भारत संहिता

अध्याय ७

शरीरसंख्याशारीरम्

शरीर के अंगों की गणना

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भूमिका

यह चरक संहिता के शारीरस्थान का सातवाँ अध्याय है। इसका नाम शरीरसंख्याशारीर है, यानी वह अध्याय जिसमें शरीर के अंगों की गणना बताई गई है। अग्निवेश पूरे शरीर को अवयवों में बाँटकर उसकी संख्या और माप जानना चाहते हैं और भगवान् आत्रेय से पूछते हैं; अध्याय भगवान् आत्रेय का उत्तर है।

उत्तर पहले उन अंगों की गिनती से शुरू होता है जो देखे जा सकते हैं। भगवान् आत्रेय छह त्वचाएँ गिनाते हैं और शरीर के छह बड़े अंग बताते हैं: दो भुजाएँ, दो टाँगें, सिर-गर्दन और धड़। फिर वे हड्डियों की गिनती देते हैं, जो दाँत और नाखून मिलाकर तीन सौ साठ होती है, और इन्द्रियों के अधिष्ठान, हृदय, प्राण के आश्रय-स्थान और कोष्ठ के अंग क्रम से बताते हैं। इसके बाद छप्पन प्रत्यङ्ग और नौ बड़े छिद्र आते हैं।

अध्याय बताता है कि गणना दो प्रकार की है। जितना देखा और बताया जा सकता है, उतना यहाँ गिनाया गया है; उससे आगे स्नायु, सिरा, धमनी, पेशी, मर्म और सन्धि जैसे अंग केवल तर्क से जाने जाते हैं, और उनकी संख्याएँ भी यहाँ दी गई हैं। उसके बाद अञ्जलि के माप से शरीर के जल, रस, रक्त और अन्य धातुओं का परिमाण बताया गया है।

फिर शरीर के अंगों को पाँच महाभूतों के अनुसार बाँटा गया है, और हर भूत के साथ उसकी इन्द्रिय बताई गई है। अंगों की गिनती स्थूल रूप से की गई है; परमाणुओं के स्तर पर वे गिने नहीं जा सकते। अन्त में पाठ कहता है कि शरीर को एक रूप में देखने से संग (बन्धन) है और अलग-अलग अवयवों के रूप में देखने से अपवर्ग है।

अध्याय का सार दो श्लोकों में है: जो वैद्य शरीर की संख्या को सब अवयवों सहित जानता है, वह उसके अज्ञान से उत्पन्न मोह से युक्त नहीं होता और मोह से उत्पन्न दोषों से अभिभूत नहीं होता। ये बातें चरक संहिता के अनुसार बताई गई हैं; इनमें कोई चिकित्सा-सलाह नहीं है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक १९-२०)

तत्र श्लोकौ -शरीरसंख्यां यो वेद सर्वावयवशो भिषक् ।तदज्ञाननिमित्तेन स मोहेन न युज्यते ॥

श्लोक १९ →

उनमें दो श्लोक हैं - जो वैद्य शरीर की संख्या को सभी अवयवों सहित जानता है, वह उसके अज्ञान से उत्पन्न मोह से युक्त नहीं होता।

अमूढो मोहमूलैश्च न दोषैरभिभूयते ।निर्दोषो निःस्पृहः शान्तः प्रशाम्यत्यपुनर्भवः ॥

श्लोक २० →

वह मोहरहित होकर मोह के कारण उत्पन्न दोषों से अभिभूत नहीं होता; वह निर्दोष, इच्छारहित और शान्त होकर अपुनर्भव (पुनर्जन्म से मुक्त) हो प्रशान्त हो जाता है।

मुख्य शब्द (१२) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. शा. ७/१

॥ १ ॥

अब हम शरीरसंख्याशारीर (शरीर के अंगों की गणना वाले) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. शा. ७/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।

च. शा. ७/३

॥ ३ ॥

अग्निवेश ने सम्पूर्ण शरीर को अंग-अंग करके बाँटकर, शरीर के सब अंगों की संख्या और प्रमाण का ज्ञान पाने के लिए भगवान् आत्रेय से शरीर की संख्या के विषय में पूछा।

च. शा. ७/४

- ! । ; - , ; । ॥ ४ ॥

उनसे भगवान् आत्रेय ने कहा - हे अग्निवेश, मुझसे सुनो। सम्पूर्ण शरीर को बताने वाले मुझसे, प्रश्न के अनुसार एकाग्र मन से, ठीक-ठीक (सुनो)। शरीर में छह त्वचाएँ हैं; वे इस प्रकार हैं - पहली उदकधरा, जो बाहरी त्वचा है; दूसरी असृग्धरा; तीसरी सिध्म और किलास के उत्पन्न होने का स्थान; चौथी दद्रू और कुष्ठ के उत्पन्न होने का स्थान; पाँचवीं अलजी और विद्रधि के उत्पन्न होने का स्थान; और छठी वह, जिसके कट जाने पर मनुष्य घबरा जाता है और अन्धे की तरह अन्धकार में प्रवेश करता है, और जिसके आश्रय से जोड़ों में काले-लाल रंग के, मोटी जड़ वाले, अत्यन्त कठिनाई से ठीक होने वाले अरुस् (घाव) उत्पन्न होते हैं; इस प्रकार छह त्वचाएँ हैं। ये (छहों) छह अंगों वाले शरीर को ढककर स्थित हैं।

च. शा. ७/५

- ॥ ५ ॥

उनमें यह शरीर के अंगों का विभाग है; वह इस प्रकार है - दो भुजाएँ, दो जंघाएँ (टाँगें), सिर-गर्दन और अन्तराधि (धड़ का मध्य भाग); इस प्रकार शरीर छह अंगों वाला है।

च. शा. ७/६

- , ; ॥ ६ ॥

हड्डियाँ दाँत, दन्तोलूखल और नाखूनों के साथ तीन सौ साठ हैं, वे इस प्रकार हैं - बत्तीस दाँत, बत्तीस दन्तोलूखल, बीस नाखून, हाथ-पैरों की उँगलियों की साठ हड्डियाँ, हाथ-पैरों की बीस शलाकाएँ, हाथ-पैरों की शलाकाओं के चार अधिष्ठान, दोनों एड़ियों की दो हड्डियाँ, दोनों पैरों के चार टखने, दोनों हाथों के दो मणिक, दोनों अरत्नियों की चार हड्डियाँ, दोनों जंघाओं की चार हड्डियाँ, दो घुटने, दो जानुकपालिकाएँ, दो ऊरुनलक, दो बाहुनलक, दो अंस, दो अंसफलक, दो अक्षक, एक जत्रु, दो तालुक, दो श्रोणिफलक, एक भगास्थि, पीठ में पैंतालीस हड्डियाँ, गर्दन में पन्द्रह, छाती में चौदह, दोनों पार्श्वों में चौबीस पर्शुकाएँ, उतने ही स्थालक और उतने ही स्थालकार्बुद, एक हन्वस्थि, दो हनुमूलबन्धन, नासिका-गण्ड-ललाट की एक हड्डी, दो शङ्ख, चार शिरःकपाल। इस प्रकार दाँत, दन्तोलूखल और नाखूनों के साथ हड्डियाँ तीन सौ साठ हैं।

च. शा. ७/७

; - । - । ; - ॥ ७ ॥

पाँच इन्द्रियों के अधिष्ठान हैं, वे इस प्रकार हैं - त्वचा, जीभ, नाक, दोनों आँखें और दोनों कान। पाँच बुद्धीन्द्रियाँ हैं, वे इस प्रकार हैं - स्पर्शन, रसन, घ्राण, दर्शन और श्रोत्र। पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं, वे इस प्रकार हैं - दोनों हाथ, दोनों पैर, पायु, उपस्थ और जीभ।

च. शा. ७/८

॥ ८ ॥

हृदय चेतना का एक अधिष्ठान है।

च. शा. ७/९

; - । ॥ ९ ॥

प्राण के दस आयतन (आश्रय-स्थान) हैं, वे इस प्रकार हैं - मूर्धा, कण्ठ, हृदय, नाभि, गुदा, बस्ति, ओज, शुक्र, शोणित और मांस। उनमें से पहले छह मर्मों की गणना में गिने जा चुके हैं।

च. शा. ७/१०

; - ॥ १० ॥

कोष्ठ के पन्द्रह अंग हैं, वे इस प्रकार हैं - नाभि, हृदय, क्लोम, यकृत्, प्लीहा, दोनों वृक्क, बस्ति, पुरीषाधार, आमाशय, पक्वाशय, उत्तरगुद, अधरगुद, क्षुद्रान्त्र, स्थूलान्त्र और वपावहन।

च. शा. ७/११

। - , ॥ ११ ॥

छप्पन प्रत्यङ्ग हैं, जो छह अंगों (दो हाथ, दो पैर, सिर और धड़) में ही सम्मिलित हैं; जिनकी गणना पहले अंगों को गिनते समय नहीं की गई थी, वे यहाँ दूसरे प्रकारों से प्रकट किए जाते हैं। वे इस प्रकार हैं - दो जङ्घापिण्डिका, दो ऊरुपिण्डिका, दो स्फिच्, दो वृषण, एक शेफ, दो उख, दो वङ्घण, दो कुकुन्दर, एक बस्तिशीर्ष, एक उदर, दो स्तन, दो श्लेष्मभू, दो बाहुपिण्डिका, एक चिबुक, दो ओष्ठ, दो सृक्कणी, दो दन्तवेष्टक, एक तालु, एक गलशुण्डिका, दो उपजिह्विका, एक गोजिह्विका, दो गण्ड, दो कर्णशष्कुली, दो कर्णपुत्रक, दो अक्षिकूट, चार अक्षिवर्त्म (पलकें), दो अक्षिकनीनिका, दो भ्रू, एक अवटु और चार पाणिपादहृदय।

च. शा. ७/१२

- ॥ १२ ॥

नौ बड़े छिद्र हैं - सात सिर में और दो नीचे।

च. शा. ७/१३

॥ १३ ॥

इतना ही दिखाई देने वाला है, और (उसे) बताना भी सम्भव है।

च. शा. ७/१४

। - , , , , , , , । , । , ॥ १४ ॥

इससे आगे जो है, वह बताया नहीं जा सकता, केवल तर्क से जाना जाता है। जैसे - नौ सौ स्नायुएँ, सात सौ सिराएँ, दो सौ धमनियाँ, चार सौ पेशियाँ, एक सौ सात मर्म, दो सौ सन्धियाँ; और सिराओं तथा धमनियों को बारीक कणों में बाँटने पर उनके मुखों के अग्रभाग का माप उनतीस हज़ार नौ सौ छप्पन है, और उतने ही सिर के बाल, दाढ़ी-मूँछ और शरीर के रोम हैं। यह जो त्वचा से आरम्भ करके देखने योग्य है, ठीक-ठीक गिना गया है; इससे आगे का तर्क से जाना जाता है। ये दोनों ही नहीं बदलते, क्योंकि शरीर की स्थिति स्वाभाविक है।

च. शा. ७/१५

; , , । - , , , , , ; , ; , , , , , , , , , । ॥ १५ ॥

जो अञ्जलि से गिनने योग्य है, उसे हम बताएँगे। वह सर्वोत्तम माप जानने योग्य है, और वह बढ़ने-घटने वाला है, अनुमान से ही जानने योग्य है। जैसे - शरीर में जल की दस अञ्जलियाँ हैं, अपनी ही अञ्जलि के माप से। जो निकलता हुआ मल को, अधिकता होने पर मूत्र, रक्त और शरीर के अन्य धातुओं को भी साथ बाँधे रखता (साथ ले जाता) है; जो सारे शरीर में घूमता हुआ बाहरी त्वचा को धारण करता है; जो त्वचा के भीतर घाव में आकर 'लसीका' नाम पाता है; और जो गर्मी से जुड़ा हुआ रोमकूपों से निकलता हुआ 'स्वेद' नाम पाता है - वह जल दस अञ्जलि के माप का है। पहले कही गई, आहार के परिणाम से बनी धातु, जिसे 'रस' कहते हैं, उसकी नौ अञ्जलियाँ हैं; शोणित (रक्त) की आठ, मल की सात, कफ की छह, पित्त की पाँच, मूत्र की चार, वसा की तीन, मेद की दो, मज्जा की एक, मस्तिष्क की आधी अञ्जलि; शुक्र का उतना ही (आधी अञ्जलि) माप है, और कफ सम्बन्धी ओज का भी उतना ही। यह शरीर का तत्त्व कहा गया।

च. शा. ७/१६

; ; ; ; ; । ॥ १६ ॥

उनमें जो विशेष रूप से स्थूल, स्थिर, मूर्तिमान्, भारी, खुरदरा और कठोर अंग है - नख, अस्थि, दाँत, मांस, चर्म, मल, केश, दाढ़ी-मूँछ, रोम, कण्डरा आदि - वह पार्थिव है, और उसमें गन्ध तथा घ्राण (नाक) है। जो द्रव, सर (बहने वाला), मन्द, स्निग्ध, मृदु और पिच्छिल है - रस, रक्त, वसा, कफ, पित्त, मूत्र, स्वेद आदि - वह आप्य (जल का) है, और उसमें रस तथा रसना (जीभ) है। जो पित्त और ऊष्मा है, और शरीर में जो भी कान्ति है, वह सब आग्नेय है, उसमें रूप तथा दर्शन (आँख) है। जो उच्छ्वास, प्रश्वास, आँख खोलना, आँख मूँदना, सिकोड़ना, फैलाना, गमन, प्रेरण, धारण आदि है, वह वायवीय है, उसमें स्पर्श तथा स्पर्शन (त्वचा) है। जो विविक्त (खाली) है, जिसे बड़े और सूक्ष्म स्रोत कहा जाता है, वह आन्तरीक्ष (आकाश का) है, उसमें शब्द तथा श्रोत्र (कान) है। जो प्रयोक्ता है, वह प्रधान है - बुद्धि और मन। इस प्रकार शरीर के अवयवों की संख्या स्थूल भेद के अनुसार अवयवों में बताई गई।

च. शा. ७/१७

, । ॥ १७ ॥

शरीर के अंग तो परमाणुओं के भेद से अगणनीय (गिने न जा सकने वाले) होते हैं, क्योंकि वे बहुत अधिक हैं, अत्यन्त सूक्ष्म हैं और इन्द्रियों से परे हैं। उन परमाणुओं के संयोग और विभाग में वायु तथा कर्म और स्वभाव कारण हैं।

च. शा. ७/१८

, । ॥ १८ ॥

इस प्रकार यह शरीर अनेक अवयवों वाला गिना गया है। एकत्व (एक रूप में) से देखने पर संग (बन्धन) है, और पृथक्त्व (अलग-अलग रूप में) से देखने पर अपवर्ग (मोक्ष) है। उसमें प्रधान, जो आसक्त नहीं है, सर्व सत्ता की निवृत्ति होने पर निवृत्त हो जाता है।

च. शा. ७/१९

- । ॥ १९ ॥

उनमें दो श्लोक हैं - जो वैद्य शरीर की संख्या को सभी अवयवों सहित जानता है, वह उसके अज्ञान से उत्पन्न मोह से युक्त नहीं होता।

च. शा. ७/२०

। ॥ २० ॥

वह मोहरहित होकर मोह के कारण उत्पन्न दोषों से अभिभूत नहीं होता; वह निर्दोष, इच्छारहित और शान्त होकर अपुनर्भव (पुनर्जन्म से मुक्त) हो प्रशान्त हो जाता है।

च. शा. ७

॥

इस प्रकार अग्निवेश के रचे, चरक द्वारा संशोधित तन्त्र के शारीरस्थान में 'शरीरसंख्याशारीर' नामक सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ।