भारत संहिता

अध्याय ११

क्षतक्षीणचिकित्सितम्

क्षत और क्षीणता की चिकित्सा

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भूमिका

क्षतक्षीणचिकित्सित चरक संहिता के चिकित्सास्थान का ग्यारहवाँ अध्याय है, और इसका नाम इसके विषय से बना है: क्षत और क्षीणता की चिकित्सा। अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय का है, जिन्हें अध्याय उदार कीर्ति वाले, परमार्थ को जानने वाले ब्रह्मर्षि कहता है। यहाँ क्षत का अर्थ है छाती का भीतर से विक्षत, यानी बुरी तरह घायल, हो जाना; और क्षीण वह रोगी है जो इस घाव से, और शुक्र तथा ओज के क्षय से भी, अत्यधिक क्षीण होता जाता है, यानी दुबला और दुर्बल होता जाता है।

अध्याय पहले कारण गिनाता है: धनुष से अत्यधिक परिश्रम करना, भारी बोझ उठाना, ऊँचे या ऊबड़-खाबड़ स्थानों से गिरना, बलवानों से लड़ना, दौड़ते बैल या घोड़े को रोकना, शिला, लकड़ी और पत्थर फेंकना, दूसरों पर प्रहार करना, बहुत ऊँचे स्वर में पाठ करना, दूर तक तेज़ चलना, बड़ी नदी पार करना, घोड़ों के साथ दौड़ना, अचानक दूर तक उछलना, बहुत नाचना, और ऐसे ही दूसरे कठोर कामों से चोट खाना। इनसे छाती विक्षत होती है और एक बलवान् व्याधि उठ खड़ी होती है; स्त्रियों में अत्यधिक आसक्त, और रूखा, थोड़ा और नपा-तुला भोजन करने वाले व्यक्ति में भी। फिर लक्षण आते हैं: छाती में पीड़ा, जिसे अध्याय छाती के फटने और टूटने के रूप में बताता है; दोनों पार्श्वों का भिंचना, शरीर का सूखना और काँपना; वीर्य, बल, वर्ण, रुचि और अग्नि का क्रम से घटना; ज्वर, व्यथा, मन की दीनता और पतला मल; और खाँसी के साथ दूषित, दुर्गन्ध वाला, गाँठदार और रक्त मिला श्लेष्मा। क्षत में छाती की पीड़ा, रक्त की उल्टी और विशेष प्रकार की खाँसी होती है, और क्षीण में मूत्र में रक्त और पार्श्व, पीठ और कमर की जकड़न। इसके पूर्वरूप अव्यक्त बताए गए हैं। अध्याय के अनुसार थोड़े लक्षणों वाले, दीप्त अग्नि वाले और बलवान् रोगी का नया रोग साध्य है, वर्ष भर पुराना याप्य है, और सब लक्षणों वाले रोग को वैद्य छोड़ दे।

चिकित्सा लाक्षा (लाख) से आरम्भ होती है: अध्याय कहता है कि छाती में क्षत जानते ही रोगी मधु मिली लाक्षा दूध के साथ पिए, और रोगी की दशा के अनुसार यह योग बदला जाता है। इसके बाद बहुत-से योग गिनाए गए हैं, जिनमें दूध, घी, मधु, शर्करा, मांस-रस और जीवनीय औषधियाँ बार-बार आती हैं: क्षत के जुड़ने (सन्धान) के लिए दूध के योग; चाटने के योग; एलादि गुटिका; अमृतप्राश घृत, श्वदंष्ट्रादि घृत और कई दूसरे घृत; सर्पिर्गुड, यानी घी से बनी गोलियाँ (यहाँ 'गुड' का अर्थ गोला है, गुड़ नहीं), जिनके कई योग हैं; और अन्त में सर्पिर्मोदक। इन योगों के गुण रक्त थूकने, खाँसी, पार्श्व के शूल, शोष, क्षय और रक्तपित्त को दूर करना, और मांस, शुक्र, बल और पुष्टि को बढ़ाना बताए गए हैं। एक घृत के बारे में अध्याय यह भी बताता है कि पित्त बढ़ा हो तो उसे चाटा जाए और वात बढ़ा हो तो पिया जाए, क्योंकि चाटा हुआ घृत थोड़ा होने से अग्नि को नष्ट नहीं करता, और पिया हुआ वात को दबा लेता है।

अध्याय का अन्तिम भाग अलग-अलग स्थितियों की बात करता है। स्त्रियों में अति आसक्त पुरुष के बस्ति-प्रदेश में वात विकार करे, तो उसके लिए वात को नष्ट करने वाले, बृंहण और वृष्य योग कहे गए हैं; और क्षीण रोगी के लिए फलों से खट्टा किया यूष, सत्तू का मन्थ, जाङ्गल पशु-पक्षियों का मांस-रस, और गाय, भैंस, बकरी आदि के दूध के साथ जौ का अन्न। अध्याय के अनुसार यह आहार दीप्त अग्नि वाले रोगी के लिए है; अग्नि मन्द हो तो दीपन और पाचन विधि कही गई है, और मल पतला हो तो ग्राही विधि, और इसी प्रसंग में सैन्धवादि चूर्ण और षाडव दिए गए हैं। फिर नागबला की जड़ का एक प्रयोग आता है, जिसे दूध के साथ एक मास तक, केवल दूध पर रहकर, लेने को कहा गया है। अध्याय का सामान्य नियम यह है कि क्षत और क्षीण रोगी वह अन्न-पान लें जो पोषण दे, शीत हो, जलन न करे, हितकर हो और हल्का हो, और यक्ष्मा, कास और रक्तपित्त के रोगियों के लिए कहे गए पथ्य भी अग्नि, व्याधि, सात्म्य और बल देखकर अपनाए जाएँ। अध्याय चेतावनी देता है कि इस रोग की उपेक्षा करने पर उसके पीछे यक्ष्मा लग जाता है, इसलिए यक्ष्मा के आने से पहले ही इसे शीघ्र जीतना है। दो सार-श्लोक बताते हैं कि यह सब पुनर्वसु ने अपने ज्येष्ठ शिष्य को कहा, और पुष्पिका के अनुसार चिकित्सास्थान का यह भाग दृढबल ने पूरा किया।

इस अध्याय से साथ ले जाने योग्य बातें ये हैं: चरक संहिता के अनुसार भारी ज़ोर, चोट और अति से छाती भीतर से घायल हो सकती है, और यह रोग शरीर को क्षीण करता जाता है; नया रोग, बलवान् और दीप्त अग्नि वाले रोगी में, साध्य माना गया है, जबकि वर्ष भर पुराना केवल याप्य; अध्याय की चिकित्सा का मुख्य स्वर शरीर को पोषण और पुष्टि देना है, पर आहार रोगी की अग्नि की दशा देखकर बदला जाता है; और अध्याय के अनुसार इस रोग को अनदेखा नहीं करना है, क्योंकि उपेक्षा करने पर इसके पीछे यक्ष्मा लग जाता है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ९६-९७)

तत्र श्लोकौ-क्षतक्षयसमुत्थानं सामान्यपृथगाकृतिम्।असाध्ययाप्यसाध्यत्वं साध्यानां सिद्धिमेव च॥

श्लोक ९६ →

इस विषय में (संग्रह के) दो श्लोक (हैं): क्षत और क्षय का समुत्थान (उत्पत्ति), (उनकी) सामान्य और अलग-अलग आकृति (लक्षण), असाध्यता, याप्यता और साध्यता, और साध्य (रोगियों) की सिद्धि (सफल चिकित्सा) भी,

उक्तवाञ्ज्येष्ठशिष्याय क्षतक्षिणचिकित्सिते।तत्त्वार्थविद्वीतरजस्तमोदोषः पुनर्वसुः॥

श्लोक ९७ →

तत्त्वार्थ (सत्य अर्थ) को जानने वाले, रज और तम (नामक) दोषों से रहित पुनर्वसु ने (यह सब) क्षतक्षीणचिकित्सित (अध्याय) में (अपने) ज्येष्ठ शिष्य को कहा।

मुख्य शब्द (१४) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

आरोग्य
आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार

शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।

अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।

चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

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च. चि. ११/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम क्षतक्षीणचिकित्सित (क्षत और क्षीण की चिकित्सा सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. चि. ११/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. चि. ११/३

। ॥ ३ ॥

उदार (महान्) कीर्ति वाले, परमार्थ (परम सत्य) को जानने वाले ब्रह्मर्षि आत्रेय ने क्षत और क्षीण (रोगियों) की चिकित्सा के लिए यह चिकित्सित (चिकित्सा का उपदेश) कहा।

च. चि. ११/४

। ॥ ४ ॥

धनुष से अत्यधिक परिश्रम करने वाले, भारी भार उठाने वाले, ऊबड़-खाबड़ और ऊँचे (स्थानों) से गिरने वाले, बलवानों के साथ लड़ने वाले

च. चि. ११/५

। ॥ ५ ॥

दौड़ते हुए बैल या घोड़े को, या किसी अन्य दम्य (सधाए जाने वाले पशु) को बलपूर्वक रोकने वाले, शिला, काष्ठ (लकड़ी) और पत्थरों के निर्घात (प्रहार) फेंकने वाले, दूसरों पर प्रहार करने वाले

च. चि. ११/६

। ॥ ६ ॥

या बहुत ऊँचे स्वर में अध्ययन (पाठ) करने वाले, या दूर तक तेज़ी से चलने वाले, या बड़ी नदी को (तैरकर) पार करने वाले, या घोड़ों के साथ दौड़ने वाले

च. चि. ११/७

। ॥ ७ ॥

सहसा दूर तक उछलने वाले, और तेज़ी से अत्यधिक नाचने वाले, तथा अन्य क्रूर (कठोर) कर्मों से बहुत चोट खाए हुए (व्यक्ति) की

च. चि. ११/८

। ॥ ८ ॥

छाती विक्षत (बुरी तरह घायल) हो जाने पर एक बलवान् व्याधि उत्पन्न होती है। और स्त्रियों में अत्यधिक आसक्त रहने वाले, तथा रूखा, अल्प और प्रमित (नपा-तुला) भोजन करने वाले (व्यक्ति) में भी (यह व्याधि उत्पन्न होती है)।

च. चि. ११/९

। ॥ ९ ॥

उसकी छाती में पीड़ा होती है, (वह) फटती है और फिर (टुकड़ों में) बँटती है; फिर दोनों पार्श्व (पसलियों वाले भाग) भिंचते हैं, शरीर सूखता है और काँपता है।

च. चि. ११/१०

। ॥ १० ॥

क्रम से (धीरे-धीरे) वीर्य, बल, वर्ण (रंग-रूप), रुचि और अग्नि घटते जाते हैं; ज्वर, व्यथा (पीड़ा), मन की दीनता, और अग्नि के नष्ट होने से विड्भेद (मल का पतला आना) भी (होता है)।

च. चि. ११/११

। ॥ ११ ॥

और खाँसते हुए (उस रोगी) का श्लेष्मा (कफ) दूषित, श्याव (कालापन लिए भूरा), बहुत दुर्गन्ध वाला, पीला, गाँठदार, बहुत (मात्रा में) और रक्त सहित निकलता है।

च. चि. ११/१२

। ॥ १२ ॥

वह क्षत (छाती में घाव वाला रोगी) अत्यधिक क्षीण होता जाता है, और इसी प्रकार शुक्र तथा ओज के क्षय से भी (क्षीण होता है)। इसके अव्यक्त (अस्पष्ट) लक्षण पूर्वरूप माने गए हैं।

च. चि. ११/१३

। ॥ १३ ॥

क्षत में छाती की पीड़ा, रक्त की छर्दि (उल्टी) और वैशेषिक (विशेष प्रकार की) कास (खाँसी) होती है; क्षीण में मूत्र में रक्त आना, और पार्श्व (पसलियों वाले भाग), पीठ तथा कमर की जकड़न (होती है)।

च. चि. ११/१४

। ॥ १४ ॥

जिसके लक्षण थोड़े हों, अग्नि दीप्त (तेज़) हो और जो बलवान् हो, उसका नया (रोग) साध्य है; वर्ष भर पुराना (रोग) याप्य है; परन्तु सब लक्षणों वाले (रोग) को (वैद्य) छोड़ दे।

च. चि. ११/१५

। ॥ १५ ॥

छाती को क्षत (घायल) जानकर (रोगी) तुरन्त ही मधु मिली लाक्षा (लाख) दूध के साथ पिए; (उसके) पच जाने पर शर्करा (शक्कर) सहित (भोजन) दूध के साथ खाए।

च. चि. ११/१६

। ॥ १६ ॥

पार्श्व (पसलियों वाले भाग) और बस्ति (मूत्राशय) में पीड़ा वाला, और अल्प पित्त तथा अग्नि वाला (रोगी) उस (लाक्षा) को सुरा (एक प्रकार की मदिरा) मिलाकर (पिए); जिसका मल भिन्न (पतला) हो, वह (उसे) मुस्ता (नागरमोथा), अतिविषा (अतीस), पाठा और वत्सक (कुटज) मिलाकर (पिए)।

च. चि. ११/१७

। ॥ १७ ॥

जिसकी अग्नि दीप्त (पाचन-शक्ति प्रबल) हो, वह लाक्षा (लाख), सर्पि (घी), मधूच्छिष्ट (मोम), जीवनीय गण (की औषधियाँ), सिता (सफ़ेद शक्कर), त्वक्क्षीरी और समिता (गेहूँ का आटा), इन्हें दूध में पकाकर पिए।

च. चि. ११/१८

। ॥ १८ ॥

क्षत वाला (रोगी) सन्धान (क्षत के जुड़ने) के लिए इक्ष्वालिका, बिसग्रन्थि (कमल-नाल की गाँठ), पद्मकेशर (कमल के केसर) और चन्दन के साथ उबाला हुआ दूध, मधु मिलाकर, पिए।

च. चि. ११/१९

। ॥ १९ ॥

जौ का चूर्ण लेकर, (उसे) दूध में सिद्ध करके और घी से तर करके; अथवा ज्वर और दाह (जलन) में सिता (सफ़ेद शक्कर), क्षौद्र (मधु) और सक्तु (सत्तू) दूध के साथ पिए।

च. चि. ११/२०

। ॥ २० ॥

कास (खाँसी) वाला और पार्श्व (बगल) तथा अस्थियों में शूल वाला (रोगी) मधूक (महुआ), मधुक (मुलेठी), द्राक्षा, त्वक्क्षीरी, पिप्पली और बला को घी और माक्षिक (मधु) के साथ चाटे।

च. चि. ११/२१

। ॥ २१ ॥

एला (इलायची), पत्र (तेजपत्र) और त्वक् (दालचीनी) आधा-आधा अक्ष, पिप्पली आधा पल, तथा सिता (सफ़ेद शक्कर), मधुक (मुलेठी), खर्जूर (खजूर) और मृद्वीका (अंगूर) एक-एक पल की मात्रा में (हों)।

च. चि. ११/२२

। ॥ २२ ॥

(इन सबका) चूर्ण बनाकर, मधु से मिलाकर गुटिकाएँ (गोलियाँ) बनाए। फिर मनुष्य प्रतिदिन अक्ष-भर मात्रा की एक (गोली) खाए।

च. चि. ११/२३

। ॥ २३ ॥

(यह गुटिका) कास (खाँसी), श्वास, ज्वर, हिक्का (हिचकी), छर्दि (उल्टी), मूर्च्छा (बेहोशी), मद, भ्रम (चक्कर), रक्त थूकने, तृष्णा (प्यास), पार्श्वशूल और अरोचक (अरुचि) को

च. चि. ११/२४

। ॥।

शोष, प्लीहा (के रोग), आढ्यवात, स्वरभेद (आवाज़ का बिगड़ना), क्षत और क्षय को, और रक्तपित्त को भी, यह तर्पण करने वाली और वृष्य गुटिका नष्ट करती है। इस प्रकार यह एलादि गुटिका है।

च. चि. ११/२५

। ॥ २५ ॥

रक्त के बहुत अधिक निकलने पर (रोगी) दक्ष (मुर्गी) का अण्डा यूषों के साथ या जल के साथ पिए; अथवा चटक (गौरैया) के अण्डों का रस, या बकरे का या जाङ्गल पशुओं का रक्त (पिए)।

च. चि. ११/२६

। ॥ २६ ॥

रक्त थूकने वाला (रोगी) पुनर्नवा का चूर्ण, रक्तशालि (लाल शालि धान) के चावल और शर्करा के साथ, द्राक्षा के रस, दूध और घी में सिद्ध करके पिए।

च. चि. ११/२७

। ॥ २७ ॥

अथवा मधूक (महुआ) और मधुक (मुलेठी) के साथ दूध में सिद्ध किया हुआ तण्डुलीयक (ले)। परन्तु जिसका वात मूढ (अटका हुआ) हो, वह सुरा में भुना हुआ और सैन्धव (सेंधा नमक) मिला अजा (बकरी) का मेद (ले)।

च. चि. ११/२८

। ॥ २८ ॥

जो क्षाम (दुबला), क्षीण, क्षतोरस्क (छाती में क्षत वाला) और अनिद्र (जिसे नींद न आती हो) हो, वह अनिल (वात) के बलवान होने पर उबाले हुए दूध के सर (मलाई) के साथ, क्षौद्र (मधु), घी और शर्करा मिलाकर खाए।

च. चि. ११/२९

। ॥ २९ ॥

क्षीण, क्षती (क्षत वाला) और कृश (दुबला) (रोगी) शर्करा, जौ और गेहूँ, जीवक और ऋषभक, तथा मधु को चाटे; अथवा उबाले हुए दूध के अनुपान के साथ (चाटे)।

च. चि. ११/३०

। ॥ ३० ॥

और वह (रोगी) क्रव्याद (मांसाहारी) पशुओं के मांस का निर्यूह (रस), घी में भुना हुआ, पिप्पली और क्षौद्र (मधु) मिलाकर पिए, जो मांस और शोणित (रक्त) को बढ़ाने वाला है।

च. चि. ११/३१

। ॥ ३१ ॥

न्यग्रोध (बरगद), उदुम्बर (गूलर), अश्वत्थ (पीपल), प्लक्ष (पाकड़), शाल (साल), प्रियङ्गु, तालमस्तक (ताड़ का शीर्ष भाग), जम्बू (जामुन) की त्वक् (छाल), प्रियाल (चिरौंजी) और पद्मक के साथ

च. चि. ११/३२

। ॥ ३२ ॥

(उन द्रव्यों और) अश्वकर्ण के साथ औटाए गए दूध से उत्पन्न घृत के साथ, जिसकी छाती में क्षत (घाव) हो और जिसका शुक्र क्षीण हो गया हो, वह मनुष्य शालि चावल का भात खाए।

च. चि. ११/३३

। ॥ ३३ ॥

यष्ट्याह्व (मुलेठी) और नागबला के क्वाथ (काढ़े) में, पयस्या, पिप्पली और वांशी के कल्क के साथ सिद्ध किया (पकाया) हुआ, दूध के बराबर (मात्रा वाला) घृत क्षत में शुभ (हितकर) है।

च. चि. ११/३४

। ॥ ३४ ॥

उसी प्रकार, कोल (बेर) और लाक्षा (लाख) के रस में, आठ गुने दूध के साथ, कट्वङ्ग, दार्वी (दारुहल्दी) की छाल, और वत्सक (कुटज) की छाल और फल के कल्कों से साधित (पकाया गया) घृत (भी हितकर है)।

च. चि. ११/३५

। ॥ ३५ ॥

जीवक और ऋषभक, वीरा, जीवन्ती, नागर (सोंठ), शटी, चार पर्णिनी, दोनों मेदा, दोनों काकोली, (और) दोनों निदिग्धिका,

च. चि. ११/३६

। ॥ ३६ ॥

दोनों पुनर्नवा, मधुक (मुलेठी), आत्मगुप्ता (कौंच), शतावरी, ऋद्धि, परूषक (फालसा), भार्गी (भारंगी), मृद्वीका (अंगूर) तथा बृहती (बड़ी कटेरी),

च. चि. ११/३७

।॥ ३७ ॥

शृङ्गाटक (सिंघाड़ा), तामलकी, पयस्या, पिप्पली, बला, और बदर (बेर), अक्षोट (अखरोट), खर्जूर (खजूर), वाताम (बादाम) और अभिषुक (के फल) भी,

च. चि. ११/३८

। ॥ ३८ ॥

और इसी प्रकार के (अन्य) फल भी; (इन सबके) एक-एक कर्ष के कल्क बनाए। धात्री (आँवला) का रस, विदारी और इक्षु (ईख) (का रस), बकरी के मांस का रस और दूध,

च. चि. ११/३९

। ॥ ३९ ॥

(इन द्रवों को) एक प्रस्थ के माप का करे; उससे एक प्रस्थ घृत पकाए। (घृत के) ठंडा होने पर (उसमें) आधा प्रस्थ मधु (शहद) और उसी प्रकार आधी तुला शर्करा (शक्कर),

च. चि. ११/४०

। ॥ ४० ॥

और पत्र (तेजपत्ता), एला (इलायची), हेम, त्वक् (दालचीनी) तथा मरिच (काली मिर्च), हर एक दो कर्ष, चूर्ण करके (उसमें) मिला दे; उसमें से मनुष्य सदा (उचित) मात्रा चाटे।

च. चि. ११/४१

। ॥ ४१ ॥

यह 'अमृतप्राश' नामक घृत मनुष्यों के लिए अमृत है। सुधा और अमृत जैसे रस वाला (यह घृत) दूध और मांसरस का आहार लेने वाले (मनुष्य) को खाना चाहिए।

च. चि. ११/४२

। ॥ ४२ ॥

(इस घृत से) जिनका शुक्र नष्ट हो गया हो, जो क्षत (से पीड़ित), क्षीण, दुर्बल और रोग से कृश हो गए हों, जो स्त्रियों में आसक्त हों, जो कृश हों, और जो वर्ण और स्वर से हीन हों, (उनका) बृंहण करे (उन्हें पुष्ट करे)।

च. चि. ११/४३

। ॥।

(यह) कास (खाँसी), हिक्का (हिचकी), ज्वर, श्वास, दाह (जलन), तृष्णा (प्यास) और अस्रपित्त (रक्तपित्त) को दूर करने वाला, पुत्र देने वाला, और वमि (उल्टी), मूर्च्छा, तथा हृदय, योनि और मूत्र के रोगों को नष्ट करने वाला है। इस प्रकार अमृतप्राश घृत (कहा गया)।

च. चि. ११/४४

। ॥ ४४ ॥

श्वदंष्ट्रा (गोखरू), उशीर (खस), मञ्जिष्ठा (मजीठ), बला, काश्मर्य (गम्भारी), कत्तृण, दर्भ की जड़, पृथक्पर्णी, पलाश (ढाक) और ऋषभक, (तथा) स्थिरा (शालपर्णी),

च. चि. ११/४५

। ॥ ४५ ॥

(इनमें से हर एक) एक पल (लेकर इन्हें) साधे (पकाए)। उनके रस (क्वाथ) में, जिसमें चार गुना दूध हो, (और) कल्क स्वगुप्ता, जीवन्ती, मेदा, ऋषभक और जीवक से,

च. चि. ११/४६

। ॥ ४६ ॥

(तथा) शतावरी, ऋद्धि, मृद्वीका (अंगूर), शर्करा (शक्कर), श्रावणी और बिस (कमल की नाल) से (बना हो); (इस प्रकार) सिद्ध किया (पकाया) हुआ एक प्रस्थ घृत वात, पित्त, हृद्द्रव और शूल को दूर करने वाला है,

च. चि. ११/४७

। ॥ ।

(यह घृत) मूत्रकृच्छ्र, प्रमेह, अर्श (बवासीर), कास (खाँसी), शोष और क्षय को दूर करता है, और धनुष (चलाने), स्त्री (-सेवन), मद्य, भार (ढोने) और मार्ग (चलने) से थके हुए लोगों को बल और मांस देता है। इस प्रकार श्वदंष्ट्रादि घृत (कहा गया)।

च. चि. ११/४८

। ॥ ४८ ॥

आठ पल मधुक (मुलेठी) और एक प्रस्थ द्राक्षा (अंगूर) के क्वाथ में, आठ पल पिप्पली के कल्क के साथ, एक प्रस्थ घृत पकाए। और (उसके) सिद्ध होकर ठण्डा हो जाने पर

च. चि. ११/४९

। ॥ ४९ ॥

(उसमें) आठ-आठ पल क्षौद्र (मधु) और शर्करा (शक्कर) मिलाए। बराबर (मात्रा में) सक्तु (सत्तू) के साथ वह क्षत-क्षीण (रोगी) में और रक्तगुल्म में हितकर है।

च. चि. ११/५०

। ॥ ५० ॥

वैद्य धात्रीफल (आँवले), विदारी, इक्षु (गन्ने) और जीवनीय (द्रव्यों) के रसों से, तथा बकरी और गाय के दूध से भी, घृत पकाए, सात प्रस्थ।

च. चि. ११/५१

।॥ ५१ ॥

और सिद्ध होकर ठण्डा हो जाने पर (उसमें) सिता (सफ़ेद शक्कर) और क्षौद्र (मधु) के दो प्रस्थ मिलाए। वह (घृत) यक्ष्मा, अपस्मार, पित्तासृक् (रक्तपित्त), कास, मेह और क्षय को दूर करने वाला,

च. चि. ११/५२

। ॥ ५२ ॥

वयःस्थापन (वय को स्थिर रखने वाला), आयुष्य (आयु बढ़ाने वाला) और मांस, शुक्र तथा बल देने वाला है। परन्तु (इस) घृत को, पित्त बहुत बढ़ा हो तो चाटे, (और) वात अधिक हो तो पिए।

च. चि. ११/५३

। ॥ ५३ ॥

चाटा हुआ (घृत) पित्त को शान्त करता है, (और) कम (मात्रा में) होने के कारण अनल (पाचक अग्नि) को नष्ट नहीं करता। पिया हुआ (घृत) अनिल (वात) को दबा लेता है और ऊष्मा (गर्मी) को रोकता है।

च. चि. ११/५४

। ॥ ५४ ॥

क्षाम (सूखे), क्षीण और कृश (दुबले) अङ्गों वाले (रोगियों) के लिए तो इन्हीं घृतों को त्वक्क्षीरी, शर्करा और लाज (खील) के चूर्णों से गाढ़ा करके प्रयोग करे।

च. चि. ११/५५

। ॥ ।

मधु के भाग सहित (इन) सर्पिर्गुडों (घी के गोलों) को खाकर, बाद में दूध पिए। उनसे (मनुष्य) रेतस् (शुक्र), वीर्य, बल और पुष्टि अधिक शीघ्र पाता है। इस प्रकार सर्पिर्गुड (कहे गए)।

च. चि. ११/५६

। ॥ ५६ ॥

बला, विदारी और ह्रस्व (छोटा) पञ्चमूल, पुनर्नवा, (तथा) पाँच क्षीरी वृक्षों (दूधिया रस वाले पेड़ों) की कोंपलें भी, (प्रत्येक) एक मुष्टि भाग।

च. चि. ११/५७

। ॥ ५७ ॥

इनके कषाय (क्वाथ) में, जिसमें दो (भाग) दूध हो और विदारी के रस तथा बकरी (के मांस) के रस का भाग हो, जीवनीय (द्रव्यों) के (एक-एक) अक्ष मात्रा के कल्कों के साथ एक आढक घृत पकाए।

च. चि. ११/५८

। ॥ ५८ ॥

(घृत के) छन जाने और ठण्डा हो जाने पर (उसमें) बत्तीस पल सिता (सफ़ेद शक्कर) डाले, (और) गेहूँ, पिप्पली और वांशी (वंशलोचन) का चूर्ण, और शृङ्गाटक (सिंघाड़े) का (चूर्ण)

च. चि. ११/५९

। ॥ ५९ ॥

माक्षिक (मधु) सहित, एक कुडव (की मात्रा में डाले)। खज (मथनी) से मथे हुए और गाढ़े हुए उस सब (मिश्रण) के सर्पिर्गुड (घी के गोले) बनाकर (उन्हें) भूर्जपत्र (भोजपत्र) में लपेट दे।

च. चि. ११/६०

। ॥ ६० ॥

पल-पल भर के उन (गोलों) को खाकर, बाद में दूध, या कफ (बढ़ा हो) तो मद्य पिए। शोष में, कास में, क्षत में, क्षीणता में, (तथा) श्रम, स्त्री (-सेवन) और भार (ढोने) से दुबले हुए (व्यक्ति) में

च. चि. ११/६१

। ॥ ।

रक्त थूकने में, ताप में, पीनस में, और (रक्त के) छाती में रुक जाने पर, पार्श्व (पसलियों) और सिर के शूल में, तथा स्वर और वर्ण के बिगड़ने में (ये सर्पिर्गुड) प्रशस्त हैं। इस प्रकार दूसरे सर्पिर्गुड (कहे गए)।

च. चि. ११/६२

।॥ ६२ ॥

त्वक्क्षीरी, श्रावणी, द्राक्षा (अंगूर), मूर्वा, ऋषभक और जीवक से, (तथा) वीरा, ऋद्धि, क्षीरकाकोली, बृहती और कपिकच्छु (कौंच) से

च. चि. ११/६३

। ॥ ६३ ॥

(तथा) खर्जूर (खजूर) के फल और मेदा से, (जो सब) दूध में पिसे हुए और एक-एक पल के माप के हों, और धात्री (आँवला), विदारी और इक्षु (गन्ने) के रस के एक-एक प्रस्थ के साथ, एक प्रस्थ घी पकाए।

च. चि. ११/६४

। ॥ ६४ ॥

(घी के) ठण्डा हो जाने पर (उसमें) आधा तुला शर्करा (शक्कर) और आधा प्रस्थ क्षौद्र (मधु) भी डालकर, कास (खाँसी), हिक्का (हिचकी) और ज्वर को दूर करने वाले सर्पिर्गुड बनाए।

च. चि. ११/६५

। ॥ ।

(ये सर्पिर्गुड) यक्ष्मा, तमक श्वास, रक्तपित्त, हलीमक, शुक्र और निद्रा के क्षय, तृष्णा, और कामला सहित कार्श्य (दुबलेपन) को नष्ट करते हैं। इस प्रकार तीसरे सर्पिर्गुड (कहे गए)।

च. चि. ११/६६

। ॥ ६६ ॥

नया (ताज़ा) आमलक (आँवला), द्राक्षा (अंगूर), आत्मगुप्ता (कौंच), पुनर्नवा, शतावरी और विदारी, तथा समङ्गा और पिप्पली

च. चि. ११/६७

। ॥ ६७ ॥

(इनके) दस-दस पल के अलग-अलग भाग, और नागर (सोंठ) से आठ पल, यष्ट्याह्व (मुलेठी) और सौवर्चल (काला नमक) का दो पल, और मरिच (काली मिर्च) का (भी दो पल)

च. चि. ११/६८

। ॥ ६८ ॥

और दूध, तेल और घी के तीन आढक में सौ (पल) शर्करा (डालकर उसके) उबाले जाने पर, (उसमें) वे चूर्ण डालकर बिल्व (बेल) के बराबर गुड (गोलियाँ)

च. चि. ११/६९

। ॥ ।

बनाए। क्षीण, क्षत और शुष्क मनुष्य उन्हें खाए। उससे वह शीघ्र ही रस आदि (धातुओं) की वृद्धि के द्वारा पुष्टि पाता है। इस प्रकार चौथे सर्पिर्गुड (कहे गए)।

च. चि. ११/७०

। ॥ ७० ॥

गाय के दूध का आधा आढक, घी एक प्रस्थ, इक्षुरस (गन्ने के रस) का एक आढक, विदारी के स्वरस से एक प्रस्थ, और तैत्तिर (तीतर के मांस के) रस से एक प्रस्थ

च. चि. ११/७१

। ॥ ७१ ॥

(इन्हें एक साथ) डाले। और उसके पकते समय इक्षुरस (गन्ने के रस) में पिसे हुए ये (द्रव्य डाले): मधूक (महुआ) के फूल एक कुडव, तथा प्रियाल (चिरौंजी) एक कुडव

च. चि. ११/७२

। ॥ ७२ ॥

आधा कुडव तुगाक्षीरी, खर्जूर (खजूर) और बिभीतक (बहेड़ा) अलग-अलग बीस-बीस, और पिप्पली की एक चतुर्थिका

च. चि. ११/७३

। ॥ ७३ ॥

और खण्ड (खाँड) से तीस पल, और मधुक (मुलेठी) से एक कर्ष ही, तथा यहाँ आधे-आधे पल के जीवनीय (द्रव्य) डलवाए।

च. चि. ११/७४

।॥ ७४ ॥

इसके पक जाने पर, ठण्डा होने पर (इसमें) एक कुडव क्षौद्र (मधु) डालकर, फिर मरिच (काली मिर्च) और अजाजी (जीरा) के एक पल चूर्ण से ऊपर से बुरके हुए मोदक (लड्डू) बनवाए।

च. चि. ११/७५

। ॥ ७५ ॥

वात, असृक् (रक्त) और पित्त के रोगों में, और क्षत, कास (खाँसी) और क्षय में, सूखते (क्षीण होते) जा रहे लोगों के लिए, जिनका शुक्र क्षीण हो गया है उनके लिए, और छाती में रक्त के ठहर जाने पर

च. चि. ११/७६

। ॥ ७६ ॥

कृश (दुबले), दुर्बल और वृद्ध लोगों के लिए, पुष्टि, वर्ण (रंग-रूप) और बल चाहने वालों के लिए, और योनि के दोष से उत्पन्न स्राव से पीड़ित स्त्रियों के लिए भी

च. चि. ११/७७

। ॥ ।

गर्भ चाहने वाली स्त्रियों के लिए, और जिनका गर्भ स्रवित हो जाता (गिर जाता) हो या मर जाता हो (उनके लिए भी): ये (मोदक) धन्य (सौभाग्य देने वाले) और बल देने वाले हैं, उन (स्त्रियों) के लिए हितकर हैं, और शुक्र तथा शोणित को बढ़ाते हैं। इस प्रकार पाँचवें सर्पिर्मोदक (कहे गए)।

च. चि. ११/७८

। ॥ ७८ ॥

स्त्री-संग में अति आसक्त (पुरुष) के बस्ति-प्रदेश (मूत्राशय के क्षेत्र) में मारुत (वात) के विकार उत्पन्न करने पर, (वैद्य) उसके लिए वात को नष्ट करने वाले, बृंहण (पुष्टि देने वाले) और वृष्य (वीर्य बढ़ाने वाले) योगों का प्रयोग करे।

च. चि. ११/७९

। ॥ ७९ ॥

अथवा (वह) शर्करा (शक्कर) और पिप्पली के चूर्णों, सर्पिः (घी) और माक्षिक (मधु) से युक्त उबाला हुआ क्षीर (दूध) पिए, जो कास (खाँसी) और ज्वर को दूर करता है।

च. चि. ११/८०

। ॥ ८० ॥

स्त्रियों (के अति-संग) से क्षीण हुआ (पुरुष) फलों से खट्टा किया हुआ, सर्पिः (घी) में भूना हुआ, और विदारी तथा इक्षु (गन्ने) के रस में पकाया हुआ यूष पिए, जो परम जीवन (जीवन-शक्ति देने वाला) और बृंहण (पुष्टि देने वाला) है।

च. चि. ११/८१

। ॥ ८१ ॥

जिसे यव (जौ) का अन्न सात्म्य (अनुकूल) है और जिसकी अग्नि दीप्त है, ऐसा क्षत-क्षीण मनुष्य कपड़े से छाने हुए सक्तु (सत्तू) का, क्षौद्र (मधु) और घृत (घी) से युक्त मन्थ पिए।

च. चि. ११/८२

। ॥ ८२ ॥

अथवा क्षीण (रोगी) के लिए जीवनीय (द्रव्यों) के साथ पकाया हुआ, घृत (घी) में भूना हुआ, शर्करा (शक्कर) सहित जाङ्गल (सूखे प्रदेश के पशु-पक्षियों के मांस का) रस व्यञ्जन के रूप में प्रयोग करे।

च. चि. ११/८३

। ॥ ८३ ॥

गाय, भैंस, घोड़ी, हथिनी और बकरी के दूधों के साथ, तथा मांस-रसों के साथ, और फलों से खट्टे किए हुए, घृत (घी) से संस्कारित यूषों के साथ (रोगी को) यव (जौ) का अन्न खिलाए।

च. चि. ११/८४

। ॥ ८४ ॥

अग्नि के दीप्त होने पर यह विधि हो; (अग्नि के) मन्द होने पर दीपन और पाचन (विधि हो)। और शकृत् (मल) के भिन्न (पतला) होने पर यक्ष्मा के रोगियों के लिए बताई गई ग्राही (मल को बाँधने वाली विधि) उचित मानी जाती है।

च. चि. ११/८५

। ॥ ८५ ॥

सैन्धव (सेंधा नमक) एक पल, शुण्ठी (सोंठ), और सौवर्चल (काला नमक) से दो पल; वृक्षाम्ल, दाडिम (अनार) और अर्जक से पत्र (पत्ते), एक-एक कुडव

च. चि. ११/८६

। ॥ ८६ ॥

मरिच (काली मिर्च) और अजाजी (जीरा) का एक-एक (भाग), धान्यक (धनिया) से दो चतुर्थिका; और इसमें शर्करा (शक्कर) के दस और दो (अर्थात् बारह) पल डलवाए।

च. चि. ११/८७

। ॥ ।

(इन सबका) चूर्ण बनाकर, इसमें से (उचित) मात्रा अन्न-पान (भोजन और पेय) में प्रयोग करे। यह रोचन (रुचि उत्पन्न करने वाला), दीपन (अग्नि को तेज़ करने वाला) और बल्य (बल देने वाला) है, और पार्श्व (पसलियों) की पीड़ा, श्वास और कास (खाँसी) को दूर करता है। इस प्रकार सैन्धवादि चूर्ण (कहा गया)।

च. चि. ११/८८

। ॥ ८८ ॥

धान्य (सम्भवतः धनिया) से एक षोडशिका, अजाजी (जीरा) और अजमोदा की दो-दो (षोडशिका), दाडिम (अनार) और वृक्षाम्ल उन दोनों से दुगुने-दुगुने, और सौवर्चल (काला नमक) से एक पल

च. चि. ११/८९

। ॥ ८९ ॥

शुण्ठी (सोंठ) का एक कर्ष, और दधित्थ (कैथ) के मध्य भाग (गूदे) से पाँच पल; (इन सबका) वह चूर्ण सोलह पल शर्करा (शक्कर) में मिलाए।

च. चि. ११/९०

। ॥ ।

यह षाडव पहले की तरह अन्न-पान (भोजन और पेय) में देना चाहिए। अनल (पाचन की अग्नि) मन्द होने पर और शकृद्भेद (मल पतला होने) पर यह यक्ष्मा के रोगियों की अग्नि बढ़ाने वाला है। इस प्रकार षाडव (कहा गया)।

च. चि. ११/९१

। ॥ ९१ ॥

नागबला की जड़ को, आधा-आधा कर्ष बढ़ाते हुए एक पल (तक), दूध मिलाकर एक मास तक पिए; (इस बीच वह) दूध पर ही निर्वाह करे और अन्न न खाए।

च. चि. ११/९२

। ॥ ९२ ॥

यह प्रयोग पुष्टि, आयु, बल और आरोग्य देने वाला (और) श्रेष्ठ है। मण्डूकपर्णी का (भी) यही कल्प (विधि) है, और वैसे ही शुण्ठी (सोंठ) और मधुक (मुलेठी) का (भी)।

च. चि. ११/९३

। ॥ ९३ ॥

जो-जो अन्न-पान (भोजन और पेय) संतर्पण (पोषण करने वाला), शीत, अविदाही (जलन न करने वाला), हितकर और लघु (हल्का) हो, सुख चाहने वाले क्षत और क्षीण (रोगियों) को उसका सेवन करना चाहिए।

च. चि. ११/९४

। ॥ ९४ ॥

और यक्ष्मा, कास (खाँसी) और रक्तपित्त के रोगियों के लिए जो पथ्य कहा गया है, वह भी अग्नि, व्याधि (रोग), सात्म्य और बल को देखकर करना चाहिए।

च. चि. ११/९५

। ॥ ९५ ॥

क्योंकि उस (रोग) की उपेक्षा करने पर यक्ष्मा का अनुबन्ध (पीछे-पीछे यक्ष्मा का लग जाना) हो जाता है, इसलिए उस (यक्ष्मा) के आने से पहले ही उस (रोग) को शीघ्रता से जीत लेना चाहिए।

च. चि. ११/९६

- । ॥ ९६ ॥

इस विषय में (संग्रह के) दो श्लोक (हैं): क्षत और क्षय का समुत्थान (उत्पत्ति), (उनकी) सामान्य और अलग-अलग आकृति (लक्षण), असाध्यता, याप्यता और साध्यता, और साध्य (रोगियों) की सिद्धि (सफल चिकित्सा) भी,

च. चि. ११/९७

। ॥ ९७ ॥

तत्त्वार्थ (सत्य अर्थ) को जानने वाले, रज और तम (नामक) दोषों से रहित पुनर्वसु ने (यह सब) क्षतक्षीणचिकित्सित (अध्याय) में (अपने) ज्येष्ठ शिष्य को कहा।

च. चि. ११

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, और अप्राप्त (न मिलने) पर दृढबल द्वारा पूरे किए गए तन्त्र (ग्रन्थ) के चिकित्सितस्थान (चिकित्सास्थान) में क्षतक्षीणचिकित्सित (क्षत और क्षीणता की चिकित्सा) नामक ग्यारहवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।