भारत संहिता

अध्याय १६

पाण्डुरोगचिकित्सितम्

पाण्डु रोग की चिकित्सा

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भूमिका

पाण्डुरोगचिकित्सित चरक संहिता के चिकित्सास्थान का सोलहवाँ अध्याय है, और इसका नाम इसके विषय से पड़ा है: पाण्डु रोग की चिकित्सा। पाण्डु उस रोग का नाम है जिसमें शरीर का रंग पीलापन लिए फीका, सफ़ेद-सा पड़ जाता है। अध्याय के आरम्भ में ही भगवान् आत्रेय के वचन के रूप में बताया गया है कि पाण्डु रोग पाँच प्रकार का माना गया है: वात, पित्त और कफ से तीन, सन्निपात से चौथा, और मिट्टी खाने से पाँचवाँ।

इसके बाद अध्याय पहले रोग की उत्पत्ति बताता है। खान-पान, आचरण और मन की दशाओं से पित्त बढ़कर शरीर में फैलता है और रक्त, त्वचा तथा मांस को दूषित करता है; इससे बल, वर्ण और ओज घटते हैं। फिर पूर्वरूप और पूरे प्रकट रोग के लक्षण गिनाए गए हैं, और उसके बाद एक-एक भेद का वर्णन आता है: वात, पित्त, कफ और त्रिदोष से होने वाले पाण्डु का, फिर मिट्टी खाने से होने वाले का। साथ ही वे लक्षण भी बताए गए हैं जिनके होने पर रोग असाध्य हो जाता है।

फिर अध्याय कामला की बात करता है, जो पित्त बढ़ाने वाली वस्तुओं का अधिक सेवन करने वाले पाण्डु के रोगी में बनती है, और उसके साध्य और असाध्य रूप बताता है। चिकित्सा का क्रम यह है कि पहले स्नेहन से शरीर को स्निग्ध किया जाए, फिर संशोधन किया जाए, उसके बाद पथ्य अन्न दिए जाएँ। इसके साथ घृत, लेह, चूर्ण, वटक और अरिष्ट जैसे अनेक योग गिनाए गए हैं, जिनमें कई योग लोहे के चूर्ण या मण्डूर से बनते हैं; योगों के साथ उनका नाम और उनके गुण भी दिए गए हैं। मिट्टी खाने वाले के लिए अलग चिकित्सा है: खाई हुई मिट्टी को शरीर से निकालना, और मिट्टी को रोगी के लिए अप्रिय बनाना।

अध्याय के अन्त में कामला का एक और रूप, जिसमें पित्त का मार्ग कफ से रुक जाता है और मल सफ़ेद हो जाता है, और फिर हलीमक नाम का रोग बताया गया है, जो पाण्डु से जुड़ा है और वात तथा पित्त से होता है। अन्तिम श्लोक पूरे अध्याय का सार देते हैं: पाँच प्रकार के पाण्डु के कारण, लक्षण और औषध, दो प्रकार की कामला, उनकी साध्यता और असाध्यता, और हलीमक।

पाठक के लिए ध्यान रखने की बात यह है कि अध्याय में योगों की मात्राएँ और विधियाँ ग्रन्थ के वचन के रूप में दी गई हैं, और यहाँ के अनुवाद तथा व्याख्या उन्हें उसी रूप में समझाते हैं; वे उपचार की सलाह नहीं हैं।

मुख्य शब्द (२२) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

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च. चि. १६/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम पाण्डुरोगचिकित्सित (पाण्डु रोग की चिकित्सा सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. चि. १६/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. चि. १६/३

। ॥ ३ ॥

पाण्डु रोग पाँच माने गए हैं: तीन वात, पित्त और कफ से, चौथा सन्निपात (तीनों दोषों के एक साथ बिगड़ने) से, और पाँचवाँ मिट्टी खाने से।

च. चि. १६/४

। ॥ ४ ॥

जिस (व्यक्ति) के धातुओं में पित्त-प्रधान दोष कुपित होते हैं, उसके धातुओं में शैथिल्य (ढीलापन) और गौरव (भारीपन) उत्पन्न होता है।

च. चि. १६/५

। ॥ ५ ॥

तब दोषों और दूष्यों के बुरी तरह दूषित हो जाने से वर्ण (रंग), बल और स्नेह (चिकनाई), तथा ओज के जो अन्य गुण हैं वे भी, अत्यधिक क्षीण हो जाते हैं।

च. चि. १६/६

। , ॥ ६ ॥

वह (व्यक्ति) अल्प रक्त वाला, अल्प मेद वाला, निःसार (सारहीन) और शिथिल इन्द्रियों वाला होकर वैवर्ण्य (रंग के बिगड़ने) को प्राप्त होता है। उसका (इस रोग का) हेतु (कारण) लक्षणों सहित सुनो।

च. चि. १६/७

।॥ ७ ॥

क्षार (खार वाले पदार्थ), अम्ल (खट्टे), लवण (नमकीन), अति उष्ण (बहुत गरम), विरुद्ध और असात्म्य भोजन से; निष्पाव, माष (उड़द), पिण्याक (खली) और तिल-तैल (तिल के तेल) के बार-बार सेवन से,

च. चि. १६/८

। ॥ ८ ॥

अन्न के विदग्ध रहते (ठीक से न पचे होने पर) दिन में सोने, व्यायाम तथा मैथुन से; प्रतिकर्म (उपचार) और ऋतु की विषमता से; और (स्वाभाविक) वेगों को रोकने से,

च. चि. १६/९

। ॥ ९ ॥

काम (इच्छा), चिन्ता, भय, क्रोध और शोक से जिसका चित्त आहत हो, (ऐसे व्यक्ति का) पित्त जब बढ़कर हृदय में ठहर जाता है,

च. चि. १६/१०

। ॥ १० ॥

(वह पित्त,) बलवान् वायु द्वारा धकेला जाकर, दस धमनियों में पहुँचकर, सम्पूर्ण शरीर में फैलकर और त्वचा तथा मांस के बीच आश्रय लेकर,

च. चि. १६/११

। ॥ ११ ॥

कफ, वात, असृक् (रक्त), त्वचा और मांस को दूषित करके वह (पित्त) त्वचा पर पाण्डु (पीलापन लिए सफ़ेद), हारिद्र (हल्दी जैसे पीले) और हरित (हरापन लिए), अनेक प्रकार के वर्ण उत्पन्न करता है।

च. चि. १६/१२

। ॥ १२ ॥

वह पाण्डु रोग कहा गया है। जब वह होने वाला हो, तब उसके लक्षण (ये होते हैं): हृदय का धड़कना, रूखापन, पसीने का न आना, तथा थकान।

च. चि. १६/१३

। ॥ १३ ॥

इस (रोग) के पूरी तरह उत्पन्न हो जाने पर प्रत्येक (रोगी) कानों में सनसनाहट वाला, क्षीण अग्नि वाला, दुर्बल, सदन (शिथिलता) से ग्रस्त, अन्न से द्वेष करने वाला, और थकान तथा भ्रम (चक्कर) से पीड़ित हो जाता है;

च. चि. १६/१४

। ॥ १४ ॥

(वह) मनुष्य अंगों में शूल (दर्द), ज्वर, श्वास (साँस फूलना), गौरव (भारीपन) और अरुचि से युक्त (होता है), और उसके अंग मानो मसले गए हों, मानो दबाकर मथ दिए गए हों;

च. चि. १६/१५

। ॥ १५ ॥

(वह) सूजे हुए अक्षिकूट (आँखों के आसपास के भाग) वाला, हरित (हरापन लिए) वर्ण का, झड़े हुए रोमों वाला, कान्तिहीन, क्रोधी, ठण्ड से द्वेष करने वाला, बहुत सोने वाला, बार-बार थूकने वाला और कम बोलने वाला (होता है)।

च. चि. १६/१६

। ॥ १६ ॥

चढ़ाई के श्रम से पिण्डिकाओं (पिंडलियों) में ऐंठन, तथा कमर, जाँघों और पैरों में पीड़ा और शिथिलता भी होती हैं; और इसका विशेष (हर भेद का अपना अलग रूप) आगे कहा जाएगा।

च. चि. १६/१७

। ॥ १७ ॥

वातल (वात को बढ़ाने वाले) आहारों और उपचारों (आचरण, रहन-सहन) से कुपित हुआ अनिल (वात) कृष्ण-पाण्डुता (कालापन लिए फीका पीला-सफेद रंग) तथा अङ्गों का रूखा और अरुण (हल्की लाली लिए) होना उत्पन्न करता है,

च. चि. १६/१८

।॥ १८ ॥

(और) अङ्गमर्द (बदन का टूटना), रुजा (पीड़ा), तोद (सुई चुभने जैसी पीड़ा), कम्प (काँपना), पार्श्वों (पसलियों वाले भागों) और सिर में पीड़ा, मल का सूखना, मुख का बेस्वाद होना, शोफ (सूजन), आनाह (पेट का फूलना) और बल का क्षय (भी उत्पन्न करता है)।

च. चि. १६/१९

। ॥ १९ ॥

पित्तल (पित्त की प्रधानता वाले) मनुष्य का पित्त, (पहले) बताए गए अपने प्रकोप के कारणों से संचित होकर, रक्त आदि (धातुओं) को दूषित करके पाण्डु रोग का कारण बनता है।

च. चि. १६/२०

। ॥ २० ॥

वह (रोगी) मनुष्य पीला या हरी आभा वाला, ज्वर और दाह (जलन) से युक्त, तृष्णा, मूर्च्छा और पिपासा (प्यास) से पीड़ित, तथा पीले मूत्र और मल वाला होता है।

च. चि. १६/२१

। ॥ २१ ॥

(उसे) पसीना आता है, वह शीतल (वस्तुओं) की इच्छा करता है और अन्न को पसन्द नहीं करता; उसके मुख का स्वाद कटु (तीखा) रहता है, और उसे उष्ण (गरम) और अम्ल (खट्टी) (वस्तुएँ) भी अनुकूल नहीं पड़तीं।

च. चि. १६/२२

। ॥ २२ ॥

अन्न के विदग्ध होने पर (ठीक से न पचकर जलन पैदा करने की अवस्था में पहुँचने पर) उसे खट्टी डकार और विदाह (जलन) होते हैं; (साथ ही) दुर्गन्ध, मल का भिन्न (पतला, फटा हुआ) होना, दुर्बलता और तम (अँधेरा छाना) भी (होते हैं)।

च. चि. १६/२३

। ॥ २३ ॥

श्लेष्मल (कफ बढ़ाने वाले आहार-विहार) से बढ़ा हुआ श्लेष्मा (कफ) भी पहले की तरह पाण्डु रोग उत्पन्न करता है, (और) गौरव (भारीपन), तन्द्रा (ऊँघ), छर्दि (उल्टी), श्वेत आभा (शरीर पर सफेदी झलकना),

च. चि. १६/२४

। ॥ २४ ॥

प्रसेक (मुँह में लार भर आना), लोमहर्ष (रोंगटे खड़े होना), साद (अङ्गों का शिथिल पड़ना), मूर्च्छा (बेहोशी), भ्रम (चक्कर), क्लम (थकावट), श्वास (साँस फूलना), कास (खाँसी), आलस्य, अरुचि और वाणी तथा स्वर का रुकना,

च. चि. १६/२५

। ॥ २५ ॥

मूत्र, आँखों और मल का शुक्ल (सफेद) होना, कटु, रूक्ष और उष्ण (वस्तुओं) की इच्छा, श्वयथु (सूजन) और मुख का स्वाद मधुर (मीठा) होना (भी उत्पन्न करता है)। इस प्रकार यह कफ से (होने वाला) पाण्डु रोग है।

च. चि. १६/२६

। ॥ २६ ॥

सब (प्रकार के) अन्न का सेवन करने वाले (मनुष्य) के सभी (तीनों) दोष दूषित होकर त्रिदोषज (तीनों दोषों से उत्पन्न), तीनों दोषों के लक्षणों वाला और अत्यन्त दुःसह (बड़ी कठिनाई से सहा जाने वाला) पाण्डु रोग उत्पन्न करते हैं।

च. चि. १६/२७

। , , ॥ २७ ॥

मिट्टी खाने की आदत वाले (मनुष्य) का (कोई) एक मल (दोष) कुपित होता है: कषाय (कसैली मिट्टी) मारुत (वात) को, ऊषर (खारी मिट्टी) पित्त को, (और) मधुर (मीठी मिट्टी) कफ को

च. चि. १६/२८

। ॥ २८ ॥

कुपित करती है; और मिट्टी रस आदि (धातुओं) को (भी कुपित करती है, तथा अपने) रौक्ष्य (रूखेपन) से खाए हुए (अन्न) को रूखा कर देती है। (वह) बिना पचे ही स्रोतों (शरीर के भीतर के मार्गों) को भर देती है और (उन्हें) रोक देती है।

च. चि. १६/२९

। ॥ २९ ॥

(वह मिट्टी) इन्द्रियों के बल को, तथा तेज, वीर्य और ओज को नष्ट करके शीघ्र ही बल, वर्ण और अग्नि का नाश करने वाला पाण्डु रोग उत्पन्न कर देती है।

च. चि. १६/३०

। ॥ ३० ॥

(ऐसे रोगी के) गाल, अक्षिकूट (आँखों के आसपास के भाग) और भौंहें सूज जाती हैं, पैर, नाभि और मेहन (जननेन्द्रिय) सूज जाते हैं, उसके कोष्ठ (पेट) में क्रिमि (कीड़े) हो जाते हैं, और वह रक्त सहित तथा कफ से युक्त मल अतिसार (दस्त) के रूप में त्यागता है।

च. चि. १६/३१

। ॥ ३१ ॥

बहुत समय पहले उत्पन्न हुआ (और) खर (कठोर, रूखा) हो चुका पाण्डु रोग सिद्ध (ठीक) नहीं होता। (और) समय बहुत बीत जाने से जो मनुष्य शून (सूजन से भरा) हो गया हो, और जो (सब कुछ) पीला देखता है,

च. चि. १६/३२

। ॥ ३२ ॥

(और) जिसे बँधे हुए और थोड़े मल वाला, कफ से युक्त, हरे रंग का अतिसार होता है, (जो) दीन (उदास और बलहीन) है, जिसके अङ्ग (मानो) सफ़ेदी से अत्यधिक लिपे हुए हैं, (और जो) वमन, मूर्च्छा और प्यास से पीड़ित है,

च. चि. १६/३३

। ॥ ३३ ॥

वह (रोगी जीवित) नहीं रहता, और (वह भी नहीं) जो पाण्डु (रोगी) रक्त के क्षय से श्वेतता को प्राप्त हो जाए। इस प्रकार पाँच प्रकार के पाण्डु रोग के लक्षण कहे गए।

च. चि. १६/३४

। ॥ ३४ ॥

परन्तु जो पाण्डु रोगी अत्यधिक (मात्रा में) पित्त बढ़ाने वाले (पदार्थों) का सेवन करता है, उसका पित्त रक्त और मांस को जलाकर रोग का कारण बनता है।

च. चि. १६/३५

। ॥ ३५ ॥

उसकी आँखें अत्यन्त हल्दी जैसी पीली, त्वचा, नाखून और मुख हल्दी जैसे पीले, मल और मूत्र लाल-पीले, (शरीर का) रंग मेंढक जैसा और इन्द्रियाँ शक्तिहीन (हो जाती हैं)।

च. चि. १६/३६

। ॥ ३६ ॥

(वह) दाह, अविपाक, दुर्बलता, सदन और अरुचि से कृश (हो जाता है)। बहुत पित्त वाली यह कामला कोष्ठ और शाखा में आश्रित मानी गई है।

च. चि. १६/३७

। ॥ ३७ ॥

समय बीतने पर खर (कठोर) हो चुकी कुम्भकामला कष्टसाध्य होती है। (और जो) मनुष्य काले-पीले मल और मूत्र वाला तथा बहुत सूजा हुआ हो,

च. चि. १६/३८

।॥ ३८ ॥

और जिसकी आँखें, मुख, वमन, मल और मूत्र लाल रंग के हों, जो (घुटन के साथ) बेसुध-सा हो जाता है, (और जो) दाह, अरुचि, प्यास, आनाह, तन्द्रा और मोह से युक्त हो,

च. चि. १६/३९

। ॥ ३९ ॥

(और) जिसकी अग्नि और संज्ञा (चेतना) नष्ट हो गई हो, (वह) कामला रोगी निश्चय ही शीघ्र मर जाता है। परन्तु (इनसे) दूसरे, साध्य (रोगियों) की चिकित्सा मैं बताऊँगा।

च. चि. १६/४०

। ॥ ४० ॥

उनमें, (स्नेहन से) स्निग्ध हुए पाण्डु रोगी का संशोधन तीक्ष्ण, ऊर्ध्व (ऊपर की ओर) और अनुलोम (नीचे की ओर दोष निकालने वाली औषधियों) से करना चाहिए; परन्तु कामला रोगी का मृदु और तिक्त विरेचनों से।

च. चि. १६/४१

। ॥ ४१ ॥

जिनका कोष्ठ भली-भाँति शुद्ध हो चुका हो, उन दोनों (रोगियों) को पथ्य अन्न दिलवाए: जौ और गेहूँ सहित पुराने शालि चावल, यूष के साथ,

च. चि. १६/४२

। ॥ ४२ ॥

मूँग, आढकी (अरहर) और मसूर (के यूष) के साथ, और जाङ्गल (पशु-पक्षियों) के हितकर (मांस-)रसों के साथ। और (चिकित्सक) दोष के अनुसार उन दोनों की विशिष्ट चिकित्सा करे।

च. चि. १६/४३

। ॥ ४३ ॥

कामला और पाण्डु के रोगी को स्नेहन के लिए पञ्चगव्य, महातिक्त अथवा कल्याणक घृत दे।

च. चि. १६/४४

। ॥ ४४ ॥

दाडिम (अनार) का एक कुडव, धान्य का आधा कुडव, चित्रक (चीता) और शृङ्गवेर (अदरक) का एक-एक पल, तथा पिप्पली की एक अष्टमिका,

च. चि. १६/४५

। ॥ ४५ ॥

उन (द्रव्यों) के कल्कों के साथ एक आढक जल में सिद्ध किया गया (पकाया गया) बीस पल घृत हृद्रोग, पाण्डु, गुल्म, अर्श, प्लीहा (के रोग) और वात तथा कफ की पीड़ा को दूर करता है।

च. चि. १६/४६

। ॥ ।

(यह घृत) दीपन है, श्वास और कास को नष्ट करता है, और मूढवात में प्रशस्त है; और कठिनाई से प्रसव करने वाली तथा वन्ध्या स्त्रियों को भी गर्भ देने वाला है। इस प्रकार दाडिमाद्य घृत (कहा गया)।

च. चि. १६/४७

। ॥ ४७ ॥

कटुका रोहिणी, मुस्त, दोनों हरिद्रा, वत्सक का एक पल, पटोल, चन्दन, मूर्वा, त्रायमाणा, दुरालभा

च. चि. १६/४८

। ॥ ४८ ॥

कृष्णा, पर्पटक, निम्ब, भूनिम्ब और देवदारु, इन सबको एक-एक कर्ष लेकर, उनसे चार गुने क्षीर (दूध) के साथ सिद्ध किया हुआ घृत का एक प्रस्थ

च. चि. १६/४९

। ॥ ।

(वह घृत) रक्तपित्त, ज्वर, दाह, भगन्दर सहित श्वयथु (सूजन), अर्श और असृग्दर को, तथा विस्फोटकों को भी नष्ट करता है। इस प्रकार कटुकाद्य घृत (कहा गया)।

च. चि. १६/५०

। ॥ ।

सौ पथ्या (हरीतकी) के रस में, पथ्या के पचास वृन्तों (डण्ठलों) के कल्क के साथ सिद्ध किया हुआ घृत का एक प्रस्थ पीना चाहिए; वह पाण्डु रोग और गुल्म को दूर करता है। इस प्रकार पथ्याघृत (कहा गया)।

च. चि. १६/५१

। ॥ ।

दन्ती के चार पल के रस में, पिसे हुए दन्ती के शलाटुओं (कच्चे फलों) के साथ, उसी प्रकार सिद्ध किया हुआ घृत का एक प्रस्थ प्लीहा (के रोग), पाण्डु (रोग) की पीड़ा और शोफ (सूजन) को जीतने वाला है। इस प्रकार दन्तीघृत (कहा गया)।

च. चि. १६/५२

।॥ ।

पुराने घृत का एक प्रस्थ, आधे प्रस्थ द्राक्षा (अंगूर) से सिद्ध किया हुआ, कामला, गुल्म, पाण्डु (रोग) की पीड़ा, ज्वर, मेह और उदर (रोग) को दूर करने वाला है। इस प्रकार द्राक्षाघृत (कहा गया)।

च. चि. १६/५३

। ॥ ।

हरिद्रा, त्रिफला, निम्ब, बला और मधुक से सिद्ध किया हुआ, दूध सहित, भैंस का घृत कामला को दूर करने वाला उत्तम (योग) है। इस प्रकार हरिद्रादि घृत (कहा गया)।

च. चि. १६/५४

। ॥ ५४ ॥

दुगुने गोमूत्र में दार्वी के दो अक्ष कल्क से सिद्ध किया हुआ (एक घृत), और दूसरा दार्वी के पाँच पल के क्वाथ में तथा कालीयक के कल्क में (सिद्ध किया हुआ)

च. चि. १६/५५

। ॥ ५५ ॥

भैंस के घृत का एक प्रस्थ (लिया जाता है); पहला (घृत) पहले (रोग) में और दूसरा दूसरे में (दिया जाए)। इन स्नेहों से (चिकित्सा) आरम्भ करके, (रोगी को) स्निग्ध (हुआ) मानकर, विरेचन कराए

च. चि. १६/५६

। ॥ ५६ ॥

मूत्र मिले हुए दूध से, बार-बार, या केवल (दूध) से। दन्ती के फलों के गुनगुने रस में एक अञ्जलि काश्मर्य के साथ पकाया हुआ (द्रव)

च. चि. १६/५७

। ॥ ५७ ॥

या (उसमें) एक अञ्जलि द्राक्षा (अंगूर) मसलकर, पाण्डु रोग को दूर करने वाला (यह योग) दे। पैत्तिक (पित्त से हुए पाण्डु रोग वाला रोगी) दुगुनी शर्करा मिला हुआ आधा पल त्रिवृत् (निशोथ) का चूर्ण पिए।

च. चि. १६/५८

। ॥ ५८ ॥

कफ से हुए पाण्डु रोग वाला (रोगी) तो गोमूत्र में भिगोकर तैयार की हुई हरीतकी (पिए); (और) आरग्वध (अमलतास) को ईख के और विदारी तथा आमलक के रस के साथ (पिए)।

च. चि. १६/५९

। ॥ ५९ ॥

मनुष्य त्र्यूषण सहित बिल्वपत्र पिए, (जो) कामला को दूर करने वाला है; या दुगुने गुड़ के साथ आधा पल दन्ती का कल्क ठण्डे पानी से (पिए)।

च. चि. १६/६०

।॥ ६० ॥

अथवा कामला का रोगी त्रिफला के रसों के साथ त्रिवृत् (निशोथ) पिए। विशाला, त्रिफला, मुस्त, कुष्ठ, दारु, कलिङ्गक को

च. चि. १६/६१

। ॥ ६१ ॥

(विशाला आदि इन द्रव्यों को) एक-एक कर्ष (की मात्रा में) ले, उसी प्रकार अतिविषा (अतीस) को आधे कर्ष के भाग में, और मधुरसा के दो कर्ष; (फिर) यह सब सुहाते (गुनगुने) जल से

च. चि. १६/६२

। ॥ ६२ ॥

मसले हुए (उस मिश्रण के) छने हुए रस को पीकर, बाद में मधु (शहद) चाटे। (यह योग) कास (खाँसी), श्वास (साँस का रोग), ज्वर, दाह (जलन), पाण्डु रोग, अरोचक (भोजन में अरुचि)

च. चि. १६/६३

। ॥ ६३ ॥

गुल्म, आनाह, आमवात और रक्तपित्त को (भी) नष्ट करता है। त्रिफला का, गुडूची (गिलोय) का, या दार्वी (दारुहल्दी) का, या निम्ब (नीम) का रस

च. चि. १६/६४

। ॥ ६४ ॥

कामला से पीड़ित मनुष्य (वह रस) ठंडा, मधु (शहद) मिलाकर, सुबह पिए। (अथवा) एक पक्ष (पंद्रह दिन) तक गाय का, या भैंस का ही, दूध और मूत्र पिए।

च. चि. १६/६५

। ॥ ६५ ॥

अथवा पाण्डु का रोगी सात दिन तक गोमूत्र मिला हुआ त्रिफला का रस (पिए)। पेड़ पर उगे अंकुरों (कोंपलों) को जलती हुई अवस्था में मूत्र में बुझाकर और मसलकर

च. चि. १६/६६

। ॥ ६६ ॥

मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू) का वह (द्रव) छानकर पिए, जो पाण्डु और शोथ (सूजन) को हरता है। स्वर्णक्षीरी, त्रिवृत् (निशोथ) और श्यामा, (तथा) नागर (सोंठ) के साथ भद्रदारु

च. चि. १६/६७

। ॥ ६७ ॥

(इन्हें) एक अञ्जलि गोमूत्र के साथ पीसकर, या मूत्र में उबालकर पिए। अथवा इनके साथ पकाया हुआ दूध पिए, जो दोषों का अनुलोमन करता है (उन्हें नीचे की ओर चलाकर बाहर निकालता है)।

च. चि. १६/६८

। ॥ ६८ ॥

अथवा हरीतकी को (नियमित) प्रयोग की विधि से गोमूत्र के साथ पिए। (उसके) पच जाने पर दूध के साथ, या मधुर रस के साथ भोजन करे।

च. चि. १६/६९

। ॥ ६९ ॥

अथवा वैद्य पाण्डु रोग की शान्ति के लिए सात रात तक गायों के मूत्र में भावित किया हुआ अयोरज (लोहे का चूर्ण) दूध के साथ (रोगी को) पिलाए।

च. चि. १६/७०

। ॥ ७० ॥

त्र्यूषण (सोंठ, काली मिर्च और पिप्पली), त्रिफला, मुस्त (नागरमोथा), विडङ्ग (वायविडंग) और चित्रक (चीता) बराबर (भाग में हों), (और) अयोरज (लोहे के चूर्ण) के नौ भाग; उस चूर्ण को क्षौद्र (मधु) और घी के साथ

च. चि. १६/७१

। ॥ ।

खाए; (यह चूर्ण) पाण्डु, हृद्रोग (हृदय के रोग), कुष्ठ, अर्श (बवासीर) और कामला को दूर करता है। यह नवायस चूर्ण कृष्णात्रेय ने कहा है। इस प्रकार नवायस चूर्ण (कहा गया)।

च. चि. १६/७२

। ॥ ७२ ॥

गुड़, नागर (सोंठ), मण्डूर और तिल, इनके भाग तौल में बराबर (लेकर), (और) पिप्पली दुगुनी (डालकर), पाण्डु के रोगी के लिए गुटिका (गोली) बनाए।

च. चि. १६/७३

। ॥ ७३ ॥

त्र्यूषण (सोंठ, काली मिर्च और पिप्पली), त्रिफला, मुस्त (नागरमोथा), विडङ्ग (वायविडंग), चव्य और चित्रक (चीता), दार्वी (दारुहल्दी) की छाल, माक्षिक धातु, ग्रन्थिक और देवदारु

च. चि. १६/७४

। ॥ ७४ ॥

इन (द्रव्यों) के दो-दो पल के भाग (लेकर), (हर एक का) अलग-अलग चूर्ण बनाए। (फिर) चूर्ण से दुगुना मण्डूर (ले), जो शुद्ध किया हुआ और अञ्जन (काजल) जैसा (काला) हो

च. चि. १६/७५

। ॥ ७५ ॥

(उस मण्डूर को) आठ गुने गोमूत्र में पकाकर, फिर उसमें वह (चूर्ण) डाले। (फिर) उदुम्बर (गूलर के फल) के बराबर वटक (गोलियाँ) बनाकर मनुष्य अपनी अग्नि (पाचन-शक्ति) के अनुसार उन्हें

च. चि. १६/७६

। ॥ ७६ ॥

तक्र (छाछ) के साथ सेवन करे, और (उनके) पच जाने पर सात्म्य (अनुकूल) भोजन (करे)। ये मण्डूरवटक निश्चय ही पाण्डुरोगियों को प्राण देने वाले हैं।

च. चि. १६/७७

। ॥ ।

(ये) कुष्ठों (त्वचा के रोगों), अजीर्णक (अपच), शोथ (सूजन), ऊरुस्तम्भ (जाँघों की जकड़न), कफ से होने वाले रोगों, अर्श (बवासीर), कामला (पीलिया), मेह (प्रमेह) और प्लीहा (तिल्ली के रोग) को भी शान्त करते हैं। इस प्रकार मण्डूरवटक (कहे गए)।

च. चि. १६/७८

। ॥ ७८ ॥

ताप्य (माक्षिक धातु), अद्रिजतु (शिलाजतु) और रूप्य (चाँदी) तथा अयस् (लोहे) का मल, अलग-अलग पाँच-पाँच पल, एक-एक पल चित्रक, त्रिफला, व्योष (त्रिकटु) और विडङ्ग के साथ

च. चि. १६/७९

। ॥ ७९ ॥

आठ पल शर्करा मिलाकर, चूर्ण करके और मधु में भिगोकर (ये) अक्ष (कर्ष) भर की मात्रा में नियम से उस (व्यक्ति) द्वारा सेवन किए जाने चाहिए, जो (औषध के) पच जाने पर हितकर और परिमित भोजन करे

च. चि. १६/८०

। ॥ ८० ॥

और कुलत्थ (कुलथी), काकमाची (मकोय) आदि तथा कपोत (कबूतर) से परहेज़ करे। त्रिफला के तीन भाग और त्रिकटुक के तीन भाग

च. चि. १६/८१

। ॥ ८१ ॥

चित्रक की जड़ का एक भाग, और वैसे ही विडङ्ग का (एक भाग), अश्मजतु (शिलाजतु) के पाँच भाग और वैसे ही रूप्यमल (चाँदी के मल) के (पाँच भाग)

च. चि. १६/८२

। ॥ ८२ ॥

और शुद्ध माक्षिक के तथा लौह के रज (लोहे के चूर्ण) के भी (उतने ही भाग), और सिता (सफ़ेद शक्कर) के आठ भाग; वह सब बारीक पीसा हुआ

च. चि. १६/८३

। ॥ ८३ ॥

माक्षिक (मधु) से भिगोया हुआ, लोहे के शुभ (उत्तम) पात्र में रखना चाहिए। फिर मनुष्य अपनी अग्नि (पाचन-शक्ति) के अनुसार उदुम्बर (गूलर के फल) के बराबर मात्रा खाए।

च. चि. १६/८४

। ॥ ८४ ॥

प्रतिदिन (इसका) प्रयोग करे; (औषध के) पच जाने पर कुलत्थ (कुलथी), काकमाची (मकोय) और कपोत (कबूतर) को छोड़कर इच्छानुसार भोजन (करे)।

च. चि. १६/८५

। ॥ ८५ ॥

यह योग, जो योगराज नाम से प्रसिद्ध है, अमृत के समान है। यह श्रेष्ठ रसायन है, सब रोगों को हरने वाला और कल्याणकारी।

च. चि. १६/८६

। ॥ ८६ ॥

(यह) पाण्डुरोग, विष, कास (खाँसी), यक्ष्मा (क्षय रोग), विषमज्वर, कुष्ठों, अजीर्णक (अपच), मेह (प्रमेह), शोष, श्वास और अरोचक (अरुचि) को

च. चि. १६/८७

। ।॥ ८७ ॥

और विशेष रूप से अपस्मार (मिर्गी), कामला (पीलिया) और गुदज (अर्श) को नष्ट करता है। इस प्रकार योगराज (कहा गया)। कौटज, त्रिफला, निम्ब (नीम), पटोल (परवल), घन (मुस्ता) और नागर (सोंठ) के

च. चि. १६/८८

। ॥ ८८ ॥

रसों से दस दिन तक, अथवा (उसके) दो-तीन गुने (दिनों तक), भावित (भावना दिए हुए) शिलाजतु के आठ पल, (और) उतनी ही सफ़ेद शर्करा

च. चि. १६/८९

। ॥ ८९ ॥

त्वक्क्षीरी, पिप्पली, धात्री (आँवला) और कर्कटाख्या, (प्रत्येक) एक पल की मात्रा में; निदिग्धी (कण्टकारी) के फल और मूल (जड़) से एक पल; और युक्ति से (उचित मात्रा में) त्रिगन्धक

च. चि. १६/९०

।॥ ९० ॥

चूर्ण किए हुए (इन सब द्रव्यों) की, तीन पल मधु के साथ, एक-एक अक्ष (तौल) की गोलियाँ बनाए। अनार का रस, दूध, पक्षियों का मांसरस, जल, सुरा (और) आसव

च. चि. १६/९१

।॥ ९१ ॥

उन (गोलियों) को खाकर (ये पेय) बाद में पिए, बिना अन्न खाए (खाली पेट) या भोजन करके ही। पाण्डु, कुष्ठ, ज्वर, प्लीहा (के रोग), तमक, अर्श और भगन्दर को

च. चि. १६/९२

।॥ ९२ ॥

पूति (दुर्गन्ध), हृदय, शुक्र, मूत्र और अग्नि के दोषों (विकारों), शोष, गर और उदर रोगों को, कास, असृग्दर, पित्तासृक्, शोथ, गुल्म और गले के रोगों को

च. चि. १६/९३

। । ॥ ९३ ॥

और सब व्रणों (घावों) को वे (गोलियाँ) नष्ट करती हैं; (वे) सब रोगों को हरने वाली (और) कल्याणकारी हैं। इस प्रकार शिलाजतुवटक (कहे गए)। पुनर्नवा, त्रिवृत् (निशोथ), व्योष, विडङ्ग, दारु, चित्रक

च. चि. १६/९४

। ॥ ९४ ॥

कुष्ठ (कूठ), दोनों हरिद्रा, त्रिफला, दन्ती, चव्य, कलिङ्गक, पिप्पली, पिप्पलीमूल और मुस्त (नागरमोथा), ये (सब द्रव्य) एक-एक पल (लिए जाएँ)।

च. चि. १६/९५

। ॥ ९५ ॥

(इस) चूर्ण से दुगुना मण्डूर (लेकर, सबको) दो आढक गोमूत्र में पकाए। कोल के बराबर गोलियाँ बनाकर, (उन्हें) तक्र (छाछ) में घोलकर मनुष्य पिए।

च. चि. १६/९६

। ॥ ।

वे (गोलियाँ) पाण्डु रोगों, प्लीहा (के रोग), अर्श, विषमज्वर, श्वयथु (सूजन), ग्रहणी के विकार, कुष्ठ तथा क्रिमियों को नष्ट करती हैं। इस प्रकार पुनर्नवमण्डूर (कहा गया)।

च. चि. १६/९७

। ॥ ९७ ॥

दार्वी (दारुहरिद्रा) की छाल, त्रिफला, व्योष, विडङ्ग (और) लोहे का चूर्ण, (इन्हें) मधु और घी के साथ मिलाकर कामला और पाण्डु रोग वाला (रोगी) चाटे।

च. चि. १६/९८

। ॥ ९८ ॥

बराबर (मात्रा में) लोहे का चूर्ण, पथ्या (हरीतकी) और हरिद्रा (हल्दी), चूर्ण करके, कामला का रोगी मधु और घी के साथ चाटे; अथवा गुड़ और मधु के साथ अभया (हरीतकी) चाटे।

च. चि. १६/९९

। ॥ ९९ ॥

त्रिफला, दोनों हरिद्रा, कटुरोहिणी (कुटकी) और लोहे का चूर्ण, (इन्हें) चूर्ण करके मधु और घी के साथ (मिलाए); वह लेह कामला को दूर करने वाला है।

च. चि. १६/१००

। ॥ १०० ॥

दो पल के भाग में तुगाक्षीरी (वंशलोचन), नागर (सोंठ) और मधुयष्टिका (मुलेठी), एक प्रस्थ पिप्पली, द्राक्षा (अंगूर), (और) आधी तुला उत्तम शर्करा (को)

च. चि. १६/१०१

। ॥ १०१ ॥

(इन्हें) चूर्ण करके धात्री (आँवले) के फलों के एक द्रोण रस में लेह की तरह (गाढ़ा होने तक) पकाए। ठण्डा होने पर (उसमें) एक प्रस्थ मधु मिलाकर, उसमें से एक पाणितल (मात्रा) चाटे।

च. चि. १६/१०२

। । ॥ १०२ ॥

यह (अवलेह) कामला, पित्त (के विकार), पाण्डु, कास (खाँसी) और हलीमक को नष्ट करता है। इस प्रकार धात्र्यवलेह (कहा गया)। त्र्यूषण, त्रिफला, चव्य, चित्रक और देवदारु

च. चि. १६/१०३

। ॥ १०३ ॥

विडङ्ग, फिर मुस्त और वत्सक (कुटज), इन सबका चूर्ण बनाए। मण्डूर के बराबर (मात्रा वाले) उस चूर्ण को आठ गुने गोमूत्र में पकाए।

च. चि. १६/१०४

। ॥ १०४ ॥

धीरे-धीरे सिद्ध (पककर तैयार) की गई और फिर ठंडी की गई, (एक-एक) कर्ष के बराबर गुड (गोलियाँ) बनानी चाहिए। उन्हें अग्नि (पाचन-शक्ति) के अनुसार खाना चाहिए; वे प्लीहा (तिल्ली) और पाण्डु के रोगों को दूर करने वाली

च. चि. १६/१०५

। । ॥ १०५ ॥

और (वे) ग्रहणी और अर्श को भी दूर करने वाली मानी गई हैं, तक्र (छाछ) और वाट्य खाने वाले (रोगी) के लिए। इस प्रकार मण्डूरवटक (कहे गए)। मञ्जिष्ठा (मजीठ), रजनी (हल्दी), द्राक्षा (अंगूर), बला की जड़ें, अयोरज (लोहे का चूर्ण)

च. चि. १६/१०६

। । ॥ १०६ ॥

और लोध्र: इन (द्रव्यों) में पाण्डु रोगियों के लिए गौड (गुड़ से बना) अरिष्ट (तैयार किया) जाए। इस प्रकार गौड अरिष्ट (कहा गया)। बीजक से सोलह पल, और त्रिफला के बीस (पल)

च. चि. १६/१०७

। ॥ १०७ ॥

द्राक्षा (अंगूर) के पाँच और लाक्षा (लाख) के सात (पल); इसे एक द्रोण जल में पकाना चाहिए। (जल का) चौथाई भाग शेष रहने पर, छानकर बचे हुए (क्वाथ) में (आगे कहे द्रव्य) डालने चाहिए

च. चि. १६/१०८

। ॥ १०८ ॥

शर्करा (शक्कर) की एक तुला, माक्षिक (शहद) का एक प्रस्थ, और एक-एक कर्ष भर व्योष (त्रिकटु), व्याघ्रनख, उशीर (खस), क्रमुक, एलवालुक के साथ

च. चि. १६/१०९

। ॥ १०९ ॥

मधुक (मुलेठी) और कुष्ठ (कूठ); इन सबका चूर्ण बनाकर (डालना चाहिए)। घृत के पात्र में (भरा) वह (मिश्रण) ग्रीष्म (गर्मी की ऋतु) में दस रात, और शिशिर (ठंड की ऋतु) में उससे दुगुने (समय तक), जौ (के बीच) रखा जाए, (फिर)

च. चि. १६/११०

।॥ ११० ॥

ग्रहणी, पाण्डु रोग, अर्श, शोथ (सूजन) और गुल्म को दूर करने वाले, तथा मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी (पथरी), मेह, कामला और सन्निपात को जीतने वाले उस (अरिष्ट) को पीना चाहिए।

च. चि. १६/१११

। । ॥ १११ ॥

आत्रेय ने इसे बीजकारिष्ट (नाम से) कहा है। इस प्रकार बीजकारिष्ट (कहा गया)। धात्री (आँवले) के दो हजार फलों को निचोड़कर, उस रस को

च. चि. १६/११२

। ॥ ११२ ॥

आठवें भाग (जितने) क्षौद्र (शहद) से और आधे कुडव कृष्णा (पिप्पली) से युक्त, आधी तुला शर्करा (शक्कर) मिला हुआ, (और) स्निग्ध (चिकने किए) घट (घड़े) में एक पक्ष (पन्द्रह दिन) तक रखा हुआ (वह रस)

च. चि. १६/११३

।॥ ११३ ॥

प्रातः (काल) मात्रा के अनुसार (इसे) पीना चाहिए, और (इसके) पच जाने पर हितकर और मित (परिमित) भोजन करना चाहिए। कामला, पाण्डु, हृद्रोग (हृदय के रोग), वातासृक् (वातरक्त), विषम ज्वर

च. चि. १६/११४

। । ॥ ११४ ॥

कास (खाँसी), हिक्का (हिचकी), अरुचि और श्वास को यह अरिष्ट नष्ट करता है। इस प्रकार धात्र्यरिष्ट (कहा गया)। स्थिरा आदि (औषधियों) से शृत (उबाला हुआ) जल पीने और भोजन में प्रशस्त है

च. चि. १६/११५

, । ॥ ११५ ॥

पाण्डु रोगियों के लिए; (और) कामला से पीड़ितों के लिए मृद्वीका (अंगूर) और आमलकी (आँवले) का रस (प्रशस्त है)। पाण्डु रोग की शान्ति के लिए महर्षि ने ऐसा कहा है।

च. चि. १६/११६

। , ॥ ११६ ॥

वैद्य को इस (उपचार) में दोष के बल के अनुसार अलग-अलग परिवर्तन करना चाहिए: वातिक (वात से हुए पाण्डु) में (यह) स्नेह-भूयिष्ठ (अधिक स्नेह वाला) हो, पैत्तिक (पित्त से हुए) में तिक्त (कड़वा) और शीतल

च. चि. १६/११७

, । ॥ ११७ ॥

श्लैष्मिक (कफ से हुए) में कटु (तीखा), तिक्त (कड़वा) और उष्ण, (तथा) सान्निपातिक (तीनों दोषों से हुए) में विमिश्र (मिला-जुला)। और खाई हुई मृत्तिका (मिट्टी) को वैद्य शरीर से निकाले

च. चि. १६/११८

। ॥ ११८ ॥

युक्ति को जानने वाला (वैद्य), (रोगी के) बल और अबल को भली-भाँति परखकर, तीक्ष्ण शोधनों से (खाई हुई मिट्टी को शरीर से बाहर निकाले)। शुद्ध हुए शरीर वाले (रोगी) को बल देने वाले सर्पि (घृत) दे।

च. चि. १६/११९

। ॥ ११९ ॥

व्योष (त्रिकटु), बिल्व (बेल), दोनों हरिद्रा, त्रिफला, दोनों पुनर्नवा, मुस्ता (नागरमोथा), अयोरज (लोहे का चूर्ण), पाठा, विडङ्ग (वायविडंग) और देवदारु

च. चि. १६/१२०

। ॥ १२० ॥

(तथा) वृश्चिकाली और भार्गी; दूध सहित, समान मात्रा में लिए गए इन (द्रव्यों) से घृत सिद्ध करके, मिट्टी (खाने) के दोष से पीड़ित मनुष्य (उसे) युक्ति से पिए।

च. चि. १६/१२१

। ॥ १२१ ॥

इसी प्रकार केशर, यष्ट्याह्व (मुलेठी), पिप्पली, क्षार और शाद्वल से (सिद्ध किया घृत भी पिए)। जो रोगी लोलुपता के कारण मिट्टी खाने से नहीं रुकता, उसको

च. चि. १६/१२२

। ॥ १२२ ॥

(मिट्टी को) अप्रिय बनाने के लिए, उस (मिट्टी) के दोष को नष्ट करने वाले (द्रव्यों) से भावित (मिट्टी) इच्छानुसार दे: विडङ्ग (वायविडंग), एला (इलायची) और अतिविषा (अतीस) से, निम्ब (नीम) के पत्ते से, पाठा से

च. चि. १६/१२३

। ॥ १२३ ॥

वार्ताक, कटुरोहिणी (कुटकी), कौटज (कुटज के द्रव्यों) से, अथवा मूर्वा से भी। पाण्डु रोगियों की चिकित्सा (वैद्य) दोष के अनुसार करे।

च. चि. १६/१२४

। ॥ १२४ ॥

विशेष कारण होने से इस (रोग) की यह विशेष चिकित्सा मानी गई है। परन्तु जो कामला रोगी तिल की पिट्ठी (पिसे हुए तिल) जैसा मल त्यागता है

च. चि. १६/१२५

।॥ १२५ ॥

(वैद्य उसके) उस पित्त को, जिसका मार्ग श्लेष्मा (कफ) से रुका हुआ है, कफ को हरने वाले (उपायों) से जीते। रूक्ष, शीत, गुरु और स्वादु (मीठे पदार्थों) से, व्यायाम से और वेगों को रोकने से

च. चि. १६/१२६

। ॥ १२६ ॥

कफ से संमूर्च्छित (मिला हुआ) बलवान् वायु पित्त को (उसके) स्थान से (बाहर) फेंक देता है। तब मनुष्य हल्दी जैसे पीले नेत्र, मूत्र और त्वचा वाला, (और) श्वेत मल वाला

च. चि. १६/१२७

।॥ १२७ ॥

(और) आटोप तथा विष्टम्भ से युक्त, और भारी हृदय वाला हो जाता है। दुर्बलता, अग्नि की मन्दता, पार्श्वों में पीड़ा, हिक्का, श्वास, अरुचि और ज्वर से

च. चि. १६/१२८

। ॥ १२८ ॥

पित्त के अल्प होने और शाखाओं में आश्रित होने पर, (रोगी) क्रम से (इन लक्षणों से) ग्रस्त हो जाता है। (उसे) मोर, तित्तिर (तीतर) और दक्ष (पक्षी) के रूक्ष, अम्ल और कटु रसों (मांसरसों) से

च. चि. १६/१२९

। ॥ १२९ ॥

और सूखी मूली तथा कुलत्थ (कुलथी) के यूषों से (उसे) अन्न खिलाए। क्षौद्र (मधु), पिप्पली और मरिच से युक्त मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू) का रस

च. चि. १६/१३०

।॥ १३० ॥

(रोगी उसे) नागर (सोंठ) सहित पिए; इस प्रकार इसका पित्त अपने आशय (स्थान) में पहुँच जाता है। कटु, तीक्ष्ण, उष्ण और लवण (द्रव्यों) से तथा बहुत अम्ल (द्रव्यों) से भी उपक्रम (चिकित्सा)

च. चि. १६/१३१

। ॥ १३१ ॥

(यह उपक्रम) मल के पित्त से रंग जाने तक और वायु के शान्त होने तक होना चाहिए। अपने स्थान में पित्त के आ जाने पर, (और) पुरीष (मल) के पित्त से रंग जाने पर

च. चि. १६/१३२

। ॥ १३२ ॥

जिसके उपद्रव शान्त हो गए हों, उस (रोगी) के लिए पहले कही गई कामला की विधि (चिकित्सा) होनी चाहिए। परन्तु जब पाण्डु (रोगी) का वर्ण हरा, श्याव (साँवला-भूरा) और पीला हो जाए

च. चि. १६/१३३

। ॥ १३३ ॥

(और) बल और उत्साह का क्षय, तन्द्रा (ऊँघ), अग्नि की मन्दता, मृदु (हल्का) ज्वर, स्त्रियों के प्रति अहर्ष (इच्छा का न होना) और अङ्गमर्द (अंगों में टूटन), श्वास (साँस फूलना), तृष्णा (प्यास), अरुचि और भ्रम (चक्कर आना) (हों),

च. चि. १६/१३४

। ॥ १३४ ॥

तब (वैद्य) उस (रोगी) के (रोग को) अनिल (वात) और पित्त से (होने वाला) हलीमक जाने। गुडूची (गिलोय) के स्वरस और क्षीर (दूध) में साधित (विधि से पकाया गया) भैंस का घृत

च. चि. १६/१३५

। ॥ १३५ ॥

(उसे) वह (रोगी) पिए, (और उससे) स्निग्ध होकर आमलक (आँवला) के रस के साथ त्रिवृत् (निशोथ) (पिए)। विरेचन हो जाने पर वह प्रायः मधुर और पित्त तथा अनिल (वात) को दूर करने वाले (आहार) का सेवन करे।

च. चि. १६/१३६

। ॥ १३६ ॥

और पहले कहा गया द्राक्षालेह (द्राक्षा का लेह), और मधुर सर्पि (घृत), और अनुवासन सहित यापन क्षीरबस्तियों (दूध वाली बस्तियों) का नियम से सेवन करे।

च. चि. १६/१३७

। ॥ १३७ ॥

और अग्नि की वृद्धि के लिए (वह) युक्ति से मार्द्वीक (द्राक्षा से बनी मदिरा) और अरिष्ट के योग पिए। और कासिक (कास के प्रसंग का) अभयालेह (हरीतकी का लेह), पिप्पली, मधुक (मुलेठी) और बला

च. चि. १६/१३८

। - ॥ १३८ ॥

और (इन्हें) दूध के साथ, दोष के अनुसार और बल के अनुसार प्रयोग करे। इस विषय में (संग्रह के) दो श्लोक (हैं): पाँच प्रकार के पाण्डु (रोग) का हेतु (कारण), लक्षण और भेषज (औषध) कहा गया है,

च. चि. १६/१३९

। । ॥ १३९ ॥

दो प्रकार की कामला, और उनकी साध्यता तथा असाध्यता भी (कही गई है); और उनका जो दूसरा विकल्प (भेद) महाव्याधि (बड़ा रोग) हलीमक है, उसका व्यञ्जन (लक्षण) भी चिकित्सा सहित संक्षेप में कहा गया है।

च. चि. १६

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, और अप्राप्त (न मिलने) पर दृढबल द्वारा पूरे किए गए तन्त्र (ग्रन्थ) के चिकित्सास्थान में पाण्डुरोगचिकित्सित (पाण्डु रोग की चिकित्सा) नामक सोलहवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।