भूमिका
रसविमान चरक संहिता के विमानस्थान का पहला अध्याय है, और हिन्दी शीर्षक में इसे 'रस का विशेष ज्ञान (आहार-विधि)' कहा गया है। 'विमान' का अर्थ है मान, यानी किसी चीज़ का माप और प्रभाव ठीक-ठीक जानना; रसविमान का अर्थ है रस का विमान, यानी रस का विशेष ज्ञान, और अध्याय का पहला विषय रस ही हैं। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय अपने शिष्य अग्निवेश को देते हैं। आरम्भ में वे बताते हैं कि विमानस्थान क्यों पढ़ाया जा रहा है: रोगों के निमित्त, पूर्वरूप, लक्षण, उपशय आदि समझ लेने के बाद वैद्य को दोष, भेषज (औषध), देश, काल, बल, शरीर, सार, आहार, सात्म्य, सत्त्व (मन), प्रकृति और वय (उम्र) का मान ठीक-ठीक जानना होता है, क्योंकि चिकित्सा इसी ज्ञान पर टिकी है। जो वैद्य यह मान नहीं जानता, वह रोग को वश में नहीं कर सकता।
पहले अध्याय रस, द्रव्य, दोष और विकार (रोग) के प्रभाव बताता है। रस, यानी स्वाद, छह हैं: मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय; और दोष तीन हैं: वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ)। ठीक ढंग से सेवन किए गए रस शरीर को चलाए रखते हैं और गलत ढंग से सेवन किए गए रस दोषों को प्रकुपित करते हैं; दोष अपनी स्वाभाविक अवस्था में शरीर का उपकार करते हैं और बिगड़कर अनेक रोगों से उसे पीड़ा देते हैं। हर दोष को तीन रस बढ़ाते हैं और तीन शान्त करते हैं। इसका नियम गुणों की समानता और विपरीतता है: दोष के समान गुणों वाले रस उसे बढ़ाते हैं, और विपरीत गुणों वाले रस बार-बार सेवन से उसे शान्त करते हैं। रसों और दोषों के मेल अनगिनत हैं, इसलिए अनेक रसों वाले द्रव्य और अनेक दोषों वाले रोग में हर अंश का प्रभाव अलग-अलग परखकर पूरे का निश्चय करने को कहा गया है। पर अध्याय यह भी कहता है कि जहाँ मेल में गुण बदल जाते हैं या एक-दूसरे को दबा देते हैं, वहाँ केवल अंशों के अनुमान से पूरे का प्रभाव नहीं जाना जा सकता; ऐसे में पहले पूरे मेल का प्रभाव जानना होता है।
द्रव्यों के प्रभाव में तैल, सर्पि (घी) और मधु (शहद) क्रम से वात, पित्त और कफ को जीतने वाले कहे गए हैं, क्योंकि उनके गुण उन दोषों के गुणों से उलटे हैं; और जो भी द्रव्य गुणों में दोषों के विपरीत हो, वह लगातार सेवन से उन्हें जीतता है। फिर भगवान् आत्रेय तीन द्रव्यों, पिप्पली, क्षार और लवण (नमक), के अति सेवन से सावधान करते हैं। पिप्पली और लवण आरम्भ में भले होते हैं, पर उनका परिणाम दोषों का संचय है। क्षार के लगातार सेवन से अन्धापन, नपुंसकता, गंजापन और बालों का पकना, और लवण के लगातार सेवन से ग्लानि, शिथिलता, दुर्बलता और असमय झुर्रियाँ बताई गई हैं; इसके उदाहरण में कुछ प्रदेशों के लोग और खारी भूमि गिनाए गए हैं, जहाँ पेड़-पौधे उगते ही नहीं या दुर्बल रहते हैं। जिन्हें अधिक नमक सात्म्य हो गया है, यानी जिनके शरीर को उसकी आदत पड़ गई है, उनके लिए अध्याय कहता है कि उस सात्म्य को क्रम से, धीरे-धीरे छोड़ना श्रेयस्कर है, क्योंकि क्रम से छुड़ाया गया सात्म्य दोष-रहित या थोड़े दोष वाला होता है।
इसके बाद सात्म्य की परिभाषा आती है: सात्म्य वह है जो अपने आप को अनुकूल पड़े। वह प्रवर, अवर और मध्य के भेद से तीन प्रकार का है, और एक-एक रस के छह और सब रसों के एक, इस तरह सात प्रकार का भी। सब रसों का सात्म्य प्रवर है, और अवर और मध्य सात्म्य से क्रम से उस तक पहुँचने को कहा गया है। फिर भी, अध्याय के अनुसार, सब रसों का सात्म्य पा लेने वाले को आहार-विधि के आठ विशेष आयतन (आधार) देखकर हित ही अपनाना है। ये आठ हैं: प्रकृति (द्रव्य का स्वभाव, जैसे भारी या हल्का होना), करण (संस्कार, जिससे द्रव्य में नए गुण आते हैं), संयोग (द्रव्यों का मेल, जो ऐसा प्रभाव पैदा करता है जो अकेले कोई द्रव्य नहीं करता), राशि (पूरे भोजन की और हर द्रव्य की मात्रा), देश (द्रव्य कहाँ उपजता है और कहाँ क्या अनुकूल है), काल (ऋतुओं का समय और रोगी की अवस्था का समय), उपयोगसंस्था (भोजन के नियम, जो पिछले भोजन के पचने पर निर्भर हैं) और उपयोक्ता (खाने वाला, जिस पर अभ्यास से बना सात्म्य निर्भर है)। अध्याय कहता है कि इनके भेद शुभ और अशुभ दोनों फल देते हैं, इसलिए इन्हें जानकर मोह या प्रमाद से ऐसा कुछ न लिया जाए जो प्रिय हो पर अहितकर हो।
अन्त में भोजन की विधि आती है, जिसे चरक संहिता स्वस्थ लोगों और कुछ रोगियों के लिए स्वभाव से ही सबसे हितकर कहती है: भोजन उष्ण, स्निग्ध और उचित मात्रा में हो, पिछला भोजन पच जाने पर खाया जाए, उसके द्रव्यों के वीर्य आपस में विरुद्ध न हों, वह मनचाहे स्थान पर और मनचाही सामग्री के साथ, न बहुत जल्दी और न बहुत देर लगाकर, बिना बोले, बिना हँसे, मन लगाकर, और अपने आप को परखकर खाया जाए। भगवान् आत्रेय हर नियम का लाभ बताते हैं, और कई नियमों को तोड़ने की हानि भी। यह सब ग्रन्थ का वर्णन है, कोई चिकित्सा-सलाह नहीं। गद्य के बाद एक श्लोक आता है: जो रस, द्रव्य, दोष और विकार को उनके प्रभाव से, और देश, काल और शरीर को जानता है, उसे आचार्य अपना भिषक् (वैद्य) कहते हैं; फिर दो संग्रह-श्लोक अध्याय के विषय गिनाते हैं। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि आहार और औषध का हित या अहित उनके रस और गुणों पर ही नहीं, उनके मेल, मात्रा, समय और खाने वाले पर भी निर्भर है, और इन सबका मान ठीक-ठीक जानना ही वह ज्ञान है जिसके लिए विमानस्थान पढ़ाया गया है।