भूमिका
पाण्डुरोगचिकित्सित चरक संहिता के चिकित्सास्थान का सोलहवाँ अध्याय है, और इसका नाम इसके विषय से पड़ा है: पाण्डु रोग की चिकित्सा। पाण्डु उस रोग का नाम है जिसमें शरीर का रंग पीलापन लिए फीका, सफ़ेद-सा पड़ जाता है। अध्याय के आरम्भ में ही भगवान् आत्रेय के वचन के रूप में बताया गया है कि पाण्डु रोग पाँच प्रकार का माना गया है: वात, पित्त और कफ से तीन, सन्निपात से चौथा, और मिट्टी खाने से पाँचवाँ।
इसके बाद अध्याय पहले रोग की उत्पत्ति बताता है। खान-पान, आचरण और मन की दशाओं से पित्त बढ़कर शरीर में फैलता है और रक्त, त्वचा तथा मांस को दूषित करता है; इससे बल, वर्ण और ओज घटते हैं। फिर पूर्वरूप और पूरे प्रकट रोग के लक्षण गिनाए गए हैं, और उसके बाद एक-एक भेद का वर्णन आता है: वात, पित्त, कफ और त्रिदोष से होने वाले पाण्डु का, फिर मिट्टी खाने से होने वाले का। साथ ही वे लक्षण भी बताए गए हैं जिनके होने पर रोग असाध्य हो जाता है।
फिर अध्याय कामला की बात करता है, जो पित्त बढ़ाने वाली वस्तुओं का अधिक सेवन करने वाले पाण्डु के रोगी में बनती है, और उसके साध्य और असाध्य रूप बताता है। चिकित्सा का क्रम यह है कि पहले स्नेहन से शरीर को स्निग्ध किया जाए, फिर संशोधन किया जाए, उसके बाद पथ्य अन्न दिए जाएँ। इसके साथ घृत, लेह, चूर्ण, वटक और अरिष्ट जैसे अनेक योग गिनाए गए हैं, जिनमें कई योग लोहे के चूर्ण या मण्डूर से बनते हैं; योगों के साथ उनका नाम और उनके गुण भी दिए गए हैं। मिट्टी खाने वाले के लिए अलग चिकित्सा है: खाई हुई मिट्टी को शरीर से निकालना, और मिट्टी को रोगी के लिए अप्रिय बनाना।
अध्याय के अन्त में कामला का एक और रूप, जिसमें पित्त का मार्ग कफ से रुक जाता है और मल सफ़ेद हो जाता है, और फिर हलीमक नाम का रोग बताया गया है, जो पाण्डु से जुड़ा है और वात तथा पित्त से होता है। अन्तिम श्लोक पूरे अध्याय का सार देते हैं: पाँच प्रकार के पाण्डु के कारण, लक्षण और औषध, दो प्रकार की कामला, उनकी साध्यता और असाध्यता, और हलीमक।
पाठक के लिए ध्यान रखने की बात यह है कि अध्याय में योगों की मात्राएँ और विधियाँ ग्रन्थ के वचन के रूप में दी गई हैं, और यहाँ के अनुवाद तथा व्याख्या उन्हें उसी रूप में समझाते हैं; वे उपचार की सलाह नहीं हैं।