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अब हम वर्णस्वरीय (वर्ण और स्वर सम्बन्धी) इन्द्रिय (स्थान) नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे।
अध्याय १
वर्ण और स्वर (से मृत्यु के लक्षण)
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वर्णस्वरीय चरक संहिता के इन्द्रियस्थान का पहला अध्याय है। इसका नाम इसके विषय से बना है: वर्ण का अर्थ है शरीर का रंग और स्वर का अर्थ है आवाज़, और इसी से अध्याय का नाम 'वर्णस्वरीय' पड़ा है। भगवान् आत्रेय के उपदेश के रूप में यह अध्याय बताता है कि इन दोनों में आए विकार से रोगी की आयु के शेष रहने का और मृत्यु के निकट होने का अनुमान कैसे लगाया जाता है।
अध्याय आरम्भ में उन बातों की एक लम्बी सूची देता है जिनकी परीक्षा वैद्य को करनी है: वर्ण, स्वर, गन्ध, रस, स्पर्श, पाँच इन्द्रियाँ, बल, स्वप्न, दूत, और भी बहुत कुछ; ये परीक्षाएँ प्रत्यक्ष, अनुमान और उपदेश से की जाती हैं। फिर इन्हें दो भागों में बाँटा गया है, पुरुष पर आश्रित और पुरुष पर आश्रित न रहने वाली। इसके बाद प्रकृति (स्वाभाविक स्थिति) और विकृति (बिगड़ी स्थिति) के भेद बताए गए हैं: प्रकृति जाति, कुल, देश, काल, आयु और हर व्यक्ति की अपनी विशेषता से बँधी होती है, और विकृति के तीन प्रकार गिनाए गए हैं, जिनकी परिभाषा दी गई है।
इस प्रारम्भिक विवेचन के बाद अध्याय वर्ण के प्रकरण पर आता है। पहले शरीर के स्वाभाविक रंग बताए गए हैं, फिर विकृत रंग। यहाँ वह संकेत आता है कि शरीर के आधे भाग में स्वाभाविक रंग और आधे में विकृत रंग साफ सीमा से बँटा दिखे, तो वह अरिष्ट है, यानी मृत्यु का सूचक लक्षण। मुख पर निकलने वाले चिह्न, नाखून, आँख, मूत्र, मल, हाथ-पैर और ओठ जैसे स्थानों के रंग-विकार भी इसी तरह देखे गए हैं, और विशेष रूप से तब जब रोगी बल से लगातार क्षीण हो रहा हो और विकार अचानक, बिना किसी कारण के उठा हो। फिर स्वर का प्रकरण आता है: हंस, क्रौञ्च, दुन्दुभि जैसी स्वाभाविक आवाज़ें, और भेड़ के मिमियाने जैसी, दबी, अस्पष्ट, अटकती, क्षीण, दयनीय या बिखरी हुई विकृत आवाज़ें। स्वर का जल्दी-जल्दी बदलना या एक का कई हो जाना अशुभ कहा गया है।
अध्याय के उत्तरार्ध में यही बातें श्लोकों में दोहराई गई हैं: आधे मुख का नीला, श्याव, ताँबे जैसा या लाल-भूरा हो जाना, पके जामुन जैसे नीले ओठ, नाखूनों और दाँतों के लक्षण, और अचानक उठने वाला विकृत स्वर। अध्याय का सार-श्लोक कहता है कि वर्ण और स्वर मरणासन्न लोगों के लक्षण जानने के लिए बताए गए हैं, और जो इन दोनों को ठीक से जानता है, वह आयु के ज्ञान में भ्रमित नहीं होता।
पाठक के लिए इस अध्याय के मुख्य विचार ये हैं: किसी लक्षण को देखने से पहले व्यक्ति की स्वाभाविक स्थिति जाननी होती है, क्योंकि प्रकृति जाति, कुल, देश, काल, आयु और व्यक्ति से बँधी होने के कारण हर पुरुष की अपनी होती है; और ग्रन्थ के अनुसार मृत्यु के सूचक वे विकार हैं जो नए हों, अचानक आए हों, बिना कारण के हों और क्षीण होते रोगी में दिखें। यह चरक संहिता का कथन है; इसे चिकित्सा की सलाह की तरह नहीं पढ़ना चाहिए।
तत्र श्लोकः-इति वर्णस्वरावुक्तौ लक्षणार्थं मुमूर्षताम्।यस्तौ सम्यग्विजानाति नायुर्ज्ञाने स मुह्यति॥
श्लोक २६ →इस विषय में श्लोक- इस प्रकार मरने के निकट (मरणासन्न) लोगों के लक्षण जानने के लिए वर्ण और स्वर कहे गए। जो उन दोनों को भली-भाँति जानता है, वह आयु के ज्ञान में मोह को प्राप्त नहीं होता।
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।
चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।
चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।
सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।
शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।
अर्थ: औषध, उपचार।
चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।
अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।
चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।
अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।
चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
अर्थ: कारण।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
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अब हम वर्णस्वरीय (वर्ण और स्वर सम्बन्धी) इन्द्रिय (स्थान) नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे।
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ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।
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इस (शास्त्र) में वर्ण, स्वर, गन्ध, रस, स्पर्श, चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, रसन, स्पर्शन, सत्त्व, भक्ति, शौच, शील, आचार, स्मृति, आकृति, प्रकृति, विकृति, बल, ग्लानि, मेधा, हर्ष, रौक्ष्य, स्नेह, तन्द्रा, आरम्भ, गौरव, लाघव, गुण, आहार, विहार, आहार का परिणाम, उपाय, अपाय, व्याधि, व्याधि का पूर्वरूप, वेदनाएँ, उपद्रव, छाया, प्रतिच्छाया, स्वप्न-दर्शन, दूत का प्रसंग, मार्ग में (घटने वाला), उत्पात-सम्बन्धी (लक्षण), रोगी के कुल में भाव और अवस्थाओं के अन्तर, औषध की संवृत्ति और औषध के विकार की युक्ति - ये परीक्ष्य (परीक्षा करने योग्य) हैं; आयु के प्रमाण का शेष भाग जानने की इच्छा करने वाले वैद्य को प्रत्यक्ष, अनुमान और उपदेश से (इनकी परीक्षा करनी चाहिए)।
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उन परीक्ष्य (परीक्षा करने योग्य) बातों में कुछ पुरुष पर आश्रित नहीं हैं और कुछ पुरुष पर आश्रित हैं। उनमें जो पुरुष पर आश्रित नहीं हैं, उनकी परीक्षा उपदेश और युक्ति से करे; और पुरुष पर आश्रित बातों की प्रकृति और विकृति से।
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उनमें प्रकृति जाति से जुड़ी भी है, कुल से जुड़ी भी, देश के अनुसार भी, काल के अनुसार भी, अवस्था (आयु) के अनुसार भी और प्रत्येक आत्मा (व्यक्ति) के लिए नियत भी। क्योंकि जाति, कुल, देश, काल, आयु और प्रत्येक व्यक्ति से नियत होकर ही उन-उन पुरुषों के वे-वे भावविशेष (विशेष लक्षण) होते हैं।
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और विकृति लक्षण के निमित्त (कारण) वाली भी है, लक्ष्य निमित्त वाली भी और निमित्त के अनुरूप भी।
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उनमें लक्षणनिमित्ता वह (विकृति) है जिसके शरीर में दैववश लक्षण ही कारण बनते हैं; क्योंकि कुछ लक्षण शरीर में बँधे (जुड़े) रहते हैं, जो उस-उस समय वहाँ स्थान पाकर उस-उस विकृति को उत्पन्न करते हैं। लक्ष्यनिमित्ता वह है जिसका निमित्त, जैसा निदानों में कहा गया है, दिखाई देता है। निमित्तानुरूपा वह है जो निमित्त के अर्थ का अनुकरण करती है; उस निमित्त-रहित (विकृति) को वैद्य आयु के प्रमाण (माप) के ज्ञान का निमित्त मानते हैं, और आयु के क्षय के निमित्त वाली तथा प्रेत के लक्षणों के अनुरूप भी, जिसे धीर (विद्वान्) लोग आयु के अन्त को पहुँचे हुए (रोगी) के ज्ञान के लिए बताते हैं। जिसे आधार बनाकर हम मरणासन्न लोगों के पुरुष-आश्रित लक्षण बताएँगे। यह उद्देश (संक्षिप्त कथन) है। उसकी हम विस्तार से व्याख्या करेंगे।
।, श्यामः, , ; ॥ ८ ॥
उनमें आरम्भ से ही वर्ण का प्रकरण है। वह इस प्रकार है - कृष्ण, श्याम, श्यामावदात और अवदात, ये शरीर के प्रकृति (स्वाभाविक) वर्ण होते हैं; और जिन दूसरे (वर्णों) की उपेक्षा न करता हुआ (वैद्य) जाने, जो उसे जानने वालों द्वारा वंश-परम्परा से या अन्य प्रकार से भी बताए जाते हैं।
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नील, श्याव, ताम्र, हरित और शुक्ल वर्ण शरीर के वैकारिक (विकृत) होते हैं; और जिन दूसरे (वर्णों) की उपेक्षा न करता हुआ (वैद्य) जाने, जो पहले न होकर अब उत्पन्न हुए विकृत (वर्ण) हैं। इस प्रकार शरीर के प्रकृति और विकृति वर्ण कहे गए हैं। उनमें, प्रकृति वर्ण आधे शरीर में और विकृति वर्ण आधे शरीर में हो, और दोनों वर्णों को सीमा से अलग-अलग बँटा हुआ देखकर - चाहे इस प्रकार बाएँ-दाएँ के विभाग से, चाहे आगे-पीछे (पूर्व-पश्चिम) के विभाग से, चाहे ऊपर-नीचे के विभाग से, चाहे भीतर-बाहर के विभाग से - रोगी का अरिष्ट है, ऐसा जाने; इसी प्रकार वर्ण का भेद मुख पर या अन्यत्र रहता हुआ मृत्यु के लिए होता है।
॥ १० ॥
वर्ण के भेद से ग्लानि, हर्ष, रौक्ष्य (रूखापन) और स्नेह (चिकनापन) भी बताए गए (समझाए गए) हैं।
॥ ११ ॥
तथा पिप्लु, व्यङ्ग, तिलक, कालक और पिडका में से किसी एक का रोगी के मुख पर उत्पन्न होना भी इसी प्रकार अप्रशस्त (अशुभ) जाने।
॥ १२ ॥
नख, नेत्र, मुख, मूत्र, पुरीष (मल), हाथ, पैर, ओष्ठ आदि में भी, विकार-सम्बन्धी बताए गए वर्णों में से किसी एक का प्रकट होना, बल, वर्ण और इन्द्रियों से क्षीण व्यक्ति में आयु के क्षय का लक्षण होता है।
, । ॥ १३ ॥
और भी कोई वर्ण-विकार, जो पहले कभी न हुआ हो, लगातार क्षीण होते हुए रोगी में अचानक, बिना किसी कारण के उत्पन्न हो, उसे अरिष्ट (मृत्यु का सूचक लक्षण) जानना चाहिए। यह वर्ण का अधिकार (प्रकरण) हुआ।
; । ; । ॥ १४ ॥
स्वर का प्रकरण यह है - हंस, क्रौञ्च, नेमि, दुन्दुभि, कलविङ्क, कौए, कबूतर और जर्जर की ध्वनि का अनुकरण करने वाले स्वर प्रकृति (स्वाभाविक) स्वर होते हैं; और जिन अन्य स्वरों की भी उपेक्षा न करते हुए, जो अनुकरण करने वाले हों या अन्य प्रकार के हों, उन्हें जानने वालों द्वारा बताए जाते हुए जाने। भेड़ के (मिमियाने जैसे), कल, ग्रस्त (दबे), अव्यक्त, गद्गद, क्षाम (क्षीण), दीन और बिखरे हुए स्वर रोगियों के वैकारिक (विकृत) स्वर होते हैं; और जिन अन्य को भी उपेक्षा न करते हुए जाने, जो पहले (वैसे) विकृत न होकर (अब) उत्पन्न हुए हों। इस प्रकार प्रकृति और विकृति के स्वर बता दिए गए हैं।
। ॥ १५ ॥
उनमें प्रकृति (स्वाभाविक) और विकृत स्वरों का शीघ्र उत्पन्न (परिवर्तित) होना, स्वरों का अनेक हो जाना और एक (स्वर) का अनेक रूप हो जाना अशुभ है। यह स्वर का अधिकार (प्रकरण) हुआ।
॥ १६ ॥
इस प्रकार वर्ण और स्वर, दोनों प्रकरण, मृत्यु के निकट व्यक्तियों के लक्षण जानने के लिए यथावत् कहे गए।
- । ॥ १७ ॥
यहाँ (इस विषय में) ये श्लोक भी हैं - जिस (रोगी) के शरीर में विकृत वर्ण उत्पन्न हो, आधे में या पूरे में, और उसका कोई कारण न हो, वह (जीवित) नहीं रहता।
। ॥ १८ ॥
नीला, या फिर श्याव (गहरा भूरा), ताँबे जैसा या फिर अरुण (लाल-भूरा) - आधे मुख का वर्ण अन्यथा (बदला हुआ) हो, तो आधे मुख में अरिष्ट कहा जाता है।
। ॥ १९ ॥
आधे मुख में चिकनापन साफ दिखे, आधे मुख में अत्यधिक रूखापन, (आधे में) ग्लानि तथा (आधे) मुख में हर्ष (रोमांच) हो, तो यह मृत्यु (प्रेत) का लक्षण है।
। ॥ २० ॥
तिलक, पिप्लु, व्यङ्ग और अनेक प्रकार की रेखाएँ, प्राण छोड़ने को उद्यत रोगी के मुख पर शीघ्र उत्पन्न हो जाती हैं।
। ॥ २१ ॥
नाखूनों और दाँतों पर फूल जैसे चिह्न, या दाँतों से लगा हुआ कीचड़ (मैल), या दाँतों पर चूर्ण जैसी परत - यह मृत्यु का लक्षण है।
। ॥ २२ ॥
ओष्ठों, पैरों, हाथों, आँखों, मूत्र और मल में तथा नाखूनों में भी वर्ण-विकृति - बल से क्षीण व्यक्ति में यह मृत्यु-कारक (मृत्यु का सूचक) है।
। ॥ २३ ॥
जिसके दोनों ओष्ठ पके हुए जामुन के समान नीले हो जाएँ, उसे धीर मनुष्य "यह मरने वाला है" ऐसा जाने; वह गतायु (जिसकी आयु समाप्त हो गई) है।
। ॥ २४ ॥
जिस प्राणी का एक या अनेक विकृत स्वर अचानक उत्पन्न हो जाए, जो क्षीण होता जा रहा हो, वह (जीवित) नहीं रहता।
। ॥ २५ ॥
और भी जो कुछ दूसरा विकार स्वर और वर्ण में हो, बल और मांस से हीन (क्षीण) व्यक्ति के, वह सब मृत्यु के उदय (आगमन) को बताने वाला है।
- । ॥ २६ ॥
इस विषय में श्लोक- इस प्रकार मरने के निकट (मरणासन्न) लोगों के लक्षण जानने के लिए वर्ण और स्वर कहे गए। जो उन दोनों को भली-भाँति जानता है, वह आयु के ज्ञान में मोह को प्राप्त नहीं होता।
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इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा पुनः संस्कारित तन्त्र के इन्द्रियस्थान में "वर्णस्वरीय इन्द्रिय" नामक पहला अध्याय समाप्त हुआ।