भूमिका
जीमूतककल्प चरक संहिता के कल्पस्थान का दूसरा अध्याय है; हिन्दी में इसका शीर्षक है 'जीमूतक के योग'। जीमूतक एक औषध-पौधे का नाम है, और 'कल्प' का अर्थ है किसी द्रव्य को औषध के रूप में तैयार करने और काम में लेने की विधि। इस अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय का है, और अध्याय का विषय केवल जीमूतक के अलग-अलग योग हैं।
अध्याय का आरम्भ जीमूतक के परिचय से होता है: उसके फल और पुष्प पर आश्रित कल्प, उसके अन्य नाम (गरागरी, वेणी, देवताडक), और यह कथन कि वह तीनों दोषों को नष्ट करने वाला है और ज्वर, श्वास, हिक्का जैसे रोगों में अपने-अपने अनुकूल औषधों के साथ प्रयोग किया जाता है। फिर पौधे के फूल आने और फल बनने के समय दूध और दूध से बनी पेया के प्रयोग बताए गए हैं, और उसके अलग-अलग प्रकारों के साथ दूध, मलाई और दही के रूप गिनाए गए हैं।
आगे चूर्ण वाले योग हैं: पुराने और सूखे फलों का चूर्ण दूध के साथ, या सुरामण्ड में भिगोकर छाना हुआ रस; फिर गुडूची, मधुक, कोविदार आदि, निम्ब, कुटज या आरग्वध आदि सात द्रव्यों के कषाय के साथ विधियाँ; फिर जीवक, ऋषभक, इक्षु या शतावरी के रस के साथ ज्वर के योग; और अन्त में जीमूतक के क्षीर से बना घी, जिसे वमन के लिए श्रेष्ठ कहा गया है। इन विधियों के साथ वात-पित्त, पित्त-कफ ज्वर, अरोचक, कास, पाण्डुरोग और यक्ष्मा जैसे रोग भी नामित हैं। इनमें से कुछ वाक्य संक्षिप्त हैं और उनका ठीक आशय स्पष्ट नहीं है; व्याख्याओं में यह बताया गया है।
अध्याय का समापन दो श्लोकों में योगों की गिनती से होता है: दूध में छह, मदिरामण्ड में एक, अन्य कषायों में बारह, आरग्वध आदि के कषाय में सात, वर्तियों में आठ, जीवक आदि में चार और घृत में एक, कुल उनतालीस योग। पाठक इस अध्याय से यह ले सकता है कि चरक संहिता किसी एक औषध के कई योग कैसे गिनाती है: कौन-से द्रव्य के साथ, किस रूप में, किस रोग-अवस्था में। यह सब ग्रन्थ का कथन है, चिकित्सकीय सलाह नहीं।