भारत संहिता

अध्याय ७

उन्मादनिदानम्

उन्माद का निदान

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भूमिका

उन्मादनिदान चरक संहिता के निदानस्थान का सातवाँ अध्याय है। निदानस्थान वह खण्ड है जिसमें रोगों के कारण और उन्हें पहचानने के लक्षण बताए गए हैं। अध्याय का नाम उसके पहले वाक्य से आया है, जिसमें कहा गया है कि अब उन्मादनिदान की व्याख्या की जाएगी; हिन्दी में इसका अर्थ है 'उन्माद का निदान'। उन्माद का अर्थ है मन का विक्षिप्त हो जाना, जिसे बोलचाल में पागलपन कहते हैं। अध्याय की अपनी परिभाषा के अनुसार उन्माद मन, बुद्धि, संज्ञा (चेतना), ज्ञान, स्मृति, भक्ति (रुचि), शील (स्वभाव), चेष्टा और आचार का विभ्रम है, यानी इन सबका अपनी सामान्य स्थिति से भटक जाना। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है।

अध्याय आरम्भ में पाँच उन्माद गिनाता है: वात, पित्त, कफ और सन्निपात (तीनों दोषों के मेल) से होने वाले चार, और आगन्तु, यानी बाहरी कारण से होने वाला एक। दोषों से होने वाले उन्माद ऐसे लोगों में शीघ्र उत्पन्न होते हैं जो डरपोक हैं, जिनका सत्त्व (मन) दूषित है, जिनके दोष बढ़े हुए हैं, जो मैला, बिगड़ा हुआ या मिलाया हुआ अनुचित आहार विषम विधि से खाते हैं, जो शरीर की चेष्टाएँ विषम रीति से करते हैं, जिनका शरीर बहुत क्षीण है, जो रोग के वेग से विचलित हैं, या जिनके मन पर काम, क्रोध, लोभ, हर्ष, भय, मोह, शोक, चिन्ता और उद्वेग जैसे भावों से बार-बार आघात होता है। तब मन आहत और बुद्धि विचलित होने पर प्रकुपित दोष हृदय में पहुँचते हैं, मनोवह (मन को वहन करने वाले) स्रोतों को ढक लेते हैं और उन्माद उत्पन्न करते हैं। इसके पूर्वरूप, यानी रोग से पहले के संकेत, हैं सिर का खालीपन, आँखों की व्याकुलता, कानों में आवाज़, भोजन की इच्छा न होना, बिना अवसर के सोच में डूबे रहना, रोंगटे खड़े होना और बार-बार ज्वर; और सपनों में अशुभ और अस्थिर रूप देखना, तिल पेरने वाले के चक्र पर चढ़ना, बवण्डरों से मथा जाना या मैले पानी के भँवर में डूबना।

फिर हर दोष के उन्माद के लिङ्ग (लक्षण) अलग-अलग गिनाए गए हैं। वातोन्माद में चंचलता दिखती है: लगातार इधर-उधर घूमना, अंगों को झटकना, बेतुकी बातें बोलना, बिना अवसर के हँसना, नाचना और गाना, दुबलापन और उभरी हुई लाल आँखें। पित्तोन्माद में उग्रता और गर्मी दिखती है: अमर्ष, क्रोध, अपनों और परायों को मारना, लोगों पर झपट पड़ना, छाया और ठण्डे जल और अन्न की चाह, और ताँबे जैसी लाल, हरी या पीली आँखें। श्लेष्मोन्माद में जड़ता दिखती है: एक ही जगह ठहरे रहना, चुप रहना, एकान्त की चाह, लार बहना, सदा सोते रहना और सफ़ेद, मैल से लिपी आँखें। हर दोष के साथ यह भी कहा गया है कि उस दोष को शान्त करने वाले उपायों के उलटे उपाय रोगी को माफ़िक नहीं आते। तीनों दोषों के लक्षण एक साथ मिलें तो उन्माद सान्निपातिक है, जिसे कुशल वैद्य असाध्य कहते हैं। बाकी तीन साध्य उन्मादों के साधन अध्याय एक लम्बी सूची में गिनाता है: स्नेह, स्वेद, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, नस्य, धूम, अञ्जन, अभ्यङ्ग और लेप जैसे शरीर के उपाय; वध (ताड़न), बन्धन, अवरोधन (रोक रखना), वित्रासन (डराना), विस्मापन (विस्मित करना) और विस्मारण (भुलवाना) जैसे मन पर असर डालने वाले उपाय; अपतर्पण, सिराव्यधन और युक्ति से तय किया गया भोजन। साथ ही वह कहता है कि निदान के विपरीत कोई दूसरा औषध भी साधन हो सकता है।

इसके बाद अध्याय आगन्तुक उन्माद पर आता है, जो दोषों से होने वाले उन्मादों से अपने समुत्थान (कारण), पूर्वरूप, लिङ्ग, वेदना और उपशय में भिन्न होता है। इसके कारण पर दो मत रखे गए हैं: कुछ आचार्य पहले किए गए अप्रशस्त (बुरे) कर्म को इसका निमित्त मानते हैं, और भगवान् पुनर्वसु आत्रेय कहते हैं कि इसका हेतु प्रज्ञापराध, यानी बुद्धि का अपराध, ही है। प्रज्ञापराध से मनुष्य देवताओं, ऋषियों, पितरों, गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों, पिशाचों, गुरुओं, वृद्धों, सिद्धों, आचार्यों और पूज्य जनों का अपमान करके अहित करता है, और तब अपने आप से ही मारे गए उस मनुष्य पर आघात करके देवता आदि उसे उन्मत्त कर देते हैं। अध्याय इसके पूर्वरूप भी बताता है और रूप भी; रूप, यानी प्रकट रोग के लक्षण, हैं अपनी सामान्य क्षमता से बढ़कर बल, वीर्य, पराक्रम, स्मरण, ज्ञान और वचन का दिखना, और उन्माद के प्रकट होने का कोई निश्चित समय न होना। वह यह भी बताता है कि ये प्राणी किस ढंग से उन्माद आरम्भ करते हैं (देवता देखकर, गुरु, वृद्ध, सिद्ध और महर्षि शाप देकर, पितर स्वयं को दिखाकर, गन्धर्व छूकर, यक्ष प्रवेश करके, राक्षस अपनी गन्ध सुँघाकर और पिशाच चढ़कर सवारी की तरह चलाकर), और किन अवसरों पर मनुष्य उनकी पहुँच में होता है, जैसे पाप-कर्म आरम्भ करने पर, सूने घर में अकेले रहने पर, नियम और व्रत के भङ्ग होने पर, या पूज्य जनों का तिरस्कार करने पर। इन प्राणियों के तीन प्रयोजन बताए गए हैं: हिंसा, रति और अभ्यर्चन (पूजा)। अध्याय के अनुसार हिंसा के प्रयोजन वाला उन्माद असाध्य है, और बाकी दो साध्य हैं, जिनके साधन मन्त्र, औषधि, मणि, मङ्गल, बलि, उपहार, होम, नियम, व्रत, प्रायश्चित्त, उपवास, स्वस्त्ययन, प्रणिपात और गमन आदि हैं।

अन्त में अध्याय पाँचों उन्मादों को दो तरह से दो-दो वर्गों में बाँटता है: निज और आगन्तु, तथा साध्य और असाध्य। दोनों के कारण कभी-कभी मिल जाते हैं, और तब पूर्वरूप और लक्षण भी मिले-जुले होते हैं; जिस मेल में कोई असाध्य उन्माद हो वह असाध्य है, साध्यों का मेल साध्य है, और उसका साधन दोनों के साधनों का मेल है। फिर अन्त के श्लोक कहते हैं कि जो मनुष्य स्वयं क्लेश में न पड़ा हो, उसे न देवता, न गन्धर्व, न पिशाच, न राक्षस पीड़ित करते हैं; कि अपने कर्म से पीड़ित मनुष्य के पीछे जो लगते हैं, उसका क्लेश उनके कारण से नहीं है; कि प्रज्ञापराध से उपजे रोग के लिए बुद्धिमान देवताओं, पितरों या राक्षसों को दोष न दे, अपने आप को ही अपने सुख और दुःख का कर्ता माने, कल्याणकारी मार्ग अपनाए और डरे नहीं; क्योंकि देवता आदि का सम्मान, हितकर बातों का सेवन, और उनसे विरोध भी, सब अपने ही अधीन है। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि उन्माद केवल मन का नहीं, शरीर के दोषों का भी रोग है, और बाहर से आते दिखने वाले आगन्तुक उन्माद की जड़ भी ग्रन्थ मनुष्य के अपने प्रज्ञापराध में देखता है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २४)

तत्र श्लोकः- संख्या निमित्तं प्राग्रूपं लक्षणं साध्यता न च। उन्मादानां निदानेऽस्मिन् क्रियासूत्रं च भाषितम्॥

श्लोक २४ →

यहाँ (सार का) श्लोक है: इस निदान (अध्याय) में उन्मादों की संख्या, निमित्त (कारण), प्राग्रूप (पूर्वरूप), लक्षण, साध्यता और (साध्यता का) न होना, तथा क्रियासूत्र (चिकित्सा का संक्षिप्त सूत्र) कहा गया है।

मुख्य शब्द (१९) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

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च. नि. ७/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम उन्मादनिदान (उन्माद के निदान सम्बन्धी अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. नि. ७/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. नि. ७/३

; ॥ ३ ॥

यहाँ (इस शास्त्र में) निश्चय ही उन्माद पाँच (प्रकार के) होते हैं, जैसे - वात, पित्त, कफ, सन्निपात (तीनों दोषों के मेल) और आगन्तु (बाहरी कारण) के निमित्त से होने वाले।

च. नि. ७/४

; ॥ ४ ॥

उनमें से दोषों के कारण होने वाले चार (उन्माद) इस प्रकार के पुरुषों में शीघ्र उत्पन्न होते हैं, जैसे - जो डरपोक हैं, जिनका सत्त्व (मन) दूषित है, जिनके दोष बढ़े हुए हैं, जो मैल-युक्त, बिगड़े हुए और (दूसरी वस्तुओं से) मिलाए हुए, अनुचित प्रकार के आहार विषमता-युक्त विधि से सेवन करते हैं, जो तन्त्रप्रयोग भी विषम रीति से करते हैं और दूसरी शारीरिक चेष्टाएँ भी विषम रीति से करते हैं, जिनका शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया है, जो रोग के वेग से विचलित हैं, या जिनका मन आहत है, या जो काम, क्रोध, लोभ, हर्ष, भय, मोह, आयास, शोक, चिन्ता, उद्वेग आदि के आघातों से बार-बार पीड़ित होते हैं; मन के आहत होने और बुद्धि के विचलित होने पर, उभरे हुए और प्रकुपित दोष हृदय में पहुँचकर, मनोवह (मन को वहन करने वाले) स्रोतों को ढककर उन्माद उत्पन्न करते हैं।

च. नि. ७/५

॥ ५ ॥

उन्माद को तो मन, बुद्धि, संज्ञा, ज्ञान, स्मृति, भक्ति, शील, चेष्टा और आचार का विभ्रम (विचलित हो जाना) जानना चाहिए।

च. नि. ७/६

; , , , , , , , , , , , , , ( )॥ ६ ॥

उसके (उन्माद के) ये पूर्वरूप (हैं), जैसे - सिर का खालीपन, आँखों की व्याकुलता, कानों में आवाज (सुनाई देना), उच्छ्वास (साँस) की अधिकता, मुँह से (लार का) बहना, भोजन की इच्छा न होना, अरुचि और अपच, हृद्ग्रह (हृदय की जकड़न), बिना अवसर के ध्यान (सोच में डूबे रहना), आयास (थकान), संमोह (भ्रम) और उद्वेग (बेचैनी), लगातार रोंगटे खड़े होना, बार-बार ज्वर, चित्त का उन्मत्त होना, उदर्दित्व, और अर्दित रोग जैसी आकृति बनना, और सपने में बार-बार घूमते, हिलते, अस्थिर और अशुभ रूपों को देखना, तिल पेरने वाले के चक्र पर चढ़ना, बवण्डरों से मथा जाना, मैले जल के भँवर में डूबना और आँखों का (अपनी जगह से) हट जाना - ये [दोषों के कारण होने वाले उन्मादों के पूर्वरूप होते हैं]।

च. नि. ७/७

। ; , , , , , , , , , , , , , ; ;, , , , , , , , ; ;, , , , , , , , , , , ; ; ; ॥ ७ ॥

उसके तुरन्त बाद इसी प्रकार उन्माद की अभिनिर्वृत्ति (पूरी तरह प्रकट होना) हो ही जाती है। उसमें उन्माद के भेदों की पहचान यह है; जैसे: लगातार इधर-उधर घूमते रहना; बिना कारण आँखों, भौंहों, होंठों, कन्धों, जबड़ों, हाथों, पैरों और अंगों को झटकना; और लगातार असम्बद्ध (बेतुकी) बातें बोलते रहना; मुँह से झाग आना; बार-बार और बिना अवसर के मुस्कुराना, हँसना, नाचना, गाना और बाजा बजाना; बेसुरे ढंग से वीणा, वंश (बाँसुरी), शङ्ख, शम्या और ताल की ध्वनियों की नकल करना; जो सवारी नहीं हैं उनसे सवारी करना; जो आभूषण के काम की नहीं ऐसी वस्तुओं से शृंगार करना; और खाने-पीने की वस्तुएँ न मिलने पर (उनका) लोभ, और मिल जाने पर (उनका) अवमान (तिरस्कार), और तीव्र मात्सर्य (डाह); कृशता (दुबलापन); पारुष्य (रूखापन या कठोरता); आँखों का उभरा हुआ और लाल होना; और वात के उपशय के विपर्यास (उलटे आहार-उपचार) से अनुपशय (कष्ट का बढ़ना); ये वातोन्माद के लिङ्ग (लक्षण) होते हैं। अमर्ष (असहनशीलता), क्रोध, और बिना अवसर के संरम्भ (उग्र आवेश); शस्त्र, ढेलों, कोड़ों, लकड़ियों और मुक्कों से अपनों को या परायों को मारना; (लोगों पर) झपट पड़ना; घनी छाया, ठण्डे जल और अन्न की इच्छा; और बहुत अधिक संताप (शरीर में जलन); आँखों का ताँबे जैसा लाल, हरा या हल्दी जैसा पीला और संरब्ध (उग्र) होना; और पित्त के उपशय के विपर्यास से अनुपशय; ये पित्तोन्माद के लिङ्ग (लक्षण) होते हैं। एक ही जगह पर ठहरे रहना, चुप रहना, थोड़ा ही चलना-फिरना, लार और सिङ्घाणक (नाक का मल) बहना, भोजन की इच्छा न होना, एकान्त की चाह, बीभत्सता (घिनौनापन), शौच (सफ़ाई) से द्वेष, सदा सोते रहना, मुख पर श्वयथु (सूजन), आँखों का सफ़ेद, स्तिमित (गीली-सी और जड़) और मैल से लिपा होना, और श्लेष्मा के उपशय के विपर्यास से अनुपशय; ये श्लेष्मोन्माद के लिङ्ग (लक्षण) होते हैं। परन्तु तीनों दोषों के लिङ्गों का सन्निपात (एक साथ मिलना) होने पर (उस उन्माद को) सान्निपातिक जानना चाहिए; कुशल (वैद्य) उसे असाध्य कहते हैं।

च. नि. ७/८

- , , ॥ ८ ॥

परन्तु तीन साध्य (उन्मादों) के साधन (उपचार) ये हैं - स्नेह, स्वेद, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, उपशमन, नस्तःकर्म (नस्य), धूम (धूमपान), धूपन (धूप देना), अञ्जन, अवपीड, प्रधमन, अभ्यङ्ग, प्रदेह (गाढ़ा लेप), परिषेक (सिंचन), अनुलेपन (लेप), वध (ताड़न), बन्धन (बाँधना), अवरोधन (रोक रखना), वित्रासन (डराना), विस्मापन (विस्मित करना), विस्मारण (भुलवाना), अपतर्पण और सिराव्यधन (सिरा बेधना); और (हर एक के) अपने-अपने अनुसार युक्ति से भोजन की विधि; और इनके अतिरिक्त भी जो कोई निदान के विपरीत औषध करने योग्य हो, वह भी (साधन) हो।

च. नि. ७/९

- । प्रकीर्तितम्॥ ९ ॥

और इस विषय में (यह श्लोक) है - श्रेष्ठ वैद्य दोषों से उत्पन्न साध्य उन्मादों को विधिपूर्वक किए गए इस कर्म (उपचार) से ठीक करे, जो (अभी) कहा गया है।

च. नि. ७/१०

। । । , ; ॥ १० ॥

परन्तु जो उन्माद दोषों से होने वाले (उन्मादों) से समुत्थान (कारण), पूर्वरूप, लिङ्ग (लक्षण), वेदना और उपशय में विशेषता (भिन्नता) लिए हुए होता है, उसे (विद्वान्) आगन्तुक कहते हैं। कुछ (आचार्य) तो पहले किए गए अप्रशस्त (बुरे) कर्म को उसका निमित्त (कारण) मानते हैं। और उसका हेतु प्रज्ञापराध ही है, ऐसा भगवान् पुनर्वसु आत्रेय (कहते हैं)। क्योंकि प्रज्ञापराध से यह (मनुष्य) देवताओं, ऋषियों, पितरों, गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों, पिशाचों, गुरुओं, वृद्धों, सिद्धों, आचार्यों और पूज्य जनों का अपमान करके अहित (काम) करता है, या इसी प्रकार का कोई दूसरा अप्रशस्त कर्म आरम्भ करता है; अपने आप से ही मारे गए उस (मनुष्य) पर आघात करते हुए देवता आदि (उसे) उन्मत्त कर देते हैं।

च. नि. ७/११

; , , , , , ; ॥ ११ ॥

उनमें, देवता आदि के प्रकोप (क्रोध) के कारण होने वाले आगन्तुक उन्माद से आक्रान्त होने वाले (व्यक्ति) के ये पूर्वरूप होते हैं; जैसे - देवताओं, गायों, ब्राह्मणों और तपस्वियों की हिंसा में रुचि, क्रोधी स्वभाव, क्रूर अभिप्राय (इरादे), अरति (बेचैनी), ओज, वर्ण, छाया, बल और शरीर का क्षीण होना, और स्वप्न में देवता आदि द्वारा डाँटा-धमकाया जाना और (कुछ करने को) प्रेरित किया जाना; उसके बाद उन्माद प्रकट होता है।

च. नि. ७/१२

; , , , , , , ॥ १२ ॥

उनमें, उन्माद उत्पन्न करने वाले और (किसी को) उन्मत्त करने जा रहे भूतों (प्राणियों) के आरम्भ (आक्रमण) का यह विशेष (ढंग) होता है; जैसे - देवता (व्यक्ति को) देखते हुए उन्माद उत्पन्न करते हैं, गुरु, वृद्ध, सिद्ध और महर्षि शाप देते हुए, पितर (स्वयं को) दिखाते हुए, गन्धर्व छूते हुए, यक्ष (शरीर में) प्रवेश करते हुए, राक्षस तो अपनी गन्ध सुँघाते हुए, और पिशाच (उस पर) चढ़कर (उसे) सवारी की तरह चलाते हुए।

च. नि. ७/१३

; , ॥ १३ ॥

उस (आगन्तुक उन्माद) के ये रूप (लक्षण) होते हैं, जैसे: अपनी (सामान्य क्षमता) से बढ़कर बल, वीर्य, पौरुष, पराक्रम, ग्रहण (बात को पकड़ने की शक्ति), धारण (उसे मन में टिकाए रखने की शक्ति), स्मरण, ज्ञान, वचन (बोलना) और विज्ञान (समझ); और उन्माद (प्रकट होने) का समय अनियत (निश्चित नहीं) होता है।

च. नि. ७/१४

; , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ॥ १४ ॥

उन्मत्त करने को उद्यत देवों, ऋषियों, पितरों, गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों और पिशाचों के लिए, अथवा गुरुओं, वृद्धों और सिद्धों के लिए भी, मनुष्य निश्चय ही इन अवसरों पर अभिगमनीय (आक्रमण की पहुँच में) होते हैं, जैसे: पाप-कर्म आरम्भ करने पर; या पहले किए गए कर्म के परिणाम (फल देने) के समय; या अकेले सूने घर में रहने पर, या चौराहे पर ठहरने पर; या सन्ध्या के समय अप्रयत (अशुद्ध और असंयत) रहने पर; या पर्व-सन्धियों में मैथुन करने पर; या रजस्वला (मासिक धर्म वाली स्त्री) से समागम करने पर; या अध्ययन, बलि, मङ्गल-कर्म और होम का अनुष्ठान विगुण (विधि से रहित) होने पर; या नियम, व्रत और ब्रह्मचर्य भङ्ग होने पर; या महायुद्ध में; या देश, कुल या नगर के विनाश के समय; या महाग्रह के समीप आने पर; या स्त्री के प्रसव के समय; या विविध भूतों (प्राणियों), अशुभ और अशुचि (वस्तुओं) को छूने पर; वमन, विरेचन और रक्तस्राव के समय; या अशुचि और अप्रयत (व्यक्ति) के चैत्य या देवालय में जाने पर; या मांस, मधु, तिल, गुड़ या मद्य (के सेवन) के बाद जूठे रहने पर; या नग्न रहने पर; या रात में नगर, निगम (बस्ती), चौराहे, उपवन, श्मशान या आघातन (वधस्थल) में जाने पर; या द्विजों, गुरुओं, देवताओं, यतियों या पूज्य (जनों) का तिरस्कार करने पर; या धर्माख्यान (धर्म के उपदेश) का उल्लंघन करने पर; या किसी अन्य अप्रशस्त (निन्दित) कर्म के आरम्भ पर। इस प्रकार अभिघात (आक्रमण) के समय बता दिए गए हैं।

च. नि. ७/१५

; , , । । , , , , , ; ॥ १५ ॥

उन्माद उत्पन्न करने वाले भूतों का (किसी को) उन्मत्त करने में प्रयोजन (उद्देश्य) तो निश्चय ही तीन प्रकार का होता है, जैसे: हिंसा, रति (आनन्द) और अभ्यर्चन (पूजा)। उनके उस विशेष प्रयोजन को उन्मत्त (व्यक्ति) के आचरण की विशेषताओं के लक्षणों से जानना चाहिए। उनमें, हिंसा चाहने वाले (भूत) द्वारा उन्मत्त किया जाता हुआ (व्यक्ति) आग में घुस जाता है, जल में डूब जाता है, या (ऊँची) भूमि से गड्ढे में गिर पड़ता है, शस्त्र, कोड़े, लकड़ी, ढेले और मुक्कों से अपने आप को मारता है, और प्राण लेने के लिए कुछ और (भी) करने लगता है; उसे असाध्य जानना चाहिए; परन्तु बाकी दो (प्रकार) साध्य हैं।

च. नि. ७/१६

॥ १६ ॥

उन दोनों (साध्य उन्मादों) के साधन (उपचार के उपाय) हैं: मन्त्र, औषधि, मणि, मङ्गल, बलि, उपहार, होम, नियम, व्रत, प्रायश्चित्त, उपवास, स्वस्त्ययन, प्रणिपात, गमन आदि।

च. नि. ७/१७

॥ १७ ॥

इस प्रकार ये पाँच उन्माद बता दिए गए हैं।

च. नि. ७/१८

। । , । , । ॥ १८ ॥

वे (पाँचों उन्माद) तो निश्चय ही, निज और आगन्तु के भेद से तथा साध्य और असाध्य के भेद से बाँटे जाने पर, पाँच होते हुए भी दो ही होते हैं। और वे दोनों (निज और आगन्तु) कभी-कभी, जैसे बताए गए हैं उन कारणों के मेल से, एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। (तब) उन दोनों का पूर्वरूप मिला-जुला ही होता है, और लिङ्ग (लक्षण) भी मिला-जुला ही होता है। उनमें असाध्य (उन्मादों) के संयोग को, और साध्य तथा असाध्य के संयोग को असाध्य जानना चाहिए; परन्तु साध्यों के संयोग को साध्य (जानना चाहिए)। उसका साधन (उपचार) (दोनों के) साधनों का संयोग ही जानना चाहिए।

च. नि. ७/१९

- । ॥ १९ ॥

और यहाँ (इस विषय में श्लोक) हैं: जो मनुष्य स्वयं (अपने कर्मों से) क्लेश में न पड़ा हो, उसे न तो देवता, न गन्धर्व, न पिशाच, न राक्षस, और न ही दूसरे (प्राणी) पीड़ित करते हैं।

च. नि. ७/२०

। ॥ २० ॥

परन्तु अपने कर्म से पीड़ित हो रहे इस (मनुष्य) के पीछे जो (प्राणी) लगते हैं, (तो) वह क्लेश उनके कारण से (उत्पन्न) नहीं है, क्योंकि (इसमें उनकी) कृतकृत्यता नहीं है।

च. नि. ७/२१

। ॥ २१ ॥

जब अपने (ही) कर्म से उत्पन्न रोग प्रज्ञापराध से पैदा हुआ हो, तब बुद्धिमान (व्यक्ति) न देवताओं को दोष दे, न पितरों को, और न ही राक्षसों को।

च. नि. ७/२२

। ॥ २२ ॥

(मनुष्य) अपने आप को ही सुख और दुःख का कर्ता माने। इसलिए कल्याणकारी मार्ग को अपनाए, डरे नहीं।

च. नि. ७/२३

। ॥ २३ ॥

देवता आदि का सम्मान (पूजा) और हितकर (बातों) का सेवन, तथा वे (देवता आदि) और उनसे विरोध: यह सब अपने ही अधीन है।

च. नि. ७/२४

- । ॥ २४ ॥

यहाँ (सार का) श्लोक है: इस निदान (अध्याय) में उन्मादों की संख्या, निमित्त (कारण), प्राग्रूप (पूर्वरूप), लक्षण, साध्यता और (साध्यता का) न होना, तथा क्रियासूत्र (चिकित्सा का संक्षिप्त सूत्र) कहा गया है।

च. नि. ७

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के निदानस्थान में उन्मादनिदान नामक सातवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।