॥ १ ॥
अब हम कतिधापुरुषीय (पुरुष कितने प्रकार का है, इस विषय के) शारीर (शरीर सम्बन्धी अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
अध्याय १
पुरुष कितने प्रकार का
इस पृष्ठ का हिन्दी पाठ AI (Claude) द्वारा तैयार किया गया ड्राफ्ट है। चिह्न वाले अंशों की सम्पादक द्वारा जाँच अभी बाकी है।
यह शारीरस्थान का पहला अध्याय है। इसका नाम कतिधापुरुषीय है, यानी वह अध्याय जो इस प्रश्न से जुड़ा है कि "पुरुष कितने प्रकार का है"। यहाँ "पुरुष" का अर्थ केवल आदमी नहीं है, वह जीवित प्राणी है जिसमें शरीर, मन और चेतना सब हैं। अध्याय की शुरुआत में ही ग्रन्थ कहता है कि अब इस अध्याय की व्याख्या की जाएगी।
अध्याय अग्निवेश के प्रश्नों से खुलता है। वे पूछते हैं कि पुरुष कितने प्रकार का है, उसका कारण क्या है, वह जानने वाला है या नहीं जानने वाला, नित्य है या अनित्य, और प्रकृति तथा विकार क्या हैं। फिर वे आत्मा के बारे में प्रचलित विशेषणों पर एक-एक करके आपत्तियाँ रखते हैं, तीनों कालों की वेदना की चिकित्सा पर शंका करते हैं, और पूछते हैं कि वेदनाओं का कारण और आश्रय क्या है और वे कहाँ पूरी तरह समाप्त होती हैं। इन सबके उत्तर पुनर्वसु देते हैं।
उत्तर में पहले पुरुष को आकाश आदि पाँच महाभूतों और छठी चेतना के रूप में, और फिर चौबीस तत्त्वों के रूप में बताया गया है। मन, इन्द्रियों, उनके विषयों और बुद्धि का काम समझाया गया है, और यह भी कि ज्ञान आत्मा, इन्द्रिय, मन और विषय के मेल से होता है। ग्रन्थ पुरुष को कारण मानता है और उस मत की जाँच करता है जो भावों को क्षण-क्षण बदलने वाला मानकर किसी स्थिर पुरुष को नहीं मानता। इसके बाद व्यक्त और अव्यक्त, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, प्रकृति के आठ रूप और सोलह विकार गिनाए गए हैं, और आत्मा के लिङ्ग, यानी उसके होने की पहचान कराने वाले चिह्न, बताए गए हैं।
अध्याय का दूसरा भाग वेदना और उसके उपचार की ओर आता है। बीती, वर्तमान और आने वाली वेदना, तीनों के उपचार की युक्ति समझाई गई है। दुःख का मूल उपधा को बताया गया है, और दुःख के कारणों में बुद्धि, धृति और स्मृति का बिगड़ना (प्रज्ञापराध), काल, और इन्द्रिय तथा विषय का असात्म्य संयोग गिनाए गए हैं। सुख और दुःख का कारण इन्द्रियाँ या विषय अकेले नहीं, उनका योग बताया गया है।
अन्त में अध्याय मोक्ष तक पहुँचता है: मन के आत्मा में स्थिर होने पर सुख-दुःख का रुक जाना, योग के साधन, तत्त्व की स्मृति को मोक्ष का मार्ग कहा जाना, और चरम संन्यास में सब वेदनाओं का मूल सहित समाप्त हो जाना। पाठक के लिए ध्यान देने की बात यह है कि इस अध्याय में पुरुष को कारण और कर्ता मानने के तर्क, वेदना की उत्पत्ति और निवृत्ति का क्रम, और सुख-दुःख के कारण के रूप में योग, ये तीन धाराएँ साथ-साथ चलती हैं।
तत्र श्लोकः-प्रश्नाः पुरुषमाश्रित्य त्रयोविंशतिरुत्तमाः।कतिधापुरुषीयेऽस्मिन्निर्णीतास्तत्त्वदर्शिना॥
श्लोक १५६ →इस विषय में श्लोक है। पुरुष का आश्रय लेकर (पुरुष को विषय बनाकर) तेईस उत्तम प्रश्न, इस कतिधापुरुषीय (पुरुष कितने प्रकार का) अध्याय में तत्त्वदर्शी (तत्त्व को देखने वाले) द्वारा निर्णीत किए गए हैं।
शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।
अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।
चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।
व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।
चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।
चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।
सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।
चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।
चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।
शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।
चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।
शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।
अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।
चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।
अर्थ: कारण।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।
अर्थ: औषध, उपचार।
चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।
॥ १ ॥
अब हम कतिधापुरुषीय (पुरुष कितने प्रकार का है, इस विषय के) शारीर (शरीर सम्बन्धी अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।
! । , ॥ ३ ॥
हे धीमान् (बुद्धिमान्)! धातुओं के भेद से पुरुष कितने प्रकार का बँटता है? पुरुष का कारण क्या है, वह किस (कारण) से है, और पुरुष का उद्गम क्या है?
, । , , ॥ ४ ॥
(पुरुष) अज्ञ है या ज्ञ? वह नित्य है या अनित्य बताया गया है? प्रकृति क्या है, विकार कौन-से हैं, और पुरुष का लिङ्ग (चिह्न) क्या है?
। ॥ ५ ॥
आत्मा को जानने वाले (ज्ञानी) निष्क्रिय, स्वतन्त्र, वशी, सर्वव्यापी और विभु आत्मा को क्षेत्रज्ञ तथा साक्षी भी कहते हैं।
! । ॥ ६ ॥
हे भगवन्! जो निष्क्रिय है, उसके लिए क्रिया कैसे होती है? और यदि वह स्वतन्त्र है, तो अनिष्ट (अवांछित) योनियों में कैसे जन्म लेता है?
। ॥ ७ ॥
यदि (आत्मा) वशी है, तो असुखकर (दुःख देने वाले) भावों से बलपूर्वक क्यों दबा लिया जाता है? और सर्वव्यापी होने से वह सब वेदनाओं को क्यों नहीं जानता?
। ॥ ८ ॥
विभु (आत्मा) पर्वत और दीवार से ढकी हुई (वस्तु) को क्यों नहीं देखता? अथवा क्षेत्रज्ञ और क्षेत्र में से पहले कौन (है), यह संशय है।
। ॥ ९ ॥
जानने योग्य क्षेत्र के बिना क्षेत्रज्ञ का पहले होना युक्त (सम्भव) नहीं है; और यदि क्षेत्र पहले हो, तो क्षेत्रज्ञ अशाश्वत (नाशवान्) हो जाएगा।
। ॥ १० ॥
और यह साक्षीभूत (साक्षी बना हुआ) किसका (साक्षी) है, क्योंकि कर्ता से भिन्न कोई अन्य नहीं है? और अविकारी के लिए वेदना से किया हुआ भेद कैसे हो सकता है?
। ॥ ११ ॥
और हे भगवन्! पीड़ित (रोगी) की तीन (वेदनाओं) में से वैद्य किसकी चिकित्सा करता है - अतीत वेदना की, वर्तमान की या भविष्य की?
। ॥ १२ ॥
आने वाली (वेदना) का अभी प्राप्त न होना है, बीती हुई का फिर न आना है, और वर्तमान पीड़ा की भी स्थिति नहीं है; इसलिए संशय है।
। ॥ १३ ॥
वेदनाओं का कारण क्या है? उनका अधिष्ठान (आश्रय) क्या कहा जाता है? और ये सभी वेदनाएँ कहाँ पूरी तरह निवृत्ति (समाप्ति) को प्राप्त होती हैं?
। ॥ १४ ॥
सब कुछ जानने वाला, सब का त्याग करने वाला, सब संयोगों से निकला हुआ, अकेला, प्रशान्त भूतात्मा किन लिङ्गों (चिह्नों) से जाना जाता है?
। ॥ १५ ॥
इस प्रकार अग्निवेश के वचन सुनकर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, प्रशान्त आत्मा वाले पुनर्वसु ने सब कुछ यथावत् (ठीक-ठीक) कहा।
। ॥ १६ ॥
आकाश आदि (पाँच महाभूत) और छठी चेतना, ये धातु "पुरुष" कहे गए हैं। चेतना धातु भी अकेला "पुरुष" नाम वाला कहा गया है।
। ॥ १७ ॥
और फिर धातुओं के भेद से (पुरुष) चौबीस (तत्त्वों) वाला कहा गया है: मन, दस इन्द्रियाँ, (पाँच) अर्थ (इन्द्रियों के विषय) और आठ धातुओं वाली प्रकृति।
। ॥ १८ ॥
मन का लक्षण ज्ञान का अभाव और भाव भी है; क्योंकि आत्मा, इन्द्रिय और अर्थों का संनिकर्ष (सम्पर्क) होने पर (भी ज्ञान) नहीं होता।
। ॥ १९ ॥
मन के दूर होने से ज्ञान (नहीं होता) और उसके समीप होने से वह (ज्ञान) होता है। अणुत्व और एकत्व, ये दो गुण मन के कहे गए हैं।
। ॥ २० ॥
चिन्तन करने योग्य, विचार करने योग्य, ऊहन (तर्क) करने योग्य, ध्यान करने योग्य और संकल्प करने योग्य, जो कुछ भी मन से जानने योग्य है, वह सब "अर्थ" नाम वाला है।
। ॥ २१ ॥
इन्द्रियों का अभिग्रह (नियन्त्रण), अपना निग्रह (संयम), ऊह और विचार - ये मन के कर्म हैं; इसके बाद बुद्धि प्रवृत्त होती है।
। ॥ २२ ॥
इन्द्रिय का विषय मन से युक्त इन्द्रिय द्वारा ही ग्रहण किया जाता है; और उसके बाद मन के द्वारा गुण या दोष की दृष्टि से उसकी कल्पना की जाती है।
। ॥ २३ ॥
उस विषय में जो निश्चय करने वाली बुद्धि उत्पन्न होती है, उसी से (पुरुष) बुद्धिपूर्वक बोलने या करने का निश्चय करता है।
। ॥ २४ ॥
आकाश आदि (महाभूतों) की पाँच इन्द्रियाँ हैं, जो एक-एक गुण अधिक से युक्त हैं; वे कर्म से अनुमान करने योग्य हैं, जिनसे बुद्धि प्रवृत्त होती है।
। ॥ २५ ॥
हाथ, पैर, गुदा और उपस्थ, तथा वाणी इन्द्रिय, ये पाँच ही कर्मेन्द्रियाँ हैं; पैर गमन के कर्म में (लगते हैं)।
। वागिन्द्रियं ॥ २६ ॥
गुदा और उपस्थ त्याग (मल-मूत्र आदि छोड़ने) के लिए हैं, दोनों हाथ ग्रहण करने और धारण करने में लगते हैं, जीभ वाणी की इन्द्रिय है; और वाणी सत्य (ज्योति) तथा अनृत (तम) होती है।
। ॥ २७ ॥
महाभूत ये हैं: ख (आकाश), वायु, अग्नि, आप (जल) और क्षिति (पृथ्वी); शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध उनके गुण हैं।
। ॥ २८ ॥
उनमें पहला (आकाश) एक गुण वाला है; आगे-आगे वालों में गुण की वृद्धि होती है; और पहले-पहले का गुण भी क्रम से गुण वालों (अगले भूतों) में माना गया है।
। ॥ २९ ॥
खर (कठोर), द्रव, चल और उष्ण होना क्रम से पृथ्वी, जल, वायु और तेज (अग्नि) का, और आकाश का अप्रतीघात (रुकावट न होना), यह लक्षण देखा गया है।
। ॥ ३० ॥
ये सभी लक्षण स्पर्शनेन्द्रिय (त्वचा) की पहुँच में हैं; क्योंकि स्पर्शनेन्द्रिय से जानने योग्य स्पर्श अपने विपरीत (गुणों) सहित है।
। ॥ ३१ ॥
शरीर में गुण गुण वालों (द्रव्यों) के कहे गए हैं और चिह्न भी; शब्द आदि अर्थ जानने योग्य हैं: गोचर, विषय और गुण (ये एक ही के नाम हैं)।
। ॥ ३२ ॥
जो बुद्धि जिस इन्द्रिय का आश्रय लेकर प्राणी में प्रवृत्त होती है, वह उसी (इन्द्रिय) के और मन के नाम से कही जाती है; (क्योंकि) वह मन से उत्पन्न होती है।
कार्येन्द्रियार्थानां । ॥ ३३ ॥
कार्य, इन्द्रिय और अर्थ के भेद से बुद्धियाँ अनेक कही गई हैं; आत्मा, इन्द्रिय, मन और अर्थ के सन्निकर्ष (सम्पर्क) से उत्पन्न होने वाली (बुद्धि) एक-एक होती है।
। ॥ ३४ ॥
जैसे अँगुली, अँगूठे और हथेली से उत्पन्न, तथा तन्त्री, वीणा और नख से उत्पन्न शब्द देखा गया है, वैसे ही संयोग से उत्पन्न बुद्धि देखी गई है।
। ॥ ३५ ॥
बुद्धीन्द्रियों, मन और अर्थों के योग को धारण करने वाले पर (आत्मा) को जाने; यह चौबीस तत्त्वों की राशि 'पुरुष' नाम वाली है।
। ॥ ३६ ॥
रजस् और तमस् से युक्त (पुरुष) का यह संयोग अनन्त है; उन दोनों के हट जाने पर तो सत्त्व की वृद्धि से (यह संयोग) निवृत्त हो जाता है।
। ॥ ३७ ॥
इसी (पुरुष) में कर्म, फल और ज्ञान प्रतिष्ठित हैं; इसी में मोह, सुख, दुःख, जीवन, मरण और स्वता (अपनापन) हैं।
। ॥ ३८ ॥
इस प्रकार जो तत्त्व से जानता है, वह प्रलय और उदय को जानता है, परम्परा को, चिकित्सा को, और जो कुछ भी जानने योग्य है (उसे भी जानता है)।
। ॥ ३९ ॥
भा (प्रकाश), तम, सत्य, अनृत, वेद, शुभ और अशुभ कर्म, कर्ता और बोद्धा (जानने वाला) नहीं होंगे, यदि पुरुष न हो।
। ॥ ४० ॥
न आश्रय, न सुख, न पीड़ा, न गति, न अगति, न वाणी, न विज्ञान, न शास्त्र, न जन्म और न मरण (होगा)।
। ॥ ४१ ॥
यदि पुरुष न हो तो न बन्ध होगा और न मोक्ष; इसलिए पुरुष कारण है, ऐसा कारण को जानने वालों ने कहा है।
कारणमात्मा । ज्ञानं प्रयोजनम्॥ ४२ ॥
यदि आत्मा कारण न हो तो भा (प्रकाश) आदि अहेतुक (बिना कारण के) हो जाएँगे; इनमें ज्ञान सम्भव नहीं होगा और उनसे प्रयोजन भी नहीं सधेगा।
। ॥ ४३ ॥
कुम्हार के बिना मिट्टी, दण्ड और चक्रों से बना हुआ घड़ा, और घर बनाने वाले के बिना मिट्टी, तिनकों और लकड़ी से बना हुआ घर
। ॥ ४४ ॥
जो (ऐसा) कहे, वह यह कहेगा कि देह करणों (साधनों) के मिलने से बिना कर्ता के बनी है; वह अज्ञान के कारण युक्ति और आगम (शास्त्र) से बहिष्कृत है।
॥ ॥ ४५ ॥
पुरुष कारण है; वह सभी प्रमाणों से जाना जाता है, उन सभी आगमों (शास्त्रों) से भी, जिनसे प्रमेय (जानने योग्य विषय) का ज्ञान होता है।
। ॥ ४६ ॥
वे (पहले के भाव) वही नहीं हैं; उनके समान दूसरे भाव परम्परा से उत्पन्न होते हैं। सादृश्य (एक-से रूप) के कारण, नये-नये (भाव) भी 'वही हैं' ऐसा कहे जाते हैं।
। ॥ ४७ ॥
भाव और उनका समूह बिना स्वामी (ईश्वर) के 'सत्त्व' नाम वाला है; वही कर्ता और भोक्ता है, वह पुरुष नहीं है - ऐसा कुछ लोग मानते हैं।
। ॥ ४८ ॥
जिनके मत में आत्मा का उपदेश नहीं किया जाता, उनके अनुसार: उन भावों में से दूसरों द्वारा किए हुए (कर्म) का प्राप्त फल, दूसरे, नये और (पहले के) समान भाव भोगते हैं।
। ॥ ४९ ॥
करणों (साधनों) की कर्ता से भिन्नता देखी गई है, परन्तु कर्ता वही (पुरुष) है। क्योंकि करणों से युक्त कर्ता ही सभी कर्मों का कारण है।
। ॥ ५० ॥
भावों के नाश में लगने वाला समय पलक झपकने के समय से भी अधिक शीघ्र है। टूटे (नष्ट) हुए भावों का फिर से होना नहीं होता, और किया हुआ (कर्म) दूसरे के पास नहीं जाता।
। ॥ ५१ ॥
तत्त्व जानने वालों का यह मत है कि क्योंकि (ऐसा है), इसलिए वह (पुरुष) कारण है। प्राणियों की क्रिया और उसके भोग में वह नित्य है और 'पुरुष' नाम वाला है।
। ॥ ५२ ॥
प्राणियों में कारण (पुरुष) के रहने पर ही अहंकार, फल, कर्म, एक देह से दूसरे देह में जाना और स्मृति, ये देह के बीच (देह बदलने पर भी) बने रहते हैं।
। ॥ ५३ ॥
परमात्मा की उत्पत्ति नहीं है, क्योंकि वह अनादि है। परन्तु 'राशि' नाम वाला पुरुष मोह, इच्छा, द्वेष और कर्म से उत्पन्न होता है।
ज्ञानं । ॥ ५४ ॥
आत्मा ज्ञ (जानने वाला) है; करणों के संयोग से उसका ज्ञान प्रवृत्त होता है। करणों के निर्मल न होने से या (उनके) संयोग के अभाव से ज्ञान प्रवृत्त नहीं होता।
। ॥ ५५ ॥
जैसे देखने वाले को भी मलिन दर्पण में (रूप) दिखाई नहीं देता, या गँदले जल में नहीं दिखता, वैसे ही दूषित चित्त में तत्त्व (दिखाई नहीं देता)।
। ॥ ५६ ॥
करण हैं: मन, बुद्धि, और ज्ञानेन्द्रियाँ तथा कर्मेन्द्रियाँ। कर्ता का कर्म (करणों के) संयोग से उत्पन्न होता है; वेदना (अनुभव) और बुद्धि भी (संयोग से ही)।
। ॥ ५७ ॥
अकेला भूतात्मा (पुरुष) कर्म करने में प्रवृत्त नहीं होता, और न फल पाता है। सब कुछ संयोग से होता है; उसके बिना कुछ भी नहीं है।
। ॥ ५८ ॥
कोई एक भाव अकेला नहीं होता, और बिना हेतु के भी नहीं होता। (भाव के) शीघ्र गति वाले स्वभाव के कारण अभाव (नाश) टलता नहीं।
। ॥ ५९ ॥
पुरुष अनादि और नित्य है; इसके विपरीत जो हेतु से उत्पन्न है (वह अनित्य है)। जो विद्यमान और कारण रहित है, वह नित्य देखा गया है; जो हेतु से उत्पन्न है, वह इससे विपरीत है।
। ॥ ६० ॥
वही (पुरुष) भाव (अपने स्वरूप) से (इन्द्रियों द्वारा) ग्रहण करने योग्य नहीं है; उसकी नित्यता किसी भी कारण से नहीं है। वह भाव के द्वारा जानने योग्य है; वह अव्यक्त और अचिन्त्य है; इससे भिन्न व्यक्त है।
।, ॥ ६१ ॥
अव्यक्त आत्मा क्षेत्रज्ञ है, शाश्वत, विभु (सर्वव्यापी) और अव्यय (अविनाशी)। उससे जो भिन्न है, वह व्यक्त है; और अन्य दो (प्रकार) आगे कहे जाएँगे।
। पुनरव्यक्तं ॥ ६२ ॥
व्यक्त ऐन्द्रियक है; वह जो इन्द्रियों से ग्रहण किया जाता है। इससे भिन्न जो है, वह अव्यक्त है, लिङ्ग (चिह्न) से ग्रहण करने योग्य और इन्द्रियों से परे है।
। ॥ ६३ ॥
आकाश आदि (पाँच महाभूत), बुद्धि, अव्यक्त और आठवाँ अहंकार, ये भूतों की प्रकृति कही गई हैं; और विकार सोलह हैं।
। ॥ ६४ ॥
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, मन सहित (वे), और पाँच विषय, ये विकार कहे गए हैं।
। ॥ ६५ ॥
इस प्रकार अव्यक्त को छोड़कर सब क्षेत्र कहा गया है। ऋषि इस क्षेत्र के अव्यक्त को क्षेत्रज्ञ जानते हैं।
। ॥ ६६ ॥
अव्यक्त से बुद्धि उत्पन्न होती है; बुद्धि से (पुरुष) 'मैं' ऐसा मानता है। इसके बाद अहंकार से आकाश आदि क्रम से उत्पन्न होते हैं।
। ॥ ६७ ॥
उसके बाद सब अंगों से पूर्ण होकर उत्पन्न हुआ पुरुष 'अभ्युदित' (उदय को प्राप्त) कहा जाता है; प्रलय में वही पुरुष चेष्टाओं और पुनर्जन्म के भावों से अलग हो जाता है।
। ॥ ६८ ॥
वह अव्यक्त से व्यक्त अवस्था को जाता है और फिर व्यक्त से अव्यक्त अवस्था को; रज और तम से घिरा हुआ वह चक्र के समान घूमता रहता है।
। ॥ ६९ ॥
जिनकी द्वन्द्व (सुख-दुःख आदि जोड़ों) में प्रबल आसक्ति है और जो अहंकार में लगे हुए हैं, उनके लिए उदय और प्रलय (उत्पत्ति और लय) होते हैं; और जो इससे भिन्न हैं, उनके लिए नहीं होते।
। ॥ ७० ॥
प्राण और अपान, पलक झपकना आदि, जीवन, मन की गति, एक इन्द्रिय से दूसरी इन्द्रिय तक संचार, प्रेरणा और धारण, और जो (इसी प्रकार के हैं)
। ॥ ७१ ॥
स्वप्न में दूसरे देश में जाना, मृत्यु (पञ्चत्व) को प्राप्त होना, तथा दाहिनी आँख से देखी हुई वस्तु का बायीं आँख से पहचाना जाना
। ॥ ७२ ॥
इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, प्रयत्न, चेतना, धृति, बुद्धि, स्मृति और अहंकार - ये (सब) परम आत्मा के लिङ्ग (चिह्न) हैं।
। ॥ ७३ ॥
क्योंकि ये लिङ्ग (चिह्न) जीवित (व्यक्ति) में पाए जाते हैं और मृत (व्यक्ति) में आत्मा के लिङ्ग नहीं पाए जाते, इसीलिए महर्षि (इन्हें आत्मा के लिङ्ग) कहते हैं।
शून्यागारमचेतनम्। ॥ ७४ ॥
उस (आत्मा) के चले जाने पर शरीर निश्चय ही सूने घर के समान और अचेतन हो जाता है; पाँच महाभूतों के शेष रह जाने के कारण उसे 'पञ्चत्व को प्राप्त' कहा जाता है।
। ॥ ७५ ॥
मन अचेतन है और क्रिया वाला है; चेतन करने वाला (आत्मा) उससे भिन्न (पर) है। मन से युक्त उस विभु (सर्वव्यापी आत्मा) की क्रियाएँ बताई जाती हैं।
। ॥ ७६ ॥
क्योंकि आत्मा चेतना वाला है, इसलिए उसे कर्ता कहा जाता है; और मन अचेतन होने के कारण क्रिया वाला होते हुए भी (कर्ता) नहीं कहा जाता।
। ॥ ७७ ॥
प्रत्येक प्राणी सभी योनियों में अपने-अपने (कर्म के) अनुसार अपनी ही आत्मा से, प्राणों द्वारा अपने को संचालित करता है; क्योंकि इसका कोई दूसरा संचालक नहीं है।
कुरुते कृत्वा । ॥ ७८ ॥
वशी (संयमी) वह कर्म करता है जिसे करके फल पाता है; वशी चित्त को एकाग्र करता है; वशी सब (विषयों) को दूर कर देता है।
। ॥ ७९ ॥
सर्वव्यापी होते हुए भी देही (शरीर धारण करने वाला) आत्मा अपनी-अपनी स्पर्श की इन्द्रिय में (स्थित वेदना को जानता है); सभी वेदनाएँ सब आश्रयों (अंगों) में स्थित हैं, इसलिए आत्मा (उन) सब वेदनाओं को नहीं जानता।
। ॥ ८० ॥
इसी से इसकी विभुता (सर्वव्यापकता) है, क्योंकि यह सर्वव्यापी और महान् है; और मन के समाधान (एकाग्र करने) से आत्मा छिपी हुई (वस्तु) को भी देखता है।
। ॥ ८१ ॥
(आत्मा को) मन से नित्य जुड़ा हुआ - उस मन से जो देह के कर्मों का अनुसरण करता है - सब योनियों में गया हुआ और एक योनि में भी स्थित जानना चाहिए।
। ॥ ८२ ॥
आत्मा का आदि नहीं है, और क्षेत्र (शरीर) की परम्परा भी अनादि है; इसलिए उन दोनों के अनादि होने से 'पहले कौन' - ऐसा नहीं कहा जाता।
। ॥ ८३ ॥
ज्ञ (जानने वाले) को साक्षी कहा जाता है, अज्ञ साक्षी नहीं होता; आत्मा तो (ज्ञ) माना गया है, (इसलिए वही साक्षी है); क्योंकि सब प्राणियों के सभी भाव आत्मा को साक्षी रखने वाले हैं।
। ॥ ८४ ॥
भूतात्मा (शरीर में स्थित आत्मा) अकेला कभी भी लक्षणों से नहीं जाना जाता; उस अनुपलभ्य (जाना न जा सकने वाले) अकेले में कोई विशेष (भेद) नहीं होता।
। ॥ ८५ ॥
संयोग से बने पुरुष का विशेष (भेद) वेदना से किया हुआ माना गया है; जहाँ वेदना निश्चित है, वहाँ विशेष उसी (वेदना) से किया हुआ है।
। ॥ ८६ ॥
'वैद्य सभी तीनों कालों की वेदनाओं की चिकित्सा करता है' - ऐसा कुछ (लोग) जिस युक्ति से कहते हैं, उस युक्ति को समझ लेना चाहिए।
। ॥ ८७ ॥
फिर उसके सिर का शूल (पीड़ा), वह ज्वर फिर आ गया; फिर वह बलवान् खाँसी, वह छर्दि (उल्टी) फिर आ गई।
। ॥ ८८ ॥
इन प्रसिद्ध वचनों से अतीत (बीती हुई वेदना) का लौट आना माना गया है; और यह बीती हुई पीड़ाओं का काल फिर आ गया है।
। ॥ ८९ ॥
उस पीड़ा के समय को लक्ष्य करके जो औषध प्रयोग की जाती है, वह बीत चुकी पीड़ाओं का प्रशमन कहा जाता है।
। ॥ ९० ॥
वे जल फिर मेरे पास आ गए हैं, जिनसे पहले फसल नष्ट हुई थी। जैसे (बाढ़ रोकने के लिए) बाँध बनाया जाता है, वैसे ही आश्रय (शरीर) में प्रतिकर्म (उपचार) किया जाता है।
आने वाले विकारों का पूर्वरूप देखकर जो क्रिया की जाती है, वह आने वाली (अनागत) पीड़ा को नष्ट करती है।
। ॥ ९२ ॥
दुःखों का परम्परा से चला आने वाला सिलसिला रुक जाता है, और सुख के कारणों के सेवन से सुख भी प्रवृत्त होता है।
। ॥ ९३ ॥
सम धातु विषमता को प्राप्त नहीं होते और विषम धातु समता को नहीं पाते। शरीर के धातु सदा अपने कारणों के सदृश (अनुरूप) ही उत्पन्न होते हैं।
इस युक्ति को आगे रखकर वैद्य तीनों कालों की पीड़ा को नष्ट करता है, ऐसा कहा गया है। और नैष्ठिकी (अन्तिम) चिकित्सा वह है जो उपधा के बिना हो।
। ॥ ९५ ॥
उपधा ही दुःख और दुःख के आश्रय को देने वाला परम (मुख्य) कारण है, और सब उपधाओं का त्याग सब दुःखों को दूर करने वाला है।
। ॥ ९६ ॥
जैसे रेशम का कीड़ा (कोषकार) वध करने वाले तन्तुओं को ग्रहण करता है, वैसे ही अज्ञानी और सदा पीड़ित मनुष्य विषयों से तृष्णा को ग्रहण करता है।
। ॥ ९७ ॥
जो ज्ञानी विषयों को अग्नि के समान जानकर उनसे निवृत्त हो जाता है, उसके पास आरम्भ न करने और संयोग न होने से दुःख नहीं आता।
। ॥ ९८ ॥
बुद्धि, धृति और स्मृति का बिगड़ना, काल और कर्मों का आ पहुँचना, और असात्म्य (प्रतिकूल) विषयों का आना, ये दुःख के कारण जानने योग्य हैं।
। ॥ ९९ ॥
नित्य और अनित्य में, हित और अहित में जो विषम (उलटा) आग्रह है, उसे बुद्धिविभ्रंश जानना चाहिए; क्योंकि बुद्धि (ठीक हो तो) सम (यथार्थ) रूप से देखती है।
। ॥ १०० ॥
विषयों की ओर झुका हुआ मन, धृति के नष्ट होने से, अहितकर विषय से रोका नहीं जा सकता; क्योंकि धृति नियमन करने के स्वभाव वाली है।
रज और मोह से ढके आत्मा (मन) वाले जिस व्यक्ति की स्मृति तत्त्वज्ञान से हट जाती है, वह स्मृतिभ्रंश है; क्योंकि स्मरण करने योग्य विषय स्मृति में ही स्थित रहता है।
कुरुतेऽशुभम्। सर्वदोषप्रकोपणम्॥ १०२ ॥
बुद्धि, धृति और स्मृति से भ्रष्ट हुआ मनुष्य जो अशुभ कर्म करता है, उसे प्रज्ञापराध जानना चाहिए; वह सब दोषों को कुपित करने वाला है।
। ॥ १०३ ॥
(वेगों में) गतिमान को (बलपूर्वक) प्रेरित करना और उठे हुए (वेगों) को रोकना, साहस के कर्मों का सेवन और स्त्रियों का अत्यधिक सेवन
। ॥ १०४ ॥
कर्मों के समय का बीत जाना, कर्मों का गलत ढंग से आरम्भ, विनय और आचार का लोप, और पूज्यजनों का अपमान
। ॥ १०५ ॥
स्वयं जाने हुए अहितकर विषयों का सेवन, और अत्यन्त उन्माद उत्पन्न करने वाले कारणों का सेवन
। ॥ १०६ ॥
असमय और अनुचित स्थान में घूमना-फिरना, बुरे (क्लिष्ट) कर्म करने वालों से मित्रता, और इन्द्रियोपक्रम (में कहे गए) सद्वृत्त का त्याग
। क्लिष्टं ॥ १०७ ॥
ईर्ष्या, मान, भय, क्रोध, लोभ, मोह, मद और भ्रम, अथवा उनसे उत्पन्न जो कष्टदायक कर्म हो, और जो कष्टदायक शारीरिक कर्म हो
। ॥ १०८ ॥
और जो अन्य भी ऐसा कर्म रज और मोह से उत्पन्न हो, उसे शिष्ट (विद्वान) लोग प्रज्ञापराध कहते हैं, जो रोग का कारण है।
। ॥ १०९ ॥
बुद्धि से विषम (गलत) विज्ञान और विषम (गलत) प्रवर्तन (प्रवृत्ति), इसे प्रज्ञापराध जानना चाहिए; क्योंकि वह मन का गोचर (क्षेत्र) है।
। ॥ ११० ॥
रोगों की कालसम्प्राप्ति (समय के अनुसार उत्पत्ति) व्याधिसंग्रह (अध्याय) में बताई जा चुकी है, और पित्त आदि (दोषों) का चय, प्रकोप और प्रशम भी, जैसा पहले (बताया गया)।
। ॥ १११ ॥
मिथ्या, अति और हीन लक्षणों वाली, वर्षा पर समाप्त होने वाली (ऋतुएँ) रोगों के कारण हैं; तथा भोजन के जीर्ण होने, खा लेने और भली-भाँति पच जाने की अवस्थाओं में काल या अकाल की जो स्थिति है (वह भी रोगों का कारण है),
। ॥ ११२ ॥
और (दिन के) पूर्वाह्ण, मध्याह्न और अपराह्ण (भाग), तथा रात्रि के जो तीन याम (पहर) हैं, इन कालों में जो रोग नियत (निश्चित रूप से बँधे) हैं, वे काल से उत्पन्न (कालज) हैं।
। ॥ ११३ ॥
अन्येद्युष्क, द्व्यहग्राही, तृतीयक और चतुर्थक (ये ज्वर) अपने-अपने काल में प्रकट होते हैं, क्योंकि इनके बल का आगमन (उसी) काल में होता है।
। ॥ ११४ ॥
ये और दूसरे जो कोई भी अनेक प्रकार के काल से उत्पन्न रोग हैं, वे अनागत (न आई हुई, भविष्य की) अवस्था में ही बल और काल को जानने वाले (वैद्य) द्वारा चिकित्सा के योग्य हैं।
काल के परिणाम (परिवर्तन) से, जरा (बुढ़ापा) और मृत्यु के कारण उत्पन्न होने वाले रोग स्वाभाविक (स्वभाव से होने वाले) देखे गए हैं; स्वभाव का कोई प्रतिकार नहीं है।
। ॥ ११६ ॥
जो पूर्व देह (पिछले जन्म) में किया हुआ कर्म 'दैव' शब्द से बताया गया है, वह भी रोगों का कारण काल के द्वारा प्राप्त होता (प्रकट होता) है।
किञ्चित् ।
क्योंकि कोई भी बड़ा कर्म ऐसा नहीं है जिसका फल भोगा न जाता हो। क्रिया (चिकित्सा) को निष्फल करने वाले कर्म से उत्पन्न रोग उस (कर्म) के क्षय होने से शान्त हो जाते हैं।
। ॥ ११८ ॥
अत्यन्त उग्र (तेज़) शब्द सुनने से, बिलकुल न सुनने से, और अत्यन्त हीन (धीमे) शब्दों के सुनने से (श्रवण में) जड़ता आ जाती है।
। ॥ ११९ ॥
कठोर, भयानक, अशस्त (अशुभ), अप्रिय और विपत्ति (व्यसन) की सूचना देने वाले शब्दों से श्रवण (कान) का संयोग मिथ्यासंयोग कहा जाता है।
। ॥ १२० ॥
असंस्पर्श (स्पर्श का बिलकुल न होना), अतिसंस्पर्श (अत्यधिक स्पर्श) और हीनसंस्पर्श (कम स्पर्श) भी; स्पर्श करने योग्य वस्तुओं के विषय में संक्षेप में कहा गया यह स्पर्शनेन्द्रिय (त्वचा) का बाधक है।
जो भूत, विष और वात (के संस्पर्श) हैं, तथा जो बेसमय आया हुआ स्नेह, शीत और उष्ण का संस्पर्श है, वह मिथ्यायोग कहा जाता है।
। ॥ १२२ ॥
चमकीले रूपों को अत्यधिक देखने से, अत्यन्त सूक्ष्म (रूपों) को देखने से और पूरी तरह न देखने से भी दृष्टि नष्ट हो जाती है।
द्वेष योग्य (अप्रिय), भयंकर, घृणित, दूर के और अत्यन्त सटे हुए रूपों को देखने से, तथा तामस रूपों के (देखने से) मिथ्यासंयोग कहा जाता है।
। ॥ १२४ ॥
अत्यादान (अधिक ग्रहण), अनादान (बिलकुल ग्रहण न करना) और ओकसात्म्य आदि के कारण रसों का जो विषम आदान और अल्प आदान है, वह दूषण (विकृति) है।
। ॥ १२५ ॥
अत्यन्त मृदु और अत्यन्त तीक्ष्ण गन्धों का सेवन, तथा पूरी तरह सेवन न करना, घ्राणेन्द्रिय (नासिका) का विनाश करने वाला है।
। ॥ १२६ ॥
जो गन्ध पूति (सड़ी, दुर्गन्ध वाली), भूत, विष और द्विष्ट (अप्रिय) हैं, तथा जो अनार्तव (बेमौसम की) हैं, उन गन्धों से घ्राण (नासिका) का संयोग मिथ्यायोग कहा जाता है।
इस प्रकार असात्म्य इन्द्रिय-विषयों का संयोग तीन प्रकार का है, जो दोषों को कुपित करने वाला है। असात्म्य उसे जानना चाहिए जो (शरीर के) साथ आत्मीयता (अनुकूलता) को प्राप्त नहीं होता।
। ॥ १२८ ॥
शब्द आदि (इन्द्रिय-विषयों) के मिथ्या, अति और हीन योग से जो रोग उत्पन्न होता है, उसे बुद्धिमानों द्वारा ऐन्द्रियक (इन्द्रिय-सम्बन्धी) रोग जानना चाहिए।
। ॥ १२९ ॥
ये (पूर्वोक्त) अशान्त वेदनाओं के कारण कहे गए हैं। सुख का कारण तो एक ही है, सम योग, जो अत्यन्त दुर्लभ है।
। ॥ १३० ॥
न इन्द्रियाँ और न ही उनके विषय सुख-दुःख के कारण हैं; सुख-दुःख का कारण तो योग देखा गया है, जो चार प्रकार का है।
। , ॥ १३१ ॥
इन्द्रियाँ हैं, विषय हैं, (परन्तु) योग (न हो तो) न पीड़ा है और न सुख। इसलिए कारण चार प्रकार का योग ही है।
।, ॥ १३२ ॥
आत्मा और इन्द्रिय, मन, बुद्धि, विषय (गोचर) अथवा कर्म के बिना सुख-दुःख (नहीं होता)। जैसा और जो जानने योग्य है, वह वैसा ही कहा जाता है।
। ॥ १३३ ॥
स्पर्शन इन्द्रिय का (विषय से) सम्पर्क, और मन का स्पर्श भी - इस प्रकार दो प्रकार का स्पर्श सुख और दुःख रूप वेदनाओं को प्रवृत्त करने वाला है।
प्रवर्तते। ॥ १३४ ॥
इच्छा और द्वेष स्वरूप तृष्णा सुख-दुःख से उत्पन्न होती है; और तृष्णा फिर सुख-दुःखों का कारण कही जाती है।
। ॥ १३५ ॥
क्योंकि वह (तृष्णा) वेदना के आश्रय कहे जाने वाले भावों (पदार्थों) को ग्रहण करती है; ग्रहण न करने पर (पुरुष) स्पर्श को प्राप्त नहीं होता, और जो स्पर्श से अछूता है वह वेदनाओं को नहीं जानता।
।॥ १३६ ॥
वेदनाओं का अधिष्ठान (आधार) मन और इन्द्रियों सहित शरीर है - केश, लोम, नखों के अग्र भाग, अन्न, मल, द्रव और गुणों को छोड़कर।
। ॥ १३७ ॥
योग में और मोक्ष में सभी वेदनाओं की प्रवृत्ति नहीं होती। मोक्ष में निवृत्ति पूर्ण (शेष-रहित) होती है; योग मोक्ष की ओर प्रवृत्त करने वाला है।
प्रवर्तते। ॥ १३८ ॥
आत्मा, इन्द्रिय, मन और विषयों के सन्निकर्ष (सम्पर्क) से सुख-दुःख उत्पन्न होता है; (किन्तु) मन के आत्मा में स्थित और स्थिर हो जाने पर (विषयों में) आरम्भ (प्रवृत्ति) न होने से
। ॥ १३९ ॥
(तब) वे दोनों (सुख और दुःख) निवृत्त हो जाते हैं और शरीर वाले (पुरुष) में वशित्व उत्पन्न होता है; योग को जानने वाले ऋषि उसे योग जानते हैं।
। ॥ १४० ॥
चित्त का आवेश (प्रवेश), पदार्थों का ज्ञान, इच्छा से क्रिया, (दिव्य) दृष्टि, (दिव्य) श्रवण, स्मृति, कान्ति, और इच्छा से अदर्शन (अदृश्य होना)
। ॥ १४१ ॥
इस प्रकार योगियों का आठ प्रकार का ऐश्वर (ईश्वर-सम्बन्धी) बल कहा गया है; वह सब शुद्ध सत्त्व (मन) के समाधान से उत्पन्न होता है।
। ॥ १४२ ॥
मोक्ष रज और तम के अभाव से तथा प्रबल कर्म के पूर्ण क्षय से (होता है); सभी संयोगों से वियोग (होना) अपुनर्भव (पुनर्जन्म का न होना) कहा जाता है।
। ॥ १४३ ॥
सत्पुरुषों की उपासना (सेवा), असत् (दुष्टों) का भली-भाँति त्याग, व्रत, चर्या और उपवास, तथा अनेक प्रकार के नियम
। ॥ १४४ ॥
धर्मशास्त्रों का धारण (स्मरण), विशेष ज्ञान, निर्जन स्थान में अनुराग, विषयों में अरुचि, मोक्ष के लिए निश्चय (दृढ़ प्रयत्न), और परम धृति (धैर्य)
। ॥ १४५ ॥
कर्मों का आरम्भ न करना, किए हुए (कर्मों) का पूर्ण क्षय, नैष्क्रम्य (कर्म से निवृत्ति), अहंकार का अभाव, और संयोग में भय देखना
। ॥ १४६ ॥
मन और बुद्धि की एकाग्रता, पदार्थों के तत्त्व की परीक्षा; तत्त्व की स्मृति के उपस्थित होने से यह सब प्रवृत्त होता है।
स्मृति सत्सेवन से लेकर धृति तक (के साधनों) से उत्पन्न होती है; भावों के स्वभाव को स्मरण करके, (उसे) स्मरण करता हुआ (पुरुष) दुःख से मुक्त हो जाता है।
। ॥ १४८ ॥
वे आठ कारण कहे जाएँगे जिनसे स्मृति उत्पन्न होती है: निमित्त और रूप के ग्रहण से, सादृश्य से, विपर्यय सहित
। स्मृतिरुच्यते॥ १४९ ॥
सत्त्व के अनुबन्ध से, अभ्यास से, ज्ञान के योग से, फिर सुनने से, और देखे, सुने तथा अनुभव किए हुए के स्मरण से स्मृति होती है, ऐसा कहा जाता है।
।, ॥ १५० ॥
तत्त्व की स्मृति का यह बल ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग मुक्त पुरुषों द्वारा दिखाया गया है, जिससे गए हुए (मुक्त) फिर लौटकर नहीं आए।
। ॥ १५१ ॥
यही (मार्ग) योग का मार्ग भी योगियों ने फिर कहा है; जिन्होंने धर्मों (तत्त्वों) की गणना कर ली, उन सांख्यों और मुक्त पुरुषों ने (इसे) मोक्ष का मार्ग कहा है।
। ॥ १५२ ॥
सब कुछ कारण वाला, दुःख रूप, अपना न होने वाला और अनित्य ही है; वह आत्मा का किया हुआ भी नहीं है, फिर भी उसमें अपनेपन का भाव उत्पन्न होता है।
। ॥ १५३ ॥
जब तक वह सत्य बुद्धि उत्पन्न नहीं होती जिससे 'यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा नहीं है' - ऐसा जानकर ज्ञानी सबको पार कर जाता है।
। ॥ १५४ ॥
उस चरम संन्यास में सभी वेदनाएँ संज्ञा, ज्ञान और विज्ञान के साथ, मूल सहित, पूर्णतः निवृत्ति को प्राप्त हो जाती हैं।
। ॥। ( ।)। ॥ १५५ ॥
इसके बाद (उस चरम संन्यास के बाद) ब्रह्मरूप हो चुका भूतात्मा जाना नहीं जाता; वह सब भावों से निकल चुका है, और उसका कोई चिह्न नहीं रहता। (ब्रह्मवेत्ताओं की गति ब्रह्म है, और वह अक्षर तथा लक्षणरहित है; गङ्गाधर के संस्करण के अनुसार।) और इस विषय में ज्ञान ब्रह्मवेत्ताओं का है; अज्ञानी उसे जानने के योग्य नहीं है।
- ।॥ १५६ ॥
इस विषय में श्लोक है। पुरुष का आश्रय लेकर (पुरुष को विषय बनाकर) तेईस उत्तम प्रश्न, इस कतिधापुरुषीय (पुरुष कितने प्रकार का) अध्याय में तत्त्वदर्शी (तत्त्व को देखने वाले) द्वारा निर्णीत किए गए हैं।
॥॥
इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संशोधित तन्त्र के शारीरस्थान में 'कतिधापुरुषीय शारीर' नामक पहला अध्याय (समाप्त हुआ) ॥१॥