भारत संहिता

अध्याय १

मदनकल्पोऽध्यायः

मदन (मैनफल) के योग

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भूमिका

मदनकल्प चरक संहिता के कल्पस्थान का पहला अध्याय है; इसके नाम का अर्थ है मदन (मैनफल) के कल्प, यानी योग। कल्प का अर्थ है किसी द्रव्य को औषध के अनेक रूपों में तैयार करने की विधियाँ। भगवान् आत्रेय अग्निवेश से कहते हैं कि कल्पस्थान इसलिए कहा जा रहा है कि वमन और विरेचन के द्रव्यों को दूसरे अनेक द्रव्यों के साथ मिलाकर अनेक योग बनाए जा सकें, उनके भेद और विभाग बताए जा सकें, और उन योगों की क्रिया-विधि ठीक से और सुखपूर्वक तैयार हो सके। इस अध्याय में यह उपदेश मदनफल को लेकर दिया गया है।

अध्याय के आरम्भ में पाठ वमन और विरेचन को परिभाषित करता है: दोषों को ऊपर के मार्ग से निकालना वमन है और नीचे के मार्ग से निकालना विरेचन; शरीर के मलों को निकालने के कारण दोनों के लिए विरेचन शब्द भी चलता है। फिर बताया गया है कि उष्ण, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, व्यवायी और विकाशी औषधियाँ शरीर में कैसे काम करती हैं, और अग्नि-वायु के अंश वाली औषध दोष को ऊपर की ओर, तथा जल-पृथ्वी के अंश वाली नीचे की ओर कैसे ले जाती है। इसके बाद उन द्रव्यों के नाम गिनाए गए हैं जिनसे छह सौ विरेचन-योग कहे जाएँगे, और यह कि द्रव्य देश, काल, गुण और पात्र की सम्पन्नता से ही अपना काम सबसे अच्छी तरह करते हैं।

इन्हीं बातों को पाठ क्रम से खोलता है। पहले देश के तीन भेद हैं: जाङ्गल, आनूप और साधारण, हर एक के वृक्ष, पक्षी, हवा, दोष और वहाँ के मनुष्यों के लक्षणों के साथ। फिर बताया गया है कि कैसी भूमि में उगी औषधियाँ प्रशस्त मानी जाती हैं, किस ऋतु में पौधे का कौन-सा अंग ग्रहण किया जाए, ग्रहण करने वाले का आचार कैसा हो, और ग्रहण किए हुए द्रव्य कहाँ और कैसे रखे जाएँ। संक्षेप में यह भी कहा गया है कि दोष के अनुसार द्रव्यों को किन द्रवों से भावित किया जाता है, और विस्तार आगे के अध्यायों के लिए रखा गया है। इसके बाद पाठ मदनफल पर आता है: उसे वमन के द्रव्यों में सबसे श्रेष्ठ कहा गया है, और उसे चुनने, तोड़ने, संस्कारित करने, सुखाने और घड़े में रखने की विधि दी गई है।

फिर वमन की विधि का पूरा क्रम है: रोगी की तैयारी, उसे दी जाने वाली फलपिप्पली का कषाय, मन्त्र से उसका अभिमन्त्रण, और वेग के कम होने पर क्या किया जाए। उसके बाद फलपिप्पली के अनेक रूप गिनाए गए हैं: गोलियाँ, दूध और उससे बने योग, मक्खन, कमल पर चूर्ण छिड़ककर सुँघाना, फाणित जैसा लेह, वर्ति, तथा अनेक द्रव्यों के कषाय से बने लेह, उत्कारिका, मोदक, शष्कुली और पूप। अध्याय के अन्त में मदन के छह पर्याय नाम दिए गए हैं और श्लोकों में योगों की गिनती का सार है, जिसके अनुसार महर्षि ने फलकल्प में एक सौ तैंतीस योग बताए हैं।

इस अध्याय से पाठक यह लेकर जाए कि चरक संहिता के अनुसार किसी द्रव्य का असर केवल उसके नाम से तय नहीं होता: वह कहाँ उगा, कब और कैसे लिया गया, कैसे रखा गया, और किस दोष, किस रोग और किस रोगी के लिए है, ये सब बातें गिनी जाती हैं। इसी से एक ही द्रव्य के अनेक योग बनते हैं। यह अध्याय पाठ का वर्णन है; इसमें कही गई विधियाँ किसी के लिए सलाह नहीं हैं।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २८-३०)

तत्र श्लोकाः-नव योगाः कषायेषु, मात्रास्वष्टौ, पयोघृते।पञ्च, फाणितचूर्णे द्वौ घ्रेये, वर्तिक्रियासु षट्॥

श्लोक २८ →

वहाँ (इस विषय में) श्लोक - कषायों में नौ योग हैं, मात्राओं में आठ, दूध और घी में पाँच, फाणित और चूर्ण में दो, सूँघने योग्य में दो, और वर्ति-क्रियाओं में छह।

विंशतिर्विंशतिर्लेहमोदकोत्कारिकासु च।शष्कुलीलूलयोश्चोक्ता योगाः षोडश षोडश॥

श्लोक २९ →

लेह, मोदक और उत्कारिका में बीस-बीस, तथा शष्कुली और लूल में सोलह-सोलह योग कहे गए हैं।

दशान्ये षाडवाद्येषु त्रयस्त्रिंशदिदं शतम्।योगानां विधिवद्दिष्टं फलकल्पे महर्षिणा॥

श्लोक ३० →

षाडव आदि में अन्य दस, इस प्रकार योगों का यह एक सौ तैंतीस (की संख्या का) समूह महर्षि ने फलकल्प में विधिपूर्वक बताया है।

मुख्य शब्द (१६) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

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च. क. १/१

॥ १ ॥

अब हम मदनकल्प (मदन के योगों के अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. क. १/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।

च. क. १/३

- , !॥ ३ ॥

अब निश्चय ही, वमन और विरेचन के योग्य द्रव्यों को, जो सबसे सुख से सेवन किए जा सकते हैं, अन्य अनेक प्रकार के द्रव्यों के साथ मिलाकर कल्पना (अनेक योग बनाने) के लिए (अर्थात् भेद और विभाग के लिए), और उन योगों की क्रिया-विधि को सुखपूर्वक भली-भाँति तैयार करने के लिए, हम कल्पस्थान का उपदेश करेंगे, हे अग्निवेश!

च. क. १/४

, ; ॥ ४ ॥

उनमें दोषों को निकालना यदि ऊपर के मार्ग से हो तो वमन नाम वाला है, नीचे के मार्ग से हो तो विरेचन नाम वाला है; अथवा दोनों ही, शरीर के मलों का विरेचन (निष्कासन) करने के कारण, विरेचन नाम पाते हैं।

च. क. १/५

, , , , । ॥ ५ ॥

उनमें उष्ण, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, व्यवायी और विकाशी औषध अपने वीर्य से हृदय में पहुँचकर, धमनियों के सहारे जाकर, बड़े और सूक्ष्म स्रोतों से, शरीर में स्थित सम्पूर्ण दोषसमूह को अग्निगुण वाला होने से पिघलाकर बहा देते हैं, और तीक्ष्णता से छिन्न-भिन्न कर देते हैं। वह छिन्न-भिन्न हुआ दोषसमूह, स्नेह (चिकनाई) से भावित शरीर में, चिकनाई लगे पात्र में रखे शहद के समान कहीं न चिपकता हुआ तैरता है, और सूक्ष्म (स्रोतों) की ओर झुकाव के कारण आमाशय में पहुँचकर, उदान वायु से प्रेरित होकर, अग्नि और वायु के स्वभाव वाला होने से, औषध के ऊर्ध्वभाग पर प्रभाव (ऊपर की ओर कार्य करने की शक्ति) के कारण ऊपर की ओर फेंक दिया जाता है; और जल तथा पृथ्वी के स्वभाव वाला होने से, औषध के अधोभाग पर प्रभाव के कारण नीचे की ओर प्रवृत्त होता है; और दोनों ओर से, दोनों गुणों वाला होने से, (दोनों ओर निकलता है)। यह लक्षणों का संक्षिप्त कथन है।

च. क. १/६

, , , ॥ ६ ॥

उनमें फल (मदनफल), जीमूतक, इक्ष्वाकु, धामार्गव, कुटज और कृतवेधन के, तथा श्यामा, त्रिवृत् (निशोथ), चतुरङ्गुल, तिल्वक, महावृक्ष, सप्तला, शाङ्खिनी, दन्ती और द्रवन्ती के, अनेक प्रकार के देश और काल में उत्पन्न होने, स्वाद, रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव को ग्रहण करने के कारण, तथा देह, दोष, प्रकृति, वय, बल, अग्नि, भक्ति, सात्म्य और रोग की अवस्था आदि के अनेक प्रकार के प्रभाव वाले होने के कारण, और विचित्र गन्ध, वर्ण, रस और स्पर्श वाले, तथा असंख्य संयोगों वाले होते हुए भी, द्रव्यों के विकल्प (भेद) का मार्ग दिखाने के लिए, उपयोग की सुगमता के लिए हम छह सौ विरेचन-योगों की व्याख्या करेंगे।

च. क. १/७

॥ ७ ॥

वे द्रव्य देश, काल, गुण और पात्र की सम्पन्नता से वीर्य और बल के आधान (प्राप्त होने) के कारण, क्रिया में सबसे अधिक समर्थ होते हैं।

च. क. १/८

, , । , , , , , , , ; , , , , , , , , , , ; ॥ ८ ॥

देश निश्चय ही तीन प्रकार का है - जाङ्गल, आनूप और साधारण। उनमें जाङ्गल देश वह जानना चाहिए जिसमें खुला आकाश अधिक है; जो वृक्षों से भी (युक्त है, और) कदर, खदिर (खैर), असन, अश्वकर्ण, धव, तिनिश, शल्लकी, साल, सोमवल्क, बदरी (बेर), तिन्दुक, अश्वत्थ (पीपल), वट (बरगद) और आमलकी (आँवला) के वनों से सघन है; जिसमें अनेक शमी, ककुभ और शिंशपा के वृक्ष अधिकतर हैं; जहाँ स्थिर और शुष्क वायु के बल से हिलाई जाती तरुण (कोमल) टहनियाँ हैं; जो फैली हुई मृगतृष्णा (मरीचिका) से घिरा है और महीन, खुरदरी, कठोर बालू तथा कंकड़ से भरपूर है; जिसका भूभाग लाव, तीतर और चकोर पक्षियों से विचरित है; जिसमें वात और पित्त की अधिकता है; और जहाँ अधिकतर मनुष्य स्थिर और कठोर हैं। इसके बाद आनूप देश वह जानना चाहिए जो हिन्ताल, तमाल, नारिकेल (नारियल) और कदली (केला) के वनों से सघन है; जो अधिकतर नदियों और समुद्र के किनारों तक फैला है; जिसमें शीतल वायु अधिक है; जिसका भूभाग वञ्जुल और वानीर (बेंत) से शोभित तटों वाली नदियों से युक्त है; जो पर्वतों और लता-कुञ्जों से शोभित है; मन्द वायु से पंखा झले जाते वृक्षों से सघन है; जिसका भूभाग अनेक वन-पंक्तियों के फूले हुए वनों से सघन है; जो चिकनी वृक्ष-लताओं से ढका है; जिसकी वृक्ष-शाखाएँ हंस, चक्रवाक, बलाका, नन्दीमुख, पुण्डरीक, कादम्ब, मद्गु, भृङ्गराज, शतपत्र और मतवाली कोयलों के स्वर से गूँजती हैं; जहाँ के पुरुष सुकुमार (कोमल) हैं; और जिसमें अधिकतर वात और कफ है। इन्हीं दोनों देशों के (मिले-जुले लक्षणों वाला) जो प्रदेश वीरुध् (लताओं), वनस्पतियों, वानस्पत्य वृक्षों, पक्षियों और मृगों के समूहों से युक्त है, और जहाँ के पुरुष स्थिर, सुकुमार, बल, वर्ण और संहनन (शरीर-गठन) से सम्पन्न तथा साधारण गुणों से युक्त हैं, उसे साधारण देश जानना चाहिए।

च. क. १/९

॥ ९ ॥

उनमें साधारण अथवा जाङ्गल देश में - जो समय के अनुसार शीत, धूप, वायु और जल से सेवित है; जो समतल और स्वच्छ है; जिसका जल प्रदक्षिण (दाहिनी ओर) बहता है; जो श्मशान, चैत्य, देवयजन, घर, सभा, गड्ढे, उद्यान, बाँबी और ऊसर से रहित है; जो कुश और रोहिष घास से ढका है; जिसकी मिट्टी चिकनी, काली और मीठी है, अथवा सुनहरे रंग की मीठी मिट्टी वाली है; जो मृदु है, हल से जोता नहीं गया है, और अन्य अधिक बलवान वृक्षों से अनुपहत (अछूता) है - ऐसी भूमि में उत्पन्न हुई औषधियाँ प्रशस्त मानी जाती हैं।

च. क. १/१०

; , , , , ; ॥ १० ॥

उनमें जो (द्रव्य) समय पर उत्पन्न हुए हों, जिनके प्रमाण, रस, वीर्य और गन्ध पूर्ण रूप से प्राप्त हो चुके हों, जिनके गन्ध, रंग, रस, स्पर्श और प्रभाव को समय, धूप, अग्नि, जल, वायु और जन्तुओं ने नष्ट न किया हो, जो ताज़े हों और उत्तर दिशा में स्थित हों; उनकी हाल में उगी शाखा और पत्ते वर्षा और वसन्त में ग्रहण करने चाहिए; ग्रीष्म में मूल, अथवा शिशिर में, जब उनके पत्ते झड़कर फिर उग आए हों; शरद् में छाल, कन्द और दूध (क्षीर); हेमन्त में सार; और ऋतु के अनुसार फूल और फल (ग्रहण करने चाहिए)। मंगलमय आचार वाला, कल्याणकारी आचरण वाला, पवित्र, श्वेत वस्त्र पहने हुए (वैद्य) देवताओं, दोनों अश्विनी (कुमारों), गायों और ब्राह्मणों की पूजा करके, उपवास रखकर, पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके (उन्हें) ग्रहण करे।

च. क. १/११

, ॥ ११ ॥

(द्रव्यों को) ग्रहण करके, उपयुक्त गुण वाले पात्रों में रखकर, उन्हें ऐसे घरों में, जिनके द्वार पूर्व या उत्तर की ओर हों, जिनका एक भाग वायुरहित और (दूसरा) हवादार हो, और जिनमें नित्य फूल, उपहार और बलि कर्म होता हो, भली-भाँति ढककर छींकों में लटकाकर रखे, ऐसी जगह जहाँ अग्नि, जल, भाप, धुएँ, धूल, चूहों और चौपायों की पहुँच न हो।

च. क. १/१२

, , ; । ॥ १२ ॥

उन्हें दोष के अनुसार प्रयोग करे: वात में सुरा, सौवीरक, तुषोदक, मैरेय, मेदक, धान्याम्ल, फलाम्ल, दही की खटास आदि से; पित्त में मुनक्का, आमलक, मधु, मधुक, परूषक, फाणित, दूध आदि से; और कफ में मधु, मूत्र, कषाय आदि से भावित (संस्कारित) और घोले हुए (प्रयोग करे)। यह उद्देश है। उसे हम विस्तार से द्रव्य, देह, दोष, सात्म्य आदि का विभाग करके आगे बताएँगे।

च. क. १/१३

, । । ; , , , । । । ॥ १३ ॥

वमन कराने वाले द्रव्यों में मदन के फल (मैनफल) को सबसे श्रेष्ठ कहते हैं, क्योंकि वे हानि नहीं करते। उन्हें वसन्त और ग्रीष्म के बीच, पुष्य, अश्वयुज् (अश्विनी) या मृगशिरा नक्षत्र में, मैत्र मुहूर्त में तोड़े। जो फल पके हुए, छेद रहित, हरे न रहे, पीलापन लिए सफ़ेद, कीड़ों से रहित, दुर्गन्ध रहित, जन्तुओं से न खाए गए और छोटे न हों, उन्हें पोंछकर साफ़ करे, कुश के दोने में बाँधे, गोबर से लेप करे, और जौ, तुष, उड़द, शालि धान, कुलथी या मूँग के पल (भूसे) में से किसी एक में आठ रात तक रख दे। इसके बाद, जब वे नरम हो जाएँ और शहद जैसी मनभावन गन्ध वाले हो जाएँ, तब निकालकर सुखाए। भली-भाँति सूख जाने पर उनमें से फलपिप्पली निकाल ले। घी, दही, शहद और पलल से मली गई और फिर सुखाई गई उन फलपिप्पलियों से रेत से भली-भाँति माँजे हुए, धूल रहित नए घड़े को गले तक भरकर, उसे भली-भाँति ढककर और भली-भाँति सुरक्षित करके छींकों पर लटकाकर ठीक से रखे।

च. क. १/१४

, - ‘ । ॥ । ॥ , ; । ॥ १४ ॥

अब, जिस रोगी को वमन कराना हो उसे दो या तीन दिन स्नेहन और स्वेदन से युक्त करके, ('कल वमन कराना है' ऐसा सोचकर) ग्राम्य, आनूप और जलचर पशु-पक्षियों के मांसरस, दूध, दही, उड़द, तिल और साग आदि से उसका कफ भली-भाँति उभारकर, रात बीत जाने और भोजन पच जाने पर, पूर्वाह्न में बलि, होम, मंगल कर्म और प्रायश्चित्त कर लेने के बाद, बिना अन्न खाए और अधिक चिकनाई लिए बिना, जब वह यवागू के साथ घी की मात्रा पी चुका हो, तब उन फलपिप्पलियों में से नाखून भीतर रखकर बाँधी मुट्ठी भर, अथवा जितनी ठीक समझे उतनी, जौकुट करके, मुलेठी के कषाय से, या कोविदार, कर्बुदार, नीप, विदुल, बिम्बी, शणपुष्पी, सदापुष्पी और प्रत्यक्पुष्पी के कषायों में से किसी एक से, रात भर भिगोकर, मसलकर और छानकर, शहद और सेंधा नमक मिलाकर, सुखद गुनगुना करके, भरे हुए शराव (कसोरे) को इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करे- 'ॐ ब्रह्मा, दक्ष, अश्विनीकुमार, रुद्र, इन्द्र, पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, वायु और अग्नि, ओषधियों के समूह सहित ऋषि और प्राणियों के समुदाय तुम्हारी रक्षा करें। जैसे रसायन ऋषियों के लिए और अमृत देवताओं के लिए है, जैसे सुधा श्रेष्ठ नागों के लिए है, वैसे ही यह औषध तुम्हारे लिए हो।' इस प्रकार अभिमन्त्रित करके, उत्तर या पूर्व की ओर मुँह किए रोगी को पिलाए। कफ-ज्वर, गुल्म और प्रतिश्याय से पीड़ित को विशेष रूप से बार-बार पिलाए, जब तक पित्त न आने लगे; उससे वह भली-भाँति वमन करता है। जिसका वेग कम हो, उसे पिप्पली, आँवला, सरसों और वच के कल्क तथा नमक मिले गरम जल से बार-बार वमन कराए, जब तक पित्त दिखाई न दे। यह सब वमन-योगों की विधि है।

च. क. १/१५

। , ॥ १५ ॥

सभी वमन-योगों में कफ को पिघलाने और काटने के लिए शहद और सेंधा नमक मिलाए। वमन-योग में मिलाए गए शहद का गरम (वस्तुओं) से विरोध नहीं होता, क्योंकि बिना पचे (दोष) वापस निकल आते हैं और दोष बाहर निकल जाते हैं।

च. क. १/१६

, , ॥ १६ ॥

फलपिप्पली के दो-दो भाग लेकर उन्हें कोविदार आदि के कषाय से इक्कीस बार स्रावित करे (भिगोकर छाने); फिर उसी रस से तीसरा भाग पीसकर हरीतकी, बिभीतक या आमलक के बराबर मात्रा की गोलियाँ बना ले। उनमें से एक या दो गोलियों को पहले कहे हुए कषायों में से किसी एक की एक अञ्जलि भर मात्रा के साथ मसलकर, बलवान् श्लेष्मा के प्रसेक (कफ के स्राव), ग्रन्थि, ज्वर, उदर रोग और अरुचि में पिलाए - यह (विधि) पहले वाली के समान है।

च. क. १/१७

, ; ; , ॥ १७ ॥

फलपिप्पली (के साथ पकाया हुआ) दूध; अथवा उसी (दूध) से बनी क्षीरयवागू, नीचे के मार्ग से होने वाले रक्तपित्त और हृदय की जलन में; अथवा उससे बने दही का ऊपरी भाग (मलाई), कफ की वमन, तमक (श्वास) और प्रसेक में; अथवा उस दूध की ठण्डी की हुई सन्तानिका (मलाई) की अञ्जलि, कुपित पित्त में और उस अवस्था में जब छाती, कण्ठ और हृदय पर हलका कफ चिपका हो - यह (विधि) पहले वाली के समान है।

च. क. १/१८

॥ १८ ॥

फलपिप्पली के साथ पकाए हुए दूध से उत्पन्न मक्खन, जो फलादि के कल्क और कषाय से सिद्ध (पकाया) किया गया हो, उस रोगी को उचित मात्रा में पिलाए जिसकी अग्नि कफ से दब गई हो और जिसका शरीर सूखता जा रहा हो - यह (विधि) पहले वाली के समान है।

च. क. १/१९

, ॥ १९ ॥

फलपिप्पली के चूर्ण को, जो फलादि के कषाय में इक्कीस बार अच्छी तरह भावित (भिगोकर सुखाया) किया गया हो और जो फूल के पराग जैसा दिखता हो, उससे सरोवर में उत्पन्न बड़े कमल पर सायंकाल चूर्ण छिड़के। रात भर रखे हुए उस (कमल) को प्रातःकाल फिर चूर्ण छिड़ककर उठा ले। जिसने हरिद्रा, कृसर या क्षीरयवागू में से किसी एक को सैन्धव, गुड और फाणित मिलाकर कण्ठ तक पी लिया हो, उस सुकुमार रोगी को, जिसके पित्त और कफ उत्क्लिष्ट (उभरे) हों और जो औषध से द्वेष करता हो, (वह कमल) सुँघाए - यह (विधि) पहले वाली के समान है।

च. क. १/२०

; ॥ २० ॥

फलपिप्पली का स्वरस, जिसे भल्लातक की विधि से छाना गया हो, पकाकर फाणित (राब) जैसा गाढ़ा हो जाने पर, तन्तु बँधने की अवस्था तक, चटाए; अथवा धूप में सुखाकर चूर्ण किए हुए (उसे) जीमूतक आदि के कषाय के साथ, कफ के स्थान में पहुँचे हुए पित्त में पिलाए - यह (विधि) पहले वाले के समान है।

च. क. १/२१

॥ २१ ॥

फलपिप्पली के चूर्णों को पहले की तरह फलादि छह में से किसी एक के कषाय से छाना हुआ लेकर, वर्ति (बत्ती या गोली) बनाकर फलादि के कषाय के साथ पिया जाए - यह (विधि) पहले वाले के समान है।

च. क. १/२२

॥ २२ ॥

फलपिप्पली, आरग्वध, वृक्षक, स्वादुकण्टक, पाठा, पाटला, शार्ङ्गेष्टा, मूर्वा, सप्तपर्ण, नक्तमाल, पिचुमर्द, पटोल, सुषवी, गुडूची, सोमवल्क और द्वीपिका में से, तथा पिप्पली, पिप्पलीमूल, हस्तिपिप्पली, चित्रक और शृङ्गवेर में से, किसी एक के कषाय (काढ़े) से सिद्ध किया हुआ लेह (चाटने योग्य औषध) बनता है; शेष पहले के समान है।

च. क. १/२३

, , ॥ २३ ॥

फलपिप्पलियों के विषय में, एला, हरेणुका, शतपुष्पा, कुस्तुम्बुरु, तगर, कुष्ठ, त्वक्, चोरक, मरुबक, अगुरु, गुग्गुलु, एलवालुक, श्रीवेष्टक, परिपेलव, मांसी, शैलेयक, स्थौणेयक, सरल, पारावतपदी और अशोकरोहिणी - इन बीस में से किसी एक के कषाय से सिद्ध की गई उत्कारिका उत्कारिका की विधि से, अथवा मोदक मोदक की विधि से, दोष, रोग और भक्ति (सम्भवतः भोजन की रुचि) के अनुसार प्रयोग करने योग्य हैं; शेष पहले के समान है।

च. क. १/२४

, , ॥ २४ ॥

फलपिप्पली के स्वरस और कषाय में भिगोकर भावित किए गए, तथा तिल और शालि चावल की पिट्ठी (से बने) जिनमें उसी कषाय का मेल हो, शष्कुली की विधि से शाष्कुली, अथवा पूप की विधि से पूप (बनते हैं); शेष पहले के समान है।

च. क. १/२५

॥ २५ ॥

और इसी विधि से सुमुख, सुरस, कुठेरक, काण्डीर, कालमालक, पर्णासक, क्षवक, फणिज्झक, गृञ्जनक, आसमर्द और भृङ्गराज में से, तथा पोटा, इक्षुवालिका, कालङ्कतक और दण्डैरक में से, किसी एक के कषाय से (ये योग) बनवाए।

च. क. १/२६

; ॥ २६ ॥

और इसी प्रकार बदर, षाडव, राग, लेह, मोदक, उत्कारिका, तर्पण, पानक, मांसरस, यूष और मद्य में से किसी एक के साथ मदनफलों को मिलाकर दोष, रोग और भक्ति (सम्भवतः भोजन की रुचि) के अनुसार दे; उनसे (रोगी) भली प्रकार वमन करता है।

च. क. १/२७

। ॥ २७ ॥

मदन, करहाट, राठ, पिण्डीतक, फल और श्वसन - इन पर्याय (समानार्थक) नामों से उसकी कल्पना (योग-रचना) कही जाती है।

च. क. १/२८

- , , ।, , ॥ २८ ॥

वहाँ (इस विषय में) श्लोक - कषायों में नौ योग हैं, मात्राओं में आठ, दूध और घी में पाँच, फाणित और चूर्ण में दो, सूँघने योग्य में दो, और वर्ति-क्रियाओं में छह।

च. क. १/२९

। ॥ २९ ॥

लेह, मोदक और उत्कारिका में बीस-बीस, तथा शष्कुली और लूल में सोलह-सोलह योग कहे गए हैं।

च. क. १/३०

। ॥ ३० ॥

षाडव आदि में अन्य दस, इस प्रकार योगों का यह एक सौ तैंतीस (की संख्या का) समूह महर्षि ने फलकल्प में विधिपूर्वक बताया है।

च. क. १

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र में, जिसके अंश अप्राप्त थे और जिसे दृढबल ने पूर्ण किया, कल्पस्थान में 'मदनकल्प' नामक पहला अध्याय (पूरा हुआ)। १।