भारत संहिता

अध्याय २

त्रिविधकुक्षीयविमानम्

कुक्षि (आमाशय) के तीन भाग (आहार की मात्रा)

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भूमिका

त्रिविधकुक्षीयविमान चरक संहिता के विमानस्थान का दूसरा अध्याय है, और हिन्दी शीर्षक में इसे 'कुक्षि (आमाशय) के तीन भाग (आहार की मात्रा)' कहा गया है। इसका नाम इसके पहले उपदेश से पड़ा है, जिसमें भोजन करने वाले से कुक्षि, यानी पेट के भीतर के उस स्थान को जिसमें खाया हुआ आहार जाता है, तीन भागों में बँटा मानने को कहा गया है। 'विमान' का अर्थ है माप, यानी किसी बात की सही मात्रा का ज्ञान, और यह अध्याय आहार की सही मात्रा के बारे में है। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय देते हैं। पिछले अध्याय में आहार-विधि के आठ विशेष आयतन (आधार) गिनाए गए थे: प्रकृति, करण, संयोग, राशि, देश, काल, उपयोगसंस्था और उपयोक्ता। यह अध्याय उनमें से राशि, यानी आहार की मात्रा, को लेता है, पर आरम्भ में ही यह भी कहता है कि केवल मात्रा ठीक होने से आहार का पूरा फल नहीं मिल जाता, क्योंकि आठों आयतनों के फल अलग-अलग हैं।

पहला उपदेश यह है कि आहार लेने वाला कुक्षि के स्थान के तीन भाग रखे: एक भाग मूर्त, यानी ठोस, आहार के लिए, एक द्रवों के लिए, और एक वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ) के लिए। भगवान् आत्रेय कहते हैं कि इतनी मात्रा में आहार लेने वाले को अनुचित मात्रा के आहार से होने वाला कोई अहित नहीं होता। आहार की मात्रा की दो ही स्थितियाँ हैं, मात्रावत्त्व (उचित मात्रा) और अमात्रावत्त्व (अनुचित मात्रा)। उचित मात्रा वाले आहार के लक्षण ये गिनाए गए हैं: आहार से कुक्षि का न दबना, हृदय का अवरोध न होना, दोनों पार्श्वों (बगलों) का न फटना, उदर का बहुत भारी न होना, इन्द्रियों का तृप्त होना, भूख और प्यास का शान्त होना, खड़े होने, बैठने, लेटने, चलने, साँस लेने और छोड़ने, हँसने और बातचीत करने में सुख बना रहना, सायं और प्रातः आहार का सुख से पच जाना, और बल, वर्ण (शरीर का रंग और कान्ति) और उपचय (शरीर की पुष्टि) का बढ़ना।

अनुचित मात्रा दो प्रकार की है, हीन (बहुत कम) और अधिक। अध्याय के अनुसार बहुत कम आहार बल, वर्ण और पुष्टि को घटाता है, तृप्ति नहीं देता, उदावर्त करता है, आयु, वृष्यता (पुरुषत्व) और ओज के लिए अहितकर है, शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों को हानि पहुँचाता है, सार को नष्ट करता है, अलक्ष्मी (दुर्भाग्य) लाता है और अस्सी वात-विकारों का आधार बनता है। बहुत अधिक आहार को कुशल वैद्य सब दोषों को प्रकुपित करने वाला मानते हैं। कारण यह बताया गया है: जो ठोस आहार से भरपेट तृप्त होकर ऊपर से द्रवों से भी तृप्ति लेता है, उसके आमाशय में स्थित वात, पित्त और कफ दबकर एक साथ प्रकुपित हो जाते हैं, बिना पचे आहार में प्रवेश करते हैं, और या तो उसे कुक्षि के एक भाग में रोक और जकड़ देते हैं, या अचानक ऊपर और नीचे के मार्गों से बाहर निकालते हैं; और हर दोष अपने अलग विकार करता है, जैसे वात शूल और आनाह, पित्त ज्वर और अतीसार, और कफ छर्दि (उल्टी) और अरोचक। फिर अध्याय आम की बात करता है, यानी उस आहार की जो ठीक से पचा नहीं और कच्चा रह गया। आमप्रदोष, यानी आम से होने वाला विकार, केवल अधिक खाने से नहीं होता: गुरु, रूक्ष, शीत, शुष्क, अप्रिय, विष्टम्भी, विदाही, अपवित्र और विरुद्ध अन्न-पान, असमय खाना-पीना, और काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, लज्जा, शोक, मान, उद्वेग और भय से सन्तप्त मन से लिया गया अन्न-पान भी आम को दूषित करता है। एक श्लोक इसे और स्पष्ट करता है: उचित मात्रा में खाया गया पथ्य अन्न भी चिन्ता, शोक, भय, क्रोध, कष्ट देने वाले बिस्तर और जागते रहने से नहीं पचता।

वैद्य आमप्रदोष को दो प्रकार का बताते हैं, विसूचिका और अलसक। विसूचिका में आम ऊपर और नीचे दोनों ओर से निकल पड़ता है। अलसक उसे होता है जो दुर्बल हो, जिसकी अग्नि मन्द हो, जिसमें कफ अधिक हो, जो वात, मूत्र और मल के वेगों को रोकता हो, और जो कठोर, भारी, रूखा, ठण्डा और सूखा अन्न बहुत खाता हो: उसका अन्न-पान वात से दबकर और कफ से मार्ग रुकने के कारण भीतर ही अटका रहता है और बाहर नहीं निकलता, और छर्दि और अतीसार को छोड़कर आमप्रदोष के बाकी लक्षण बहुत बढ़कर दिखते हैं। कभी-कभी दूषित दोष तिरछे फैलकर पूरे शरीर को डण्डे की तरह जकड़ देते हैं; इसे दण्डालसक कहते हैं, और वैद्य इसे असाध्य मानते हैं। जो लोग आदतन विरुद्ध आहार लेते हैं, अध्यशन करते हैं (पहला भोजन पचने से पहले फिर खाते हैं) या अजीर्ण में भोजन करते हैं, उनके आमदोष को आमविष कहा गया है, क्योंकि उसके लक्षण विष जैसे होते हैं; अध्याय इसे परम असाध्य कहता है, क्योंकि यह शीघ्र असर करता है और इसका उपक्रम (उपचार) विरुद्ध है। इसके बाद अध्याय आमप्रदोष की चिकित्सा बताता है: साध्य आम में पहले नमक मिला गरम पानी पिलाकर वमन, फिर स्वेदन और वर्ति से उपचार और उपवास; विसूचिका में पहले लङ्घन, फिर वह क्रम जो विरेचन के बाद अपनाया जाता है; और यदि आहार पच जाने पर भी आमाशय दोष से लिपा हो, कोष्ठ जड़ और भारी हो और भूख न हो, तो भोजन नहीं, बल्कि बचे दोष को पचाने और अग्नि को प्रदीप्त करने वाला औषध, क्योंकि आम से दुर्बल अग्नि दोष, औषध और आहार तीनों को एक साथ नहीं पचा सकती। अध्याय के अनुसार आम से उत्पन्न विकार अपतर्पण से ही शान्त होते हैं, और कुशल वैद्य हर विकार में ऐसा औषध चाहते हैं जो उसके हेतु और व्याधि के विपरीत हो, या वही प्रयोजन सिद्ध करे। आमप्रदोष से मुक्त होने पर, जब दोष पक जाएँ और अग्नि दीप्त हो, दोष, भेषज, देश, काल, बल, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति और वय की परीक्षा करके अभ्यङ्ग, आस्थापन, अनुवासन और स्नेहपान का विधान है। यह सब ग्रन्थ का वर्णन है, कोई चिकित्सा-सलाह नहीं। फिर एक श्लोक कहता है कि आहार-विधि के आठों आयतनों की भली-भाँति परीक्षा करके ही अपने लिए हितकर आहार अपनाया जाए।

अन्त में अग्निवेश आदि शिष्य पूछते हैं कि खाया, चबाया, पिया और चाटा हुआ आहार कहाँ पचता है, और पुनर्वसु आत्रेय उत्तर देते हैं: प्राणी के नाभि और स्तनों के बीच का भाग आमाशय कहलाता है, और चारों प्रकार का आहार वहीं पचता है; वहाँ पचने के बाद वह धमनियों द्वारा सब आशयों (शरीर के स्थानों) में पहुँचता है। अध्याय एक संग्रह-श्लोक पर समाप्त होता है, जो बताता है कि उचित और अनुचित मात्रा वाले आहार के लक्षण और फल अलग-अलग कहे गए। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि उसके अनुसार आहार की उचित मात्रा कुक्षि के तीन भागों से पहचानी जाती है, बहुत कम और बहुत अधिक आहार दोनों हानि करते हैं, और केवल मात्रा ही नहीं, आहार का प्रकार, समय और खाने वाले के मन की दशा भी तय करते हैं कि आहार पचेगा या आमप्रदोष करेगा।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक १९)

तत्र श्लोकःतस्य मात्रावतो लिङ्गं फलं चोक्तं यथायथम्।अमात्रस्य तथा लिङ्गं फलं चोक्तं विभागशः॥

श्लोक १९ →

यहाँ (अध्याय का सार बताने वाला) श्लोक है: उस मात्रावान् (उचित मात्रा वाले आहार) के लक्षण और फल यथोचित रूप से कहे गए हैं; उसी प्रकार अमात्र (अनुचित मात्रा वाले आहार) के लक्षण और फल विभाग करके (अलग-अलग) कहे गए हैं।

मुख्य शब्द (१८) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

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च. वि. २/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम त्रिविधकुक्षीय (कुक्षि के तीन भागों सम्बन्धी) विमान की व्याख्या करेंगे।

च. वि. २/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. वि. २/३

; - , , ; ॥ ३ ॥

आहार का सेवन करने वाला (व्यक्ति) कुक्षि (आमाशय) में आहार के अवकाश (स्थान) के तीन भाग रखे; जैसे कि, एक अवकाश-भाग मूर्त (ठोस) आहार-द्रव्यों के लिए, एक द्रवों के लिए, और एक वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ) के लिए। क्योंकि इतनी आहार-मात्रा का सेवन करने वाला अमात्रा (अनुचित मात्रा) के आहार से उत्पन्न होने वाला कोई भी अशुभ (अहित) नहीं पाता।

च. वि. २/४

, ॥ ४ ॥

और केवल आहार के मात्रावान् (उचित मात्रा वाला) होने से ही आहार के फल की पूरी उत्तमता प्राप्त करना सम्भव नहीं है, क्योंकि प्रकृति आदि आठ आहार-विधि-विशेष-आयतनों (आहार की विधि के विशेष आधारों) के फल अलग-अलग बँटे हुए हैं।

च. वि. २/५

। ॥ ५ ॥

उनमें (उन आठ आधारों में) से, पहले आहार-राशि (आहार की मात्रा) को लेकर, यह (विवेचन) मात्रा और अमात्रा (उचित और अनुचित मात्रा) के फल का निश्चय करने के लिए है। क्योंकि आहार-राशि की विधि का विकल्प (भेद) इतना ही है: मात्रावत्त्व (उचित मात्रा वाला होना) और अमात्रावत्त्व (उचित मात्रा वाला न होना)।

च. वि. २/६

, । - , , , , , , , , ; ॥ ६ ॥

उनमें, मात्रावत्त्व (आहार का उचित मात्रा वाला होना) पहले कुक्षि के भागों के विभाजन द्वारा (संक्षेप में) बताया गया है; उसकी हम फिर विस्तार से व्याख्या करेंगे। जैसे कि, आहार से कुक्षि का न दबना, हृदय का अवरोध न होना, दोनों पार्श्वों (बगलों) का न फटना, उदर का बहुत भारी न होना, इन्द्रियों का तृप्त होना, भूख और प्यास का शान्त होना, खड़े होने, बैठने, लेटने, चलने, साँस लेने और छोड़ने, हँसने और बातचीत करने में सुख बना रहना, सायं और प्रातः सुख से परिणमन (पच जाना), और बल, वर्ण और उपचय (शरीर की पुष्टि) करने वाला होना; ये उचित मात्रा वाले आहार के लक्षण होते हैं।

च. वि. २/७

- , । , । , । , , ॥ ७ ॥

अमात्रावत्त्व (आहार का उचित मात्रा में न होना) तो दो प्रकार का बताते हैं - हीन और अधिक। उनमें, हीन मात्रा वाली आहार-राशि को (विद्वान्) बल, वर्ण और उपचय (शरीर की पुष्टि) का क्षय करने वाली, अतृप्ति करने वाली, उदावर्त करने वाली, न आयु के लिए हितकर न वृष्य (पुरुषत्व बढ़ाने वाली), ओज के लिए अहितकर, शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों को हानि पहुँचाने वाली, सार को नष्ट करने वाली, अलक्ष्मी (दुर्भाग्य) लाने वाली और अस्सी वात-विकारों का आयतन (आधार) बताते हैं; और अतिमात्र (आहार-राशि) को तो कुशल (वैद्य) सब दोषों को प्रकुपित करने वाली मानते हैं। क्योंकि जो (व्यक्ति) ठोस आहार-द्रव्यों से भरपेट तृप्त होकर फिर द्रव पदार्थों से (भी) तृप्ति प्राप्त करता है, उसके आमाशय में स्थित वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ), अतिमात्रा में किए गए आहार से अत्यधिक दबाए जाकर, सभी एक साथ प्रकोप को प्राप्त होते हैं; वे प्रकुपित (दोष) उसी अपरिणत (न पची) आहार-राशि में प्रवेश करके, अन्न के साथ कुक्षि के एक भाग में टिककर (उसे) रोकते और जकड़ते हुए, अथवा अचानक ऊपर और नीचे के मार्गों से (उसे) बाहर निकालते हुए, अतिमात्रा में खाने वाले के (शरीर में) अलग-अलग ये विकार उत्पन्न करते हैं। उनमें वात शूल, आनाह, अङ्गमर्द, मुख का सूखना, मूर्च्छा, भ्रम, अग्नि की विषमता, पार्श्व (पसलियों), पीठ और कमर की जकड़न, सिराओं का सिकुड़ना और स्तम्भन (जकड़न) करता है; पित्त ज्वर, अतीसार, अन्तर्दाह (भीतरी जलन), तृष्णा, मद, भ्रम और प्रलाप (करता है); और श्लेष्मा छर्दि (उल्टी), अरोचक, अविपाक, शीतज्वर, आलस्य और शरीर का भारीपन (करता है)।

च. वि. २/८

, , , ॥ ८ ॥

और (कुशल वैद्य) केवल अतिमात्र आहार-राशि को ही आमप्रदोष उत्पन्न करने वाली नहीं मानते, बल्कि गुरु, रूक्ष, शीत, शुष्क, द्विष्ट (अप्रिय), विष्टम्भी, विदाही, अशुचि (अपवित्र) और विरुद्ध अन्न-पान का सेवन, और असमय (अन्न-पान का) सेवन, अथवा काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, लज्जा, शोक, मान, उद्वेग और भय से सन्तप्त मन वाले (व्यक्ति) द्वारा जो अन्न-पान लिया जाता है, वह भी आम को ही दूषित करता है (अर्थात् आमप्रदोष उत्पन्न करता है)।

च. वि. २/९

।॥ ९ ॥

और इस विषय में (यह श्लोक) है - (उचित) मात्रा में खाया गया और पथ्य अन्न भी चिन्ता, शोक, भय, क्रोध, दुःखशय्या (कष्ट देने वाले बिस्तर) और प्रजागर (जागते रहने) से नहीं पचता।

च. वि. २/१०

- , ॥ १० ॥

वैद्य उस आमप्रदोष को दो प्रकार का बताते हैं - विसूचिका और अलसक।

च. वि. २/११

॥ ११ ॥

उनमें, विसूचिका उसे जानना चाहिए जिसमें आमदोष ऊपर और नीचे (दोनों ओर) निकल पड़ा हो, और जिसका रूप वैसा हो जैसा (पहले) कहा गया है।

च. वि. २/१२

- , । , । , ; , ॥ १२ ॥

(अब) हम अलसक का वर्णन करेंगे: जो दुर्बल है, जिसकी अग्नि अल्प (मन्द) है, जिसमें श्लेष्मा (कफ) अधिक है, जो वात (अधोवायु), मूत्र और पुरीष (मल) के वेगों को रोकता है, और जो स्थिर (कठोर), गुरु (भारी), बहुत अधिक, रूक्ष (रूखा), शीत (ठण्डा) और सूखा अन्न खाता है, उसका वह अन्न-पान अनिल (वात) से दबकर और श्लेष्मा से मार्ग रुक जाने के कारण अत्यधिक लीन (भीतर ही अटका) रहता है, और अलस (निष्क्रिय) होने के कारण बाहर की ओर नहीं निकलता; तब वह छर्दि (वमन) और अतीसार (दस्त) को छोड़कर आमप्रदोष के (अन्य) लक्षण अत्यधिक मात्रा में दिखाता है। और अत्यधिक दूषित हुए दोष, जिनके मार्ग दूषित आम से रुक गए हैं, तिरछे चलते हुए कभी-कभी इसके समूचे शरीर को डण्डे की तरह जकड़ (स्तब्ध कर) देते हैं; तब उसे (वैद्य) दण्डालसक और असाध्य कहते हैं। और जो विरुद्ध (आहार), अध्यशन (पहला भोजन पचने से पहले फिर खाना) और अजीर्ण में भोजन करने का अभ्यस्त है, उसके आमदोष को भिषक् (वैद्य) आमविष कहते हैं, क्योंकि उसके लक्षण विष के समान होते हैं; वह परम असाध्य है, क्योंकि वह शीघ्र असर करता है और उसका उपक्रम (उपचार) विरुद्ध है।

च. वि. २/१३

, । । , ; । । , । , । ॥ १३ ॥

उनमें, जो आम साध्य है, दूषित है और अलसीभूत (निष्क्रिय होकर रुका हुआ) है, उसे पहले (रोगी को) नमक मिला गरम पानी पिलाकर वमन द्वारा निकलवाना चाहिए; उसके बाद स्वेदन और वर्ति-प्रणिधान (औषध की बत्ती रखने) से उपचार करना चाहिए, और इसे उपवास कराना चाहिए। विसूचिका में तो पहले लङ्घन ही (करना चाहिए), और (फिर) विरेचन लिए हुए (रोगी) की तरह आनुपूर्वी (क्रम)। आमप्रदोषों में तो, भोजन के समय, यह देखकर कि (रोगी का) आहार पच चुका है, फिर भी उसका आमाशय दोष से लिपा हुआ है, उसका कोष्ठ स्तिमित (जड़) और भारी है और उसे अन्न की इच्छा नहीं है, उसे शेष दोष को पचाने के लिए और अग्नि को प्रदीप्त करने के लिए औषध पिलाना चाहिए, परन्तु अजीर्ण में भोजन कदापि नहीं; क्योंकि आमप्रदोष से दुर्बल हुई अग्नि दोष, औषध और आहार-समूह को एक साथ पचाने में समर्थ नहीं होती। और भी, आमप्रदोष, आहार और औषध का (यह) विभ्रम (उलझा हुआ मेल) अत्यन्त बलवान् होने के कारण, जिसकी कायाग्नि शान्त हो चुकी है ऐसे निर्बल आतुर (रोगी) को सहसा ही मार डाल सकता है। फिर, आमप्रदोष से उत्पन्न विकारों का शमन अपतर्पण से ही होता है; परन्तु अनुबन्ध होने पर (यानी रोग बना रहे तो), जिन व्याधियों में अपतर्पण किया जा चुका है उनके निग्रह (शमन) में, निमित्त (कारण) के विपरीत औषध को छोड़कर, आतङ्क (रोग) के विपरीत औषध ही, जो जिसके लिए उचित हो, प्रयोग करना चाहिए। और सभी विकारों के निग्रह में भी कुशल (वैद्य) हेतु और व्याधि के विपरीत औषध चाहते हैं, या (ऐसा औषध) जो वही प्रयोजन सिद्ध करे। फिर, जो आमप्रदोष से मुक्त हो गया है, जिसके दोष पूरी तरह पक चुके हैं और जिसकी अग्नि दीप्त है, उसके लिए दोष, भेषज, देश, काल, बल, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति और वय की विभिन्न अवस्थाओं की तथा विकारों की भली-भाँति परीक्षा करके, अभ्यङ्ग, आस्थापन और अनुवासन विधि के अनुसार, और स्नेहपान युक्ति से, प्रयोग करना चाहिए।

च. वि. २/१४

। ॥ १४ ॥

और इस विषय में (यह श्लोक) है: आहार-विधि के आठ आयतनों (आधारों) की भली-भाँति परीक्षा करके (व्यक्ति) अपने लिए हितकर (आहार) का विधान करे। और हितकर (आहार) के उपयोग के विषय में यहाँ जो कोई अन्य मार्ग (उपाय) है, उसे भी अपनाए।

च. वि. २/१५

। ॥ १५ ॥

खाया हुआ, चबाया हुआ, पिया हुआ और चाटा हुआ (आहार) कहाँ पचता है? हे धीर, यह हम आपसे पूछते हैं; हे बुद्धिमान्, वह हमें बताइए।

च. वि. २/१६

। ॥ १६ ॥

इस प्रकार अग्निवेश आदि (अग्निवेश जिनमें प्रमुख थे, उन) शिष्यों द्वारा पूछे जाने पर पुनर्वसु ने तब उन्हें बताया कि आहार कहाँ पचता है।

च. वि. २/१७

। ॥ १७ ॥

प्राणी के नाभि और स्तनों के बीच का (भाग) आमाशय माना गया है। खाया, चबाया, पिया और चाटा हुआ (आहार) यहीं पचता है।

च. वि. २/१८

। ॥ १८ ॥

आमाशय में पहुँचा हुआ आहार पूरी तरह पाक (पाचन) प्राप्त करता है, और पक जाने पर बाद में धमनियों द्वारा सब आशयों (शरीर के सभी स्थानों) में पहुँचता है।

च. वि. २/१९

। ॥ १९ ॥

यहाँ (अध्याय का सार बताने वाला) श्लोक है: उस मात्रावान् (उचित मात्रा वाले आहार) के लक्षण और फल यथोचित रूप से कहे गए हैं; उसी प्रकार अमात्र (अनुचित मात्रा वाले आहार) के लक्षण और फल विभाग करके (अलग-अलग) कहे गए हैं।

च. वि. २

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के विमानस्थान में त्रिविधकुक्षीयविमान नामक दूसरा अध्याय (पूरा हुआ)।