भारत संहिता

अध्याय ११

फलमात्रासिद्धिः

फल की मात्रा

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भूमिका

सिद्धिस्थान का ग्यारहवाँ अध्याय 'फलमात्रासिद्धि' है, जिसका शीर्षक हिन्दी में 'फल की मात्रा' है। 'फल' यहाँ उन फलों के लिए है जो बस्ति की चिकित्सा में प्रयुक्त होते हैं, और 'सिद्धि' का अर्थ है किसी बात का ठीक-ठीक निर्धारित हो जाना। अध्याय की शुरुआत इसी बात से होती है कि बस्ति में प्रयुक्त फलों में कौन-सा श्रेष्ठ है, इस पर मुनियों में मतभेद था और वे निर्णय के लिए भगवान् आत्रेय के पास गए।

कथा के पहले भाग में भृगु, कौशिक, काप्य, शौनक, गौतम और अन्य मुनि एक-एक करके अलग-अलग फलों के गुण और दोष गिनाते हैं: जीमूतक, कटुतुम्ब, धामार्गव, कुटज, कृतवेधन और कटुक। भगवान् आत्रेय सबकी बात सुनकर कहते हैं कि कोई भी फल न पूरी तरह दोष से रहित है और न गुण से रहित, इसलिए विचार इस पर होना चाहिए कि किसमें गुणों की अधिकता है। इसके बाद वे अलग-अलग रोगों में अलग-अलग फलों का उल्लेख करते हैं, और मदन के गुण गिनाकर बताते हैं कि दूसरे फल होते हुए भी वही विशेष रूप से 'फल' नाम पाता है।

दूसरे भाग में शिष्य शंका रखते हैं कि बस्ति तो नाभि के नीचे गुदा तक ही पहुँचती है, फिर वह सारे शरीर से दोषों को कैसे दूर करती है। गुरु उत्तर देते हैं कि शरीर को वात ही चलाता है; वह अकेला या दोषों के साथ अपने स्थान में कुपित होता है, और शुद्धि करने वाली बस्ति उसे अनुलोमन करती है, जिससे उसके शान्त होने पर सारे शरीर में फैले रोग भी शान्त हो जाते हैं। फिर हाथी, ऊँट, गाय, घोड़े, भेड़ और बकरी के लिए बस्ति की थैली, नेत्र, निरूह की मात्रा और द्रव्यों की सूचियाँ आती हैं।

अन्तिम भाग में अग्निवेश पूछते हैं कि कौन-से लोग सदा रोगी रहते हैं। गुरु श्रोत्रिय, राजसेवक, वेश्या और व्यापार से जीने वालों को गिनाते हैं और बताते हैं कि अपने-अपने कामों और आदतों के कारण वे शरीर की देखभाल नहीं कर पाते। फिर ऐसे लोगों के लिए फलवर्ति, निरूहण और अनुवासन के योग ग्रन्थ के कथन के रूप में बताए गए हैं, और शिशु तथा वृद्ध के लिए निरूहबस्ति की विशेषता कही गई है। पाठक के लिए इस अध्याय की मुख्य बातें ये हैं: हर फल में गुण और दोष दोनों हैं, श्रेष्ठता गुणों की अधिकता से आँकी जाती है, और बस्ति का काम वात को ठीक दिशा में लाने से सारे शरीर पर होता है।

मुख्य शब्द (१२) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

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च. सि. ११/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम फलमात्रासिद्धि (फलों की मात्रा के निर्धारण का) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सि. ११/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सि. ११/३

। ॥ ३ ॥

फल और बस्ति (में प्रयुक्त फलों) की श्रेष्ठता के निश्चय के विषय में मतभेद रखने वाले मुनि, उदार सत्त्व (मन), बुद्धि, श्रुत (शास्त्र-ज्ञान) और विज्ञान से सम्पन्न अत्रिपुत्र भगवान् (आत्रेय) के पास गए

च. सि. ११/४

। ॥ ४ ॥

भृगु, कौशिक, काप्य, शौनक तथा पुलस्त्य, असित, गौतम आदि (मुनियों ने पूछा कि) फल आदि (द्रव्यों) में, आस्थापन (बस्ति) के प्रयोगों में कौन-सा श्रेष्ठ माना गया है।

च. सि. ११/५

। ॥ ५ ॥

शौनक ने कहा कि फलों में जीमूतक कफ और पित्त को हरने वाला श्रेष्ठ फल है। फिर राजा वामक ने कहा कि वह मृदु वीर्य (हल्के प्रभाव) के कारण मल को नहीं तोड़ता (ढीला नहीं करता)।

च. सि. ११/६

। ॥ ६ ॥

(पिछले वक्ता राजा वामक ने) कटुतुम्ब को वमन में उत्तम माना, और वह दोषों को प्रेरित करने वाला है। वह अवृष्य है, क्योंकि वह शीतल नहीं है और तीक्ष्ण, कटु तथा रूक्ष है - ऐसा गौतम ने कहा।

च. सि. ११/७

। ॥ ७ ॥

और उसने (पिछले वक्ता गौतम ने) धामार्गव को कफ और पित्त को बाहर निकालने में श्रेष्ठ माना। परन्तु बडिश ने उसे वात बढ़ाने वाला, ग्लानि (थकावट) करने वाला और बल का हरण करने वाला माना।

च. सि. ११/८

। ॥ ८ ॥

(पिछले वक्ता बडिश ने) कुटज की उत्तम कहकर प्रशंसा की, कि वह बल को नष्ट नहीं करता और कफ तथा पित्त को हरता है। काप्य ने उसे अत्यन्त विज्जल (चिपचिपा), ऊर्ध्वभाग (ऊपर के भाग) में काम करने वाला और वात को क्षुब्ध करने वाला कहा।

च. सि. ११/९

। ॥ ९ ॥

(काप्य ने) कृतवेधन को वात बढ़ाने वाला कहा, (पर यह भी कि) वह कफ और पित्त को प्रबलता से हर सकता है। भद्र शौनक ने (कहा कि) वह अच्छा नहीं है, और कटुक भी अत्यन्त बल का नाश करने वाला है।

च. सि. ११/१०

। ॥ १० ॥

इस प्रकार उनके हेतुओं (युक्तियों) के साथ कहे गए अत्यन्त विविध वचनों को सुनकर बुद्धिमान् अत्रिपुत्र ने फलों के विषय में (उनके) परम निश्चय की प्रशंसा की और यह कहा

च. सि. ११/११

। ॥ ११ ॥

फलों के दोषों और गुणों के विषय में सबने वाणी (सरस्वती) से एक-एक करके ठीक-ठीक कहा है। परन्तु कोई (फल) न दोष से रहित है और न गुण से रहित, इसलिए गुणों की अधिकता का विचार किया जाता है।

च. सि. ११/१२

। ॥ १२ ॥

यहाँ (इस विषय में) कुष्ठ में गरागरी हितकर है, मेह (प्रमेह) के रोगी के लिए इक्ष्वाकु हितकर माना गया है। हृदय रोग में कुटज का फल श्रेष्ठ है और पाण्डु रोगों में कोठफल।

च. सि. ११/१३

, । ॥ १३ ॥

उदर (रोग) में कृतवेधन हितकर है, परन्तु मदन किसी भी रोग का विरोधी (हानिकर) नहीं है। वह मधुर है, कषाय और तिक्त (रस) से युक्त है, रूक्ष नहीं है, और कटु, उष्ण तथा विज्जल (चिपचिपा) गुण वाला है।

च. सि. ११/१४

। ॥ १४ ॥

(वह मदन) कफ और पित्त को हरने वाला और शीघ्र असर करने वाला है, निरापद है और वात को अनुकूल दिशा में चलाने वाला (अनुलोम करने वाला) है। इसलिए दूसरे फलों के होते हुए भी वह विशेष रूप से 'फल' नाम पाता है।

च. सि. ११/१५

। ॥ १५ ॥

गुरु द्वारा इस प्रकार वचन कहे जाने पर और मुनियों के समूह द्वारा उसका सम्मान किए जाने पर, तब हर्ष से भरा हुआ शिष्यों का समूह साथ मिलकर प्रणाम करके पूछने लगा।

च. सि. ११/१६

। ॥ १६ ॥

गुरु ने बस्ति को सब कर्मों और गुणों को करने वाला कहा है। परन्तु बस्ति नाभि से ऊपर की ओर नहीं जाती; नाभि के नीचे गुदा है। इसलिए वह (बस्ति) सारे शरीर से दोषों को कैसे दूर करती है?

च. सि. ११/१७

। ॥ १७ ॥

तब गुरु ने यह कहा: वात (अनिल) इस शरीर को नियन्त्रित करती है, रुकावट को तोड़ने के कारण। वह (वात) अकेली ही, अथवा दोषों के साथ मिलकर, अपने स्थान में स्थित होकर प्रकोप (बिगड़ी हुई अवस्था) को प्राप्त होती है।

च. सि. ११/१८

। ॥ १८ ॥

उस वात को, पित्त, कफ और मल सहित, शुद्धि करने वाली बस्ति अनुलोमन करती है (ठीक दिशा में ले जाती है)। और सारे शरीर में फैला हुआ रोगों का समूह उस (वात) के शान्त होने से शान्त हो जाता है।

च. सि. ११/१९

। ॥ १९ ॥

तब बुद्धि से उस अखण्डित (पूरे) अर्थ को समझकर, (शिष्य ने) इन (गुरु) से रोगों को नष्ट करने वाले, हाथी, ऊँट, गाय, घोड़े, भेड़ और बकरी सम्बन्धी (बस्ति) कर्म के विषय में पूछा। और उन्होंने बस्ति के बारे में बताया, तथा फिर प्रेरित किए जाने पर उसकी विधि भी कही।

च. सि. ११/२०

। ॥ २० ॥

हे सौम्य, हाथी और ऊँट के लिए बकरे और मेढ़े (से बनी बस्तियाँ मानते हैं); गाय और घोड़े के लिए भैंस से बनी बस्ति को चाहते हैं; और भेड़-बकरियों के लिए बूढ़े बैल से उत्पन्न बस्ति को उसके उपाय का विचार करने वाले (जानकार) कहते हैं।

च. सि. ११/२१

। ॥ २१ ॥

नेत्र (नली) क्रम से एक अरत्नि, अठारह और सोलह अङ्गुल का, और उसी प्रकार दस अङ्गुल का है। हाथी, ऊँट, गाय, घोड़े, भेड़ और बकरी की बस्ति के जोड़ में (नेत्र का) चौथाई भाग लगाना हितकर कहना चाहिए।

च. सि. ११/२२

। ॥ २२ ॥

बकरी और भेड़ के लिए निरूह की मात्रा एक प्रस्थ है; गाय आदि में बल के अनुसार दुगुनी या तिगुनी। ऊँट का निरूह और उसी प्रकार हाथी का दो आढक (है)। और अनुवासन में वृद्धि आठवाँ भाग है।

च. सि. ११/२३

। ॥ २३ ॥

कलिङ्गक और कुष्ठ, मधुक, पिप्पली, वचा, शताह्वा, मदन, रसाञ्जन, ये सभी (पशुओं) में हितकर हैं; सेंधा नमक सहित गुड़ और द्विपञ्चमूल (दशमूल) भी। यह (द्रव्यों की) विकल्पना (विकल्प) है।

च. सि. ११/२४

। ॥ २४ ॥

हाथी के लिए अधिक (मात्रा में) अश्वत्थ (पीपल), वट (बरगद), अश्वकर्णक; खादिर (खैर) सहित प्रग्रह, शाल (साल) और ताल (ताड़) से उत्पन्न (द्रव्य); और दोनों पर्णी, धव, शिग्रु (सहजन), पाटली और मधूक के सार, निकुम्भ और चित्रक सहित।

च. सि. ११/२५

। ॥ २५ ॥

पलाश, भूतीक, सुराह्व और रोहिणी का कषाय (काढ़ा) गायों के लिए अधिक हितकर कहा गया है। पलाश, दन्ती, सुरदारु, कत्तृण और द्रवन्ती घोड़े के लिए अधिक (हितकर) कही गई हैं।

च. सि. ११/२६

। ॥ २६ ॥

गधे और ऊँट के लिए पीलु, करीर और खादिर (खैर), तथा शम्याक, बिल्व आदि गण के पत्ते; भेड़-बकरियों के लिए त्रिफला और परूषक, कपित्थ और कर्कन्धु, बिल्व सहित कोल (बेर) से उत्पन्न (द्रव्य)।

च. सि. ११/२७

। ॥ २७ ॥

अब अग्निवेश ने सदा रोगी रहने वाले मनुष्यों के विषय में और (उनके लिए) हितकर (उपाय) के विषय में पूछा, और गुरु ने उसे कहा: सदा रोगी रहने वाले श्रोत्रिय, राजसेवक, इसी प्रकार वेश्या और व्यापार से जीविका चलाने वाले (लोग) हैं।

च. सि. ११/२८

। ॥ २८ ॥

ब्राह्मण वेद के अध्ययन, व्रत और नित्य कर्म आदि के कारण शरीर के हित की चेष्टा नहीं करता। राजा की सेवा करने वाला राजा के मन की रक्षा, दूसरों की इच्छा के अनुसार चलने, बहुत चिन्ता और भय के कारण (शरीर के हित की चेष्टा नहीं करता)।

च. सि. ११/२९

। ॥ २९ ॥

मनुष्य के मन के अनुसार चलने वाली, सेवा-सत्कार में लगी, मार्जन और सजावट (पाठ में कोष्ठक सहित अभि(वि)भूषा है: अभिभूषा या विभूषा) में लगी वेश्या (रोगी रहती है); और सदा बैठे रहने से, अत्यधिक लगाव तथा बेचने-खरीदने आदि के लोभ से भी व्यापार से जीने वाले (रोगी रहते हैं)।

च. सि. ११/३०

। ॥ ३० ॥

वे सदा ही आए हुए (मल-मूत्र आदि के) वेग को रोकते हैं, और समय पर भोजन नहीं करते; वे असमय मल-त्याग और विहार का सेवन करने वाले होते हैं। और जो अन्य लोग भी (ऐसे) हैं, वे भी सदा रोगी रहते हैं।

च. सि. ११/३१

। ॥ ३१ ॥

वेग को रोकने से कुपित हुए, मलावरोध और सब अङ्गों में पीड़ा उत्पन्न करने वाले वात को देखकर वैद्य उनके लिए सबसे पहले भली-भाँति बनाई हुई, स्नेह (घी-तेल) से युक्त फलवर्ति का प्रयोग करे।

च. सि. ११/३२

। ॥ ३२ ॥

पुनर्नवा, एरण्ड, निकुम्भ, चित्रक, देवदारु सहित त्रिवृता और निदिग्धिका को, तथा जो पाँच महान् मूल हैं उन्हें, दही के मस्तु से मिले हुए मूत्र में पकाकर

च. सि. ११/३३

। ॥ ३३ ॥

तेल, घी और पाँच लवणों से युक्त, भली-भाँति मिलाई हुई बस्ति का फिर प्रयोग करे। निरूहण दिए हुए (रोगी) को धन्व (मरुभूमि) के पशुओं के मांसरस के साथ भोजन कराकर, उसके बाद निकुम्भ के तेल से अनुवासन करे।

च. सि. ११/३४

। ॥ ३४ ॥

बला, रास्ना सहित, फल, बिल्व और चित्रक, द्विपञ्चमूल (दशमूल), कृतमालक का फल, जौ और कुलत्थ को एक आढक जल में पकाए; वह रस (काढ़ा) कलिङ्गक आदि पिसे हुए द्रव्यों के साथ

च. सि. ११/३५

। ॥ ३५ ॥

तिल, घी, गुड़ और सैन्धव (नमक) सहित वह सदा रोगी रहने वालों के लिए हितकर और बल तथा वर्ण को बढ़ाने वाला है। इसी प्रकार अनुवासन में मधुक से सिद्ध किया हुआ, फल से, बिल्व से, अथवा शताह्वया से भी (सिद्ध किया हुआ तेल हितकर है)।

च. सि. ११/३६

। ॥ -

जीवनीय (द्रव्यों) से युक्त रस अनुवासन में और बिना नमक वाला (रस) निरूहण में शिशु के लिए हितकर है। और शिशु तथा वृद्ध के लिए निरूहबस्ति से बढ़कर शीघ्र अङ्गों का बल बढ़ाने वाला दूसरा (उपाय) नहीं है। इस विषय में श्लोक-

च. सि. ११/३७

। ॥ ३७ ॥

फलकर्म, बस्ति की श्रेष्ठता, नेत्र, गौ आदि की बस्तियाँ जो (बताई गई हैं), सदा रोगी रहने वाले (लोग) कहे गए, और फलमात्रा में इनके लिए जो हितकर है।

च. सि. ११

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संस्कार किए गए, (जो भाग) प्राप्त नहीं था उसे दृढबल द्वारा पूरा किए गए तन्त्र के सिद्धिस्थान में फलमात्रासिद्धि नामक ग्यारहवाँ अध्याय (समाप्त हुआ)।