भारत संहिता

अध्याय ४

महतीगर्भावक्रान्तिशारीरम्

गर्भ का अवतरण (विस्तार से)

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भूमिका

महतीगर्भावक्रान्ति चरक संहिता के शारीरस्थान का चौथा अध्याय है। नाम का अर्थ है गर्भ के अवतरण का बड़ा, यानी विस्तृत, वर्णन: गर्भ कैसे बनता है, कैसे बढ़ता है और किन कारणों से नहीं बन पाता या बिगड़ जाता है। अध्याय भगवान् आत्रेय का उपदेश है। वे आरम्भ में ही आठ बातें गिनाते हैं जिन्हें आगे समझाया जाएगा: गर्भ किस कारण से बनता है, उसे गर्भ नाम कब मिलता है, वह किसका विकार है, किस क्रम से कोख में बनता है, उसकी वृद्धि का कारण क्या है, जन्म न होने का, नाश का और विकृति का कारण क्या है।

पहला भाग गर्भ के बनने की बात करता है। आत्रेय बताते हैं कि गर्भ माता, पिता, आत्मा, सात्म्य, रस और सत्त्व, इन छह भावों के मिलने से बनता है, और शुक्र, शोणित और जीव के कोख में पहुँचने पर ही उसे गर्भ नाम मिलता है। वह पाँच महाभूतों का विकार है और चेतना उसका आधार है, जिसे छठा धातु कहा गया है। ऋतुमती स्त्री की पहचान, मिलन से बीज का बनना और आर्तव से उसका मेल बताने के बाद अध्याय दिखाता है कि चेतना धातु किस क्रम से गुणों को ग्रहण करती है, पहले आकाश को और फिर वायु आदि चार को। फिर पहले, दूसरे और तीसरे महीने में गर्भ का रूप बताया गया है, और अंगों का दूसरा वर्गीकरण महाभूतों के अनुसार दिया गया है, जिससे यह विचार निकलता है कि पुरुष लोक के समान है।

आगे अध्याय दिखाता है कि इन्द्रियाँ और अंग साथ-साथ बनते हैं, और गर्भ के लिंग के बारे में ग्रन्थ का कथन दिया गया है। फिर द्वैहृदय्य का प्रसंग आता है: जब गर्भ की इन्द्रियाँ बन जाती हैं तब उसकी इच्छाएँ माता के हृदय के साथ जुड़ी दिखती हैं। ग्रन्थ गर्भ पहचानने के लक्षण गिनाता है, और बताता है कि इस अवस्था की इच्छाओं के विषय में बड़े-बूढ़ों का मत क्या रहा है। इसके बाद चौथे से नौवें महीने का क्रम है, जिसमें हर महीने गर्भ और माता में आने वाला परिवर्तन बताया गया है; आठवें महीने को कुशल जन गिनती में नहीं लेते, और प्रसव का काल नौवें से दसवें महीने तक कहा गया है।

अध्याय का दूसरा भाग वृद्धि के कारण और बिगाड़ का वर्णन करता है। माता आदि भावों की पूर्णता, आचरण की उत्तमता, उपस्नेह और उपस्वेद, काल का परिणाम और स्वभाव की सिद्धि को वृद्धि का हेतु कहा गया है, और इन्हीं भावों के बिगड़ने से गर्भ का नाश या जन्म का न होना बताया गया है। जब दोष शरीर के बीज के किसी भाग को दूषित करते हैं, तब गर्भ के उस अंग में विकृति आती है; पाठ स्त्री और पुरुष के बीज के दोषों से बनने वाली स्थितियाँ अलग-अलग गिनाता है। फिर कहा गया है कि आत्मा स्वयं विकार से रहित है, विकृति शरीर के तीन दोषों वात, पित्त और कफ से और मन के दो दोषों रज और तम से उपजती है।

अन्त का बड़ा भाग सत्त्व, यानी मन की प्रकृति, के भेद बताता है: शुद्ध, राजस और तामस। शुद्ध के सात, राजस के छह और तामस के तीन भेद देवताओं, ऋषियों और प्राणियों के स्वभाव के अनुकरण से गिनाए गए हैं, और पाठ स्वयं कहता है कि यह भेदों का केवल एक अंश है। अन्त के श्लोक अध्याय का सार देते हैं: गर्भ से जुड़े पाँच शुभ और तीन अशुभ भाव, कुल आठ, और जो वैद्य इन्हें सब प्रकार से जानता है, उसकी योग्यता। ध्यान रहे कि अध्याय ग्रन्थ का मत बताता है, कोई उपाय या सलाह नहीं देता।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ४२-४५)

तत्र श्लोकाः-निमित्तमात्मा प्रकृतिर्वृद्धिः कुक्षौ क्रमेण च।वृद्धिहेतुश्च गर्भस्य पञ्चार्थाः शुभसंज्ञिताः॥

श्लोक ४२ →

इस विषय में श्लोक ये हैं- निमित्त, आत्मा, प्रकृति, कोख में क्रम से वृद्धि और गर्भ की वृद्धि का हेतु, ये पाँच विषय शुभ नाम वाले (शुभ कहे गए) हैं।

अजन्मनि च यो हेतुर्विनाशे विकृतावपि।इमांस्त्रीनशुभान् भावानाहुर्गर्भविघातकान्॥

श्लोक ४३ →

जो (भाव) जन्म न होने में, नाश में और विकृति (बिगड़ने) में भी कारण होता है, इन तीन अशुभ भावों को गर्भ का विघात करने वाला कहते हैं।

शुभाशुभसमाख्यातानष्टौ भावानिमान् भिषक्।सर्वथा वेद यः सर्वान् स राज्ञः कर्तुमर्हति॥

श्लोक ४४ →

शुभ और अशुभ नाम से कहे गए इन आठ भावों को जो वैद्य सब प्रकार से जानता है, वह राजाओं (की चिकित्सा) करने के योग्य है।

अवाप्त्युपायान् गर्भस्य स एवं ज्ञातुमर्हति।ये च गर्भविघातोक्ता भावास्तांश्चाप्युदारधीः॥

श्लोक ४५ →

वह उदार बुद्धि वाला (वैद्य) इस प्रकार गर्भ की प्राप्ति के उपायों को जानने के योग्य होता है, और जो गर्भ का विघात करने वाले कहे गए भाव हैं, उन्हें भी (जानने के योग्य होता है)।

मुख्य शब्द (२१) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

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च. शा. ४/१

॥ १ ॥

अब इसके बाद हम महती गर्भावक्रान्ति (गर्भ के अवतरण के विस्तृत वर्णन वाले) शारीर (शरीर सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. शा. ४/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।

च. शा. ४/३

, , , , , , , , ॥ ३ ॥

गर्भ जिस कारण से बनता है, जिसमें गर्भ नाम पड़ता है, गर्भ जिसका विकार है, जिस क्रम से वह कोख में पूर्ण रूप लेता है, जो इसकी वृद्धि का कारण है, जिस कारण से इसका जन्म नहीं होता, जिस कारण से कोख में जन्म लेता हुआ (गर्भ) नाश को प्राप्त होता है और जिस कारण से पूरी तरह नष्ट न होकर (गर्भ) विकृति को प्राप्त होता है, उसकी हम आगे व्याख्या करेंगे।

च. शा. ४/४

। ॥ ४ ॥

माता से, पिता से, आत्मा से, सात्म्य से, रस से और सत्त्व से, इन भावों के मिलने से गर्भ बनता है। उस गर्भ के जो-जो अवयव जिस-जिस से बनते हैं, उन्हें बाँटकर माता से उत्पन्न आदि अवयवों को आगे अलग-अलग कहा गया है।

च. शा. ४/५

॥ ५ ॥

शुक्र, शोणित और जीव का संयोग जब कोख में पहुँच जाता है, तभी (उसे) गर्भ नाम मिलता है।

च. शा. ४/६

। , ॥ ६ ॥

गर्भ तो निश्चय ही अन्तरिक्ष (आकाश), वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का विकार है और चेतना का आधार बना हुआ है। इस प्रकार इस युक्ति से पाँच महाभूतों के विकारों के समूह रूप गर्भ चेतना का आधार है, और वही इसका छठा धातु कहा गया है।

च. शा. ४/७

। , । ॥ ७ ॥

जिस क्रम से गर्भ कोख में बनता है, उसकी हम व्याख्या करेंगे। जब पुराना रज बीत गया हो और नया रज अभी टिका न हो, तब जो शुद्ध स्नान की हुई हो और जिसकी योनि, शोणित और गर्भाशय दोषरहित हों, ऐसी स्त्री को हम ऋतुमती कहते हैं। वैसी उस स्त्री के साथ जब दोषरहित बीज वाला पुरुष मिलन को प्राप्त होता है, तब हर्ष से प्रेरित उसका श्रेष्ठ शरीर-धातु-आत्मा शुक्र रूप होकर अंग-अंग से उत्पन्न होता है। हर्ष से भरे आत्मा से प्रेरित और अधिष्ठित वह बीज रूप धातु पुरुष के शरीर से निकलने के उचित मार्ग से गर्भाशय में प्रवेश करके आर्तव के साथ संसर्ग को प्राप्त होता है।

च. शा. ४/८

; । , , ; , । ॥ ८ ॥

उसमें सबसे पहले सत्त्व (मन) को साधन बनाने वाली चेतना धातु गुणों को ग्रहण करने के लिए प्रवृत्त होती है; क्योंकि वही हेतु, कारण, निमित्त, अक्षर, कर्ता, मन्ता, वेदिता, बोद्धा, द्रष्टा, धाता, ब्रह्मा, विश्वकर्मा, विश्वरूप, पुरुष, प्रभव, अव्यय, नित्य, गुणी, ग्रहण, प्रधान, अव्यक्त, जीव, ज्ञ, पुद्गल, चेतनावान्, विभु, भूतात्मा, इन्द्रियात्मा और अन्तरात्मा है। वह गुणों के ग्रहण के समय दूसरे गुणों से पहले अन्तरिक्ष (आकाश) को ग्रहण करता है; जैसे प्रलय के समाप्त होने पर भूतों की सृष्टि की इच्छा रखने वाला, अक्षर स्वरूप, सत्त्व को ग्रहण करने वाला आत्मा पहले आकाश की रचना करता है, फिर क्रम से अधिक प्रकट गुणों वाले वायु आदि चार धातुओं की; उसी प्रकार शरीर को ग्रहण करने में भी प्रवृत्त होता हुआ पहले आकाश को ही ग्रहण करता है, फिर क्रम से अधिक प्रकट गुणों वाले वायु आदि चार धातुओं को। गुणों का यह सारा ग्रहण भी अत्यन्त सूक्ष्म (अणु) काल में होता है।

च. शा. ४/९

॥ ९ ॥

सभी गुणों से युक्त वह गर्भ के रूप को प्राप्त होकर पहले महीने में जमकर, सभी धातुओं से गँदला किया हुआ, खेट जैसा हो जाता है; उसका शरीर अप्रकट होता है और अंग-अवयव मानो हैं भी और नहीं भी।

च. शा. ४/१०

। , , ॥ १० ॥

दूसरे महीने में (गर्भ) घन (ठोस) पिण्ड, या पेशी, या अर्बुद बन जाता है। उनमें घन पुरुष, पेशी स्त्री और अर्बुद नपुंसक होता है।

च. शा. ४/११

॥ ११ ॥

तीसरे महीने में सभी इन्द्रियाँ और सभी अंग-अवयव एक साथ प्रकट होते हैं।

च. शा. ४/१२

। । । , , , , ॥ १२ ॥

उनमें इस (गर्भ) के कुछ अंग-अवयव मातृज आदि अवयवों में बाँटकर पहले यथावत् कहे जा चुके हैं। अब महाभूतों के विकारों के विभाग के अनुसार इसके उन्हीं अंग-अवयवों को, और कुछ दूसरे अंग-अवयवों को भी, दूसरे प्रकार से आगे बताएँगे। मातृज आदि भी इसके महाभूतों के विकार ही हैं। उनमें इसका आकाश स्वरूप भाग: शब्द, श्रोत्र, लघुता, सूक्ष्मता और विवेक; वायु स्वरूप: स्पर्श, स्पर्शन, रूक्षता, प्रेरणा, धातुओं का व्यूहन और शरीर की चेष्टाएँ; अग्नि स्वरूप: रूप, दर्शन, प्रकाश, पाचन और उष्णता; जल स्वरूप: रस, रसन, शीतलता, मृदुता, स्नेह और क्लेद; पृथ्वी स्वरूप: गन्ध, घ्राण, गुरुता, स्थिरता और मूर्ति।

च. शा. ४/१३

। , ; ॥ १३ ॥

इस प्रकार यह पुरुष लोक के समान माप का है। लोक में जितने भी मूर्त (आकार वाले) भाव-विशेष हैं, उतने ही पुरुष में हैं; और जितने पुरुष में हैं, उतने लोक में हैं - बुद्धिमान लोग इसे ऐसा ही देखना चाहते हैं।

च. शा. ४/१४

; । , । , । , । , । , , ॥ १४ ॥

इस प्रकार इस (गर्भ) की इन्द्रियाँ और अंग-अवयव एक साथ बन जाते हैं, केवल उन भावों को छोड़कर जो जन्म लेने के बाद, बाद के समय में उत्पन्न होते हैं; जैसे दाँत, व्यंजन (दाढ़ी-मूँछ आदि चिह्न), (लिंग का) स्पष्ट प्रकट होना और वैसे ही अन्य। यह प्रकृति (स्वाभाविक क्रम) है; विकृति (विकार) इससे भिन्न होती है। इस गर्भ में कुछ भाव नित्य हैं और कुछ अनित्य हैं। उसके जो अंग-अवयव स्थिर होते हैं, वे ही स्त्री-लिंग, पुरुष-लिंग या नपुंसक-लिंग को धारण करते हैं। उनमें स्त्री और पुरुष के जो विशेष भाव प्रधान (मुख्य अंगों) पर आश्रित हैं और गुणों पर आश्रित हैं, उनमें से जिस ओर अधिकता होती है, उसी ओर का भाव होता है। जैसे: क्लीबता, भीरुता, निपुणता का अभाव, मोह, अस्थिरता, शरीर के निचले भाग का भारीपन, सहन न कर पाना, ढीलापन, कोमलता, गर्भाशय-बीज-भाग, और वैसे ही अन्य (भाव) स्त्री बनाने वाले होते हैं; इनसे उलटे (भाव) पुरुष बनाने वाले होते हैं; और दोनों (स्त्री और पुरुष) के भाग वाले अवयव नपुंसक बनाने वाले होते हैं।

च. शा. ४/१५

, , , । ; । । । । ॥ १५ ॥

उस (गर्भ) की इन्द्रियाँ जिस समय बनती हैं, उसी समय चेतना में संवेदन दृढ़ हो जाता है; इसलिए तब से गर्भ फड़कता है और दूसरे जन्म में अनुभव की हुई जो कुछ भी (वस्तु) चाहता है, उसे बड़े-बूढ़े द्वैहृदय्य कहते हैं। और इस (गर्भ) का माता से उत्पन्न हृदय रस ले जाने वाली संवाहिनी नाड़ियों से माता के हृदय से जुड़ा होता है; इसलिए उन दोनों का उन (नाड़ियों) से लगाव साथ-साथ स्पन्दित होता है। उसी कारण को ध्यान में रखते हुए (लोग) द्वैहृदय्य की अवस्था वाले गर्भ का अपमान करना नहीं चाहते। क्योंकि अपमान होने पर इस (गर्भ) का नाश या विकार देखा जाता है। उस समय माता कुछ विषयों में गर्भ के साथ समान योगक्षेम वाली होती है। इसलिए कुशल जन गर्भवती स्त्री की प्रिय और हितकर (वस्तुओं) से विशेष रूप से सेवा करते हैं।

च. शा. ४/१६

। , , । ॥ १६ ॥

उस गर्भधारण और द्वैहृदय्य को पहचानने के लिए हम संक्षेप में लक्षण बताएँगे। इसके जानने में उपचार का साधन है, और जानना लक्षणों से होता है, इसलिए लक्षणों का उपदेश आवश्यक है। जैसे - आर्तव का न दिखना, मुँह से पानी बहना, भोजन की इच्छा न होना, उल्टी, अरुचि, खट्टे की चाह, विशेष रूप से तरह-तरह की वस्तुओं की इच्छा, शरीर का भारीपन, आँखों की थकान, स्तनों में दूध, होंठों और स्तनमण्डलों का अत्यधिक कालापन, पैरों में सूजन, हल्की रोमावली का उभरना और योनि का आटालत्व - ये लक्षण गर्भ के पूर्णतः स्थित हो जाने पर होते हैं।

च. शा. ४/१७

॥ १७ ॥

वह (गर्भवती स्त्री) जो-जो चाहे, वह-वह उसे दे, गर्भ को हानि पहुँचाने वाले पदार्थों को छोड़कर।

च. शा. ४/१८

; ; , ॥ १८ ॥

गर्भ को हानि पहुँचाने वाली बातें ये हैं - अत्यन्त भारी, गरम और तीखी सब वस्तुएँ तथा कठोर चेष्टाएँ। और वृद्ध जन ये दूसरी बातें भी बताते हैं - देवता, राक्षस और उनके अनुचरों से रक्षा के लिए (गर्भिणी) लाल वस्त्र न पहने, नशा करने वाली मदिराएँ न पिए, सवारी पर न चढ़े, मांस न खाए, सब इन्द्रियों के प्रतिकूल पदार्थों को दूर ही छोड़ दे, और जो कोई दूसरी बात भी स्त्रियाँ (ऐसी) जानें (उसे भी छोड़ दे)।

च. शा. ४/१९

। ॥ १९ ॥

परन्तु इच्छा के तीव्र होने पर, चाहे वस्तु अहितकर भी हो, उसे हितकर (वस्तु) से मिलाकर इसको देना चाहिए, इच्छा को शान्त करने के लिए। क्योंकि इच्छा को रोक लेने से कुपित वायु शरीर के भीतर घूमता हुआ बन रहे गर्भ का विनाश या विकृत रूप कर सकता है।

च. शा. ४/२०

, ॥ २० ॥

चौथे महीने में गर्भ स्थिरता को प्राप्त होता है, इसलिए तब गर्भवती स्त्री विशेष रूप से अधिक शरीर के भारीपन को प्राप्त होती है।

च. शा. ४/२१

, ॥ २१ ॥

पाँचवें महीने में गर्भ के मांस और रक्त की वृद्धि दूसरे महीनों की तुलना में अधिक होती है, इसलिए तब गर्भवती स्त्री विशेष रूप से दुबलेपन को प्राप्त होती है।

च. शा. ४/२२

, ॥ २२ ॥

छठे महीने में गर्भ के बल और वर्ण की वृद्धि दूसरे महीनों की तुलना में अधिक होती है, इसलिए तब गर्भवती स्त्री विशेष रूप से बल और वर्ण की हानि को प्राप्त होती है।

च. शा. ४/२३

, ॥ २३ ॥

सातवें महीने में गर्भ सब भावों (तत्त्वों) से पुष्ट किया जाता है, इसलिए तब गर्भवती स्त्री सब प्रकार से अत्यन्त थकी हुई होती है।

च. शा. ४/२४

। , ; । ॥ २४ ॥

आठवें मास में गर्भ माता से और माता गर्भ से, रस को ले जाने वाली संवाहिनी (वहन करने वाली वाहिकाओं) के द्वारा बार-बार एक-दूसरे का ओज ग्रहण करते हैं, क्योंकि गर्भ अभी सम्पूर्ण (पूर्ण विकसित) नहीं है। इसलिए उस समय गर्भिणी बार-बार प्रसन्नता से युक्त होती है और बार-बार म्लान (कुम्हलाई हुई) हो जाती है, वैसे ही गर्भ भी; इसलिए उस समय गर्भ का जन्म व्यापत्ति (विकार) से युक्त होता है, क्योंकि ओज स्थिर नहीं है। इसी कारण को देखकर कुशल जन आठवें मास को अगण्य (गिनती में न लेने योग्य) कहते हैं।

च. शा. ४/२५

। , ॥ २५ ॥

उस (आठवें मास) का एक दिन भी बीत जाने पर नौवें मास को लेकर दसवें मास तक का समय प्रसव का काल कहते हैं। यही प्रसव का काल है; इसके बाद कोख में गर्भ का रहना वैकारिक (विकार से युक्त) है।

च. शा. ४/२६

॥ २६ ॥

इस प्रकार इस क्रम से (गर्भ) कोख में पूर्ण रूप से बनता है।

च. शा. ४/२७

॥ २७ ॥

माता आदि गर्भ को उत्पन्न करने वाले भावों की सम्पदा (पूर्णता) से, वैसे ही (माता के) आचरण की उत्तमता से, माता से ही उपस्नेह और उपस्वेद के द्वारा, काल के परिणाम से और स्वभाव की सिद्धि से गर्भ कोख में वृद्धि को प्राप्त होता है।

च. शा. ४/२८

॥ २८ ॥

माता आदि गर्भ को उत्पन्न करने वाले भावों की ही व्यापत्ति (बिगड़ना) के कारण इस (गर्भ) का अजन्म (जन्म न होना) होता है।

च. शा. ४/२९

, ॥ २९ ॥

इस (गर्भ) के लिए कोख में वृद्धि के हेतु के रूप में जो भाव बताए गए हैं, उनके विपर्यय (उलट जाने) से (गर्भ) उदर में ही विनाश को प्राप्त होता है, अथवा अचिरजात (थोड़े ही समय पहले जन्मा हुआ) हो।

च. शा. ४/३०

, , , ; , , । , ; , ; , , ॥ ३० ॥

जिस कारण से गर्भ पूर्ण रूप से नष्ट न होकर विकृति को प्राप्त होता है, उसे हम आगे बताएँगे - जब स्त्री द्वारा दोषों को कुपित करने वाले बताए गए (आहार-विहार) का सेवन करने पर कुपित हुए दोष शरीर में फैलते हुए रक्त और गर्भाशय तक पहुँचते हैं, किन्तु रक्त और गर्भाशय को पूर्ण रूप से दूषित नहीं करते, और तब यह स्त्री गर्भ पाती है, तब उस गर्भ के माता से उत्पन्न अंगों में से कोई एक अंग अथवा अनेक अंग विकृत हो जाते हैं; क्योंकि जिस-जिस अंग के बीज या बीज-भाग में दोष कुपित होते हैं, उस-उस अंग में विकृति प्रवेश कर जाती है। जब इस स्त्री के रक्त में गर्भाशय का बीज-भाग दूषित होता है, तब वह (दोष) वन्ध्या को उत्पन्न करता है; जब इसके रक्त में गर्भाशय के बीज-भाग का अंश दूषित होता है, तब पूतिप्रजा को उत्पन्न करता है; और जब इसके रक्त में गर्भाशय के बीज-भाग का अंश तथा स्त्री बनाने वाले शरीर-बीज-भागों का एक अंश दूषित होता है, तब वार्ता नामक, स्त्री के आकार की अधिकता वाली किन्तु स्त्री न होने वाली सन्तान को उत्पन्न करता है; उसे स्त्री-व्यापद् कहते हैं।

च. शा. ४/३१

, ; , ; , ; ॥ ३१ ॥

इसी प्रकार पुरुष के बीज में जब बीज-भाग दूषित होता है, तब वह वन्ध्य को उत्पन्न करता है; जब फिर इसके बीज में बीज-भाग का अंश दूषित होता है, तब पूतिप्रज को उत्पन्न करता है; और जब इसके बीज में बीज-भाग का अंश तथा पुरुष बनाने वाले शरीर-बीज-भागों का एक अंश दूषित होता है, तब पुरुष के आकार की अधिकता वाले, किन्तु पुरुष न होने वाले तृणपुत्रिक नामक (सन्तान) को उत्पन्न करता है; उसे पुरुष-व्यापद् कहते हैं।

च. शा. ४/३२

॥ ३२ ॥

माता और पिता से उत्पन्न अंगों की इस विकृति-व्याख्या से सात्म्य, रस और सत्त्व से उत्पन्न अंगों की विकृति भी समझाई जा चुकी होती है।

च. शा. ४/३३

; ॥ ३३ ॥

आत्मा तो परम और विकार से रहित है और सब प्राणियों में भेद से रहित (समान) है; किन्तु मन और शरीर के भेद से भेद की प्राप्ति होती है।

च. शा. ४/३४

, ; , । , ॥ ३४ ॥

उनमें शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ; वे शरीर को दूषित करते हैं; और मन के दो दोष हैं - रज और तम; वे दोनों मन को दूषित करते हैं। उन दूषित हुए मन और शरीर से विकृति उत्पन्न होती है, और न बिगड़े हुए (मन-शरीर) से उत्पन्न नहीं होती।

च. शा. ४/३५

॥ ३५ ॥

उनमें शरीर योनि के भेद से चार प्रकार का पहले कहा गया है।

च. शा. ४/३६

, , । , , । । , । ॥ ३६ ॥

सत्त्व (मन) निश्चय ही तीन प्रकार का है: शुद्ध, राजस और तामस। उनमें शुद्ध (सत्त्व) को कल्याण का अंश होने से दोषरहित कहा गया है; राजस को रोष का अंश होने से सदोष कहा गया है; और तामस को भी मोह का अंश होने से सदोष कहा गया है। उन तीनों सत्त्वों में से प्रत्येक के भेदों की गिनती असंख्य है, क्योंकि उनमें तर-तम (कम-अधिक) का योग होता है, शरीर की योनि (उत्पत्ति) के विशेष भेद होते हैं, और वे एक-दूसरे के अनुसार चलते हैं। शरीर भी सत्त्व के अनुसार चलता है और सत्त्व भी शरीर के अनुसार। इसलिए कुछ सत्त्व-भेदों की व्याख्या हम केवल उदाहरण के लिए, संक्षेप में निर्देश करके आगे करेंगे।

च. शा. ४/३७

॥ ॥ ॥ ॥ ॥ ॥ ॥ ; ॥ ३७ ॥

वह इस प्रकार है: जो पवित्र हो, सत्य संकल्प वाला हो, अपने आप को जीता हुआ (संयमी) हो, अपना भाग दूसरों में बाँटने वाला हो, ज्ञान, विज्ञान, कहने और उत्तर देने की क्षमता से युक्त हो, स्मरण शक्ति वाला हो, काम, क्रोध, लोभ, मान, मोह, ईर्ष्या, हर्ष और अमर्ष से रहित हो, और सभी प्राणियों में समभाव रखता हो, उसे ब्राह्म (सत्त्व वाला) जाने। जो यज्ञ, अध्ययन, व्रत, होम, ब्रह्मचर्य और अतिथि-व्रत में तत्पर हो, जिसके मद, मान, राग, द्वेष, मोह, लोभ और रोष शान्त हो गए हों, और जो प्रतिभा, वचन, विज्ञान तथा धारण करने की शक्ति से युक्त हो, उसे आर्ष (सत्त्व वाला) जाने। जो ऐश्वर्यवान् हो, जिसकी बात मानने योग्य हो, जो यज्ञ करने वाला, शूर, ओजस्वी, तेज से युक्त, क्लेश रहित कर्म करने वाला, दूरदर्शी तथा धर्म, अर्थ और काम में लगा हुआ हो, उसे ऐन्द्र (सत्त्व वाला) जाने। जिसका आचरण मर्यादा (लेखा) में स्थित हो, जो उचित समय पर कार्य करने वाला, परास्त न होने वाला, उद्यमी, स्मरण शक्ति वाला, ऐश्वर्य पाने वाला हो और जिसके राग, ईर्ष्या, द्वेष तथा मोह दूर हो गए हों, उसे याम्य (सत्त्व वाला) जाने। जो शूर, धीर, पवित्र, अपवित्रता से द्वेष करने वाला, यज्ञ करने वाला, जल में विहार करने में रुचि रखने वाला, क्लेश रहित कर्म करने वाला हो और जिसका क्रोध तथा प्रसन्नता उचित स्थान पर हो, उसे वारुण (सत्त्व वाला) जाने। जो स्थान, मान, उपभोग और परिवार से सम्पन्न हो, धर्म, अर्थ और काम में सदा लगा रहने वाला, पवित्र, सुखपूर्वक विहार करने वाला हो और जिसका क्रोध तथा प्रसन्नता प्रकट दिखती हो, उसे कौबेर (सत्त्व वाला) जाने। जो नृत्य, गीत, वाद्य, उल्लापक, श्लोक, आख्यायिका, इतिहास और पुराण में कुशल तथा उन्हें प्रिय मानने वाला हो, गन्ध, माला, अनुलेपन, वस्त्र और स्त्रियों के साथ विहार की कामना में सदा लगा रहने वाला हो और ईर्ष्या न करने वाला हो, उसे गान्धर्व (सत्त्व वाला) जाने। इस प्रकार इसे शुद्ध सत्त्व का सात प्रकार का भेदांश (भेद का अंश) जाने, क्योंकि उसमें कल्याण का अंश है; और उसके संयोग से ब्राह्म को अत्यन्त शुद्ध निश्चित करे।

च. शा. ४/३८

॥ ॥ ॥ ॥ ॥ ॥ , ॥ ३८ ॥

शूर, चण्ड (उग्र), असूयक, ऐश्वर्यवान्, औपधिक (छली), रौद्र, निर्दय और आत्मपूजक (अपनी पूजा करने वाला) को आसुर (सत्त्व वाला) जाने। असहनशील, लम्बे समय तक क्रोध रखने वाले, दुर्बल स्थान पर प्रहार करने वाले, क्रूर, भोजन में अत्यधिक रुचि वाले, मांस को सबसे प्रिय मानने वाले, नींद और परिश्रम की अधिकता वाले तथा ईर्ष्यालु को राक्षस (सत्त्व वाला) जाने। बहुत खाने वाले, स्त्रियों में आसक्त, स्त्रियों के साथ एकान्त चाहने वाले, अपवित्र, पवित्रता से द्वेष करने वाले, डरपोक, डराने वाले तथा विकृत विहार और आहार के स्वभाव वाले को पैशाच (सत्त्व वाला) जाने। क्रुद्ध होने पर शूर, क्रुद्ध न होने पर डरपोक, तीक्ष्ण, परिश्रम की अधिकता वाले, डरे हुए रहने वाले तथा आहार और विहार में लगे हुए को सार्प (सत्त्व वाला) जाने। आहार की कामना वाले, अत्यन्त दुःखद शील, आचार और व्यवहार वाले, असूयक, बाँटकर न खाने वाले, अत्यन्त लालची और कर्म न करने के स्वभाव वाले को प्रैत (सत्त्व वाला) जाने। निरन्तर कामना में लगे रहने वाले, सदा आहार और विहार में लगे हुए, अस्थिर, असहनशील और संचय न करने वाले को शाकुन (सत्त्व वाला) जाने। इस प्रकार रजोगुण वाले सत्त्व का छह प्रकार का भेदांश (भेद का अंश) जाने, क्योंकि उसमें रोष का अंश है।

च. शा. ४/३९

॥ ॥ ॥ ॥ ३९ ॥

जो दूसरों का तिरस्कार करने वाला, बुद्धिहीन, निन्दित आचार और आहार वाला, मैथुन में लगा रहने वाला और सोने के स्वभाव वाला हो, उसे पाशव (पशु के सत्त्व वाला) जाने। जो डरपोक, नासमझ, भोजन का लोभी, अस्थिर, काम और क्रोध में अत्यन्त आसक्त, इधर-उधर घूमने के स्वभाव वाला और जल की इच्छा रखने वाला हो, उसे मात्स्य (मछली के सत्त्व वाला) जाने। जो आलसी, केवल भोजन में अत्यन्त लगा हुआ और बुद्धि के सब अंगों से रहित हो, उसे वानस्पत्य (वनस्पति के सत्त्व वाला) जाने। इस प्रकार तामस सत्त्व का तीन प्रकार का भेदांश (भेद का भाग) जाने, क्योंकि उसमें मोह का अंश है।

च. शा. ४/४०

; , , , च ॥ ४० ॥

इस प्रकार अगणित भेदों वाले तीनों ही सत्त्वों के भेदों का एक अंश बताया गया: शुद्ध सत्त्व का सात प्रकार, ब्रह्मा, ऋषि, इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर और गन्धर्व के सत्त्व के अनुकरण से; राजस का छह प्रकार, दैत्य, पिशाच, राक्षस, सर्प, प्रेत और शकुनि के सत्त्व के अनुकरण से; तामस का तीन प्रकार, पशु, मत्स्य और वनस्पति के सत्त्व के अनुकरण से; और सत्त्व के अनुसार उपचार कैसे होना चाहिए, (यह भी विचारणीय है)।

च. शा. ४/४१

; , ॥ ४१ ॥

यह केवल उद्देश (संक्षिप्त कथन) है, जो गर्भावक्रान्ति से जुड़ा हुआ और उद्देश के अनुसार बताया गया है; उस विषय के जानने में (यह) सामर्थ्य है कि गर्भ को उत्पन्न करने वाले भावों का अनुसमाधि (उन्हें ठीक से बनाए रखना) हो, और गर्भ में विघात करने वाले भावों का विघात (नाश) हो।

च. शा. ४/४२

- । ॥ ४२ ॥

इस विषय में श्लोक ये हैं- निमित्त, आत्मा, प्रकृति, कोख में क्रम से वृद्धि और गर्भ की वृद्धि का हेतु, ये पाँच विषय शुभ नाम वाले (शुभ कहे गए) हैं।

च. शा. ४/४३

। ॥ ४३ ॥

जो (भाव) जन्म न होने में, नाश में और विकृति (बिगड़ने) में भी कारण होता है, इन तीन अशुभ भावों को गर्भ का विघात करने वाला कहते हैं।

च. शा. ४/४४

। ॥ ४४ ॥

शुभ और अशुभ नाम से कहे गए इन आठ भावों को जो वैद्य सब प्रकार से जानता है, वह राजाओं (की चिकित्सा) करने के योग्य है।

च. शा. ४/४५

। ॥ ४५ ॥

वह उदार बुद्धि वाला (वैद्य) इस प्रकार गर्भ की प्राप्ति के उपायों को जानने के योग्य होता है, और जो गर्भ का विघात करने वाले कहे गए भाव हैं, उन्हें भी (जानने के योग्य होता है)।

च. शा. ४

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा संशोधित तन्त्र के शारीरस्थान में महतीगर्भावक्रान्तिशारीर नामक चौथा अध्याय (पूरा हुआ)। ४।