भारत संहिता

अध्याय १

ज्वरनिदानम्

ज्वर का निदान

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भूमिका

ज्वरनिदान चरक संहिता के निदानस्थान का पहला अध्याय है। निदान का अर्थ है रोग का कारण, और निदानस्थान वह खण्ड है जिसमें रोगों के कारण और उन्हें पहचानने के साधन बताए गए हैं। अध्याय का नाम उसके पहले वाक्य से आया है, जिसमें कहा गया है कि अब ज्वरनिदान की व्याख्या की जाएगी; हिन्दी में इसका अर्थ है 'ज्वर का निदान'। इस अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय का है, जिन्हें अध्याय के अन्त में पुनर्वसु नाम से भी कहा गया है; वे यह उपदेश विनय से झुके हुए अग्निवेश को देते हैं। अध्याय के दो भाग हैं: पहले पूरे निदानस्थान के लिए निदान के सामान्य सिद्धान्त, और फिर ज्वर का निदान।

पहले भाग में भगवान् आत्रेय बताते हैं कि हेतु, निमित्त, आयतन, कर्ता, कारण, प्रत्यय, समुत्थान और निदान, ये सब एक ही अर्थ, रोग के कारण, के शब्द हैं। कारण तीन प्रकार का है: इन्द्रियों का अपने विषयों से असात्म्य (अहितकर) संयोग, प्रज्ञापराध (बुद्धि का अपराध) और परिणाम। इनसे व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं, जो आग्नेय, सौम्य और वायव्य, तीन प्रकार की हैं, और दूसरी राजस और तामस, दो प्रकार की। रोग पाँच साधनों से जाना जाता है: निदान (कारण), पूर्वरूप (रोग प्रकट होने से पहले के लक्षण), लिङ्ग (प्रकट रोग के लक्षण), उपशय (औषध, आहार और विहार का वह उपयोग जिससे सुख मिले) और संप्राप्ति (रोग के बनने और आ पहुँचने का क्रम)। संप्राप्ति भी संख्या, दोषों के प्राधान्य, विधि, विकल्प और बल-काल के भेद से अलग-अलग होती है। इसलिए जिस वैद्य का मन और बुद्धि अविकृत हों, वह इन्हीं के द्वारा रोगों को ठीक-ठीक जाने। यही पूरे निदानस्थान का सार है। आगे लोभ, अभिद्रोह और कोप से उत्पन्न आठ आरम्भिक व्याधियों का वर्णन निदान से आरम्भ करके होगा, उनकी चिकित्सा केवल संक्षेप में, और विस्तृत चिकित्सा बाद में चिकित्सास्थान में।

दूसरा भाग ज्वर से आरम्भ होता है, क्योंकि शरीर के विकारों में ज्वर प्रथम है। मनुष्यों को ज्वर आठ कारणों से होता है: वात, पित्त और कफ से अलग-अलग, इनके तीन जोड़ों से, तीनों के मेल से, और आठवाँ आगन्तु, यानी बाहरी कारण से। तीनों दोषों के ज्वर एक ही क्रम से बताए गए हैं। पहले वे आहार और आचरण आते हैं जिनकी अति से वह दोष प्रकुपित होता है: वात के लिए रूखे, हल्के और ठंडे पदार्थ, शोधन-कर्मों की अति, भूखे रहना, जागना और शोक; पित्त के लिए गरम, खट्टे, नमकीन और तीखे पदार्थ, तेज़ धूप, आग और क्रोध; कफ के लिए चिकने, भारी, मीठे और ठंडे पदार्थ, दिन में सोना और व्यायाम न करना। फिर बताया गया है कि प्रकुपित दोष आमाशय में पाचन की ऊष्मा से जुड़कर, आहार से बनने वाली पहली धातु रस के साथ-साथ चलता है, रस और स्वेद के स्रोतों को बन्द करता है, अग्नि को मन्द करता है और पाचन के स्थान की ऊष्मा को बाहर निकालकर पूरे शरीर में फैल जाता है; तब ज्वर होता है। अन्त में हर ज्वर के लक्षण आते हैं: वात का ज्वर अनियमित ढंग से चढ़ता-उतरता है और उसमें अङ्गों में तरह-तरह की पीड़ा होती है; पित्त के ज्वर में दाह, प्यास और तीव्र गर्मी होती है; कफ के ज्वर में भारीपन, अरुचि, अधिक नींद और ठंडक। हर ज्वर के बढ़ने के अपने समय हैं, और जिन कारणों से दोष बिगड़ा, उनसे आराम नहीं मिलता, उनके विपरीत उपायों से मिलता है।

दो दोष या तीनों दोष एक साथ भी कुपित होते हैं, जैसे अनियमित भोजन, भोजन न करने, विष से दूषित जल, शोधन-कर्मों के ठीक से न किए जाने, स्त्रियों के विषम प्रसव से, या पहले कहे कारणों के मिल जाने से; और वे उसी क्रम से ज्वर उत्पन्न करते हैं। ऐसे ज्वर को पहले कहे गए लक्षणों के मेल से पहचाना जाता है। आगन्तु ज्वर अभिघात (चोट), अभिषङ्ग, अभिचार और अभिशाप से होता है, और उससे पहले व्यथा होती है; कुछ समय वह अकेला रहता है, फिर दोष उससे जुड़ जाते हैं। अपने अलग लक्षण, उपक्रम (चिकित्सा) और उत्पत्ति के कारण वह बाकी सात ज्वरों से भिन्न है। अध्याय यह भी कहता है कि ज्वर वास्तव में एक ही है, जिसका लक्षण सन्ताप (शरीर का तपना) है; उसके भेद उसे अलग-अलग आधारों पर बाँटने से बनते हैं। फिर ज्वर के पूर्वरूप गिनाए गए हैं, शरीर के भी और मन और व्यवहार के भी, जैसे मुँह का स्वाद बिगड़ना, जम्हाई, आँसू आना, बड़ों की बातों पर खीज और मीठे से अरुचि; ये सन्ताप से पहले होते हैं और उसके बाद भी बने रहते हैं।

इसके बाद अध्याय ज्वर की महिमा बताता है। ज्वर महेश्वर, यानी शिव जी, के कोप से उत्पन्न हुआ; वह सब प्राणियों के प्राण हरता है और देह, इन्द्रियों और मन को तपाता है। कोई दूसरा रोग इतना दारुण, इतने उपद्रवों वाला और इतना दुश्चिकित्स्य नहीं है, इसलिए ज्वर सब रोगों का अधिपति है; सब प्राणी उसके साथ जन्म लेते हैं और उसके साथ ही मरते हैं। चिकित्सा इस अध्याय में केवल सार रूप में है। अध्याय के अनुसार पूर्वरूप दिखने पर या ज्वर के आरम्भ में हल्का भोजन या अपतर्पण हितकर है, क्योंकि ज्वर आमाशय से उठता है, और उसके बाद अनेक उपाय यथायोग्य, युक्ति से किए जाते हैं। पुराने पड़ चुके ज्वर में अध्याय उपयुक्त औषधियों से सिद्ध घी की प्रशंसा करता है, जो स्नेह से वात को, शीतलता से पित्त को और संस्कार से कफ को जीतता है। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि रोग को उसके कारण, पूर्वरूप, लक्षण, उपशय और संप्राप्ति से पहचाना जाता है, और ज्वर, जो शरीर के रोगों में प्रथम और सबसे दारुण है, इसी ढंग से पहचाना गया है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ४२-४४)

तत्र श्लोकाः-त्रिविधं नामपर्यायैर्हेतुं पञ्चविधं गदम्।गदलक्षणपर्यायान् व्याधेः पञ्चविधं ग्रहम्॥

श्लोक ४२ →

इस विषय में (अध्याय के संग्रह के) श्लोक (ये हैं): नाम के पर्यायों सहित तीन प्रकार का हेतु, पाँच प्रकार का गद (रोग), गद (रोग) और लक्षण के पर्याय, व्याधि का पाँच प्रकार का ग्रह (पहचानने का साधन),

ज्वरमष्टविधं तस्य प्रकृष्टासन्नकारणम्।पूर्वरूपं च रूपं च भेषजं संग्रहेण च॥

श्लोक ४३ →

आठ प्रकार का ज्वर, उसका प्रकृष्ट (दूर का) और आसन्न (निकट का) कारण, पूर्वरूप और रूप (लक्षण), और संक्षेप में भेषज (चिकित्सा),

व्याजहार ज्वरस्याग्रे निदाने विगतज्वरः।भगवानग्नेवेशाय प्रणताय पुनर्वसुः॥

श्लोक ४४ →

ज्वर (सन्ताप) से रहित भगवान् पुनर्वसु ने प्रणत (विनय से झुके हुए) अग्निवेश को (निदानस्थान के) आरम्भ में ज्वर के निदान में (ये सब विषय) कहे।

मुख्य शब्द (२४) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. नि. १/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम ज्वरनिदान (ज्वर के निदान सम्बन्धी अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. नि. १/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. नि. १/३

।, , ॥ ३ ॥

यहाँ (इस शास्त्र में) हेतु, निमित्त, आयतन, कर्ता, कारण, प्रत्यय, समुत्थान और निदान - ये एक ही अर्थ वाले (पर्याय) हैं। वह (निदान) तीन प्रकार का है - असात्म्य इन्द्रियार्थ-संयोग (इन्द्रियों का अपने विषयों से अहितकर सम्पर्क), प्रज्ञापराध और परिणाम।

च. नि. १/४

, , ; , ॥ ४ ॥

इसलिए तीन प्रकार की व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं - आग्नेय, सौम्य और वायव्य; और दूसरी (व्याधियाँ) दो प्रकार की हैं - राजस और तामस।

च. नि. १/५

॥ ५ ॥

इस विषय में व्याधि, आमय, गद, आतङ्क, यक्ष्मा, ज्वर, विकार और रोग - ये एक ही अर्थ वाले (पर्याय) हैं।

च. नि. १/६

॥ ६ ॥

उस (व्याधि) का ज्ञान निदान, पूर्वरूप, लिङ्ग, उपशय और संप्राप्ति से होता है।

च. नि. १/७

॥ ७ ॥

उनमें निदान (का अर्थ) कारण है, यह पहले कहा जा चुका है।

च. नि. १/८

॥ ८ ॥

व्याधि की उत्पत्ति से पहले (प्रकट होने वाला) लक्षण पूर्वरूप है।

च. नि. १/९

। ॥ ९ ॥

प्रकट हो चुके (रोग) का लक्षण तो लिङ्ग है। इस विषय में लिङ्ग, आकृति, लक्षण, चिह्न, संस्थान, व्यञ्जन और रूप - ये एक ही अर्थ वाले (पर्याय) हैं।

च. नि. १/१०

॥ १० ॥

उपशय तो हेतु और व्याधि के विपरीत, तथा विपरीत-अर्थकारी (विपरीत जैसा प्रयोजन सिद्ध करने वाले), औषध, आहार और विहारों का वह उपयोग है जिसका परिणाम सुख हो।

च. नि. १/११

॥ ११ ॥

व्याधि की संप्राप्ति, जाति और आगति - ये एक ही अर्थ वाले (पर्याय) हैं।

च. नि. १/१२

॥ , , ॥ । , ॥ , , ॥ ॥ ॥ १२ ॥

वह (संप्राप्ति) संख्या, प्राधान्य, विधि, विकल्प और बल-काल के भेदों से (अनेक प्रकार की) भिन्न होती है। संख्या तो, जैसे - आठ ज्वर, पाँच गुल्म, सात कुष्ठ, इत्यादि। दोषों का प्राधान्य तो 'तर' और 'तम' से जाना जाता है; उनमें दो (दोषों) में 'तर' और तीन में 'तम' (कहा जाता है)। विधि नामक (भेद यह है) - व्याधियाँ निज और आगन्तु के भेद से दो प्रकार की, तीन दोषों के भेद से तीन प्रकार की, और साध्य, असाध्य, मृदु और दारुण के भेद से चार प्रकार की (होती हैं)। और इस प्रसंग में विकल्प (का अर्थ) है मिले हुए दोषों के अंश-अंश के बल का भेद (आकलन)। और व्याधियों का बल-काल-विशेष ऋतु, दिन-रात और आहार के काल के क्रम से नियत होता है।

च. नि. १/१३

॥ १३ ॥

इसलिए जिसका सत्त्व (मन) और बुद्धि अनुपहत (अविकृत) हों, ऐसा भिषक् (वैद्य) हेतु आदि भावों से व्याधियों को यथावत् (ठीक-ठीक) जाने।

च. नि. १/१४

। ॥ १४ ॥

इस प्रकार निदानस्थान के विषयों का संक्षेप बता दिया गया है। अब यहाँ से उसका विस्तार से उपदेश करते हुए (हम) और अधिक व्याख्या करेंगे।

च. नि. १/१५

, । ॥ १५ ॥

वहाँ (निदानस्थान में) सबसे पहले तो लोभ, अभिद्रोह और कोप से उत्पन्न आद्य (प्रथम) आठ व्याधियों की व्याख्या निदान से आरम्भ होने वाले क्रम से करेंगे, और साथ ही (उनकी) चिकित्सा का केवल सूत्र-रूप संक्षेप। और बाद में चिकित्सितों (चिकित्सास्थान के अध्यायों) में विकारों की, उनके उपचित (बढ़े हुए, विस्तृत) रूप के अनुसार, आगे व्याख्या करेंगे।

च. नि. १/१६

, ॥ १६ ॥

यहाँ (निदानस्थान में) विकारों में सबसे पहले ज्वर का ही उपदेश किया जाता है, क्योंकि शारीरिक (विकारों) में वह प्रथम है।

च. नि. १/१७

; , , , , , , , ॥ १७ ॥

अब, मनुष्यों को ज्वर आठ कारणों से उत्पन्न होता है; जैसे - वात से, पित्त से, कफ से, वात और पित्त से, वात और कफ से, पित्त और कफ से, वात, पित्त और कफ (तीनों) से, और आठवें कारण आगन्तु (बाहरी कारण) से।

च. नि. १/१८

॥ १८ ॥

उस (ज्वर) के निदान, पूर्वरूप, लिङ्ग और उपशय की विशेषताओं की हम क्रम से व्याख्या करेंगे।

च. नि. १/१९

॥ १९ ॥

रूक्ष, लघु और शीत (पदार्थ), वमन, विरेचन, आस्थापन और शिरोविरेचन का अतियोग (आवश्यकता से अधिक प्रयोग), व्यायाम, वेगों को रोकना, अनशन (भूखे रहना), अभिघात (चोट), व्यवाय (मैथुन), उद्वेग (मन की बेचैनी), शोक, रक्त का अत्यधिक निकलना, जागरण (जागते रहना) और शरीर को विषम ढंग से रखना - इनका अधिक सेवन होने से वायु प्रकोप को प्राप्त होता है।

च. नि. १/२०

, ॥ २० ॥

जब वह (वायु) कुपित होकर आमाशय में प्रवेश करके, (वहाँ की) ऊष्मा के साथ मिलकर, आहार के परिणाम (पाचन) से बनने वाली पहली धातु, जिसका नाम रस है, उसका अनुसरण करके, रस और स्वेद को बहाने वाले स्रोतों को बन्द करके, अग्नि को उपहत (दुर्बल) करके और पक्तिस्थान (पाचन के स्थान) से ऊष्मा को बाहर निकालकर सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हो जाता है, तब वह ज्वर उत्पन्न करता है।

च. नि. १/२१

; , , , , ; ; , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ॥ २१ ॥

उस (वातज्वर) के ये लक्षण होते हैं; जैसे- ज्वर के आरम्भ और विसर्ग (चढ़ने और उतरने) का विषम (अनियमित) होना, ऊष्मा (शरीर की गर्मी) की विषमता, ज्वर की तीव्रता और मन्दता का स्थिर न रहना, (भोजन के) पचने के अन्त में, दिन के अन्त में, रात के अन्त में या घर्म (ग्रीष्म ऋतु) के अन्त में ज्वर का आना या बढ़ना, विशेष रूप से नख, नेत्र, मुख, मूत्र, पुरीष (मल) और त्वचा का परुष (रूखा) और अरुण (लाल) वर्ण होना तथा (इनका) अत्यधिक कॢप्तीभाव (सम्भवतः कटा-फटा-सा हो जाना); उन-उन अङ्गों और अवयवों की अनेक प्रकार की उपमाओं वाली तथा चल और अचल वेदनाएँ (पीड़ाएँ); जैसे- पैरों में सुन्नपन, पिण्डलियों में ऐंठन, घुटनों और सभी सन्धियों (जोड़ों) का ढीला होकर अलग-सा होना, जाँघों की शिथिलता, और कमर, पार्श्व (बगल), पीठ, स्कन्ध, बाहु, अंस (कन्धों) और छाती का मानो टूटा, कुचला, मसला, मथा, चटका, फाड़ा और धकेला हुआ होना, और जबड़ों का ठीक से काम न करना, और कानों में आवाज़ (गूँज), शङ्खों (कनपटियों) में सुई चुभने जैसी पीड़ा, मुँह का स्वाद कषाय (कसैला) होना या मुँह का बेस्वाद होना, मुँह, तालु और कण्ठ का सूखना, प्यास, हृदय में जकड़न, सूखी छर्दि (उलटी), सूखी खाँसी, छींक और डकार का रुकना, अन्न और रस (स्वाद) से खिन्नता, प्रसेक (मुँह में पानी आना), अरोचक (अरुचि) और अविपाक (अपच), विषाद (उदासी), जम्हाई, शरीर का मुड़ना, कँपकँपी, थकान, चक्कर, प्रलाप (बड़बड़ाना), नींद न आना, रोंगटे खड़े होना और दाँतों में सिहरन, गरम (वस्तुओं) की इच्छा, निदान में कहे गए (कारणों) से अनुपशय (आराम न मिलना) और (उनके) विपरीत (उपायों) से उपशय (आराम मिलना); ये वातज्वर के लक्षण होते हैं।

च. नि. १/२२

॥ २२ ॥

उष्ण, अम्ल (खट्टे), लवण (नमकीन), क्षार और कटुक (तीखे) भोजनों और अजीर्ण में किए गए भोजन का अत्यधिक सेवन करने से, तथा तीक्ष्ण आतप (तेज़ धूप) और अग्नि के संताप (ताप), श्रम, क्रोध और विषम आहार से भी पित्त प्रकोप को प्राप्त होता है।

च. नि. १/२३

, ॥ २३ ॥

जब वह (पित्त) प्रकुपित होकर आमाशय से ऊष्मा को साथ लेकर, आहार के परिणाम से बनी पहली धातु का, जिसका नाम रस है, अनुसरण करके, रस और स्वेद को ले जाने वाले स्रोतों को बन्द करके, (अपने) द्रव होने के कारण अग्नि को मन्द करके, और पक्तिस्थान (पाचन के स्थान) से ऊष्मा को बाहर निकालकर, पीड़ा देता हुआ समस्त शरीर में फैल जाता है, तब ज्वर उत्पन्न करता है।

च. नि. १/२४

; , , , , , , , , , , , , , , , , , , ॥ २४ ॥

उसके (पित्त ज्वर के) ये लक्षण होते हैं; वे इस प्रकार हैं: पूरे शरीर में एक साथ ही ज्वर का आना या बढ़ना, विशेष रूप से खाए हुए (भोजन) के विदाह के समय, दोपहर में, आधी रात में या शरद् ऋतु में; मुँह का स्वाद कटु (चरपरा) होना; नाक, मुख, कण्ठ, होंठ और तालु का पकना; तृष्णा (प्यास); मद; भ्रम (चक्कर); मूर्च्छा; पित्त की उलटी; अतीसार; भोजन से अरुचि; सदन (अङ्गों की शिथिलता); खेद (क्लान्ति); प्रलाप; शरीर पर लाल कोठ (चकत्ते) निकल आना; नखों, आँखों, मुख, मूत्र, मल और त्वचा में हरापन और हल्दी जैसा पीलापन; ऊष्मा (शरीर की गर्मी) की अत्यन्त तीव्रता; बहुत अधिक दाह (जलन); शीतल (वस्तुओं) की इच्छा; निदान में कहे गए (कारणों) से अनुपशय (आराम न मिलना) और (उनसे) विपरीत (आहार-विहार) से उपशय (आराम मिलना); ये पित्त ज्वर के लक्षण होते हैं।

च. नि. १/२५

॥ २५ ॥

स्निग्ध (चिकनाई वाले), गुरु (भारी), मधुर, पिच्छिल (लिसलिसे), शीत, अम्ल और लवण (पदार्थ), दिन में सोना, हर्ष और व्यायाम न करना, इनका अत्यधिक सेवन करने से श्लेष्मा प्रकोप को प्राप्त होता है।

च. नि. १/२६

, ॥ २६ ॥

जब वह (श्लेष्मा) प्रकुपित होकर आमाशय में प्रवेश करके, ऊष्मा के साथ मिलकर, आहार के परिणाम (पाचन) से बनी पहली धातु, जिसका नाम रस है, उसके साथ-साथ जाकर, रस और स्वेद (पसीने) को बहाने वाले स्रोतों को बंद करके, अग्नि को मन्द करके, पक्तिस्थान (पाचन के स्थान) से ऊष्मा को बाहर निकालकर, (उसे) दबाता हुआ पूरे शरीर में फैल जाता है, तब ज्वर उत्पन्न करता है।

च. नि. १/२७

; , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ; ( )॥ २७ ॥

उसके (श्लेष्म ज्वर के) ये लक्षण होते हैं; वे इस प्रकार हैं: पूरे शरीर में एक साथ ही ज्वर का आना या बढ़ना, विशेष रूप से भोजन करते ही, पूर्वाह्ण (दिन के पहले भाग) में, रात के पहले भाग में या वसन्त ऋतु में; शरीर का भारीपन; भोजन की इच्छा न होना; श्लेष्मा (कफ) का (मुँह से) गिरना; मुँह में मिठास; हृल्लास (जी मिचलाना); हृदय का (कफ से) लिपा-सा होना; स्तिमितता (शरीर का भीगा-सा और जड़ लगना); छर्दि (उलटी); अग्नि का मन्द होना; नींद की अधिकता; स्तम्भ (जकड़न); तन्द्रा; कास (खाँसी); श्वास (साँस फूलना); प्रतिश्याय (जुकाम); शीतलता, और नखों, आँखों, मुख, मूत्र, मल और त्वचा की सफ़ेदी; और अङ्गों से बहुत अधिक, बड़ी संख्या में, शीत पिडकाएँ (ठंडी फुंसियाँ) उभर आती हैं; गरम (वस्तुओं) की इच्छा; निदान में कहे गए (कारणों) से अनुपशय (आराम न मिलना) और (उनसे) विपरीत (आहार-विहार) से उपशय (आराम मिलना); इस प्रकार [ये श्लेष्म ज्वर के लक्षण होते हैं]।

च. नि. १/२८

, ॥ २८ ॥

विषमाशन (अनियमित भोजन) से, अनशन (भोजन न करने) से, अन्न के बदलने से, ऋतु के बिगड़ने से, असात्म्य (प्रतिकूल) गन्ध सूँघने से, और विष से दूषित जल के उपयोग से, गर (संयोग से बने विष) से, और पर्वतों के उपश्लेष (सम्पर्क) से, स्नेह, स्वेद, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन और शिरोविरेचन के ठीक प्रकार से न किए गए प्रयोग से, या मिथ्या (गलत) संसर्जन से, और स्त्रियों के विषम प्रसव से, और प्रसव कर चुकी (स्त्रियों) के मिथ्या उपचार से, और (पहले) जैसे कहे गए हैं उन हेतुओं के मिल जाने से, निदान (सेवन किए गए कारणों) के अनुसार द्वन्द्वों (दो-दो दोषों के जोड़ों) में से कोई एक, या सभी तीनों दोष एक साथ प्रकोप को प्राप्त होते हैं (कुपित हो जाते हैं); वे कुपित होकर उसी क्रम से ज्वर उत्पन्न करते हैं।

च. नि. १/२९

॥ २९ ॥

उस स्थिति में, पहले जैसे कहे गए हैं उन ज्वर-लक्षणों का विशेष प्रकार का मिश्रण देखकर (वैद्य) द्वान्द्विक (दो दोषों से हुए ज्वरों में से) किसी एक ज्वर को, या सान्निपातिक (तीनों दोषों से हुए) ज्वर को जाने।

च. नि. १/३०

। । , , ॥ ३० ॥

अभिघात (चोट), अभिषङ्ग, अभिचार और अभिशाप से तो आठवाँ, आगन्तु ज्वर होता है, जिसके पहले व्यथा (पीड़ा) होती है। वह आगन्तु (ज्वर) कुछ समय तक केवल (दोषों से अलग) रहकर बाद में दोषों से अनुबद्ध होता है (जुड़ जाता है)। उनमें अभिघात से उत्पन्न (ज्वर) दूषित रक्त में स्थित वायु से, अभिषङ्ग से उत्पन्न (ज्वर) वात और पित्त से, और अभिचार तथा अभिशाप से उत्पन्न (दोनों ज्वर) तो सन्निपात (तीनों दोषों के मेल) से अनुबद्ध होते हैं।

च. नि. १/३१

, । ॥ ३१ ॥

वह (आगन्तु ज्वर) विशिष्ट (अपने अलग) लिङ्ग (लक्षण), उपक्रम (चिकित्सा) और समुत्थान (उत्पत्ति के कारण) वाला होने से सात प्रकार के ज्वर से भिन्न जानना चाहिए, और साधारण कर्म (चिकित्सा) से उसका उपचार किया जाता है। इस प्रकार ज्वर की आठ प्रकार की प्रकृति कही गई।

च. नि. १/३२

।, । ॥ ३२ ॥

ज्वर तो एक ही है, जिसका लक्षण सन्ताप (शरीर का तपना) है। उसी को (विद्वान्) अभिप्राय के भेद से दो प्रकार का कहते हैं, और निज तथा आगन्तु के भेद से भी। उनमें निज (ज्वर) को वैद्य वात आदि (दोषों) के विकल्प (भिन्न मेल) से दो प्रकार का, तीन प्रकार का, चार प्रकार का और सात प्रकार का कहते हैं।

च. नि. १/३३

; , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ; ॥ ३३ ॥

उसके (ज्वर के) ये पूर्वरूप होते हैं; जैसे - मुँह का स्वाद बिगड़ना, शरीर का भारीपन, अन्न की इच्छा न होना, आँखों का आकुल (बेचैन) होना, आँसू आना, नींद की अधिकता, अरति (बेचैनी), जम्हाई, विनाम (शरीर का झुकना), कँपकँपी, श्रम (थकान), भ्रम (चक्कर), प्रलाप (बड़बड़ाना), जागरण (नींद न आना), रोमहर्ष (रोंगटे खड़े होना) और दन्तहर्ष (दाँतों में सिहरन), शब्द, शीत, वायु और धूप को सहना और न सह पाना, अरोचक (अरुचि) और अविपाक (भोजन न पचना), दुर्बलता, अङ्गमर्द (अंगों का टूटना), सदन (शिथिलता), अल्पप्राणता (बल-उत्साह की कमी), दीर्घसूत्रता (काम में ढिलाई), आलस्य, अभ्यस्त काम का छूट जाना, अपने कामों के प्रति उलटा भाव, गुरुजनों की बातों पर खीज, बच्चों से चिढ़, अपने धर्म (कर्तव्यों) के प्रति बेपरवाही, माला, अनुलेपन और भोजन से क्लेश होना, और मीठे खाद्य पदार्थों से अरुचि, और खट्टे, नमकीन और कटु (तीखे) का प्रिय लगना; ये ज्वर के पूर्वरूप हैं, जो सन्ताप से पहले होते हैं; और ये ताप से पीड़ित (रोगी) के साथ भी लगे रहते हैं।

च. नि. १/३४

॥ ३४ ॥

इस प्रकार ये ज्वर के लक्षण एक-एक करके, विस्तार और संक्षेप से समझा दिए गए हैं।

च. नि. १/३५

, , , , ; , । , । ; , , ॥ ३५ ॥

ज्वर तो निश्चय ही महेश्वर के कोप (क्रोध) से उत्पन्न है; (वह) सब प्राणियों के प्राण हरने वाला, देह, इन्द्रियों और मन को ताप देने वाला, प्रज्ञा, बल, वर्ण, हर्ष और उत्साह को घटाने वाला, (तथा) श्रम, क्लम, मोह और आहार में रुकावट उत्पन्न करने वाला है; (वह) शरीरों को ज्वरित (तप्त और पीड़ित) करता है, इसलिए ज्वर (कहलाता) है; दूसरे रोग वैसे दारुण, बहुत उपद्रवों वाले और दुश्चिकित्स्य (कठिनाई से चिकित्सा योग्य) नहीं हैं, जैसा यह (ज्वर) है। वह सब रोगों का अधिपति है, और अनेक तिर्यग्योनियों (पशु-पक्षी आदि की योनियों) में बहुत प्रकार के शब्दों (नामों) से पुकारा जाता है। सब प्राणी ज्वर के साथ ही जन्म लेते हैं और ज्वर के साथ ही मरते हैं; वह महामोह है, उससे अभिभूत (दबे हुए) देहधारी पूर्व देह का (पिछले जन्म का) कुछ भी कर्म स्मरण नहीं करते; और सब प्राणियों के प्राण अन्त में ज्वर ही लेता है।

च. नि. १/३६

, ; ॥ ३६ ॥

उसमें (ज्वर की चिकित्सा में), पूर्वरूप दिखाई देने पर या ज्वर के आरम्भ में, हल्का भोजन या अपतर्पण (उपवास) हितकर है, क्योंकि ज्वर आमाशय से उत्पन्न होता है; उसके बाद कषायपान, अभ्यङ्ग, स्नेह, स्वेद, प्रदेह, परिषेक, अनुलेपन, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, उपशमन, नस्तःकर्म, धूप, धूमपान, अञ्जन, क्षीर (दूध) और भोजन का विधान भी यथायोग्य (जिसके लिए जो उचित हो) युक्ति से प्रयोग करना चाहिए।

च. नि. १/३७

; , , पित्तमूष्माणं ; ॥ ३७ ॥

परन्तु सभी जीर्ण ज्वरों (पुराने पड़ चुके ज्वरों) में, अपनी-अपनी (अवस्था के अनुकूल) औषधियों से सिद्ध किए गए सर्पि (घी) का पान प्रशंसित है; क्योंकि सर्पि स्नेह (चिकनाई) के कारण वात को शान्त करता है, संस्कार (औषधियों के साथ पकाए जाने) से कफ को, और शीतलता से पित्त और ऊष्मा (ताप) को; इसलिए सभी जीर्ण ज्वरों में सर्पि वैसे ही हितकर है, जैसे आग से झुलसते पदार्थों पर जल।

च. नि. १/३८

- । ॥ ३८ ॥

और इस विषय में (ये श्लोक) हैं: जैसे मनुष्य (आग की) शान्ति के उद्देश्य से जलते हुए घर को जल से सींचते हैं, वैसे ही जीर्ण ज्वर में घृत (दिया जाता है)।

च. नि. १/३९

, । ॥ ३९ ॥

(घृत) स्नेह (चिकनाई) से वात को शान्त करता है, शीतलता से पित्त को वश में करता है; पर (अपने) समान गुणों वाले दोष कफ को घृत संस्कार (औषधियों के साथ पकाए जाने) से जीत लेता है।

च. नि. १/४०

। ॥ ४० ॥

कोई दूसरा स्नेह संस्कार का वैसा अनुवर्तन नहीं करता (संस्कार के गुण वैसे ग्रहण नहीं करता), जैसा सर्पि (घी); इसलिए सर्पि सब स्नेहों में उत्तम माना गया है।

च. नि. १/४१

। ॥ ४१ ॥

गद्य में कहा गया जो अर्थ (विषय) फिर श्लोकों द्वारा दोहराया जाता है, उसकी व्यक्ति (स्पष्टता) और व्यवसाय (निश्चय) के लिए दो बार कहा गया वह (अर्थ) निन्दित नहीं होता।

च. नि. १/४२

- । ॥ ४२ ॥

इस विषय में (अध्याय के संग्रह के) श्लोक (ये हैं): नाम के पर्यायों सहित तीन प्रकार का हेतु, पाँच प्रकार का गद (रोग), गद (रोग) और लक्षण के पर्याय, व्याधि का पाँच प्रकार का ग्रह (पहचानने का साधन),

च. नि. १/४३

। ॥ ४३ ॥

आठ प्रकार का ज्वर, उसका प्रकृष्ट (दूर का) और आसन्न (निकट का) कारण, पूर्वरूप और रूप (लक्षण), और संक्षेप में भेषज (चिकित्सा),

च. नि. १/४४

। ॥ ४४ ॥

ज्वर (सन्ताप) से रहित भगवान् पुनर्वसु ने प्रणत (विनय से झुके हुए) अग्निवेश को (निदानस्थान के) आरम्भ में ज्वर के निदान में (ये सब विषय) कहे।

च. नि. १

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के निदानस्थान में ज्वरनिदान नामक पहला अध्याय (पूरा हुआ)।