भारत संहिता

अध्याय २

अतुल्यगोत्रीयं शारीरम्

भिन्न गोत्र (गर्भ की उत्पत्ति और विकार)

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ४८)

तत्र श्लोकः।इहाग्निवेशस्य महार्थयुक्तं षट्त्रिंशकं प्रश्नगणं महर्षिः।अतुल्यगोत्रे भगवान् यथावन्निर्णीतनाम् ज्ञानविवर्धनार्थं॥

श्लोक ४८ →
मुख्य शब्द (१३) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

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च. शा. २/१

अथातोऽतुल्यगोत्रीयं शारीरं व्याख्यास्यामः॥ १ ॥

च. शा. २/२

॥ २ ॥

च. शा. २/३

। ॥ ३ ॥

च. शा. २/४

। ॥ ४ ॥

च. शा. २/५

। ॥ ५ ॥

च. शा. २/६

। ॥ ६ ॥

च. शा. २/७

। ॥ ७ ॥

च. शा. २/८

। ॥ ८ ॥

च. शा. २/९

। ॥ ९ ॥

च. शा. २/१०

। ॥ १० ॥

च. शा. २/११

कन्यां सुतं वा सहितौ पृथग्वा सुतौ सुते वा तनयांन् बहून् वा।कस्मात् प्रसूते सुचिरेण गर्भमेकोऽभिवृद्धिं च यमेऽभ्युपैति॥ ११ ॥

च. शा. २/१२

॥ १२ ॥

च. शा. २/१३

। ॥ १३ ॥

च. शा. २/१४

भिनत्ति यावद्बहुधा प्रपन्नः शुक्रार्तवं वायुरतिप्रवृद्धः।तावन्त्यपत्यानि यथाविभाहं कर्मात्मकान्यस्ववशात् प्रसूते॥ १४ ॥

च. शा. २/१५

। ॥ १५ ॥

च. शा. २/१६

कर्मात्मकत्वाद्विषमांशभेदाच्छुक्रासृजोर्वृद्धिमुपैति कुक्षौ।एकोऽधिको न्यूनतरो द्वितीय एवं यमेऽप्यभ्यधिको विशेषः ॥ १६ ॥

च. शा. २/१७

। ॥ १७ ॥

च. शा. २/१८

बीजात् समांशादुपतप्तबीजात् स्त्रीपुंसलिङ्गी भवति द्विरेताः।शुक्राशयं गर्भगतस्य हत्वा करोति वायुः पवनेन्द्रियत्वन्॥ १८ ॥

च. शा. २/१९

शुक्राशयद्वारविघ्ट्टनेन संस्कारवाहं कुरुतेऽनिलश्च।मन्दाल्पबीजावबलावहर्षौ क्लीबौ च हेतुर्विकृतिद्वयस्य॥ १९ ॥

च. शा. २/२०

। ॥ २० ॥

च. शा. २/२१

वाय्वग्निदोषाद्वृषणौ तु यस्य नाशं गतौ वातिकषण्डकः सः।इत्येवमष्टौ विकृतिप्रकाराः कर्मात्मकानामुपलक्षणीयः॥ २१ ॥

च. शा. २/२२

। ? ॥ २२ ॥

च. शा. २/२३

निष्ठीविका गौरवमङ्गसादस्तन्द्राप्रहर्षौ हृदये व्यथा च।तृप्तिश्च बीजग्रहणं च योन्यां गर्भस्य सद्योऽनुगतस्य लिङ्गम्॥ २३ ॥

च. शा. २/२४

। ॥ २४ ॥

च. शा. २/२५

। ॥ २५ ॥

च. शा. २/२६

। ॥ २६ ॥

च. शा. २/२७

तेषां विशेषाद्बलवन्ति यानि भवन्ति मातापितृकर्मजानि।तानि व्यवस्येत् सदृशत्वहेतुं सत्त्वं यथानूकमपि व्यवस्येत्॥ २७ ॥

च. शा. २/२८

। ॥ २८ ॥

च. शा. २/२९

। ॥ २९ ॥

च. शा. २/३०

वर्षासु काष्ठाश्मघनाम्बुवेगास्तरोः सरित्स्रोतसि संस्थितस्य।यथैव कुर्युर्विकृतिं तथैव गर्भस्य कुक्षौ वियतस्य दोषाः॥ ३० ॥

च. शा. २/३१

। ॥ ३१ ॥

च. शा. २/३२

। ॥ ३२ ॥

च. शा. २/३३

। ॥ ३३ ॥

च. शा. २/३४

। ॥ ३४ ॥

च. शा. २/३५

। ॥ ३५ ॥

च. शा. २/३६

। ॥ ३६ ॥

च. शा. २/३७

। ॥ ३७ ॥

च. शा. २/३८

। ॥ ३८ ॥

च. शा. २/३९

। ॥ ३९ ॥

च. शा. २/४०

। ॥ ४० ॥

च. शा. २/४१

। ॥ ४१ ॥

च. शा. २/४२

। ॥ ४२ ॥

च. शा. २/४३

। ॥ ४३ ॥

च. शा. २/४४

। ॥ ४४ ॥

च. शा. २/४५

हैमन्तिकं दोषचयं वसन्ते प्रवाहयन् ग्रैष्मकमभ्रकाले।घनात्यये वार्षिकमाशु सम्यक् प्राप्नोति रोगानृतुजान्न जातु ॥ ४५ ॥

च. शा. २/४६

। ॥ ४६ ॥

च. शा. २/४७

। ॥ ४७ ॥

च. शा. २/४८

तत्र श्लोकः।इहाग्निवेशस्य महार्थयुक्तं षट्त्रिंशकं प्रश्नगणं महर्षिः।अतुल्यगोत्रे भगवान् यथावन्निर्णीतनाम् ज्ञानविवर्धनार्थं॥ ४८ ॥

च. शा. २

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थानेऽतुल्यगोत्रीयं शारीरं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥