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अब इसलिए हम दीर्घञ्जीवितीय (दीर्घ जीवन सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।
अध्याय १
दीर्घ जीवन (आयुर्वेद का अवतरण और मूल सिद्धान्त)
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दीर्घञ्जीवितीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का पहला अध्याय है। इसका नाम इसके पहले श्लोक के शब्दों 'दीर्घं जीवितम्' (लम्बा जीवन) से पड़ा है। यह अध्याय पूरे ग्रन्थ की नींव रखता है: आयुर्वेद कहाँ से आया, आयु और आयुर्वेद क्या हैं, और वे मूल विचार कौन-से हैं जिन पर आगे की सारी चिकित्सा टिकी है।
अध्याय एक कथा से आरम्भ होता है। जब रोग मनुष्यों के तप, अध्ययन, व्रत और आयु में बाधा बनने लगे, तब करुणा से भरे अनेक महर्षि हिमालय पर एकत्र हुए। उन्होंने माना कि आरोग्य ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का मूल है। भरद्वाज ऋषि इन्द्र जी के पास गए और उनसे हेतु (रोग के कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध का ज्ञान - आयुर्वेद - लेकर लौटे। यही ज्ञान आगे पुनर्वसु आत्रेय ने अपने छह शिष्यों को दिया, जिनमें अग्निवेश ने सबसे पहले अपना तन्त्र (ग्रन्थ) रचा। अध्याय के अन्त की पुष्पिका बताती है कि यह ग्रन्थ अग्निवेश का रचा हुआ है, जिसका चरक ने प्रतिसंस्कार (संशोधन) किया।
इसके बाद अध्याय परिभाषाओं पर आता है। शरीर, इन्द्रिय, मन (सत्त्व) और आत्मा का संयोग आयु है; और आयुर्वेद वह शास्त्र है जो बताता है कि कौन-सा जीवन हितकर है और कौन-सा अहितकर, कौन-सा सुखी है और कौन-सा दुःखी। फिर छह मूल पदार्थ - सामान्य, विशेष, गुण, द्रव्य, कर्म और समवाय - समझाए गए हैं, जिनके सहारे आगे का पूरा विचार चलता है। शरीर के तीन दोष (वात, पित्त, कफ) और मन के दो दोष (रज, तम) बताए गए हैं, और यह सिद्धान्त कि दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं।
अध्याय का बड़ा भाग औषधों की सूची है: छह रस; पशुओं, पौधों और पृथ्वी से मिलने वाले द्रव्य; सोलह मूलिनी और उन्नीस फलिनी औषधियाँ; चार स्नेह, पाँच लवण, आठ मूत्र, आठ प्रकार के दूध और छह शोधन-वृक्ष। अन्त में अध्याय वैद्य की बात करता है: किसी ओषधि का नाम और रूप जान लेना पर्याप्त नहीं; सही योग (प्रयोग) से विष भी औषध बन जाता है, और गलत प्रयोग से औषध भी विष। इसलिए अज्ञानी वैद्य की कड़ी निन्दा की गई है, और बताया गया है कि श्रेष्ठ वैद्य वही है जो रोगी को रोग से मुक्त करे।
तत्र श्लोकाःआयुर्वेदागमो हेतुरागमस्य प्रवर्तनम् ।सूत्रणस्याभ्यनुज्ञानमायुर्वेदस्य निर्णयः ॥
श्लोक १३६ →यहाँ (अध्याय के सार के) श्लोक हैं: आयुर्वेद का आगमन, (उस) आगमन का हेतु, (उसका) प्रवर्तन (प्रसार), सूत्रण (तन्त्रों की रचना) का अभ्यनुज्ञान (अनुमोदन), आयुर्वेद का निर्णय (उसके स्वरूप का निश्चय)।
संपूर्णं कारणं कार्यमायुर्वेदप्रयोजनम् ।हेतवश्चैव दोषाश्च भेषजं संग्रहेण च ॥
श्लोक १३७ →सम्पूर्ण कारण, कार्य, आयुर्वेद का प्रयोजन, हेतु (रोगों के कारण) और दोष, तथा संक्षेप में भेषज (औषध)।
रसाः सप्रत्ययद्रव्यास्त्रिविधो द्रव्यसंग्रहः ।मूलिन्यश्च फलिन्यश्च स्नेहाश्च लवणानि च ॥
श्लोक १३८ →(अपने) प्रत्ययों और द्रव्यों सहित रस, द्रव्य का त्रिविध (तीन प्रकार का) संग्रह, मूलिनी (जड़ वाली औषधियाँ) और फलिनी (फल वाली औषधियाँ), स्नेह और लवण।
मूत्रं क्षीराणि वृक्षाश्च षड् ये क्षीरत्वगाश्रयाः ।कर्माणि चैषां सर्वेषां योगायोगगुणागुणाः ॥
श्लोक १३९ →मूत्र, क्षीर (दूध), और वे छह वृक्ष जो क्षीर (दूध जैसे रस) और त्वक् (छाल) के आश्रय (स्रोत) हैं; और इन सबके कर्म, योग और अयोग (उचित और अनुचित प्रयोग), गुण और अगुण (लाभ और हानि)।
वैद्यापवादो यत्रस्थाः सर्वे च भिषजां गुणाः ।सर्वमेतत् समाख्यातं पूर्वाध्याये महर्षिणा ॥
श्लोक १४० →(अज्ञानी) वैद्य का अपवाद (निन्दा), और (वह वैद्य) जिसमें वैद्यों के सभी गुण स्थित हों; यह सब महर्षि ने पूर्व (प्रथम) अध्याय में भली-भाँति कहा है।
शब्द-रचना: आयुस् (आयु, जीवन) + वेद (ज्ञान; √विद् 'जानना' से)।
अर्थ: आयु का वेद, अर्थात् जीवन का ज्ञान।
चरक संहिता में: आयुर्वेद वह शास्त्र है जिसमें हित और अहित, सुख और दुःख वाली आयु, आयु के लिए क्या हितकर और क्या अहितकर है, आयु का मान, और स्वयं आयु बताई गई हो (सू. १/४१)। इसलिए आयुर्वेद केवल रोगों की दवा नहीं, पूरे जीवन को स्वस्थ और सार्थक रखने की विद्या है।
अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।
चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।
अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।
चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।
अर्थ: कारण।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।
अर्थ: रोग दूर करने का साधन।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।
शब्द-रचना: स्व (अपने) + स्थ (स्थित)।
अर्थ: जो अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो, अर्थात् निरोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ का भी आश्रय है (सू. १/२४), और कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त - स्वास्थ्य की रक्षा - के लिए माने गए हैं (सू. १/६७)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।
शब्द-रचना: समान + य (भाव) - समान होने का भाव।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: सामान्य सदा सब भावों की वृद्धि का कारण है, और एकत्व (एक जैसा बनाना) करता है (सू. १/४४-४५)। उदाहरण के लिए, जिस गुण वाला द्रव्य लिया जाए, वह शरीर में उसी गुण को बढ़ाता है।
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।
चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।
सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।
आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।
शब्द-रचना: सम् + अव + √इ (साथ आना)।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: पृथ्वी आदि द्रव्यों का अपने गुणों के साथ कभी अलग न होना (अपृथग्भाव) समवाय है; यह नित्य है (सू. १/५०)।
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।
चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।
अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।
चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।
शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।
अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।
चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।
व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।
अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।
चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।
सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।
चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।
चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।
शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।
अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।
चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।
चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।
चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।
शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।
अर्थ: औषध, उपचार।
चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।
शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
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॥ १ ॥
अब इसलिए हम दीर्घञ्जीवितीय (दीर्घ जीवन सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।
। ॥ ३ ॥
दीर्घ जीवन की खोज करते हुए उग्र तप वाले भरद्वाज, अमरों के ईश्वर (देवताओं के स्वामी) इन्द्र को शरण देने वाला जानकर, उनके पास गए।
। ॥ ४ ॥
क्योंकि ब्रह्मा ने जैसा आयुर्वेद कहा था, (ठीक वैसा ही) उसे सबसे पहले प्रजापति ने सम्पूर्ण रूप से ग्रहण किया; और फिर उनसे (प्रजापति से) दोनों अश्विनों ने (उसे ग्रहण किया)।
। ॥ ५ ॥
दोनों अश्विनों से भगवान् शक्र (इन्द्र) ने निश्चय ही उसे पूरा का पूरा प्राप्त किया। इसलिए ऋषियों के कहने पर भरद्वाज शक्र के पास गए।
। ॥ ६ ॥
जब देहधारियों के तप, उपवास, अध्ययन, ब्रह्मचर्य, व्रत और आयु में विघ्न बनकर रोग प्रकट हुए, (तब…)।
। ॥ ७ ॥
तब प्राणियों के प्रति करुणा को आगे रखकर पुण्य कर्म करने वाले महर्षि हिमालय के शुभ पार्श्व (ढलान) पर एकत्र हुए।
। ॥ ८ ॥
(उन महर्षियों में थे:) अङ्गिरा और जमदग्नि, वसिष्ठ, कश्यप, भृगु, आत्रेय, गौतम, साङ्ख्य, पुलस्त्य, नारद (और) असित।
। ॥ ९ ॥
(उनमें) अगस्त्य और वामदेव, मार्कण्डेय और आश्वलायन, पारिक्षि, भिक्षु आत्रेय, भरद्वाज (और) कपिञ्जल (भी थे)।
। ॥ १० ॥
(उनमें) विश्वामित्र और आश्मरथ्य, भार्गव च्यवन, अभिजित्, गार्ग्य, शाण्डिल्य और कौण्डिल्य, वार्क्षि, देवल और गालव (भी थे)।
। ॥ ११ ॥
(उनमें) साङ्कृत्य और बैजवापि, कुशिक, बादरायण, बडिश और शरलोमा, (तथा) काप्य और कात्यायन, ये दोनों (भी थे)।
। ॥ १२ ॥
(उनमें) काङ्कायन, कैकशेय, धौम्य, मारीच और काश्यप, शर्कराक्ष, हिरण्याक्ष, लोकाक्ष और पैङ्गि भी (थे)।
। ॥ १३ ॥
(उनमें) शौनक और शाकुनेय, मैत्रेय, मैमतायनि, वैखानस, वालखिल्य, और इसी प्रकार अन्य महर्षि (भी थे)।
। ॥ १४ ॥
(वे महर्षि) ब्रह्मज्ञान के, दम के और नियम के भण्डार थे; तप के तेज से वे ऐसे दमक रहे थे जैसे वे अग्नियाँ जिनमें आहुति दी जा रही हो।
। ॥ १५ ॥
वहाँ सुखपूर्वक बैठे उन (महर्षियों) ने यह पुण्य चर्चा की: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उत्तम मूल आरोग्य है।
। ॥ १६ ॥
रोग उस (आरोग्य) को, श्रेय को और जीवन को हर लेने वाले हैं। मनुष्यों के सामने यह बड़ा विघ्न प्रकट हुआ है।
। ॥ १७ ॥
'उन (रोगों) के शमन का उपाय क्या हो सकता है?' ऐसा कहकर वे ध्यान में स्थित हो गए। तब उन्होंने ध्यान-चक्षु (ध्यान की आँख) से शक्र (इन्द्र) को (अपनी) शरण के रूप में देखा।
। ॥ १८ ॥
अमरों के स्वामी वे (इन्द्र) शमन का उपाय ठीक-ठीक बताएँगे। शचीपति (इन्द्र) से पूछने के लिए सहस्राक्ष के भवन में कौन जाए?
। ॥ १९ ॥
'इस कार्य में मुझे नियुक्त किया जाए' - यह वचन सबसे पहले भरद्वाज ने कहा; इसलिए ऋषियों ने उन्हें (इस कार्य पर) नियुक्त किया।
। ॥ २० ॥
उन (भरद्वाज) ने शक्र (इन्द्र) के भवन में जाकर, देवताओं और ऋषियों के समूह के बीच विराजमान, प्रज्वलित अग्नि के समान देदीप्यमान बलहन्ता (इन्द्र) को देखा।
। ॥ २१ ॥
उन (भरद्वाज) ने पास जाकर विजय के आशीर्वचनों से सुरेश्वर (देवताओं के स्वामी इन्द्र) का अभिनन्दन किया, और (फिर) उस धीमान् (बुद्धिमान) ने विनयपूर्वक ऋषियों का उत्तम वचन कहा।
। ॥ २२ ॥
क्योंकि सब प्राणियों को भयभीत करने वाले रोग उत्पन्न हो गए हैं, इसलिए हे अमरप्रभो (देवताओं के स्वामी)! मुझे (उनकी) शान्ति का उपाय यथावत् (ठीक-ठीक) बताइए।
। ॥ २३ ॥
(उनकी) बुद्धि को विपुल (अत्यन्त विशाल) जानकर भगवान् शतक्रतु (इन्द्र) ने उन परम ऋषि (भरद्वाज) को थोड़े शब्दों में आयुर्वेद का उपदेश दिया।
। ॥ २४ ॥
(वह आयुर्वेद) जो हेतु, लिङ्ग और औषध का ज्ञान है, स्वस्थ और आतुर (रोगी) (दोनों) का परम आश्रय है, त्रिसूत्र (तीन सूत्रों वाला), शाश्वत और पुण्य है, और जिसे पितामह (ब्रह्मा) ने जाना था।
। ॥ २५ ॥
उन महामति मुनि (भरद्वाज) ने उसी में मन लगाकर, अनन्तपार (अपार) और त्रिस्कन्ध (तीन स्कन्धों वाले) सम्पूर्ण आयुर्वेद को शीघ्र ही यथावत् (ठीक-ठीक) जान लिया।
। ॥ २६ ॥
उस (ज्ञान) से भरद्वाज ने सुख से युक्त अमित (असीम) आयु प्राप्त की; और उन्होंने वह (ज्ञान) ऋषियों को, न कुछ बढ़ाकर और न कुछ शेष छोड़कर, बताया।
। ॥ २७ ॥
और आयु को दीर्घ करने की इच्छा रखने वाले ऋषियों ने भरद्वाज से उस वेद (ज्ञान) को ग्रहण किया, जो प्रजा (लोगों) के लिए हितकारी और आयु को बढ़ाने वाला है।
। ॥ २८ ॥
उन महर्षियों ने ज्ञानचक्षु (ज्ञान रूपी नेत्र) से सामान्य और विशेष, गुण, द्रव्य और कर्म को यथावत् (ठीक-ठीक) देखा।
। ॥ २९ ॥
और समवाय को (भी देखा); जिसे जानकर और तन्त्र (शास्त्र) में कही गई विधि का पालन करते हुए उन्होंने परम शर्म (सर्वोच्च सुख और कल्याण) और अनित्वर (शीघ्र नष्ट न होने वाला) जीवन भी प्राप्त किया।
। ॥ ३० ॥
इसके बाद मैत्रीपर (सबके प्रति मित्रभाव में लगे रहने वाले) पुनर्वसु ने सब प्राणियों पर अनुकम्पा (करुणा) के कारण (अपने) छह शिष्यों को पुण्य आयुर्वेद दिया।
। ॥ ३१ ॥
अग्निवेश, भेल, जतूकर्ण, पराशर, हारीत और क्षारपाणि - (इन छहों) ने उन मुनि (पुनर्वसु) का वह वचन (उपदेश) ग्रहण किया।
। ॥ ३२ ॥
वहाँ (शिष्यों में) अन्तर बुद्धि का था, मुनि (पुनर्वसु) के उपदेश में कोई अन्तर नहीं था; इसी (बुद्धि की विशेषता के) कारण अग्निवेश सबसे पहले तन्त्र (शास्त्र-ग्रन्थ) के कर्ता (रचयिता) हुए।
। ॥ ३३ ॥
इसके बाद भेल आदि (शिष्यों) ने अपना-अपना तन्त्र रचा, और उन सुमेधा (उत्तम बुद्धि वाले शिष्यों) ने (अपनी) रचनाएँ ऋषि-समूह सहित आत्रेय को सुनाईं।
। ॥ ३४ ॥
पुण्यकर्मा (शिष्यों) का किया हुआ विषयों का सूत्रण (सूत्रों में रचना) सुनकर, ऋषियों ने प्रसन्न होकर 'यथावत् सूत्रित है (ठीक-ठीक सूत्रबद्ध किया गया है)' - ऐसा (कहकर) उसका अनुमोदन किया।
। ॥ ३५ ॥
सब प्राणियों का हित चाहने वाले सभी (ऋषियों) ने उन (शिष्यों) की प्रशंसा की, और 'प्राणियों के प्रति (यह) अनुक्रोश (करुणा) साधु (प्रशंसनीय) है' - ऐसा एक साथ ऊँचे स्वर में कहा।
। ॥ ३६ ॥
स्वर्ग में स्थित देवर्षियों ने परम ऋषियों के उस पुण्य शब्द को सुना, और (उसे) सुनकर वे अमरों (देवताओं) सहित अत्यन्त प्रसन्न हुए।
। ॥ ३७ ॥
आकाश में प्राणियों द्वारा हर्ष से उठाए गए 'अहो, साधु!' (अहा, बहुत उत्तम!) के स्निग्ध (मधुर) और गम्भीर घोष ने तीनों लोकों को गुँजा दिया।
। ॥ ३८ ॥
मंगलमय (सुखद) वायु बही, सभी दिशाएँ प्रकाश से जगमगा उठीं, और जल (की बूँदों) सहित दिव्य फूलों की वर्षा भी हुई।
। ॥ ३९ ॥
तब ज्ञान की देवियाँ - बुद्धि, सिद्धि, स्मृति, मेधा, धृति, कीर्ति, क्षमा (और) दया - अग्निवेश आदि (शिष्यों) में प्रविष्ट हुईं।
। ॥ ४० ॥
और परम ऋषियों द्वारा अनुमोदित इन (अग्निवेश आदि) के वे तन्त्र (शास्त्र-ग्रन्थ) प्राणि-समूहों के भव (कल्याण) के लिए पृथ्वी पर प्रतिष्ठा को प्राप्त हुए।
। ॥ ४१ ॥
जिसमें हित और अहित, सुख और दुःख (रूप) आयु, उस (आयु) के लिए हित और अहित (क्या हितकर है और क्या अहितकर), (उसका) मान (परिमाण), और स्वयं वह (आयु) कही गई हो, वह आयुर्वेद कहलाता है।
। ॥ ४२ ॥
शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग आयु कहलाता है; धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध - इन पर्यायों (समानार्थी नामों) से (भी) आयु कही जाती है।
। ॥ ४३ ॥
उस आयु का वेद (आयुर्वेद) वेद के ज्ञाताओं द्वारा सबसे अधिक पुण्यमय माना गया है, (क्योंकि इसमें) वह कहा जाएगा जो मनुष्यों के लिए दोनों लोकों में हितकर है।
। ॥ ४४ ॥
सामान्य सदा सब भावों (पदार्थों) की वृद्धि का कारण है और विशेष (उनके) ह्रास (घटने) का हेतु; प्रवृत्ति (क्रियाशीलता) तो दोनों की (होती) है।
। ॥ ४५ ॥
सामान्य एकत्व करने वाला (एक जैसा बनाने वाला) है और विशेष पृथक्त्व करने वाला (अलग करने वाला)। तुल्यार्थता (समान होना) ही सामान्य है, और विशेष (उसका) विपर्यय (उलटा) है।
। ॥ ४६ ॥
सत्त्व (मन), आत्मा और शरीर - ये तीनों त्रिदण्ड (तीन डंडों से बने तिपाये) के समान हैं; (इनके) संयोग से लोक (जीव-जगत्) टिका रहता है, उसी में सब कुछ प्रतिष्ठित है।
। ॥ ४७ ॥
वह (संयोग) पुरुष है, वह चेतन है, और वह इस वेद (आयुर्वेद) का अधिकरण (विषय और आधार) माना गया है; क्योंकि उसी के लिए यह वेद प्रकाशित किया गया है।
। ॥ ४८ ॥
ख (आकाश) आदि (पाँच महाभूत), आत्मा, मन, काल और दिशाएँ - यह द्रव्यों का संग्रह (गणना) है। इन्द्रियों से युक्त द्रव्य चेतन है, (और) इन्द्रियों से रहित (द्रव्य) अचेतन है।
। ॥ ४९ ॥
अर्थों (इन्द्रियों के विषयों) सहित गुरु आदि, बुद्धि (से लेकर) प्रयत्न तक के (गुण), और पर आदि - ये गुण कहे गए हैं। प्रयत्न से आरम्भ होने वाली चेष्टा (गतिविधि) कर्म कहलाती है।
। ॥ ५० ॥
पृथ्वी आदि (द्रव्यों) का गुणों के साथ अपृथग्भाव (कभी अलग न होना) समवाय माना गया है। वह नित्य है; क्योंकि जहाँ द्रव्य है, वहाँ गुण अनियत (अनिश्चित) नहीं होता।
। ॥ ५१ ॥
जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं, और जो समवायि कारण है, वह द्रव्य है। गुण तो समवायी (द्रव्य में अभिन्न रूप से रहने वाला), निश्चेष्ट (स्वयं क्रिया-रहित) कारण है।
। ॥ ५२ ॥
जो द्रव्य में आश्रित रहकर संयोग और विभाग का कारण होता है, (वह कर्म है)। कर्तव्य (जो किया जाना है, उस) की क्रिया कर्म है; कर्म (किसी) अन्य की अपेक्षा नहीं करता।
। ॥ ५३ ॥
इस प्रकार कारण कहा गया। यहाँ (इस शास्त्र में) धातुसाम्य (धातुओं की समता) को कार्य कहा जाता है, और धातुसाम्य की क्रिया (धातुओं को सम अवस्था में लाना) इस तन्त्र का प्रयोजन कही गई है।
। ॥ ५४ ॥
काल, बुद्धि और इन्द्रियार्थों (इन्द्रियों के विषयों) का मिथ्या (गलत) योग, अयोग (योग न होना) और अतियोग (अधिक योग) - यह दो आश्रयों (शरीर और मन) वाले रोगों के हेतुओं का तीन प्रकार का संग्रह है।
। ॥ ५५ ॥
शरीर और सत्त्व नाम वाला (मन), (ये दोनों) रोगों के आश्रय माने गए हैं, और उसी प्रकार सुखों के भी; परन्तु सुखों का कारण सम (उचित) योग है।
। ॥ ५६ ॥
परन्तु पर (परम) आत्मा निर्विकार है। वह सत्त्व, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ (मिलकर) चैतन्य का कारण है; वह नित्य है, द्रष्टा है, और निश्चय ही (सब) क्रियाओं को देखता है।
। ॥ ५७ ॥
वायु, पित्त और कफ, यह शारीरिक दोष-संग्रह (दोषों का समूह) कहा गया है; और मानसिक (दोष-संग्रह) रज और तम ही बताया गया है।
। ॥ ५८ ॥
पहला (शारीरिक दोष-समूह) दैव और युक्ति पर आश्रित औषधों से शान्त होता है; मानसिक (दोष-समूह) ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से (शान्त होता है)।
। ॥ ५९ ॥
मारुत (वात) रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है; वह विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से भली-भाँति शान्त होता है।
। ॥ ६० ॥
पित्त सस्नेह (कुछ चिकनाई लिए), उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर और कटु है; वह विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शीघ्र शान्त होता है।
। ॥ ६१ ॥
श्लेष्मा (कफ) के गुरु, शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल गुण विपरीत गुणों से प्रशम (शान्ति) को प्राप्त होते हैं।
। ॥ ६२ ॥
जो विकार साध्य माने गए हैं, वे विपरीत गुणों वाले तथा देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर हो जाते हैं।
। ॥ ६३ ॥
परन्तु असाध्य रोगों की चिकित्सा नहीं बताई जाती। और इसके आगे फिर प्रत्येक द्रव्य के अनुसार (उसके) गुणों और कर्मों का वर्णन किया जाएगा।
। ॥ ६४ ॥
रस रसना (जिह्वा) का अर्थ (विषय) है। उसका द्रव्य जल और उसी प्रकार पृथ्वी है; और उसकी उत्पत्ति में तथा उसके भेदों में आकाश आदि (शेष) तीन (महाभूत) कारण हैं।
। ॥ ६५ ॥
स्वादु (मधुर), अम्ल, लवण, कटुक, तिक्त और कषाय, इन छह का यह समूह रसों का संग्रह माना गया है।
। ॥( । ॥)
स्वादु (मधुर), अम्ल और लवण (रस) वायु को जीतते (शान्त करते) हैं; कषाय, स्वादु और तिक्त पित्त को, और कषाय, कटु और तिक्त श्लेष्मा को (जीतते हैं)। कटु, अम्ल और लवण पित्त को, स्वादु, अम्ल और लवण कफ को, और कटु, तिक्त और कषाय समीरण (वात) को कुपित करते हैं।
। ॥ ६७ ॥
कोई (द्रव्य) दोषों को शान्त करने वाला होता है, कोई धातुओं को दूषित करने वाला, और कोई स्वस्थवृत्त (स्वास्थ्य की रक्षा) में (हितकर) माना गया है; (इस प्रकार) द्रव्य तीन प्रकार का कहा जाता है।
। ॥ ६८ ॥
वह (द्रव्य) फिर तीन प्रकार का कहा गया है: जङ्गम, औद्भिद और पार्थिव। मधु, गोरस, पित्त, वसा, मज्जा, असृक् (रक्त), आमिष (मांस) (ये जङ्गम द्रव्य हैं, जिनकी सूची अगले श्लोक में पूरी होती है)।
। ॥ ६९ ॥
विट् (मल), मूत्र, चर्म, रेतस् (वीर्य), अस्थि, स्नायु, शृङ्ग (सींग), नख, खुर, केश, लोम और रोचना (गोरोचन), (ये) जङ्गम (प्राणियों) से (लेकर) प्रयोग किए जाते हैं।
। ॥ ७० ॥
सुवर्ण (सोना), मल सहित पाँच लोह (धातुएँ), सिकता (बालू), सुधा (चूना), मनःशिला और आल (हरताल), मणियाँ, लवण, गैरिक (गेरू) और अञ्जन (ये पार्थिव द्रव्य हैं)।
। ॥ ७१ ॥
(यह सब) भौम (भूमि से उत्पन्न) औषध बताया गया है। औद्भिद (औषध) तो चार प्रकार का है: वनस्पति, वीरुध्, वानस्पत्य और ओषधि।
। ॥ ७२ ॥
वनस्पति फलों से (पहचानी जाती है), वानस्पत्य फूलों से और फलों से भी; ओषधियाँ वे मानी गई हैं जिनका अन्त फल पकने पर होता है, और वीरुध् प्रतानों (फैलने वाली शाखाओं) से (पहचानी जाती हैं)।
। ॥ ७३ ॥
मूल, त्वक् (छाल), सार (भीतरी कठोर लकड़ी), निर्यास (गोंद आदि स्राव), नाल (डंठल), स्वरस (निचोड़ा हुआ रस), पल्लव, क्षार, क्षीर (दूधिया रस), फल, पुष्प, भस्म (राख), तैल और कण्टक (काँटे) (वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है)।
। ॥ ७४ ॥
पत्र (पत्ते), शुङ्ग (कोंपलें), कन्द और प्ररोह (अंकुर) - (यह) औद्भिद गण (पौधों से मिलने वाले द्रव्यों का वर्ग) है। मूलिनी सोलह और फलिनी एक कम बीस (उन्नीस) कही गई हैं।
। ॥ ७५ ॥
और महास्नेह चार हैं, और लवण पाँच ही; मूत्र आठ गिनाए गए हैं, और दूध भी आठ ही।
। ॥ ७६ ॥
और शोधन के लिए छह वृक्ष पुनर्वसु ने बताए हैं। जो इन्हें विकारों (रोगों) में (उचित रूप से) प्रयुक्त करना जानता है, वह वेदवित् (वेद का ज्ञाता) है।
। ॥ ७७ ॥
हस्तिदन्ती, हैमवती, श्यामा, त्रिवृत्, अधोगुडा, सप्तला, श्वेतनामा और प्रत्यक्श्रेणी, गवाक्षी भी (वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है)।
। ॥ ७८ ॥
ज्योतिष्मती और बिम्बी, शणपुष्पी, विषाणिका, अजगन्धा, द्रवन्ती, और यहाँ सोलहवीं क्षीरिणी है (- ये सोलह मूलिनी हैं)।
। ॥ ७९ ॥
शणपुष्पी, बिम्बी और हैमवती भी छर्दन (वमन) में (प्रयुक्त होती हैं); और श्वेता तथा ज्योतिष्मती को शीर्षविरेचन (सिर के विरेचन) में प्रयोग करना चाहिए।
। ॥ ८० ॥
जो ग्यारह बची हैं, उन्हें विरेचन में प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार नाम और कर्म से मूलिनी (औषधियाँ) बताई गईं; (अब) फलिनी (औषधियों) को सुनो।
। । ॥ ८१ ॥
शङ्खिनी, फिर विडङ्ग, त्रपुष और मदन; धामार्गव, फिर इक्ष्वाकु, जीमूत, कृतवेधन; और क्लीतक दो प्रकार का माना गया है: आनूप (जल-बहुल भूमि का) और स्थलज (सूखी भूमि का)।
। ॥ ८२ ॥
प्रकीर्या और उदकीर्या, प्रत्यक्पुष्पा तथा अभया, अन्तःकोटरपुष्पी, और हस्तिपर्णी का शारद (शरद् ऋतु वाला फल) (वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है)।
। ॥ ८३ ॥
कम्पिल्लक और आरग्वध का, तथा कुटज का भी जो फल है; धामार्गव, फिर इक्ष्वाकु, जीमूत और कृतवेधन (वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है)।
। ॥ ८४ ॥
मदन, कुटज, त्रपुष और हस्तिपर्णिनी - (पिछले श्लोक के धामार्गव आदि के साथ) इन्हें वमन में और आस्थापनों में भी प्रयोग करना चाहिए।
। ॥ ८५ ॥
नाक के मार्ग से प्रच्छर्दन (दोषों को बाहर निकालने) में प्रत्यक्पुष्पा का विधान है। जो दस बचे हैं, वे विरेचन में (प्रयोग के लिए) कहे गए हैं।
। ॥ ८६ ॥
(इस प्रकार) उन्नीस फल नाम और कर्म के साथ कहे गए। सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा - (यह) स्नेह चार प्रकार का बताया गया है।
। ॥ ८७ ॥
पान, अभ्यञ्जन और बस्ति के लिए तथा नस्य के लिए भी युक्ति से (प्रयुक्त होने पर ये स्नेह) स्नेहन करने वाले, जीवन देने वाले, वर्ण को उत्तम करने वाले और बल तथा उपचय (शरीर की पुष्टि) को बढ़ाने वाले हैं।
। ॥ ८८ ॥
और ये स्नेह निश्चय ही वात, पित्त और कफ को दूर करने वाले बताए गए हैं। सौवर्चल, सैन्धव, विड और औद्भिद भी (वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है)।
। ॥ ८९ ॥
सामुद्र के साथ ये पाँच लवण होते हैं। (ये) स्निग्ध, उष्ण, तीक्ष्ण और सबसे अधिक दीपनीय (अग्नि को प्रदीप्त करने वाले) हैं।
। ॥ ९० ॥
(ये लवण) आलेपन के लिए, तथा स्नेहन और स्वेदन की विधि में, अधोभाग और ऊर्ध्वभाग (शोधनों) में, निरूहों में और अनुवासन में प्रयुक्त होते हैं (सूची अगले श्लोक में जारी है)।
। ॥ ९१ ॥
(ये लवण) अभ्यञ्जन में, भोजन के लिए, सिर के विरेचन में, शस्त्रकर्म में, वर्ति (बत्ती) बनाने के लिए, तथा अञ्जन और उत्सादन में भी (प्रयुक्त होते हैं)।
। ॥ ९२ ॥
(ये लवण) अजीर्ण और आनाह में, वात (के विकारों) में, गुल्म में, शूल में तथा उदर (रोग) में (प्रयुक्त होते हैं)। (इस प्रकार) लवण कहे गए; इसके आगे आठ मूत्रों को मुझसे जानो।
। ॥ ९३ ॥
आत्रेय के शासन (उपदेश) में जो सब (मूत्र) मुख्य बताए गए हैं, (वे हैं): भेड़ का मूत्र, बकरी का मूत्र, गाय का मूत्र और जो भैंस का (मूत्र) है।
। ॥ ९४ ॥
हाथी का मूत्र, फिर ऊँट का, घोड़े का और गधे का (मूत्र)। (मूत्र सामान्यतः) उष्ण, तीक्ष्ण और अरूक्ष (रूखा नहीं), कटु तथा लवण (रस) से युक्त होता है।
। ॥ ९५ ॥
मूत्र उत्सादन में उपयुक्त है, और आलेपनों में उपयुक्त है; मूत्र आस्थापन में उपयुक्त है, और विरेचन में भी उपयुक्त है।
। ॥ ९६ ॥
वह (मूत्र) स्वेदों में भी उपयुक्त है, और आनाहों में, अगदों में, उदर रोगों में तथा अर्श में, और गुल्म, कुष्ठ तथा किलास के रोगियों में (भी)।
। ॥ ९७ ॥
वह (मूत्र) उपनाहों में और उसी प्रकार परिषेक में भी उपयुक्त है; और (उसे) दीपनीय, विषघ्न और क्रिमिघ्न बताया जाता है।
। ॥ ९८ ॥
और पाण्डुरोग से पीड़ित लोगों के लिए (इसे) उत्तम शर्म (सुख देने वाला उपाय) कहा जाता है। पिया हुआ (मूत्र) श्लेष्मा (कफ) को शान्त करता है और मारुत (वात) का अनुलोमन करता है।
। ॥ ९९ ॥
(और) पित्त को अधोभाग (नीचे के मार्ग) से खींचकर निकालता है। इस प्रकार इस (मूत्र के प्रसंग) में गुणों का संग्रह मैंने सामान्य रूप से तो कह दिया; (अब यह) अलग-अलग (प्रत्येक मूत्र के लिए) कहा जाएगा।
। ॥ १०० ॥
भेड़ का मूत्र तिक्त (रस) सहित, स्निग्ध और पित्त का अविरोधी होता है। बकरी का (मूत्र) कषाय-मधुर और पथ्य है, और दोषों को नष्ट करता है।
। ॥ १०१ ॥
गाय का (मूत्र) थोड़ा मधुर, दोषों का नाश करने वाला, और क्रिमि तथा कुष्ठ को दूर करने वाला है; पीने पर यह कण्डू (खुजली) को शान्त करता है, और दोषोदर में भली-भाँति हितकर है।
। ॥ १०२ ॥
भैंस का (मूत्र) तो क्षार सहित और सर है, तथा अर्श, शोफ और उदर (रोग) का नाश करता है। हाथी का मूत्र लवण (रस वाला) है और क्रिमि तथा कुष्ठ के रोगियों के लिए हितकर है।
। ॥ १०३ ॥
(हाथी का मूत्र) बँधे हुए मल-मूत्र, विष, श्लेष्मा (कफ) के रोगों और अर्श में प्रशस्त है। ऊँट का (मूत्र) तिक्त (रस) सहित, श्वास और कास का नाश करने वाला तथा अर्श का नाश करने वाला कहा जाता है।
। ॥ १०४ ॥
घोड़ों का (मूत्र) तिक्त-कटु है और कुष्ठ, व्रण तथा विष को दूर करता है। गधे का मूत्र अपस्मार, उन्माद और ग्रह (-बाधा) का नाश करने वाला है।
। ॥ १०५ ॥
इस प्रकार यहाँ मूत्र (उनकी) सामर्थ्य और प्रयोग के अनुसार कहे गए। अब क्षीर (दूध) कहे जाएँगे, और इनका कर्म तथा जो इनके गुण हैं (वे भी)।
। ॥ १०६ ॥
भेड़ का दूध, बकरी का दूध, गाय का दूध और जो भैंस का (दूध) है; फिर ऊँटनियों का, हथिनियों का, घोड़ी का तथा स्त्री का (दूध)।
। ॥ १०७ ॥
दूध प्रायः मधुर, स्निग्ध, शीत, स्तन्य (स्तन-दूध बढ़ाने वाला), प्रीणन, बृंहण, वृष्य, मेध्य, बल्य और मनस्कर माना गया है।
। ॥ १०८ ॥
(दूध) जीवनीय, श्रम को हरने वाला और श्वास तथा कास को मिटाने वाला है; यह शोणितपित्त को नष्ट करता है, और विहत (चोट से टूटे अंग) का सन्धान करने वाला (जोड़ने वाला) है।
। ॥ १०९ ॥
(दूध) सभी प्राणियों के लिए सात्म्य (अनुकूल) है; वह शमन तथा शोधन करने वाला, तृष्णा (प्यास) को मिटाने वाला और दीपनीय (अग्नि को प्रदीप्त करने वाला) है, और क्षीण तथा क्षत (रोगियों) में श्रेष्ठ है।
। ॥ ११० ॥
पाण्डुरोग और अम्लपित्त में, शोष, गुल्म तथा उदर (रोग) में, अतीसार, ज्वर, दाह और श्वयथु (सूजन) में (दूध) विशेष रूप से (हितकर है)।
। ॥ १११ ॥
योनि और शुक्र के दोषों (विकारों) में, मूत्र के अल्प होने पर और मल के गाँठदार (कठोर) हो जाने पर, (दूध) वात और पित्त के विकारों से पीड़ित लोगों के लिए पथ्य (हितकर) है।
। ॥ ११२ ॥
नस्य, आलेप और अवगाह में, वमन और आस्थापन में, तथा विरेचन और स्नेहन में, (इन) सब में दूध का प्रयोग किया जाता है।
। ॥ ११३ ॥
एक-एक (प्रकार के) दूध के गुणों को मैं क्रम से, अलग-अलग, अन्नपान आदि (विषयों) वाले अध्याय में फिर से पूरी तरह कहूँगा।
। ॥ ११४ ॥
अब तीन अन्य वृक्ष (कहे जाते हैं), जो फलिनी और मूलिनी (औषधियों) से अलग हैं: स्नुही, अर्क और अश्मन्तक; उनका अलग-अलग कर्म यह है।
। ॥ ११५ ॥
वमन में अश्मन्तक को (उपयोगी) जानना चाहिए और विरेचन में स्नुही के क्षीर (दूधिया रस) को; अर्क का क्षीर विरेचन सहित वमन में, (अर्थात् दोनों में उपयोगी) जानना चाहिए।
। ॥ ११६ ॥
(विद्वान्) इन तीन अन्य वृक्षों को बताते हैं, जिनकी त्वचा (छाल) हितकर है: पूतीक, कृष्णगन्धा और तिल्वक नामक वृक्ष।
। ॥ ११७ ॥
विरेचन में पूतीक तथा तिल्वक का प्रयोग करना चाहिए; और कृष्णगन्धा परीसर्प, शोथ (सूजन) और अर्श में (उपयोगी) कही जाती है।
। ॥ ११८ ॥
(कृष्णगन्धा) दद्रु, विद्रधि और गण्ड में, कुष्ठ में और अलजी में भी (उपयोगी है)। विचक्षण (कुशल वैद्य) इन छह वृक्षों को शोधन (करने वाले) भी जाने।
। ॥ ११९ ॥
इस प्रकार फलिनी और मूलिनी (औषधियाँ), स्नेह, लवण, मूत्र, दूध और वे छह वृक्ष, जिनका क्षीर (दूधिया रस) और जिनकी त्वचा (छाल) बताई गई है, कहे गए।
। ॥ १२० ॥
वन में बकरी चराने वाले (अजप), भेड़ चराने वाले (अविप), गाय चराने वाले (गोप) और जो अन्य वनवासी हैं, वे भी ओषधियों को नाम और रूप से जानते ही हैं।
। ॥ १२१ ॥
केवल नाम के ज्ञान से, अथवा फिर रूप के ज्ञान से, कोई भी ओषधियों की परम प्राप्ति (उनके पूर्ण ज्ञान और लाभ) को नहीं जान सकता।
। ॥ १२२ ॥
परन्तु जो उन (ओषधियों) का योग (प्रयोग) जानता है, वह उनका रूप न जानते हुए भी तत्त्ववित् (उनका यथार्थ जानने वाला) कहा जाता है; फिर उस भिषक् (वैद्य) का तो कहना ही क्या, जो ओषधियों को सब प्रकार से जानता हो।
। ॥ १२३ ॥
किन्तु जो इन (ओषधियों) के योग को, देश और काल के अनुसार निश्चित किया हुआ, प्रत्येक व्यक्ति को देख-परखकर जानता हो, उसे उत्तम भिषक् (श्रेष्ठ वैद्य) जानना चाहिए।
। ॥ १२४ ॥
जैसे विष, जैसे शस्त्र, जैसे अग्नि और जैसे अशनि (वज्र) (घातक होते हैं), वैसे ही अविज्ञात (ठीक से न जाना हुआ) औषध (होता है); (और) विज्ञात (भली-भाँति जाना हुआ) औषध अमृत के समान होता है।
। ॥ १२५ ॥
क्योंकि जो औषध नाम, रूप और गुण, इन तीनों से भली-भाँति न जाना गया हो, और जो जाना हुआ होकर भी दुर्युक्त (गलत ढंग से प्रयुक्त) हो, वह अनर्थ (हानि) का कारण बनता है।
। ॥ १२६ ॥
योग (उचित प्रयोग) से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है; और भेषज भी दुर्युक्त (गलत ढंग से प्रयुक्त) होने पर तीक्ष्ण विष बन जाता है।
। ॥ १२७ ॥
इसलिए जीवन और आरोग्य चाहने वाले बुद्धिमान् (व्यक्ति) को युक्ति से रहित वैद्य द्वारा प्रयुक्त (दिया गया) कोई भी भेषज (औषध) नहीं लेना चाहिए।
। ॥ १२८ ॥
सिर पर गिरा हुआ वासव (इन्द्र) का अशनि (वज्र) (मनुष्य को) सशेष (कुछ बचा हुआ, अर्थात् जीवित) छोड़ सकता है, परन्तु अज्ञ (अनजान व्यक्ति) की बताई हुई औषध रोगी को सशेष नहीं छोड़ सकती।
। ॥ १२९ ॥
अपने को प्राज्ञ (विद्वान्) मानने वाला जो (व्यक्ति) भेषज (औषध) को भली-भाँति जाने बिना ही दुःखी, (रोग-शय्या पर) लेटे हुए, (उस पर) श्रद्धा रखने वाले रोगी को (वह भेषज) दे देता है, (उसके विषय में अगला श्लोक कहता है)।
। ॥ १३० ॥
(ऐसे) उस धर्म-त्यागी, पापी, मृत्यु-रूप बने हुए, दुर्मति (दुष्ट बुद्धि वाले) से बातचीत करने से भी मनुष्य नरक में गिरने वाला हो जाता है।
। ॥ १३१ ॥
आशीविष (अत्यन्त विषैले सर्प) का विष या खौलता हुआ ताँबा ही पी लिया जाए, अथवा अत्यन्त आग में तपाए हुए लोहे के गोले भी खा लिए जाएँ, यह (कहीं) अच्छा है, (किस बात से, यह अगला श्लोक बताता है)।
। ॥ १३२ ॥
परन्तु श्रुतवानों (शास्त्र के ज्ञाताओं) का वेश धारण करने वाले (व्यक्ति) द्वारा शरण में आए, रोग से पीड़ित (व्यक्ति) से अन्न, पान (पेय) या वित्त (धन) लिया जाए, (यह अच्छा) नहीं।
। ॥ १३३ ॥
इसलिए भिषक् (वैद्य) बनने की इच्छा रखने वाला बुद्धिमान् (व्यक्ति) अपने गुणों की सम्पदा (अर्जित करने) में परम प्रयत्न करे, जिससे वह मनुष्यों का प्राणद (प्राण देने वाला) हो सके।
। ॥ १३४ ॥
वही भैषज्य (औषध) युक्त (उचित) है जो आरोग्य देने में समर्थ होता है, और वैद्यों में वही श्रेष्ठ है जो (रोगी को) रोगों से मुक्त करा दे।
। ॥ १३५ ॥
सिद्धि (सफलता) सब कर्मों (चिकित्सा-कार्यों) के सम्यक् प्रयोग को बताती है, और सिद्धि सब गुणों से युक्त श्रेष्ठतम वैद्य को बताती है।
। ॥ १३६ ॥
यहाँ (अध्याय के सार के) श्लोक हैं: आयुर्वेद का आगमन, (उस) आगमन का हेतु, (उसका) प्रवर्तन (प्रसार), सूत्रण (तन्त्रों की रचना) का अभ्यनुज्ञान (अनुमोदन), आयुर्वेद का निर्णय (उसके स्वरूप का निश्चय)।
। ॥ १३७ ॥
सम्पूर्ण कारण, कार्य, आयुर्वेद का प्रयोजन, हेतु (रोगों के कारण) और दोष, तथा संक्षेप में भेषज (औषध)।
। ॥ १३८ ॥
(अपने) प्रत्ययों और द्रव्यों सहित रस, द्रव्य का त्रिविध (तीन प्रकार का) संग्रह, मूलिनी (जड़ वाली औषधियाँ) और फलिनी (फल वाली औषधियाँ), स्नेह और लवण।
। ॥ १३९ ॥
मूत्र, क्षीर (दूध), और वे छह वृक्ष जो क्षीर (दूध जैसे रस) और त्वक् (छाल) के आश्रय (स्रोत) हैं; और इन सबके कर्म, योग और अयोग (उचित और अनुचित प्रयोग), गुण और अगुण (लाभ और हानि)।
। ॥ १४० ॥
(अज्ञानी) वैद्य का अपवाद (निन्दा), और (वह वैद्य) जिसमें वैद्यों के सभी गुण स्थित हों; यह सब महर्षि ने पूर्व (प्रथम) अध्याय में भली-भाँति कहा है।
।
इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के सूत्रस्थान में दीर्घञ्जीवितीय नामक प्रथम अध्याय (पूरा हुआ)।