॥ १ ॥
अध्याय ८
जातिसूत्रीयं शारीरम्
जन्म से सम्बन्धित सूत्र (गर्भिणी और शिशु की देखभाल)
इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ६८-६९)
तत्र श्लोकौ-पुत्राशिषां कर्म समृद्धिकारकं यदुक्तमेतन्महदर्थसंहितम्।तदाचरन् ज्ञो विधिभिर्यथातथं पूजां यथेष्टं लभतेऽनसूयकः॥
श्लोक ६८ →शरीरं चिन्त्यते सर्वं दैवमानुषसंपदा।सर्वभावैर्यतस्तस्माच्छारीरं स्थानमुच्यते॥
श्लोक ६९ →मुख्य शब्द (२३) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
- कर्मन्
- कर्म - क्रिया, गति
विस्तार
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
- धातु
- धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार
शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।
अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।
चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।
व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।
- सत्त्व
- सत्त्व - मन
विस्तार
शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।
चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।
- विशेष
- विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
- शरीर
- शरीर - देह
विस्तार
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
- गुण
- गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।
चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।
सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।
- हेतु
- हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार
अर्थ: कारण।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।
- वात
- वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
- विकार
- विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
- दोष
- दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
- आत्मन्
- आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार
अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।
चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।
- औषध
- औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार
शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।
अर्थ: रोग दूर करने का साधन।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।
- वमन
- वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार
शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।
- विरेचन
- विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार
शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।
- स्नेह
- स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
- स्वस्थ
- स्वस्थ - अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित; निरोगी
विस्तार
शब्द-रचना: स्व (अपने) + स्थ (स्थित)।
अर्थ: जो अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो, अर्थात् निरोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ का भी आश्रय है (सू. १/२४), और कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त - स्वास्थ्य की रक्षा - के लिए माने गए हैं (सू. १/६७)।
- रस
- रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
- आरोग्य
- आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार
शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।
अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।
चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।
- पित्त
- पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
- श्लेष्मन्
- श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार
शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।
चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।
- लिङ्ग
- लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
- आतुर
- आतुर - रोगी
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।
- आयुस्
- आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार
अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।
चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।
मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।
॥ २ ॥
॥ ३ ॥
अथाप्येतौ स्त्रीपुंसौ स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य,वमनविरेचनाभ्यां संशोध्य,क्रमेण प्रकृतिमापादयेत् ।संशुद्धौ चास्थापनानुवासनाभ्यामुपाचरेत्; उपाचरेच्च मधुरौषधसंस्कृताभ्यां घृतक्षीराभ्यां पुरुषं, स्त्रियं तु तैलमाषाभ्याम्॥ ४ ॥
ततः पुष्पात् प्रभृति त्रिरात्रमासीत ब्रह्मचारिण्यधःशायिनी, पाणिभ्यामन्नमजर्जरपात्राद्भुञ्जाना, न च काञ्चिन्मृजामापद्येत ।ततश्चतुर्थेऽहन्येनामुत्साद्य सशिरस्कं स्नापयित्वा शुक्लानि वासांस्याच्छादयेत् पुरुषं च ।ततः शुक्लवाससौ स्रग्विणौ सुमनसावन्योन्यमभिकामौ संवसेयातां स्नानात् प्रभृति युग्मेष्वहःसु पुत्रकामौ, अयुग्मेषु दुहितृकामौ॥ ५ ॥
न च न्युब्जां पार्श्वगतां वा संसेवेत ।न्युब्जाया वातो बलवान् स योनिं पीडयति, पार्श्वगताया दक्षिणे पार्श्वे श्लेष्मा स च्युतः पिदधाति गर्भाशयं, वामे पार्श्वे पित्तं तदस्याः पीडितं विदहति रक्तं शुक्रं च, तस्मादुत्ताना बीजं गृह्णीयात्; तथाहि यथास्थानमवतिष्टन्ते दोषाः।पर्याप्ते चैनां शीतोदकेन परिषिञ्चेत् ।तत्रात्यशिता क्षुधिता पिपासिता भीता विमनाः शोकार्ता क्रुद्धाऽन्यं च पुमांसमिच्छन्ती मैथुने चातिकामा वा न गर्भं धत्ते, विगुणां वा प्रजां जनयति।अतिबालामतिवृद्धां दीर्घरोगिणीमन्येन वा विकारेणोपसृष्टां वर्जयेत्।पुरुषेऽप्येत एव दोषाः ।अतः सर्वदोषवर्जितौ स्त्रीपुरुषौ संसृज्येयाताम्॥ ६ ॥
संजातहर्षौ मैथुने चानुकूलाविष्टगन्धं स्वास्तीर्णं सुखं शयनमुपकल्प्य मनोज्ञं हितमशनमशित्वा नात्यशितौ दक्षिणपादेन पुमानारोहेत् वामपादेन स्त्री॥ ७ ॥
तत्र मन्त्रं प्रयुञ्जीत - “अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठाऽसि धाता त्वा ददतु विधाता त्वा दधातु ब्रह्मवर्चसा भव”इति ।“ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोमः सूर्यस्तथाऽश्विनौ।भगोऽथ मित्रावरुणौ वीरं ददतु मे सुतम् ” इत्युक्त्वा सं वसेयाताम्॥ ८ ॥
सा चेदेवमाशासीत - बृहन्तमवदातं हर्यक्षमोजस्विनं शुचिं सत्त्वसंपन्नं पुत्रमिच्छेयमिति, शुद्धस्नानात् प्रभृत्यस्यै मन्थमवदातयवानां मधुसर्पिर्भ्यां संसृज्य श्वेताया गोः सरूपवत्सायाः पयसाऽऽलोड्य राजते कांस्ये वा पात्रे काले काले सप्ताहं सततं प्रयच्छेत् पानाय । प्रातश्च शालियवान्नविकारान् दधिमधुसर्पिर्भिः पयोभिर्वा संसृज्य भुञ्जीत, तथा सायमवदातशरणशयनासनपानवसनभूषणा च स्यात् ।सायं प्रातश्च शश्वच्छ्वेतं महान्तं वृषभमाजानेयं वा हरिचन्दनाङ्गदं पश्येत् ।सौम्याभिश्चैनां कथाभिर्मनोनुकूलाभिरुपासीत ।सौम्याकृतिवचनोपचारचेष्टांश्च स्त्रीपुरुषानितरानपि चेन्द्रियार्थानवदातान् पश्येत् ।सहचर्यश्चैनां प्रियहिताभ्यां सततमुपचरेयुस्तथा भर्ता ।न च मिश्रीभावमापद्येयातामिति ।अनेन विधिना सप्तरात्रं स्थित्वाऽष्टमेऽहन्याप्लुत्याद्भिः सशिरस्कं सह भर्त्रा अहतानि वस्त्राण्याच्छादयेदवदातानि, अवदाताश्च स्रजो भूषणानि च बिभृयात्॥ ९ ॥
तत ऋत्विक् प्रागुत्तरस्यां दिश्यगारस्य प्राग्प्रवणमुदक्प्रवणं वा प्रदेशमभिसमीक्ष्य, गोमयोदकाभ्यां स्थण्डिलमुपलिप्य, प्रोक्ष्य चोदकेन, वेदीमस्मिन् स्थापयेत्।तां पश्चिमेनाहतवस्त्रसंचये श्वेतार्षभे वाऽप्यजिन उपविशेद् ब्राह्मणप्रयुक्तः, राजन्यप्रयुक्तस्तु वैयाघ्रे चर्मण्यानडुहे वा, वैश्यप्रयुक्तस्तु रौरवे बास्ते वा।तत्रोपविष्टः पालाशीभिरैङ्गुदीभिरौदुम्बरीभिर्माधूकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमाधाय, कुशैः परिस्तीर्य, परिधिभिश्च परिधाय, लाजैः शुक्लाभिश्च गन्धवतीभिः सुमनोभिरुपकिरेत्।तत्र प्रणीयोदपात्रं पवित्रपूतमुपसंस्कृत्य सर्पिराज्यार्थं यथोक्तवर्णानाजानेयादीन् समन्ततः स्थापयेत्॥ १० ॥
। । । । । , ; । , , ॥ ११ ॥
या तु स्त्री श्यामं लोहिताक्षं व्यूढोरस्कं महाबाहुं च पुत्रमाशासीत, या वा कृष्णमृदुदीर्घकेशं शुक्लाक्षं शुक्लदन्तं तेजस्विनमात्मवन्तम्; एष एवानयोरपि होमविधिः।किन्तु परिबर्हो वर्णवर्जं स्यात्।पुत्रवर्णानुरूपस्तु यथाशीरेव तयोः परिबर्होऽन्यः कार्यः स्यात्॥ १२ ॥
() ॥ १३ ॥
। । ॥ १४ ॥
। , , ॥ १५ ॥
॥ १६ ॥
। - , ; , ॥ १७ ॥
। ॥ १८ ॥
तयोः कर्मणा वेदोक्तेन विवर्तनमुपदिश्यते प्राग्व्यक्तीभावात् प्रयुक्तेन सम्यक्। कर्मणां हि देशकालसंपदुपेतानां नियतमिष्टफलत्वं, तथेतरेषामितरत्वम्।तस्मादापन्नगर्भां स्त्रियमभिसमीक्ष्य प्राग्व्यक्तीभावाद्गर्भस्य पुंसवनमस्यै दद्यात्।गोष्ठे जातस्य न्यग्रोधस्य प्रागुत्तराभ्यां शाखाभ्यां शुङ्गे अनुपहते आदाय द्वाभ्यां धान्यमाषाभ्यां संपदुपेताभ्यां गौरसर्षपाभ्यां वा सह दध्नि प्रक्षिप्य पुष्येण पिबेत्, तथैवापराञ्जीवकर्षभकापामार्गसहचरकल्कांश्च युगपदेकैकशो यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य पयसा, कुड्यकीटकं मत्स्यकं वोदकाञ्जलौ प्रक्षिप्य पुष्येण पिबेत्, तथा कनकमयान् राजतानायसांश्च पुरुषकानग्निवर्णानणुप्रमाणान् दध्नि पयस्युदकाञ्जलौ वा प्रक्षिप्य पिबेदनवशेषतः पुष्येण, पुष्येणैव च शालिपिष्टस्य पच्यमानस्योष्माणमुपाघ्राय तस्यैव च पिष्टस्योदकसंसृष्टस्य रसं देहल्यामुपनिधाय दक्षिणे नासापुटे स्वयमासिञ्चेत् पिचुना। यच्चान्यदपि ब्राह्मणा ब्रूयुराप्ता वा स्त्रियः पुंसवनमिष्टं तच्चानुष्ठेयम्।इति पुंसवनानि॥ १९ ॥
, , , । । ॥ २० ॥
; , , ; , , । , , , , , , , , , , , , , , , , , , , । । । । ॥ २१ ॥
, , , । । ॥ २२ ॥
सा चेदपचाराद् द्वयोस्त्रिषु वा मासेषु पुष्पं पष्येन्नास्या गर्भः स्थास्यतीति विद्यात्; अजातसारो हि तस्मिन् काले भवति गर्भः॥ २३ ॥
सा चेच्चतुष्प्रभृतिषु मासेषु क्रोधशोकासूयेर्ष्याभयत्रासव्यवायव्यायामसंक्षोभसंधारणविषमाशनशयनस्थानक्षुत्पिपासातियोगात् कदाहाराद्वा पुष्पं पश्येत्, तस्या गर्भस्थापनविधिमुपदेक्ष्यामः।पुष्पदर्शनादेवैनां ब्रूयात्-शयनं तावन्मृदुसुखशिशिरास्तरणसंस्तीर्णमीषदवनतशिरस्कं प्रतिपद्यस्वेति।ततो यष्टीमधुकसर्पिर्भ्यां परमशिशिरवारिणि संस्थिताभ्यां पिचुमाप्लाव्योपस्थसमीपे स्थापयेत्तस्याः, तथा शतधौतसहस्रधौताभ्यां सर्पिर्भ्यामधोनाभेः सर्वतः प्रदिह्यात्, सर्वतश्च गव्येन चैनां पयसा सुशीतेन मधुकाम्बुना वा न्यग्रोधादिकषायेण वा परिषेचयेदधो नाभेः, उदकं वा सुशीतमवगाहयेत्, क्षीरिणां कषायद्रुमाणां च स्वरसपरिपीतानि चेलानि ग्राहयेत्, न्यग्रोधादिशुङ्गासिद्धयोर्वा क्षीरसर्पोषोः पिचुं ग्राहयेत्, अतश्चैवाक्षमात्रं प्राशयेत्, प्राशयेद्वा केवलं क्षीरसर्पिः, पद्मोत्पलकुमुदकिञ्जल्कांश्चास्यै समधुशर्करान् लेहार्थं दद्यात्, शृङ्गाटकपुष्करबीजकशेरुकान् भक्षणार्थं, गन्धप्रियङ्ग्वसितोत्पलशालूकोदुम्बरशलाटुन्यग्रोधशुङ्गानि वा पाययेदेनामाजेन पयसा, पयसा चैनां बलातिबलाशालिषष्टिकेक्षुमूलकाकोलीशृतेन समधुशर्करं रक्तशालीनामोदनं मृदुसुरभिशीतलं भोजयेत्, लावकपिञ्जलकुरङ्गशम्वरशशहरिणैणकालपुच्छकरसेन वा घृतसुसंस्कृतेन सुखशिशिरोपवातदेशस्थां भोजयेत्, क्रोधशोकायासव्यवायव्यायामेभ्यश्चाभिरक्षेत्, सौम्याभिश्चैनां कथाभिर्मनोनुकूलाभिरुपासीत; तथाऽस्या गर्भस्तिष्ठति॥ २४ ॥
, , ॥ २५ ॥
यस्याः पुनरुष्णतीक्ष्णोपयोगाद्गर्भिण्या महति संजातसारे गर्भे पुष्पदर्शनं स्यादन्यो वा योनिस्रावस्तस्या गर्भो वृद्धिं न प्राप्नोति निःस्रुतत्वात्; स कालमवतिष्ठतेऽतिमात्रं, तमुपविष्टकमित्याचक्षते केचित्।उपवासव्रतकर्मपरायाः पुनः कदाहारायाः स्नेहद्वेषिण्या वातप्रकोपणोक्तान्यासेवमानाया गर्भो वृद्धिं न प्राप्नोति परिशुष्कत्वात्;स चापि कालमवतिष्ठतेऽतिमात्रम्, अस्पन्दनश्च भवति, तं तु नागोदरमित्याचक्षते॥ २६ ॥
नार्योस्तयोरुभयोरपि चिकित्सितविशेषमुपदेक्ष्यामः-भौतिकजीवनीयबृहणीयमधुरवातहरसिद्धानां सर्पिषां पयसामामगर्भाणां चोप्योगो गर्भवृद्धिकरः; तथा संभोजनमेतैरेव सिद्धैश्च घृतादिभिः सुभिक्षायाः, अभीक्ष्णं यानवाहनापमार्जनावजृम्भणैरुपपादनमिति॥ २७ ॥
यस्याः पुनर्गर्भः प्रसुप्तो न स्पन्दते तां श्येनमत्स्यगवयशिखिताम्रचूडतित्तिरीणामन्यतमस्य सर्पिष्मता रसेन माषयूषेण वा प्रभूतसर्पिषा मूलकयूषेण वा रक्तशालीनामोदनं मृदुमधुरशीतलं भोजयेत् ।तैलाभ्यङ्गेन चास्या अभीक्ष्णमुदरबस्तिवंक्षणोरुकटीपार्श्वपृष्ठप्रदेशानीषदुष्णेनोपचरेत्॥ २८ ॥
यस्याः पुनरुदावर्तविबन्धः स्यादष्टमे मासे न चानुवासनसाध्यं मन्येत ततस्तस्यास्तद्विकारप्रशमनमुपकल्पयेन्निरूहम्।उदावर्तो ह्युपेक्षितः सहसा सगर्भां गर्भिणीं गर्भमथवाऽतिपातयेत्।तत्र वीरणशालिषष्टिककुशकाशेक्षुवालिकावेतसपरिव्याधमूलानां भूतीकानन्ताकाश्मर्यपरूषकमधुकमृद्वीकानां च पयसाऽर्धोदकेनोद्गमय्य रसं प्रियालबिभीतकमज्जतिलकल्कसंप्रयुक्तमीषल्लवणमनत्युष्णं च निरूहं दद्यात्।व्यपगतविबन्धां चैनां सुखसलिलपरिषिक्ताङ्गीं स्थैर्यकरमविदाहिनमाहारं भुक्तवतीं सावं मधुरकसिद्धेन तैलेनानुवासयेत्।न्युब्जां त्वेनामास्थापनानुवासनाभ्यामुपचरेत्॥ २९ ॥
यस्याः पुनरतिमात्रदोषोपचयाद्वा तीक्ष्णोष्णातिमात्रसेवनाद्वा वातमूत्रपुरीषवेगविधारणैर्वा विषमाश(स)नशयनस्थानसंपीडनाभिघातैर्वा क्रोधशोकेर्ष्याभयत्रासादिभिर्वा साहसैर्वाऽपरैः कर्मभिरन्तःकुक्षेर्गर्भो म्रियते, तस्याः स्तिमितं स्तब्धमुदरमाततं शीतमश्मान्तर्गतमिव भवत्यस्पन्दनो गर्भः, शूलमधिकमुपजायते, न चाव्यः प्रादुर्भवन्ति, योनिर्नप्रस्रवति, अक्षिणी चास्याः स्रस्ते भवतः, ताम्यति, व्यथते, भ्रमते, श्वसिति, अरतिबहुला च भवति, न चास्या वेगप्रादुर्भावो यथावदुपलभ्यते; इत्येवंलक्षणां स्त्रियं मृतगर्भेयमिति विद्यात्॥ ३० ॥
तस्य गर्भशल्यस्य जरायुप्रपातनं कर्म संशमनमित्याहुरेके, मन्त्रादिकमथर्ववेदविहितमित्येके, परिदृष्टकर्मणा शल्यहर्त्रा हरणमित्येके।व्यपगतगर्भशल्यां तु स्त्रियमामगर्भां सुरासीध्वरिष्टमधुमदिरासवानामन्यतममग्रे सामर्थ्यतः पाययेद्गर्भकोष्ठशुद्ध्यर्थमर्तिविस्मरणार्थं प्रहर्षणार्थं च , अतः परं संप्रीणनैर्बलानुरक्षिभिरस्नेहसंप्रयुक्तैर्यवाग्वादिभिर्वा तत्कालयोगिभिराहारैरुपचरेद्दोषधातुक्लेदविशोषणमात्रं कालम्।अतः परं स्नेहपानैर्बस्तिभिराहारविधिभिश्च दीपनीयजीवनीयबृंहणीयमधुरवातहरसमाख्यातैरुपचरेत्।परिपक्वगर्भशल्यायाः पुनर्विमुक्तगर्भशल्यायास्तदहरेव स्नेहोपचारः स्यात्॥ ३१ ॥
परमतो निर्विकारमाप्याय्यमानस्य गर्भस्य मासे मासे कर्मोपदेक्ष्यामः ।प्रथमे मासे शङ्किता चेद्गर्भमापन्ना क्षीरमनुपस्कृतं मात्रावच्छीतं काले काले पिबेत्, सात्म्यमेव च भोजनं सायं प्रातश्च भुञ्जीत; द्वितीये मासे क्षीरमेव च मधुरौषधसिद्धं; तृतीये मासे क्षीरं मधुसर्पिर्भ्यामुपसंसृज्य; चतुर्थे मासे क्षीरनवनीतमक्षमात्रमश्नीयात्; पञ्चमे मासे क्षीरसर्पिः; षष्ठे मासे क्षीरसर्पिर्मधुरौषधसिद्धं; तदेव सप्तमे मासे ।तत्र गर्भस्य केशा जायमाना मातुर्विदाहं जनयन्तीति स्त्रियो भाषन्ते; तन्नेति भगवानात्रेयः, किन्तु गर्भोत्पीडनाद्वातपित्तश्लेष्माण उरः प्राप्य विदाहं जनयन्ति, ततः कण्डूरुपजायते, कण्डूमूला च किक्किसावाप्तिर्भवति।तत्र कोलोदकेन नवनीतस्य मधुरौषधसिद्धस्य पाणितलमात्रं काले कालेऽस्यै पानार्थं दद्यात्, चन्दनमृणालकल्कैश्चास्याः स्तनोदरं विमृद्नीयात्, शिरीषधातकीसर्षपमधुकचूर्णैर्वा, कुटजार्जकबीजमुस्तहरिद्राकल्कैर्वा, निम्बकोलसुरसमञ्जिष्ठाकल्कैर्वा, पृषतहरिणशशरुधिरयुतया त्रिफलया वा; करवीरपत्रसिद्धेन तैलेनाभ्यङ्गः; परिषेकः पुनर्मालतीमधुकसिद्धेनाम्भसा; जातकण्डूश्च कण्डूयनं वर्जयेत्त्वग्भेदवैरूप्यपरिहारार्थम्, असह्यायां तु कण्ड्वामुन्मर्दनोद्धर्षणाभ्यां परिहारः स्यात्; मधुरमाहारजातं वातहरमल्पमस्नेहलवणमल्पोदकानुपानं च भुञ्जीत ।अष्टमे तु मासे क्षीरयवागूं सर्पिष्मतीं काले काले पिबेत्; तन्नेति भद्रकाप्यः, पैङ्गल्याबाधो ह्यस्या गर्भमागच्छेदिति; अस्त्वत्र पैङ्गल्याबाध इत्याह भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः , न त्वेवैतन्न कार्यम्; एवं कुर्वती ह्यरोगाऽऽरोग्यबलवर्णस्वरसंहननसंपदुपेतं ज्ञातीनामपि श्रेष्ठमपत्यं जनयति।नवमे तु खल्वेनां मासे मधुरौषधसिद्धेन तैलेनानुवासयेत्।अतश्चैवास्यास्तैलात् पिचुं योनौ प्रणयेद्गर्भस्थानमार्गस्नेहनार्थम्।यदिदं कर्म प्रथमं मासं समुपादायोपदिष्टमानवमान्मासात्तेन गर्भिण्या गर्भसमये गर्भधारिणीकुक्षिकटीपार्श्वपृष्ठं मृदूभवति, वातश्चानुलोमः संपद्यते, मूत्रपुरीषे च प्रकृतिभूते सुखेन मार्गमनुपद्यते, चर्मनखानि च मार्दवमुपयान्ति, बलवर्णौ चोपचीयेते; पुत्रं चेष्टं संपदुपेतं सुखिनं सुखेनैषा काले प्रजायत इति॥ ३२ ॥
प्राक् चैवास्या नवमान्मासात् सूतिकागारं कारयेदपहृतास्थिशर्कराकपाले देशे प्रशस्तरूपरसगन्धायां भूमौ प्राग्द्वारमुदग्द्वारं वा बैल्वानां काष्ठानां तैन्दुकैङ्गुदकानां भाल्लातकानां वार(रु)णानां खादिराणां वा; यानि चान्यान्यपि ब्राह्मणाः शंसेयुरथर्ववेदविदस्तेषां; वसनालेपनाच्छादनापिधानसंपदुपेतं वास्तुविद्याहृदययोगाग्निसलिलोदूखलवर्चःस्थानस्नानभूमिमहानसमृतुसुखं च॥ ३३ ॥
तत्र सर्पिस्तैलमधुसैन्धवसौवर्चलकालविडलवणविडङ्गकुष्ठकिलिमनागरपिप्पलीपिपलीमूलहस्तिपिप्पलीमण्डूकपर्ण्येलालाङ्गलीवचाचव्यचित्रिकचिरबिल्वहिङ्गुसर्षपलशुनकतककणकणिकानीपातसीबल्वजभूर्जकुलत्थमैरेयसुरासवाः सन्निहिताः स्युः; तथाऽश्मानौ द्वौ, द्वे कु(च)ण्डमुसले, द्वे उदूखले, खरवृषभश्च, द्वौ च तीक्ष्णौ सूचीपिप्पलकौ सौवर्णराजतौ, शस्त्राणि च तीक्ष्णायसानि, द्वौ च बिल्वमयौ पर्यङ्कौ, तैन्दुकैङ्गुदानि च काष्ठान्यग्निसन्धुक्षणानि, स्त्रियश्च बह्व्यो बहुशः प्रजाताः सौहार्दयुक्ताः सततमनुरक्ताः प्रदक्षिणाचाराः प्रतिपत्तिकुशलाः प्रकृतिवत्सलास्त्यक्तविषादाः क्लेशसहिन्योऽभिमताः, ब्राह्मणाश्चाथर्ववेदविदः; यच्चान्यदपि तत्र समर्थं मन्येत, यच्चान्यच्च ब्राह्मणा ब्रूयुः स्त्रियश्च वृद्धास्तत् कार्यम्॥ ३४ ॥
ततः प्रवृत्ते नवमे मासे पुण्येऽहनि प्रशस्तनक्षत्रयोगमुपगते प्रशस्ते भगवति शशिनि कल्याणे कल्याणे च करणे मैत्रे मुहूर्ते शान्तिं हुत्वा गोब्राह्मणमग्निमुदकं चादौ प्रवेश्य गोभ्यस्तृणोदकं मधुलाजांश्च प्रदाय ब्राह्मणेभयोऽक्षतान् सुमनसो नान्दीमुखानि च फलानीष्टानि दत्त्वोदकपूर्वमासनस्थेभ्योऽभिवाद्य पुनराचम्य स्वस्ति वाचयेत्।ततः पुण्याहशब्देन गोब्राह्मणं समनुवर्तमाना प्रदक्षिणं प्रविशेत् सूतिकागारम्।तत्रस्था च प्रसवकालं प्रतीक्षेत्॥ ३५ ॥
तस्यास्तु खल्विमानि लिङ्गानि प्रजननकालमभितो भवन्ति; तद्यथा-क्लमो गात्राणां, ग्लानिराननस्य, अक्ष्णोः शैथिल्यं, विमुक्तबन्धनत्वमिव वक्षसः, कुक्षेरवस्रंसनम्, अधोगुरुत्वं, वंक्षणबस्तिकटीकुक्षिपार्श्वपृष्ठनिस्तोदः, योनेः प्रस्रवणम्, अनन्नाभिलाषश्चेति; ततोऽनन्तरमावीनां प्रादुर्भावः, प्रसेकश्च गर्भोदकस्य॥ ३६ ॥
आवीप्रादुर्भावे तु भूमौ शयनं विदध्यान्मृद्वास्तरणोपपन्नम्।तदध्यासीत सा।तां ततः समन्ततः परिवार्य यथोक्तगुणाः स्त्रियः पर्युपासीरन्नाश्वासयन्त्यो वाग्भिर्ग्राहिणीयाभिः सान्त्वनीयाभिश्च॥ ३७ ॥
सा चेदावीभिः संक्लिश्यमाना न प्रजायेताथैनां ब्रूयात्-उत्तिष्ठ, मुसलमन्यतरं गृह्णीष्व, अनेनैतदुलूखलं धान्यपूर्णं मुहुर्मुहुरभिजहि मुहुर्मुहुरवजृम्भस्व चङ्क्रमस्व चान्तराऽन्तरेति; एवमुपदिशन्त्येके।तन्नेत्याह भगवानात्रेयः।दारुणव्यायामवर्जनं हि गर्भिण्याः सततमुपदिश्यते, विशेषतश्च प्रजननकाले प्रचलितसर्वधातुदोषायाः सुकुमार्या नार्या मुसलव्यायामसमीरितो वायुरन्तरं लब्ध्वा प्राणान् हिंस्यात्, दुष्प्रतीकारतमा हि तस्मिन् काले विशेषेण भवति गर्भिणी; तस्मान्मुसलग्रहणं परिहार्यमृषयो मन्यन्ते, जृम्भणं चङ्क्रमणं च पुनरनुष्ठेयमिति ।अथास्यै दद्यात् कुष्ठैलालाङ्गलिकीवचाचिकत्रचिरबिल्वचव्यचूर्णमुपघ्रातुं, सा तन्मुहुर्मुहुरुपजिघ्रेत्, तथा भूर्जपत्रधूमं शिंशपासारधूमं वा।तस्याश्चान्तराऽन्तरा कटीपार्श्वपृष्ठसक्थिदेशानीषदुष्णेन तैलेनाभ्यज्यानुसुखमवमृद्गीयात्।अनेन कर्मणा गर्भोऽवाक् प्रतिपद्यते॥ ३८ ॥
स यदा जानीयाद्विमुच्य हृदयमुदरमस्यास्त्वाविशति, बस्तिशिरोऽवगृह्णाति, त्वरयन्त्येनामाव्यः, परिवर्ततेऽधो गर्भ इति; अस्यामवस्थायां पर्यङ्कमेनामारोप्य प्रवाहयितुमुपक्रमेत।कर्णे चास्या मन्त्रमिममनुकूला स्त्री जपेत्- ऽक्षितिर्जलं वियत्तेजो वायुर्विष्णुः प्रजापतिः।सगर्भां त्वां सदा पान्तु वैशल्यं च दिशन्तु ते॥प्रसूष्व त्वमविक्लिष्टमविक्लिष्टा शुभानने !।कार्तिकेयद्युतिं पुत्रं कार्तिकेयाभिरक्षितम्ऽ इति॥ ३९ ॥
; , , । , ; , । । , । । ॥ ४० ॥
यदा च प्रजाता स्यात्तदैवैनामवेक्षेत-काचिदस्या अपरा प्रपन्ना न वेति ।तस्याश्चेदपरा न प्रपन्ना स्यादथैनामन्यतमा स्त्री दक्षिणेन पाणिना नाभेरुपरिष्टाद्बलवन्निपीड्य सव्येन पाणिना पृष्ठत उपसंगृह्य तां सुनिर्धूतं निर्धुनुयात्।अथास्याः पार्ष्ण्या श्रोणीमाकोटयेत् ।अस्याः स्फिचावुपसंगृह्य सुपीडितं पीडयेत्।अथास्या बालवेण्या कण्ठतालु परिमृशेत्।भूर्जपत्रकाचमणिसर्पनिर्मोकैश्चास्या योनिं धूपयेत्।कुष्ठतालीसकल्कं बल्वजयूषे मैरेयसुरामण्डे तीक्ष्णे कौलत्थे वा यूषे मण्डूकपर्णीपिप्पलीसंपाके वा संप्लाव्य पाययेदेनाम्।तथा सूक्ष्मैलाकिलिमकुष्ठनागरविडङ्गपिप्पलीकालागुरुचव्यचित्रकोपकुञ्चिकाकल्कं खरवृषभस्य वा जीवतो दक्षिणं कर्णमुत्कृत्य दृषदि जर्जरीकृत्य बल्वजक्वाथादीनामाप्लावनानामन्यतमे प्रक्षिप्याप्लाव्य मुहूर्तस्थितमुद्धृत्य तदाप्लावनं पाययेदेनाम्।शतपुष्पाकुष्ठमदनहिङ्गुसिद्धस्य चैनाम् तैलस्य पिचुं ग्राहयेत्।अतश्चैवानुवासयेत् ।एतैरेव चाप्लावनैः फलजीमूतेक्ष्वाकुधामार्गवकुटजकृतवेधनहस्तिपिप्पल्युपहितैरास्थापयेत्।तदास्थापनमस्याः सह वातमूत्रपुरीषैर्निर्हरत्यपरामासक्तां वायोरेवाप्रतिलोमगत्वात्।अपरां हि वातमूत्रपुरीषाण्यन्यानि चान्तर्बहिर्मार्गाणि सज्जन्ति॥ ४१ ॥
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। । ॥ ४३ ॥
ततः कल्पनं नाड्याः ।अतस्तस्याः कल्पनविधिमुपदेक्ष्यामः-नाभिबन्धनात् प्रभृत्यष्टाङ्गुलमभिज्ञानं कृत्वा छेदनावकाशस्य द्वयोरन्तरयोः शनैर्गृहीत्वा तीक्ष्णेन रौक्मराजतायसानां छेदनानामन्यतमेनआर्धधारेण छेदयेत्।तामग्रे सूत्रेणोपनिबध्य कण्ठेऽस्य शिथिलमवसृजेत्।तस्य चेन्नाभिः पच्येत, तां लोध्रमधुकप्रियङ्गुसुरदारुहरिद्राकल्कसिद्धेन तैलेनाभ्यज्यात्, एषामेव तैलौषधानां चूर्णेनावचूर्णयेत्।इति नाडीकल्पनविधिरुक्तः सम्यक्॥ ४४ ॥
असम्यक्कल्पने हि नाड्या आयामव्यायामोत्तुण्डितापिण्डलिकाविनामिकाविजृम्भिकाबाधेभ्यो भयम्।तत्राविदाहिभिर्वातपित्तप्रशमनैरभ्यङ्गोत्सादनपरिषेकैः सर्पिर्भिश्चोपक्रमेत गुरुलाघवमभिसमीक्ष्य॥ ४५ ॥
। । । ॥ ४६ ॥
अथास्य रक्षां विदध्यात्-आदानीखदिरकर्कन्धुपीलुपरूषकशाखाभिरस्या गृहं समन्ततः परिवारयेत्। सर्वतश्च सूतिकागारस्य सर्षपातसीतण्डुलकणकणिकाः प्रकिरेयुः ।तथा तण्दुलबलिहोमः सततमुभयकालं क्रियेतानामकर्मणः ।द्वारे च मुसलं देहलीमनु तिरश्चीनं न्यसेत्।वचाकुष्ठक्षौमकहिङ्गुसर्ष्पातसीलशुनकणकणिकानां रक्षोघ्नसमाख्यातानां चौषधीनां पोट्टलिकां बद्ध्वा सूतिकागारस्योत्तरदेहल्यामवसृजेत्, तथा सूतिकायाः कण्ठे सपुत्रायाः, स्थाल्युदककुम्भपर्यङ्केष्वपि, तथैव च द्वयोर्द्वारपक्षयोः।कणककण्टकेन्धनवानग्निस्तिन्दुककाष्ठेन्धनश्चाग्निः सूतिकागारस्याभ्यन्तरतो नित्यं स्यात्।स्त्रियश्चैनां यथोक्तगुणाः सुहृदश्चानुश्चानुजागृयुर्दशाहं द्वादशाहं वा।अनुपरतप्रदानमङ्गलाशीःस्तुतिगीतवादित्रमन्नपानविशदमनुरक्तप्रहृष्टजनसंपूर्णं च तद्वेश्म कार्यम्।ब्राह्मणश्चाथर्ववेदवित् सततमुभयकालं शान्तिं जुहुयात् स्वस्त्ययनार्थं कुमारस्य तथा सूतिकायाः ।इत्येतद्रक्षाविधानमुक्तम्॥ ४७ ॥
। ; । । । । ॥ ४८ ॥
, , ; ; ; ॥ ४९ ॥
दशमे त्वहनि सपुत्रा स्त्री सर्वगन्धौषधैर्गौरसर्षपलोध्रैश्च स्नाता लघ्वहतशुचिवस्त्रं परिधाय पवित्रेष्टलघुविचित्रभूषणवती च संस्पृश्य मङ्गलान्युचितामर्चयित्वा च देवतां शिखिनः शुक्लवाससोऽव्यङ्गांश्च ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा कुमारमहतानां च वाससां संचये प्राक्शिरसमुदक्शिरसं वा संवेश्य देवतापूर्वं द्विजातिभ्यः प्रणमतीत्युक्त्वा कुमारस्य पिता द्वे नामनी कारयेन्नाक्षत्रिकं नामाभिप्रायिकं च ।तत्राभिप्रायिकं घोषवदाद्यन्तस्थान्तमूष्मान्तं वाऽवृद्धं त्रिपुरुषानूकमनवप्रतिष्ठितं, नाक्षात्रिकं तु नक्षत्रदेवतासमानाख्यं द्व्यक्षरं चतुरक्षरं वा॥ ५० ॥
। वृत्ते च नामकर्मणि कुमारं परीक्षितुमुपक्रमेतायुषः प्रमाणज्ञानहेतोः।तत्रेमान्यायुष्मतां कुमाराणां लक्षणानि भवन्ति।तद्यथा-एकैकजा मृदवोऽल्पाः स्निग्धाः सुबद्धमूलाः कृष्णाः केशाः प्रशस्यन्ते, स्थिरा बहला त्वक्, प्रकृत्याऽतिसंपन्नमीषत्प्रमाणातिवृत्तमनुरूपमातपत्रोपमं शिरः, व्यूढं दृढं समं सुश्लिष्टशङ्खसन्ध्यूर्ध्वव्यञ्जनसंपन्नमुपचितं वलिभमर्धचन्द्राकृति ललाटं, बहलौ विपुलसमपीठौ समौ नीचैर्वृद्धौ पृष्ठतोऽवनतौ सुश्लिष्टकर्णपुत्रकौ महाच्छिद्रौ कर्णौ, ईषत्प्रलम्बिन्यावसंगते समे संहते महत्यौ भुवौ, समे समाहितदर्शने व्यक्तभागविभागे बलवती तेजसोपपन्ने स्वङ्गापाङ्गे चक्षुषी, ऋज्वी महोच्छ्वासा वंशसंपन्नेषदवनताग्रा नासिका, महदृजुसुनिविष्टदन्तमास्यम्, आयामविस्तारोपपन्ना श्लक्ष्णा तन्वी प्रकृतिवर्णयुक्ता जिह्वा, श्लक्ष्णं युक्तोपचयमूष्मोपपन्नं रक्तं तालु, महानदीनः स्निग्धोऽनुनादी गम्भीरसमुत्थो धीरः स्वरः, नातिस्थूलौ नातिकृशौ विस्तारोपपन्नावास्यप्रच्छादनौ रक्तावोष्ठौ, महत्यौ हनू, वृत्ता नातिमहती ग्रीवा,व्यूढमुपचितमुरः, गूढं जत्रु पृष्ठवंशश्च, विप्रकृष्टान्तरौ स्तनौ, असंपातिनी स्थिरे पार्श्वे, वृत्तपरिपूर्णायतौ बाहू सक्थिनी अङ्गुलयश्च, महदुपचितं पाणिपादं, स्थिरा वृत्ताः स्निग्धास्ताम्रास्तुङ्गाः कूर्माकाराः करजाः, प्रदक्षिणावर्ता सोत्सङ्गा च नाभिः, उरस्त्रिभागहीना समा समुपचितमांसा कटी, वृत्तौ स्थिरोपचितमांसौ नात्युन्नतौ नात्यवनतौ स्फिचौ, अनुपूर्वं वृत्तावुपचययुक्तावूरू, नात्युपचिते नात्यपचिते एणीपदे प्रगूढसिरास्थिसन्धी जङ्घे, नात्युपचितौ नात्यपचितौ गुल्फौ, पूर्वोपदिष्टगुणौ पादौ कूर्माकारौ, प्रकृतियुक्तानि वातमूत्रपुरीषगुह्यानि तथा स्वप्रजागरणायासस्मितरुदितस्तनग्रहणानि, यच्च किञ्चिदन्यदप्यनुक्तमस्ति तदपि सर्वं प्रकृतिसंपन्नमिष्टं, विपरीतं पुनरनिष्टम्।इति दीर्घायुर्लक्षणानि॥ ५१ ॥
। ॥ ५२ ॥
()॥ ५३ ॥
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। ; , ॥ ५५ ॥
तेषां तु त्रयाणामपि क्षीरदोषाणां प्रतिविशेषमभिसमीक्ष्य यथास्वं यथादोषं च वमनविरेचनास्थापनानुवासनानि विभज्य कृतानि प्रशमनाय भवन्ति।पानाशनविधिस्तु दुष्टक्षीराया यवगोधूमशालिषष्टिकमुद्गहरेणुककुलत्थसुरासौवीरकमैरेयमेदकलशुनकरञ्जप्रायः स्यात्।क्षीरदोषविशेषांश्चावेक्ष्यावेक्ष्य तत्तद्विधानं कार्यं स्यात्।पाठामहौषधसुरदारुमुस्तमूर्वागुडूचीवत्सकफलकिराततिक्तककटुकरोहिणीसारिवाकषायाणां च पानं प्रशस्यते, तथाऽन्येषां तिक्तकषायकटुकमधुराणां द्रव्याणां प्रयोगः क्षीरविकारविशेषानभिसमीक्ष्य मात्रां कालं च ।इति क्षीरविशोधनानि॥ ५६ ॥
क्षीरजननानि तु मद्यानि सीधुवर्ज्यानि, ग्राम्यानूपौदकानि च शाकधान्यमांसानि, द्रवमधुराम्ललवणभूयिष्ठाश्चाहाराः, क्षीरिण्यश्चौषधयः, क्षीरपानमनायासश्च, वीरणषष्टिकशालीक्षुवालिकादर्भकुशकाशगुन्द्रेत्कटमूलकषायाणां च पानमिति(क्षीरजननानि)॥ ५७ ॥
। ॥ ५८ ॥
; । ॥ ५९ ॥
शयनासनास्तरणप्रावरणानि कुमारस्य मृदुलघुशुचिसुगन्घीनि स्युः; स्वेदमलजन्तुमन्ति मूत्रपुरीषोपसृष्टानि च वर्ज्यानि स्युः; असति संभवेऽन्येषां तान्येव च सुप्रक्षालितोपधानानि सुधूपितानि शुद्धशुष्काण्युपयोगं गच्छेयुः॥ ६० ॥
धूपनानि पुनर्वाससां शयनास्तरणप्रावरणानां च यवसर्षपातसीहिङ्गुगुग्गुलुवचाचोरकवयःस्थागोलोमीजटिलापलङ्कषाशोकरोहिणीसर्पनिर्मोकाणि घृतयुक्तानि स्युः॥ ६१ ॥
; , ॥ ६२ ॥
सनानि ॥ ६३ ॥
न ह्यस्य वित्रासनं साधु।तस्मात्तस्मिन् रुदत्यभुञ्जाने वाऽन्यत्र विधेयतामगच्छति राक्षसपिशाचपूतनाद्यानां नामान्याह्वयता कुमारस्य वित्रासनार्थं नामग्रहणं न कार्यं स्यात्॥ ६४ ॥
। । । , । ॥ ६५ ॥
एवमेनं कुमारमायौवनप्राप्तेर्धर्मार्थकौशलागमनाच्चानुपालयेत्॥ ६६ ॥
। ॥ ६७ ॥
- । ॥ ६८ ॥
। ॥ ६९ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने जातिसूत्रीयं शारीरं नामाष्टमोऽध्यायः॥८॥