भूमिका
रक्तपित्तनिदान चरक संहिता के निदानस्थान का दूसरा अध्याय है। निदानस्थान वह खण्ड है जिसमें रोगों के कारण और उन्हें पहचानने के साधन बताए गए हैं। अध्याय का नाम उसके पहले वाक्य से आया है, जिसमें कहा गया है कि अब रक्तपित्तनिदान की व्याख्या की जाएगी; हिन्दी में इसका अर्थ है 'रक्तपित्त का निदान'। रक्तपित्त वह रोग है जिसमें बिगड़ा हुआ पित्त रक्त को दूषित करता है और रक्त शरीर के छिद्रों से बाहर निकलने लगता है; पित्त शरीर के तीन दोषों (वात, पित्त और कफ) में से वह है जिसका सम्बन्ध पाचन और शरीर की गर्मी से है। अध्याय इस रोग को लोहितपित्त भी कहता है, क्योंकि लोहित का अर्थ भी रक्त है। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है, जिन्हें अध्याय के अन्त में पुनर्वसु नाम से कहा गया है। वे आरम्भ में ही बताते हैं कि आगे यह समझाया जाएगा कि पित्त किस प्रकार का होकर लोहितपित्त नाम पाता है।
पहले रोग के कारण आते हैं, जो लगभग सभी आहार से जुड़े हैं: यवक, उद्दालक और कोरदूष जैसे अन्नों की अधिकता; बहुत उष्ण और तीक्ष्ण भोजन, जो दालों के सूप और क्षार के साथ, दही और खट्टी काञ्जी डालकर, सूअर, भैंस, भेड़, मछली या गाय के मांस के साथ, या मूली, सरसों और लहसुन जैसे चटपटे उपदंशों के साथ लिया जाए; सुरा और खट्टे पेय अनुपान के रूप में; पिष्टान्न (पिसे अन्न से बने पदार्थ) की अधिकता; और गर्मी से तपे हुए व्यक्ति का बहुत अधिक मात्रा में कच्चा दूध पीना, या दूध के साथ कुछ विशेष वस्तुएँ लेना। ऐसा आचरण करने वाले का पित्त प्रकुपित होता है, यानी बढ़कर बिगड़ता है, और रक्त अपनी सामान्य मात्रा से बढ़ जाता है। तब प्रकुपित पित्त शरीर में फैलकर उन स्रोतों के मुखों तक पहुँचता है जो यकृत् (जिगर) और प्लीहा (तिल्ली) से निकलते हैं और रक्त को ले जाते हैं, उन्हें रोकता है और उसी रक्त को दूषित कर देता है। फिर अध्याय नाम का कारण बताता है: रक्त से संसर्ग, रक्त को दूषित करना और रक्त की गन्ध और रंग अपना लेना, इन तीन कारणों से इस पित्त को लोहितपित्त कहते हैं।
इसके बाद रोग के पूर्वरूप, यानी रोग प्रकट होने से पहले दिखने वाले लक्षण, गिनाए गए हैं, जैसे भोजन की इच्छा न होना, खाए हुए भोजन से जलन, खट्टी गन्ध और स्वाद वाली डकार, बार-बार उल्टी, आवाज़ बिगड़ना, अङ्गों का शिथिल होना, मुँह से मानो धुआँ निकलना, मुँह में लोहे, रक्त या मछली जैसी गन्ध, अङ्गों, मल, मूत्र, पसीने और लार आदि का लाल, हरा या हल्दी जैसा पीला होना, और स्वप्न में बार-बार लाल, नीले, पीले और चमकते रूप दिखना। फिर इसके उपद्रव आते हैं, यानी वे रोग जो इसके साथ बाद में जुड़ जाते हैं: दुर्बलता, अरुचि, अपच, श्वास, खाँसी, ज्वर, अतीसार, सूजन, शोष, पाण्डुरोग और स्वरभेद।
अध्याय का केन्द्र रक्तपित्त के दो मार्ग हैं। जिस शरीर में कफ अधिक हो, उसमें रक्तपित्त ऊपर की ओर जाकर कान, नाक, आँख और मुख से निकलता है; जिसमें वात अधिक हो, उसमें नीचे की ओर जाकर मूत्र और मल के मार्गों से; और जिसमें दोनों अधिक हों, उसमें दोनों मार्गों से। इसी मार्ग से रोग का परिणाम तय होता है, क्योंकि ग्रन्थ के अनुसार रक्तपित्त में दोषों को उलटे मार्ग से निकाला जाता है। ऊपर जाने वाला रक्तपित्त साध्य है, यानी ठीक हो सकता है: उसमें विरेचन (दस्त कराकर दोष निकालना) उपयोगी है, जो पित्त को जीतने का परम उपाय है और साथ जुड़े कफ के लिए भी हीन नहीं, और उसके लिए औषध बहुत हैं। नीचे जाने वाला याप्य है, यानी पूरी तरह नहीं मिटता पर उपचार से दबा रहता है: उसमें वमन (उल्टी कराकर दोष निकालना) कम उपयोगी है, वह पित्त को निकालने में श्रेष्ठ नहीं और साथ जुड़े वात के लिए भी हीन है, और औषध थोड़े हैं। दोनों मार्गों वाला असाध्य है, क्योंकि उसके लिए कोई उलटा मार्ग नहीं बचता, और उसका उपशमन भी पूरी तरह नहीं होता।
बीच में अध्याय बताता है कि रक्तपित्त का प्रकोप पहली बार प्राचीन काल में दक्ष के यज्ञ के विध्वंस के समय हुआ, जब रुद्र जी के कोप की अग्नि से घिरे प्राणियों में ज्वर के बाद यह रोग उठा। इसे दावाग्नि जैसा, अचानक आ पड़ने वाला और शीघ्र हानि करने वाला कहा गया है, और ग्रन्थ कहता है कि मात्रा, देश और काल देखकर इसकी शीघ्र शान्ति का प्रयत्न किया जाए। अध्याय यह भी कहता है कि सेवकों और साधनों के अभाव, दौरात्म्य (दुष्ट स्वभाव), वैद्य के दोष या उचित कर्म न होने से कोई-कोई साध्य रोग भी असाध्य हो जाता है, और असाध्य रक्तपित्त के लक्षण देता है: रक्त का काला, नीला या इन्द्रधनुष जैसी आभा वाला होना, कपड़े को रंग देना, बहुत दुर्गन्ध वाला और अत्यधिक होना, सब उपद्रवों का होना, बल और मांस का क्षय, और रोगी को आसपास की वस्तुएँ और आकाश तक लाल दिखना। ग्रन्थ के अनुसार असाध्य को छोड़ दिया जाए, याप्य को यत्न से दबाए रखा जाए, और साध्य को सावधान वैद्य सिद्ध औषधों से ठीक करे। अन्त के दो श्लोक अध्याय के विषय गिनाकर कहते हैं कि मोह, रज, लोभ, मान और मद से रहित पुनर्वसु ने ये सब कहे। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि रक्तपित्त किस मार्ग से निकलता है, यह उसके साथ जुड़े दोष पर निर्भर है, और वही मार्ग बताता है कि रोग साध्य है, याप्य है या असाध्य।