भारत संहिता

अध्याय ११

अणुज्योतीयमिन्द्रियम्

मन्द ज्योति

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भूमिका

इन्द्रियस्थान का यह ग्यारहवाँ अध्याय अणुज्योतीय है, जिसका नाम उसके पहले श्लोक के शब्द ‘अणुज्योतिः’ (मन्द ज्योति) से लिया गया है। इसके उपदेशक भगवान् आत्रेय हैं। अध्याय मृत्यु के निकट आने की सूचना देने वाले लक्षणों का वर्णन करता है।

अध्याय की शुरुआत उन लक्षणों से होती है जिनके बाद, चरक संहिता के अनुसार, लगभग एक वर्ष का जीवन शेष रहता है: दृष्टि और ध्यान का बिगड़ना, उदासी, बलि को पक्षियों का न छूना, और अरुन्धती तारे का न दिखना। इसके बाद छह महीने और फिर एक महीने के भीतर मृत्यु की सूचना देने वाले लक्षण गिनाए गए हैं, जैसे गुणों का बिना कारण हट जाना, माथे पर रेखाएँ, काँपना और बेसुधी, अंगों का सूखना या सूजना।

आगे उन चेष्टाओं का वर्णन है जो मृत्यु के बिलकुल पास पहुँचे व्यक्ति में दिखती हैं: प्रलाप, बाल नोचना, हवा में कुछ ढूँढना, बेवजह हँसना, अपने जनों को न पहचानना और हाथ-पैर तथा साँस का ठण्डा पड़ना। बीच में यह भी कहा गया है कि जब आकाश आदि महाभूतों का अयोग या अतियोग एक साथ दिखे, तब वैद्य औषध का प्रयोग न करे।

अध्याय के अन्त के श्लोक बताते हैं कि रोगों के बहुत बढ़ने और मन के बल के घटने से जीव देह को छोड़ता है, और जो वैद्य, औषध, गुरु और मित्र से ही द्वेष करने लगें, उन्हें यम जी के वश में गया जानना चाहिए। चार पाद साथ हों तो भी गई हुई आयु वाले के लिए व्यर्थ रहते हैं, इसलिए वैद्य को स्वस्थ और रोगी, दोनों की आयु की परीक्षा करनी चाहिए। अन्त में अरिष्ट की परिभाषा दी गई है: चिकित्सा के मार्ग को लाँघ चुके दोष शरीर में फैलकर जो चिह्न प्रकट करते हैं, वह अरिष्ट कहलाता है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २९)

तत्र श्लोकः-क्रियापथमतिक्रान्ताः केवलं देहमाप्लुताः।चिह्नं कुर्वन्ति यद्दोषास्तदरिष्टं निरुच्यते॥

श्लोक २९ →

इस विषय में श्लोक- चिकित्सा के मार्ग को लाँघ चुके और केवल शरीर में फैले हुए दोष जो लक्षण प्रकट करते हैं, वह अरिष्ट कहलाता है।

मुख्य शब्द (११) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

स्वस्थ
स्वस्थ - अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित; निरोगी
विस्तार

शब्द-रचना: स्व (अपने) + स्थ (स्थित)।

अर्थ: जो अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो, अर्थात् निरोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ का भी आश्रय है (सू. १/२४), और कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त - स्वास्थ्य की रक्षा - के लिए माने गए हैं (सू. १/६७)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

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च. इं. ११/१

॥ १ ॥

अब हम अणुज्योतीय (मन्द ज्योति सम्बन्धी) इन्द्रिय (अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. इं. ११/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।

च. इं. ११/३

। ॥ ३ ॥

जिसकी ज्योति (नेत्रों की ज्योति) मन्द हो गई है, जिसका ध्यान अनेक विषयों में बँटा रहता है, जिसकी कान्ति बिगड़ गई है और जिसका मन सदा उदास रहता है, वह कहीं रति (सुख) नहीं पाता और एक वर्ष के भीतर परलोक चला जाता है।

च. इं. ११/४

। ॥ ४ ॥

जिस व्यक्ति की रखी हुई बलि (भोजन की भेंट) को बलि खाने वाले (पक्षी) नहीं खाते, वह एक वर्ष में दूसरे लोक में पहुँचकर पिण्ड को ग्रहण करता है।

च. इं. ११/५

। ॥ ५ ॥

जो प्राणी सप्तर्षि (तारामण्डल) के समीप स्थित अरुन्धती (तारे) को नहीं देखता, वह वर्ष के अन्त में महान् अन्धकार (मृत्यु) को देखता है।

च. इं. ११/६

। ॥ ६ ॥

जो बिना किसी कारण के, विकार (प्रकृति से भिन्न स्थिति) के रूप में, शोभा, वृद्धि या धन पाता है, अथवा उससे विभ्रंश (पतन, ह्रास) पाता है, उसका जीवन वर्ष के अन्त वाला होता है।

च. इं. ११/७

। ॥ ७ ॥

भक्ति, शील, स्मृति, त्याग, बुद्धि और बल - ये छह बिना किसी कारण के उससे हट जाते हैं जो छह महीने में मरने वाला है।

च. इं. ११/८

। ॥ ८ ॥

जिसके माथे पर पहले कभी न दिखी धमनियों का अत्यन्त सुन्दर जाल दिखाई देता है, वह छह महीने नहीं जीता।

च. इं. ११/९

। ॥ ९ ॥

जिसका माथा चन्द्रमा के समान टेढ़ी रेखाओं से भर जाता है, उसकी आयु का अन्त छह महीनों में बताना चाहिए।

च. इं. ११/१०

। ॥ १० ॥

जिसके शरीर का काँपना, मोह (बेसुधी), चाल और वाणी भी मतवाले व्यक्ति के समान दिखाई देते हैं, वह एक महीना नहीं जीता।

च. इं. ११/११

। ॥ ११ ॥

जिसका वीर्य, मूत्र और मल पानी में डूब जाते हैं, वह एक महीने में अपने ही जनों से द्वेष करने वाला होकर मृत्यु रूपी जल में डूब जाता है।

च. इं. ११/१२

। ॥ १२ ॥

जिसका शरीर विशेष रूप से सूखता जाता है, पर शरीर के शेष भाग के बिना हाथ-पैर और मुख, ये दोनों सूज जाते हैं, वह एक महीना नहीं जीता।

च. इं. ११/१३

। ॥ १३ ॥

जिसके माथे, सिर या बस्ति पर बालचन्द्र के समान टेढ़ी नीली रेखा दिखाई देती है, वह जीने योग्य नहीं रहता।

च. इं. ११/१४

। ॥ १४ ॥

जिसके शरीर पर मूँगे की गोली जैसी चमक वाली मसूरिकाएँ (एक प्रकार की फुंसियाँ) निकलकर शीघ्र नष्ट हो जाती हैं, वह भी देर से नहीं, शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।

च. इं. ११/१५

। ॥ १५ ॥

जिसकी गर्दन में अवमर्द (मसलने जैसी पीड़ा) हो, जीभ की सूजन प्रबल हो, और ब्रध्न, मुख तथा गले का पकना हो, उसे पका हुआ (मृत्यु के लिए पक चुका) बताना चाहिए।

च. इं. ११/१६

। ॥ १६ ॥

भ्रम (घबराहट), अत्यधिक प्रलाप और हड्डियों का अत्यन्त भयंकर टूटना या फटना, ये तीनों काल के पाश से घिरे हुए व्यक्ति में प्रकट होते हैं।

च. इं. ११/१७

। ॥ १७ ॥

काल से प्रेरित वह दुर्बल मनुष्य बेसुध होकर बालों को नोचता है और स्वस्थ व्यक्ति की तरह भोजन को बहुत अधिक पकड़ता (ग्रहण करता) है।

च. इं. ११/१८

। ॥ १८ ॥

आँखों के पास अँगुलियों वाले हाथ को लाकर उसे ढूँढता-सा देखता है, और काल से अन्धा हुआ वह मुस्कुराता भी है; उसकी आँखें ऊपर चढ़ी और बिना पलक झपकाए रहती हैं।

च. इं. ११/१९

। ॥ १९ ॥

काल से प्रेरित वह मोह में पड़ा हुआ व्यक्ति शय्या से, आसन से, अपने अंग से, लकड़ी से अथवा दीवार से किसी असत् (न होने वाली) वस्तु को ढूँढता है।

च. इं. ११/२०

। ॥ २० ॥

जो न हँसने योग्य बात पर हँसता है, बेसुध होता हुआ दोनों होंठ चाटता है, और जिसके पैर, हाथ तथा श्वास ठण्डे हैं, वह मनुष्य जीवित नहीं रहता।

च. इं. ११/२१

। ॥ २१ ॥

महामोह से ढके मन वाला वह, पास में खड़े अपने जन को अथवा किसी और व्यक्ति को ही बुलाता हुआ, देखता हुआ भी नहीं देखता।

च. इं. ११/२२

। ॥ २२ ॥

बुद्धिमान् वैद्य शरीर में आकाश आदि (महाभूतों) के अयोग या अतियोग को एक साथ देखकर औषध का प्रयोग न करे।

च. इं. ११/२३

। ॥ २३ ॥

रोगों के अत्यन्त बढ़ जाने से और मन के बल के क्षय से शरीरधारी जीव देह नामक अपने निवास को शीघ्र छोड़ देता है।

च. इं. ११/२४

। ॥ २४ ॥

प्राणों के क्षय होने पर वर्ण (रंग), स्वर, अग्नि का बल, वाणी, इन्द्रिय और मन का बल घट जाते हैं; और निद्रा सदा बनी रहती है, या फिर होती ही नहीं।

च. इं. ११/२५

। ॥ २५ ॥

जो वैद्य, औषध, पेय, अन्न, गुरु और मित्र से द्वेष करते हैं, इन सभी को यम (समवर्ती) के वश में गया हुआ ही जानना चाहिए।

च. इं. ११/२६

। ॥ २६ ॥

इनमें रोग बढ़ता है और औषध निष्फल हो जाती है। इनके अन्न न खाए और इनका जल भी न छुए।

च. इं. ११/२७

। ॥ २७ ॥

चारों पाद एकत्र हों और साधक गुणों से युक्त हों, तो भी गई हुई आयु वाले के लिए वे व्यर्थ हैं; द्रव्य के बिना गुणों का उदय नहीं होता।

च. इं. ११/२८

। ॥ २८ ॥

वैद्य को स्वस्थ और रोगी, दोनों की आयु की परीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि आयु के ज्ञान का सम्पूर्ण फल आयु को जानने वाले को ही मिलता है।

च. इं. ११/२९

- । ॥ २९ ॥

इस विषय में श्लोक- चिकित्सा के मार्ग को लाँघ चुके और केवल शरीर में फैले हुए दोष जो लक्षण प्रकट करते हैं, वह अरिष्ट कहलाता है।

च. इं. ११

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश के रचे और चरक द्वारा संशोधित तन्त्र के इन्द्रियस्थान में अणुज्योतीय इन्द्रिय नामक ग्यारहवाँ अध्याय (समाप्त हुआ)।