा) और देवदारु; खदिर (खैर) और धव - (यह) लेप; श्यामा, दन्ती और द्रवन्ती

च. चि. ७/१२५

। ॥ १२५ ॥

लाक्षा (लाख), रसाञ्जन (रसौत) और एला (इलायची); और पुनर्नवा - ये कुष्ठ के रोगी के लेप हैं। ये सभी छह (लेप) दधिमण्ड मिलाकर लगाने चाहिए; (ये) वात और कफ के कुष्ठ को नष्ट करने वाले हैं।

च. चि. ७/१२६

। ॥ १२६ ॥

एडगज, कुष्ठ (कूठ), सैन्धव (सेंधा नमक), सौवीरक, सर्षप (सरसों) और कृमिघ्न (कृमिनाशक द्रव्यों) से कृमि, मण्डल नामक कुष्ठ और दद्रु कुष्ठ शान्त हो जाते हैं।

च. चि. ७/१२७

। ॥ १२७ ॥

एडगज, सर्जरस (राल) और मूलक (मूली) का बीज - सिध्म कुष्ठों के लिए, काञ्जिक (काँजी) मिलाकर, यह अलग-अलग उद्वर्तन (उबटन) और लेप माना गया है।

च. चि. ७/१२८

। ॥ १२८ ॥

वासा (अडूसा) और त्रिफला पीने, स्नान, उद्वर्तन (उबटन) और प्रलेप (लेप) में (प्रयोग किए जाएँ); और बृहती (बड़ी कटेरी), सेव्य (खस) और पटोल (परवल), तथा सारिवा सहित रोहिणी भी।

च. चि. ७/१२९

। ॥ १२९ ॥

खदिर (खैर), अवघातक, ककुभ (अर्जुन), रोहीतक, लोध्र (लोध), कुटज, धव, निम्ब (नीम), सप्तच्छद और करवीर (कनेर) स्नान और पीने में प्रशस्त माने जाते हैं।

च. चि. ७/१३०

। ॥ १३० ॥

जल, वाप्य, लोह, केशर, पत्र, प्लव और चन्दन, तथा मृणाल (कमल की नाल), क्रम से बढ़ते भागों में (लेकर बना) प्रलेप पित्त और कफ के कुष्ठ में सिद्ध (परखा हुआ) है।

च. चि. ७/१३१

। ॥ १३१ ॥

यष्ट्याह्व (मुलेठी), लोध्र (लोध), पद्मक, पटोल (परवल), पिचुमर्द (नीम) और चन्दन के रस भी, भली-भाँति ठंडे, पित्त-कुष्ठ के रोगियों के लिए स्नान और पीने में हितकर हैं।

च. चि. ७/१३२

। ॥ १३२ ॥

प्रियङ्गु, हरेणुका और वत्सक (कुटज) के फल आलेप (लेप) हैं; और अतिविषा (अतीस), सेव्य (खस) तथा चन्दन सहित कटुका रोहिणी (कुटकी) भी।

च. चि. ७/१३३

।॥ १३३ ॥

जलन वाले कुष्ठों में तिक्त घृतों, धौत घृतों (धोए हुए घी) और चन्दन, मधुक, प्रपौण्डरीक तथा उत्पल (नील कमल) से युक्त तेलों से अभ्यङ्ग (किया जाए)।

च. चि. ७/१३४

। ॥ १३४ ॥

जब (त्वचा में) क्लेद (गीलापन, स्राव) हो, अंग गिरने लगे, दाह (जलन) हो, और चर्मदल सहित विस्फोटक हो, तब शीतल प्रदेह और सेक, व्यध (सिरा-वेध), विरेक (विरेचन) और तिक्त घृत (हितकर हैं)।

च. चि. ७/१३५

। ॥ १३५ ॥

खदिर घृत, निम्ब घृत, दार्वी घृत और पटोल घृत, रक्त और पित्त की प्रबलता वाले कुष्ठों में (प्रत्येक) उत्तम और सिद्ध (परखी हुई) औषध है।

च. चि. ७/१३६

। ॥ १३६ ॥

त्रिफला की त्वचा (फलों के छिलके) आधा-आधा पल, और पटोल के पत्ते (भी आधा पल); शेष (द्रव्य) एक-एक कर्ष: निम्ब सहित कटुरोहिणी (कुटकी), यष्ट्याह्वा (मुलेठी) और त्रायमाणा।

च. चि. ७/१३७

। ॥ १३७ ॥

यह कषाय (काढ़ा) मसूर की दो पल दाल डालकर एक आढक जल में पकाया जाए; आठवाँ भाग शेष रहने पर छाना हुआ रस लिया जाए।

च. चि. ७/१३८

। ॥ १३८ ॥

और काढ़े के वे आठ-आठ पल के दो भाग (यानी सोलह पल) तथा घी के चार पल पकाए जाएँ, जब तक आठ पल शेष रहे; फिर उसे गुनगुना पिया जाए।

च. चि. ७/१३९

। ॥ १३९ ॥

वह (घृत) वात और पित्त के कुष्ठ, वीसर्प, प्रबल वातशोणित, ज्वर, दाह, गुल्म, विद्रधि, विभ्रम और विस्फोटकों को नष्ट करता है।

च. चि. ७/१४०

। ॥ १४० ॥

निम्ब और पटोल, दार्वी (दारुहल्दी), दुरालभा, तिक्तरोहिणी (कुटकी), त्रिफला, पर्पटक और त्रायमाणा को अर्धदल (आधे-आधे) भाग में लेना चाहिए।

च. चि. ७/१४१

। ॥ १४१ ॥

एक आढक जल में पकाए गए (इन द्रव्यों) के रस में, जब वह आठवाँ भाग रह जाए और छान लिया जाए, चन्दन, किराततिक्तक (चिरायता), मागधिका (पिप्पली) और त्रायमाणा डाले

च. चि. ७/१४२

। ॥ १४२ ॥

मुस्त (नागरमोथा) और वत्सक (कुटज) के बीज भी; (इन सबके) आधे-आधे कर्ष के भाग लेकर उनका कल्क बनाकर (डाले), और छह पल नया घी (भी डाले); इस प्रकार सिद्ध किया (पकाया) हुआ यह घृत पीना चाहिए।

च. चि. ७/१४३

।॥ ।

सिद्ध (तैयार) हो जाने पर (यह घृत) कुष्ठ, ज्वर, गुल्म, अर्श, ग्रहणी, पाण्डु रोग और श्वयथु (सूजन) को हरने वाला, तथा पामा, विसर्प, पिडका (फुंसियों), कण्डू (खुजली), मद और गण्ड को दूर करने वाला है। इस प्रकार तिक्तषट्पलक घृत (कहा गया)।

च. चि. ७/१४४

। ॥ १४४ ॥

सप्तच्छद, प्रतिविषा (अतीस), शम्पाक (अमलतास), तिक्तरोहिणी (कुटकी), पाठा, मुस्त (नागरमोथा), उशीर (खस), त्रिफला, पटोल, पिचुमर्द (नीम) और पर्पटक,

च. चि. ७/१४५

। ॥ १४५ ॥

धन्वयवास, चन्दन, उपकुल्या (पिप्पली), पद्मक, दोनों हरिद्रा (हल्दी और दारुहल्दी), विशाला सहित षड्ग्रन्था, शतावरी और दोनों सारिवा,

च. चि. ७/१४६

। ॥ १४६ ॥

वत्सक (कुटज) के बीज, यास, मूर्वा, अमृता (गुडूची), किराततिक्त (चिरायता), और यष्ट्याह्व (मुलेठी) तथा त्रायमाणा: बुद्धिमान (वैद्य) इन (सब) के कल्क बनाए।

च. चि. ७/१४७

। ॥ १४७ ॥

कल्क (घी का) चौथाई भाग हो, जल आठ गुना, और अमृतफलों का रस घी से दुगुना डालना चाहिए; सिद्ध हो जाने पर वह सर्पि (घी) (रोगी को) पिलाए।

च. चि. ७/१४८

। ॥ १४८ ॥

जिनमें रक्त और पित्त प्रबल हों ऐसे कुष्ठों को, रक्त बहाने वाले अर्शों (बवासीर) को, वीसर्प, अम्लपित्त, वातासृक् (वातरक्त) और पाण्डु रोग को,

च. चि. ७/१४९

। ॥ १४९ ॥

पामा सहित विस्फोटकों को, उन्माद, कामला (पीलिया), ज्वर, कण्डू (खुजली), हृद्रोग, गुल्म, पिडकाओं (फुंसियों), असृग्दर और गण्डमाला को,

च. चि. ७/१५०

।॥ ।

उचित समय पर (रोगी के) बल के अनुसार पिया गया यह महातिक्त सर्पि (घी) (इन रोगों को), (और) सैकड़ों योगों से भी न जीते गए महाविकारों (बड़े रोगों) को, शीघ्र नष्ट करता है। इस प्रकार महातिक्तक घृत (कहा गया)।

च. चि. ७/१५१

। ॥ १५१ ॥

दोष के निकाल दिए जाने पर, रक्त के निकाल दिए जाने पर, बाहरी और भीतरी शमन (चिकित्सा) किए जाने पर, और स्नेह उचित समय पर दिए जाने पर, साध्य (ठीक हो सकने वाला) कुष्ठ बना नहीं रहता।

च. चि. ७/१५२

। ॥ १५२ ॥

खदिर (खैर) की पाँच तुला, शिंशपा (शीशम) और असन की (एक-एक) तुला; ये सब आधी-आधी तुला हों: करञ्ज, अरिष्ट, वेतस,

च. चि. ७/१५३

। ॥ १५३ ॥

पर्पट और कुटज भी, वृष (वासा) तथा कृमिहर, दोनों हरिद्रा (हल्दी और दारुहल्दी), और कृतमाल (अमलतास), गुडूची (गिलोय), त्रिफला, त्रिवृत् (निशोथ),

च. चि. ७/१५४

। ॥ १५४ ॥

और सप्तपर्ण; (इन सब) कूटे हुए (द्रव्यों) को दस द्रोण जल में (पकाए), और आठवाँ भाग बचने पर कषाय (काढ़े) को (आग से) उतार ले।

च. चि. ७/१५५

। ॥ १५५ ॥

(उस कषाय के साथ) बराबर मात्रा में धात्री (आँवले) का रस और एक आढक सर्पि (घी), यथोक्त (पहले बताए गए) महातिक्तक (घृत) के एक-एक पल वाले कल्कों के साथ, पकाए।

च. चि. ७/१५६

। ॥ ।

पान (पीने) और अभ्यङ्ग (मालिश) के रूप में सेवन करने से यह सब कुष्ठों को नष्ट करता है। 'महाखदिर' नाम का यह (घृत) कुष्ठ के विकारों को दूर करने वाला सर्वश्रेष्ठ (घृत) है। इस प्रकार महाखदिर घृत (पूरा हुआ)।

च. चि. ७/१५७

। ॥ १५७ ॥

जब (कुष्ठ के रोगी के) अङ्ग गिरने लगें, उनसे लसीका बहने लगे और वे जन्तुओं (कृमियों) द्वारा खाए गए हों, तब मूत्र, निम्ब (नीम) और विडङ्ग का स्नान, पान और प्रदेह (गाढ़ा लेप) (में प्रयोग करना चाहिए)।

च. चि. ७/१५८

। ॥ १५८ ॥

गोमूत्र के साथ वृष (अडूसा), कुटज, सप्तपर्ण, करवीर (कनेर), करञ्ज, निम्ब (नीम) और खदिर (खैर) स्नान, पान और लेप में (प्रयुक्त होकर) कृमि और कुष्ठ को दूर करते हैं।

च. चि. ७/१५९

। ॥ १५९ ॥

पेय और आहार की विधि में, प्रसेचन (सींचने) में, धूपन (धुआँ देने) में और प्रदेह (गाढ़े लेप) में, कृमियों को नष्ट करने वाला विडङ्ग और कुष्ठ को नष्ट करने वाला खदिर (खैर) सबसे बढ़कर है।

च. चि. ७/१६०

। ॥ १६० ॥

विडङ्ग सहित एडगज, आरग्वध (अमलतास) की जड़ें, कुत्ते के दाँत और गाय, घोड़े, सूअर तथा ऊँट के दाँत कुष्ठों के उद्दालन (उखाड़कर दूर करने के साधन) हैं।

च. चि. ७/१६१

। ॥ १६१ ॥

विडङ्ग सहित एडगज, दोनों निशा (हरिद्रा और दारुहरिद्रा) और राजवृक्ष की जड़, पिप्पली और पाकल के साथ, कुष्ठ का श्रेष्ठ उद्दालन (उखाड़कर दूर करने वाला योग) है; (इसे) प्रयोग करना चाहिए।

च. चि. ७/१६२

। ॥ १६२ ॥

सब ओर से (भली-भाँति) शुद्ध किए जा चुके श्वित्र (के रोगियों) में (यह चिकित्सा) विशेष रूप से प्रयोग करनी चाहिए। श्वित्र में गुड़ सहित मलपू का रस सबसे श्रेष्ठ स्रंसन (दस्त लाने वाली औषध) माना जाता है।

च. चि. ७/१६३

। ॥ १६३ ॥

भली-भाँति स्नेहन किया हुआ (रोगी) उस (रस) को पीकर अपने बल के अनुसार सूर्य की किरणों के ताप का सेवन करे (धूप ले)। विरेचन हो जाने पर (वह) तीन दिन तक, प्यास लगने पर, पेया पिए।

च. चि. ७/१६४

। ॥ १६४ ॥

श्वित्र वाले अङ्ग पर जो स्फोट (फफोले) उठते हैं, उन्हें काँटे से फोड़ दे। फफोलों के बह जाने पर एक पक्ष (पन्द्रह दिन) तक प्रतिदिन सुबह पिए

च. चि. ७/१६५

। ॥ १६५ ॥

मलपू, असन, प्रियङ्गु और शतपुष्पा को जल में अच्छी तरह उबालकर (बना काढ़ा), अथवा बल के अनुसार फाणित मिला हुआ पलाश (ढाक) का क्षार।

च. चि. ७/१६६

। ॥ १६६ ॥

और जो भी दूसरा (उपचार) कुष्ठ को नष्ट करने वाला है, वह सब ही श्वित्र के लिए प्रशस्त है, खदिर (खैर) के जल के साथ; अथवा खदिर के जल का पान श्रेष्ठ है।

च. चि. ७/१६७

। ॥ १६७ ॥

श्वित्र को शान्त करने के लिए मनःशिला (मैनसिल) सहित विडङ्ग, कासीस (कसीस), रोचना और कनकपुष्पी का, सैन्धव (सेंधा नमक) मिलाकर, लेप लगाए।

च. चि. ७/१६८

। ॥ १६८ ॥

अथवा कदली (केले) के क्षार से युक्त और गायों के रक्त से युक्त, जलाई हुई गधे की हड्डी (का लेप); अथवा हाथी के मद में रखा हुआ मालती की कलियों का क्षार।

च. चि. ७/१६९

। ॥ १६९ ॥

अथवा कुष्ठ (कूठ) और सैन्धव (सेंधा नमक) सहित नीलोत्पल (नीला कमल), हाथी के मूत्र में पीसा हुआ (लेप); (अथवा) गायों के मूत्र में पीसा हुआ मूलक (मूली) के बीज और अवल्गुज का लेप।

च. चि. ७/१७०

। ॥ १७० ॥

अथवा अवल्गुज और चित्रक (चीता) के साथ गायों के मूत्र में पीसी हुई काकोदुम्बरिका, अथवा बर्हि (मोर) के पित्त से मिलाई हुई मनःशिला (मैनसिल) (का लेप लगाया जाए)।

च. चि. ७/१७१

। ॥ १७१ ॥

अवल्गुज के बीज, लाक्षा (लाख), गोपित्त (गाय का पित्त), दो अञ्जन, पिप्पली और काले लोहे का चूर्ण - (इनका) लेप किलास को नष्ट करने वाला है।

च. चि. ७/१७२

। ॥ १७२ ॥

शुद्धि (शरीर के शोधन) से, शोणितमोक्ष (रक्त निकालने) से, विरूक्षण (रूखा करने वाले उपायों) से और सक्तु (सत्तू) खाने से किसी-किसी ही ऐसे (व्यक्ति) का श्वित्र नष्ट होता है जिसके पाप क्षीण हो चुके हों।

च. चि. ७/१७३

। ॥ १७३ ॥

किलास को दारुण, चारुण और श्वित्र, इन तीन नामों से जानना चाहिए; वह तीन प्रकार का होता है, और प्रायः वह त्रिदोषज (तीनों दोषों से उत्पन्न) होता है।

च. चि. ७/१७४

। ॥ १७४ ॥

दोष के रक्त में आश्रित होने पर श्वित्र रक्त (लाल), मांस में आश्रित होने पर ताम्र (ताँबे के रंग का) और मेद में आश्रित होने पर श्वेत (सफ़ेद) होता है; और वह उत्तरोत्तर (एक के बाद दूसरा, क्रमशः अधिक) गुरु (कठिन) होता है।

च. चि. ७/१७५

। ॥ १७५ ॥

जो (श्वित्र) आपस में अभिन्न (एक-दूसरे से अलग न) हो, जो बहु (बहुत अधिक) हो, जिसके रोम लाल हों, और जो अनेक वर्षों से उत्पन्न (पुराना) हो, वह श्वित्र सिद्ध होता (ठीक होता) ही नहीं।

च. चि. ७/१७६

। ॥ १७६ ॥

जिसके रोम लाल न हों, जो तनु (पतला) हो, पाण्डु (पीलापन लिए सफ़ेद) हो, बहुत पुराना न हो (अधिक समय पहले उत्पन्न न हुआ हो), और बीच के अवकाश (स्थान) में उभरा हुआ हो, वह श्वित्र साध्य (ठीक होने योग्य) कहा जाता है।

च. चि. ७/१७७

। ॥ १७७ ॥

असत्य वचन, कृतघ्नता, देवताओं की निन्दा और गुरुओं का तिरस्कार, पाप-कर्म और पहले किया हुआ कर्म, और विरोधी अन्न - (यह सब) किलास का हेतु (कारण) है।

च. चि. ७/१७८

- । ॥ १७८ ॥

इस विषय में (सार के) श्लोक (हैं): (कुष्ठों के) हेतु, द्रव्य, अनेक प्रकार के लिङ्ग (लक्षण), कौन-से दोष किन (कुष्ठों) में अधिक होते हैं, कुष्ठों में दोषों के लक्षण, संक्षेप में दोषों का निर्देश,

च. चि. ७/१७९

। ॥ १७९ ॥

साध्य, असाध्य और कृच्छ्र (कठिनाई से ठीक होने वाला) कुष्ठ, और कुष्ठ को दूर करने वाले जो सिद्ध (परखे हुए) योग (हैं), किलास का हेतु, (उसके) लक्षण, (उसकी) गुरुता और लघुता, तथा (उसकी) शान्ति (चिकित्सा),

च. चि. ७/१८०

। ॥ १८० ॥

इस प्रकार स्मृति और बुद्धि बढ़ाने के लिए, शिष्य हुताशवेश (अग्निवेश) के लिए, महर्षि द्वारा कुष्ठनाशन (कुष्ठ को नष्ट करने वाले) अध्याय में (यह) संग्रह रचा गया।

च. चि. ७

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र (ग्रन्थ) के चिकित्सितस्थान (चिकित्सास्थान) में कुष्ठचिकित्सित (कुष्ठ की चिकित्सा) नामक सातवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।