भारत संहिता

अध्याय ५

पूर्वरूपीयमिन्द्रियम्

पूर्वरूप (से मृत्यु के लक्षण)

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भूमिका

पूर्वरूपीय चरक संहिता के इन्द्रियस्थान का पाँचवाँ अध्याय है। इसका नाम इसके पहले शब्दों 'पूर्वरूपीय' से पड़ा है, और इस अध्याय का विषय है पूर्वरूप से मृत्यु के लक्षण। पूर्वरूप का अर्थ है किसी रोग के प्रकट होने से पहले दिखने वाले संकेत। आत्रेय बताते हैं कि वे असाध्य रोगों के पूर्वरूप अलग-अलग कहेंगे, ताकि वैद्यों का ज्ञान बढ़े।

अध्याय का आरम्भ यह बताने से होता है कि ज्वर के प्रसंग में कहे गए सभी पूर्वरूप जिस मनुष्य में बहुत अधिक मात्रा में प्रकट हों, उसके पास मृत्यु ज्वर को आगे करके आती है, और किसी दूसरे रोग के पूर्वरूप इसी तरह प्रकट हों तो भी मृत्यु निश्चित है। इसके बाद आत्रेय कुछ और अत्यन्त भयंकर पूर्वरूप गिनाते हैं। इनमें शोष, गुल्म, कुष्ठ, प्रमेह, उन्माद और अपस्मार जैसे रोगों के संकेत हैं, और कई स्वप्न भी हैं जिनके साथ मृत्यु का सम्बन्ध बताया गया है।

फिर अध्याय कुछ भयंकर स्वप्नों की लम्बी सूची देता है, जो कई श्लोकों में एक ही वाक्य की तरह चलती है: सिर पर बाँस और लता उगना, पशु-पक्षियों और राक्षसों से घिरना, गड्ढे या जल में गिरना, दाँत, चन्द्रमा और सूर्य का गिरना, और ऐसे ही दूसरे दृश्य। ग्रन्थ के अनुसार ऐसे स्वप्न तब आते हैं जब मन को वहन करने वाले स्रोत अत्यन्त बलवान् दोषों से भर जाते हैं।

अन्त में अध्याय स्वप्नों को स्वयं समझाता है। स्वप्न के सात प्रकार गिनाए गए हैं: देखा हुआ, सुना हुआ, अनुभव किया हुआ, चाहा हुआ, कल्पित, भाविक और दोष से उत्पन्न। इनमें पहले पाँच, दिन का स्वप्न और बहुत छोटा या बहुत लम्बा स्वप्न निष्फल कहे गए हैं। रात के पहले भाग का स्वप्न थोड़ा फल देता है, और जिसे देखकर मनुष्य फिर न सोए वह शीघ्र बड़ा फल देता है। अशुभ स्वप्न के बाद उसी रात शुभ स्वप्न दिखे तो फल शुभ जाना जाता है।

अध्याय का सार यह है कि जो वैद्य पूर्वरूपों और इन भयंकर स्वप्नों को जानता है, वह मोह में पड़कर असाध्य रोगों में चिकित्सा-कर्म आरम्भ नहीं करता। यह ज्ञान पाठ के कथन के रूप में दिया गया है, किसी उपचार की सलाह के रूप में नहीं।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ४७)

तत्र श्लोकः-पूर्वरूपाण्यथ स्वप्नान् य इमान् वेत्ति दारुणान्।न स मोहादसाध्येषु कर्माण्यारभते भिषक्॥

श्लोक ४७ →

इस विषय में श्लोक- जो वैद्य पूर्वरूपों को तथा इन भयंकर स्वप्नों को जानता है, वह मोह से असाध्य रोगों में चिकित्सा-कर्म आरम्भ नहीं करता।

मुख्य शब्द (८) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. इं. ५/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम पूर्वरूपीय नामक इन्द्रिय (स्थान के अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. इं. ५/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।

च. इं. ५/३

। ॥ ३ ॥

असाध्य रोगों के पूर्वरूपों को, जो (रोगों के अनुसार) कुछ भिन्न और कुछ मिलते-जुलते हैं, हम वैद्यों के ज्ञान की वृद्धि के लिए अलग-अलग कहेंगे।

च. इं. ५/४

। ॥ ४ ॥

ज्वर (के प्रसंग) में कहे गए सभी पूर्वरूप अत्यधिक मात्रा में जिस मनुष्य में प्रवेश करते हैं, उसमें ज्वर को आगे करके मृत्यु प्रवेश करती है।

च. इं. ५/५

। ॥ ५ ॥

और दूसरे रोग के भी पूर्वरूप जिस मनुष्य में इसी प्रकार (अत्यधिक मात्रा में) प्रवेश करते हैं, उसकी भी मृत्यु निश्चित है।

च. इं. ५/६

। ॥ ६ ॥

परन्तु अब हम पूर्वरूपों के कुछ दूसरे, अत्यन्त भयंकर अंशों को कहेंगे, जो रोहों (रोगों के उभार) से जुड़ते हैं और जिनसे मृत्यु जुड़ी रहती है।

च. इं. ५/७

। ॥ ७ ॥

जिसका बल घटता है और प्रतिश्याय बढ़ता है, स्त्रियों में अत्यन्त आसक्त उस मनुष्य को अन्त (मृत्यु) के लिए शोष उत्पन्न होता है।

च. इं. ५/८

। ॥ ८ ॥

जो स्वप्न में कुत्तों, ऊँटों अथवा गधों (से खींचा जाता हुआ) दक्षिण दिशा को जाता है, वह यक्ष्मा को पाकर जीवन छोड़ देता है।

च. इं. ५/९

। ॥ ९ ॥

जो स्वप्न में प्रेतों के साथ मद्य पीता है और कुत्ते द्वारा खींचा जाता है, वह अत्यन्त भयंकर ज्वर को पाकर जीवन छोड़ देता है।

च. इं. ५/१०

। ॥ १० ॥

जो लाख के रंग वाले लाल वस्त्र जैसी आभा के आकाश को पास से देखता है, वह रक्तपित्त को पाकर उसी से मृत्यु की ओर ले जाया जाता है।

च. इं. ५/११

। ॥ ११ ॥

लाल माला पहने, सभी अंगों में लाल, लाल वस्त्र पहने, बार-बार हँसता हुआ जो मनुष्य स्वप्न में स्त्री द्वारा ले जाया जाता है, वह रक्त को पाकर नष्ट हो जाता है।

च. इं. ५/१२

। ॥ १२ ॥

शूल (पीड़ा), आटोप (पेट फूलना), आँतों की गुड़गुड़ाहट, अत्यधिक दुर्बलता, और नाखून आदि में रंग का बिगड़ना - गुल्म के साथ ये (हों तो) अन्त करने वाला ग्रह होता है।

च. इं. ५/१३

। ॥ १३ ॥

स्वप्न में जिसके हृदय में भयंकर काँटों वाली लता उत्पन्न होती है, उस मनुष्य में अन्त के लिए क्रूर गुल्म प्रवेश करता है।

च. इं. ५/१४

। ॥ १४ ॥

जिसके शरीर में थोड़ा-सा भी छू जाने पर वह स्थान बहुत अधिक फट जाता है, और घाव भरते नहीं, उसे कुष्ठ के द्वारा मृत्यु मार देती है।

च. इं. ५/१५

। ॥ १५ ॥

स्वप्न में जो नग्न है, घी से सींचा हुआ है और बिना लपट वाली अग्नि में आहुति देता है, कुष्ठ से मरने वाले उस मनुष्य की छाती पर कमल उत्पन्न होते हैं।

च. इं. ५/१६

। ॥ १६ ॥

स्नान किए हुए और लेप लगे शरीर वाले पर भी जिसके ऊपर मक्खियाँ मँडराती हैं, वह प्रमेह से संस्पर्ण (सम्पर्क) पाकर उसी से मारा जाता है।

च. इं. ५/१७

। ॥ १७ ॥

जो मनुष्य स्वप्न में चाण्डालों के साथ अनेक प्रकार के स्नेह (घी, तेल आदि चिकने पदार्थ) पीता है, वह प्रमेह से बाँधा जाता है और अन्त (मृत्यु) के लिए छुआ जाता है।

च. इं. ५/१८

। ॥ १८ ॥

चिन्ता और थकावट, दोनों उद्वेग (घबराहट), अनुचित स्थान पर उत्पन्न मोह, अरति, बल की हानि - (ये लक्षण हों तो) मृत्यु के पहले उन्माद आता है।

च. इं. ५/१९

। ॥ १९ ॥

भोजन से द्वेष करने वाले, चित्त खोए हुए और अत्यन्त पीड़ित मनुष्य को देखकर धीर (वैद्य) उसे शीघ्र घातक उन्माद से मरने वाला जाने।

च. इं. ५/२०

। ॥ २० ॥

क्रोधी, भय की अधिकता वाले, कभी-कभी अचानक हँसते मुख वाले तथा मूर्च्छा और प्यास की अधिकता वाले देहधारी को उन्माद मार देता है।

च. इं. ५/२१

। ॥ २१ ॥

जो स्वप्न में राक्षसों के समूहों के साथ नाचता हुआ जल में डूबता है, वह अत्यन्त उन्माद को पाकर इस लोक से परे के लोक को चला जाता है।

च. इं. ५/२२

। ॥ २२ ॥

जो जागते हुए अत्यन्त असत् (अवास्तविक) वस्तुएँ देखता है और असत् (अवास्तविक), बहुत-सी, अनेक प्रकार की ध्वनियाँ भी सुनता है, वह अपस्मार से जकड़ लिया जाता है।

च. इं. ५/२३

। ॥ २३ ॥

स्वप्न में मतवाला होकर नाचते हुए जिस मनुष्य को प्रेत झकझोरकर ले जाता है, उसे मृत्यु ले जाती है, जिसके आगे-आगे अपस्मार चलता है।

च. इं. ५/२४

। ॥ २४ ॥

जागने पर जिसके दोनों जबड़े, दोनों मन्या (गर्दन की नसें) और दोनों आँखें जकड़ जाती हैं, उसे बहिरायाम जकड़कर निश्चय ही मार देता है।

च. इं. ५/२५

। ॥ २५ ॥

जो मनुष्य स्वप्न में शष्कुलियाँ (तले हुए पकवान) अथवा अपूप (पूए) खाता है, वह यदि जागने पर वैसा ही वमन करे तो जीवित नहीं रहता।

च. इं. ५/२६

। ॥ २६ ॥

जो इन पूर्वरूपों को ठीक से जान लेता है, वह इनके अनुबन्ध और फल को जानने के योग्य है।

च. इं. ५/२७

। ॥ २७ ॥

इन दूसरे भयंकर स्वप्नों को भी (वैद्य) पहचाने, जो रोगियों के विनाश के लिए अथवा बड़े कष्ट के लिए (होते हैं)।

च. इं. ५/२८

। ॥ २८ ॥

जिसके सिर पर स्वप्न में बाँस, झाड़ी, लता आदि उग आते हैं और पक्षी (वहाँ) बस जाते हैं, तथा जो स्वप्न में मैण्ड्य को प्राप्त होता है

च. इं. ५/२९

।॥ २९ ॥

जो स्वप्न में गिद्ध, उल्लू, कुत्ते, कौए आदि से तथा राक्षस, प्रेत, पिशाच, स्त्री, चण्डाल, द्रविड और आन्ध्र जनों से घिर जाता है

च. इं. ५/३०

। ॥ ३० ॥

जो स्वप्न में बाँस, बेंत, लता, फन्दे, तृण और काँटों से भरे (स्थान) में फँस जाता है, और जो चलते हुए गिर भी पड़ता है

च. इं. ५/३१

। ॥ ३१ ॥

जो स्वप्न में धूल के तकिये वाली भूमि में, दीमक की बाँबी में, या राख में, श्मशान-स्थल में अथवा गड्ढे में गिर पड़ता है

च. इं. ५/३२

। ॥ ३२ ॥

जो स्वप्न में गँदले जल में, कीचड़ में अथवा अन्धकार से ढके कुएँ में डूब जाता है, और तेज़ धारा में बह जाता है

च. इं. ५/३३

। ॥ ३३ ॥

स्वप्न में स्नेहपान (घी-तेल आदि पीना), अभ्यङ्ग (तेल मालिश), वमन और विरेचन, सोने की प्राप्ति, झगड़ा, बन्धन और पराजय

च. इं. ५/३४

। ॥ ३४ ॥

(स्वप्न में) जूतों की जोड़ी का खो जाना, पैरों के चर्म (जूतों) का गिरना, हर्ष, और कुपित पितरों द्वारा डाँटा जाना

च. इं. ५/३५

। ॥ ३५ ॥

(स्वप्न में) दाँत, चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र, देवता, दीप और आँखों का गिरना अथवा नाश, अथवा पर्वत का टूटना

च. इं. ५/३६

। ॥ ३६ ॥

जो स्वप्न में लाल फूलों वाले वन में, पापकर्म के निवास वाली भूमि में, चिता में, तथा गुफा के अन्धकार से भरे (स्थान) में प्रवेश करता है

च. इं. ५/३७

। ॥ ३७ ॥

(जो) स्वप्न में लाल माला पहने, जोर से हँसता हुआ, नग्न होकर, बन्दरों से जुते (वाहन) से दक्षिण दिशा के भयंकर वन में जाता है

च. इं. ५/३८

। ॥ ३८ ॥

स्वप्न में गेरुए वस्त्र वालों, कठोर स्वभाव वालों, नग्नों, दण्ड धारण करने वालों, काले तथा लाल नेत्र वालों का दर्शन (लोग) नहीं चाहते।

च. इं. ५/३९

। ॥ ३९ ॥

स्वप्न में काली, पापिनी, आचारहीन, लम्बे केश, नाखून और स्तनों वाली तथा फीकी माला और वस्त्र वाली (स्त्री) कालनिशा मानी गई है।

च. इं. ५/४०

। ॥ ४० ॥

इस प्रकार ये भयंकर स्वप्न हैं, जिनसे रोगी मृत्यु को प्राप्त होता है; (और जो) निरोगी है, वह भी संशय में पहुँचकर कोई-कोई ही मुक्त होता है।

च. इं. ५/४१

। ॥ ४१ ॥

मन को वहन करने वाले स्रोतों के अत्यन्त बलवान् तीनों दोषों से भर जाने के कारण (मनुष्य) भयंकर समय में भयंकर स्वप्न देखता है।

च. इं. ५/४२

। ॥ ४२ ॥

बहुत गहरी नींद में न सोया हुआ पुरुष इन्द्रियों के स्वामी मन से फल वाले तथा निष्फल स्वप्नों को अनेक प्रकार से देखता है।

च. इं. ५/४३

। ॥ ४३ ॥

देखा हुआ, सुना हुआ और अनुभव किया हुआ, चाहा हुआ, कल्पित, भाविक तथा दोष से उत्पन्न - स्वप्न को (विद्वान्) सात प्रकार का जानते हैं।

च. इं. ५/४४

। ॥ ४४ ॥

उन (सात) में पहले पाँच प्रकार के स्वप्न को बुद्धिमान् वैद्य निष्फल बताए, तथा दिन के स्वप्न को और बहुत छोटे तथा बहुत लम्बे (स्वप्न) को भी।

च. इं. ५/४५

। ॥ ४५ ॥

रात के पहले भाग में जो स्वप्न देखा जाता है, वह थोड़े फल वाला होता है; जिसे देखकर (मनुष्य) फिर न सोए, वह शीघ्र बड़े फल वाला होता है।

च. इं. ५/४६

। ॥ ४६ ॥

अशुभ स्वप्न देखकर भी जो उसी (रात) में फिर सौम्य, शुभ आकार वाला (स्वप्न) देखे, उसका फल शुभ जाने।

च. इं. ५/४७

- । ॥ ४७ ॥

इस विषय में श्लोक- जो वैद्य पूर्वरूपों को तथा इन भयंकर स्वप्नों को जानता है, वह मोह से असाध्य रोगों में चिकित्सा-कर्म आरम्भ नहीं करता।

च. इं. ५

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा संशोधित तन्त्र के इन्द्रियस्थान में 'पूर्वरूपीय इन्द्रिय' नामक पाँचवाँ अध्याय (समाप्त हुआ) ॥५॥