॥ १ ॥
अध्याय ५
पुरुषविचयशारीरम्
पुरुष का विचार (पुरुष और लोक)
इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २५-२६)
तत्र श्लोकौ-सप्रयोजनमुद्दिष्टं लोकस्य लुरुषस्य च ।सामान्यं मूलमुत्लत्तौ निवृत्तौ मार्ग एव च ॥
श्लोक २५ →शुद्धसत्त्वसमाधानं सत्या बुद्धिश्च नैष्ठिकी।विचये लुरुषस्योक्ता निष्ठा च लरमर्षिणा॥
श्लोक २६ →मुख्य शब्द (१३) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
- विशेष
- विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
- सामान्य
- सामान्य - समानता; जो वृद्धि का कारण है
विस्तार
शब्द-रचना: समान + य (भाव) - समान होने का भाव।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: सामान्य सदा सब भावों की वृद्धि का कारण है, और एकत्व (एक जैसा बनाना) करता है (सू. १/४४-४५)। उदाहरण के लिए, जिस गुण वाला द्रव्य लिया जाए, वह शरीर में उसी गुण को बढ़ाता है।
- धातु
- धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार
शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।
अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।
चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।
व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।
- आत्मन्
- आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार
अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।
चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।
- कर्मन्
- कर्म - क्रिया, गति
विस्तार
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
- हेतु
- हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार
अर्थ: कारण।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।
- शरीर
- शरीर - देह
विस्तार
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
- इन्द्रिय
- इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
- विकार
- विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
- दोष
- दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
- वात
- वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
- सत्त्व
- सत्त्व - मन
विस्तार
शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।
चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।
- रजस्
- रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार
अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।
चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।
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॥ २ ॥
ऽपुरुषोऽयं लोकसंनितःऽइत्युवाच भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः।यावन्तो हि लोके (भूर्तिमन्तो ) भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके; इत्येवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच-नेतावता वाक्येनोक्तं वाक्यार्थमवगाहामहे, भगवता बुद्ध्या भूयस्तरमतोऽनुव्याख्यायमानं शुश्रूषामह इति॥ ३ ॥
, ; , ! । ; , ॥ ४ ॥
तस्य पुरुषस्य पृथिवी मूर्तिः, आपः क्लेदः, तेजोऽभिसन्तापः, वायुः प्राणः, वियत् सुषिराणि, ब्रह्म अन्तरात्मा।यथा खलु ब्राह्मी विभूतिर्लोके तथा पुरुषेऽप्यान्तरात्मिकी विभूतिः, ब्रह्मणो विभूतिर्लोके प्रजापतिरन्तरात्मनो विभूतिः पुरुषे सत्त्वं, यस्त्विन्द्रो लोके स पुरुषेऽहङ्कारः, आदित्यस्त्वादानं, रुद्रो रोषः, सोमः प्रसादः, वसवः सुखम्, अश्विनौ कान्तिः, मरुदुत्साहः, विश्वेदेवाः सर्वेन्द्रियाणि सएवेन्द्रियार्थाश्च, तमो मोहः, ज्योतिर्ज्ञानं, यथा लोकस्य सर्गादिस्तथा पुरुषस्य गर्भाधानं, यथा कृतयुगमेवं बाल्यं, यथा त्रेता तथा यौवनं, यथा द्वापरस्तथा स्थाविर्यं, यथा कलिरेवमातुर्यं, यथा युगान्तस्तथा मरणमिति।एवमेतेनानुमानेनानुक्तानामपि लोकपुरुषयोरवयवविशेषाणामग्निवेश! सामान्यं विद्यादिति॥ ५ ॥
एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच-एवमेतत् सर्वमनपवादं यथोक्तं भगवता लोकपुरुषयोः सामान्यम्।किन्न्वस्य सामान्योपदेशस्य प्रयोजनमिति॥ ६ ॥
! । । । । ॥ ७ ॥
तस्य हेतुः, उत्पत्तिः, वृद्धिः, उपप्लवः, वियोगश्च ।तत्र हेतुरुत्पत्तिकारणं, उत्पत्तिर्जन्म, वृद्धिराप्यायनम्, उपप्लवो दुःखागमः, षड्धातुविभागो वियोगः सजीवापगमः स प्राणनिरोधः स भङ्गः स लोकस्वभावः। तस्य मूलं सर्वोपप्लवानां च प्रवृत्तिः, निवृत्तिरुपरमः।प्रवृत्तिर्दुःखं, निवृत्तिः सुखमिति यज् ज्ञानमुत्पद्यते तत् सत्यम्।तस्य हेतुः सर्वलोकसामान्यज्ञानम्।एतत्प्रयोजनं सामान्योपदेशस्येति॥ ८ ॥
! , ॥ ९ ॥
। ; ।, , , , , , , । । , ॥ १० ॥
; ॥ ११ ॥
। , , , , , , , , , , , , , , , , , तोर्जलकुण्डिका, , , , , , , , , , , , , , , , , ; , , ; , , , ; , ; ॥ १२ ॥
भवन्ति चात्र-एतैरविमलं सत्त्वं शुद्ध्युलायैर्विशुध्यति।मृज्यमान इवादर्शस्तैलचेलकचादिभिः॥ १३ ॥
। ॥ १४ ॥
ज्नलत्यात्मनि संरुद्धं तत् सत्त्वं संवृतायने।शुद्धः स्थिरः प्रसन्नार्चिर्दीलो दीलाशये यथा॥ १५ ॥
शुद्धसत्त्वस्य या शुद्धा सत्या बुद्धिः प्रवर्तते।यया भिनत्त्यतिबलं महामोहमयं तमः॥ १६ ॥
। ॥ १७ ॥
यया नोलैत्यहङ्कारं नोलास्ते कारणं यया।यया नालम्बते किंचित् सर्वं संन्यस्यते यया॥ १८ ॥
। ॥ १९ ॥
लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि लश्यतः।लरावरदृशः शान्तिर्ज्ञनमूला न नश्यति॥ २० ॥
लश्यतः सर्वभावान् हि सर्वावस्थासु सर्वदा।ब्रह्मभूतस्य संयोगो न शुद्धस्योललद्यते॥ २१ ॥
नातमनः करणाभावाल्लिङ्गमल्युललभ्यते।स सर्वकरणायोगान्मुक्त इत्यभिधीयते ॥ २२ ॥
विलालं विरजः शान्तं लरमक्षरमव्ययम्।अमृतं ब्रह्म निर्वाणं लर्यायैः शान्तिरुच्यते॥ २३ ॥
! । ॥ २४ ॥
तत्र श्लोकौ-सप्रयोजनमुद्दिष्टं लोकस्य लुरुषस्य च ।सामान्यं मूलमुत्लत्तौ निवृत्तौ मार्ग एव च ॥ २५ ॥
शुद्धसत्त्वसमाधानं सत्या बुद्धिश्च नैष्ठिकी।विचये लुरुषस्योक्ता निष्ठा च लरमर्षिणा॥ २६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने पुरुषविचयशारीरं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥५॥