भारत संहिता

अध्याय २

अपामार्गतण्डुलीयोऽध्यायः

अपामार्ग के बीज (शोधन-औषधियाँ और यवागू)

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भूमिका

अपामार्गतण्डुलीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का दूसरा अध्याय है। इसका नाम इसकी पहली सूची के आरम्भिक शब्दों 'अपामार्गस्य बीजानि' (अपामार्ग के बीज) से पड़ा है; तण्डुल का अर्थ है दाना या बीज, और अपामार्ग वही पौधा है जिसे हिन्दी में चिरचिटा कहते हैं। पहले अध्याय की तरह इस अध्याय का उपदेश भी भगवान् आत्रेय का है। अध्याय के दो भाग हैं: शरीर के शोधन के पाँच कर्मों की औषधियाँ, और रोगों के अनुसार बनाई जाने वाली यवागू।

पहले भाग में पञ्चकर्म, यानी शरीर से दोषों को बाहर निकालने के पाँच कर्मों, की औषधियाँ क्रम से गिनाई गई हैं। पहले शिरोविरेचन (नाक के मार्ग से सिर का शोधन) की औषधियाँ आती हैं, और वे रोग जिनमें यह किया जाता है, जैसे सिर का भारीपन और शूल, आधे सिर का दर्द, पीनस, अपस्मार और सूँघने की शक्ति का नाश। फिर वमन (उल्टी द्वारा शोधन) की औषधियाँ हैं, जिनका प्रयोग तब बताया गया है जब कफ और पित्त उभरे हुए हों और रोग आमाशय में हो; फिर विरेचन (दस्त द्वारा शोधन) की, जब दोष पक्वाशय में पहुँच गया हो। इसके बाद आस्थापन बस्ति की औषधियाँ हैं, उदावर्त और विबन्ध (मल आदि के रुकने) के लिए; और अन्त में कहा गया है कि वात को शान्त करने वाली अनुवासन बस्ति भी इसी औषध-गण से बनाई जाए।

इन सूचियों के बाद अध्याय बताता है कि ये कर्म कैसे किए जाएँ: पहले स्नेह और स्वेद से शरीर को तैयार करके, और मात्रा (परिमाण) और काल (समय) का विचार करते हुए। यहीं से अध्याय का एक मूल विचार आता है: युक्ति, यानी सही योजना, मात्रा और काल पर आधारित है, और चिकित्सा की सफलता युक्ति पर टिकी है। इसलिए युक्ति जानने वाला वैद्य उनसे सदा ऊपर है जो केवल द्रव्यों को जानते हैं।

दूसरे भाग में भगवान् आत्रेय अट्ठाईस यवागू बताते हैं। यवागू अन्न को औषधियों के साथ पकाकर बनाया गया पतला दलिया या पेय है। हर यवागू के साथ उसकी औषधियाँ और उसका प्रभाव बताया गया है: कोई पाचन की अग्नि को जगाती है और शूल दूर करती है; कई अतिसार, रक्तातिसार और मूत्रकृच्छ्र में हितकर कही गई हैं; कोई प्यास, विष, खाँसी, हिचकी और श्वास को दूर करती है। कई यवागू उलटे प्रभाव वाली जोड़ियों में आती हैं: एक शरीर को पुष्ट करती है तो दूसरी कृश, एक चिकनाई लाती है तो दूसरी रूखापन, एक मल को बाहर निकालती है तो दूसरी उसे बाँधती है। कुछ घी या तेल से हुई गड़बड़ी, विषमज्वर, नशे और भूख के लिए भी बताई गई हैं।

अध्याय का सार-श्लोक दोनों भागों को समेटता है: पञ्चकर्म के आधार पर औषधियों का संग्रह, और अट्ठाईस यवागू। वह यह भी बताता है कि जो औषधियाँ पहले मूल और फल के ज्ञान के लिए कही गई थीं, वे यहाँ फिर इसलिए आई हैं कि जाना जा सके कि पञ्चकर्म में उनका प्रयोग कहाँ होता है; इस तरह एक ही औषधि को दो दृष्टियों से जाना जाता है। अन्त में अध्याय कहता है कि इन औषधियों के संयोगों से चिकित्सा करने योग्य वही वैद्य है जिसकी स्मृति अच्छी हो, जो हेतु और युक्ति को जानता हो, जिसने अपने मन को जीत लिया हो और जो सूझ-बूझ से सही निर्णय ले सके।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ३४-३६)

तत्र श्लोकः -अष्टाविंशतिरित्येता यवाग्वः परिकीर्तिताः।पञ्चकर्माणि चाश्रित्य प्रोक्तो भैषज्यसंग्रहः॥

श्लोक ३४ →

इस विषय में (सार रूप) श्लोक (है): इस प्रकार ये अट्ठाईस यवागू बताई गई हैं, और पञ्चकर्मों को आधार बनाकर औषधियों का संग्रह कहा गया है।

पूर्वं मूलफलज्ञानहेतोरुक्तं यदौषधम्।पञ्चकर्माश्रयज्ञानहेतोस्तत् कीर्तितं पुनः॥

श्लोक ३५ →

जो औषध पहले मूल और फल के ज्ञान के लिए कहा गया था, वही फिर से पञ्चकर्म में (उसके) आश्रय (प्रयोग) के ज्ञान के लिए बताया गया है।

स्मृतिमान् हेतुयुक्तिज्ञो जितात्मा प्रतिपत्तिमान्।भिषगौषधसंयोगैश्चिकित्सां कर्तुमर्हति॥

श्लोक ३६ →

स्मृतिमान् (अच्छी स्मृति वाला), हेतु और युक्ति को जानने वाला, जितात्मा (अपने मन को वश में रखने वाला) और प्रतिपत्तिमान् (सूझ-बूझ वाला) भिषक् (वैद्य) औषधों के संयोगों से चिकित्सा करने के योग्य होता है।

मुख्य शब्द (१७) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

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च. सू. २/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम अपामार्गतण्डुलीय (अपामार्ग के बीज सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. २/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. २/३

। ॥ ३ ॥

अपामार्ग (चिरचिटा) के बीज, पिप्पली और मरिच (काली मिर्च), विडङ्ग (वायविडंग), फिर शिग्रु (सहजन) (के बीज), सर्षप (सरसों) और तुम्बुरु (के फल),

च. सू. २/४

। ॥ ४ ॥

अजाजी और अजगन्धा, पीलु (के फल), एला (इलायची), हरेणुका, पृथ्वीका, सुरसा, श्वेता, कुठेरक और फणिज्झक,

च. सू. २/५

। ॥ ५ ॥

शिरीष के बीज, लशुन (लहसुन), दोनों हरिद्रा, दोनों लवण, ज्योतिष्मती (मालकांगनी) और नागर (सोंठ), (इन्हें वैद्य) शीर्षविरेचन (सिर के शोधन) में दे,

च. सू. २/६

। ॥ ६ ॥

सिर के भारीपन और (सिर के) शूल में, पीनस में, अर्धावभेदक (आधे सिर के दर्द) में, क्रिमि-रोग में, अपस्मार (मिर्गी) में, घ्राणनाश (सूँघने की शक्ति के नाश) में और प्रमोहक में।

च. सू. २/७

। ॥ ७ ॥

मदन (मैनफल), मधुक, निम्ब (नीम), जीमूत, कृतवेधन, पिप्पली, कुटज और इक्ष्वाकु (के फल), एला (इलायची) और धामार्गव (के फल),

च. सू. २/८

। ॥ ८ ॥

जब श्लेष्मा (कफ) और पित्त उपस्थित (उभरे हुए) हों और रोग आमाशय में स्थित हो, तब वैद्य शरीर को दूषित न करते हुए (इन्हें) वमन के लिए प्रयोग करे।

च. सू. २/९

। ॥ ९ ॥

त्रिवृता (निशोथ), त्रिफला, दन्ती, नीलिनी (नील), सप्तला, वचा (वच), कम्पिल्लक (कमीला), गवाक्षी, क्षीरिणी और उदकीर्यका,

च. सू. २/१०

। ॥ १० ॥

पीलु (के फल), आरग्वध (अमलतास), द्राक्षा (अंगूर), द्रवन्ती और निचुल (के फल), (इन्हें वैद्य) दोष के पक्वाशय में पहुँच जाने पर विरेचन के लिए प्रयोग करे।

च. सू. २/११

। ॥ ११ ॥

पाटला, अग्निमन्थ, बिल्व (बेल) और श्योनाक, काश्मर्य, शालपर्णी, पृश्निपर्णी और निदिग्धिका,

च. सू. २/१२

। ॥ १२ ॥

बला, श्वदंष्ट्रा (गोखरू), बृहती, पुनर्नवा सहित एरण्ड (अरंड), यव (जौ), कुलत्थ (कुलथी), कोल (बेर), गुडूची (गिलोय) और मदन (मैनफल),

च. सू. २/१३

। ॥ १३ ॥

पलाश (ढाक), कत्तृण, स्नेह (घी, तेल आदि) और लवण (नमक), (इन्हें वैद्य) उदावर्त में, विबन्धों (मल आदि के रुकने) में और आस्थापनों (आस्थापन बस्तियों) में प्रयोग करे।

च. सू. २/१४

। ॥ १४ ॥

इसी औषध-गण (औषधियों के समूह) से मारुत (वात) को नष्ट करने वाला अनुवासन बनाया जाना चाहिए। इस प्रकार पञ्चकर्म सम्बन्धी संग्रह (औषधियों का संकलन) कहा गया।

च. सू. २/१५

। ॥ १५ ॥

उपस्थित (उभरे हुए) दोषों वाले (रोगियों) के लिए (वैद्य) स्नेह और स्वेद के प्रयोग से (उन्हें तैयार करके), मात्रा और काल का विचार करते हुए, वे पञ्चकर्म (पाँच कर्म) करे।

च. सू. २/१६

, । ॥ १६ ॥

युक्ति मात्रा और काल पर आधारित है, (और) सिद्धि (सफलता) युक्ति पर टिकी है। युक्ति को जानने वाला (वैद्य) द्रव्यों का ज्ञान रखने वालों से सदा ऊपर रहता है।

च. सू. २/१७

। ॥ १७ ॥

इसके आगे मैं विविध औषधियों वाली यवागुएँ बताऊँगा, उनसे साध्य (ठीक हो सकने वाले) विविध विकारों (रोगों) की निवृत्ति (दूर करने) के लिए।

च. सू. २/१८

। ॥ १८ ॥

पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और नागर (सोंठ) के साथ सिद्ध की गई (पकाई गई) यवागू दीपनीय (पाचन-अग्नि को जगाने वाली) और शूल को नष्ट करने वाली होती है।

च. सू. २/१९

। , ॥ १९ ॥

दधित्थ (कैथ), बिल्व (बेल), चाङ्गेरी, तक्र (छाछ) और दाडिम (अनार) के साथ सिद्ध की गई (यवागू) पाचनी और ग्राहिणी होती है; वात सहित (अवस्था) में पञ्चमूल से बनी पेया (दी जाती है)।

च. सू. २/२०

। ॥ २० ॥

शालपर्णी, बला, बिल्व (बेल) और पृश्निपर्णी के साथ सिद्ध की गई (पकाई गई), दाडिम (अनार) से खट्टी की गई पेया पित्त और श्लेष्मा (कफ) के अतिसार वाले (रोगियों) के लिए हितकर है।

च. सू. २/२१

। ॥ २१ ॥

आधे जल वाले बकरी के दूध में ह्रीवेर, उत्पल, नागर (सोंठ) और पृश्निपर्णी के साथ सिद्ध की गई (पकाई गई) पेया रक्तातिसार को नष्ट करने वाली है।

च. सू. २/२२

। ॥ २२ ॥

आम सहित (अवस्था) में (वैद्य) अतिविषा (अतीस), अम्ल (खट्टे द्रव्य) और नागर (सोंठ) सहित पेया दे; मूत्रकृच्छ्र में श्वदंष्ट्रा (गोखरू) और कण्टकारी (कटेरी) के साथ (सिद्ध की गई), फाणित सहित (पेया दे)।

च. सू. २/२३

। ॥ २३ ॥

विडङ्ग (वायविडंग), पिप्पलीमूल, शिग्रु (सहजन) और मरिच (काली मिर्च) के साथ तक्र (छाछ) में पकाई गई और सुवर्चिका मिली यवागू क्रिमिघ्नी (कृमियों को नष्ट करने वाली) होती है।

च. सू. २/२४

।, ॥ २४ ॥

मृद्वीका (अंगूर), सारिवा, लाजा (खील), पिप्पली, मधु (शहद) और नागर (सोंठ) से (बनी यवागू) पिपासाघ्नी (प्यास मिटाने वाली) होती है, और सोमराजी के साथ पकाई गई (यवागू) विषघ्नी (विष का नाश करने वाली) होती है।

च. सू. २/२५

। ॥ २५ ॥

वराह (सूअर) के (मांस के) निर्यूह (रस) में पकाई गई यवागू बृंहणी (शरीर को पुष्ट करने वाली) मानी गई है। भूने हुए गवेधुक (के दानों) की, माक्षिक (शहद) मिली (यवागू) कर्शनीया (शरीर को कृश करने वाली) होती है।

च. सू. २/२६

। ॥ २६ ॥

घी से युक्त, बहुत तिलों वाली और लवण (नमक) मिली (यवागू) स्नेहनी (शरीर में स्निग्धता लाने वाली) होती है। कुश और आमलक (आँवला) के निर्यूह (काढ़े) में (पकाई गई) श्यामाक (साँवा) की (यवागू) विरूक्षणी (रूखापन लाने वाली) होती है।

च. सू. २/२७

। ॥ २७ ॥

दशमूली के साथ पकाई गई (यवागू) कास (खाँसी), हिक्का (हिचकी), श्वास और कफ को दूर करने वाली होती है। यमक (घी और तेल के मेल) में और मदिरा के साथ पकाई गई (यवागू) पक्वाशय की पीड़ा को दूर करने वाली होती है।

च. सू. २/२८

। ॥ २८ ॥

शाक (साग-सब्ज़ी), मांस, तिल और माष (उड़द) के साथ पकाई गई (यवागू) वर्च (मल) को बाहर निकालती है। जम्बू (जामुन) और आम्र (आम) की गुठली, दधित्थ (कैथ), अम्ल (खट्टा पदार्थ) और बिल्व (बेल) के साथ (पकाई गई यवागू) साङ्ग्राहिकी (मल को बाँधने वाली) मानी गई है।

च. सू. २/२९

।॥ २९ ॥

क्षार, चित्रक, हिङ्गु (हींग) और अम्लवेतस के साथ (पकाई गई यवागू) भेदिनी (बँधे मल को तोड़कर निकालने वाली) मानी गई है। अभया (हरीतकी), पिप्पलीमूल और विश्व (सोंठ) के साथ (पकाई गई यवागू) वातानुलोमनी (वात का अनुलोमन करने वाली) होती है।

च. सू. २/३०

। ॥ ३० ॥

तक्र (छाछ) में पकाई गई यवागू घृत-व्यापत्ति (घी से हुई गड़बड़ी) का नाश करने वाली होती है। तैल-व्यापद् (तेल से हुई गड़बड़ी) में तक्र और पिण्याक (खली) के साथ पकाई गई (यवागू) प्रशस्त (उत्तम) होती है।

च. सू. २/३१

। ॥ ३१ ॥

गव्य (गाय के) मांस-रस के साथ (पकाई गई), अम्ल (खट्टा पदार्थ) मिली (यवागू) विषमज्वर का नाश करने वाली होती है। यवों (जौ) की, यमक (घी और तेल) में पिप्पली और आमलक (आँवला) के साथ पकाई गई (यवागू) कण्ठ्य (गले के लिए हितकर) होती है।

च. सू. २/३२

। ॥ ३२ ॥

ताम्रचूड (मुर्गे) के (मांस के) रस में पकाई गई (यवागू) रेतोमार्ग (वीर्य के मार्ग) की पीड़ा को दूर करने वाली होती है। माष (उड़द) की दाल सहित, घी और दूध के साथ पकाई गई (यवागू) वृष्य (पौरुष बढ़ाने वाली) होती है।

च. सू. २/३३

। ॥ ३३ ॥

उपोदिका और दधि (दही) के साथ पकाई गई (यवागू) मद (नशे) का नाश करने वाली होती है। अपामार्ग, क्षीर (दूध) और गोधा (गोह) के रस के साथ पकाई गई (यवागू) क्षुधा (भूख) को मिटा देती है।

च. सू. २/३४

- । ॥ ३४ ॥

इस विषय में (सार रूप) श्लोक (है): इस प्रकार ये अट्ठाईस यवागू बताई गई हैं, और पञ्चकर्मों को आधार बनाकर औषधियों का संग्रह कहा गया है।

च. सू. २/३५

। ॥ ३५ ॥

जो औषध पहले मूल और फल के ज्ञान के लिए कहा गया था, वही फिर से पञ्चकर्म में (उसके) आश्रय (प्रयोग) के ज्ञान के लिए बताया गया है।

च. सू. २/३६

। ॥ ३६ ॥

स्मृतिमान् (अच्छी स्मृति वाला), हेतु और युक्ति को जानने वाला, जितात्मा (अपने मन को वश में रखने वाला) और प्रतिपत्तिमान् (सूझ-बूझ वाला) भिषक् (वैद्य) औषधों के संयोगों से चिकित्सा करने के योग्य होता है।

च. सू. २

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में अपामार्गतण्डुलीय नामक दूसरा अध्याय (पूरा हुआ)।