भारत संहिता

अध्याय ७

व्याधितरूपीयविमानम्

रोगियों के रूप (और कृमि)

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भूमिका

व्याधितरूपीय विमान चरक संहिता के विमानस्थान का सातवाँ अध्याय है, जिसका हिन्दी शीर्षक 'रोगियों के रूप (और कृमि)' है। 'व्याधितरूप' का अर्थ है रोगी का बाहरी रूप, यानी वह जैसा दिखाई देता है। अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय देते हैं और अग्निवेश उनसे प्रश्न करते हैं।

अध्याय दो भागों में चलता है। पहले भाग में आत्रेय बताते हैं कि दो प्रकार के रोगी होते हैं: जिसका रोग भारी है और जिसका हल्का। पर रोगी का बाहरी रूप हमेशा रोग का सही माप नहीं देता: जिसका मन, बल और शरीर अच्छा है, वह भारी रोग में भी हल्का बीमार दिखता है, और जिसका कमज़ोर है, वह हल्के रोग में भी बहुत बीमार। जो वैद्य केवल आँख से देखकर निर्णय करते हैं, वे भूल करते हैं: भारी रोग में मृदु उपचार देकर दोषों को और भड़का देते हैं, और हल्के रोग में तीक्ष्ण उपचार देकर शरीर को क्षीण कर देते हैं। जो वैद्य सब परखने योग्य बातों को हर ढंग से परखकर निर्णय करते हैं, वे नहीं चूकते।

दूसरे भाग में अग्निवेश कृमियों के बारे में पूछते हैं, और आत्रेय उन्हें उत्पत्ति के आधार पर चार वर्गों में बाँटते हैं: मलज, शोणितज, श्लेष्मज और पुरीषज। हर वर्ग का वर्णन सात बातों के क्रम से होता है: उत्पत्ति का कारण, स्थान, आकृति, रंग, नाम, शरीर पर प्रभाव और चिकित्सा। इसके बाद अध्याय कृमियों की चिकित्सा के तीन चरण बताता है: पहले उन्हें बाहर निकालना (अपकर्षण), फिर उनकी उत्पत्ति के आधार का नाश (प्रकृतिविघात), और फिर रोग के कारण बताई गई बातों से दूर रहना। फिर अपकर्षण और प्रकृतिविघात के लिए बस्ति, वमन, विरेचन, शिरोविरेचन और अनेक औषध-योगों की विधियाँ विस्तार से गिनाई गई हैं। यह ग्रन्थ का वर्णन है, कोई चिकित्सा-सलाह नहीं।

अन्त में ग्रन्थ कहता है कि कृमियों के लिए बताई गई यह तीन प्रकार की विधि सभी रोगों के लिए भी देखी गई है: शरीर के दोषों को निकालना या शान्त करना, और कारण से बचना। संग्रह-श्लोक अध्याय के विषय गिनाते हैं: दो प्रकार के रोगी, दो प्रकार के वैद्य, बीस कृमि और उनकी सात बातों का समूह। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि रोग का रूप और रोग का बल एक ही चीज़ नहीं हैं, इसलिए ठीक निर्णय के लिए रोगी की हर बात को परखना आवश्यक माना गया है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ३१-३२)

तत्र श्लोकौ-व्याधितौ पुरुषौ ज्ञाज्ञौ भिषजौ सप्रयोजनौ।विंशतिः क्रिमयस्तेषां हेत्वादिः सप्तको गणः॥

श्लोक ३१ →

इस विषय में दो (संग्रह-) श्लोक हैं: दो (प्रकार के) रोगी पुरुष; जानकार और अनजान, दो (प्रकार के) वैद्य, (अपने) प्रयोजन सहित; बीस कृमि; और उनका हेतु आदि सात (बातों) का समूह

उक्तो व्याधितरूपीये विमाने परमर्षिणा।शिष्यसंबोधनार्थाय व्याधिप्रशमनाय च॥

श्लोक ३२ →

(यह सब) परम ऋषि द्वारा, शिष्यों को समझाने के लिए और रोगों के प्रशमन (शान्ति) के लिए, व्याधितरूपीय विमान में कहा गया है।

मुख्य शब्द (१७) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

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च. वि. ७/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम व्याधितरूपीय (रोगियों के रूप सम्बन्धी) विमान की व्याख्या करेंगे।

च. वि. ७/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. वि. ७/३

, । , । ॥ ३ ॥

यहाँ निश्चय ही दो (प्रकार के) पुरुष व्याधितरूप (रोगी के रूप वाले) होते हैं: गुरुव्याधित (भारी रोग से पीड़ित) और लघुव्याधित (हल्के रोग से पीड़ित)। उनमें से एक, गुरुव्याधित, सत्त्व (मन), बल और शरीर की सम्पदा से युक्त होने के कारण लघुव्याधित जैसा दिखाई देता है; दूसरा, लघुव्याधित, सत्त्व आदि के हीन होने के कारण गुरुव्याधित जैसा दिखाई देता है। उन दोनों के (विषय में) अकुशल (वैद्य) केवल आँख से ही रूप देखकर निर्णय करते हुए रोग के गुरुलाघव (भारीपन और हल्केपन) में भूल कर बैठते हैं।

च. वि. ७/४

। । , । , । । , ॥ ४ ॥

ज्ञान के एक अंश से सम्पूर्ण ज्ञेय (जानने योग्य विषय) का विज्ञान (ठीक ज्ञान) उत्पन्न नहीं होता। और (इस प्रकार) भ्रम में पड़े हुए (वैद्य) निश्चय ही रोग के ज्ञान में और उपक्रम (चिकित्सा) की युक्ति के ज्ञान में भी भूल करते हैं। वे जब लघुव्याधित के रूप वाले गुरुव्याधित (रोगी) को पाते हैं, तब उसे अल्प दोष वाला मानकर, संशोधन के समय उसे मृदु संशोधन देते हुए, उसके दोषों को और भी अधिक उभार देते हैं। और जब गुरुव्याधित के रूप वाले लघुव्याधित (रोगी) को पाते हैं, तब उसे महान् दोष वाला मानकर, संशोधन के समय उसे तीक्ष्ण संशोधन देते हुए, दोषों को अत्यधिक निकालकर उसके शरीर को क्षीण कर देते हैं। इस प्रकार ज्ञान के एक अंश से सम्पूर्ण ज्ञेय विषय का ज्ञान (हो गया) मानने वाले (वैद्य) चूक जाते हैं। परन्तु जानने योग्य को जान चुके वैद्य, जो कुछ परीक्षा योग्य है, उस सबकी हर प्रकार से, जितनी सम्भव हो, परीक्षा करके निर्णय करते हुए कहीं भी भूल नहीं करते, और इच्छित प्रयोजन को सिद्ध करते हैं।

च. वि. ७/५

- । ॥ ५ ॥

और इस विषय में (ये श्लोक) हैं: सत्त्व आदि की भिन्नता के कारण रोगी में (दिखने वाले) रोग के रूप को देखकर बाल (नासमझ वैद्य) रोग के बल और अबल (प्रबलता और दुर्बलता) के विषय में भ्रम में पड़ जाते हैं।

च. वि. ७/६

। ॥ ६ ॥

अज्ञान से मोहित वे (वैद्य) भेषज (औषध) का अयोग (अनुचित प्रयोग) करते हैं, (जो) रोगियों के विनाश के लिए, या बड़े क्लेश के लिए भी (होता है)।

च. वि. ७/७

। ॥ ७ ॥

परन्तु प्राज्ञ (बुद्धिमान् वैद्य) यहाँ परीक्षा योग्य सब कुछ हर प्रकार से जानकर भेषजों (औषधों) के प्रयोग में कभी नहीं चूकते।

च. वि. ७/८

, ॥ ८ ॥

इस प्रकार व्याधितरूप (रोगियों के रूप) के प्रकरण में व्याधितरूपों की संख्या और उत्पत्ति, रोगी के रूप के कारण होने वाली भूल का निन्दनीय कारण, और सम्प्रतिपत्ति (ठीक निर्णय) का अनिन्दनीय कारण सुनकर, इसके बाद अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय के दोनों पैर पकड़कर (प्रणाम करके) उनसे सब कृमियों के, पुरीष (मल) में आश्रय लेने वालों के, समुत्थान (उत्पत्ति का कारण), स्थान, संस्थान (आकृति), वर्ण (रंग), नाम, प्रभाव (शरीर पर असर) और चिकित्सा के विशेष (भेद) पूछे।

च. वि. ७/९

! ; ; , , , ॥ ९ ॥

तब भगवान् आत्रेय ने उनसे कहा: हे अग्निवेश! यहाँ (इस शास्त्र में) पहले सहज (जन्म के साथ उत्पन्न) कृमियों को छोड़कर कृमि अनेक प्रकार के विभाजन से बीस प्रकार के बताए गए हैं; वे फिर प्रकृति (उत्पत्ति के मूल) के अनुसार बाँटे जाने पर चार प्रकार के होते हैं, जैसे: पुरीषज (मल से उत्पन्न), श्लेष्मज (कफ से उत्पन्न), शोणितज (रक्त से उत्पन्न) और मलज (मैल से उत्पन्न)।

च. वि. ७/१०

। । ; ; ; , ; , ; , ; , , ॥ १० ॥

इनमें मल (मैल) बाह्य (बाहरी) और आभ्यन्तर (भीतरी) (दो प्रकार का) होता है। उनमें बाह्य मल से उत्पन्न (कृमियों) को हम मलज कहते हैं। उनका समुत्थान (उत्पत्ति का कारण) है मृजा (शरीर की सफ़ाई) का त्याग; स्थान हैं सिर के बाल, दाढ़ी-मूँछ, रोएँ, पलकें और वस्त्र; संस्थान (आकृति): अणु (बहुत छोटे), तिल के आकार वाले और बहुत पैरों वाले; वर्ण: काला और सफ़ेद; नाम: यूका (जूँ) और पिपीलिका; प्रभाव: कण्डू (खुजली) उत्पन्न करना, और कोठ (चकत्ते) और पिडका (फुंसियाँ) उत्पन्न करना; और इनकी चिकित्सा तो है: अपकर्षण (इन्हें निकाल देना), मल का नाश, और मल उत्पन्न करने वाले भावों (कारणों) का सेवन न करना।

च. वि. ७/११

; ; , ; ; , , , , , ; , , ; , ॥ ११ ॥

शोणितज (रक्त से उत्पन्न) कृमियों का समुत्थान (उत्पत्ति का कारण) तो निश्चय ही कुष्ठ रोगों के समान है; स्थान - रक्त ले जाने वाली धमनियाँ; संस्थान (आकार) - (वे) सूक्ष्म, गोल और बिना पैरों के होते हैं, और कुछ सूक्ष्म होने के कारण दिखाई नहीं देते; वर्ण - ताम्र (ताँबे जैसा लाल); नाम - केशाद, लोमाद, लोमद्वीप, सौरस, औडुम्बर और जन्तुमातृ; प्रभाव - सिर के बाल, दाढ़ी-मूँछ, नख, रोम और पलकों का झड़ना, और व्रण (घाव) में पहुँचे हुओं के (प्रभाव) हर्ष (झनझनाहट), कण्डू (खुजली), तोद (चुभन) और संसर्पण (रेंगना) हैं, और बहुत बढ़े हुओं का (प्रभाव) त्वचा, सिरा, स्नायु, मांस और तरुणास्थि (कोमल हड्डी) को खा जाना है; इनकी चिकित्सा भी कुष्ठ रोगों के समान है, उसे हम बाद में बताएँगे।

च. वि. ७/१२

; , ; , , ; , , , , , , ; , , , , , , , , , , , ॥ १२ ॥

श्लेष्मज (श्लेष्मा, अर्थात् कफ से उत्पन्न) कृमि दूध, गुड़, तिल, मछली, आनूप (जल-बहुल प्रदेश के प्राणियों का) मांस, पिष्टान्न (पिसे अन्न से बने पदार्थ), परमान्न (खीर), कुसुम्भ (कुसुम) के स्नेह (तेल), और अजीर्ण, पूति (सड़े हुए), क्लिन्न (गीले, सीले हुए), संकीर्ण (घालमेल वाले), विरुद्ध और असात्म्य भोजन से उत्पन्न होते हैं; उनका स्थान आमाशय है; वे बढ़ते हुए ऊपर की ओर या नीचे की ओर, या दोनों ओर फैलते हैं; उनके आकार और रंग की विशेषताएँ तो (इस प्रकार हैं) - कुछ सफ़ेद और चौड़ी पट्टी जैसे आकार वाले, कुछ गोल घेरे वाले, गण्डूपद (केंचुए) जैसी आकृति वाले, सफ़ेद और ताँबे जैसी (लाल) आभा वाले, (और) कुछ सूक्ष्म, लम्बे, धागे जैसी आकृति वाले और सफ़ेद; श्लेष्मा के कारण उत्पन्न उन तीन प्रकार के कृमियों के नाम हैं - अन्त्राद, उदराद, हृदयचर, चुरु, दर्भपुष्प, सौगन्धिक और महागुद; प्रभाव - हृल्लास (जी मिचलाना), मुँह से पानी बहना, अरोचक (अरुचि) और अविपाक (अपच), ज्वर, मूर्च्छा, जम्हाई, छींक, आनाह, अङ्गमर्द (अंगों में टूटन), छर्दि (उल्टी), कृशता (दुबलापन) और पारुष्य (रूखापन)।

च. वि. ७/१३

; , , ; , ; , , ; , ; , , , , , ; ॥ १३ ॥

पुरीषज (मल से उत्पन्न होने वाले) कृमि श्लेष्मज (कफ से उत्पन्न होने वाले) कृमियों के समान समुत्थान (उत्पत्ति के कारणों) वाले हैं; उनका स्थान पक्वाशय है; बढ़ते हुए वे तो नीचे की ओर फैलते हैं, परन्तु जिस (रोगी) में वे आमाशय की ओर मुड़ जाएँ, जितने समय (वे ऐसे रहें) उतने समय उसकी डकारें और साँसें मल की गन्ध वाली होती हैं; उनकी आकृति और रंग के भेद तो (ये हैं): कुछ पतली गोल परिधि वाले, सफ़ेद, लम्बे और ऊन के रेशों जैसे होते हैं, परन्तु कुछ मोटी गोल परिधि वाले और श्याव (साँवले), नीले, हरे और पीले होते हैं; उनके नाम हैं: ककेरुक, मकेरुक, लेलिह, सशूलक और सौसुराद; (उनका) प्रभाव (यह है): पुरीषभेद (मल का पतला होकर निकलना), कार्श्य (दुबलापन), पारुष्य (रूखापन) और रोंगटे खड़े कर देना; और वे ही इस (रोगी) के गुदद्वार में चारों ओर चुभन करते हुए और खुजली उत्पन्न करते हुए गुदद्वार को घेरे रहते हैं, (और) वे ही उत्तेजित होने पर सीमा से अधिक गुदा से बाहर निकलते हैं। यह श्लेष्मज और पुरीषज कृमियों के समुत्थान आदि का विशेष (वर्णन) है।

च. वि. ७/१४

। , , ॥ १४ ॥

परन्तु इनकी चिकित्सा तो (हम पहले) संक्षेप में बताकर बाद में विस्तार से बताएँगे। उसमें सब कृमियों का सबसे पहले अपकर्षण (बाहर निकालना) ही करना चाहिए, उसके बाद प्रकृतिविघात (उनकी उत्पत्ति के आधार का नाश), और फिर निदान में कहे गए भावों (कारणों) का सेवन न करना।

च. वि. ७/१५

; , ; , , , ; । , ; । । । ॥ १५ ॥

उनमें अपकर्षण (यह है): हाथ से पकड़कर, जाँचकर, उपकरण (औज़ार) की सहायता से या बिना उपकरण के (कृमियों को) बाहर निकालना; परन्तु (शरीर के भीतर) अपने स्थानों में पहुँचे हुए कृमियों का अपकर्षण विधि के अनुसार औषध से (होता है), (और) वह चार प्रकार का है; जैसे: शिरोविरेचन, वमन, विरेचन और आस्थापन; यह अपकर्षण की विधि है। और इनका प्रकृतिविघात कटु (तीखे), तिक्त (कड़वे), कषाय (कसैले), क्षार और उष्ण (गरम) द्रव्यों का उपयोग है, और जो कुछ भी दूसरा श्लेष्मा और पुरीष का विरोधी हो, वह भी (प्रकृतिविघात) होगा; यह प्रकृतिविघात है। उसके बाद निदान में कहे गए भावों का सेवन न करना (यह है): निदान के वर्णन में जो कहा गया है उसका, और उसी तरह के दूसरे द्रव्यों का भी त्याग। इस प्रकार लक्षण-रूप में (मुख्य बातों में) चिकित्सा की व्याख्या की गई। यही फिर विस्तार से बताया जाएगा।

च. वि. ७/१६

। ॥ १६ ॥

अब कोष्ठ में कृमि वाले इस रोगी को वैद्य पहले छह या सात रात (दिन) तक स्नेह और स्वेद से उपचारित करके, 'कल इसे संशोधन (शोधन की औषध) पिलाऊँगा' ऐसा (सोचकर), कृमियों को उभारने के लिए और (उनके) कोष्ठ की ओर आने के लिए, दूध, गुड़, दही, तिल, मछली, आनूप (दलदली प्रदेश के प्राणियों के) मांस, पिष्टान्न (पिसे अन्न से बने पदार्थ), परमान्न (खीर) और कुसुम्भ के स्नेह (तेल) से युक्त भोजनों से शाम को और सुबह (उसका) उपचार करे। फिर रात बीत जाने पर, (रोगी ने रात) सुख से बिताई है और (उसका) भोजन भली-भाँति पच गया है, यह जानकर, यदि (वह) उपचार के योग्य हो, तो सब परीक्षणीय विशेषों (जाँचने योग्य बातों) को भली-भाँति परखकर उसी दिन आस्थापन, वमन और विरेचन से (उसका) उपचार करे।

च. वि. ७/१७

; , ; , , , ॥ १७ ॥

फिर (वैद्य) कहे, 'लाओ': मूलक (मूली), सर्षप (सरसों), लशुन (लहसुन), करञ्ज, शिग्रु (सहजन), मधुशिग्रु, खरपुष्पा, भूस्तृण, सुमुख, सुरस, कुठेरक, गण्डीर, कालमालक, पर्णास, क्षवक और फणिज्झक, ये सब, अथवा जितने मिल सकें। लाए गए उन (द्रव्यों) को भली-भाँति देखकर, टुकड़े-टुकड़े कटवाकर, पानी से धोकर, भली-भाँति धोई हुई स्थाली (हाँडी) में डालकर, आधा जल मिले गोमूत्र से भिगोकर, दर्वी (कलछी) से निरन्तर चलाते हुए पकाए। जल के अधिकतर खप जाने पर और औषधों का रस निकल जाने पर स्थाली को (आग से) उतारकर, उस भली-भाँति छाने हुए, सुहाते गरम (गुनगुने) कषाय (काढ़े) को मदनफल (मैनफल), पिप्पली और विडङ्ग (वायविडंग) के कल्क (पिसी लुगदी) तथा तैल से युक्त करके और स्वर्जिका (सज्जीखार) से नमकीन करके, बस्ति में भरकर इसे विधि के अनुसार आस्थापन दे। इसी प्रकार अर्क (आक), अलर्क, कुटज, आढकी (अरहर), कुष्ठ (कूठ) और कैडर्य के कषाय से, या इसी प्रकार शिग्रु, पीलु, कुस्तुम्बुरु (धनिया), कटुका (कुटकी) और सर्षप के कषाय से, (या) इसी प्रकार आमलक (आँवला), शृङ्गवेर (अदरक), दारुहरिद्रा (दारुहल्दी) और पिचुमर्द (नीम) के कषाय से, (जो) मदनफल आदि के मेल से तैयार किया गया हो, तीन बार या सात रात (दिन) तक आस्थापन दे।

च. वि. ७/१८

; , ; ॥ १८ ॥

और अन्तिम बस्ति के लौट आने पर, फिर से सँभल गए (रोगी) को उसी दिन युक्ति से उभयतोभागहर (ऊपर और नीचे, दोनों मार्गों से दोष निकालने वाला) संशोधन पिलाए। उसकी विधि बताई जाएगी: मदनफल (मैनफल) और पिप्पली के कषाय (काढ़े) की आधी अञ्जलि भर मात्रा में एक अक्ष भर त्रिवृत् (निशोथ) का कल्क (पिसी लुगदी) घोलकर इसे पीने के लिए दे; वह इसके दोष को दोनों ओर से भली-भाँति निकालता है। इसी प्रकार सब विशेषों (विशेष बातों) को ध्यान में रखते हुए वैद्य कल्प में कहे गए वमन और विरेचन (के योगों) को मिलाकर बुद्धि से इसे पिलाए।

च. वि. ७/१९

। ; । , ॥ १९ ॥

फिर इसे भली-भाँति विरिक्त (विरेचन से शुद्ध) हुआ जानकर अपराह्ण (दोपहर बाद) में शैखरिक के सुहाते गरम (गुनगुने) कषाय (काढ़े) से (इसका) परिषेचन करे (धार डालकर नहलाए)। और उसी कषाय से (इसके) बाहरी और भीतरी, जल के सब काम सदा कराए; उसके अभाव में कटु, तिक्त और कषाय (रस वाली) औषधों के क्वाथों (काढ़ों) से, या मूत्रों और क्षारों से परिषेचन करे। और परिषेचन किए हुए इसे वायु से रहित घर में प्रवेश कराकर पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक (चीता) और शृङ्गवेर (अदरक) से सिद्ध (पकाई गई) यवागू (पतली लपसी) आदि से क्रम से (इसका) उपचार करे; और विलेपी (गाढ़ी लपसी) के क्रम तक पहुँच जाने पर इसे विडङ्ग (वायविडंग) के तैल से एक दिन छोड़कर दो या तीन बार अनुवासन (स्नेह की बस्ति) दे।

च. वि. ७/२०

, ॥ २० ॥

और यदि (वैद्य) कभी यह समझे कि इस (रोगी) के शीर्षाद (सिर को खाने वाले) कृमि बहुत बढ़ गए हैं और सिर में ही फैल रहे हैं, तो स्नेह और स्वेद से इसके सिर को तैयार करके अपामार्ग के तण्डुल (बीज) आदि वाले शिरोविरेचन से (सिर का) विरेचन करे।

च. वि. ७/२१

, , । ; ; ॥ २१ ॥

कृमियों की प्रकृति (उत्पत्ति के आधार) के नाश के लिए जो आहार की विधि कही गई है, अब हम उसकी व्याख्या करेंगे: मूलकपर्णी को जड़, अग्रभाग और प्रतानों (फैलने वाली टहनियों) सहित लाकर, टुकड़े-टुकड़े कटवाकर, उलूखल (ओखली) में कुटवाकर और दोनों हाथों से निचोड़कर रस ले; उस रस में लाल शालि चावल का आटा घोलकर पूपलिका (टिकिया) बनाए, उसे धुएँ रहित अंगारों पर सेंककर, विडङ्ग, तैल और लवण से युक्त करके, जिसके कोष्ठ में कृमि हों उस (रोगी) को खाने के लिए दे, और उसके बाद पिप्पली आदि पाँच (द्रव्यों) के वर्ग से मिलाया हुआ, लवण सहित खट्टा काञ्जिक या उदश्वित् (पानी मिला मट्ठा) पिलाए। इसी विधि से मार्कव, अर्क (आक), सहचर, नीप, निर्गुण्डी, सुमुख, सुरस, कुठेरक, गण्डीर, कालमालक, पर्णास, क्षवक, फणिज्झक, बकुल, कुटज (कुड़ा) और सुवर्णक्षीरी के स्वरसों में से किसी एक में पूपलिकाएँ बनवाए; उसी प्रकार किणिही, किराततिक्तक (चिरायता), सुवहा, आमलक (आँवला), हरीतकी (हरड़) और बिभीतक (बहेड़ा) के स्वरसों में पूपलिकाएँ बनवाए; और इनके स्वरसों को एक-एक करके, दो-दो मिलाकर या सब एक साथ, मधु में घोलकर, सुबह बिना कुछ खाए (रोगी) को पीने के लिए दे।

च. वि. ७/२२

। ॥ २२ ॥

इसके बाद घोड़े की लीद लाकर, एक बड़े किलिञ्जक (चटाई) पर फैलाकर, धूप में सुखाकर, उदूखल (ओखली) में कुटवाकर, फिर सिल पर बारीक चूर्ण बनवाकर, विडङ्ग के कषाय (काढ़े) से या त्रिफला के कषाय से आठ बार या दस बार धूप में भली-भाँति भावना देकर, फिर सिल पर बारीक चूर्ण बनवाकर, नए कलश (घड़े) में डालकर सुरक्षित रखवा दे। उन चूर्णों में से एक हथेली भर, या जितना (वैद्य) उचित समझे, उसे क्षौद्र (मधु) में मिलाकर, जिसके कोष्ठ में कृमि हों उस (रोगी) को चाटने के लिए दे।

च. वि. ७/२३

, । ; , । ॥ २३ ॥

इसी प्रकार भल्लातक (भिलावे) की गुठलियाँ लाकर, और कलश के प्रमाण से (कलश-भर) कूटकर, स्नेह से भावित, दृढ़, तले में अनेक बारीक छेदों वाले, (और) शरीर (बाहरी भाग) को लपेटकर मिट्टी से लीपे गए कलश में डालकर, उडुप (ढक्कन) से ढककर, भूमि में कण्ठ (गले) तक गाड़े गए, वैसे ही स्नेह से भावित, दूसरे दृढ़ कुम्भ के ऊपर (उसे) रखकर, चारों ओर गोबर (के उपले) चुनकर जलाए; वह (वैद्य) जब जाने कि गोबर (के उपले) अच्छी तरह जल गए हैं और भल्लातक की गुठलियाँ स्नेह से रहित हो गई हैं, तब उस कुम्भ को (भूमि से) निकाले। फिर उस दूसरे कुम्भ से स्नेह लेकर, (उसे) स्नेह की आधी मात्रा वाले विडङ्ग (वायविडंग) के दानों के चूर्ण के साथ मिलाकर, पूरे दिन धूप में रखकर, फिर इस (रोगी) को पीने के लिए (उसकी) मात्रा दे; उससे (रोगी का) अच्छी तरह विरेचन होता है, और विरेचन हो चुके (रोगी) का (आगे का) क्रम (आनुपूर्वी) वैसा ही है जैसा (पहले) कहा गया है। इसी प्रकार भद्रदारु (देवदारु) और सरल (चीड़) की लकड़ी के स्नेह तैयार करके पीने के लिए दे।

च. वि. ७/२४

॥ २४ ॥

और अनुवासन के (उचित) समय पर इसे अनुवासन (स्नेह-बस्ति) दे।

च. वि. ७/२५

; , , , , , , , , , , , , ; , ॥ २५ ॥

फिर (वैद्य) कहे, 'लाओ' - शरद् ऋतु में उपजे, नए, (उत्तम) गुणों से युक्त तिल; उन्हें लाकर, फटककर अच्छी तरह साफ़ करके, अच्छी तरह शुद्ध करके, गुनगुने विडङ्ग-कषाय (वायविडंग के काढ़े) में डालकर दोष (अशुद्धि) के दूर होने तक भिगोए रखे; (उन्हें) दोष से रहित देखकर, छिलका उतारकर अच्छी तरह छीलकर, फिर से फटककर अच्छी तरह साफ़ करके, अच्छी तरह शुद्ध करके, विडङ्ग-कषाय से इक्कीस (तीन गुना सात) बार अच्छी तरह भावना देकर, धूप में सुखाकर, उलूखल (ओखली) में कूटकर, फिर सिल पर बारीक पिसवाकर, द्रोणी (नाँद) में रखकर, विडङ्ग-कषाय को बार-बार छिड़कते हुए हाथों से ही मसल-मसलकर मर्दन करे; और उसके दबाए जाने पर जो तैल ऊपर निकल आए, उसे दोनों हाथों से समेटकर, साफ़ और दृढ़ कलश में रखकर सुरक्षित रूप से रखवा दे।

च. वि. ७/२६

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फिर (वैद्य) कहे, 'लाओ: तिल्वक और उद्दालक के, विडङ्ग (वायविडंग) के कषाय (काढ़े) से बारीक पीसे हुए, बिल्व भर परिमाण वाले दो पिण्ड; श्यामा और त्रिवृत् (निशोथ) के, उनसे आधे परिमाण वाले (दो पिण्ड); दन्ती और द्रवन्ती के, इनसे आधे परिमाण वाले (दो पिण्ड); और चव्य और चित्रक (चीता) के, इनसे भी आधे परिमाण वाले (दो पिण्ड)।' इस (औषध-) संग्रह को आधे आढक भर विडङ्ग के कषाय से मिलाकर, उसमें वह प्रस्थ भर तैल डालकर, सबको भली-भाँति घोलकर, एक बड़े कड़ाह (पर्योग) में उड़ेलकर और आग पर चढ़ाकर, आसन पर सुख से बैठा हुआ (वैद्य) स्नेह (तैल) को सब ओर से लगातार देखते हुए और करछी से निरन्तर चलाते हुए मन्द आँच पर पकाए। जब वह जाने कि शब्द (आवाज) थम गया है, झाग बैठ गया है, स्नेह निर्मल हो गया है, अपने-अपने अनुरूप गन्ध, वर्ण (रंग) और रस (स्वाद) उत्पन्न हो गए हैं, और उँगलियों से मसलने पर औषध न बहुत नरम, न बहुत कठोर, और उँगलियों में न चिपकने वाला होकर बत्ती-सा बँध जाता है, तो वही उसे (आग से) उतारने का समय है। तब उसे उतारकर, ठण्डा हो जाने पर नये कपड़े से छानकर, स्वच्छ और मजबूत कलश में उड़ेलकर, ढक्कन से ढककर, सफेद कपड़े की पट्टी से लपेटकर, धागे से भली-भाँति बाँधकर, भली-भाँति सुरक्षित रखवा दे। फिर इस (रोगी) को पीने के लिए (उसकी) मात्रा दे; उससे भली-भाँति विरेचन होता है; और जिसके दोष ठीक प्रकार से निकल गए हों, उसके लिए (आगे का) क्रम वही है जो कहा गया है। फिर अनुवासन के समय उसे अनुवासन (बस्ति) दे। और इसी पकाने की विधि से सर्षप (सरसों), अतसी (अलसी), करञ्ज और कोषातकी के स्नेह (तैल) तैयार करके, सब विशेष बातों को ध्यान में रखते हुए (रोगी को) पिलाए। उससे (रोगी) रोगमुक्त हो जाता है।

च. वि. ७/२७

। , ; । । ॥ २७ ॥

इस प्रकार श्लेष्मा (कफ) और पुरीष (मल) से उत्पन्न होने वाले दोनों (प्रकार के) कृमियों के समुत्थान (उत्पत्ति के कारण), संस्थान (आकार), वर्ण, नाम, प्रभाव और चिकित्सा की विशेषताएँ सामान्य रूप से बताई गईं। परन्तु विशेष रूप से, पुरीषज कृमियों की चिकित्सा इन्हीं औषधों से, थोड़ी मात्रा में, और अधिकतर आस्थापन, अनुवासन और अनुलोमहरण (नीचे के मार्ग से निकालने) के द्वारा करनी चाहिए; और श्लेष्मज कृमियों की चिकित्सा इन्हीं औषधों से, अधिक मात्रा में, और अधिकतर शिरोविरेचन, वमन और उपशमन के द्वारा करनी चाहिए। इस प्रकार यह कृमिनाशक भेषज-विधि (औषध-विधि) बताई गई है। इसका पालन करने वाले को अपने-अपने (कृमियों के) हेतुओं से बचने का प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार, जैसा उद्देश (पहले कथन) था, उसके अनुसार यह कृमिकोष्ठ (जिसके कोष्ठ में कृमि हों, उस रोगी) की चिकित्सा ठीक-ठीक बताई गई है।

च. वि. ७/२८

- । ॥ २८ ॥

और यहाँ (ये श्लोक) हैं: कृमियों की पहली औषध (चिकित्सा) अपकर्षण (उन्हें बाहर निकालना) ही मानी गई है; उसके बाद प्रकृति का विघात (नाश) और निदान (कारण) का वर्जन (त्याग)।

च. वि. ७/२९

। ॥ २९ ॥

कृमियों को लक्ष्य करके जो यह तीन प्रकार की विधि कही गई है, यही सभी विकारों (रोगों) के निग्रह (नियन्त्रण) में भी (उपयोगी) देखी गई है।

च. वि. ७/३०

। ॥ ३० ॥

संशोधन, संशमन और निदान का वर्जन: वैद्य को प्रत्येक रोग में विधि के अनुसार इतना करना चाहिए।

च. वि. ७/३१

- । ॥ ३१ ॥

इस विषय में दो (संग्रह-) श्लोक हैं: दो (प्रकार के) रोगी पुरुष; जानकार और अनजान, दो (प्रकार के) वैद्य, (अपने) प्रयोजन सहित; बीस कृमि; और उनका हेतु आदि सात (बातों) का समूह

च. वि. ७/३२

। ॥ ३२ ॥

(यह सब) परम ऋषि द्वारा, शिष्यों को समझाने के लिए और रोगों के प्रशमन (शान्ति) के लिए, व्याधितरूपीय विमान में कहा गया है।

च. वि. ७

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र (ग्रन्थ) के विमानस्थान में व्याधितरूपीयविमान नामक सातवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।