भूमिका
त्रिविधकुक्षीयविमान चरक संहिता के विमानस्थान का दूसरा अध्याय है, और हिन्दी शीर्षक में इसे 'कुक्षि (आमाशय) के तीन भाग (आहार की मात्रा)' कहा गया है। इसका नाम इसके पहले उपदेश से पड़ा है, जिसमें भोजन करने वाले से कुक्षि, यानी पेट के भीतर के उस स्थान को जिसमें खाया हुआ आहार जाता है, तीन भागों में बँटा मानने को कहा गया है। 'विमान' का अर्थ है माप, यानी किसी बात की सही मात्रा का ज्ञान, और यह अध्याय आहार की सही मात्रा के बारे में है। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय देते हैं। पिछले अध्याय में आहार-विधि के आठ विशेष आयतन (आधार) गिनाए गए थे: प्रकृति, करण, संयोग, राशि, देश, काल, उपयोगसंस्था और उपयोक्ता। यह अध्याय उनमें से राशि, यानी आहार की मात्रा, को लेता है, पर आरम्भ में ही यह भी कहता है कि केवल मात्रा ठीक होने से आहार का पूरा फल नहीं मिल जाता, क्योंकि आठों आयतनों के फल अलग-अलग हैं।
पहला उपदेश यह है कि आहार लेने वाला कुक्षि के स्थान के तीन भाग रखे: एक भाग मूर्त, यानी ठोस, आहार के लिए, एक द्रवों के लिए, और एक वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ) के लिए। भगवान् आत्रेय कहते हैं कि इतनी मात्रा में आहार लेने वाले को अनुचित मात्रा के आहार से होने वाला कोई अहित नहीं होता। आहार की मात्रा की दो ही स्थितियाँ हैं, मात्रावत्त्व (उचित मात्रा) और अमात्रावत्त्व (अनुचित मात्रा)। उचित मात्रा वाले आहार के लक्षण ये गिनाए गए हैं: आहार से कुक्षि का न दबना, हृदय का अवरोध न होना, दोनों पार्श्वों (बगलों) का न फटना, उदर का बहुत भारी न होना, इन्द्रियों का तृप्त होना, भूख और प्यास का शान्त होना, खड़े होने, बैठने, लेटने, चलने, साँस लेने और छोड़ने, हँसने और बातचीत करने में सुख बना रहना, सायं और प्रातः आहार का सुख से पच जाना, और बल, वर्ण (शरीर का रंग और कान्ति) और उपचय (शरीर की पुष्टि) का बढ़ना।
अनुचित मात्रा दो प्रकार की है, हीन (बहुत कम) और अधिक। अध्याय के अनुसार बहुत कम आहार बल, वर्ण और पुष्टि को घटाता है, तृप्ति नहीं देता, उदावर्त करता है, आयु, वृष्यता (पुरुषत्व) और ओज के लिए अहितकर है, शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों को हानि पहुँचाता है, सार को नष्ट करता है, अलक्ष्मी (दुर्भाग्य) लाता है और अस्सी वात-विकारों का आधार बनता है। बहुत अधिक आहार को कुशल वैद्य सब दोषों को प्रकुपित करने वाला मानते हैं। कारण यह बताया गया है: जो ठोस आहार से भरपेट तृप्त होकर ऊपर से द्रवों से भी तृप्ति लेता है, उसके आमाशय में स्थित वात, पित्त और कफ दबकर एक साथ प्रकुपित हो जाते हैं, बिना पचे आहार में प्रवेश करते हैं, और या तो उसे कुक्षि के एक भाग में रोक और जकड़ देते हैं, या अचानक ऊपर और नीचे के मार्गों से बाहर निकालते हैं; और हर दोष अपने अलग विकार करता है, जैसे वात शूल और आनाह, पित्त ज्वर और अतीसार, और कफ छर्दि (उल्टी) और अरोचक। फिर अध्याय आम की बात करता है, यानी उस आहार की जो ठीक से पचा नहीं और कच्चा रह गया। आमप्रदोष, यानी आम से होने वाला विकार, केवल अधिक खाने से नहीं होता: गुरु, रूक्ष, शीत, शुष्क, अप्रिय, विष्टम्भी, विदाही, अपवित्र और विरुद्ध अन्न-पान, असमय खाना-पीना, और काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, लज्जा, शोक, मान, उद्वेग और भय से सन्तप्त मन से लिया गया अन्न-पान भी आम को दूषित करता है। एक श्लोक इसे और स्पष्ट करता है: उचित मात्रा में खाया गया पथ्य अन्न भी चिन्ता, शोक, भय, क्रोध, कष्ट देने वाले बिस्तर और जागते रहने से नहीं पचता।
वैद्य आमप्रदोष को दो प्रकार का बताते हैं, विसूचिका और अलसक। विसूचिका में आम ऊपर और नीचे दोनों ओर से निकल पड़ता है। अलसक उसे होता है जो दुर्बल हो, जिसकी अग्नि मन्द हो, जिसमें कफ अधिक हो, जो वात, मूत्र और मल के वेगों को रोकता हो, और जो कठोर, भारी, रूखा, ठण्डा और सूखा अन्न बहुत खाता हो: उसका अन्न-पान वात से दबकर और कफ से मार्ग रुकने के कारण भीतर ही अटका रहता है और बाहर नहीं निकलता, और छर्दि और अतीसार को छोड़कर आमप्रदोष के बाकी लक्षण बहुत बढ़कर दिखते हैं। कभी-कभी दूषित दोष तिरछे फैलकर पूरे शरीर को डण्डे की तरह जकड़ देते हैं; इसे दण्डालसक कहते हैं, और वैद्य इसे असाध्य मानते हैं। जो लोग आदतन विरुद्ध आहार लेते हैं, अध्यशन करते हैं (पहला भोजन पचने से पहले फिर खाते हैं) या अजीर्ण में भोजन करते हैं, उनके आमदोष को आमविष कहा गया है, क्योंकि उसके लक्षण विष जैसे होते हैं; अध्याय इसे परम असाध्य कहता है, क्योंकि यह शीघ्र असर करता है और इसका उपक्रम (उपचार) विरुद्ध है। इसके बाद अध्याय आमप्रदोष की चिकित्सा बताता है: साध्य आम में पहले नमक मिला गरम पानी पिलाकर वमन, फिर स्वेदन और वर्ति से उपचार और उपवास; विसूचिका में पहले लङ्घन, फिर वह क्रम जो विरेचन के बाद अपनाया जाता है; और यदि आहार पच जाने पर भी आमाशय दोष से लिपा हो, कोष्ठ जड़ और भारी हो और भूख न हो, तो भोजन नहीं, बल्कि बचे दोष को पचाने और अग्नि को प्रदीप्त करने वाला औषध, क्योंकि आम से दुर्बल अग्नि दोष, औषध और आहार तीनों को एक साथ नहीं पचा सकती। अध्याय के अनुसार आम से उत्पन्न विकार अपतर्पण से ही शान्त होते हैं, और कुशल वैद्य हर विकार में ऐसा औषध चाहते हैं जो उसके हेतु और व्याधि के विपरीत हो, या वही प्रयोजन सिद्ध करे। आमप्रदोष से मुक्त होने पर, जब दोष पक जाएँ और अग्नि दीप्त हो, दोष, भेषज, देश, काल, बल, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति और वय की परीक्षा करके अभ्यङ्ग, आस्थापन, अनुवासन और स्नेहपान का विधान है। यह सब ग्रन्थ का वर्णन है, कोई चिकित्सा-सलाह नहीं। फिर एक श्लोक कहता है कि आहार-विधि के आठों आयतनों की भली-भाँति परीक्षा करके ही अपने लिए हितकर आहार अपनाया जाए।
अन्त में अग्निवेश आदि शिष्य पूछते हैं कि खाया, चबाया, पिया और चाटा हुआ आहार कहाँ पचता है, और पुनर्वसु आत्रेय उत्तर देते हैं: प्राणी के नाभि और स्तनों के बीच का भाग आमाशय कहलाता है, और चारों प्रकार का आहार वहीं पचता है; वहाँ पचने के बाद वह धमनियों द्वारा सब आशयों (शरीर के स्थानों) में पहुँचता है। अध्याय एक संग्रह-श्लोक पर समाप्त होता है, जो बताता है कि उचित और अनुचित मात्रा वाले आहार के लक्षण और फल अलग-अलग कहे गए। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि उसके अनुसार आहार की उचित मात्रा कुक्षि के तीन भागों से पहचानी जाती है, बहुत कम और बहुत अधिक आहार दोनों हानि करते हैं, और केवल मात्रा ही नहीं, आहार का प्रकार, समय और खाने वाले के मन की दशा भी तय करते हैं कि आहार पचेगा या आमप्रदोष करेगा।