भारत संहिता

अध्याय २

रक्तपित्तनिदानम्

रक्तपित्त का निदान

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भूमिका

रक्तपित्तनिदान चरक संहिता के निदानस्थान का दूसरा अध्याय है। निदानस्थान वह खण्ड है जिसमें रोगों के कारण और उन्हें पहचानने के साधन बताए गए हैं। अध्याय का नाम उसके पहले वाक्य से आया है, जिसमें कहा गया है कि अब रक्तपित्तनिदान की व्याख्या की जाएगी; हिन्दी में इसका अर्थ है 'रक्तपित्त का निदान'। रक्तपित्त वह रोग है जिसमें बिगड़ा हुआ पित्त रक्त को दूषित करता है और रक्त शरीर के छिद्रों से बाहर निकलने लगता है; पित्त शरीर के तीन दोषों (वात, पित्त और कफ) में से वह है जिसका सम्बन्ध पाचन और शरीर की गर्मी से है। अध्याय इस रोग को लोहितपित्त भी कहता है, क्योंकि लोहित का अर्थ भी रक्त है। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है, जिन्हें अध्याय के अन्त में पुनर्वसु नाम से कहा गया है। वे आरम्भ में ही बताते हैं कि आगे यह समझाया जाएगा कि पित्त किस प्रकार का होकर लोहितपित्त नाम पाता है।

पहले रोग के कारण आते हैं, जो लगभग सभी आहार से जुड़े हैं: यवक, उद्दालक और कोरदूष जैसे अन्नों की अधिकता; बहुत उष्ण और तीक्ष्ण भोजन, जो दालों के सूप और क्षार के साथ, दही और खट्टी काञ्जी डालकर, सूअर, भैंस, भेड़, मछली या गाय के मांस के साथ, या मूली, सरसों और लहसुन जैसे चटपटे उपदंशों के साथ लिया जाए; सुरा और खट्टे पेय अनुपान के रूप में; पिष्टान्न (पिसे अन्न से बने पदार्थ) की अधिकता; और गर्मी से तपे हुए व्यक्ति का बहुत अधिक मात्रा में कच्चा दूध पीना, या दूध के साथ कुछ विशेष वस्तुएँ लेना। ऐसा आचरण करने वाले का पित्त प्रकुपित होता है, यानी बढ़कर बिगड़ता है, और रक्त अपनी सामान्य मात्रा से बढ़ जाता है। तब प्रकुपित पित्त शरीर में फैलकर उन स्रोतों के मुखों तक पहुँचता है जो यकृत् (जिगर) और प्लीहा (तिल्ली) से निकलते हैं और रक्त को ले जाते हैं, उन्हें रोकता है और उसी रक्त को दूषित कर देता है। फिर अध्याय नाम का कारण बताता है: रक्त से संसर्ग, रक्त को दूषित करना और रक्त की गन्ध और रंग अपना लेना, इन तीन कारणों से इस पित्त को लोहितपित्त कहते हैं।

इसके बाद रोग के पूर्वरूप, यानी रोग प्रकट होने से पहले दिखने वाले लक्षण, गिनाए गए हैं, जैसे भोजन की इच्छा न होना, खाए हुए भोजन से जलन, खट्टी गन्ध और स्वाद वाली डकार, बार-बार उल्टी, आवाज़ बिगड़ना, अङ्गों का शिथिल होना, मुँह से मानो धुआँ निकलना, मुँह में लोहे, रक्त या मछली जैसी गन्ध, अङ्गों, मल, मूत्र, पसीने और लार आदि का लाल, हरा या हल्दी जैसा पीला होना, और स्वप्न में बार-बार लाल, नीले, पीले और चमकते रूप दिखना। फिर इसके उपद्रव आते हैं, यानी वे रोग जो इसके साथ बाद में जुड़ जाते हैं: दुर्बलता, अरुचि, अपच, श्वास, खाँसी, ज्वर, अतीसार, सूजन, शोष, पाण्डुरोग और स्वरभेद।

अध्याय का केन्द्र रक्तपित्त के दो मार्ग हैं। जिस शरीर में कफ अधिक हो, उसमें रक्तपित्त ऊपर की ओर जाकर कान, नाक, आँख और मुख से निकलता है; जिसमें वात अधिक हो, उसमें नीचे की ओर जाकर मूत्र और मल के मार्गों से; और जिसमें दोनों अधिक हों, उसमें दोनों मार्गों से। इसी मार्ग से रोग का परिणाम तय होता है, क्योंकि ग्रन्थ के अनुसार रक्तपित्त में दोषों को उलटे मार्ग से निकाला जाता है। ऊपर जाने वाला रक्तपित्त साध्य है, यानी ठीक हो सकता है: उसमें विरेचन (दस्त कराकर दोष निकालना) उपयोगी है, जो पित्त को जीतने का परम उपाय है और साथ जुड़े कफ के लिए भी हीन नहीं, और उसके लिए औषध बहुत हैं। नीचे जाने वाला याप्य है, यानी पूरी तरह नहीं मिटता पर उपचार से दबा रहता है: उसमें वमन (उल्टी कराकर दोष निकालना) कम उपयोगी है, वह पित्त को निकालने में श्रेष्ठ नहीं और साथ जुड़े वात के लिए भी हीन है, और औषध थोड़े हैं। दोनों मार्गों वाला असाध्य है, क्योंकि उसके लिए कोई उलटा मार्ग नहीं बचता, और उसका उपशमन भी पूरी तरह नहीं होता।

बीच में अध्याय बताता है कि रक्तपित्त का प्रकोप पहली बार प्राचीन काल में दक्ष के यज्ञ के विध्वंस के समय हुआ, जब रुद्र जी के कोप की अग्नि से घिरे प्राणियों में ज्वर के बाद यह रोग उठा। इसे दावाग्नि जैसा, अचानक आ पड़ने वाला और शीघ्र हानि करने वाला कहा गया है, और ग्रन्थ कहता है कि मात्रा, देश और काल देखकर इसकी शीघ्र शान्ति का प्रयत्न किया जाए। अध्याय यह भी कहता है कि सेवकों और साधनों के अभाव, दौरात्म्य (दुष्ट स्वभाव), वैद्य के दोष या उचित कर्म न होने से कोई-कोई साध्य रोग भी असाध्य हो जाता है, और असाध्य रक्तपित्त के लक्षण देता है: रक्त का काला, नीला या इन्द्रधनुष जैसी आभा वाला होना, कपड़े को रंग देना, बहुत दुर्गन्ध वाला और अत्यधिक होना, सब उपद्रवों का होना, बल और मांस का क्षय, और रोगी को आसपास की वस्तुएँ और आकाश तक लाल दिखना। ग्रन्थ के अनुसार असाध्य को छोड़ दिया जाए, याप्य को यत्न से दबाए रखा जाए, और साध्य को सावधान वैद्य सिद्ध औषधों से ठीक करे। अन्त के दो श्लोक अध्याय के विषय गिनाकर कहते हैं कि मोह, रज, लोभ, मान और मद से रहित पुनर्वसु ने ये सब कहे। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि रक्तपित्त किस मार्ग से निकलता है, यह उसके साथ जुड़े दोष पर निर्भर है, और वही मार्ग बताता है कि रोग साध्य है, याप्य है या असाध्य।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २८-२९)

तत्र श्लोकौ-कारणं नामनिर्वृत्तिं पूर्वरूपाण्युपद्रवान्।मार्गौ दोषानुबन्धं च साध्यत्वं न च हेतुमत्॥

श्लोक २८ →

यहाँ (अध्याय के अन्त में) दो श्लोक हैं - कारण, नाम की निर्वृत्ति (नाम कैसे पड़ा), पूर्वरूप, उपद्रव, दो मार्ग, दोषों का अनुबन्ध, और हेतु सहित साध्य होना और (साध्य) न होना

निदाने रक्तपित्तस्य व्याजहार पुनर्वसुः।वीतमोहरजोदोषलोभमानमदस्पृहः॥

श्लोक २९ →

मोह, रज, दोष, लोभ, मान (अभिमान), मद और स्पृहा (लालसा) से रहित पुनर्वसु ने रक्तपित्त के निदान में (इन सब का) वर्णन किया।

मुख्य शब्द (१४) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

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च. नि. २/१

अब इसलिए हम रक्तपित्तनिदान (रक्तपित्त के निदान सम्बन्धी अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. नि. २/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. नि. २/३

, ॥ ३ ॥

पित्त किस प्रकार का होकर 'लोहितपित्त' यह संज्ञा (नाम) पाता है, उसकी हम व्याख्या करेंगे।

च. नि. २/४

, , , , , ) भूस्तृणसुमुखसुरसकुठेरकगण्डीरकालमालकपर्णासक्षवकफणिज्झकोपदंशं, , ; , , , ; , । ॥ ४ ॥

जब कोई प्राणी अधिकतर यवक, उद्दालक और कोरदूष (कोदो) वाले अन्न खाता है, और दूसरा भी बहुत उष्ण और तीक्ष्ण भोजन (खाता है), जो निष्पाव, माष (उड़द) और कुलत्थ (कुलथी) के सूप और क्षार से युक्त हो, या जिस पर दधि (दही), दधिमण्ड, उदश्वित्, कट्वर और खट्टी काञ्जी डाली गई हो, (जिसमें) सूअर, भैंस, भेड़, मछली और गाय का मांस हो, (जो) पिण्याक (खली), पिण्डालु और सूखे शाक के साथ हो, जिसके साथ उपदंश के रूप में मूलक (मूली), सर्षप (सरसों), लशुन (लहसुन), करञ्ज, शिग्रु (सहिजन), मधुशिग्रु, [खडयूष], भूस्तृण, सुमुख, सुरस, कुठेरक, गण्डीर, कालमालक, पर्णास, क्षवक और फणिज्झक हों, या जिसका अनुपान अधिकतर सुरा, सौवीर, तुषोदक, मैरेय, मेदक, मधूलक, शुक्त, और कुवल तथा बदर (बेर) के खट्टे (पेय) हों, (और) जिसमें बाद में (लिए जाने वाले) पिष्टान्न की अधिकता हो; या गर्मी से तपा हुआ (व्यक्ति) बहुत अधिक मात्रा में या बहुत बार कच्चा दूध पीता है, दूध के साथ रौहिणीक खाता है, या सरसों के तेल और क्षार में पकाया हुआ काणकपोत (दूध के साथ खाता है), या गर्मी से तपा हुआ (व्यक्ति) कुलत्थ, पिण्याक और पके जाम्बव (जामुन) और लकुच (बड़हल) के साथ, या शौक्तिकों के साथ दूध पीता है; तो इस प्रकार आचरण करने वाले उस (व्यक्ति) का पित्त प्रकोप को प्राप्त होता है, और लोहित (रक्त) अपने प्रमाण को लाँघ जाता है। उस (लोहित) के प्रमाण से बढ़ जाने पर प्रकुपित पित्त शरीर में फैलता हुआ जैसे ही यकृत् (जिगर) और प्लीहा (तिल्ली) से निकलने वाले तथा लोहित को वहन करने वाले स्रोतों के उन मुखों तक, जो लोहित के अभिष्यन्द से भारी हैं, पहुँचकर उन्हें रोक देता है, (वैसे ही) उसी लोहित को दूषित कर देता है।

च. नि. २/५

॥ ५ ॥

(लोहित के साथ) संसर्ग के कारण, लोहित को दूषित करने के कारण, और लोहित की गन्ध और वर्ण (रंग) का अनुसरण करने के कारण, पित्त को 'लोहितपित्त' कहते हैं।

च. नि. २/६

; , , , , , , , , , , , , ( )॥ ६ ॥

उस (लोहितपित्त) के ये पूर्वरूप होते हैं; जैसे - भोजन की इच्छा न होना, खाए हुए (भोजन) का विदाह (जलन), शुक्त और अम्ल (खट्टी) गन्ध और रस वाली डकार, बार-बार छर्दि (उल्टी) आना, उल्टी में निकले (पदार्थ) का बीभत्स (घिनौना) होना, स्वरभेद, अङ्गों का शिथिल होना, परिदाह, मुख से मानो धुआँ निकलना, और मुख में मानो लोहे, लोहित (रक्त), मछली और कच्चे (मांस) की गन्ध होना, अङ्गों और अवयवों, शकृत् (मल), मूत्र, स्वेद (पसीने), लार, नाक के मल, मुख और कान के मल, पिडकोलिका और पिडकाओं (फुंसियों) का लाल, हरा या हल्दी जैसा पीला होना, अङ्गों में वेदना (पीड़ा), और स्वप्न में लाल, नीले, पीले, श्याव और चमकते हुए रूपों का बार-बार दिखना; इस प्रकार [लोहितपित्त के पूर्वरूप होते हैं]।

च. नि. २/७

॥ ७ ॥

(इसके) उपद्रव तो निश्चय ही दौर्बल्य, अरोचक, अविपाक, श्वास, कास, ज्वर, अतीसार, शोफ, शोष और पाण्डुरोग, और स्वरभेद हैं।

च. नि. २/८

, । , , , ॥ ८ ॥

और इसके मार्ग दो हैं: ऊपर का और नीचे का। जिस शरीर में श्लेष्मा (कफ) अधिक हो, उसमें श्लेष्मा के संसर्ग से वह (लोहितपित्त) ऊपर की ओर जाता हुआ कान, नाक, आँख और मुख से निकलता है; परन्तु जिस शरीर में वात अधिक हो, उसमें वात के संसर्ग से नीचे की ओर जाता हुआ मूत्र और पुरीष (मल) के मार्गों से निकलता है; और जिस शरीर में श्लेष्मा और वात (दोनों) अधिक हों, उसमें श्लेष्मा और वात के संसर्ग से वह दोनों ही मार्गों में जाता है, (और) उन दोनों मार्गों में जाता हुआ शरीर के ऊपर कहे गए सभी छिद्रों से निकलता है।

च. नि. २/९

, ; , ; , ॥ ९ ॥

उनमें जो (रक्तपित्त) ऊपर के मार्ग से जाता है, वह साध्य है, क्योंकि उसकी चिकित्सा विरेचन से की जा सकती है और उसके लिए बहुत-से औषध हैं; जो नीचे के मार्ग से जाता है, वह याप्य है, क्योंकि उसकी चिकित्सा वमन से करनी पड़ती है और उसके लिए थोड़े औषध हैं; जो दोनों मार्गों से जाता है, वह असाध्य है, क्योंकि उसमें न वमन का प्रयोग हो सकता है न विरेचन का, और उसके लिए कोई औषध नहीं है।

च. नि. २/१०

॥ १० ॥

रक्तपित्त का प्रकोप तो प्राचीन काल में, दक्ष के यज्ञ के विध्वंस के समय, रुद्र के कोप और अमर्ष (रोष) की अग्नि से जिनके शरीर और प्राण घिर गए थे, उन प्राणियों में ज्वर के बाद हुआ।

च. नि. २/११

॥ ११ ॥

दावाग्नि (जंगल की आग) की तरह अचानक आ पड़ने वाले, शीघ्र (हानि) करने वाले और आत्ययिक (तुरन्त उपचार माँगने वाले) उस (रक्तपित्त) की शीघ्र शान्ति के लिए, उस (काम) में सावधान (वैद्य) को मात्रा, देश और काल को भली-भाँति देखकर, सन्तर्पण अथवा अपतर्पण से, मृदु, मधुर, शीतल, तिक्त और कषाय खाद्य पदार्थों से, प्रदेह (लेप), परिषेक (छिड़काव), अवगाह (डुबोकर बैठाना) और संस्पर्शन (स्पर्श) से, अथवा वमन आदि से प्रयत्न करना चाहिए।

च. नि. २/१२

- । ॥ १२ ॥

और इस विषय में (ये श्लोक) हैं - जो लोहितपित्त ऊपर (के मार्ग) को जाता है, वह साध्य है, क्योंकि (उसमें) विरेचन उपयोगी होता है और औषध बहुत हैं।

च. नि. २/१३

। ॥ १३ ॥

पित्त को जीतने के लिए तो विरेचन परम औषध है; और वहाँ जो श्लेष्मा (कफ) अन्वय (साथ जुड़ा दोष) है, उसके लिए भी वह अधम (निकृष्ट) नहीं माना गया है।

च. नि. २/१४

। ॥ १४ ॥

और उसमें मधुर औषध भी योगावह (लाभ पहुँचाने वाला) होता है; इसलिए जो रक्त (रक्तपित्त) ऊपर (के मार्ग) को जाता है, वह साध्य माना गया है।

च. नि. २/१५

। ॥ १५ ॥

परन्तु जो रक्त (रक्तपित्त) नीचे के मार्ग वाला है, वह याप्य है, यह निश्चित है, क्योंकि (उसमें) वमन कम उपयोगी है और औषध थोड़े हैं।

च. नि. २/१६

। ॥ १६ ॥

क्योंकि पित्त को निकालने में वमन श्रेष्ठ नहीं कहा जाता; और वहाँ जो वायु (वात) अन्वय (साथ जुड़ा दोष) है, उसकी शान्ति में भी वह अवर (हीन) माना गया है।

च. नि. २/१७

। ॥ १७ ॥

और वहाँ वह (औषध), (अर्थात्) कषाय और तिक्त (पदार्थ), अयोगावह (लाभ न पहुँचाने वाला) है; इसलिए जो (रक्तपित्त) अनुलोम (नीचे की ओर) जाने वाला कहा गया है, वह याप्य बताया गया है।

च. नि. २/१८

। ॥ १८ ॥

परन्तु जो रक्तपित्त दोनों ही मार्गों को जाता है, उसे पहले कहे हुए कारण से ही असाध्य जानना चाहिए।

च. नि. २/१९

। ॥ १९ ॥

क्योंकि इसके लिए उलटे मार्ग से जाने वाला कोई संशोधन है ही नहीं; और रक्तपित्त में उलटे मार्ग से (दोषों को) निकालने का विधान है।

च. नि. २/२०

। ॥ २० ॥

इसी प्रकार इसका उपशमन (शान्त करने वाला उपचार) भी पूरी तरह नहीं होता; और दोषों के संसृष्ट (आपस में मिले हुए) होने पर ऐसा शमन माना गया है जो सब (दोषों) को जीते।

च. नि. २/२१

। ॥ २१ ॥

इस प्रकार मार्ग के भेद से रक्त (रक्तपित्त) तीन प्रकार के परिणाम वाला कहा गया। परन्तु इन कारणों से तो कोई-कोई साध्य (रोग) भी सिद्ध (ठीक) नहीं होता।

च. नि. २/२२

। ॥ २२ ॥

प्रेष्य (सेवक) और उपकरण (साधनों) के अभाव से, दौरात्म्य (दुष्ट स्वभाव) से, वैद्य के दोष से और (उचित) कर्म न करने से कोई-कोई रोग साध्यत्व (ठीक हो सकने की अवस्था) को लाँघ जाता है।

च. नि. २/२३

। ॥ २३ ॥

तब साध्य और याप्य (अवस्थाओं) को पार कर जाने से केवल असाध्यत्व ही रह जाएगा। रक्तपित्त की उस (असाध्यता) का यह विज्ञान (पहचान) बताया जाता है।

च. नि. २/२४

। ॥ २४ ॥

जो (रक्तपित्त) काला अथवा नीला हो, या जिसकी आभा शक्रधनुष् (इन्द्रधनुष) जैसी हो, और जो वस्त्र को रंग दे, वह रक्तपित्त असाध्य है।

च. नि. २/२५

। ॥ २५ ॥

जो बहुत दुर्गन्ध वाला और अत्यधिक (मात्रा में) हो, और सब उपद्रवों से युक्त हो, और जो बल और मांस के क्षय में (हो), वह रक्त (रक्तपित्त) भी असाध्य है।

च. नि. २/२६

। ॥ २६ ॥

और जिस रक्तपित्त से पीड़ित मनुष्य दिखने वाली (वस्तुओं) को और आकाश को भी लाल देखे, वह भी असाध्य है, इसमें संशय नहीं।

च. नि. २/२७

, । ॥ २७ ॥

उनमें असाध्य (रक्तपित्त) को छोड़ देना चाहिए, याप्य का यत्न से यापन करना चाहिए, और सावधान वैद्य साध्य (रक्तपित्त) को सिद्ध (प्रभावी) औषधों से ठीक करे।

च. नि. २/२८

- । ॥ २८ ॥

यहाँ (अध्याय के अन्त में) दो श्लोक हैं - कारण, नाम की निर्वृत्ति (नाम कैसे पड़ा), पूर्वरूप, उपद्रव, दो मार्ग, दोषों का अनुबन्ध, और हेतु सहित साध्य होना और (साध्य) न होना

च. नि. २/२९

।॥ २९ ॥

मोह, रज, दोष, लोभ, मान (अभिमान), मद और स्पृहा (लालसा) से रहित पुनर्वसु ने रक्तपित्त के निदान में (इन सब का) वर्णन किया।

च. नि. २

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के निदानस्थान में रक्तपित्तनिदान नामक दूसरा अध्याय (पूरा हुआ)।