व्याख्या
यह सूत्र देश (भूमि-प्रदेश) के तीन भेद बताता है: जाङ्गल, आनूप और साधारण। पिछले सूत्र में कहा गया था कि द्रव्य देश, काल आदि की सम्पत्ति से ही अधिक कार्यकारी होते हैं; इसलिए यहाँ पहले देश को समझाया गया है।
जाङ्गल देश सूखा और खुला प्रदेश है: वहाँ आकाश खुला दिखता है, खदिर (खैर), धव, अश्वत्थ (पीपल), वट (बरगद), बदरी (बेर), आमलकी (आँवला) जैसे वृक्षों के वन तथा शमी, ककुभ और शिंशपा के वृक्ष हैं, सूखी तेज़ हवा चलती है, मृगतृष्णा (दूर पानी जैसा दिखने वाला भ्रम) दिखती है, मिट्टी में महीन-खुरदरी बालू और कंकड़ हैं, और लाव, तीतर, चकोर जैसे पक्षी घूमते हैं। इस देश में वात और पित्त की अधिकता मानी गई है, और वहाँ के लोग अधिकतर स्थिर और कठोर प्रकृति के होते हैं। (वात, पित्त और कफ शरीर के तीन दोष हैं।)
आनूप देश जल-बहुल और हरा-भरा प्रदेश है: हिन्ताल, तमाल, नारियल, केले के वन, नदियाँ और समुद्र के तट, ठण्डी और मन्द हवा, फूलों से लदे घने वन, पर्वत और लता-कुञ्ज, तथा हंस, चक्रवाक, कोयल आदि पक्षियों की आवाज़। यहाँ वात और कफ की अधिकता और सुकुमार (कोमल) पुरुष बताए गए हैं।
साधारण देश इन दोनों के बीच का है, जिसमें लताएँ (वीरुध्), वनस्पति (बिना फूल के फल देने वाले बड़े वृक्ष), वानस्पत्य (फूल-फल वाले वृक्ष), पक्षी और मृग मिलते हैं, और वहाँ के पुरुष स्थिर, कोमल, बलवान, अच्छे वर्ण और सुगठित शरीर (संहनन) वाले तथा दोनों के साधारण गुणों से युक्त होते हैं।
कदर, असन, अश्वकर्ण, तिनिश, शल्लकी, साल, सोमवल्क, तिन्दुक आदि के सही पहचान-नाम यहाँ नहीं दिए गए हैं; वे यहाँ संस्कृत नाम से ही रखे गए हैं। पाठ में 'वञ्जुलवानीरोपणोभित' छपा है; सम्भवतः यह 'उपशोभित' होना चाहिए। एक शब्दखण्ड ('प्रवृत्यत्') का अर्थ स्पष्ट नहीं है।