भूमिका
अपस्मारनिदान चरक संहिता के निदानस्थान का आठवाँ और अन्तिम अध्याय है। निदानस्थान वह खण्ड है जिसमें रोगों के कारण और उन्हें पहचानने के लक्षण बताए गए हैं, और इसके आठ अध्याय आठ रोगों के बारे में हैं: ज्वर, रक्तपित्त, गुल्म, प्रमेह, कुष्ठ, शोष, उन्माद और अपस्मार। अध्याय का नाम उसके पहले वाक्य से आया है, जिसमें कहा गया है कि अब अपस्मारनिदान की व्याख्या की जाएगी; हिन्दी में इसका अर्थ है 'अपस्मार का निदान'। अध्याय की अपनी परिभाषा के अनुसार अपस्मार स्मृति, बुद्धि और सत्त्व (मन) के संप्लव, यानी विचलित हो जाने, से होने वाला तमःप्रवेश (अन्धकार में प्रवेश) है, जिसमें रोगी की चेष्टाएँ बीभत्स (घिनौनी) हो जाती हैं। अध्याय के वर्णन में यह रोग दौरों के रूप में आता है: रोगी कभी बार-बार, कभी देर-देर से अपस्मार से ग्रस्त होता है और फिर होश में आता है। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है।
अध्याय आरम्भ में चार अपस्मार गिनाता है: वात, पित्त, कफ और सन्निपात (तीनों दोषों के मेल) से होने वाले। ये ऐसे प्राणियों में शीघ्र उत्पन्न होते हैं जिनका चित्त रज और तम से दूषित है, जिनके दोष अपने मार्ग से भटके हुए, विषम और बहुत बढ़े हुए हैं, जो मैले, बिगड़े हुए और अनुचित वस्तुओं से मिले अपवित्र भोजन का विषम विधि से सेवन करते हैं, जो शरीर की चेष्टाएँ विषम ढंग से करते हैं, या जिनका शरीर अत्यधिक क्षीण हो गया है। तब प्रकुपित दोष हृदय में, जिसे अध्याय अन्तरात्मा का सबसे श्रेष्ठ आयतन (आश्रय-स्थान) कहता है, और इन्द्रियों के स्थानों में जाकर ठहर जाते हैं; और जब काम, क्रोध, भय, लोभ, मोह, हर्ष, शोक, चिन्ता और उद्वेग जैसे भाव उन्हें उकसाते हैं, तो वे हृदय और इन्द्रियों के स्थानों को सहसा भर देते हैं, और प्राणी अपस्मार से ग्रस्त हो जाता है। इससे पहले पूर्वरूप, यानी आने वाले रोग के संकेत, दिखते हैं: भौंहों का अपनी जगह से हटना, आँखों में लगातार विकार, शब्द न होने पर भी शब्द सुनाई देना, लार और नाक का मल बहना, भोजन की इच्छा न होना, अरुचि और अपच, हृदय का जकड़ना, पेट फूलना, दुर्बलता, हड्डियों में टूटने जैसी पीड़ा, अङ्गों का टूटना, मोह, आँखों के आगे अँधेरा, मूर्छा और बार-बार चक्कर; और स्वप्न में मद, नाचना, बिंधना, व्यथा, काँपना और गिरना। इनके तुरन्त बाद अपस्मार प्रकट होता है।
फिर हर प्रकार की पहचान बताई गई है। वात के अपस्मार में दौरे बार-बार आते हैं और रोगी क्षण भर में होश में आ जाता है; उसकी आँखें उभर आती हैं, वह बेसुरे स्वर में विलाप करता है, झाग उगलता है, गर्दन तन जाती है, सिर टेढ़ा मुड़ जाता है, अङ्गुलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं, हाथ-पैर अस्थिर रहते हैं, और उसे अस्थिर, चपल और रूखे रूप दिखते हैं। पित्त के अपस्मार में भी दौरे बार-बार आते हैं और होश जल्दी लौटता है; रोगी घुटी हुई आवाज़ करता है, भूमि को पीटता है, उसके नख, नेत्र, मुख और त्वचा हरे, पीले या ताँबे जैसे लाल होते हैं, और उसे रक्त से सने, उग्र, भयानक, जलते हुए और क्रुद्ध रूप दिखते हैं। कफ के अपस्मार में दौरे देर-देर से आते हैं और होश भी देर से लौटता है; रोगी गिर पड़ता है, उसकी चेष्टाएँ बहुत विकृत नहीं होतीं, लार बहती है, नख आदि सफ़ेद होते हैं, और उसे सफ़ेद, भारी और चिकने रूप दिखते हैं। हर प्रकार में उसी दोष को बढ़ाने वाली वस्तुएँ अनुपशय (प्रतिकूल) होती हैं और उनकी उलटी वस्तुएँ उपशय (अनुकूल)। जिसमें सब लिङ्ग (लक्षण) एक साथ मिलें, वह सान्निपातिक अपस्मार असाध्य कहा गया है। अध्याय यह भी कहता है कि इन अपस्मारों के साथ कभी-कभी आगन्तु (बाहरी कारण) भी जुड़ जाता है, जिसकी पहचान है बताए गए लिङ्गों से अधिक लिङ्ग होना और कुछ ऐसे लिङ्ग होना जो दोषों के लिङ्गों से मेल न खाएँ। चिकित्सा का सिद्धान्त संक्षेप में यह बताया गया है कि अपस्मार के रोगियों के लिए अपने-अपने दोष के अनुसार तीक्ष्ण संशोधन और उपशमन हितकर हैं, आगन्तु के संयोग में मन्त्र आदि, और दोनों के एक साथ होने पर, चिकित्सा जानने वालों के कथन के अनुसार, साधारण कर्म। इसी प्रसंग में अध्याय बताता है कि प्राचीन काल में दक्ष के यज्ञ के विध्वंस के समय कई रोग पहली बार उत्पन्न हुए: भागते प्राणियों के शरीर के झकझोरे जाने से गुल्म, हवि खाने से प्रमेह और कुष्ठ, भय, त्रास और शोक से उन्माद, और अनेक प्रकार के भूतों और अशुचि (अपवित्र वस्तुओं) के संस्पर्श से अपस्मार; ज्वर महेश्वर (शिव जी) के ललाट से उत्पन्न हुआ, उसके संताप से रक्तपित्त, और अत्यधिक मैथुन से नक्षत्रों के राजा (चन्द्र देव) को राजयक्ष्मा हुआ।
इसके बाद अध्याय पूरे निदानस्थान की ओर लौटता है। वह कहता है कि उत्तम निदानस्थान पूरा कहा गया, और फिर एक नई बात रखता है: कोई रोग स्वयं दूसरे रोग का निदान, यानी कारण, बन सकता है। जैसे ज्वर के संताप से रक्तपित्त, रक्तपित्त से ज्वर, और दोनों से शोष; प्लीहा (तिल्ली) के बढ़ने से जठर (उदर रोग), और जठर से शोथ (सूजन); अर्श (बवासीर) से जठर और गुल्म; और प्रतिश्याय (जुकाम) से कास (खाँसी), कास से क्षय, और क्षय से शोष। कोई रोग दूसरे का कारण बनकर स्वयं शान्त हो जाता है, और कोई शान्त नहीं होता और कारण भी बनता है। ऐसे व्याधि-संकर (रोगों के मेल) अत्यन्त कष्टसाध्य होते हैं; वे रोगों के एक-दूसरे से उत्पन्न होने से भी बनते हैं और अपरिशुद्ध प्रयोग से भी, यानी ऐसी चिकित्सा से जो एक व्याधि को शान्त करे पर दूसरी को उभार दे। अध्याय के अनुसार शुद्ध प्रयोग वही है जो व्याधि को शान्त करे और दूसरी को कुपित न करे। फिर वह हेतु, लिङ्ग और शान्ति (शमन का उपाय), तीनों के बारे में बताता है कि एक के अनेक, अनेक का एक, एक का एक और अनेक के अनेक हो सकते हैं, और रूक्ष (रूखेपन वाले) हेतु, ज्वर, संताप, लङ्घन और हल्के भोजन जैसे उदाहरणों से इन्हें समझाता है।
अन्तिम भाग साध्यता और चिकित्सा के ढंग पर है। सुखसाध्य रोग सुगम उपाय से थोड़े समय में ठीक होता है और कृच्छ्रसाध्य बड़े प्रयत्न से लम्बे समय में; याप्य नामक असाध्य रोग पूरी तरह नहीं मिटता, और प्रत्याख्येय सब चिकित्साओं से परे चला जाता है। असाध्य रोग साध्य नहीं बनता, पर साध्य रोग असाध्य बन सकता है, और (चिकित्सा के) पादों में चूक से या दैव से रोग दूसरी अवस्था में पहुँच जाते हैं। इसलिए अध्याय बुद्धिमान वैद्य से कहता है कि वह रोगों की वृद्धि, स्थान (ठहराव) और क्षय की अवस्था को, और देह, अग्नि, बल और चेतस् (मन) की अवस्था को भी, चाहे वह अत्यन्त सूक्ष्म हो, पहचाने; और तिरछे मार्गों में गए दोषों की चिकित्सा में उतावली न करे, बल्कि उन्हें प्रयोगों से क्षीण करे या कोष्ठ में लाकर निकट के मार्ग से निकाले। वह यह भी कहता है कि जो लक्षण अपने आप में रोग हैं, वे जब दूसरे रोग की पहचान के लिए गिनाए जाते हैं, तब लिङ्ग माने जाते हैं, रोग नहीं; और संक्षेप में सब कुछ दो ही है, विकार और प्रकृति, और दोनों अपने हेतु के वश में हैं: हेतु न रहे तो वे बने नहीं रहते। अध्याय का अन्त संग्रह के श्लोकों से होता है, जो पूरे निदानस्थान के विषय गिनाते हैं: हेतु, पूर्वरूप, रूप, उपशय, सम्प्राप्ति, पूर्व उत्पत्ति (सम्भवतः रोगों की आदि उत्पत्ति), चिकित्सा का सूत्र-मात्र (संक्षिप्त संकेत), ज्वर आदि आठ विकारों की साध्यता और असाध्यता, उनके हेतु, लिङ्ग और शमन के उपाय, और हेतु, व्याधि और लक्षण के पर्याय-नाम। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि अपस्मार दोषों का वह रोग है जिसमें प्रकुपित दोष हृदय और इन्द्रियों के स्थानों को भर देते हैं, और स्मृति, बुद्धि और मन के विचलित होने से रोगी कुछ समय के लिए अन्धकार में डूब जाता है; और यह कि ग्रन्थ के अनुसार सब रोगों के भेद जानने वाला और सब औषधों में निपुण वैद्य सब रोगों को नष्ट करता है और मोह (भ्रम) में नहीं पड़ता।