भारत संहिता

अध्याय २

पुष्पितकमिन्द्रियम्

पुष्पित (मृत्यु के पूर्व-संकेत)

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २३)

तत्र श्लोकः-सामान्येन मयोक्तानि लिङ्गानि रसगन्धयीः।पुष्पितस्य नरस्यैतत्फलं मरणमादिशेत्॥

श्लोक २३ →
मुख्य शब्द (६) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
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शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
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अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
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अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
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अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
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अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
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शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

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च. इं. २/१

॥ १ ॥

च. इं. २/२

॥ २ ॥

च. इं. २/३

। ॥ ३ ॥

च. इं. २/४

। ॥ ४ ॥

च. इं. २/५

। ॥ ५ ॥

च. इं. २/६

। ॥ ६ ॥

च. इं. २/७

। ।

च. इं. २/८

। ॥ ८ ॥

च. इं. २/९

। ॥ ९ ॥

च. इं. २/१०

। ॥ १० ॥

च. इं. २/११

। पुष्पितं ॥ ११ ॥

च. इं. २/१२

आपुलुतानाप्लुते काये यस्य गन्धाः शुभाशुभाः।व्यत्यासेनानिमित्ताः स्युः स च पुष्पित उच्यते॥ १२ ॥

च. इं. २/१३

। ॥ १३ ॥

च. इं. २/१४

। ॥ १४ ॥

च. इं. २/१५

इदं चाप्यतिदेशार्थं लक्षणं गन्धसंश्रयम्।वक्ष्यामो यदभिज्ञाय भिषङ्नरणमादिशेत्॥ १५ ॥

च. इं. २/१६

। ॥ १६ ॥

च. इं. २/१७

एतावद्गन्धविज्ञानं,रसज्ञानमतः परम्।आतुराणं शरीरेषु वक्ष्यते विधिपूर्वकम्॥ १७ ॥

च. इं. २/१८

। ॥ १८ ॥

च. इं. २/१९

। ॥ १९ ॥

च. इं. २/२०

। ॥ २० ॥

च. इं. २/२१

मक्षिकाश्चैव यूकाश्च मशकैः सह।विरसादपसर्पन्ति जन्तोः कायान्मुमूर्षतः॥ २१ ॥

च. इं. २/२२

। ॥ २२ ॥

च. इं. २/२३

तत्र श्लोकः-सामान्येन मयोक्तानि लिङ्गानि रसगन्धयीः।पुष्पितस्य नरस्यैतत्फलं मरणमादिशेत्॥ २३ ॥

च. इं. २

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने पुष्पितकमिन्द्रियं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥