भारत संहिता

अध्याय ८

अपस्मारनिदानम्

अपस्मार का निदान

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भूमिका

अपस्मारनिदान चरक संहिता के निदानस्थान का आठवाँ और अन्तिम अध्याय है। निदानस्थान वह खण्ड है जिसमें रोगों के कारण और उन्हें पहचानने के लक्षण बताए गए हैं, और इसके आठ अध्याय आठ रोगों के बारे में हैं: ज्वर, रक्तपित्त, गुल्म, प्रमेह, कुष्ठ, शोष, उन्माद और अपस्मार। अध्याय का नाम उसके पहले वाक्य से आया है, जिसमें कहा गया है कि अब अपस्मारनिदान की व्याख्या की जाएगी; हिन्दी में इसका अर्थ है 'अपस्मार का निदान'। अध्याय की अपनी परिभाषा के अनुसार अपस्मार स्मृति, बुद्धि और सत्त्व (मन) के संप्लव, यानी विचलित हो जाने, से होने वाला तमःप्रवेश (अन्धकार में प्रवेश) है, जिसमें रोगी की चेष्टाएँ बीभत्स (घिनौनी) हो जाती हैं। अध्याय के वर्णन में यह रोग दौरों के रूप में आता है: रोगी कभी बार-बार, कभी देर-देर से अपस्मार से ग्रस्त होता है और फिर होश में आता है। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है।

अध्याय आरम्भ में चार अपस्मार गिनाता है: वात, पित्त, कफ और सन्निपात (तीनों दोषों के मेल) से होने वाले। ये ऐसे प्राणियों में शीघ्र उत्पन्न होते हैं जिनका चित्त रज और तम से दूषित है, जिनके दोष अपने मार्ग से भटके हुए, विषम और बहुत बढ़े हुए हैं, जो मैले, बिगड़े हुए और अनुचित वस्तुओं से मिले अपवित्र भोजन का विषम विधि से सेवन करते हैं, जो शरीर की चेष्टाएँ विषम ढंग से करते हैं, या जिनका शरीर अत्यधिक क्षीण हो गया है। तब प्रकुपित दोष हृदय में, जिसे अध्याय अन्तरात्मा का सबसे श्रेष्ठ आयतन (आश्रय-स्थान) कहता है, और इन्द्रियों के स्थानों में जाकर ठहर जाते हैं; और जब काम, क्रोध, भय, लोभ, मोह, हर्ष, शोक, चिन्ता और उद्वेग जैसे भाव उन्हें उकसाते हैं, तो वे हृदय और इन्द्रियों के स्थानों को सहसा भर देते हैं, और प्राणी अपस्मार से ग्रस्त हो जाता है। इससे पहले पूर्वरूप, यानी आने वाले रोग के संकेत, दिखते हैं: भौंहों का अपनी जगह से हटना, आँखों में लगातार विकार, शब्द न होने पर भी शब्द सुनाई देना, लार और नाक का मल बहना, भोजन की इच्छा न होना, अरुचि और अपच, हृदय का जकड़ना, पेट फूलना, दुर्बलता, हड्डियों में टूटने जैसी पीड़ा, अङ्गों का टूटना, मोह, आँखों के आगे अँधेरा, मूर्छा और बार-बार चक्कर; और स्वप्न में मद, नाचना, बिंधना, व्यथा, काँपना और गिरना। इनके तुरन्त बाद अपस्मार प्रकट होता है।

फिर हर प्रकार की पहचान बताई गई है। वात के अपस्मार में दौरे बार-बार आते हैं और रोगी क्षण भर में होश में आ जाता है; उसकी आँखें उभर आती हैं, वह बेसुरे स्वर में विलाप करता है, झाग उगलता है, गर्दन तन जाती है, सिर टेढ़ा मुड़ जाता है, अङ्गुलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं, हाथ-पैर अस्थिर रहते हैं, और उसे अस्थिर, चपल और रूखे रूप दिखते हैं। पित्त के अपस्मार में भी दौरे बार-बार आते हैं और होश जल्दी लौटता है; रोगी घुटी हुई आवाज़ करता है, भूमि को पीटता है, उसके नख, नेत्र, मुख और त्वचा हरे, पीले या ताँबे जैसे लाल होते हैं, और उसे रक्त से सने, उग्र, भयानक, जलते हुए और क्रुद्ध रूप दिखते हैं। कफ के अपस्मार में दौरे देर-देर से आते हैं और होश भी देर से लौटता है; रोगी गिर पड़ता है, उसकी चेष्टाएँ बहुत विकृत नहीं होतीं, लार बहती है, नख आदि सफ़ेद होते हैं, और उसे सफ़ेद, भारी और चिकने रूप दिखते हैं। हर प्रकार में उसी दोष को बढ़ाने वाली वस्तुएँ अनुपशय (प्रतिकूल) होती हैं और उनकी उलटी वस्तुएँ उपशय (अनुकूल)। जिसमें सब लिङ्ग (लक्षण) एक साथ मिलें, वह सान्निपातिक अपस्मार असाध्य कहा गया है। अध्याय यह भी कहता है कि इन अपस्मारों के साथ कभी-कभी आगन्तु (बाहरी कारण) भी जुड़ जाता है, जिसकी पहचान है बताए गए लिङ्गों से अधिक लिङ्ग होना और कुछ ऐसे लिङ्ग होना जो दोषों के लिङ्गों से मेल न खाएँ। चिकित्सा का सिद्धान्त संक्षेप में यह बताया गया है कि अपस्मार के रोगियों के लिए अपने-अपने दोष के अनुसार तीक्ष्ण संशोधन और उपशमन हितकर हैं, आगन्तु के संयोग में मन्त्र आदि, और दोनों के एक साथ होने पर, चिकित्सा जानने वालों के कथन के अनुसार, साधारण कर्म। इसी प्रसंग में अध्याय बताता है कि प्राचीन काल में दक्ष के यज्ञ के विध्वंस के समय कई रोग पहली बार उत्पन्न हुए: भागते प्राणियों के शरीर के झकझोरे जाने से गुल्म, हवि खाने से प्रमेह और कुष्ठ, भय, त्रास और शोक से उन्माद, और अनेक प्रकार के भूतों और अशुचि (अपवित्र वस्तुओं) के संस्पर्श से अपस्मार; ज्वर महेश्वर (शिव जी) के ललाट से उत्पन्न हुआ, उसके संताप से रक्तपित्त, और अत्यधिक मैथुन से नक्षत्रों के राजा (चन्द्र देव) को राजयक्ष्मा हुआ।

इसके बाद अध्याय पूरे निदानस्थान की ओर लौटता है। वह कहता है कि उत्तम निदानस्थान पूरा कहा गया, और फिर एक नई बात रखता है: कोई रोग स्वयं दूसरे रोग का निदान, यानी कारण, बन सकता है। जैसे ज्वर के संताप से रक्तपित्त, रक्तपित्त से ज्वर, और दोनों से शोष; प्लीहा (तिल्ली) के बढ़ने से जठर (उदर रोग), और जठर से शोथ (सूजन); अर्श (बवासीर) से जठर और गुल्म; और प्रतिश्याय (जुकाम) से कास (खाँसी), कास से क्षय, और क्षय से शोष। कोई रोग दूसरे का कारण बनकर स्वयं शान्त हो जाता है, और कोई शान्त नहीं होता और कारण भी बनता है। ऐसे व्याधि-संकर (रोगों के मेल) अत्यन्त कष्टसाध्य होते हैं; वे रोगों के एक-दूसरे से उत्पन्न होने से भी बनते हैं और अपरिशुद्ध प्रयोग से भी, यानी ऐसी चिकित्सा से जो एक व्याधि को शान्त करे पर दूसरी को उभार दे। अध्याय के अनुसार शुद्ध प्रयोग वही है जो व्याधि को शान्त करे और दूसरी को कुपित न करे। फिर वह हेतु, लिङ्ग और शान्ति (शमन का उपाय), तीनों के बारे में बताता है कि एक के अनेक, अनेक का एक, एक का एक और अनेक के अनेक हो सकते हैं, और रूक्ष (रूखेपन वाले) हेतु, ज्वर, संताप, लङ्घन और हल्के भोजन जैसे उदाहरणों से इन्हें समझाता है।

अन्तिम भाग साध्यता और चिकित्सा के ढंग पर है। सुखसाध्य रोग सुगम उपाय से थोड़े समय में ठीक होता है और कृच्छ्रसाध्य बड़े प्रयत्न से लम्बे समय में; याप्य नामक असाध्य रोग पूरी तरह नहीं मिटता, और प्रत्याख्येय सब चिकित्साओं से परे चला जाता है। असाध्य रोग साध्य नहीं बनता, पर साध्य रोग असाध्य बन सकता है, और (चिकित्सा के) पादों में चूक से या दैव से रोग दूसरी अवस्था में पहुँच जाते हैं। इसलिए अध्याय बुद्धिमान वैद्य से कहता है कि वह रोगों की वृद्धि, स्थान (ठहराव) और क्षय की अवस्था को, और देह, अग्नि, बल और चेतस् (मन) की अवस्था को भी, चाहे वह अत्यन्त सूक्ष्म हो, पहचाने; और तिरछे मार्गों में गए दोषों की चिकित्सा में उतावली न करे, बल्कि उन्हें प्रयोगों से क्षीण करे या कोष्ठ में लाकर निकट के मार्ग से निकाले। वह यह भी कहता है कि जो लक्षण अपने आप में रोग हैं, वे जब दूसरे रोग की पहचान के लिए गिनाए जाते हैं, तब लिङ्ग माने जाते हैं, रोग नहीं; और संक्षेप में सब कुछ दो ही है, विकार और प्रकृति, और दोनों अपने हेतु के वश में हैं: हेतु न रहे तो वे बने नहीं रहते। अध्याय का अन्त संग्रह के श्लोकों से होता है, जो पूरे निदानस्थान के विषय गिनाते हैं: हेतु, पूर्वरूप, रूप, उपशय, सम्प्राप्ति, पूर्व उत्पत्ति (सम्भवतः रोगों की आदि उत्पत्ति), चिकित्सा का सूत्र-मात्र (संक्षिप्त संकेत), ज्वर आदि आठ विकारों की साध्यता और असाध्यता, उनके हेतु, लिङ्ग और शमन के उपाय, और हेतु, व्याधि और लक्षण के पर्याय-नाम। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि अपस्मार दोषों का वह रोग है जिसमें प्रकुपित दोष हृदय और इन्द्रियों के स्थानों को भर देते हैं, और स्मृति, बुद्धि और मन के विचलित होने से रोगी कुछ समय के लिए अन्धकार में डूब जाता है; और यह कि ग्रन्थ के अनुसार सब रोगों के भेद जानने वाला और सब औषधों में निपुण वैद्य सब रोगों को नष्ट करता है और मोह (भ्रम) में नहीं पड़ता।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ४२-४४)

तत्र श्लोकाः-हेतवः पूर्वरूपाणि रूपाण्युपशयस्तथा।संप्राप्तिः पूर्वमुत्पत्तिः सूत्रमात्रं चिकित्सितात्॥

श्लोक ४२ →

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक (हैं): हेतु, पूर्वरूप, रूप, तथा उपशय, सम्प्राप्ति, पूर्व (आदिकाल) में (रोगों की) उत्पत्ति, चिकित्सा में से केवल सूत्र-मात्र (संक्षिप्त संकेत),

ज्वरादीनां विकाराणामष्टानां साध्यता न च।पृथगेकैकशश्चोक्ता हेतुलिङ्गोपशान्तयः॥

श्लोक ४३ →

ज्वर आदि आठ विकारों की साध्यता और असाध्यता (साध्य न होना), और अलग-अलग, एक-एक करके कहे गए हेतु, लिङ्ग और उपशान्ति (शमन के उपाय),

हेतुपर्यायनामानि व्याधीनां लक्षणस्य च।निदानस्थानमेतावत् संग्रहेणोपदिश्यते॥

श्लोक ४४ →

हेतु के, व्याधियों के और लक्षण के पर्याय-नाम (समान अर्थ वाले नाम): इतना निदानस्थान है, जिसका संक्षेप में उपदेश किया जाता है।

मुख्य शब्द (१८) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

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च. नि. ८/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम अपस्मारनिदान (अपस्मार के निदान सम्बन्धी अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. नि. ८/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. नि. ८/३

॥ ३ ॥

यहाँ (इस शास्त्र में) निश्चय ही अपस्मार चार होते हैं, जो वात, पित्त, कफ और सन्निपात के निमित्त (कारण) से होते हैं।

च. नि. ८/४

; , । , ॥ ४ ॥

वे (चारों अपस्मार) ऐसे प्राणियों में शीघ्र उत्पन्न होते हैं; जैसे - जिनका चित्त रज और तम से उपहत (दूषित) है, जिनके दोष उद्भ्रान्त (अपने मार्ग से भटके हुए), विषम और बहुत बढ़े हुए हैं, जो मल से युक्त, विकृत और (अनुचित वस्तुओं से) मिले हुए अपवित्र भोज्य पदार्थों का विषमता से युक्त उपयोग-विधि से सेवन करते हैं, जो तन्त्रप्रयोग भी विषम (अनुचित) ढंग से करते हैं, और जो दूसरी शारीरिक चेष्टाएँ भी विषम ढंग से करते हैं; अथवा अत्यधिक उपक्षय (क्षीणता) से - (ऐसे लोगों के) दोष प्रकुपित होकर, रज और तम से उपहत चित्त वाले उन (लोगों) के अन्तरात्मा के सबसे श्रेष्ठ आयतन (आश्रय-स्थान) हृदय में पहुँचकर उसके ऊपर ठहर जाते हैं, और वैसे ही इन्द्रियों के आयतनों (स्थानों) पर भी। और वहाँ स्थित रहते हुए, जब वे काम, क्रोध, भय, लोभ, मोह, हर्ष, शोक, चिन्ता, उद्वेग आदि से प्रेरित होकर हृदय और इन्द्रियों के आयतनों को सहसा (अचानक) भर देते हैं, तब प्राणी अपस्मार से ग्रस्त होता है।

च. नि. ८/५

॥ ५ ॥

अपस्मार को तो (विद्वान्) स्मृति, बुद्धि और सत्त्व (मन) के संप्लव (विचलित हो जाने) से होने वाला, बीभत्स (घिनौनी) चेष्टाओं वाला, आवस्थिक (किसी अवस्था में कुछ समय के लिए होने वाला) तमःप्रवेश (अन्धकार में प्रवेश) कहते हैं।

च. नि. ८/६

; ॥ ६ ॥

उस (अपस्मार) के ये पूर्वरूप होते हैं; जैसे - भ्रूव्युदास (भौंहों का अपनी जगह से हटना), आँखों में लगातार विकार, शब्द न होने पर भी शब्द सुनाई देना, लार और सिङ्घाण (नाक के मल) का बहना, भोजन की इच्छा न होना, अरोचक (अरुचि) और अविपाक (भोजन न पचना), हृदयग्रह (हृदय का जकड़ना), कुक्षि (पेट) का आटोप (फूलना), दुर्बलता, अस्थिभेद (हड्डियों में टूटने जैसी पीड़ा), अङ्गमर्द (अङ्गों का टूटना), मोह, अन्धकार दिखना, मूर्छा, और बार-बार भ्रम (चक्कर); और स्वप्न में मद, नाचना, बिंधना, व्यथा, काँपना, गिरना आदि (का अनुभव); इस प्रकार (ये पूर्वरूप हैं)।

च. नि. ८/७

॥ ७ ॥

उसके बाद तुरन्त अपस्मार की अभिनिर्वृत्ति (उत्पत्ति) ही (होती है)।

च. नि. ८/८

; , , , , , , , , , , , , ॥, , , , , , , ॥, , , , , , , , ॥ , ॥ ॥ ८ ॥

उनमें (चारों अपस्मारों में) भेद पहचानने का ज्ञान यह है; जैसे - जो बार-बार अपस्मार से ग्रस्त होता है, क्षण भर में फिर होश में आ जाता है, जिसकी आँखें उभर आती हैं, जो बेसुरे स्वर में विलाप करता है, झाग उगलता है, जिसकी गर्दन बहुत अधिक फूली (तनी) हुई है, सिर टेढ़ा मुड़ा हुआ है, अङ्गुलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी मुड़ी हुई हैं, हाथ-पैर अस्थिर हैं, जिसके नख, नेत्र, मुख और त्वचा अरुण (लालिमा लिए), परुष (रूखे-खुरदरे) और श्याव (काले-भूरे) हैं, जो अस्थिर, चपल (चञ्चल), परुष और रूक्ष (रूखे) रूप देखता है, जिसे वात बढ़ाने वाली वस्तुएँ अनुपशय (प्रतिकूल) हैं और उनसे विपरीत (वस्तुएँ) उपशय (अनुकूल) हैं, उसे वात से अपस्मार-ग्रस्त जानना चाहिए। जो बार-बार अपस्मार से ग्रस्त होता है, क्षण भर में फिर होश में आ जाता है, कूजता (घुटी हुई आवाज़ करता) है, भूमि को पीटता है, जिसके नख, नेत्र, मुख और त्वचा हरे, हल्दी जैसे पीले और ताँबे जैसे लाल हैं, जो रक्त से सने, उग्र, भैरव (भयानक), जलते हुए और क्रुद्ध रूप देखता है, जिसे पित्त बढ़ाने वाली वस्तुएँ अनुपशय हैं और उनसे विपरीत (वस्तुएँ) उपशय हैं, उसे पित्त से अपस्मार-ग्रस्त जानना चाहिए। जो देर-देर से अपस्मार से ग्रस्त होता है और देर से होश में आता है, गिर पड़ता है, जिसकी चेष्टाएँ बहुत अधिक विकृत नहीं होतीं, जो लार उगलता है, जिसके नख, नेत्र, मुख और त्वचा शुक्ल (सफ़ेद) हैं, जो शुक्ल, गुरु (भारी) और स्निग्ध (चिकने) रूप देखता है, जिसे श्लेष्मा (कफ) बढ़ाने वाली वस्तुएँ अनुपशय हैं और उनसे विपरीत (वस्तुएँ) उपशय हैं, उसे श्लेष्मा से अपस्मार-ग्रस्त जानना चाहिए। जिसमें सब लिङ्ग (लक्षण) एक साथ मिले हों, उस अपस्मार को सान्निपातिक जानना चाहिए; उसे असाध्य कहते हैं। इस प्रकार चार अपस्मार बताए गए।

च. नि. ८/९

, । ॥ ९ ॥

उन (अपस्मारों) के साथ कभी-कभी आगन्तु (बाहरी कारण) का अनुबन्ध (जुड़ना) होता ही है; उसे हम आगे बताएँगे। उसकी विशेष पहचान यह है: बताए गए लिङ्गों (लक्षणों) से अधिक लिङ्ग होना, और कुछ (लिङ्ग) ऐसे होना जो दोषों के लिङ्गों के अनुरूप न हों।

च. नि. ८/१०

, ॥ १० ॥

अपस्मार के रोगियों के लिए अपने-अपने (दोष के) अनुसार तीक्ष्ण संशोधन (शोधन चिकित्साएँ) और उपशमन (शान्त करने वाली चिकित्साएँ) हितकर हैं, और आगन्तु (बाहरी कारण) का संयोग होने पर मन्त्र आदि (हितकर हैं)।

च. नि. ८/११

, , , , , , ॥ ११ ॥

प्राचीन काल में उसी दक्ष के यज्ञ के विध्वंस के समय अनेक दिशाओं में भागते हुए प्राणियों में अभिद्रवण (तेज़ी से दौड़ पड़ना), तरण (पार करना), धावन (दौड़ना), प्लवन (तैरना), लङ्घन (लाँघना) आदि शरीर को झकझोरने वाली क्रियाओं से गुल्म की उत्पत्ति हुई; हवि (यज्ञ में अर्पित द्रव्य) खाने से प्रमेह और कुष्ठ की, भय, त्रास और शोक से उन्मादों की, और अनेक प्रकार के भूतों और अशुचि (अपवित्र वस्तुओं) के संस्पर्श से अपस्मारों की (उत्पत्ति हुई); ज्वर तो निश्चय ही महेश्वर के ललाट से उत्पन्न हुआ, उसके संताप से रक्तपित्त, और नक्षत्रों के राजा (चन्द्रमा) का राजयक्ष्मा अतिव्यवाय (अत्यधिक मैथुन) से (उत्पन्न हुआ)।

च. नि. ८/१२

- । ॥ १२ ॥

और यहाँ (इस विषय में ये श्लोक) हैं: अपस्मार निश्चय ही वात से, पित्त से और कफ से (होता है); चौथा सन्निपात (तीनों दोषों के मेल) से (होता है), ऐसा (अपस्मार) प्रत्याख्येय (चिकित्सा के लिए अस्वीकार करने योग्य) है।

च. नि. ८/१३

। ॥ १३ ॥

परन्तु साध्य (अपस्मारों) को बुद्धिमान् वैद्य एकाग्र होकर तीक्ष्ण संशोधनों से, और अपने-अपने (दोष के) अनुसार शमनों से भी, ठीक करते हैं।

च. नि. ८/१४

। ॥ १४ ॥

जब दोषों से उत्पन्न (अपस्मार) के साथ आगन्तु (बाहरी कारण) का अन्वय (जुड़ाव) होता है, तब चिकित्सा जानने वाले साधारण (दोनों के लिए समान) कर्म (चिकित्सा) बताते हैं।

च. नि. ८/१५

। ॥ १५ ॥

सब रोगों के विशेष (भेद) जानने वाला और सब औषधों में निपुण वैद्य सब आमयों (रोगों) को नष्ट करता है, और मोह (भ्रम) में नहीं पड़ता।

च. नि. ८/१६

। ॥ १६ ॥

इस प्रकार यह उत्तम निदानस्थान पूरा-पूरा कहा गया। रोग भी (किसी दूसरे) रोग का निदानार्थकर (कारण का काम करने वाला) पाया जाता है।

च. नि. ८/१७

। ॥ १७ ॥

जैसे कि: ज्वर के संताप से रक्तपित्त उभरता है, रक्तपित्त से ज्वर, और उन दोनों से शोष भी उत्पन्न होता है।

च. नि. ८/१८

। ॥ १८ ॥

प्लीहा (तिल्ली) के बढ़ने से जठर (उदर रोग), और जठर से शोथ (सूजन) ही (होता है); अर्शों (बवासीर) से कष्टदायक जठर (उदर रोग) और गुल्म भी उत्पन्न होता है।

च. नि. ८/१९

। ॥ १९ ॥

प्रतिश्याय (जुकाम) से कास (खाँसी) हो सकता है, कास से क्षय उत्पन्न होता है, और क्षय शोष रोग के हेतु (कारण) के रूप में भी पाया जाता है।

च. नि. ८/२०

। ॥ २० ॥

वे (रोग) पहले केवल रोग होते हैं, बाद में हेतु का काम करने वाले (बनते हैं); (कुछ) दोनों काम करने वाले देखे गए हैं, और इसी प्रकार (कुछ) एक ही काम करने वाले।

च. नि. ८/२१

। ॥ २१ ॥

क्योंकि कोई रोग (दूसरे) रोग का हेतु बनकर (स्वयं) शान्त हो जाता है; और कोई दूसरा (रोग) शान्त नहीं होता, और हेतु का काम भी करता है।

च. नि. ८/२२

। ॥ २२ ॥

इस प्रकार मनुष्यों में व्याधियों के संकर (मेल) अत्यन्त कष्टसाध्य देखे जाते हैं, प्रयोग (चिकित्सा) के अपरिशुद्ध होने से, और (रोगों के) एक-दूसरे से उत्पन्न होने से।

च. नि. ८/२३

। , ॥ २३ ॥

जो प्रयोग (चिकित्सा) एक व्याधि को शान्त करे (पर) दूसरी को उभार दे, वह विशुद्ध नहीं है; शुद्ध (प्रयोग) तो वह है जो (व्याधि को) शान्त करे और (दूसरी को) कुपित न करे।

च. नि. ८/२४

। ॥ २४ ॥

एक हेतु अनेक (रोगों) का (होता है), इसी प्रकार एक (रोग) का एक (हेतु) ही; और एक व्याधि के अनेक (हेतु), और बहुत-सी (व्याधियों) के बहुत-से (हेतु) भी (होते हैं)।

च. नि. ८/२५

। ॥ २५ ॥

ज्वर, भ्रम (चक्कर), प्रलाप (बड़बड़ाना) आदि रूक्ष हेतु से उत्पन्न होते देखे जाते हैं; और एक रूक्ष (हेतु) से एक (रोग) ज्वर ही उत्पन्न होता है।

च. नि. ८/२६

। ॥ २६ ॥

और रूक्ष आदि बहुत-से हेतुओं से एक ज्वर हो सकता है; और रूक्ष आदि (हेतुओं) से ज्वर आदि व्याधियाँ निश्चय ही उत्पन्न होती हैं।

च. नि. ८/२७

। ॥ २७ ॥

और एक लिङ्ग (लक्षण) अनेक (रोगों) का देखा जाता है, इसी प्रकार एक (रोग) का भी; और एक व्याधि के बहुत-से (लिङ्ग), और बहुत-सी (व्याधियों) के बहुत-से (लिङ्ग) भी हो सकते हैं।

च. नि. ८/२८

। ॥ २८ ॥

विषम आरम्भ (अनियमित ढंग से शुरू होना) आदि (लक्षणों) का एक लिङ्ग ज्वर माना गया है; और एक ज्वर का भी एक (ही) लिङ्ग संताप (शरीर का तपना) कहा जाता है।

च. नि. ८/२९

। ॥ २९ ॥

और विषम आरम्भ आदि (लक्षणों) से एक ज्वर पहचाना जाता है; और इन्हीं लिङ्गों से (युक्त) ज्वर, श्वास, हिक्का आदि रोग होते हैं।

च. नि. ८/३०

। ॥ ३० ॥

एक शान्ति (शमन का उपाय) अनेक (रोगों) की देखी जाती है, इसी प्रकार एक (रोग) की भी; और एक व्याधि की अनेक (शान्तियाँ), और बहुत-सी (व्याधियों) की बहुत-सी (शान्तियाँ) भी।

च. नि. ८/३१

। ॥ ३१ ॥

आमाशय से उत्पन्न होने वाली व्याधियों की शान्ति लङ्घन-क्रिया है; और एक ज्वर की भी एक शान्ति लङ्घन कही जाती है।

च. नि. ८/३२

। ॥ ३२ ॥

उसी प्रकार हल्का भोजन आदि भी अकेले ज्वर की (अनेक) शान्तियाँ (उपचार) हैं, और यही (उपचार) ज्वर, श्वास, हिक्का आदि (अनेक रोगों) के प्रशमन (शान्त करने वाले उपाय) भी हैं।

च. नि. ८/३३

। ॥ ३३ ॥

सुखसाध्य (सरलता से ठीक होने वाला रोग), जिसका उपाय सुगम होता है, थोड़े समय में ठीक किया जाता है; परन्तु कृच्छ्रसाध्य (कठिनाई से ठीक होने वाला रोग) बड़े प्रयत्न से, लम्बे समय में ठीक किया जाता है।

च. नि. ८/३४

। ॥ ३४ ॥

याप्य नामक असाध्य रोग पूरी तरह समाप्त नहीं होता; दूसरा (उससे आगे का) असाध्य रोग, प्रत्याख्येय (चिकित्सा के लिए अस्वीकार करने योग्य), सब चिकित्साओं से परे चला जाता है।

च. नि. ८/३५

। ॥ ३५ ॥

असाध्य (रोग) साध्यता को प्राप्त नहीं होता, परन्तु साध्य (रोग) असाध्यता को प्राप्त हो जाता है; (चिकित्सा के) पादों में चूक से, या दैव से, रोग दूसरी अवस्था में पहुँच जाते हैं।

च. नि. ८/३६

। ॥ ३६ ॥

बुद्धिमान (वैद्य) रोगों की वृद्धि, स्थान (ठहराव) और क्षय की अवस्था को पहचाने, और देह, अग्नि, बल तथा चेतस् (मन) की (इस अवस्था को) भी, चाहे वह अत्यन्त सूक्ष्म ही हो।

च. नि. ८/३७

। ॥ ३७ ॥

क्योंकि विचक्षण (कुशल वैद्य) रोग की अवस्थाओं के भेदों को बार-बार जानकर, उस-उस अवस्था में चतुःश्रेय (चार का श्रेय, यानी कल्याण) प्राप्त करता है।

च. नि. ८/३८

। ॥ ३८ ॥

तिर्यग्गत (तिरछे मार्गों में गए हुए) दोष प्रायः रोगियों को लम्बे समय तक कष्ट देते हैं; उनके विषय में देह, अग्नि और बल को जानने वाला (वैद्य) उतावली से चिकित्सा न करे।

च. नि. ८/३९

। ॥ ३९ ॥

(वैद्य) या तो प्रयोगों (औषध के प्रयोगों) से उन (दोषों) को क्षीण करे, या उन्हें सुखपूर्वक (बिना कष्ट के) कोष्ठ में ले आए; उन्हें कोष्ठ में पहुँचा हुआ जानकर बुद्धिमान (वैद्य) उन्हें निकटता के अनुसार (निकट के मार्ग से) बाहर निकाले।

च. नि. ८/४०

। ॥ ४० ॥

और (रोगों की) पहचान के लिए संग्रह में जो व्याधि-लिङ्ग (रोगों के लक्षण) कहे गए हैं, वे (अपने आप में) व्याधियाँ (रोग) हैं; परन्तु उस समय (जब वे लक्षण के रूप में आते हैं) वे लिङ्ग (लक्षण) माने गए हैं, आमय (रोग) नहीं।

च. नि. ८/४१

। ॥ ४१ ॥

संक्षेप में, सब कुछ दो ही है: विकार (बिगड़ी हुई अवस्था) और प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था)। यह (दोनों) अपने-अपने हेतु के वश में है; हेतु के अभाव में (यह) बना नहीं रहता।

च. नि. ८/४२

- । ॥ ४२ ॥

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक (हैं): हेतु, पूर्वरूप, रूप, तथा उपशय, सम्प्राप्ति, पूर्व (आदिकाल) में (रोगों की) उत्पत्ति, चिकित्सा में से केवल सूत्र-मात्र (संक्षिप्त संकेत),

च. नि. ८/४३

। ॥ ४३ ॥

ज्वर आदि आठ विकारों की साध्यता और असाध्यता (साध्य न होना), और अलग-अलग, एक-एक करके कहे गए हेतु, लिङ्ग और उपशान्ति (शमन के उपाय),

च. नि. ८/४४

। ॥ ४४ ॥

हेतु के, व्याधियों के और लक्षण के पर्याय-नाम (समान अर्थ वाले नाम): इतना निदानस्थान है, जिसका संक्षेप में उपदेश किया जाता है।

च. नि. ८

।

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के निदानस्थान में अपस्मारनिदान नामक आठवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।