भूमिका
इन्द्रियानीकमिन्द्रियम् चरक संहिता के इन्द्रिय स्थान का चौथा अध्याय है; इसका नाम इसके आरम्भिक शब्दों से लिया गया है। यह अध्याय पूरा का पूरा इस प्रश्न पर है कि इन्द्रियों के ज्ञान में आने वाले किन बिगाड़ों को मृत्यु या आयु के क्षय का लक्षण माना गया है। इन्द्रिय का अर्थ है जानने के साधन, जैसे आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा। जिस लक्षण से आने वाली मृत्यु की सूचना मिलती है, उसे अरिष्ट लक्षण कहा जाता है। उपदेश भगवान् आत्रेय का है।
अध्याय की घोषणा के बाद भगवान् आत्रेय पहले यह बताते हैं कि वैद्य प्राणी की इन्द्रियों की परीक्षा कैसे करे। इन्द्रियों का ज्ञान सीधे दिखाई नहीं देता, इसलिए उसकी परीक्षा अनुमान से की जाती है। कसौटी यह रखी गई है कि जिसका इन्द्रियों पर आश्रित ज्ञान स्वस्थ लोगों की तुलना में बिना किसी कारण के बिगड़ा दिखे, वह मृत्यु का लक्षण है। फिर इसी बात को विस्तार से कहने की प्रतिज्ञा की जाती है।
विस्तार का सबसे बड़ा भाग दृष्टि के बिगाड़ों का है। जो आकाश को ठोस और पृथ्वी को आकाश जैसा देखे, जो साफ जल में जाल देखे, जो जागते हुए प्रेतों और राक्षसों को देखे, जो अग्नि को उसके स्वाभाविक रंग में न देखे, जो बिना बादलों के बिजली देखे, या जो सूर्य और चन्द्रमा को ढकी हुई मिट्टी की पात्री जैसा देखे, ऐसे अनेक दृश्य गिनाए गए हैं। इसके बाद श्रवण, गन्ध, रस और स्पर्श के बिगाड़ आते हैं: जो शब्द न होने पर शब्द सुने या शब्द को न पहचाने, जो गन्धों के अच्छे और बुरे होने को उलटा जाने, जो रसों को न पहचाने, और जो छूकर पदार्थों में भिन्नता माने। अन्त में ऐसे लक्षण भी हैं जो किसी एक इन्द्रिय के नहीं हैं: बिना तप या योग के इन्द्रियों से अपनी सामान्य सीमा से अधिक देखना, और बुद्धि के विपर्यास से इन्द्रियों के विषयों में बार-बार वह विकृति देखना जो वास्तव में है नहीं।
अध्याय के अन्त में एक श्लोक आता है जिसके अनुसार जो वैद्य इस इन्द्रिय-विज्ञान को यथार्थ रूप में समझता है, वही मृत्यु और जीवन को जानने योग्य है। पाठक को यह ध्यान रखना चाहिए कि यहाँ चरक संहिता बता रही है कि कौन-सा बिगाड़ मृत्यु का संकेत है; यह किसी के लिए चिकित्सा-सलाह नहीं है। कुछ श्लोकों का अर्थ छपे पाठ और उसके विश्लेषण में गड़बड़ी के कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, और उन श्लोकों की व्याख्या में यह कहा गया है।