॥ १ ॥
अध्याय १२
गोमयचूर्णीयमिन्द्रियम्
गोबर के चूर्ण जैसा (अरिष्ट लक्षण)
मुख्य शब्द (१७) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
- इन्द्रिय
- इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
- स्नेह
- स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
- आतुर
- आतुर - रोगी
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।
- औषध
- औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार
शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।
अर्थ: रोग दूर करने का साधन।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।
- भिषज्
- भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
- विकार
- विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
- गुण
- गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।
चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।
सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।
- कर्मन्
- कर्म - क्रिया, गति
विस्तार
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
- रस
- रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
- शरीर
- शरीर - देह
विस्तार
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
- तमस्
- तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।
चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।
- सत्त्व
- सत्त्व - मन
विस्तार
शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।
चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।
- भेषज
- भेषज - औषध, उपचार
विस्तार
शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।
अर्थ: औषध, उपचार।
चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।
- लिङ्ग
- लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
- आरोग्य
- आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार
शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।
अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।
चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।
- द्रव्य
- द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।
आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।
- युक्ति
- युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार
शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।
अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।
चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।
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मुक्तकेशोऽथवा नग्ने रुदत्यप्रयतेऽथवा।भिषगभ्यागतं दृष्ट्वा दूतं मरणमादिशेत्॥ १० ॥
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दीनभीतद्रुतत्रस्तमलिनामसतीं स्त्रियम्।त्रीन् व्याकृतींश्च षण्डांश्च दूतान् विद्यान्मुमूर्षताम्॥ १६ ॥
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आतुरार्थमनुप्राप्तं खरोष्ट्ररथवाहनम्।दूतं दृद्ष्ट्वा भिषग्विद्यादातुरस्य पराभवम्॥ १८ ॥
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पथच्छेदो बिडालेन शुना सर्पेण वा पुनः।मृगाद्विजानां क्रूराणां गिरो दीप्तां दिशं प्रति॥ २९ ॥
। ॥ ३० ॥
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। ॥ ३२ ॥
प्रवेशे पूर्णकुम्भाग्निमृद्वीजफलसर्पिषाम्।वृषब्राह्मणरत्नान्नदेवतानां च निर्गतिम्॥ ३३ ॥
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। ॥ ४१ ॥
अत्यर्थं पुनरृवेयं विवक्षा नो विधीयते।तस्मिन्नेवाधिकरणे यत् पूर्वमभिशब्दितम्॥ ४२ ॥
। ॥ ४३ ॥
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। ॥ ४५ ॥
प्राणाः समुपतप्यन्ते निज्ञानमुपरुध्यते।वमन्ति बलमङ्गानि चेष्टा व्युपरमन्ति च॥ ४६ ॥
। ॥ ४७ ॥
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। ॥ ५१ ॥
वैवर्ण्यं भजते कायः कायच्छिद्रं विशुष्यति।धूमः संजायते मूर्ध्नी दारुणाख्यश्च चूर्णकः॥ ५२ ॥
। ॥ ५३ ॥
गुणाः शरीरदेशानां शीतोष्णमृदुदारुणाः।निपर्यासेन वर्तन्ते स्थानेष्वन्येषु तद्विधाः॥ ५४ ॥
। ॥ ५५ ॥
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। ॥ ५८ ॥
। ॥ ५९ ॥
प्रकृतिर्हीयतेऽत्यर्थं विकृतिश्चाभिवर्धते।कृत्स्नमौत्पातिकं घोरमरि(नि)ष्टमुपलक्ष्यते॥ ६० ॥
। ॥ ६१ ॥
। ॥ ६२ ॥
। ॥ ६३ ॥
। ॥ ६४ ॥
। ॥ ६५ ॥
।॥ ६६ ॥
। ॥ ६७ ॥
। ॥ ६८ ॥
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। ॥ ७० ॥
॥ ७१ ॥
। ॥ ७२ ॥
कन्यापुंवर्धमानानां बद्धस्यैकपशोस्तस्था।पृथिव्या उद्धृतायाश्च वह्नेः प्रज्वलितस्य च॥ ७३ ॥
। ॥ ७४ ॥
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। ॥ ७७ ॥
।॥ ७८ ॥
। ॥ ७९ ॥
पथि वेश्मप्रवेशे तु विद्यादारोग्यलक्षणम्।मङ्गलाचारसंपन्नः सारुतो वैश्मिको जनः॥ ८० ॥
। ॥ ८१ ॥
। ॥ ८२ ॥
हयानां पुरुषाणां च स्वप्ने समधिरोहणम्।सोमार्काग्निद्विजातीनां गवां नॄणां पयास्विनाम्॥ ८३ ॥
। ॥ ८४ ॥
।॥ ८५ ॥
। । ॥ ८६ ॥
। ॥ ८७ ॥
आरोग्याद्बलमायुश्च सुखं च लभते महत्।इष्टांश्चाप्यपरान् भावान् पुरुषः शुभलक्षणः॥तत्र श्लोकौ -
।॥ ८९ ॥
। ॥ ९० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने गोमयचूर्णीयमिन्द्रियं नाम द्वादशोऽध्यायः॥१२॥