॥ १ ॥
अब इसके बाद हम उत्तरबस्तिसिद्धि (उत्तरबस्ति नामक अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
अध्याय १२
उत्तरबस्ति
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यह चरक संहिता के सिद्धिस्थान का बारहवाँ अध्याय है। इसका नाम उत्तरबस्तिसिद्धि है, यानी उत्तरबस्ति से जुड़ी सिद्धि, सफल प्रयोग की विधि का वर्णन। अध्याय का नाम इसकी पहली पंक्ति में ही आता है, जहाँ भगवान् आत्रेय कहते हैं कि अब इस अध्याय की व्याख्या की जाएगी।
अध्याय वमन आदि शोधन कर्मों के बाद के रोगी से शुरू होता है, जो दुर्बल हो गया है और जिसकी अग्नि मन्द है। आत्रेय बताते हैं कि वैद्य उसकी रक्षा अण्डे या तेल से भरे पात्र की तरह बहुत सावधानी से करे, पेया जैसे हल्के आहार से अग्नि को फिर जगाए और रोगी को उसकी प्रकृति में लौटाए। इसके बाद वे उन आठ बातों को गिनाते हैं जिनसे शोधन के बाद के रोगी को बचना चाहिए: ऊँचे स्वर से बोलना, रथ के झटके, अधिक चलना, अधिक बैठना, अजीर्ण, अहितकर भोजन, दिन में सोना और मैथुन। हर एक से होने वाले कष्ट और उनकी चिकित्सा का क्रम भी बताया गया है।
इसके बाद अध्याय का मुख्य भाग आता है: यापन बस्तियाँ, जो सभी समय दी जाने वाली बस्तियाँ कही गई हैं। पहले बारह नुस्खे गिनाए गए हैं, जिनमें दूध, घी, तेल, मधु और अनेक औषधियों के काढ़े और कल्क हैं। फिर मांसरस और अण्डों के रस से बनने वाली बस्तियाँ बताई गई हैं, और अत्यन्त वृष्य स्नेह भी, जिन्हें ब्रह्मघोष और देवपूजन के साथ प्रयुक्त करने की विधि कही गई है। इसके बाद के श्लोकों में इन बस्तियों की गिनती दी गई है, जो विस्तार से दो सौ सोलह तक पहुँचती है। साथ ही यह कहा गया है कि यापन बस्ति के अत्यधिक सेवन से उपद्रव हो सकते हैं, इसलिए उसका सेवन युक्ति से किया जाए।
अध्याय के अन्त में केवल इस अध्याय का नहीं, पूरे सिद्धिस्थान का समापन है। ग्रन्थ बताता है कि यह तन्त्र अग्निवेश ने कहा, चरक ने संस्कारित किया और जो भाग प्राप्त नहीं था उसे दृढबल ने पूरा किया। फिर छब्बीस तन्त्रयुक्तियों के नाम गिनाए गए हैं और बताया गया है कि वे ग्रन्थ को समझने में क्यों सहायक हैं, और इस संहिता को पढ़ने का फल कहा गया है।
पाठक के लिए ध्यान रखने की बात यह है कि यहाँ के नुस्खे और विधियाँ ग्रन्थ का वर्णन हैं, चिकित्सा की सलाह नहीं। कई औषधियों और पशु-पक्षियों की पहचान यहाँ तय नहीं की गई है, और कुछ पाठ-स्थल अस्पष्ट हैं; इन्हें उन श्लोकों की व्याख्या में बताया गया है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।
शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।
अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।
चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।
सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।
चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।
चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।
अर्थ: औषध, उपचार।
चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।
चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।
अर्थ: रोग दूर करने का साधन।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।
चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।
सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।
शब्द-रचना: स्व (अपने) + स्थ (स्थित)।
अर्थ: जो अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो, अर्थात् निरोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ का भी आश्रय है (सू. १/२४), और कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त - स्वास्थ्य की रक्षा - के लिए माने गए हैं (सू. १/६७)।
शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।
अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।
चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।
अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।
चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
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॥ १ ॥
अब इसके बाद हम उत्तरबस्तिसिद्धि (उत्तरबस्ति नामक अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।
। ॥ ३ ॥
अब वैद्य, वमन आदि (शोधन कर्मों) से शुद्ध किए गए, दुर्बल, कृश, मन्द अग्नि वाले, जिसके सन्धान (जोड़) और बन्धन ढीले हो गए हैं, ऐसे रोगी की
। ॥ ४ ॥
जिसके वात, विष्ठा, मूत्र, कफ और पित्त निकल चुके हैं, जिसका आशय (आमाशय आदि स्थान) कृश हो गया है, जिसका देह शून्य (खाली-सा) है और जो प्रतीकार (रोग का सामना) सहने में असमर्थ है, उसकी (वैद्य) सब ओर से रक्षा करे
। ॥ ५ ॥
जैसे नए अण्डे की, जैसे तेल से भरे पात्र की, और जैसे दण्डधारी ग्वाला गायों की (रक्षा करता है), वैसे ही सब प्रकार के अपचार (अनुचित आचरण) से (रोगी की रक्षा करे)।
। ॥ ६ ॥
अग्नि को प्रदीप्त करने के लिए वैद्य पहले पेया आदि (हल्के आहार) से, जिसके अन्त में रस (मांसरस आदि) आता है, क्रम से उपचार करे; वह क्रम को जानने में कुशल हो।
। ॥ ७ ॥
स्निग्ध, खट्टे, मीठे और हृदय को भाने वाले (भोज्य) पहले; उसके बाद अम्ल और लवण दो रस; उसके बाद मधुर और तिक्त; फिर उसके बाद कषाय और कटु (रस दे)
। ॥ ८ ॥
परस्पर विरुद्ध तथा स्निग्ध और रूक्ष रसों के बारी-बारी से उपयोग द्वारा वैद्य (रोगी को) प्रकृति (अपनी स्वाभाविक अवस्था) तक पहुँचाए।
। ॥ ९ ॥
जो सब कुछ सहने में समर्थ हो, जो असंसर्ग (संसर्ग-रहित) हो, जो रति (प्रसन्नता) से युक्त हो, स्थिर इन्द्रियों वाला हो, बलवान् हो और सत्त्व (मनोबल) से सम्पन्न हो, उसे प्रकृति को प्राप्त हुआ जानना चाहिए।
। ॥ १० ॥
इस प्रकृति को प्राप्त न हुआ (रोगी) सभी वर्जित वस्तुओं को छोड़े; और विशेष रूप से इन आठ को, जो बड़े दोष उत्पन्न करने वाली हैं।
। ॥ ११ ॥
उच्च स्वर से बोलना, रथ के हिचकोले, अधिक चलना और अधिक बैठना, अजीर्ण और अहितकर भोजन, दिन में सोना और मैथुन।
। ॥ १२ ॥
उनसे उत्पन्न व्याधियाँ क्रम से देह के ऊपरी भाग में, सर्वांग में, नीचे, मध्य में, पीड़ा तथा मद से, दोष से, श्लेष्मा से और क्षय से उत्पन्न होंगी।
। ॥ १३ ॥
उनके लक्षण विस्तार से, प्रत्येक की चिकित्सा, तथा सिद्ध (सफल) बस्तियाँ और यापन (बस्तियाँ) मैं यथावत् कहूँगा।
; , , , , , ॥ १४ ॥
उनमें से ऊँचे स्वर से बोलने और अधिक बोलने से सिर में ताप, कनपटी और कान में चुभन जैसी पीड़ा, सुनने में रुकावट, मुख-तालु-कण्ठ का सूखना, आँखों के आगे अँधेरा, प्यास, ज्वर, तमक, जबड़े और गर्दन की जकड़न, थूकना, छाती और पसलियों का शूल, स्वरभेद, हिचकी, श्वास आदि होते हैं। रथ के झटकों से संधियों और पर्वों की शिथिलता, जबड़े-नाक-कान-सिर का शूल और चुभन, पेट का क्षोभ, आटोप, आँतों की गड़गड़ाहट, आध्मान, हृदय और इन्द्रियों में रुकावट, कूल्हे-पार्श्व-वंक्षण-वृषण-कमर-पीठ की पीड़ा, संधि-कन्धे-गर्दन की दुर्बलता, अंगों का ताप, पैरों की सूजन, सुन्नपन, रोमांच आदि होते हैं। अधिक चलने से पैर-जंघा-ऊरु-घुटने-वंक्षण-श्रोणि-पीठ का शूल, जाँघों की शिथिलता, चुभन, पिंडलियों का ऐंठना, अंगमर्द, कन्धों का ताप, सिराओं और धमनियों का रोमांच, श्वास, कास आदि होते हैं। अधिक बैठने से रथ के झटकों से होने वाले कूल्हे, पार्श्व, वंक्षण, वृषण, कमर और पीठ की पीड़ा आदि होते हैं। अजीर्ण और अध्यशन से मुख का सूखना, आध्मान, शूल, चुभन, प्यास, शरीर की शिथिलता, वमन, अतिसार, मूर्च्छा, ज्वर, प्रवाहण, आमविष आदि होते हैं। विषम और अहित भोजन से भोजन की अनिच्छा, दुर्बलता, विवर्णता, खुजली, पामा, शरीर का अवसाद तथा वात आदि के प्रकोप से उत्पन्न ग्रहणी और अर्श के रोग आदि होते हैं। दिन में सोने से अरुचि, अपाचन, अग्नि का नाश, स्तैमित्य, पाण्डुता, खुजली, पामा, दाह, वमन, अंगमर्द, हृदय की जकड़न, जड़ता, तन्द्रा, निद्रा की अधिकता, गाँठों की उत्पत्ति, दुर्बलता, मूत्र और आँखों की लाली, तालु में लेप-सा होना आदि होते हैं। मैथुन से शीघ्र बल का नाश, ऊरुओं की शिथिलता, सिर-बस्ति-गुदा-लिंग-वंक्षण-ऊरु-घुटने-जंघा-पैर का शूल, हृदय का धड़कना, आँखों की पीड़ा, अंगों की शिथिलता, शुक्रमार्ग से रक्त आना, कास, श्वास, रक्त थूकना, स्वर का बैठना, कमर की दुर्बलता, एकांग और सर्वांग रोग, अण्डकोष की सूजन, वात-मल-मूत्र का रुकना, शुक्र का स्खलन, जड़ता, कम्पन, बहरापन, विषाद आदि होते हैं; गुदा मानो कट रही हो, लिंग मानो पीटा जा रहा हो, मन मानो बैठा जा रहा हो, हृदय काँपता है, संधियाँ पीड़ित होती हैं, और मानो अँधेरे में प्रवेश कर रहा हो। इस प्रकार इन आठ अपचारों से ये उपद्रव प्रकट होते हैं।
, ; ॥ १५ ॥
उन (उपद्रवों) की सिद्धि (चिकित्सा) यह है। उनमें ऊँचे स्वर से बोलने और बहुत बोलने से उत्पन्न (उपद्रवों) में अभ्यङ्ग, स्वेदन, उपनाह, धूम, नस्य, भोजन के बाद स्नेहपान, रस और दूध आदि, वात को हरने वाली सब विधि और मौन (हितकर है)। रथ के झटकों, अधिक चलने और अधिक बैठने से उत्पन्न (उपद्रवों) में स्नेहन, स्वेदन आदि वात को हरने वाला सब कर्म और (इन) कारणों का त्याग (करना चाहिए)। अजीर्ण और अध्यशन से उत्पन्न (उपद्रवों) में पूरी तरह वमन कराना, रूखा स्वेदन, और लङ्घन, पाचन तथा दीपन योग्य औषधों का प्रयोग (करना चाहिए)। विषम और अहितकर भोजन से उत्पन्न (उपद्रवों) में अपने-अपने (दोष के) अनुसार दोषों को हरने वाली क्रियाएँ (करनी चाहिए)। दिन में सोने से उत्पन्न (उपद्रवों) में धूमपान, लङ्घन, वमन, शिरोविरेचन, व्यायाम, रूखा भोजन, अरिष्ट और दीपन औषधों का प्रयोग, प्रघर्षण, उन्मर्दन, परिषेचन आदि, और कफ को हरने वाली सब विधि (करनी चाहिए)। मैथुन से उत्पन्न (उपद्रवों) में जीवनीय गण के द्रव्यों से सिद्ध किए हुए दूध और घी का सेवन, तथा वात को हरने वाले स्वेदन, अभ्यङ्ग और उपनाह, वृष्य आहार, स्नेह, स्नेहन की विधियाँ, यापन बस्तियाँ और अनुवासन (करने चाहिए); और मूत्र के विकार तथा बस्ति के शूलों में विदारीगन्धादि गण और जीवनीय गण के द्रव्यों तथा दूध के साथ सिद्ध किया हुआ तैल उत्तरबस्ति (के रूप में) हो।
। । । ॥ १६ ॥
यापन बस्तियाँ सभी समय देने योग्य हैं; उन्हें हम बताएँगे। मुस्त, उशीर, बला, आरग्वध (अमलतास), रास्ना, मञ्जिष्ठा, कटुरोहिणी, त्रायमाणा, पुनर्नवा, बिभीतक, गुडूची और स्थिरा आदि पाँच मूल - ये सब एक-एक पल लेकर टुकड़े करके कूट लिए जाएँ, और आठ मदनफल भी; इन्हें धोकर एक आढक जल में काढ़ा बनाकर, चौथाई शेष रहने पर उस रस में दो प्रस्थ दूध मिलाकर फिर पकाया जाए; जब दूध मात्र शेष रहे तब उसमें चौथाई भाग जाङ्गल (पशु के) मांसरस और बराबर मात्रा में मधु तथा घृत मिलाकर, शतकुसुमा, मधुक, कुटज के फल, रसाञ्जन और प्रियङ्गु का कल्क बनाकर मिलाकर, सैन्धव (सेंधा नमक) के साथ, सुखोष्ण (सहने योग्य गुनगुनी) बस्ति दी जाए। यह बस्ति शुक्र, मांस और बल को उत्पन्न करने वाली है; क्षत, क्षीणता, कास, गुल्म, शूल, विषमज्वर, ब्रध्न (वर्ध्म), कुण्डल, उदावर्त, कुक्षिशूल, मूत्रकृच्छ्र, असृग्रज, विसर्प, प्रवाहिका, शिरःशूल, जानु-ऊरु-जङ्घा-बस्ति का जकड़ना, अश्मरी, उन्माद, अर्श, प्रमेह, आध्मान, वातरक्त तथा पित्त और कफ के रोगों को हरने वाली है; तुरन्त बल देने वाली और रसायन है। एरण्ड की जड़ और पलाश में से छह पल (लेकर), तथा शालिपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, कण्टकारिका, रोक्षुरक, रास्ना, अश्वगन्धा, गुडूची, वर्षाभू, आरग्वध और देवदारु - ये एक-एक पल लेकर टुकड़े करके कूटे हुए, और आठ फल, धोकर एक आढक जल और चौथाई भाग दूध में पकाए। चौथाई शेष रहने पर छाने हुए काढ़े में शतकुसुमा, कुष्ठ, मुस्त, पिप्पली, हपुषा, बिल्व, वचा, वत्सक के फल, रसाञ्जन, प्रियङ्गु और यवानी का कल्क डालकर, मधु, घृत, तैल और सैन्धव मिलाकर, सुखोष्ण एक, दो या तीन निरूह दे। यह सबके लिए उत्तम है, और विशेष रूप से लाड़-प्यार में पले सुकुमार, स्त्रीविहार से क्षीण, क्षत वाले, वृद्ध, पुराने अर्श वाले और सन्तान की इच्छा रखने वालों के लिए। उसी प्रकार सहचर, बला, दर्भमूल और सारिवा से सिद्ध किए हुए दूध से (बस्ति दे)। तथा बृहती, कण्टकारी, शतावरी और छिन्नरुहा से पकाए हुए दूध से, मधुक, मदन और पिप्पली के कल्क के साथ, पहले की तरह बस्ति (दे)। तथा बला, अतिबला, विदारी, शालिपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, कण्टकारिका, दर्भमूल, परूषक, काश्मर्य, बिल्वफल और यव से सिद्ध किए हुए दूध से, मधुक और मदन के कल्क के साथ, मधु, घृत और सैवर्चल मिलाकर; यह कास, ज्वर, गुल्म, प्लीहा से पीड़ित तथा स्त्री और मद्य से कष्ट पाए हुओं के लिए तुरन्त बल देने वाली और रसायन है। बला, अतिबला, रास्ना, आरग्वध, मदन, बिल्व, गुडूची, पुनर्नवा, एरण्ड, अश्वगन्धा, सहचर, पलाश, देवदारु और दो पञ्चमूल (दस मूल) - ये एक-एक पल, और यव, कोल तथा कुलत्थ दो-दो प्रसृत, और सूखी मूलियों के भी; एक द्रोण जल में पकाकर निरूह की मात्रा जितना शेष रहने पर छाना हुआ काढ़ा लेकर, उसमें मधुक, मदन, शतपुष्पा, कुष्ठ, पिप्पली, वचा, वत्सक के फल, रसाञ्जन, प्रियङ्गु और यवानी का कल्क बनाकर, गुड़, घृत, तैल, मधु, दूध, मांसरस, खट्टी काञ्जी और सैन्धव मिलाकर, सुखोष्ण बस्ति दे - वात से उत्पन्न शुक्र, मूत्र और मल के रुकने में, तथा गुल्म, हृद्रोग, आध्मान, ब्रध्न, पार्श्व-पृष्ठ-कटी की जकड़न, संज्ञानाश और बलक्षय में। आधा कुडव हपुषा, उससे दुगुने आधे कुटे जौ, दूध और जल में पकाकर दूध शेष रहने पर, मधु, घृत, तैल और नमक मिलाकर; यह सर्वाङ्ग में फैले वातरक्त वाले, मल-मूत्र रुकने वाले और स्त्रीसंग से थके हुओं के लिए हितकर है, वात को हरने वाली है, और बुद्धि, मेधा, अग्नि और बल को उत्पन्न करने वाली है। ह्रस्व पञ्चमूल का काढ़ा, दूध और जल में पकाया हुआ, पिप्पली, मधुक और मदन का कल्क मिलाकर, गुड़, घृत, तैल और नमक सहित; यह क्षीण और विषमज्वर से दुबले हुए की बस्ति है। बला, अतिबला, अपामार्ग और आत्मगुप्ता (आठ पल) तथा आधे कुटे जौ की एक अञ्जलि का काढ़ा, गुड़, घृत, तैल और नमक से युक्त, पहले की तरह बस्ति; यह वृद्ध, दुर्बल और क्षीण शुक्र-रक्त वालों के लिए अत्यन्त हितकर है। बला, मधुक, विदारी, दर्भमूल, मृद्वीका और जौ का काढ़ा बकरी के दूध से पकाकर, मधुक और मदन का कल्क, मधु, घृत और सैन्धव मिलाकर ज्वर से पीड़ित लोगों को बस्ति दे। शालिपर्णी, पृश्निपर्णी, गोक्षुरक की जड़, काश्मर्य, परूषक, खजूर के फल और महुए के फूलों से, बकरी के दूध और जल के एक-एक प्रस्थ में सिद्ध किया हुआ काढ़ा, पिप्पली, मधुक और उत्पल के कल्क से युक्त, घृत और सैन्धव सहित, क्षीण इन्द्रियों वाले और विषमज्वर से दुबले हुए के लिए बस्ति उत्तम कही गई है। स्थिरा आदि पञ्चमूल के पाँच पल, तथा शालि, षष्टिक, यव, गोधूम और माष के पाँच प्रसृत के साथ बकरी का दूध पकाया जाए, चौथाई शेष रहने पर मुर्गी के अण्डे के रस और उसके बराबर मधु, घृत, शर्करा, सैन्धव और सौवर्चल से युक्त बस्ति अत्यन्त वृष्य है और बल तथा वर्ण को उत्पन्न करने वाली है। इस प्रकार यापन बस्तियाँ बारह हैं।
॥ १७ ॥
और यह कल्प (विधि) मोर, गोनर्द, हंस और सारस के अण्डों के रस में भी हो सकता है।
, ; ॥ १८ ॥
तीतर, मोर और राजहंस (के मांस) सहित, पंचमूल के साथ दूध में पकाया हुआ तथा शतपुष्पा, मधुक, रास्ना, कुटज, मदनफल और पिप्पली के कल्क से युक्त, और घृत, तैल, गुड़ तथा सैन्धव से मिला हुआ बस्ति बल, वर्ण और शुक्र को उत्पन्न करने वाला और रसायन है। दशमूल और कुक्कुट के रस के साथ पकाया हुआ, चौथाई शेष रहने तक पका दूध, पिप्पली, मधुक, रास्ना और मदन के कल्क तथा शर्करा, मधु और घृत से युक्त बस्ति स्त्रियों में अत्यन्त कामी पुरुषों के लिए बल उत्पन्न करने वाला है। पित्त, पंख, पैर, मुख और आँतों से रहित मोर को स्थिर (शालपर्णी) आदि पंचमूल के एक-एक पल के साथ जलमिले दूध में पकाकर, दूध शेष रहने पर मदन, पिप्पली, विदारी, शतकुसुमा और मधुक का कल्क मिलाकर तथा मधु, घृत और सैन्धव से युक्त करके, स्त्रियों में अत्यन्त आसक्त और क्षीण इन्द्रियों वालों को बल और वर्ण करने वाली बस्ति देनी चाहिए। यह कल्प (विधि) विष्किर, प्रतुद, प्रसह और जलचर प्राणियों में भी हो सकता है, तथा रोहित आदि मछलियों में दूध के बिना। गोधा, नेवला, बिल्ली, चूहा और शल्लक के मांस के दस-दस पल के भागों को पंचमूल सहित दूध में पकाकर, उस दूध में पिप्पली के फल का कल्क, सैन्धव, सौवर्चल, शर्करा, मधु, घृत और तैल मिलाया हुआ बस्ति बलकारक और रसायन है, क्षीण और क्षत (घायल) व्यक्ति के घाव जोड़ने वाला है, और जिनकी छाती कुचली गई है, जो रथ, हाथी या घोड़े से टूटे हुए हैं, वातबलासक आदि से पीड़ित हैं, तथा उदावर्त, वात और मूत्र, मल, शुक्र के रुकने वालों के लिए अत्यन्त हितकर है। कछुआ आदि में से किसी एक के मांस के साथ पकाया हुआ दूध, जिसमें बैल, हाथी, घोड़े, नक्र, हंस और कुक्कुट के अण्डों का रस, मधु, घृत, शर्करा, सैन्धव तथा इक्षुरक और आत्मगुप्ता के फल का कल्क मिलाया गया हो, वह बस्ति वृद्धों के लिए भी बल उत्पन्न करने वाला है। केकड़े का रस, चटक के अण्डों के रस से युक्त तथा मधु, घृत और शर्करा सहित बस्ति; ये बस्तियाँ अत्यन्त वृष्य हैं, और उच्चटक, इक्षुरक तथा आत्मगुप्ता के साथ पकाए दूध को भोजन के साथ और अनुपान रूप में लेने से पुरुष को सौ स्त्रियों के पास जाने वाला बना देती हैं। बैल, बकरे, सूअर के वृषण, केकड़े और चटक के साथ पकाया हुआ तथा उच्चटक, इक्षुरक, आत्मगुप्ता, मधु, घृत और सैन्धव से युक्त, थोड़ा नमकीन किया हुआ दूध बस्ति है। दशमूल, मोर, हंस और कुक्कुट के काढ़े के पाँच प्रसृत में तैल, घृत, वसा और मज्जा के चार-चार प्रसृत मिलाकर, शतपुष्पा, मुस्त और हपुषा का कल्क डालकर, नमक सहित बस्ति पैर, टखने, ऊरु, घुटने, जंघा, त्रिक, वंक्षण, बस्ति और वृषण के वातरोगों को हरने वाली है। मृग, विष्किर, आनूप और बिल में रहने वाले प्राणियों के लिए इसी कल्प से बस्तियाँ देनी चाहिए। मधु और घृत के दो-दो प्रसृत, उतना ही गर्म जल, आधा पल शतपुष्पा और आधे अक्ष सैन्धव से युक्त बस्ति अत्यन्त वृष्य है तथा मूत्रकृच्छ्र, पित्त और वात को हरने वाली है। ताज़े घृत, तैल, वसा और मज्जा के चार प्रस्थ, आधा पल हपुषा और आधे अक्ष सैन्धव से युक्त बस्ति अत्यन्त वृष्य है, मूत्रकृच्छ्र और पित्त के रोगों को हरने वाली तथा रसायन है। मधु और तैल के चार प्रसृत, आधा पल शतपुष्पा और आधे अक्ष सैन्धव से युक्त बस्ति अग्नि को दीप्त करने वाली, पुष्टिकारक, बल और वर्ण करने वाली, उपद्रव रहित, अत्यन्त वृष्य और रसायन है, तथा क्रिमि, कुष्ठ, उदावर्त, गुल्म, अर्श, ब्रध्न, प्लीहा और मेह को हरने वाली है। उसी प्रकार मधु और घृत के साथ दूध के बराबर मात्रा में, पहले कहे कल्क से बनी बस्ति बल और वर्ण करने वाली, अत्यन्त वृष्य और उपद्रव रहित है, बस्ति और मेढ्र के पाक, परिकर्तिका, मूत्रकृच्छ्र और पित्त के रोगों को हरने वाली तथा रसायन है। उसी प्रकार मधु और घृत के साथ मांसरस के बराबर मात्रा में, एक अक्ष मुस्ता से युक्त बस्ति पहले की तरह वात, बलास, पादहर्ष, गुल्म तथा त्रिक, ऊरु और जानु के सिकुड़ने और बस्ति, वृषण, मेढ्र, त्रिक और पीठ के शूल को हरने वाली है। सुरा, सौवीरक, कुलत्थ, मांसरस, मधु, घृत और तैल के मिलाकर सात प्रसृत, मुस्त और शताह्वा का कल्क तथा नमक सहित बस्ति सभी वातरोगों को हरने वाली है। दशमूल, त्रिफला, बिल्व और मदनफल का काढ़ा, गोमूत्र में पकाया हुआ, कुटज, मदनफल, मुस्त और पाठा के कल्क से युक्त तथा सैन्धव, यावशूक, क्षौद्र और तैल से मिला हुआ बस्ति श्लेष्म के रोगों, बस्ति में गुड़गुड़ाहट, वात, शुक्र के रुकने, पाण्डुरोग, अजीर्ण, विसूचिका और अलसक में देना चाहिए।
। - , । , । , । । ; । । । ॥ १९ ॥
इसके बाद अत्यन्त वृष्य (शुक्रवर्धक) स्नेहों को कहेंगे। शतावरी, गुडूची, इक्षु (ईख), विदारी, आमलक, द्राक्षा और खजूर के, यन्त्र से निचोड़े हुए रस का एक-एक प्रस्थ अलग-अलग लें; उसी प्रकार घृत, तैल और गाय, भैंस तथा बकरी के दूध के दो-दो प्रस्थ डालें; और जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, त्वक्क्षीरी, शृङ्गाटक, मधूलिका, मधुक, उच्चटा, पिप्पली, पुष्करबीज, नीलोत्पल, कदम्ब के फूल, पुण्डरीक और केशर के कल्क, तथा पृषत और तरक्षु का मांस, कुक्कुट, चटक, चकोर, मत्ताक्ष, बर्हि, जीवञ्जीव, कुलिङ्ग और हंस के अण्डों का रस, वसा, मज्जा आदि प्रत्येक का एक प्रस्थ डालकर पकाए। वेदघोष तथा शङ्ख, पटह और भेरी की ध्वनियों के साथ सिद्ध हुए उस (स्नेह) को, श्वेत छत्र से छाया करके, हाथी के कन्धे पर चढ़ाए; भगवान् वृषध्वज (शिव) की पूजा करके, उस स्नेह को एक तिहाई मधु मिलाकर, मङ्गल आशीर्वाद, स्तुति और देवपूजन के साथ बस्ति के रूप में प्रयुक्त करे। पुरुषों के लिए, जो स्त्री-सहवास करने वाले हैं, जिनका वीर्य नष्ट हो गया है, जो क्षत, क्षीणता और विषमज्वर से पीड़ित हैं; तथा दूषित योनि वाली, बाँझ, रक्तगुल्म से पीड़ित, मृतापत्या (जिनकी सन्तान मर जाती है) और अनार्तवा (जिन्हें आर्तव नहीं होता) और क्षीण मांस-रुधिर वाली स्त्रियों के लिए इसे अत्यन्त हितकर, उत्तम रसायन तथा झुर्रियों और सफेद बालों का नाशक जाने। बला, गोक्षुर, रास्ना, अश्वगन्धा, शतावरी और सहचर के सौ-सौ (पल) कूटकर सौ द्रोण जल में पकाए; उस जल के एक द्रोण शेष रहने पर, कपड़े से छाने हुए रस में विदारी और आमलक के स्वरस, बस्त (बकरे), भैंसे, सूअर, बैल, मुर्गे, मोर, हंस, कारण्डव और सारस के अण्डों के रस, तथा घृत और तैल का एक-एक प्रस्थ और दूध के आठ प्रस्थ डालकर, तथा चन्दन, मधुक, मधूलिका, त्वक्क्षीरी, बिस, मृणाल, नीलोत्पल, पटोल, आत्मगुप्ता, अन्नपाकि, तालमस्तक, खजूर, मृद्वीका, तामलकी, कण्टकारी, जीवक, ऋषभक, क्षुद्रसहा, महासहा, शतावरी, मेदा, पिप्पली, ह्रीबेर, त्वक् और पत्र के कल्क डालकर पकाए। ब्रह्मघोष आदि की विधि से सिद्ध हुई बस्ति दे। उससे (मनुष्य) सौ स्त्रियों के पास जा सकता है; और इसमें विहार और आहार का कोई भी नियन्त्रण नहीं रहता। यह वृष्य, बल्य, बृंहण, आयुष्य, झुर्रियों और सफेद बालों को दूर करने वाला है, तथा क्षत, क्षीण, नष्टशुक्र और विषमज्वर से पीड़ितों और दूषित योनि वाली स्त्रियों के लिए अत्यन्त हितकर है। सहचर के सौ पल चार द्रोण जल में पकाकर, एक द्रोण शेष रहने पर, भली-भाँति छाने हुए रस में विदारी और ईख के रस के एक-एक प्रस्थ, आठ गुना दूध, घृत और तैल का एक-एक प्रस्थ, तथा बला, मधुक, मधूक, चन्दन, मधूलिका, सारिवा, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, पयस्या, अगुरु, मञ्जिष्ठा, व्याघ्रनख, शटी, सहचर, सहस्रवीर्या, वराङ्ग और लोध्र के, एक-एक अक्ष की मात्रा के और दुगुनी शर्करा वाले कल्कों से पकाए। ब्रह्मघोष आदि की विधि से सिद्ध हुई बस्ति दे। यह सब रोगों को हरने वाला रसायन है, सुकुमार (विलासी) जनों और अन्तःपुर में रहने वाली स्त्रियों के लिए श्रेष्ठ है, क्षत, क्षय, वात-पित्त की वेदना, श्वास और कास को हरने वाला है; इसमें एक तिहाई मधु मिलाया जाता है; यह झुर्रियों और सफेद बालों को दूर करने वाला तथा वर्ण, रूप, बल, मांस और शुक्र को बढ़ाने वाला है। ये रसायन स्नेहबस्तियाँ, सामर्थ्य होने पर, वीर्य और बल की स्थापना के लिए शतपाक या सहस्रपाक (सौ या हजार बार पकाई हुई) बनानी चाहिए।
- । ॥ २० ॥
इस विषय में (ये श्लोक) हैं - ये बस्तियाँ और स्नेह 'यापन' नाम से कहे गए हैं; ये स्वस्थों, रोगियों और वृद्धों के लिए अविरोधी (हानि न करने वाले, अनुकूल) हैं।
। ॥ २१ ॥
अत्यधिक मैथुन करने के स्वभाव वालों के लिए ये शुक्र, मांस और बल देने वाली, सब रोगों को शान्त करने वाली और सभी ऋतुओं में उपयोग के योग्य हैं।
। ॥ २२ ॥
स्नेहबस्ति और निरूह, दोनों के सम्बन्ध में देखा गया है कि ये सन्तान न होने वाली स्त्रियों और पुरुषों को भी सन्तान देने वाली और दोनों प्रयोजन (स्नेहन और शोधन) पूरे करने वाली हैं।
। ॥ २३ ॥
बस्ति के प्रयोगों में व्यायाम, मैथुन, मद्य, मधु (शहद), ठण्डा जल, सम्भोजन (खूब खाना) और रथ की सवारी का झटका, ये निन्दित (वर्जित) हैं।
-। ॥ २४ ॥
इस विषय में श्लोक हैं - शिखी (मोर), गोनर्द और हंस के अण्डों से, दक्ष (सम्भवतः कुक्कुट) के समान तीन बस्तियाँ; विष्किर पक्षियों से बीस, प्रतुद पक्षियों से तीस और प्रसह पशु-पक्षियों से नौ।
। ॥ २५ ॥
तथा जलचर (पक्षियों) से बीस और सत्ताईस, मत्स्य आदि से नौ; इस प्रकार शिखी के कल्प से बस्तियाँ (कही गई हैं)।
। ॥ २६ ॥
कर्कटक आदि से और कूर्म के कल्प से दस बस्तियाँ; मृगों से सत्रह, उन्नीस और विष्किर पक्षियों से दस।
। ॥ २७ ॥
आनूप (दलदली, जल के पास रहने वाले) और भूशय (बिल में रहने वाले) प्राणियों से दक्ष और शिखी के समान चौदह; इस प्रकार ये उनतीस, स्नेहों सहित, संक्षेप में (कही गई हैं)।
। ॥ २८ ॥
विस्तार से भेद करने पर दो सौ सोलह बस्तियाँ कही गई हैं; ये शहद से युक्त होकर पुरुष को अत्यन्त वृष (प्रबल कामशक्ति वाला) बना देती हैं।
। ॥ २९ ॥
ये (बस्तियाँ) न अतियोग करती हैं और न अयोग, और रुकी रहने (स्तम्भित होने) पर भी (वैसा ही) करती हैं; जिसे ये दी गई हों उसमें यदि कोमल होने के कारण ये बाहर न निकलें
।॥ ३० ॥
तो उसे गोमूत्र सहित तीक्ष्ण बस्तियों से शीघ्र ही आस्थापन देना चाहिए। (यापन बस्ति के अधिक सेवन से) सूजन, अग्नि का नाश, पाण्डुता, शूल, अर्श और परिकर्तिका
। ॥ ३१ ॥
यापन बस्ति के अत्यधिक सेवन से होते हैं ज्वर और अतिसार भी; उनमें अरिष्ट, क्षीर, सीधु आदि से आरम्भ होने वाली दीपन क्रिया अभीष्ट (उचित) है।
। ॥ ३२ ॥
इसलिए यापन बस्तियों का सेवन युक्ति (विवेक) से करे, आदत या अधिकता से नहीं। इस प्रकार 'उच्चैर्भाष्यपूर्वाणाम्' (पाठ अस्पष्ट) की व्यापदें चिकित्सा सहित
। ॥ ३३ ॥
(वे व्यापदें) विस्तार से अलग-अलग कही जा चुकी हैं; उनसे, अर्थात् वमन आदि कर्मों के ठीक से न किए जाने से होने वाली आपदाओं से, मनुष्य की सदा रक्षा करे।
। ॥ ३४ ॥
जिस स्थान (खण्ड) में साधन (उपचार के साधन) कहे गए हों, वह सिद्धिस्थान कहलाता है। इस प्रकार यह एक सौ बीस अध्यायों वाली आत्रेय मुनि की वाणी
। ॥ ३५ ॥
बुद्धिमान् अग्निवेश ने प्राणियों के हित के लिए (इस तन्त्र को) कहा है; (इसे पढ़ने वाला) दीर्घ आयु, यश, स्वास्थ्य और पूर्ण त्रिवर्ग
। ॥ ३६ ॥
और लोक में सर्वोत्तम सिद्धि प्राप्त करता है, जो विधि से इसे पढ़ता है; वह संक्षेप में कही गई बात का विस्तार करता है और अत्यन्त विस्तृत बात को संक्षिप्त करता है।
। ॥ ३७ ॥
संस्कार करने वाला पुराने तन्त्र को भी फिर से नया बना देता है; इसलिए अत्यन्त बुद्धिमान् चरक द्वारा (संस्कारित) यह तन्त्रों में उत्तम (तन्त्र)
। ॥ ३८ ॥
संस्कारित किया गया, तत्त्वों से परिपूर्ण (यह तन्त्र) तीन भाग से पहचाना जाता है। उन्होंने भूतों के स्वामी शंकर को प्रसन्न करके उसे पूरा किया।
। ॥ ३९ ॥
पञ्चनद नगर में उत्पन्न दृढबल ने अखण्ड (सम्पूर्ण) अर्थ के लिए बहुत से तन्त्रों से विशेष (बातों) का उञ्छ-शिल की तरह संग्रह करके
। ॥ ४० ॥
सत्रह (अध्यायों), औषध-अध्यायों, सिद्धि और कल्पों से उन्होंने शब्द और अर्थ में न्यूनता से रहित तथा तन्त्र के दोषों से रहित इस (तन्त्र) को पूरा किया
। ॥ ४१ ॥
छब्बीस विचित्र तन्त्रयुक्तियों से सजाया गया है। उनमें अधिकरण, योग, हेत्वर्थ और पद का अर्थ (पदार्थ)
।॥ ४२ ॥
प्रदेश, उद्देश, निर्देश, वाक्यशेष, प्रयोजन, उपदेश, अपदेश, अतिदेश, अर्थापत्ति और निर्णय
।॥ ४३ ॥
प्रसङ्ग, एकान्त, अनेकान्त, सापवर्ग, विपर्यय, पूर्वपक्ष, विधान, अनुमत, व्याख्यान और संशय
। ॥ ४४ ॥
अतीतावेक्षा, अनागतावेक्षा, स्वसंज्ञा, ऊह्य और समुच्चय; निदर्शन, निर्वचन, संनियोग और विकल्प
। ॥ ४५ ॥
प्रत्युत्सार, उद्धार और सम्भव - ये तन्त्रयुक्तियाँ हैं। संक्षेप और विस्तार से कहे गए तन्त्र में ये पूर्ण रूप से होती हैं।
। ॥ ४६ ॥
संक्षेप में कहे गए (तन्त्र) में (ये) एक अंश से दिखाई देती हैं। जैसे कमलों के वन के लिए सूर्य और जैसे घर के लिए दीपक
। ॥ ४७ ॥
(उसी प्रकार) तन्त्र की युक्तियाँ जगाने और प्रकाश करने के प्रयोजन वाली हैं। जिसकी बुद्धि यहाँ, एक भी शास्त्र में, स्थान पा चुकी है,
। । ॥ ४८ ॥
वह युक्ति को जानने के कारण दूसरे शास्त्र को भी शीघ्र समझ लेता है। तन्त्रयुक्ति के बिना शास्त्रों को पढ़ता हुआ भी वैद्य शास्त्र के अर्थों को नहीं पाता, जैसे भाग्य के क्षय होने पर (मनुष्य) अर्थों (धन आदि) को नहीं पाता।
। ॥ ४९ ॥
बुरी तरह ग्रहण किया हुआ शास्त्र अज्ञानी को शस्त्र के समान नष्ट ही कर देता है। वही भली-भाँति ग्रहण किया हुआ शास्त्र और शस्त्र जानकार की रक्षा करते हैं।
( । )॥ ५० ॥
(इसलिए ये (युक्तियाँ) इसी तन्त्र के तत्त्व को जानने के लिए, गुण और दोष की दृष्टि से, आगे फिर विस्तार से कही जाएँगी।)
। ॥ ५१ ॥
जो इस सम्पूर्ण (तन्त्र) को पढ़कर, अनमना हुए बिना, अर्थों पर भली-भाँति विचार करता है और प्रयोग में सदा लगा रहता है, वह मनुष्यों को सुख और जीवन देने वाला होता है तथा धृति, स्मृति, बुद्धि और धर्म में बढ़ा हुआ होता है।
। ॥ ५२ ॥
जिसके हृदय में बारह हजार (श्लोकों) वाली संहिता स्थित रहती है, वह अर्थ को जानने वाला है, वह विचार को जानने वाला है और वह चिकित्सा में कुशल है।
। ॥ ५३ ॥
वह उनके रोगों को और चिकित्सा को क्यों नहीं जान लेगा? वह्निवेश की चिकित्सा स्वस्थ और रोगी के हित के लिए है।
। ॥ ५४ ॥
जो यहाँ है, वह दूसरी जगह भी है; जो यहाँ नहीं है, वह कहीं भी नहीं है, अग्निवेश द्वारा रचे गए और चरक द्वारा संस्कारित तन्त्र में।
। ॥)
(सिद्धिस्थान नामक आठवें (स्थान) के प्राप्त होने पर उसमें दृढबल द्वारा ही अपनी सिद्धि के लिए सिद्धिस्थान संक्षेप में पूरा किया गया।)
॥॥
इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचे गए, चरक द्वारा संस्कारित, (जो भाग) प्राप्त नहीं था उसे दृढबल द्वारा पूरे किए गए सिद्धिस्थान में उत्तरबस्तिसिद्धि नामक बारहवाँ अध्याय (समाप्त) ॥१२॥