भारत संहिता

अध्याय १

रसविमानम्

रस का विशेष ज्ञान (आहार-विधि)

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भूमिका

रसविमान चरक संहिता के विमानस्थान का पहला अध्याय है, और हिन्दी शीर्षक में इसे 'रस का विशेष ज्ञान (आहार-विधि)' कहा गया है। 'विमान' का अर्थ है मान, यानी किसी चीज़ का माप और प्रभाव ठीक-ठीक जानना; रसविमान का अर्थ है रस का विमान, यानी रस का विशेष ज्ञान, और अध्याय का पहला विषय रस ही हैं। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय अपने शिष्य अग्निवेश को देते हैं। आरम्भ में वे बताते हैं कि विमानस्थान क्यों पढ़ाया जा रहा है: रोगों के निमित्त, पूर्वरूप, लक्षण, उपशय आदि समझ लेने के बाद वैद्य को दोष, भेषज (औषध), देश, काल, बल, शरीर, सार, आहार, सात्म्य, सत्त्व (मन), प्रकृति और वय (उम्र) का मान ठीक-ठीक जानना होता है, क्योंकि चिकित्सा इसी ज्ञान पर टिकी है। जो वैद्य यह मान नहीं जानता, वह रोग को वश में नहीं कर सकता।

पहले अध्याय रस, द्रव्य, दोष और विकार (रोग) के प्रभाव बताता है। रस, यानी स्वाद, छह हैं: मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय; और दोष तीन हैं: वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ)। ठीक ढंग से सेवन किए गए रस शरीर को चलाए रखते हैं और गलत ढंग से सेवन किए गए रस दोषों को प्रकुपित करते हैं; दोष अपनी स्वाभाविक अवस्था में शरीर का उपकार करते हैं और बिगड़कर अनेक रोगों से उसे पीड़ा देते हैं। हर दोष को तीन रस बढ़ाते हैं और तीन शान्त करते हैं। इसका नियम गुणों की समानता और विपरीतता है: दोष के समान गुणों वाले रस उसे बढ़ाते हैं, और विपरीत गुणों वाले रस बार-बार सेवन से उसे शान्त करते हैं। रसों और दोषों के मेल अनगिनत हैं, इसलिए अनेक रसों वाले द्रव्य और अनेक दोषों वाले रोग में हर अंश का प्रभाव अलग-अलग परखकर पूरे का निश्चय करने को कहा गया है। पर अध्याय यह भी कहता है कि जहाँ मेल में गुण बदल जाते हैं या एक-दूसरे को दबा देते हैं, वहाँ केवल अंशों के अनुमान से पूरे का प्रभाव नहीं जाना जा सकता; ऐसे में पहले पूरे मेल का प्रभाव जानना होता है।

द्रव्यों के प्रभाव में तैल, सर्पि (घी) और मधु (शहद) क्रम से वात, पित्त और कफ को जीतने वाले कहे गए हैं, क्योंकि उनके गुण उन दोषों के गुणों से उलटे हैं; और जो भी द्रव्य गुणों में दोषों के विपरीत हो, वह लगातार सेवन से उन्हें जीतता है। फिर भगवान् आत्रेय तीन द्रव्यों, पिप्पली, क्षार और लवण (नमक), के अति सेवन से सावधान करते हैं। पिप्पली और लवण आरम्भ में भले होते हैं, पर उनका परिणाम दोषों का संचय है। क्षार के लगातार सेवन से अन्धापन, नपुंसकता, गंजापन और बालों का पकना, और लवण के लगातार सेवन से ग्लानि, शिथिलता, दुर्बलता और असमय झुर्रियाँ बताई गई हैं; इसके उदाहरण में कुछ प्रदेशों के लोग और खारी भूमि गिनाए गए हैं, जहाँ पेड़-पौधे उगते ही नहीं या दुर्बल रहते हैं। जिन्हें अधिक नमक सात्म्य हो गया है, यानी जिनके शरीर को उसकी आदत पड़ गई है, उनके लिए अध्याय कहता है कि उस सात्म्य को क्रम से, धीरे-धीरे छोड़ना श्रेयस्कर है, क्योंकि क्रम से छुड़ाया गया सात्म्य दोष-रहित या थोड़े दोष वाला होता है।

इसके बाद सात्म्य की परिभाषा आती है: सात्म्य वह है जो अपने आप को अनुकूल पड़े। वह प्रवर, अवर और मध्य के भेद से तीन प्रकार का है, और एक-एक रस के छह और सब रसों के एक, इस तरह सात प्रकार का भी। सब रसों का सात्म्य प्रवर है, और अवर और मध्य सात्म्य से क्रम से उस तक पहुँचने को कहा गया है। फिर भी, अध्याय के अनुसार, सब रसों का सात्म्य पा लेने वाले को आहार-विधि के आठ विशेष आयतन (आधार) देखकर हित ही अपनाना है। ये आठ हैं: प्रकृति (द्रव्य का स्वभाव, जैसे भारी या हल्का होना), करण (संस्कार, जिससे द्रव्य में नए गुण आते हैं), संयोग (द्रव्यों का मेल, जो ऐसा प्रभाव पैदा करता है जो अकेले कोई द्रव्य नहीं करता), राशि (पूरे भोजन की और हर द्रव्य की मात्रा), देश (द्रव्य कहाँ उपजता है और कहाँ क्या अनुकूल है), काल (ऋतुओं का समय और रोगी की अवस्था का समय), उपयोगसंस्था (भोजन के नियम, जो पिछले भोजन के पचने पर निर्भर हैं) और उपयोक्ता (खाने वाला, जिस पर अभ्यास से बना सात्म्य निर्भर है)। अध्याय कहता है कि इनके भेद शुभ और अशुभ दोनों फल देते हैं, इसलिए इन्हें जानकर मोह या प्रमाद से ऐसा कुछ न लिया जाए जो प्रिय हो पर अहितकर हो।

अन्त में भोजन की विधि आती है, जिसे चरक संहिता स्वस्थ लोगों और कुछ रोगियों के लिए स्वभाव से ही सबसे हितकर कहती है: भोजन उष्ण, स्निग्ध और उचित मात्रा में हो, पिछला भोजन पच जाने पर खाया जाए, उसके द्रव्यों के वीर्य आपस में विरुद्ध न हों, वह मनचाहे स्थान पर और मनचाही सामग्री के साथ, न बहुत जल्दी और न बहुत देर लगाकर, बिना बोले, बिना हँसे, मन लगाकर, और अपने आप को परखकर खाया जाए। भगवान् आत्रेय हर नियम का लाभ बताते हैं, और कई नियमों को तोड़ने की हानि भी। यह सब ग्रन्थ का वर्णन है, कोई चिकित्सा-सलाह नहीं। गद्य के बाद एक श्लोक आता है: जो रस, द्रव्य, दोष और विकार को उनके प्रभाव से, और देश, काल और शरीर को जानता है, उसे आचार्य अपना भिषक् (वैद्य) कहते हैं; फिर दो संग्रह-श्लोक अध्याय के विषय गिनाते हैं। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि आहार और औषध का हित या अहित उनके रस और गुणों पर ही नहीं, उनके मेल, मात्रा, समय और खाने वाले पर भी निर्भर है, और इन सबका मान ठीक-ठीक जानना ही वह ज्ञान है जिसके लिए विमानस्थान पढ़ाया गया है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २७-२८)

तत्र श्लोकौविमानार्थो रसद्रव्यदोषरोगाः प्रभावतः।द्रव्याणि नातिसेव्यानि त्रिविधं सात्म्यमेव च॥

श्लोक २७ →

इस विषय में (संग्रह के) दो श्लोक (हैं): विमान का अर्थ (प्रयोजन), प्रभाव के अनुसार रस, द्रव्य, दोष और रोग, अधिक सेवन न करने योग्य द्रव्य, और तीन प्रकार का सात्म्य भी,

आहारायतनान्यष्टौ भोज्यसाद्गुण्यमेव च।विमाने रससंख्याते सर्वमेतत् प्रकाशितम्॥

श्लोक २८ →

आहार के आठ आयतन (आधार) और भोज्य (भोजन) का साद्गुण्य (गुणकारिता) भी, यह सब रससंख्यात (रस नाम वाले) विमान में प्रकाशित (बताया गया) है।

मुख्य शब्द (२२) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. वि. १/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम रसविमान (रस आदि के विशेष मान, यानी विशेष ज्ञान, सम्बन्धी अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. वि. १/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. वि. १/३

, । । ॥ ३ ॥

यहाँ (इस शास्त्र में), रोगों के निमित्त (कारण), पूर्वरूप, रूप (लक्षण), उपशय, संख्या, प्राधान्य, विधि, विकल्प और बल-काल-विशेष को भली-भाँति समझ लेने के बाद, वैद्य को सावधान मन से दोष, भेषज (औषध), देश, काल, बल, शरीर, सार, आहार, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति और वय (आयु) का मान (माप) यथावत् (ठीक-ठीक) जानना होता है, क्योंकि क्रिया (चिकित्सा) दोष आदि के मान के ज्ञान पर आश्रित है। दोष आदि के मान को न जानने वाला वैद्य रोग को वश में करने में समर्थ नहीं होता। इसलिए, हे अग्निवेश, दोष आदि के मान के ज्ञान के लिए हम विमानस्थान का उपदेश करेंगे।

च. वि. १/४

। षट् - । , ॥ ४ ॥

वहाँ (इस अध्याय में) पहले हम रस, द्रव्य, दोष और विकार (रोग) के प्रभाव बताएँगे। रस तो छह हैं: मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय। वे ठीक ढंग से उपयोग (सेवन) किए जाने पर शरीर को चलाए रखते हैं, परन्तु गलत ढंग से उपयोग किए जाने पर निश्चय ही दोषों के प्रकोप (बिगड़कर बढ़ने) के कारण बनते हैं।

च. वि. १/५

। , ॥ ५ ॥

और दोष तीन हैं: वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ)। वे प्रकृति (अपनी स्वाभाविक अवस्था) में रहते हुए शरीर का उपकार करने वाले होते हैं, परन्तु विकृति (बिगड़ी हुई अवस्था) को प्राप्त होने पर निश्चय ही अनेक प्रकार के विकारों (रोगों) से शरीर को पीड़ित करते हैं।

च. वि. १/६

, । - , ; , ; , ॥ ६ ॥

उनमें (इन रसों में), एक-एक दोष को तीन-तीन रस उत्पन्न करते हैं, और तीन-तीन (रस उसे) शान्त करते हैं। जैसे: कटु, तिक्त और कषाय वात को उत्पन्न करते हैं, और मधुर, अम्ल और लवण इसे शान्त करते हैं; कटु, अम्ल और लवण पित्त को उत्पन्न करते हैं, और मधुर, तिक्त और कषाय इसे शान्त करते हैं; मधुर, अम्ल और लवण श्लेष्मा (कफ) को उत्पन्न करते हैं, और कटु, तिक्त और कषाय इसे शान्त करते हैं।

च. वि. १/७

, । , ॥ ७ ॥

रस और दोष के सन्निपात (मेल) में तो, जो रस जिन दोषों के समान गुणों वाले या अधिकतर समान गुणों वाले होते हैं, वे उन (दोषों) को बढ़ाते हैं; (और जो) विपरीत गुणों वाले या अधिकतर विपरीत गुणों वाले (होते हैं, वे) बार-बार सेवन किए जाने पर (उन्हें) शान्त करते हैं। इसी व्यवस्था के लिए, परस्पर असंसृष्ट (आपस में न मिले हुए) रसों का छह होना, और दोषों का तीन होना बताया जाता है।

च. वि. १/८

, ॥ ८ ॥

क्योंकि इनके (रसों और दोषों के) संसर्ग (आपसी मेल) के विकल्पों (प्रकारों) का विस्तार अपरिसंख्येय (गिना न जा सकने वाला) होता है, क्योंकि विकल्पों के भेद अनगिनत हैं।

च. वि. १/९

॥ ९ ॥

ऐसी स्थिति में तो, अनेक रसों वाले द्रव्यों में और अनेक दोषों से बने विकारों (रोगों) में, (वैद्य) रस और दोष के प्रभाव को एक-एक करके भली-भाँति परखकर, उसके बाद द्रव्य और विकार के प्रभाव का तत्त्व (वास्तविक स्वरूप) निश्चित करे।

च. वि. १/१०

। ॥ १० ॥

परन्तु ऐसा निश्चय ही सब जगह नहीं (होता)। क्योंकि जो (द्रव्य) विकृति से विषम रूप में मिले हुए हैं, अनेक स्वभावों वाले हैं, आपस में एक-दूसरे से उपहत (प्रभाव में दबाए गए) हैं, और दूसरे विकल्पनों (बदलावों) से बदले गए हैं, उनके समुदाय (पूरे मेल) के प्रभाव का तत्त्व केवल अवयवों (अंशों) के प्रभाव के अनुमान से निश्चित करना सम्भव नहीं है।

च. वि. १/११

॥ ११ ॥

ऐसे मिले हुए समुदय (मेल) में तो, (वैद्य) समुदाय के प्रभाव का तत्त्व इसी प्रकार जानकर, उसके बाद द्रव्य और विकार के प्रभाव का तत्त्व निश्चित करे।

च. वि. १/१२

॥ १२ ॥

इसलिए हम रस के प्रभाव (असर) की दृष्टि से, द्रव्य के प्रभाव की दृष्टि से, दोष के प्रभाव की दृष्टि से और विकार के प्रभाव की दृष्टि से तत्त्व (वास्तविक स्वरूप) का उपदेश करेंगे।

च. वि. १/१३

। । ॥ १३ ॥

उनमें से यह रस का प्रभाव बताया जा चुका है। अब हम द्रव्य का प्रभाव बताएँगे। तैल (तेल), सर्पि (घी) और मधु (शहद) ऐसे द्रव्य हैं जो (क्रम से) वात, पित्त और श्लेष्मा को शान्त करने के लिए हैं।

च. वि. १/१४

; , , । , ; । , ; । ॥ १४ ॥

उनमें तैल (तेल) स्नेह (चिकनाई), उष्णता (गरमी) और गुरुता (भारीपन) से युक्त होने के कारण, निरन्तर सेवन किए जाने पर, वात को जीत लेता है (शान्त करता है); क्योंकि वात रूक्षता (रूखेपन), शीतता (ठंडक) और लघुता (हल्केपन) से युक्त होकर (तैल के) विरुद्ध गुणों वाला होता है, और विरुद्ध गुणों के मिलने पर अधिक के द्वारा अल्प (कम) जीत लिया जाता है; इसलिए निरन्तर सेवन किया जाता हुआ तैल वात को जीत लेता है। सर्पि (घी) ठीक इसी प्रकार मधुरता, शीतता और मन्दता के कारण पित्त को जीत लेता है; क्योंकि पित्त अमधुर (मधुर नहीं), उष्ण और तीक्ष्ण होता है। और मधु (शहद) रूक्षता, तीक्ष्णता और कषाय (कसैला) होने के कारण श्लेष्मा (कफ) को जीत लेता है; क्योंकि श्लेष्मा स्निग्ध (चिकना), मन्द और मधुर होता है। और जो कोई अन्य द्रव्य भी इसी प्रकार गुणों में वात, पित्त और कफ के विपरीत हो, वह भी निरन्तर सेवन किए जाने पर इन्हें जीत लेता है।

च. वि. १/१५

; - पिप्पली, , ॥ १५ ॥

अब, तीन द्रव्यों का सेवन अन्य द्रव्यों की अपेक्षा अधिक, अति मात्रा में, नहीं करना चाहिए; वे इस प्रकार हैं - पिप्पली, क्षार (खार) और लवण (नमक)।

च. वि. १/१६

; ; , ; ; - , , ; ; ॥ १६ ॥

क्योंकि पिप्पलियाँ कटु (तीखी) होती हुई भी मधुर विपाक वाली, गुरु (भारी), बहुत अधिक स्निग्ध और उष्ण नहीं, प्रक्लेदी (क्लेद अर्थात् गीलापन उत्पन्न करने वाली) और भेषज (औषध) के रूप में मानी गई हैं; वे तुरन्त शुभ और अशुभ (दोनों प्रकार का फल) करने वाली होती हैं; प्रयोग के साथ (रहने वाले) अच्छे गुणों के कारण वे आपातभद्र (केवल आरम्भ में भली) होती हैं, (पर) उनका परिणाम दोषों का संचय होता है; क्योंकि निरन्तर सेवन की जाने पर वे गुरु और प्रक्लेदी होने के कारण श्लेष्मा को उत्क्लिष्ट कर देती (उभार देती) हैं, उष्णता के कारण पित्त को, और स्नेह तथा उष्णता थोड़ी होने के कारण वे वात को शान्त करने में समर्थ नहीं होतीं; परन्तु वे योगवाही अवश्य होती हैं; इसलिए पिप्पलियों का अति मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए।

च. वि. १/१७

, ; । , - ; क्षारं ॥ १७ ॥

और क्षार (खार) उष्णता, तीक्ष्णता और लघुता (हल्केपन) से युक्त होकर पहले क्लेद (गीलापन) उत्पन्न करता है, बाद में सुखा देता है; उसका उपयोग पचन (पकाने), दहन (जलाने) और भेदन (फोड़ने) के लिए किया जाता है; अति मात्रा में प्रयोग किया जाता हुआ वह केश (बाल), अक्षि (आँख), हृदय और पुंस्त्व (पुरुषत्व) की हानि करने वाला हो जाता है। जो ग्राम (गाँव), नगर, निगम (कस्बे) और जनपद (प्रदेश) (के लोग) निश्चय ही इसका निरन्तर सेवन करते हैं, वे अन्धेपन, नपुंसकता, गंजेपन और बालों के पकने से ग्रस्त और हृदय में काटने जैसी पीड़ा वाले होते हैं, जैसे कि प्राच्य (पूर्व के निवासी) और चीन (के निवासी); इसलिए क्षार का अति मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए।

च. वि. १/१८

, , , , , , , , ।। । , । - ; । । । ॥ १८ ॥

और लवण (नमक) उष्णता और तीक्ष्णता से युक्त है, बहुत गुरु (भारी) नहीं, बहुत स्निग्ध (चिकना) नहीं, उपक्लेदी (गीलापन लाने वाला), विस्रंसन (मल को ढीला कर नीचे सरकाने) में समर्थ और अन्न-द्रव्यों में रुचि उत्पन्न करने वाला है; वह आपातभद्र (केवल आरम्भ में भला) है, क्योंकि उसके अच्छे गुण प्रयोग के बराबर (प्रयोग तक ही) रहते हैं; और परिणाम में दोषों का संचय करने वाला है; वह रोचन (रुचि जगाने), पाचन (पचाने), उपक्लेदन (गीला करने) और विस्रंसन के लिए प्रयोग किया जाता है। अत्यधिक प्रयोग किया जाने पर वह शरीर में ग्लानि, शिथिलता और दुर्बलता उत्पन्न करता है। क्योंकि जो ग्राम (गाँव), नगर, निगम (कस्बे) और जनपद (प्रदेश) (के लोग) इसका निरन्तर प्रयोग करते हैं, वे अधिकतर ग्लानि-युक्त, ढीले मांस और रक्त वाले और कष्ट न सह सकने वाले होते हैं। जैसे - बाह्लीक, सौराष्ट्रिक, सैन्धव और सौवीरक (लोग); क्योंकि वे दूध के साथ भी लवण खाते हैं। और यहाँ भूमि के जो प्रदेश अत्यन्त ऊसर (खारे) हैं, उनमें लवण से दूषित होने के कारण ओषधि, वीरुध्, वनस्पति और वानस्पत्य या तो उगते ही नहीं, या कम तेज (शक्ति) वाले होते हैं। इसलिए लवण का अति मात्रा में प्रयोग नहीं करना चाहिए। जो पुरुष अधिक लवण के अभ्यस्त हैं (जिन्हें अधिक लवण सात्म्य हो गया है), उनके भी असमय ही खालित्य (गंजापन), पालित्य (बालों का पकना) और वलियाँ (झुर्रियाँ) हो जाती हैं।

च. वि. १/१९

। ॥ १९ ॥

इसलिए उनके लिए उस सात्म्य (आदत बन चुकी वस्तु) से क्रम से (धीरे-धीरे) हटना श्रेयस्कर है। क्योंकि सात्म्य भी, यदि क्रम से छुड़ाया जाए, तो दोष-रहित या थोड़े दोष वाला होता है।

च. वि. १/२०

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सात्म्य उसे कहते हैं जो अपने (शरीर) में उपशय करे (अनुकूल बैठे); क्योंकि सात्म्य का अर्थ उपशय (अनुकूलता) ही है। वह (सात्म्य) प्रवर (उत्तम), अवर (हीन) और मध्य के भेद से तीन प्रकार का है; परन्तु एक-एक रस (के सात्म्य) से और सब रसों के उपयोग से (वह) सात प्रकार का है। उनमें सब रसों वाला (सात्म्य) प्रवर है, एक रस वाला अवर है, और प्रवर और अवर के बीच में स्थित (सात्म्य) मध्य है। उनमें अवर और मध्य सात्म्यों से क्रम से ही प्रवर सात्म्य को प्राप्त करना चाहिए। और सब रसों वाले सात्म्य को प्राप्त हुआ (व्यक्ति) भी, प्रकृति से लेकर आठवें उपयोक्ता तक, आहार-विधि के सब विशेष आयतनों (आधारों) को भली-भाँति देखकर हित का ही अनुसरण करे।

च. वि. १/२१

; - ()॥ २१ ॥

उनमें निश्चय ही ये आठ आहार-विधि-विशेषायतन (आहार-विधि के विशेष आधार) हैं; जैसे - प्रकृति, करण, संयोग, राशि, देश, काल, उपयोगसंस्था और आठवाँ उपयोक्ता (हैं)।

च. वि. १/२२

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उनमें, प्रकृति उसे कहते हैं जो स्वभाव है; और वह (प्रकृति) आहार और औषध के द्रव्यों का गुरु आदि गुणों से स्वाभाविक योग है; जैसे - माष (उड़द) और मुद्ग (मूँग) का, तथा शूकर (सूअर) और एण (हिरण) का। और करण स्वाभाविक (प्राकृतिक अवस्था वाले) द्रव्यों का अभिसंस्कार (संस्कार करना) है। क्योंकि संस्कार दूसरे गुणों का आधान (डालना) कहलाता है। वे गुण जल और अग्नि के सम्पर्क, शौच (शुद्ध करना), मन्थन (मथना), देश, काल, वासन (सुगन्धित करना), भावन (द्रव में भिगोकर भावित करना) आदि से, और काल-प्रकर्ष (समय बीतना), भाजन (पात्र) आदि से डाले जाते हैं। और संयोग दो या बहुत-से द्रव्यों का एक साथ मिल जाना है; वह (संयोग) ऐसा विशेष (प्रभाव) उत्पन्न करता है, जिसे द्रव्य अलग-अलग उत्पन्न नहीं करते; जैसे - मधु (शहद) और सर्पि (घी) का, तथा मधु, मत्स्य (मछली) और पय (दूध) का संयोग। और राशि (का अर्थ) सर्वग्रह और परिग्रह है, जो मात्रा और अमात्रा (उचित और अनुचित मात्रा) के फल का निश्चय करने के लिए है। उनमें, सारे आहार की मात्रा का एक पिण्ड के रूप में (एक साथ) ग्रहण सर्वग्रह है, और आहार के द्रव्यों की मात्रा का एक-एक करके ग्रहण परिग्रह है। क्योंकि सबका (एक साथ) ग्रहण सर्वग्रह है, और सब ओर से (हर एक का) ग्रहण परिग्रह कहलाता है। और देश स्थान है; वह द्रव्यों की उत्पत्ति और प्रचार (फैलाव) को, और देश-सात्म्य को बताता है। काल तो नित्यग (सदा चलने वाला) भी है और आवस्थिक (अवस्था से जुड़ा) भी; उनमें आवस्थिक (काल) विकार (रोग) की अपेक्षा रखता है, परन्तु नित्यग (काल) ऋतु-सात्म्य की अपेक्षा रखता है। और उपयोगसंस्था उपयोग (भोजन करने) का नियम है; वह जीर्ण (भोजन पचने) के लक्षणों की अपेक्षा रखता है। और उपयोक्ता वह है जो उस आहार का उपयोग करता है, (और) जिस पर ओकसात्म्य निर्भर है। इस प्रकार आहार-विधि के आठ विशेष आयतनों की व्याख्या हो गई।

च. वि. १/२३

; , ; ॥ २३ ॥

इनके विशेष (भेद) शुभ और अशुभ फल देने वाले, और एक-दूसरे के सहायक होते हैं; (व्यक्ति) उन्हें जानने की इच्छा करे, और जानकर हित चाहने वाला ही हो; और मोह से या प्रमाद से ऐसे किसी आहार-पदार्थ का, या अन्य किसी वस्तु का, सेवन नहीं करना चाहिए जो प्रिय हो (पर) अहितकर हो और जिसका परिणाम दुःख हो।

च. वि. १/२४

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इस विषय में, आहार-विधि का यह विधान स्वस्थ लोगों के लिए, और कुछ रोगियों के लिए भी, जो (उचित) समय पर भोजन करते हैं, स्वभाव से ही सबसे अधिक हितकर होता है: (व्यक्ति) उष्ण (गरम), स्निग्ध (चिकनाई युक्त), उचित मात्रा वाला, (पिछला भोजन) जीर्ण होने (पचने) पर, वीर्य में अविरुद्ध, इष्ट (मनचाहे) स्थान पर, सब इष्ट (मनचाही) सामग्री के साथ, न बहुत जल्दी-जल्दी, न बहुत देर लगाकर, बिना बोले, बिना हँसे, उसी में मन लगाकर, अपने आप को भली-भाँति परखकर (भोजन) खाए।

च. वि. १/२५

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हम उस (आहार-विधि) का साद्गुण्य (गुणकारिता) बताएँगे: उष्ण (गरम भोजन) खाना चाहिए; क्योंकि उष्ण (भोजन) खाते समय स्वादिष्ट लगता है, खा लिए जाने पर उदर की अग्नि को प्रदीप्त करता है, शीघ्र पच जाता है, वात का अनुलोमन करता है (उसे सही दिशा में चलाता है) और श्लेष्मा (कफ) को घटाता है; इसलिए उष्ण (भोजन) खाना चाहिए। स्निग्ध (चिकनाई वाला भोजन) खाना चाहिए; क्योंकि स्निग्ध (भोजन) खाते समय स्वादिष्ट लगता है, खा लिए जाने पर मन्द (न उभरी हुई) अग्नि को प्रदीप्त करता है, शीघ्र पच जाता है, वात का अनुलोमन करता है, शरीर को पुष्ट करता है, इन्द्रियों को दृढ़ करता है, बल की वृद्धि करता है और वर्ण (रंग) को निर्मल बनाता है; इसलिए स्निग्ध (भोजन) खाना चाहिए। मात्रा के अनुसार (उचित मात्रा में) खाना चाहिए; क्योंकि मात्रा के अनुसार खाया हुआ (भोजन) वात, पित्त और कफ को पीड़ित न करता हुआ केवल आयु को ही बढ़ाता है, सुखपूर्वक गुदा तक पहुँच जाता है, ऊष्मा (गर्मी) को नष्ट नहीं करता, और बिना कष्ट के परिपाक (पूरे पाचन) को प्राप्त होता है; इसलिए मात्रा के अनुसार खाना चाहिए। जीर्ण होने पर (पहला भोजन पच जाने पर) खाना चाहिए; क्योंकि अजीर्ण में (पहला भोजन न पचा हो तब) खाने वाले का खाया हुआ आहार, पहले के आहार के अपक्व (न पके) रस को बाद के आहार-रस से मिलाता हुआ, सभी दोषों को शीघ्र प्रकुपित करता है; परन्तु (पहला भोजन) पच जाने पर, जब दोष अपने-अपने स्थान में स्थित हों, अग्नि प्रदीप्त हो, भूख उत्पन्न हो गई हो, स्रोतों के मुख खुल गए हों, डकार शुद्ध हो, हृदय शुद्ध हो, वात का अनुलोमन हो, और वात, मूत्र और पुरीष (मल) के वेग निकल चुके हों, तब खाने वाले का खाया हुआ आहार शरीर की सब धातुओं को दूषित न करता हुआ केवल आयु को ही बढ़ाता है; इसलिए जीर्ण होने पर खाना चाहिए। वीर्य से अविरुद्ध (भोजन) खाना चाहिए; क्योंकि अविरुद्ध वीर्य वाला (भोजन) खाने वाला विरुद्ध वीर्य वाले आहार से उत्पन्न विकारों से ग्रस्त नहीं होता; इसलिए वीर्य से अविरुद्ध (भोजन) खाना चाहिए। इष्ट (मनपसन्द) स्थान में और सब इष्ट उपकरणों (सामग्री) के साथ खाना चाहिए; क्योंकि इष्ट स्थान में खाने वाला, अनिष्ट स्थान से उत्पन्न होने वाले, मन को आघात पहुँचाने वाले भावों से मन के आघात (उद्वेग) को प्राप्त नहीं होता, और उसी प्रकार इष्ट सब उपकरणों से (भी); इसलिए इष्ट स्थान में और वैसे ही सब इष्ट उपकरणों के साथ खाना चाहिए। बहुत जल्दी-जल्दी नहीं खाना चाहिए; क्योंकि बहुत जल्दी-जल्दी खाने वाले को उत्स्नेहन (सम्भवतः भोजन का अपने मार्ग से फिसलना) और अवसादन (सम्भवतः शिथिलता) होता है, भोजन (ठीक से) टिकता नहीं, और भोजन के दोषों और गुणों की पहचान भी निश्चित नहीं होती; इसलिए बहुत जल्दी-जल्दी नहीं खाना चाहिए। बहुत देर लगाकर (बहुत धीरे-धीरे) नहीं खाना चाहिए; क्योंकि बहुत देर लगाकर खाने वाला तृप्ति नहीं पाता, बहुत खा लेता है, भोजन ठण्डा हो जाता है और विषम रूप से पचता है; इसलिए बहुत देर लगाकर नहीं खाना चाहिए। न बोलते हुए, न हँसते हुए, उसी (भोजन) में मन लगाकर खाना चाहिए; क्योंकि बोलते हुए, हँसते हुए या दूसरी ओर मन लगाकर खाने वाले को निश्चय ही वे ही दोष होते हैं, जो बहुत जल्दी-जल्दी खाने वाले को (होते हैं); इसलिए न बोलते हुए, न हँसते हुए, उसी में मन लगाकर खाना चाहिए। अपने आप को भली-भाँति परखकर खाना चाहिए; क्योंकि 'यह मुझे अनुकूल पड़ता है, यह अनुकूल नहीं पड़ता', इस प्रकार इसे (खाने वाले को) अपना आत्मसात्म्य (अपने लिए क्या अनुकूल है) ज्ञात हो जाता है; इसलिए अपने आप को भली-भाँति परखकर खाना चाहिए।

च. वि. १/२६

। ॥ २६ ॥

और इस विषय में (यह श्लोक) है: जो रसों, द्रव्यों, दोषों और विकारों को (उनके) प्रभाव से जानता है, और देश और काल को और शरीर को (भी जानता है), वह हमारा भिषक् (वैद्य) है।

च. वि. १/२७

। ॥ २७ ॥

इस विषय में (संग्रह के) दो श्लोक (हैं): विमान का अर्थ (प्रयोजन), प्रभाव के अनुसार रस, द्रव्य, दोष और रोग, अधिक सेवन न करने योग्य द्रव्य, और तीन प्रकार का सात्म्य भी,

च. वि. १/२८

। प्रकाशितम्॥ २८ ॥

आहार के आठ आयतन (आधार) और भोज्य (भोजन) का साद्गुण्य (गुणकारिता) भी, यह सब रससंख्यात (रस नाम वाले) विमान में प्रकाशित (बताया गया) है।

च. वि. १

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के विमानस्थान में रसविमान नामक पहला अध्याय (पूरा हुआ)।