॥ १ ॥
अध्याय ८
रोगभिषग्जितीयं विमानम्
रोग और उसकी चिकित्सा (वैद्य की शिक्षा और परीक्षा)
इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक १५२-१५७)
तत्र श्लोकाः-लक्षणाचार्यशिष्याणां परीक्षा कारणं च यत्।अध्येयाध्यापनविधी संभाषाविधिरेव च॥
श्लोक १५२ →षड्भिरूनानि पञ्चाशद्वादमार्गपदानि च।पदानि दश चान्यानि कारणादीनि तत्त्वतः॥
श्लोक १५३ →संप्रश्नश्च परीक्षादेर्नवको वमनादिषु।भिषग्जितीये रोगाणां विमाने संप्रकाशितः॥
श्लोक १५४ →बहुविधमिदमुक्तमर्थजातं बहुविधवाक्यविचित्रमर्थकान्तम्।बहुविधशुभशब्दसन्धियुक्तं बहुविधवादनिसूदनं परेषाम्॥
श्लोक १५५ →इमां मतिं बहुविधहेतुसंश्रयां विजज्ञिवान् परमतवादसूदनीम्।न सज्जते परवचनावमर्दनैर्न शक्यते परवचनैश्च मर्दितुम्॥
श्लोक १५६ →दोषादीनां तु भावानां सर्वेषामेव हेतुमत्।मानात् सम्यग्विमानानि निरुक्तानि विभागशः॥इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने रोगभिषग्जितीयविमानं नामाष्टमोऽध्यायः॥
श्लोक १५७ →मुख्य शब्द (३०) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
- आत्मन्
- आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार
अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।
चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।
- कर्मन्
- कर्म - क्रिया, गति
विस्तार
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
- युक्ति
- युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार
शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।
अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।
चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।
- भिषज्
- भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
- दोष
- दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
- तमस्
- तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।
चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।
- विशेष
- विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
- गुण
- गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।
चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।
सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।
- द्रव्य
- द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।
आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।
- सामान्य
- सामान्य - समानता; जो वृद्धि का कारण है
विस्तार
शब्द-रचना: समान + य (भाव) - समान होने का भाव।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: सामान्य सदा सब भावों की वृद्धि का कारण है, और एकत्व (एक जैसा बनाना) करता है (सू. १/४४-४५)। उदाहरण के लिए, जिस गुण वाला द्रव्य लिया जाए, वह शरीर में उसी गुण को बढ़ाता है।
- समवाय
- समवाय - अटूट सम्बन्ध, जैसे द्रव्य और उसके गुण का
विस्तार
शब्द-रचना: सम् + अव + √इ (साथ आना)।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: पृथ्वी आदि द्रव्यों का अपने गुणों के साथ कभी अलग न होना (अपृथग्भाव) समवाय है; यह नित्य है (सू. १/५०)।
- हेतु
- हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार
अर्थ: कारण।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।
- इन्द्रिय
- इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
- आरोग्य
- आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार
शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।
अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।
चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।
- औषध
- औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार
शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।
अर्थ: रोग दूर करने का साधन।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।
- भेषज
- भेषज - औषध, उपचार
विस्तार
शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।
अर्थ: औषध, उपचार।
चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।
- धातु
- धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार
शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।
अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।
चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।
व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।
- वमन
- वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार
शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।
- विरेचन
- विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार
शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।
- शरीर
- शरीर - देह
विस्तार
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
- लिङ्ग
- लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
- आयुस्
- आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार
अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।
चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।
- आतुर
- आतुर - रोगी
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।
- विकार
- विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
- वात
- वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
- सत्त्व
- सत्त्व - मन
विस्तार
शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।
चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।
- स्नेह
- स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
- रस
- रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
- श्लेष्मन्
- श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार
शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।
चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।
- पित्त
- पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।
॥ २ ॥
। ; , । ॥ ३ ॥
ततोऽनन्तरमाचार्यं परीक्षेत; तद्यथा-पर्यवदातश्रुतं परिदृष्टकर्माणं दक्षं दक्षिणं शुचिं जितहस्तमुपकरणवन्तं सर्वोन्द्रियोपपन्नं प्रकृतिज्ञं प्रतिपत्तिज्ञमनुपस्कृतनिद्यमनहङ्कृतमनसूयकमकोपनं क्लेशक्षमं शिष्यवत्सलमध्यापकं ज्ञापनसमर्थं चेति।एवंगुणो ह्याचार्यः सुक्षेत्रमार्तवो मेघ इव शस्यगुणैः सुशिष्यमाशु वैद्यगुणैः संपादयति॥ ४ ॥
। ॥ ५ ॥
, , ॥ ६ ॥
तत्रायमध्ययनविधिः-कल्यः कृतक्षणः प्रातरुत्थायोपव्यूषं वा कृत्वाऽऽवश्यकमुपस्पृश्योदकं देवर्षिगोब्राह्मणगुरुवृद्धसिद्धाचार्येभ्यो नमस्कृत्य समे शुचौ देशे सुखोपविष्टो मनःपुरःसराभिर्वाग्भिः सूत्रमनुक्रामन् पुनः पुनरावर्तयेद् बुद्ध्वा सम्यगनुप्रविश्यार्थतत्त्वं स्वदोषपरिहारार्थं परदोषप्रमाणार्थं च; एवं मध्यंदिनेऽपराह्णे रात्रौ च शश्वदपरिहापयन्नध्ययनमभ्यस्येत्।इत्यध्ययनविधिः॥ ७ ॥
अथाध्यापनविधिः-अध्यापने कृतबुद्धिराचार्यः शिष्यमेवादितः परीक्षेत; तद्यथा-प्रशान्तमार्यप्रकृतिकमक्षुद्रकर्माणमृजुचक्षुर्मुखनासावंशं तनुरक्तविशदजिह्वमविकृतदन्तौष्ठममिन्मिनं धृतिमन्तमनहङ्कृतं मेधाविनं वितर्कस्मृतिसंपन्नमुदारसत्त्वं तद्विद्यकुलजमथवा तद्विद्यवृत्तं तत्त्वाभिनिवेशिनमव्यङ्गमन्यापन्नेव्द्रियं निभृतमनुद्धतमर्थतत्त्वभावकमकोपनमव्यसनिनं शीलशौचाचारानुरागदाक्ष्यप्रादक्षिण्योपपन्नमध्ययनाभिकाममर्थविज्ञाने कर्मदर्शने चानन्यकार्यमलुब्धमनलसं सर्वभूतहितैषिणमाचार्यसर्वानुशिष्टिप्रतिकरमनुरक्तं च, एवंगुणसमुदितमध्याप्यमाहुः॥ ८ ॥
॥ ९ ॥
॥ १० ॥
तमुपस्थितमाज्ञाय समे शुवौ देशे प्राक्प्रवणे उदक्प्रवणे वा चतुष्किष्कुमात्रं चतुरस्रं स्थण्डिलं गोमयोदकेनोपलिप्तं कुशास्तीर्णं सुपरिहितं परिधिभिश्चतुर्दिशं यथोक्तचन्दनोदकुम्भक्षौमहेमहिरण्यरजतमणिमुक्ताविद्रुमालङ्कृतं मेध्यभक्ष्यगन्धशुक्लपुष्पलाजसर्षपाक्षतोपशोभितं कृत्वा, तत्र पालाशीभिरैङ्गुदीभिरौदुम्बरीभिर्माधुकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमाधाय प्राङ्मुखः शुचिरध्ययनविधिमनुविधाय मधुसर्पिर्भ्यां त्रिस्त्रिर्जुहुयादग्निमाशीःसंप्रयुकैर्मन्त्रैर्ब्रह्माणमग्निं धन्वन्तरिं प्रजापतिमश्विनाविन्द्रमृषींश्च सूत्रकारानभिमन्त्रयमाणः पूर्वं स्वाहेति॥ ११ ॥
। । ; ॥ १२ ॥
अथैनमग्निसकाशे ब्राह्मणसकाशे भिषक्सकाशे चानुशिष्यात्-ब्रह्मचारिणा श्मश्रुधारिणा सत्यवादिनाऽमांसादेन मेध्यसेविना निर्मत्सरेणाशस्त्रधारिणा च भवितव्यं, न च ते मद्वचनात् किञ्चिदकार्यं स्यादन्यत्र राजद्विष्टात् प्राणहराद्विपुलादधर्म्यादनर्थसंप्रयुक्ताद्वाऽप्यर्थात्; मदर्पणेन मत्प्रधानेन मदधीनेन मत्प्रियहितानुवर्तिना च शश्वद्भवितव्यं, पुत्रवद्दासवदर्थिवच्चोपचरताऽनुवस्तव्योऽहम्, अनुत्सेकेनावहितेनानन्यमनसा विनीतेनावेक्ष्यावेक्ष्यकारिणाऽनसूयकेन चाभ्यनुज्ञातेन प्रविचरितव्यम्, अनुज्ञातेन (चाननुज्ञातेन च) प्रविचरता पूर्वं गुर्वर्थोपाहरणे यथाशक्ति प्रयतितव्यं, कर्मसिद्धिमर्थसिद्धिं यशोलाभं प्रेत्य च स्वर्गमिच्छता भिषजा त्वया गोब्राह्मणमादौ कृत्वा सर्वप्राणभृतां शर्माशासितव्यमहरहरुत्तिष्ठता चोपविशता च, सर्वात्मना चातुराणामारोह्याय प्रयतितव्यं, जीवितहेतोरपि चातुरेभ्यो नाभिद्रोग्धव्यं, मनसाऽपि च परस्त्रियो नाभिगमनीयास्तथा सर्वमेव परस्वं, निभृतवेशपरिच्छदेन भवितव्यम्, अशौण्डेनापापेनापापसहायेन च, श्लक्ष्णशुक्लधर्म्यशर्म्यधन्यसत्यहितमितवचसा देशकालविचारिणा स्मृतिमता ज्ञानोत्थानोपकरणसंपत्सु नित्यं यत्नवता च; न च कदाचिद्राजद्विष्टानां राजद्वेषिणां वा महाजनद्विष्टानां महाजनद्वेषिणां वाऽप्यौषधमनुविधातव्यं, तथा सर्वेषामत्यर्थनिकृतदुष्टदुःखशीलाचारोपचाराणामनपवादप्रतिकाराणां मुमूर्षूणां च, तथैवासन्निहितेश्वराणां स्त्रीणामनध्यक्षाणां वा; न च कदाचित् स्त्रीदत्तमामिषमादातव्यमननुज्ञातं भर्त्राऽथवाऽध्यक्षेण, आतुरकुलं चानुप्रविशता विदितेनानुमतप्रवेशिना सार्धं पुरुषेण सुसंवीतेनावाक्शिरसा स्मृतिमता स्तिमितेनावेक्ष्यावेक्ष्य मनसा सर्वमाचरता सम्यगनुप्रवेष्टव्यम्, अनुप्रविश्य च वाङ्मनोबुद्धीन्द्रियाणि न क्वचित् प्रणिधातव्यान्यन्यत्रातुरादातुरादातुरोपकारार्थादातुरगतेष्वन्येषु वा भावेषु, न चातुरकुलप्रवृत्तयो बहिर्निश्चारयितव्याः, ह्रसितं चायुषः प्रमाणमातुरस्य जानताऽपि त्वया न वर्णयितव्यं तत्र य रोच्यमानमातुरस्यान्यस्य वाऽप्युपघाताय संपद्यते; ज्ञानवताऽपि च नात्यर्थमात्मनो ज्ञाने विकत्थितव्यम्, आप्तादपि हि विकत्थमानादत्यर्थमुद्विजन्त्यनेके॥ १३ ॥
न चैव ह्यस्ति सुतरमायुर्वेदस्य पारं, तस्मादप्रमत्तः शश्वदभियोगमस्मिन् गच्छेत्, एतच्च कार्यम्। एवंभूयश्च वृत्तसौष्ठवमनसूयता परेभ्योऽप्यागमयितव्यं, कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमतामाचार्यः शत्रुश्चाबुद्धिमताम्, अतश्चाभिसमीक्ष्य बुद्धिमताऽमित्रस्यापि धन्यं यशस्यमायुष्यं पौष्टिकं लौक्यमभ्युपदिशतो वचः श्रोतव्यमनुविधातव्यं चेति।अतः परमिदं ब्रूयात्-देवताग्निद्विजगुरुवृद्धसिद्धाचार्येषु ते नित्यं सम्यग्वर्तितव्यं, तेषु ते सम्यग्वर्तमानस्यायमग्निः सर्वगन्धरसरत्नबीजानि यथेरिताश्च देवताः शिवाय स्युः, अतोऽन्यथा वर्तमानस्याशिवायेति।एवं ब्रुवति चाचार्ये शिष्यः ऽतथािति ब्रूयात्।यथोपदेशं च कुर्वन्नध्याप्यः, अतोऽन्यथा त्वनध्याप्यः।अध्याप्यमध्यापयन् ह्याचार्यो यथोक्तैश्चाध्यापनफलैर्योगमाप्नोत्यन्यैश्चानुक्तैः श्रेयस्करैर्गुणैः शिष्यमात्मानं च युनक्ति।इत्यध्यापनविधिरुक्तः॥ १४ ॥
संभाषाविधिमत ऊर्ध्वं व्याख्यास्यामः-भिषक् भिषजा सह संभाषेत।तद्विद्यसंभाषा हि ज्ञानाभियोगसंहर्षकरी भवति, वैशारद्यमपि चाभिमिर्वर्तयति, वचनशक्तिमपि चाधत्ते, यशश्चाभिदीपयति, पूर्वश्रुते च संदेहवतः पुनः श्रवणाच्छ्रुतसंशयमपकर्षति, श्रुते चासंदेहवतो भूयोऽध्यवसायमभिनिर्वर्तयति, अश्रुतमपि च कञ्चिदर्थं श्रोत्रविषयमापादयति, यच्चाचार्यः शिष्याय शुश्रूषवे प्रसन्नः क्रमेणोपदिशति गुह्याभिमतमर्थजातं तत् परस्परेण सह जल्पन् पिण्डेन विजिगीषुराह संहर्षात्, तस्मात्तद्विद्यसंभाषामभिप्रशंसन्ति कुशलाः॥ १५ ॥
, ॥ १६ ॥
तत्र ज्ञानविज्ञानवचनप्रतिवचनशक्तिसंपन्नेनाकोपनेनानुपस्कृतविद्येनानसूयकेनानुनेयेनानुनयकोविदेन क्लेशक्षमेण प्रियसंभाषणेन च सह सन्धायसंभाषा विधीयते।तथाविधेन सह कथयन् विस्रब्धः कथयेत्, पृच्छेदपि च विस्रब्धः, पृच्छते चास्मै विस्रब्धाय विशदमर्थं ब्रूयात्, न च निग्रहभयादुद्विजेत, निगृह्य चैनं न हृष्येत्, न च परेषु विकत्थेत, न च मोहादेकान्तग्राही स्यात्, न चाविदितमर्थमनुवर्णयेत्, सम्यक् चानुनयेनानुनयेत्, तत्र चावहितः स्यात्।इत्यनुलोमसंभाषाविधिः॥ १७ ॥
। । , । ; , ; , । ॥ १८ ॥
तत्र त्रिविधः परः संपद्यते-प्रवरः, प्रत्यवरः, समो वा, गुणविनिक्षेपतः; नत्वेव कार्त्स्नेयन॥ १९ ॥
परिषत्तु खलु द्विविधा-ज्ञानवती, मूढपरिषच्च।सैव द्विविधा सती त्रिविधा पुनरनेन कारणविभागेन-सुहृत्परिषत्, उदासीनपरिषत्, प्रतिनिविष्टपरिषच्चेति।तत्र प्रतिनिविष्टायां परिषदि ज्ञानविज्ञानवचनप्रतिवचनशक्तिसंपन्नायां मूढायां वा न कथंचित् केनचित् सह जल्पो विधीयते; मूढायां तु सुहृत्परिषद्युदासीनायां वा ज्ञानविज्ञानवचनप्रतिवचनशक्तीरन्तरेणाप्यदीप्तयशसा महाजवचिद्विष्टेनापि सह जल्पो विधीयते।तद्विधेन च सह कथयता आविद्धदीर्घसूत्रसंकुलैर्वाक्यदण्डकैः कथयितव्यम्, अतिहृष्टं मुहुर्मुहुरुपहसता परं निरूपयता च पर्षदमाकारैर्ब्रुवतश्चास्य वाक्यावकाशो न देयः; कष्टशब्दं च ब्रुवता वक्तव्यो निच्यते, अथवा पुनर्हीना ते प्रतिज्ञा, इति।पुनश्चाहू(ह्व)यमानः प्रतिवक्तव्यः-परिसंवत्सरो भवान् शिक्षस्व तावत्; न त्वया गुरुरुपासितो नूनम्, अथवा पर्याप्तमेतावत्ते; सकृदपि हि परिक्षेपिकं निहतं निहतमाहुरिति नास्य योगः कर्तव्यः कथञ्चित्।अप्येवं श्रेयसा सह विगृह्य वक्तव्यमित्याहुरेके; नत्वेवं ज्यायसा सह विग्रहं प्रशंसन्ति कुशलाः॥ २० ॥
प्रत्यवरेण तु सह समानाभिमतेन वा विगृह्य जल्पता सुहृत्परिषदि कथयितव्यम्, अथवाऽप्युदासीनपरिषद्यवधानश्रवणज्ञानविज्ञानोपधारणवचनप्रतिवचनशक्तिसंपन्नायां कथयता चावहितेन परस्य साद्गुण्यदोषबलमवेक्षितव्यं, समवेक्ष्य च यत्रैनं श्रेष्ठं मन्येत नास्य तत्र जल्पं योजयेदनाविष्कृतमयोगं कुर्वन्; यत्र त्वेनमवरं मन्येत तत्रैवैनमाशु निगृह्णीयात्।तत्र खल्विमे प्रत्यवराणामाशु निग्रहे भवन्त्युपायाः; तद्यथा-श्रुतहीनं महता सूत्रपाठेनाभिभवेत्, विज्ञानहीनं पुनः कष्टशब्देन वाक्येन, वाक्यधारणाहीनमाविद्धदीर्घसूत्रसंकुलैर्वाक्यदण्डकैः, पतिभाहीनं पुनर्वचनेनैकविधेनानेकार्थवाचिना, वचनशक्तिहीनमर्धोक्तस्य वाक्यस्याक्षेपेण, अविशारदमपत्रपणेन, कोपनमायासनेन, भीरुं वित्रासनेन, अनवहितं नियमनेनेति।एवमेतैरुपायैः परमवरमभिभवेच्छीघ्रम्॥ २१ ॥
तत्र श्लोकौ-विगृह्य कथयेद्य्क्त्या युक्तं च न निवारयेत्।विगृह्यभाषा तीव्रं हि केषांचिद्द्रोहमावहेत्॥ २२ ॥
। ॥ २३ ॥
॥ २४ ॥
, , ; , ॥ २५ ॥
तत्रेदं वादमर्यादालक्षणं भवति-इदं वाच्यम्, इदमवाच्यम्, एवं पराजितो भवतीति॥ २६ ॥
; , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ॥ २७ ॥
तत्र वादो नाम स यत् परेण सह शास्त्रपूर्वकं विगृह्य कथयति।स च द्विविधः संग्रहेण-जल्पः, वितण्डा च।तत्र पक्षाश्रितयोर्वचनं जल्पः, जल्पविपर्ययो वितण्डा।यथा-एकस्य पक्षः पुनर्भवोऽस्तीति, नास्तित्यपरस्य; तौ च स्वस्वपक्षहेतुभिः स्वस्वपक्षं स्थापयतः, परपक्षमुद्भावयतः, एष जल्पः।जल्पविपर्ययो वितण्डा।वितण्डा नाम परपक्षे दोषवचनमात्रमेव॥ २८ ॥
॥ २९ ॥
; ॥ ३० ॥
अथ स्थापना-स्थापना नाम तस्या एव प्रतिज्ञाया हेतुदृष्टान्तोपनयनिगमनैः स्थापना।पूर्वं हि प्रतिज्ञा, पश्चात् स्थापना, किं ह्यप्रतिज्ञातं स्थापन्यिष्यति; यथा-नित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञा; हेतुः-अकृतकत्वादिति; दृष्टान्तः-यथाऽऽकाशमिति; उपनयः-यथा चाकृतकमाकाशं, तच्च नित्यं, तथा पुरुष इति; निगमनं-तस्मान्नित्य इति॥ ३१ ॥
अथ प्रतिष्ठापना-प्रतिष्ठापना नाम या तस्या एव परप्रतिज्ञाया विपरीतार्थस्थापना।यथनित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञा; हेतुः-ऐन्द्रियकत्वादिति; दृष्टान्तः-यथा घ्ट इति, उपनयो-यथा घट ऐन्द्रियकः स चानित्यः, तथा चायमिति; निगमनं-तस्मादनित्य इति॥ ३२ ॥
; , , , ; ॥ ३३ ॥
अथ दृष्टान्तः-दृष्टान्तो नाम यत्र मूर्खविदुषां बुद्धिसाम्यं, यो वर्ण्यं वर्णयति।यथा-अग्निरुष्णाः, द्रवमुदकं, स्थिरा पृथिवी, आदित्यः प्रकाशक इति; यथा आदित्यः प्रकाशकस्तथा सांख्यज्ञानं प्रकाशकमिति॥ ३४ ॥
उपयो निगमनं चोक्तं स्थापनाप्रतिष्ठापनाव्याख्यायाम्॥ ३५ ॥
अथोत्तरम्-उत्तरं नाम साधर्म्योपदिष्टे हेतौ वैधर्म्यवचनं, वैधर्म्योप्दिष्टे वा हेतौ साधर्म्यवचनम्।यथा-ऽहेतुसधर्माणो विकाराः, शीतकस्य हि व्याधेर्हेतुभिः साधर्म्यं हिमशिशिरवातसंस्पर्शाःऽ, इति ब्रुवतः परो ब्रूयात्-हेतुविधर्माणो विकाराः, यथा शरीरावयवानां दाहौष्ण्यकोथप्रपचने हेतुवैधर्म्यं हिमशिशिरवातसंस्पर्शा इति।एतत् सविपर्ययमुत्तरम्॥ ३६ ॥
अथ सिद्धान्तः-सिद्धान्तो नाम स यः परीक्षकैर्बहुविधं परीक्ष्य हेतुभिश्च साधयित्वा स्थाप्यते निर्णयः।स चतुर्विधः-सर्वतन्त्रसिद्धान्तः, प्रतितन्त्रसिद्धान्तः, अधिकरणसिद्धान्तः, अभ्युपगमसिद्धान्तश्चेति।तत्र सर्वतन्त्रसिद्धान्तो नाम तस्मिंस्तस्मिन् सर्वस्मिंस्तन्त्रे तत्तत् प्रसिद्धं; यथा सन्ति निदानानि, सन्ति व्याधयः, सन्ति सिद्ध्युपायाः साध्यानामिति।प्रतितन्त्रसिद्धान्तो नाम तस्मिंस्तस्मिन्नेकैकस्मिंस्तन्त्रे तत्तत् प्रसिद्धं; यथा-अन्यत्राष्टौ रसाः षडत्र, पञ्चेन्द्रियाण्यत्र षडिन्द्रियाण्यन्यत्र तन्त्रे, वातादिकृताः सर्वे विकारा यथाऽन्यत्र, अत्र वातादिकृता भूतकृताश्च प्रसिद्धाः।अधिकरणसिद्धान्तो नाम स यस्मिन्नधिकरणे प्रस्तूयमाने सिद्धान्यन्यान्यप्यधिकरणानि भवन्ति, यथा-ऽन मुक्तः कर्मानुबन्धिकं कुरुते, निस्पृहत्वात्ऽ इति प्रस्तुते सिद्धाः कर्मफलमोक्षपुरुषप्रेत्यभावा भवन्ति।अभ्युपगमसिद्धान्तो नाम स यमर्थमसिद्धमपरीक्षितमनुपदिष्टमहेतुकं वा वादकालेऽभ्युपगच्छन्ति भिषजः; तद्यथा-द्रव्यं प्रधानमिति कृत्वा वक्ष्यामः, गुणाः प्रधानमिति कृत्वा वक्ष्यामः, वीर्यं प्रधानमिति कृत्वा वक्ष्यामः, इत्येवमादिः।इति चतुर्विधः सिद्धान्तः॥ ३७ ॥
अथ शब्दः-शब्दो नाम वर्णसमाम्नायः; स चतुर्विधः-दृष्टार्थश्च, अदृष्टार्थश्च, सत्यश्च, अनृतश्चेति।तत्र दृष्टार्थो नाम-त्रिभिर्हेतुभिर्दोषाः प्रकुप्यन्ति, षड्भिरुपक्रमैश्च प्रशाम्यन्ति, सति श्रोत्रादिसद्भावे शब्दादिग्रहणमिति।अदृष्टार्थः पुनः-अस्ति प्रेत्यभावः, अस्ति मोक्ष इति।सत्यो नाम-यथार्थभूतः; सन्त्यायुर्वेदोपदेशाः, सन्ति सिद्ध्युपायाः साध्यानां व्याधीनां, सन्त्यारम्भफलानीति।सत्यविपर्ययश्चानृतः॥ ३८ ॥
; , ॥ ३९ ॥
अथानुमानम्-अनुमानं नाम तर्को युक्त्यपेक्षः; यथा-अग्निं जरणशक्त्या, बलं व्यायामशक्त्या, श्रोत्रादीनि शब्दादिग्रहणेनेत्येवमादि॥ ४० ॥
॥ ४१ ॥
; , , ॥ ४२ ॥
; , ॥ ४३ ॥
; , ॥ ४४ ॥
; ॥ ४५ ॥
; ॥ ४६ ॥
; , ॥ ४७ ॥
अथार्थप्राप्तिः-अर्थप्राप्तिर्नाम यत्रैकेनार्थेनोक्तेनापरस्यार्थस्यानुक्तस्यापि सिद्धिः; यथा-नायं संतर्पणसाध्यो व्याधिरित्युक्ते भवत्यर्थप्राप्तिः-अपतर्पणसाध्योऽयमिति, नानेन दिवा भोक्तव्यमित्युक्ते भवत्यर्थप्राप्तिः-निशि भोक्तव्यमिति॥ ४८ ॥
; , , ॥ ४९ ॥
। ; , ॥ ५० ॥
अथाननुयोज्यम्-अननुयोज्यं नामातो विपर्ययेण; यथा-अयमसाध्यः॥ ५१ ॥
अथानुयोगः-अनुयोगो नाम स यत् तद्विद्यानां तद्विद्यैरेव सार्धं तन्त्रे तन्त्रैकदेशे वा प्रश्नः प्रश्नैकदेशो वा ज्ञानविज्ञावचनप्रतिवचनपरीक्षार्थमादिश्यते।यथा-ऽनित्यः पुरुषःऽ इति प्रतिज्ञाते यत् परः ऽको हेतुःऽ इत्याह, सोऽनुयोगः॥ ५२ ॥
अथ प्रत्यनुयोगः-प्रत्यनुयोगो नामानुयोगस्यानुयोगः; यथा-अस्यानुयोगस्य पुनः को हेतुरिति॥ ५३ ॥
अथ वाक्यदोषः-वाक्यदोषो नाम यथा खल्वस्मिन्नर्थ न्यूनम्, अनर्थकम्, अपार्ह्तकं, विरुद्धं चेति; एतानि ह्यन्तरेण न प्रकृतोऽर्ह्तः प्रणश्येत्।तत्र न्यूनं-प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनानामन्यतमेनापि न्यूनं न्यूनं भवति; यद्वा बहूपदिष्टहेतुकमेकेन हेतुना साध्यते तच्च न्यूनम्।अथाधिकम्-अधिकं नाम यन्न्यनविपरीतं, यद्वाऽऽयुर्वेदे भाष्यमाणे बार्हस्पत्यमौशनसमन्यद्वा यत्किंचिदप्रतिसंबद्धार्थमुच्यते, यद्वा संबद्धार्थमपि द्विरभिधीयते तत् पुनरुक्तदोषत्वादधिकं; तच्च पुनरुक्तं द्विविधम्-अर्थपुनरुक्तं, शब्दपुनरुक्तं च; तत्रार्थपुनरुक्तं यथा-भेषजमौषधं साधनमिति, शब्दपुनरुक्तं पुनर्भेषजं भेषजमिति।अथानर्थकम्-अनर्ह्तकं नाम यद्वचनमक्षरग्राममात्रमेव स्यात् पञ्चवर्गवन्न चार्थतो गृह्यते।अथापार्थकम्-अपार्थकं नाम यदर्थवच्च परस्परेणासंयुज्यमानार्थकं; यथा-चक्रन(त)क्रवंशवज्रनिशाकरा इति।अथ विरुद्धं-विरुद्धं नाम यद्दृष्टान्तसिद्धान्तसमयैर्विरुद्धं; तत्र पूर्वं दृष्टान्तसिद्धान्तावुक्तौ; समयः पुनस्त्रिधा भवति; यथा-आयुर्वैदिकसमयः, याज्ञिकसमयः, कोक्षशास्त्रिकसमयश्चेति; तत्रायुर्वैदिकसमयःचतुष्पादं भेषजमिति, याज्ञिकसमयःआलभ्या यजमानैः पशव इति, मोक्षशास्त्रिकसमयःसर्वभूतेष्वहिंसेति; तत्र स्वसमयविपरीतमुच्यमानं विरुद्धं भवति।इति वाक्यदोषाः॥ ५४ ॥
, , , , , ॥ ५५ ॥
अथ च्छलं-छलं नाम परिशठमर्थाभासमनर्थकं वाग्वस्तुमात्रमेव।तद्द्विविधं-वाक्छल्ं, सामान्यच्छलं च।तत्र वाक्छलं नाम यथा-कश्चिद्ब्रूयात्-नवतन्त्रेऽयं भिषगिति, अथ भिषग् ब्रूयात्-नाहं नवतन्त्र एकतन्त्रोऽहमिति; परो ब्रूयात्-नाहं ब्रवीमि नव तन्त्राणि तवेति, अपि तु नवाभ्यस्तं ते तन्त्रमिति; भिषक् ब्रूयात्-न मया नवाभ्यस्तं तन्त्रम्, अनेकधाऽभ्यस्तं मया तन्त्रमिति; एतद्वाक्छलम्।सामान्यच्छलं नाम यथा-व्याधिप्रशमनायौषधमित्युक्ते, परो भूयात्-सत् सत्प्रशमनायेति किं नु भवानाह; सन् हि रोगः, सदौषधं; यदि च सत् सत्प्रशमनाय भवति, तत्र सत् कासः, सत् क्षयः, सत्सामान्यात् कासस्ते क्षयप्रशमनाय भविष्यतीति।एतत् सामान्यच्छलम्॥ ५६ ॥
अथाहेतुः-अहेतुर्नाम प्रकरणसमः, संशयसमः, वर्ण्यसमश्चेति।तत्र प्रकरणसमो नामाहेतुर्यथा-अन्यः शरीरादात्मा नित्य इति; परो ब्रूयात्-यस्मादन्यः शरीरादात्मा, तस्मान्नित्यः; शरीरं ह्यनित्यमतो विधर्मिणा चात्मना भवितव्यमित्येष चाहेतुः; नहि य एव पक्षः स एव हेतुरिति।संशयसमो नामाहेतुर्य एव संशयहेतुः स एव संशयच्छेदहेतुः; यथा-अयमायुर्वेदैकदेशमाह, किंन्वयं चिकित्सकः स्यान्न वेति संशये परो ब्रूयात्-यस्मादयमायुर्वेदैकदेशमाह तस्माच्चिकित्सकोऽयमिति, न च संशयच्छेदहेतुं विशेषयति, एष चाहेतुः; न हि य एव संशयहेतुः, स एव संशयच्छेदहेतुर्भवति।वर्ण्यसमो नामाहेतुःयो हेतुर्वर्ण्याविशिष्टः; यथा-कश्चिद्ब्रूयात्-अस्पर्शत्वाद्बुद्धिरनित्या शब्दविदिति; अत्र वर्ण्यः शब्दो बुद्धिरपि वर्ण्या, तदुभयवर्ण्याविशिष्टत्वाद्वर्ण्यसमोऽप्यहेतुः॥ ५७ ॥
, ; , ॥ ५८ ॥
; ॥ ५९ ॥
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॥ ६६ ॥
वादस्तु खलु भिषजां प्रवर्तमानो प्रवर्तेतायुर्वेद एव, नान्यत्र।अत्र हि वाक्यप्रतिवाक्यविस्तराः केवलाश्चोपपत्तयः सर्वाधिकरणेषु।ताः सर्वाः समवेक्ष्य सर्वं वाक्यं ब्रूयात्, नाप्रकृतकमशास्त्रमपरीक्षितमसाधकमाकुलमव्यापकं वा।सर्वं च हेतुमद्ब्रूयात्।हेतुमन्तो ह्यकलुषाः सर्व एव वादविग्रहाश्चिकित्सिते कारणभूताः, प्रशस्तबुद्धिवर्धकत्वात्; सर्वारम्भसिद्धं ह्यावहत्यनुपहता बुद्धिः॥ ६७ ॥
। । ॥ ६८ ॥
, , ॥ ६९ ॥
॥ ७० ॥
॥ ७१ ॥
॥ ७२ ॥
॥ ७३ ॥
अनुबन्धः खलु स यः कर्तारमवश्यमनुबध्नाति कार्यादुत्तरकालं कार्यनुमित्तः शुभो वाऽप्यशुभो भावः॥ ७४ ॥
॥ ७५ ॥
॥ ७६ ॥
; , , , ॥ ७७ ॥
, ; , , , ॥ ७८ ॥
, । ॥ ७९ ॥
, , , , , , , ॥ ८० ॥
स एवं पृष्टो यदि मोहयितुमिच्छेत्, ब्रूयादेनं-बहुविधा हि परीक्षा तथा परीक्ष्यविधिभेदः, कतमेन विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्नया परीक्षया केन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीक्ष्यस्य भिन्नस्य भेदाग्रं भवान् पृच्छत्यायमानं; नेदानीं भवतोऽन्येन विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्नया परीक्षयाऽन्येन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीक्ष्यस्य भिन्नस्याभिलषितमर्थं श्रोतुमहमन्येन परीक्षाविधिभेदेनान्येन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीक्ष्यं भित्त्वाऽन्यथाऽऽचक्षाण इच्छां पूरयेयमिति॥ ८१ ॥
; , , ॥ ८२ ॥
, । । , ॥ ८३ ॥
, , , , , , , , , , । । , ॥ ८४ ॥
, ॥ ८५ ॥
कारणं भिषगित्युक्तमग्रे, तस्य परीक्षा-भिषङ्नाम यो भिषज्यति, यः सूत्रार्थप्रयोगकुशलः, यस्य चायुः सर्वथा विदितं यथावत्।स च सर्वधातुसाम्यं चिकीर्षन्नात्मानमेवादितः परीक्षेत गुणिषु गुणतः कार्याभिनिर्वृत्तिं पश्यन्, कच्चिदहमस्य कार्यस्याभिनिर्वर्तने समर्ह्तो न वेति; तत्रेमे भिषग्गुणा यैरुपपन्नो भिषग्धातुसाम्याभिनिर्वर्तने समर्थो भवति; तद्यथा-पर्यवदातश्रुतता, परिदृष्टकर्मता, दाक्ष्यं, शौचं, जितहस्तता, उपकरणवत्ता, सर्वेन्द्रियोपपन्नता, प्रकृतिज्ञता, प्रतिपत्तिज्ञता चेति॥ ८६ ॥
करणं पुनर्भेषजम्।भेषजं नाम तद्यदुपकरणायोपकल्पते भिषजो धातुसाम्याभिनिर्वृत्तौ प्रयतमानस्य विशेषतश्चोपायान्तेभ्यः।तद्द्विविधं व्यपाश्रयभेदात्-दैवव्यपाश्रयं, युक्तिव्यऋपाश्रयं चेति।तत्र दैवव्य पाश्रयं-मन्त्रौषधिमणिमङ्गलबल्युपहारहोमनियमप्रायश्चित्तोपवासस्वस्त्ययनप्रणिपातगमनादि, युक्तिव्यपाश्रयं-संशोधनोपशमने चेष्टाश्च दृष्टफलाः।एतच्चैव भेषजमङ्गभेदादपि द्विविधं-द्रव्यभूतम्, अद्रव्यभूतं च।तत्र यदद्रव्यभूतं तदुपायाभिप्लुतम्।उपायो नाम भयदर्शनविस्मापनविस्मारणक्षोभणहर्षणभर्स्तनवधबन्धस्वप्नसंवाहनादिरमूर्तो भावविशेषो यथोक्ताः सिद्ध्युपायाश्चोपायाभिप्लुता इति।यत्तु द्रव्यभूतं तद्वमनादिषु योगमुपैति।तस्यापीयं परीक्षा-इदमेवंप्रकृत्यैवंगुणमिवंप्रभावमस्मिन् देशे जातमस्मिन्नृतावेवं गृहीतमेवं निहितमेवमुपस्कृतमनया च मात्रया युक्तमस्मिन् व्याधावेवंविधस्य पुरुषस्यैवतावन्तं दोषमपकर्षत्युपशमयति वा, यदन्यदपि चैवंविधं भेषजं भवेत्तच्चानेन विशेषेण युक्तमिति॥ ८७ ॥
, । ॥ ८८ ॥
, । , , , , , , , , , , , ॥ ८९ ॥
कार्यफलं सुखावाप्तिः, तस्य लक्षणं-मनोबुद्धीच्द्रियशरीरतुष्टिः॥ ९० ॥
, ॥ ९१ ॥
॥ ९२ ॥
तत्र भूमिपरीक्षा आतुरपरिज्ञानहेतोर्वा स्यादौषधपरिज्ञानहेतोर्वा।तत्र तावदियमातुरपरिज्ञानहेतोः।तद्यथा-अयं कस्मिन् भूमिदेशे जातः संवृद्धो व्याधितो वा; तस्मिंश्च भूमिदेशे मनुष्याणामिदमाहारजातम्, इदं विहारजातम्, इदमाचारजातम्, एतावच्च बलम्, एवंविधं सत्त्वम्, एवंविधं सात्म्यम्, एवंविधो दोषः, भक्तिरियम्, इमे व्याधयः, हितमिदम्, अहितमिदमिति प्रायोग्रहणेन।औषधपरिज्ञानहेतोस्तु कल्पेषु भूमिपरीक्षा वक्ष्यते॥ ९३ ॥
आतुरस्तु खलु कार्यदेशः।तस्य परीक्षा आयुषः प्रमाणज्ञानहेतोर्वा स्याद्, बलदोषप्रमाणज्ञानहेतोर्वा।तत्र तावदियं बलदोषप्रमाणज्ञानहेतोः; दोषप्रमाणानुरुपो हि भेषजप्रमाणविकल्पो बलप्रमाणविशेषापेक्षो भवति।सहसा ह्यतिबलमौषधमपरीक्षकप्रयुक्तमल्पबलमातुरमतिपातयेत्; न ह्यतिबलान्याग्रेयवायवीयान्यौषधान्यग्निक्षारशस्त्रकर्माणि वा शक्यन्तेऽल्पबलैः सोढुम्; असह्यातितीक्ष्णवेगत्वाद्धि तानि सद्यःप्राणहराणि स्युः।एतच्चैव कारणमपेक्षमाणा हीनबलमातुरमविषादकरैर्मृदुसुकुमारप्रायैरुत्तरोत्तरगुरुभिरविभ्रमैरनात्ययिकैश्चोपचरन्त्यौषधैः; विशेषतश्च नारीः, ता ह्यनवस्थितमृदुविवृतविक्लवहृदयाः प्रायः सुकुमार्योऽबलाः परसंस्तभ्याश्च।तथा बलवति बलवद्व्याधिपरिगते स्वल्पबलमौषधमपरीक्षकप्रयुक्तमसाधकमेव भवति।तस्मादातुरं परीक्षेत प्रकृतितश्च, विकृतितश्च, सारतश्च, संहननतश्च, प्रमाणतश्च, सात्म्यतश्च, सत्त्वतश्च, आहारशक्तितश्च, व्यायामशक्तितश्च, वयस्तश्चेति, बलप्रमाणविशेषग्रहणहेतोः॥ ९४ ॥
।, , , । , ; । , , , , । ॥ ९५ ॥
श्लेष्मा हि स्निग्धश्लक्ष्णमृदुमधुरसारसान्द्रमन्दस्तिमितगुरुशीतविज्जलाच्छः।तस्य स्नेहाच्छ्लेष्मलाः स्निग्धाङ्गाः, श्लक्ष्णत्वाच्छ्लक्ष्णाङ्गाः, मृदुत्वाद्दृष्टिसुखसुकुमारावदातगात्राः, मादुर्यात् प्रभूतशुक्रव्यवायापत्याः, सारत्वात् सारसंहतस्थिरशरीराः, सान्द्रत्वादुपचितपरिपूर्णसर्वाङ्गाः, मन्दत्वान्मन्दचेष्टाहारव्याहाराः, स्तैमित्यादशीध्रारम्भक्षोभविकाराः, गुरुत्वात् साराधिष्ठितावस्थितगतयः, शैत्यादल्पक्षुत्तृष्णासंतापस्वेददोषाः, विज्जलत्वात् सुश्लिष्टसारसन्धिबन्धनाः, तथाऽच्छत्वात् प्रसन्नदर्शनाननाः प्रसन्नस्निग्धवर्णस्वराश्च भवन्ति।त एवंगुणयोगाच्छ्लेष्मला बलवन्तो वसुमन्तो विद्यावन्त औजस्विनः शान्ता आयुष्मन्तश्च भवन्ति॥ ९६ ॥
पित्तमुष्णं तीक्ष्णं द्रवं विस्रमम्लं कटुकं च।तस्यौष्ण्यात् पित्तला भवन्त्युष्णासहा, उष्णमुखाः, सुकुमारावदातगात्राः, प्रभूतविप्लुव्यङ्गतिलपिडकाः, क्षुत्पिपासावन्तः, क्षिप्रवलीपलितखालित्यदोषाः, प्रायो मृद्वल्पकपिलश्मश्रुलोमकेशाश्च; तैक्ष्ण्यात्तीक्ष्णपराक्रमाः, तीक्ष्णाग्नयः, प्रभूताशनपानाः, क्लेशासहिष्णवो, दन्दशूकाः; द्रवत्वाच्छिथिलमृदुसन्धिमांसाः, प्रभूतसृष्टस्वेदमूत्रपुरीषाश्च; विस्रत्वात् प्रभूतपूतिकक्षास्यशिरःशरीरगन्धाः; कट्वम्लत्वादल्पशुक्रव्यवायापत्याः; त एवंगुणयोगात् पित्तला मध्यबला मध्यायुषो मध्यज्ञानविज्ञानवित्तोपकरणवन्तश्च भवन्ति॥ ९७ ॥
वातस्तु रूक्षलघुचलबहुशीघ्रशीतपरुषविशदः।तस्य रौक्ष्याद्वातला रूक्षापचिताल्पशरीराः प्रततरूक्षक्षामसन्नसक्तजर्जरस्वरा जागरूकाश्च भवन्ति, लघुत्वाल्लघुचपलगतिचेष्टाहारव्याहाराः, चलत्वादनवस्थितसन्ध्यक्षिभ्रूहन्वोष्ठजिह्वाश्रिरःस्कन्धपाणिपादाः, बहुत्वाद्बहुप्रलापकण्डरासिराप्रतानाः, शीघ्रत्वाच्छ्रीघ्रसमारम्भक्षोभविकाराः शीघ्रत्रासरागविरागाः श्रुतग्राहिणोऽल्पस्मृतयश्च, शैत्याच्छीतासहिष्णवः प्रततशीतकोद्वेपकस्तम्भाः, पारुष्यात् परुषकेशश्मश्रुरोमनखदशनवदनपाणिपादाः, वैशद्यात् स्फुटिताङ्गावयवाः सततसन्धिशब्दगामिनश्च भवन्ति; त एवं गुणयोगाद्वातलाः प्रायेणाल्पबलाश्चाल्पायुषश्चाल्पापत्याश्चाल्पसाधनाश्चाल्पधनाश्च भवन्ति॥ ९८ ॥
॥ ९९ ॥
। ॥ १०० ॥
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स्मृतिमन्तो भक्तिमन्तः कृतज्ञाः प्रज्ञाः शुचयो महोत्साहा दक्षा धीराः समरविक्रान्तयोधिनस्त्यक्तविषादाः सुव्यवस्थितगतिगम्भीरबुद्धिचेष्टाः कल्याणाभिनिवेशिनश्च सत्त्वसाराः।तेषां स्वलक्षणैरेव गुणा व्याख्याताः॥ ११० ॥
॥ १११ ॥
॥ ११२ ॥
॥ ११३ ॥
॥ ११४ ॥
कथं नु शरीरमात्रदर्शनादेव भिषङ्नुह्येदयमुपचितत्वाद्बलवान्, अयमल्पबलः कृशत्वात्, महाबलोऽयं महाशरीरत्वात्, अयमल्पशरीरत्वादल्पबल इति; दृश्यन्ते ह्यल्पशरीराः कृशाश्चैके बलवन्तः; तत्र पिपीलिकाभारहरणवत् सिद्धिः।अतश्च सारतः परीक्षेतेत्युक्तम्॥ ११५ ॥
संहननतश्चेति संहननं, संहति संयोजनमित्येकोऽर्थः।तत्र समसुविभक्तास्थि, सुबद्धसन्धि, सुनिविष्टमांसशोणितं, सुसंहतं शरीरमित्युच्यते।तत्र सुसंहतशरीराः पुरुषा बलवन्तः, विपर्ययेणाल्पबलाः, मध्यत्वात् संहननस्य मध्यबला भवन्ति॥ ११६ ॥
प्रमाणतश्चेति शरीरप्रमाणं पुनर्यथास्वेनाङ्गुलिप्रमाणेनोपदेक्ष्यते उत्सेधविस्तारायामैर्यथाक्रमम्।तत्र पादौ चत्वारि षट् चतुर्दशाङ्गुलानि, जङ्घे त्वष्टादशाङ्गुले षोडशाङ्गुलपरिक्षेपे च, जानुनी चतुरङ्गुले षोडशाङ्गुलपरिक्षेपे, त्रिंशदङ्गुलपरिक्षेपावष्टादशाङ्गुलावूरु, षडङ्गुलदीर्घौ वृषणावष्टाङ्गुलपरिणाहौ, शेफः षडङ्गुलदीर्घं पञ्चाङ्गुलपरिणाहं, द्वादशाङ्गुलिपरिणाहो भगः, षोडशाङ्गुलविस्तारा कटी, दशाङ्गुलं बस्तिशिरः, दशाङ्गुलविस्तारं द्वादशाङ्गुलमुदरं, दशाङ्गुलविस्तीर्णे द्वादशाङ्गुलायामे पार्श्वे, द्वादशाङ्गुलं स्तनान्तरं, द्व्यङ्गुलं स्तनपर्यन्तं, चतुर्विंशत्यङ्गुलविशालं द्वादशाङ्गुलोत्सेधमुरः, द्व्यङ्गुलं हृदयम्, अष्टाङ्गुलौ स्कन्धौ, षडङ्गुलावंसौ, षोडशाङ्गुलौ प्रबाहू, पञ्चदशाङ्गुलौ प्रपाणी, हस्तौ द्वादशाङ्गुलौ, कक्षावष्टाङ्गुलौ, त्रिकं द्वादशाङ्गुलोत्सधम्, अष्टादशाङ्गुलोत्सेधं पृष्ठं, चतुरङ्गुलोत्सेधा द्वाविंशत्यङ्गुलपरिणाहा शिरोधरा, द्वादशाङ्गुलोत्सेधं चतुर्विंशत्यङ्गुलपरिणाहमाननं, पञ्चाङ्गुलमास्यं, चिबुकौष्ठकर्णाक्षिमध्यनासिकाललाटं चतुरङ्गुलं, षोडशाङ्गुलोत्सेधं द्वात्रिंशदङ्गुलपरिणाहं शिरः; इति पृथक्त्वेनाङ्गावयवानां मानमुक्तम्।केवलं पुनः शरीरमङ्गुलिपर्वाणि चतुरशीतिः।तदायामविस्तारसमं समुच्यते।तत्रायुर्बलमोजः सुखमैश्वर्यं वित्तमिष्टाश्चापरे भावा भवन्त्यायत्ताः प्रमाणवति शरीरे; विपर्ययस्त्वतो हीनेऽधिके वा॥ ११७ ॥
। , , ॥ ११८ ॥
सत्त्वतश्चेति सत्त्वमुच्यते मनः।तच्छरीरस्य तन्त्रकमात्मसंयोगात्।तन्त्रिविधं बलभेदेन-प्रवरं, मध्यम्, अवरं चेति; अतश्च प्रवरमध्यावरसत्त्वाः पुरुषा भवन्ति।तत्र प्रवरसत्त्वाः सत्त्वसारास्ते सारेषूपदिष्टाः, स्वल्पशरीरा ह्यपि ते निजागन्तुनिमित्तासु महतीष्वपि पीडास्वव्यथा दृश्यन्ते सत्त्वगुणवैशेष्यात्; मध्यसत्त्वास्त्वपरानात्मन्युपनिधाय संस्तम्भयन्त्यात्मनाऽऽत्मानं परैर्वाऽपि संस्तभ्यन्ते; हीनसत्त्वास्तु नात्मना नापि परैः सत्त्वबलं प्रति शक्यन्ते उपस्तम्भयितुं, महाशरीरा ह्यपि ते स्वल्पानामपि वेदनानामसहा दृश्यन्ते, सन्निहितभयशोकलोभमोहमाना रौद्रभैरद्विष्टबीभत्सविकृतसंकथास्वपि च पशुपुरुषमांसशोणितानि चावेक्ष्य विषादवैवर्ण्यमूर्च्छोन्मादभ्रमप्रपतनानामन्यतममाप्नुवन्त्यथवा मरणमिति॥ ११९ ॥
; ॥ १२० ॥
। ॥ १२१ ॥
वयस्तश्चेति कालप्रमाणविशेषापेक्षिणी हि शरीरावस्था वयोऽभिधीयते।तद्वयो यथास्थूलभेदेन त्रिविधं-बालं, मध्यं, जीर्णमिति।तत्र बालमपरिपक्वधातुमजातव्यञ्जनं सुकुमारमक्लेशसहमसंपूर्णबलं श्लेष्मधातुप्रायमाषोडशवर्षं, विवर्धमानधातुगुणं पुनः प्रायेणानवस्थितसत्त्वमात्रिंशद्वर्षमुपदिष्टं; मध्यं पुनः समत्वागतबलवीर्यपौरुषपराक्रमग्रहणधारणस्मरणवचनविज्ञानसर्वधातुगुणं बलस्थितमवस्थितसत्त्वमविशीर्यमाणधातुगुणं पित्तधातुप्रायमाषष्टिवर्षमुपदिष्टम्; अतः परं हीयमानधात्विन्द्रियबलवीर्यपौरुषपराक्रमग्रहणधारणस्मरणवचनविज्ञानं भ्रश्यमानधातुगुणं वायुधातुप्रायं क्रमेण जीर्णमुच्यते आवर्षशतम्।वर्षशतं खल्वायुषः प्रमाणमस्मिन् काले; सन्ति च पुनरधिकोनवर्षशतजीविनोऽपि मनुष्याः; तेषां विकृतिवर्ज्यैः प्रकृत्यादिबलविशेषैरायुषो लक्षणतश्च प्रमाणमुपलभ्य वयसस्त्रित्वं विभजेत्॥ १२२ ॥
। । ॥ १२३ ॥
॥ १२४ ॥
कालः पुनः संवत्सरश्चातुरावस्था च।तत्र संवत्सरो द्विधा त्रिधा षोढा द्वादशधा भूयश्चाप्यतः प्रविभज्यते तत्तत्कार्यमभिसमीक्ष्य।अत्र खलु तावत् षोढा प्रविभज्य कार्यमुपदेक्ष्यतेहेमन्तो ग्रीष्मो वर्षाश्चेति शीतोष्णवर्षलक्षणास्त्रय ऋतवो भवन्ति, तेषामन्तर्रेष्वितरे साधारणलक्षणास्त्रय ऋतवःप्रावृट्शरद्वसन्ता इति।प्रावृडिति प्रथमः प्रवृष्टः कालः, तस्यानुबन्धो हि वर्षाः।एवमेते संशोधनमधिकृत्य षट् विभज्यन्ते ऋतवः॥ १२५ ॥
तत्र साधारणलक्षणेष्वृतुषु वमनादीनां प्रवृत्तिर्विधीयते, निवृत्तिरितरेषु।साधारणलक्षणा हि मन्दशीतोष्णवर्षत्वात् सुखतमाश्च भवन्त्यविकल्पकशश्च शरीरौषधानाम्, इतरे पुनरत्यर्थशीतोष्णवर्षत्वाद्दुःखतमाश्च भवत्नि विकल्पकाश्च शरीरौषधानाम्॥ १२६ ॥
तत्र हेमन्ते ह्यतिमात्रशीतोपहतत्वाच्छरीरमसुखोपपन्नं भवत्यतिशीतवाताध्मातमतिदारुणीभूतमवबद्धदोषं च, भेषजं पुनः संशोधनार्थमुष्णस्वभावमतिशीतोपहतत्वान्मन्दवीर्यत्वमापद्यते, तस्मात्तयोः संयोगे संशोधनमयोगायोपपद्यते शरीरमपि च वातोपद्रवाय।ग्रीष्मे पुनर्भृशोष्णोपहतत्वाच्छरीरमसुखोपपन्नं भवत्युष्णवातातपाध्मातमतिशिथिलमत्यर्थप्रविलीनदोषं, भेषजं पुनः संशोधनार्थमुष्णस्वभावमुष्णानुगमनात्तीक्ष्णतरत्वमापद्यते, तस्मात्तयोः संयोगे संशोधनमतियोगायोपपद्यते शरीरामपि पिपासोपद्रवाय।वर्षासु तु मेघजलावतते गूढार्कचन्द्रतारे धाराकुले वियति भूमौ पङ्कजलपटलसंवृतायामत्यर्थोपक्लिन्नशरीरेषु भूतेषु विहतस्वभावेषु च केवलेष्वौषधग्रामेषु तोयतोयदानुगतमारुतसंसर्गाद् गुरुप्रवृत्तीनि वमनादीनि भवन्ति, गुरुसमुत्थानानि च शरीराणि।तस्माद्वमनादीनां निवृत्तिर्विधीयते वर्षान्तेष्वृतुषु, न चेदात्ययिकं कर्म।आत्ययिके पुनः कर्मणि काममृतुं विकल्प्य कृत्रिमगुणोपधानेन यथर्तुगुणविपरीतेन भेषजं संयोगसंस्कारप्रमाणविकल्पेनोपपाद्य प्रमाणवीर्यसमं कृत्वा ततः प्रयोजयेदुत्तमेन यत्नेनावहितः॥ १२७ ॥
; , ; ; । । ; ॥ १२८ ॥
॥ १२९ ॥
। ॥ १३० ॥
॥ १३१ ॥
परीक्षायास्तु खलु प्रयोजनं प्रतिपत्तिज्ञानम्।प्रतिपत्तिर्नाम यो विकारारो यथा प्रतिपत्तव्यस्तस्य तथाऽनुष्ठानज्ञानम्॥ १३२ ॥
, , ॥ १३३ ॥
प्रवृनिवृत्तिलक्षणसंयोगे तु गुरुलाघवं संप्रधार्य सम्यगध्यवस्येदन्यतरनिष्ठायाम्।सन्ति हि व्याधयः शास्त्रेषूत्सर्गापवादैरुपक्रमं प्रति निर्दिष्टाः।तस्माद्गुरुलाघवं संप्रधार्य सम्यगध्यवस्येदित्युक्तम्॥ १३४ ॥
यानि तु खलु वमनादिषु भेषजद्रव्याण्युपयोगं गच्छन्ति तान्यनुव्याख्यास्यामः।तद्यथा-फलजीमूतकेक्ष्वाकुधामार्गवकुटजकृतवेधनफलानि, फलजीमूतकेक्ष्वाकुधामार्गवपत्रपुष्पाणि आरग्वधवृक्षकमदनस्वादुकण्टकापाठापाटलाशार्ङ्गेष्टामूर्वासप्तपर्णनक्तमालपिचुमर्दपटोलसुषवीगुडूचीचित्रकसोमवल्कशतावरीद्वीपीशिग्रुमूलकषायैः, मधुकमधूककोविदारकर्वुदारनीपविदुलबिम्बीशणपुष्पीसदापुष्पाप्रत्यक् पुष्पाकषायैश्च, एलाहरेणुप्रियङ्गुपृथ्वीकाकुस्तुम्बुरुतगरनलदह्रीवेरतालीशोशीरकषायैश्च, इक्षुकाण्डेक्ष्विक्षुवालिकादर्भपोटगलकालङ्कृ(ङ्क)तकषायैश्च, सुमनासौमनस्यायनीहरिद्रादारुहरिद्रावृश्चीरपुनर्नवामहासहाक्षुद्रसहाकषायैश्च, शाल्मलिशाल्मलिकभद्रपर्ण्येलापर्ण्युपोदिकोद्दालकधन्वनराजादनिपचित्रागोपीशृङ्गाटिकाकषायैश्च, पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकशृङ्गवेरसर्षपफाणितक्षीरक्षारलवणोदकैश्च, यथालाभं यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य वर्तिक्रियाचूर्णावलेहस्नेहकषायमांसरसयवागूयूषकाम्बलिकक्षीरोपधेयान्मोदकानन्यांश्च भक्ष्यप्रकारान् विविधाननुविधाय यथार्हं वमनार्हाय दद्याद्विधिवद्वमनम्।इति कल्पसंग्रहो वमनद्रव्याणाम्।कल्पमेषां विस्तारेणोत्तरकालमुपदेक्ष्यामः॥ १३५ ॥
विरेचनद्रव्याणि तु श्यामात्रिवृच्चतुरङ्गुलतिल्वकमहावृक्षसप्तलाशाङ्खिनीदन्तीद्रवन्तीनां क्षीरमूलत्वक्पत्रपुष्पफलानि यथायोगं तैस्तैः क्षीरमूलत्वक्पत्रपुष्पफलैर्विक्लिप्ताविक्लिप्तैः, अजगन्धाश्वगन्धाजशृङ्गीक्षीरिणीनीलिनीक्लीतककषायैश्च, प्रकीर्योदकीर्यामसूरविदलाकम्पिल्लकविडङ्गगवाक्षीकषायैश्च, पीलुप्रियालमृद्वीकाकाश्मर्यपरूषकबदरदाडिमामलकहरीतकीबिभीतकवृश्चीरपुनर्नवाविदारिगन्धादिकषायैश्च, सीधुसुरासौवीरकतुषोदकमैरेयमेदकमदिरामधुमधूलकधान्याम्लकुवलबदरखर्जूरकर्कन्धुभिश्च, दधिदधिमण्डोदश्विद्भिश्च, गोमहिष्यजावीनां च क्षीरमूत्रैर्यथालाभं यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य वर्तिक्रियाचूर्णासवलेकस्नेहकषायमांसरसयूषकाम्बलिकयवागूक्षीरोपधेयान् मोदकानन्यांश्च भक्ष्यप्र(वि)कारान् विविधांश्च योगाननुविधाय यथार्हं विरेचनार्हाय दद्याद्विरेचनम्।इति कल्पसंग्रहो विरेचनद्रव्याणाम्।कल्पमेषां विस्तरेण यथावदुत्तरकालमुपदेक्ष्यामः॥ १३६ ॥
आस्थापनेषु तु भूयिष्ठकल्पानि द्रव्याणि यानि योगमुपयान्ति तेषु तेष्ववस्थान्तरेष्वायुराणां, तानि द्रव्याणि नामतो विस्तरेणोपदिश्यमानान्यपरिसंख्येयानि स्युरतिबहुत्वात्; इष्टश्चानतिसंक्षेपविस्तरोपदेशस्तन्त्रे, इष्टं च केवलं ज्ञानं, तस्माद्रसत एव तान्यत्र व्याख्यास्यामः।रससंसर्गविकल्पविस्तरो ह्येषामपरिसङ्ख्येयः, समवेतानां रसानामंशांशबलविकल्पातिबहुत्वात्।तस्माद्द्रव्याणां चैकदेशमुदाहरणार्थं रसेष्वनुविभज्य रसैकैकश्येन च नामलक्षणार्थं षडास्थापनस्कन्धा रसतोऽनुविभज्य व्याख्यास्यन्ते॥ १३७ ॥
, । , ॥ १३८ ॥
तद्यथा-जीवकर्षभकौ जीवन्ती वीरा तामलकी काकोली क्षीरकाकोली मुद्गपर्णी माषपर्णी शालपर्णी पृश्निपर्ण्यसनपर्णी मेदा महामेदा कर्कटशृङ्गी शृङ्गाटिका छिन्नरुहा च्छत्राऽतिच्छत्रा श्रावणी महाश्रावणी सहदेवा विश्वदेवा शुक्ला क्षीरशुक्ला बलाऽतिबला विदारी क्षीरविदारी क्षुद्रसहा महासहा ऋष्यगन्धाऽश्वगन्धा वृश्चीरः पुनर्नवा बृहती कण्टकारिकोरुबूको मोरटः श्वदंष्ट्रा संहर्षा शतावरी शतपुष्पा मधूकपुष्पी यष्टीमधु मधूलिका मृद्वीका खर्जूरं परूषकमात्मगुप्ता पुष्करबीजं कशेरुकं राजकशेरुकं राजादनं कतकं काश्मर्यं शीतपाक्योदनपाकी तालखर्जूरमस्तकमिक्षुरिक्षुवालिका दर्भः कुशः काशः शालिर्गुन्द्रेत्कटकः शरमूलं राजक्षवकः ऋष्यप्रोक्ता द्वारदा भारद्वाजी वनत्रपुष्यभीरुपत्री हंसपादी काकनासिका कुलिङ्गाक्षी क्षीरबल्ली कपोलवल्ली कपोतवल्ली सोमवल्ली गोपवल्ली मधुवल्ली चेति; एषामेवंविधानामन्येषां च मधुरवर्गपरिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां छेद्यानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा प्रक्ष ल्य पानीयेन सुप्रक्षालितायां स्थाल्यां समावाप्य पयसाऽर्धोदकेनाभ्यासिच्य साधयेद्दर्व्या सततमवघट्टयन्; तदुपयुक्तभूयिष्ठेऽम्भसि गतरसेष्वौषधेषु पयसि चानुपदग्धे स्थालीमुपहृत्य सुपरिपूतं पयः सुखोष्णं घृततैलवसामज्जलवणफाणितोपहितं बस्तिं वातविकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यात्; शीतं तु मधुसर्पिर्भ्यामुपसंसृज्य पित्तविकारिणे विधिवद्दद्यात्।इति मधुरस्कन्धः॥ १३९ ॥
, , , ।॥ १४० ॥
, । ॥ १४१ ॥
पिप्पलीपिप्पलीमूलहस्तिपिप्पचव्यचित्रकशृङ्गवेरमरिचाजमोदार्द्रकविडङ्गकुस्तुम्बुरुपीलुतेजोवत्येलाकुष्ठभल्लातकास्थिहिङ्गुनिर्यासकिलिममूलकसर्षपलशुनकरञ्जशिग्रुकमधुशिग्रुकखरपुष्पभूस्तृणसुमुखसुरसकुठेरकार्जकगण्डीरकालमालकपर्णासक्षवकफणिज्झकक्षारमूत्रपित्तानीति; एषामेवंविधानां चान्येषां कटुकवर्गपरिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां छेद्यानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा गोमूत्रेण सह साधयित्वोपसंस्कृत्य यथावन्मधुतैललवणोपहितं सुखोष्णं बस्तिं श्लेष्मविकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यात्।इति कटुकस्कन्धः॥ १४२ ॥
चन्दननलदकृतमालनक्तमालनिम्बतुम्बुरुकुटजहरिद्रादारुहरिद्रामुस्तमूर्वाकिराततिक्तककटुकरोहिणीत्रायमाणाकारवेल्लिकाकरीरकरवीरकेबुककठिल्लकवृषमण्डूकपर्णीकर्कोटकवार्ताकुकर्कशकाकमाचीकाकोदुम्बरिकासुषव्यतिविषापटोलकुलकपाठागुडूचीवेत्राग्रवेतसविकङ्कतबकुलसोमवल्कसप्तपर्णसुमनार्कावल्गुजवचातगरागुरुवालकोशीराणीति, एषामेवंविधानां चान्येषां तिक्तवर्गपरिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां छेद्यानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेनाभ्यासिच्य साधयित्वोपसंस्कृत्य यथावन्मधुतैललवणोपहितं सुखोष्णं बस्तिं श्लेष्मविकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यात्, शीतं तु मधुसर्पिर्भ्यामपसंसृज्य पित्तविकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यात्।इति तिक्तस्कन्धः॥ १४३ ॥
प्रियग्ङ्वनन्ताम्रास्थ्यम्बष्ठकीकट्वङ्गलोध्रमोचरससमङ्गाधातकीपुष्पपद्मापद्मकेशरजम्ब्वाम्रप्लक्षवटकपीतनोदुम्बराश्वत्थभल्लातकास्थ्यश्मन्तकशिरीषशिंशपासोमवल्कतिन्दुकप्रियालबदरखदिरसप्तपर्णश्वकर्णस्यन्दनार्जुनारिमेदैलवालुकपरिपेलवकदम्बशल्लकीजिङ्गिनीकाशकशेरुकराजकशेरुकट्फलवंशपद्मकाशोकशालधवसर्जभूर्जशणखरपुष्पापुरशमीमाचीकवरकतुङ्गाजकर्णस्फूर्जकबिभीतककुम्भीपुष्करबीजबिसमृणालतालखर्जूरतरुणानीति, एषामेवंविधानां चान्येषां कषायवर्गपरिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां छेद्यानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेनाभ्यासिच्य साधयित्वोपसंस्कृत्य यथावन्मधुतैललवणोपहितं सुखोष्णं बस्तिं श्लेष्मविकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यात्, शीतं तु मधुसर्पिर्भ्यामुपसंसृज्य पित्तविकारिणे दद्यात्।इति कषायस्कन्धः॥ १४४ ॥
- । ॥ १४५ ॥
सर्शो हि प्रणिहिताः सर्वरोगेषु जानता।सर्वान्रोगान्नियच्छन्ति येभ्य आस्थापनं हितम्॥ १४६ ॥
। ॥ १४७ ॥
॥ १४८ ॥
, ; , ; । ; , । ॥ १४९ ॥
। । , । । , । , , । , , ॥ १५० ॥
शिरोविरेचनद्रव्याणि पुनरपामार्गपिप्पलीमरिचविडङ्गशिग्रुशिरीषतुम्बुरुपिल्वजाज्यजमोदावार्ताकीपृथ्वीकैलाहरेणुकाफलानि च, सुमुखसुरसकुठेरकगण्डीरकालमालकपर्णासक्षवकफणिज्झकहरिद्राशृङ्गवेरमूलकलशुनतर्कारीसर्षपपत्राणि च, अर्कालर्ककुष्ठनागदन्तीवचापामार्गश्वेताज्योतिष्मतीगवाक्षीगण्डीरपुष्यवाक्पुष्पीवृश्चिकालीवयस्थातिविषामूलानि च, हरिद्राशृङ्गवेरमूलकलशुनकन्दाश्च, लोध्रमदनसप्तपर्णनिम्बार्कपुष्पाणि च, देवदार्वगुरुसरलशल्लकीजिङ्गिन्यसनहिङ्गुनिर्यासाश्च, तेजोवतीवराङ्गेङ्गुदीशोभाञ्जनकबृहतीकण्टकारिकात्वचश्चेति।शिरोविरेचनं सप्तविधं, फलपत्रमूलकन्दपुष्पनिर्यासत्वगाश्रयभेदात्।लवणकटुतिक्तकषायाणि चेन्द्रियोपशयानि तथाऽपराण्यनुक्तान्यपि द्रव्याणि यथायोगविहितानि शिरोविरेचनार्थमुपदिश्यन्ते इति॥ १५१ ॥
- कारणं । ॥ १५२ ॥
। ॥ १५३ ॥
। ॥ १५४ ॥
। ॥ १५५ ॥
। ॥ १५६ ॥
दोषादीनां तु भावानां सर्वेषामेव हेतुमत्।मानात् सम्यग्विमानानि निरुक्तानि विभागशः॥इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने रोगभिषग्जितीयविमानं नामाष्टमोऽध्यायः॥ १५७ ॥
(अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते।