॥ १ ॥
अब इसलिए हम हिक्काश्वासचिकित्सित (हिक्का और श्वास की चिकित्सा) नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे।
अध्याय १७
हिक्का और श्वास की चिकित्सा
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हिक्काश्वासचिकित्सित चरक संहिता के चिकित्सास्थान का सत्रहवाँ अध्याय है, और इसका नाम इसके विषय से बना है: हिक्का और श्वास की चिकित्सा। हिक्का हिचकी का रोग है, और श्वास साँस फूलने, यानी साँस लेने में कठिनाई, का रोग। अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय का है। उनके शिष्य अग्निवेश हाथ जोड़कर पूछते हैं कि जिन रोगों के अनेक भेद बताए गए हैं, उनमें कौन-सा दुर्जय है, यानी कठिनाई से जीता जाता है। आत्रेय प्रसन्न होकर उत्तर देते हैं कि प्राण हरने वाले रोग तो बहुत हैं, पर वे वैसे घातक नहीं जैसे श्वास और हिक्का, जो प्राणों को शीघ्र ही काट डालते हैं; और दूसरे अनेक रोगों से ग्रस्त प्राणी को भी अन्त में हिक्का या श्वास हो जाता है।
फिर आत्रेय इन रोगों का स्वभाव और कारण समझाते हैं। दोनों कफ और वात के स्वरूप वाले हैं, पर पित्त के स्थान से उत्पन्न होते हैं, और हृदय तथा रस आदि धातुओं को सुखा देते हैं; इसलिए ये 'साधारण' और परम दुर्जय माने गए हैं, और गलत चिकित्सा होने पर विषैले साँपों की तरह मार डालते हैं। दोनों के पाँच-पाँच प्रकार हैं। कारणों की सूची लम्बी है: धूल, धुआँ और हवा, ठण्डे स्थान और ठण्डे जल का सेवन, व्यायाम, मैथुन, मार्ग चलना, रूखा अन्न और अनियमित भोजन; आम से हुआ बिगाड़, आनाह, रूखापन, अत्यधिक अपतर्पण, दुर्बलता, मर्म पर चोट और शोधन का अतियोग; अतीसार, ज्वर, छर्दि, प्रतिश्याय, क्षत और क्षय, रक्तपित्त, उदावर्त, विसूचिका, अलसक, पाण्डुरोग और विष जैसे दूसरे रोग; उड़द, खली, तिल का तेल, पिसे अन्न के पदार्थ, जलचर और आनूप प्राणियों का मांस, दही और कच्चा दूध जैसे भारी और कफ बढ़ाने वाले आहार; और कण्ठ तथा छाती पर प्रतीघात। अध्याय के अनुसार इन कारणों से कुपित वात प्राणवाही स्रोतों में प्रवेश करता है, छाती में ठहरकर कफ को उभारता है, और हिक्का तथा श्वास उत्पन्न करता है।
इसके बाद आत्रेय दोनों रोगों के पूर्वरूप और उनके प्रकारों के लक्षण बताते हैं। हिक्का के पाँच प्रकार हैं: महाहिक्का, गम्भीरा और व्यपेता, जिन्हें अध्याय प्राणों के लिए घातक कहता है, और क्षुद्र तथा अन्नजा, जो हल्की हैं; क्षुद्रहिक्का परिश्रम से बढ़ती और भोजन करते ही मन्द पड़ जाती है, और अन्नजा हिक्का जल्दबाज़ी में बहुत खाने-पीने से होती है और खाने-पीने पर शान्त हो जाती है। अध्याय उन रोगियों को भी गिनाता है जिनमें कोई भी हिक्का शीघ्र जीवन नष्ट कर देती है, और बताता है कि यमिका हिक्का उसी रोगी में ठीक हो सकती है जो क्षीण और हताश न हो और जिसके धातु और इन्द्रियाँ स्थिर हों। श्वास के भी पाँच प्रकार हैं: महाश्वास, ऊर्ध्वश्वास और छिन्नश्वास शीघ्र प्राण लेने वाले बताए गए हैं; तमकश्वास याप्य है, यानी लगातार उपचार से दबा रहता है, और नया हो तो साध्य हो सकता है, और उसके प्रतमक और संतमक भेद भी बताए गए हैं; क्षुद्रश्वास हल्का और साध्य है। प्राण हरने वाले प्रकारों को चिकित्सा के लिए वर्ज्य कहा गया है, और साध्य तथा याप्य प्रकारों का उपचार शीघ्र करने को, क्योंकि उपेक्षा किए जाने पर वे रोगी को वैसे ही जला डालते हैं जैसे आग सूखी घास को।
चिकित्सा का भाग इस सिद्धान्त से आरम्भ होता है कि हिक्का और श्वास के कारण, स्थान और मूल एक हैं, इसलिए दोनों की चिकित्सा भी एक है। अध्याय के अनुसार पहले रोगी के शरीर पर नमक मिला तेल लगाकर नाडी, प्रस्तर और संकर स्वेद दिए जाते हैं, जिनकी गरमी से गँठा हुआ कफ वैसे ही पिघलकर बहने लगता है जैसे सूर्य की किरणों से पहाड़ों की घाटियों का हिम; फिर रोगी को मछली या सूअर के मांसरस या दही के साथ स्निग्ध भात खिलाया जाता है, और कफ बढ़ने पर पिप्पली, सैन्धव और मधु से युक्त ऐसा वमन दिया जाता है जो वात का विरोधी न हो; यदि कुछ दोष भीतर रह जाए, तो उसे औषधियों के धुएँ (धूम) से निकाला जाता है। साथ में अपवाद भी बताए गए हैं: पित्त या दाह से पीड़ित, जिनका रक्त या पसीना अधिक बहता हो, क्षीण, रूखे, गर्भवती और पित्त प्रकृति वाले रोगियों को स्वेद नहीं दिया जाता, केवल छाती और कण्ठ का हल्का सेंक; नए ज्वर और आम वाले रोगियों में रूक्ष स्वेद और लङ्घन कहे गए हैं; और अतियोग से भड़के वात को शान्त करने को कहा गया है। अध्याय रोगियों के भेद भी करता है: बलवान और कफ-प्रधान रोगी का वमन और विरेचन से शोधन होता है, और वातिक, दुर्बल, बालक और वृद्ध रोगियों को शमन उपायों से तृप्त किया जाता है, क्योंकि आत्रेय बताते हैं कि जिसका कफ उभरा न हो, जिसे स्वेद न दिया गया हो या जो दुर्बल हो, उसका शोधन करने से वायु मर्म को सुखाकर प्राण ले सकता है।
इसके बाद अनेक योग आते हैं: दशमूल या कुलथी के रस में पकाया गया जाङ्गल पशु-पक्षियों का मांस, अनेक यूष और यवागू, क्वाथ, कल्क और सुरा, पशुओं के मल का रस, जलाए गए पशु-द्रव्यों के चूर्ण, मुक्ताद्य चूर्ण, नस्य, दूध, और रूखे रोगियों के लिए तेजोवत्यादि और मनःशिलादि जैसे घृत। अध्याय बताता है कि चाटने वाले योग (लेह) इसलिए दिए जाते हैं कि कफ से रुका प्राण का मार्ग शुद्ध हो, क्योंकि रुका हुआ जल जैसे और वेग से उठता है वैसे ही रुका वात भी; जिस रोगी में कफ न हो, उसे वे नहीं दिए जाते। यह भी कहा गया है कि ठण्डे जल का छिड़काव, अचानक डर, आश्चर्य, क्रोध या हर्ष जैसे झटके हिक्का को हटा सकते हैं, और रोगी के लिए इन रोगों के कारण वर्ज्य हैं। अन्त में अध्याय एक सामान्य कसौटी देता है: जो कुछ कफ और वात को नष्ट करे, उष्ण हो और वात का अनुलोमन करे, वह हितकर है; और जहाँ कोई उपचार एक दोष को घटाते हुए दूसरे को बढ़ाए, वहाँ प्रायः वात हरने वाला उपचार श्रेष्ठ है, क्योंकि बृंहण में हानि थोड़ी और सँभलने योग्य होती है, शमन में बहुत नहीं, और कर्शन में भारी और न सँभलने योग्य। इसलिए अध्याय के अनुसार हिक्का और श्वास के रोगियों की चिकित्सा, चाहे उनका शोधन हुआ हो या नहीं, प्रायः शमन और बृंहण से की जाती है। संग्रह-श्लोक अध्याय के विषय दोहराता है, और पुष्पिका बताती है कि यह अध्याय उन भागों में है जो न मिलने पर दृढबल ने पूरे किए।
तत्र श्लोकः-दुर्जयत्वे समुत्पत्तौ क्रियैकत्वे च कारणम्।लिङ्गं पथ्यं च हिक्कानां श्वासानां चेह दर्शितम्॥
श्लोक १५१ →इस विषय में (संग्रह का) श्लोक (है): हिक्काओं और श्वासों के दुर्जय (कठिनाई से जीते जाने वाले) होने का, (उनकी) उत्पत्ति का और (दोनों की) चिकित्सा एक होने का कारण, (उनके) लिङ्ग (लक्षण) और पथ्य (हितकर उपचार): (ये सब) यहाँ दिखाए गए हैं।
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।
अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।
चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।
सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।
अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।
चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।
व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।
चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।
चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।
चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।
सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।
चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।
चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।
शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।
अर्थ: औषध, उपचार।
चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।
शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।
अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।
चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।
अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।
चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।
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॥ १ ॥
अब इसलिए हम हिक्काश्वासचिकित्सित (हिक्का और श्वास की चिकित्सा) नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।
। ॥ ३ ॥
देवताओं और लोक (संसार) के विषयों के तत्त्व को जानने वाले, उत्तम ऋषि आत्रेय से बुद्धिमान अग्निवेश ने हाथ जोड़कर (अपना) संशय पूछा।
। ॥ ४ ॥
जो ये रोग दो प्रकार के, त्रिदोष (तीनों दोषों से सम्बन्धित), तीन प्रकार के प्रकोप वाले और अनेक स्वरूपों वाले कहे गए हैं, उनमें से कौन-सा (रोग) दुर्जय (कठिनाई से जीता जाने वाला) होता है?
। ॥ ५ ॥
अग्निवेश का वह वचन सुनकर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ (आत्रेय) ने अत्यन्त प्रसन्न होकर परमार्थ (वास्तविक सत्य) का निश्चित निर्णय कहा।
। ॥ ६ ॥
प्राण हरने वाले रोग भले ही बहुत से हैं, परन्तु वे वैसे (घातक) नहीं हैं, जैसे श्वास और हिक्का, (जो) प्राणों को शीघ्र ही काट डालते हैं।
। ॥ ७ ॥
अनेक प्रकार के दूसरे रोगों से भी ग्रस्त प्राणी को अन्त में हिक्का, या तीव्र वेदना (पीड़ा) वाला श्वास (रोग) हो जाता है।
। ॥ ८ ॥
ये दोनों (हिक्का और श्वास) कफ और वात स्वरूप वाले हैं, पित्त के स्थान से उत्पन्न होते हैं, और हृदय को तथा रस आदि धातुओं को सुखा देने वाले हैं।
। ॥ ९ ॥
इसलिए ये दोनों साधारण और परम दुर्जय (अत्यन्त कठिनाई से जीते जाने वाले) माने गए हैं; मिथ्या उपचार (गलत चिकित्सा) होने पर ये क्रुद्ध (कुपित) होकर दो आशीविषों (विषैले साँपों) की तरह मार डालते हैं।
। ॥ १० ॥
रोगसंग्रह (रोगों की गणना) में ये दोनों अलग-अलग पाँच प्रकार के बताए गए हैं। उन दोनों का समुत्थान (उत्पत्ति के कारण), लिङ्ग (लक्षण) और (उनकी) चिकित्सा सुनो।
।॥ ११ ॥
रज (धूल) से, धुएँ और हवा से, शीत स्थान और शीत जल के सेवन से, व्यायाम से, ग्राम्यधर्म (मैथुन), मार्ग चलने, रूखे अन्न और विषम (अनियमित) भोजन से
। ॥ १२ ॥
आमप्रदोष (आम से हुए बिगाड़) से, आनाह (पेट फूलने) से, रूखेपन से, अत्यधिक अपतर्पण से, दुर्बलता से, मर्म पर चोट से, द्वन्द्व से, शोधन के अतियोग (अधिकता) से
।॥ १३ ॥
अतीसार, ज्वर, छर्दि, प्रतिश्याय, क्षत और क्षय से, रक्तपित्त से, उदावर्त से, विसूची (विसूचिका) और अलसक से भी
।॥ १४ ॥
पाण्डुरोग से और विष से भी ये दोनों रोग उत्पन्न होते हैं; निष्पाव, माष (उड़द), पिण्याक (खली) और तिल-तैल (तिल के तेल) के सेवन से
।॥ १५ ॥
पिष्ट (पिसे अन्न से बने पदार्थ), शालूक, विष्टम्भी, विदाही और गुरु (भारी पदार्थों के) भोजन से, जलज (जल के) और आनूप (जल-बहुल प्रदेश के) प्राणियों के मांस, दधि (दही) और आम (कच्चे) दूध के सेवन से
। ॥ १६ ॥
अभिष्यन्दी उपचार (आहार-विहार) से, और श्लेष्मल (कफ बढ़ाने वाले) पदार्थों के सेवन से, कण्ठ और उरस् (छाती) पर प्रतीघात से, और अनेक प्रकार के विबन्धों (रुकावटों) से
। ॥ १७ ॥
(इन कारणों से) मारुत (वात) प्राण को वहन करने वाले स्रोतों में प्रवेश करके कुपित होता है; वह उरस् (छाती) में स्थित होकर कफ को ऊपर उभारकर हिक्का और श्वास (रोगों) को उत्पन्न करता है
। ॥ १८ ॥
(वह वात) प्राणियों के प्राण रोक देने वाले, भयंकर, पाँच और पाँच (प्रकार के हिक्का और श्वास रोग उत्पन्न करता है)। इसके आगे (मैं) दोनों के पूर्वरूप कहूँगा, (उन्हें) सुनो।
। ॥ १९ ॥
कण्ठ और छाती का भारीपन, मुख का कसैलापन और कुक्षि (पेट) का आटोप (गुड़गुड़ाहट के साथ फूलना) भी, (ये) हिक्काओं के पूर्वरूप हैं।
। ॥ २० ॥
आनाह (पेट का अफारा), पार्श्वशूल (बगलों में दर्द), हृदय का पीडन (दबाव), और प्राण (वायु) का विलोम (उल्टी दिशा में) चलना, (ये) श्वास रोगों के पूर्वलक्षण हैं।
। ॥ २१ ॥
कफ सहित अनिल (वात) प्राण, उदक (जल) और अन्न को ले जाने वाले स्रोतों को रोककर हिक्काएँ उत्पन्न करता है। उनके लक्षण अलग-अलग सुनो।
। ॥ २२ ॥
जिसके मांस, बल, प्राण और तेज क्षीण हो चुके हों, उस (रोगी) के कण्ठ को कफ सहित अनिल (वात) सहसा पकड़कर, बहुत ऊँचे घोष (आवाज़) वाली
। ॥ २३ ॥
लगातार, एक, दो और तीन गुनी हिक्का उत्पन्न करता है। तथा प्राण (वायु) स्रोतों, मर्मों और ऊष्मा को भी रोककर
। ॥ २४ ॥
संज्ञा (चेतना) हर लेता है, अंगों में स्तम्भ (जकड़न) भी उत्पन्न करता है, और जिसकी स्मृति नष्ट हो चुकी हो उस (रोगी) के अन्न-पान का मार्ग भी रोक देता है,
। ॥ २५ ॥
(उस रोगी के, जिसकी) आँखें आँसुओं से डबडबाई हों, कनपटियाँ जकड़ी हों और भौंहें ढलक गई हों, जिसकी बोलचाल और प्रलाप अटक-अटककर निकलें, और जो चैन न पा रहा हो।
। ॥ ।
बड़े मूल वाली, बड़े वेग वाली, बड़े शब्द (आवाज़) वाली और बड़े बल वाली वह (हिक्का) 'महाहिक्का' मानी गई है, जो मनुष्यों के प्राण तुरन्त हर लेती है। इस प्रकार महाहिक्का (का वर्णन पूरा हुआ)।
। ॥ २७ ॥
जो प्रवृद्ध (आयु में बढ़ा हुआ), कृश (दुबला) और दीन मन वाला मनुष्य जर्जर छाती से, कठिनाई के साथ, गहरी आवाज़ गुँजाते हुए हिचकी लेता है,
। ॥ २८ ॥
जँभाई लेते हुए, अंगों को सिकोड़ते और फिर फैलाते हुए, दोनों पार्श्वों (बगलों) को खींचकर, कराहने जैसा स्वर निकालते हुए, स्तम्भ (जकड़न) और पीड़ा से पीड़ित (होकर),
। ॥ २९ ॥
और इस (रोगी) की हिक्का नाभि से या पक्वाशय से उत्पन्न होती है, जो घुटते हुए (रोगी) के शरीर को बहुत झकझोरती है और मानो (उसे) झुका देती है,
। ॥ ।
और जिसका बल और चेतना नष्ट हो चुके हों, उस (रोगी) के उच्छ्वास (साँस) का मार्ग रोक देती है। उस (मनुष्य) की वह हिक्का 'गम्भीरा' नाम की है और प्राणों का अन्त करने वाली मानी गई है। इस प्रकार गम्भीरा हिक्का (का वर्णन पूरा हुआ)।
। ॥ ३१ ॥
जो हिक्का चार प्रकार के अन्न-पान (के लेने) पर व्यपेत (शान्त) हो जाती है, और आहार के परिणाम (पाचन) के अन्त में फिर से बल पा लेती है,
। ॥ ३२ ॥
प्रलाप, वमि (उल्टी), अतीसार (दस्त) और तृष्णा (प्यास) से पीड़ित, विचेतस् (बेसुध), जँभाई लेने वाले, अस्थिर आँखों वाले, सूखे मुँह वाले और (शरीर) झुकाने वाले (रोगी) की
। ॥ ।
(ऐसे) पर्याध्मात (चारों ओर से फूले हुए रोगी) की जो हिक्का जत्रु (हँसली) के मूल से रुक-रुक कर (उठती) है, उसे व्यपेता (नाम की) हिक्का जानना चाहिए; यह हिक्का प्राणों को रोकने वाली है। इस प्रकार व्यपेता हिक्का (का वर्णन हुआ)।
। ॥ ३४ ॥
जब क्षुद्र (थोड़ा, मन्द) वात व्यायाम (परिश्रम) से हिलकर कोष्ठ से (उठकर) कण्ठ में पहुँचता है, तब वह क्षुद्र (हल्की) हिक्का उत्पन्न करता है।
। ॥ ३५ ॥
वह (क्षुद्रहिक्का) न तो बहुत कष्ट देने वाली है, न छाती, सिर और मर्मों को पीड़ा देने वाली; और न ही वह उच्छ्वास (साँस), अन्न और पान के मार्ग को ढककर (रोककर) ठहरती है।
। ॥ ३६ ॥
परिश्रम करने वाले (व्यक्ति) में यह बढ़ जाती है, और भोजन करते ही मन्द पड़ जाती है; जहाँ से यह पहले प्रवृत्त होती (उठती) है, वहीं से लौट जाती है।
। ॥ ।
हृदय, क्लोम, कण्ठ और तालु पर आश्रित वह मृदु (हल्की) हिक्का 'क्षुद्रहिक्का' कही गई है, और मनुष्यों के लिए साध्य (चिकित्सा से ठीक होने योग्य) बताई गई है। इस प्रकार क्षुद्रहिक्का (का वर्णन हुआ)।
। ॥ ३८ ॥
सहसा (जल्दबाज़ी में) बहुत अधिक खाए-पिए गए पान और अन्न से, या बहुत अधिक मद (नशा) देने वाले मद्यों से दबाया गया अनिल (वात) कोष्ठ से ऊपर की ओर जाता है।
। ॥ ३९ ॥
उसी प्रकार अत्यधिक क्रोध, बोलने, मार्ग चलने, हँसने और भार (उठाने) में अति करने से, कोष्ठ में स्थित वायु, पान और भोज्य (खाने की वस्तुओं) से दबाया हुआ, दौड़ता हुआ
। ॥ ४० ॥
उरःस्रोतस् (छाती के मार्ग) में प्रवेश करके तब अन्नजा (अन्न से उत्पन्न) हिक्का उत्पन्न करता है। और वह (रोगी) धीरे-धीरे, बिना सिलसिले के, और छींकता हुआ भी हिचकी लेता है।
। ॥ ।
वह अन्नजा हिक्का न मर्मों में पीड़ा उत्पन्न करने वाली है, न इन्द्रियों को कष्ट देने वाली; और पीने पर तथा खाने पर शान्त हो जाती है। इस प्रकार अन्नजा हिक्का (का वर्णन हुआ)।
। ॥ ४२ ॥
जिसके दोष बहुत अधिक संचित हो गए हों, जो भोजन छूटने से कृश (दुबला) हो गया हो, जिसका शरीर रोगों से क्षीण हो गया हो, जो वृद्ध हो और अत्यधिक व्यवाय (मैथुन) करता हो, (ऐसे व्यक्ति में)
। ॥ ४३ ॥
इन (हिक्काओं) में से जो भी हिक्का उत्पन्न हो, वह शीघ्र ही जीवन को नष्ट कर देती है; और प्रलाप, आर्ति (पीड़ा), तृष्णा (प्यास) और मोह (मूर्च्छा) से युक्त यमिका (हिक्का भी जीवन नष्ट कर देती है)।
। ॥ ४४ ॥
जो (रोगी) क्षीण नहीं है, दीन (हताश) भी नहीं है, और जिसके धातु और इन्द्रियाँ स्थिर हैं, उसकी यमिका (हिक्का) ठीक की जा सकती है; इससे अन्यथा (स्थिति में) वह मार डालती है।
। ॥ ४५ ॥
जब कफपूर्वक (कफ के साथ) मारुत (वात) स्रोतों को रोककर, (स्वयं भी) रुका हुआ होकर चारों ओर फैलता है, तब वह श्वास (रोगों) को उत्पन्न करता है।
। ॥ ४६ ॥
जिस मनुष्य का वात ऊपर की ओर उछाला जा रहा हो, जो दुःखी (पीड़ित) हो, और जो रुका हुआ (अवरुद्ध) होकर मतवाले साँड़ की तरह लगातार शब्द के साथ ऊँचे स्वर में साँस लेता हो
। ॥ ४७ ॥
जिसका ज्ञान और विज्ञान (समझ-बूझ) नष्ट हो गया है, तथा जिसकी आँखें घूम रही हैं, जिसकी आँखें और मुख विकृत हो गए हैं, जिसके मूत्र और मल रुक गए हैं, (और) जिसकी वाणी टूट-फूट गई है
। ॥ ।
जो दीन (दुःखी, असहाय) है, और जिसकी साँस (की आवाज़) दूर से ही भली-भाँति पहचान में आती है, महाश्वास से ग्रस्त वह (मनुष्य) शीघ्र ही मर जाता है। इस प्रकार महाश्वास (का वर्णन हुआ)।
। ॥ ४९ ॥
और जो (रोगी) ऊपर की ओर लम्बी साँस लेता है और (उसे) नीचे की ओर वापस नहीं खींचता, जिसके मुख और स्रोत श्लेष्मा (कफ) से ढके हुए हैं, (और) जो कुपित गन्धवह (वायु) से पीड़ित है
। ॥ ५० ॥
जिसकी दृष्टि ऊपर की ओर है, और जो घूमती आँखों से इधर-उधर देखता है, जो मूर्च्छित होने लगता है और वेदना (पीड़ा) से व्याकुल है, जिसका मुख सूख गया है, (और जो) अरति (बेचैनी) से पीड़ित है
। ॥।
क्योंकि ऊपर की ओर जाने वाली साँस (ऊर्ध्वश्वास) के प्रकुपित होने पर नीचे की ओर जाने वाली साँस (अधःश्वास) रुक जाती है। मूर्च्छित होते और दम घुटते हुए उसी (रोगी) के प्राणों को ऊपर की ओर चलता श्वास हर लेता है। इस प्रकार ऊर्ध्वश्वास (का वर्णन हुआ)।
। ॥ ५२ ॥
और जो (रोगी) पूरी शक्ति लगाकर, पीड़ित होकर, टूट-टूट कर साँस लेता है, या दुःख से व्याकुल और मर्मों को काटने वाली पीड़ा से पीड़ित होकर साँस ले ही नहीं पाता
। ॥ ५३ ॥
जो आनाह (अफारा), स्वेद (पसीने) और मूर्च्छा से पीड़ित है, जिसकी बस्ति (मूत्राशय) में जलन हो रही है, जिसकी आँखें विप्लुत (डबडबाई या चंचल) हैं, जो अत्यन्त क्षीण हो गया है, (कठिनाई से) साँस लेता है, और जिसकी एक आँख लाल है
। ॥ ।
जो विचेता (बेसुध) है, जिसका मुख सूख गया है, जो विवर्ण (फीका) पड़ गया है और प्रलाप करता है, वह मनुष्य छिन्नश्वास से विच्छिन्न (टूटा हुआ) होकर शीघ्र ही प्राण त्याग देता है। इस प्रकार छिन्नश्वास (का वर्णन हुआ)।
। ॥ ५५ ॥
जब वायु प्रतिलोम (उलटी दिशा में) होकर स्रोतों में पहुँचता है, और ग्रीवा (गर्दन) और सिर को जकड़कर तथा श्लेष्मा (कफ) को उभारकर
। ॥ ५६ ॥
उस (श्लेष्मा) से रुका हुआ (वह वायु) पीनस, घुर्घुरुक (घरघराहट) तथा अत्यन्त तीव्र वेग वाले, प्राणों को पीड़ा देने वाले श्वास को उत्पन्न करता है।
। ॥ ५७ ॥
अत्यधिक वेग के कारण उसका दम घुटने लगता है, वह खाँसता है और (उसकी साँस) पूरी तरह रुक जाती है; और खाँसते-खाँसते वह बार-बार प्रमोह (मूर्च्छा) में चला जाता है।
। ॥ ५८ ॥
श्लेष्मा के न निकलने पर (रोगी) बहुत दुःखी होता है; और उसी (श्लेष्मा) के निकल चुकने पर (वह) मुहूर्त भर (थोड़ी देर) सुख पाता है।
। ॥ ५९ ॥
फिर उसका कण्ठ (गला) बैठ जाता है, (वह) कठिनाई से बोल पाता है; और श्वास से पीड़ित (वह) लेटे रहने पर नींद भी नहीं पाता।
। ॥ ६० ॥
लेटे हुए उस (रोगी) के दोनों पार्श्वों (बगलों) को समीरण (वायु) जकड़ लेता है; बैठे रहने पर वह सुख पाता है, और उष्ण (गरमाहट) को पसन्द करता है।
। ॥ ६१ ॥
(तमकश्वास का रोगी) ऊपर चढ़ी (उभरी) आँखों वाला, पसीने से भीगते माथे के साथ अत्यन्त पीड़ित और सूखे मुँह वाला होता है; बार-बार श्वास (का वेग उठता है) और बार-बार ही वह (श्वास से) धौंका जाता है (हाँफता है)।
। ॥ ।
(यह श्वास) बादलों, जल, ठण्ड, पूर्वी हवा और श्लेष्मल (कफ बढ़ाने वाले पदार्थों) से बढ़ता है। वह तमकश्वास याप्य (उपचार से दबा रहने वाला) है, अथवा नया उत्पन्न हुआ हो तो साध्य हो सकता है। इस प्रकार तमकश्वास (का वर्णन हुआ)।
।॥ ६३ ॥
ज्वर और मूर्च्छा से घिरे (रोगी) के उस (तमकश्वास) को तो प्रतमक जानना चाहिए। उदावर्त, रज (धूल), अजीर्ण, शरीर के क्लिन्न (गीले) होने और निरोध से उत्पन्न होने वाला (यह श्वास)
। ॥ ।
अँधेरे से अत्यधिक बढ़ता है और शीत (ठण्डी चीज़ों) से शीघ्र शान्त हो जाता है। जो (रोगी) मानो अँधेरे में डूब रहा हो, उसके उस (श्वास) को तो संतमक जानना चाहिए। इस प्रकार प्रतमक और संतमकश्वास (का वर्णन हुआ)।
। ॥ ६५ ॥
रूक्षता (रूखे आहार-विहार) और परिश्रम से उत्पन्न, कोष्ठ में (श्वास को) ऊपर प्रेरित करता हुआ क्षुद्र (थोड़ा) वात क्षुद्रश्वास (उत्पन्न करता है); वह (श्वास) अत्यधिक कष्ट देकर अङ्गों को पीड़ित करने वाला नहीं होता।
। ॥ ६६ ॥
वह (क्षुद्रश्वास) न शरीर के अङ्गों को हानि पहुँचाता है, न दूसरे (श्वासों) की तरह कष्टदायक होता है, और न भोजन-पान की उचित गति को रोकता है।
। ॥ ६७ ॥
न (वह) इन्द्रियों को व्यथा पहुँचाता है, न ही कोई (अन्य) पीड़ा उत्पन्न करता है। वह (क्षुद्रश्वास) साध्य कहा गया है; और बलवान (रोगी) के सभी (श्वास भी), जिनके लक्षण प्रकट न हुए हों, (साध्य हैं)।
। ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्वास और हिक्का (रोग) अपने-अपने लक्षणों के साथ बताए गए। इनमें से प्राण हरने वाले (प्रकार) वर्ज्य (चिकित्सा के लिए त्याज्य) हैं, क्योंकि वे घोर और शीघ्र (घातक) प्रभाव करने वाले होते हैं।
। ॥ ६९ ॥
परन्तु साध्य और याप्य (प्रकारों) का उपचार वैद्य को औषधियों से शीघ्र करना चाहिए, क्योंकि उपेक्षा किए जाने पर वे (रोगी को) वैसे ही जला डाल सकते हैं, जैसे अग्नि सूखे कक्ष (घास-फूस) को।
। ॥ ७० ॥
कारण, स्थान और मूल एक होने से दोनों (हिक्का और श्वास) की चिकित्सा भी एक ही है; ऋषियों ने उसे जैसा देखा है, वैसा समझो।
। ॥ ७१ ॥
हिक्का और श्वास से पीड़ित (रोगी) के शरीर पर लवणतैल (नमक मिला तेल) लगाकर, आरम्भ में नाडी, प्रस्तर और संकर (नामक) स्निग्ध स्वेदों से उसका उपचार करना चाहिए।
। ॥ ७२ ॥
उन (स्वेदों) से इसका गँठा हुआ कफ (श्लेष्मा) स्रोतों में पिघल जाता है, छिद्र (मार्ग) कोमल हो जाते हैं, और तब वात का अनुलोमन (स्वाभाविक दिशा में चलना) होता है।
। ॥ ७३ ॥
जैसे पर्वतों के कुञ्जों (घाटियों) में (जमा) हिम सूर्य की किरणों से तपकर पिघलता और बहने लगता है, वैसे ही शरीर में स्थिर (जमा हुआ) कफ स्वेदों से तपकर पिघलता और बहने लगता है।
। ॥ ७४ ॥
(रोगी को) भली-भाँति स्वेदित जानकर, तब शीघ्र उसे मछलियों या सूअरों के रसों (मांसरस) के साथ, अथवा दध्युत्तर (ऊपर से दही) के साथ स्निग्ध ओदन (चिकनाई युक्त भात) खिलाना चाहिए।
। ॥ ७५ ॥
उसके बाद श्लेष्मा (कफ) के बढ़ जाने पर उस (रोगी) को वमन (उल्टी कराने वाली औषध) पिलाए, जो पिप्पली, सैन्धव (सेंधा नमक) और क्षौद्र (मधु) से युक्त हो (और) वात का विरोधी न हो।
। ॥ ७६ ॥
दुष्ट विग्रह वाले (बिगड़े हुए) कफ के निकाल दिए जाने पर वह (रोगी) सुख पाता है, और स्रोतों (शरीर के मार्गों) के शुद्ध हो जाने पर अनिल (वात) बिना रुकावट के संचार करता है।
। ॥ ७७ ॥
यदि दोष का शेष भाग (भीतर) लीन (चिपका हुआ) रह जाए, तो बुद्धिमान् (वैद्य) उसे धूमों (औषधीय धुएँ) से निकाले। हरिद्रा (हल्दी), पत्र, एरण्ड (अरंड) की जड़, लाक्षा (लाख) और मनःशिला (मैनसिल) को
। ॥ ७८ ॥
देवदारु (देवदार) सहित अल और मांसी (जटामांसी) को पीसकर वर्ति (बत्ती) बनाए। घृत (घी) से लिपटी हुई उस (बत्ती) का धूम पिए (धुआँ खींचे), अथवा घृत से युक्त यवों (जौ) से (धूम पिए)।
। ॥ ७९ ॥
मधूच्छिष्ट (मोम), सर्जरस (राल) और घृत को मल्लक-सम्पुट (जुड़े हुए दो सकोरों) में रखकर धूम पिए; अथवा गायों के शृङ्ग (सींग), बाल या स्नायु का (धूम पिए)।
। ॥ ८० ॥
(अथवा) स्योनाक और वर्धमान की, या कुश की सूखी नाडी (खोखला डंठल), (अथवा) घृत में डुबोए हुए पद्मक, गुग्गुल, लोह या शल्लकी (का धूम पिए)।
।॥ ८१ ॥
स्वर के क्षीण होने, अतिसार, असृक्पित्त (रक्तपित्त) और दाह के अनुबन्ध (साथ जुड़ने) से उत्पन्न हिक्का और श्वास का उपचार मधुर, स्निग्ध, शीत आदि (उपायों) से करे।
। ॥ ८२ ॥
पित्त और दाह से पीड़ित, जिनका रक्त और स्वेद (पसीना) अधिक बहता हो, जिनकी धातु और बल क्षीण हों, रूक्ष (रूखे शरीर वाले), गर्भिणी (गर्भवती) स्त्रियाँ और पित्तल (पित्त की प्रकृति वाले) भी स्वेद्य (स्वेदन के योग्य) नहीं हैं।
। ॥ ८३ ॥
चाहे तो शर्करा सहित गुनगुने स्नेह-सेकों (तेल, घी की धार) से और मृदु (हल्के) उत्कारिका-उपनाहों (पुलटिस) से छाती और कण्ठ का क्षण भर (थोड़ी देर) स्वेदन करे।
। ॥ ८४ ॥
तिल, उमा (अलसी), माष (उड़द) और गोधूम (गेहूँ) के चूर्णों से, वात को हरने वाले (द्रव्यों) के साथ, और स्नेहों से, अम्ल (खट्टे द्रव्य) सहित या क्षीर (दूध) सहित बनाई गई उत्कारिका हितकर होती है।
। ॥ ८५ ॥
नए ज्वर और आम दोष वाले (रोगियों) में रूक्ष स्वेद (बिना स्नेह का सेंक) और विलङ्घन कराए, अथवा (रोगी की अवस्था) भली भाँति परखकर लवण के जल (नमक मिले पानी) से उल्लेखन (वमन) भी कराए।
। ॥ ८६ ॥
अतियोग से उद्धत (भड़के हुए) वात को देखकर भिषक् (वैद्य) वात को हरने वाले, न बहुत शीत न बहुत उष्ण रस आदि से और अभ्यङ्गों (तेल की मालिश) से (उसे) शान्त करे।
। ॥ ८७ ॥
उदावर्त तथा आध्मान में अन्न मातुलुङ्ग (बिजौरा) और अम्लवेतस से, तथा हिङ्गु (हींग), पीलु और बिड (लवण) से युक्त और अनुलोमन (वात को सही दिशा में ले जाने वाला) होना चाहिए।
। ॥ ८८ ॥
वस्तुतः हिक्का और श्वास का एक रोगी बलवान् होता है, (तो) दूसरा दुर्बल; उसी प्रकार एक कफ की अधिकता वाला होता है, (तो) दूसरा रूक्ष और अधिक अनिल (वात) वाला।
। ॥ ८९ ॥
कफ की अधिकता वाले और बलवान् (रोगी) में विरेचन सहित वमन करे; उसके बाद, पथ्य (हितकर) भोजन करने वाले (उस रोगी) के लिए धूम, लेह आदि से शमन (करे)।
। ॥ ९० ॥
वातिक (वात-प्रधान), दुर्बल, बालक और वृद्ध (रोगियों) को अनिल (वात) का नाश करने वाले शमन (उपायों) से, जैसे स्नेह, यूष, रस आदि से, तृप्त (पुष्ट) ही करे।
। ॥ ९१ ॥
जिनका कफ उत्क्लिष्ट (उभरकर ढीला) नहीं हुआ है, जिन्हें स्वेद नहीं दिया गया है और जो दुर्बल हैं, उनका विशोधन करने से वायु (शरीर में) स्थान पाकर मर्म को सुखाकर शीघ्र ही प्राण हर सकता है।
। ॥ ९२ ॥
इसलिए वैद्य दृढ (बलवान्) और अधिक कफ वाले (रोगियों) को आनूप और जलचर (प्राणियों) के रसों से तृप्त करके, स्वेद दिए जाने पर, उनका विशोधन करे; अन्य (रोगियों) का बृंहण करे (उन्हें पुष्ट करे)।
। ॥ ९३ ॥
बर्हि (मोर), तित्तिरि (तीतर) और दक्ष (नामक पक्षी), तथा जाङ्गल (सूखे प्रदेश के) मृग और द्विज (पशु और पक्षी), दशमूली के रस (काढ़े) में या कुलत्थ के रस में पकाए हुए, हितकर हैं।
। ॥ ९४ ॥
निदिग्धिका, बिल्वमध्य (बिल्व अर्थात् बेल के फल का गूदा), कर्कटाख्या, दुरालभा, त्रिकण्टक, गुडूची (गिलोय) और चित्रक सहित कुलत्थ (कुलथी) को
। ॥ ९५ ॥
जल में पकाकर (जो) रस (बने, वह) छाना हुआ, पिप्पली और घी से भूना (छौंका) हुआ, नागर (सोंठ) सहित और लवण (नमक) सहित, भोजन में हितकर यूष होगा।
। ॥ ९६ ॥
रास्ना, बला, ह्रस्व (छोटा) पञ्चमूल और चित्रक सहित मुद्ग (मूँग) को जल में पकाकर, उस रस में भी पहले की तरह यूष बनाना चाहिए।
। ॥ ९७ ॥
मातुलुङ्ग (बिजौरा), निम्ब (नीम) और कुलक के पल्लवों (कोमल पत्तों) को, तथा व्योष सहित मुद्ग (मूँग) को पकाकर, क्षारयूष (क्षार मिलाकर बनने वाला यूष) तैयार करे।
। ॥ ९८ ॥
लवण (नमक) सहित क्षार, शिग्रु (सहजन) और मरिच (काली मिर्च) डालकर युक्ति से (उचित विधि से) बनाया गया यूष हिक्का और श्वास के विकारों को दूर करने वाला है।
। ॥ ९९ ॥
कासमर्दक (कसौंदी) के पत्तों का यूष, और शोभाञ्जन (सहजन) का (यूष), तथा सूखी मूली का यूष हिक्का और श्वास को रोकने वाला है।
। ॥ १०० ॥
दही, व्योष और सर्पि (घी) सहित, वार्ताक (बैंगन) से बना यूष हितकर है, और शालि, षष्टिक, गोधूम (गेहूँ) और यव (जौ) के अनव (जो नए न हों, ऐसे पुराने) अन्न भी।
। ॥ १०१ ॥
हिङ्गु (हींग), सौवर्चल, अजाजी, बिड, पौष्कर और चित्रक से, तथा कर्कटशृङ्गी से सिद्ध की हुई (पकाई हुई) यवागू श्वास और हिक्का के रोगियों के लिए (हितकर है)।
।॥ १०२ ॥
दशमूली, शटी, रास्ना, पिप्पलीमूल और पौष्कर से, तथा शृङ्गी, तामलकी, भार्गी, गुडूची (गिलोय), नागर (सोंठ) और अम्बु (जल) से
।॥ १०३ ॥
मनुष्य कास (खाँसी), हृद्ग्रह (हृदय की जकड़न), पार्श्वार्ति (पसलियों वाली बगल की पीड़ा), हिक्का और श्वास की शान्ति के लिए (इन द्रव्यों से) विधि से सिद्ध की हुई यवागू, या (इनका) कषाय (काढ़ा) पिए।
। ॥ १०४ ॥
अन्न और पान (खाने और पीने की वस्तुओं) को पुष्कराह्व, शटी, व्योष, मातुलुङ्ग (बिजौरा) और अम्लवेतस से, घी, बिड और हिङ्गु (हींग) सहित, युक्त करे।
। ॥ १०५ ॥
प्यास लगने पर हिक्का और श्वास का रोगी मनुष्य दशमूल का क्वाथ (काढ़ा), अथवा देवदारु का (क्वाथ), अथवा मदिरा भी पिए।
। ॥ १०६ ॥
पाठा, मधुरसा, रास्ना, सरल (चीड़) और देवदारु को धोकर और कूटकर सुरामण्ड (सुरा के ऊपर के स्वच्छ भाग) में रखवाए।
। ॥ १०७ ॥
वैद्य उस (सुरामण्ड) को थोड़ा नमकीन करके एक प्रसृत (हथेली भर) मात्रा में पिलाए; उससे हिक्का और श्वास दोनों ही शान्त हो जाते हैं।
। ॥ १०८ ॥
हिङ्गु (हींग), सौवर्चल (काला नमक), कोल (बेर), समङ्गा, पिप्पली और बला को मातुलुङ्ग (बिजौरा) के रस में पीसकर, अथवा आरनाल (खट्टी काँजी) के साथ, पिए।
। ॥ १०९ ॥
सौवर्चल (काला नमक), नागर (सोंठ) और भार्गी (भारंगी) को दो (भाग) शर्करा मिलाकर गरम पानी के साथ पिए; यह हिक्का और श्वास के विकारों को दूर करने वाला है।
। ॥ ११० ॥
भार्गी (भारंगी) और नागर (सोंठ) का कल्क, उसी प्रकार मरिच (काली मिर्च) और क्षार का (कल्क), और पीतद्रु, चित्रक, आस्फोता और मूर्वा का (कल्क) पानी के साथ पिए।
। ॥ १११ ॥
मधूलिका, तुगाक्षीरी, नागर (सोंठ) और पिप्पली (से बनी), घी में पकाई गई उत्कारिका पित्त के अनुबन्ध से उत्पन्न श्वास में (हितकर है)।
। ॥ ११२ ॥
वात के अनुबन्ध से उत्पन्न श्वास में श्वाविध् का (मांस), शश (खरगोश) का मांस और शल्लक का रक्त, पिप्पली और घी के साथ पकाए हुए, (हितकर हैं)।
। ॥ ११३ ॥
सुवर्चला का रस, दूध और त्रिकटु मिला घी, शालि चावल के भात के अनुपान (के रूप में), वात और पित्त से जुड़े (श्वास) में हितकर है।
। ॥ ११४ ॥
शिरीष (सिरस) के फूलों का स्वरस, अथवा फिर सप्तपर्ण का (स्वरस), पिप्पली और मधु मिलाकर, कफ और पित्त से जुड़े (श्वास) में (हितकर) माना गया है।
। ॥ ११५ ॥
मधुक, पिप्पलीमूल, गुड़, गाय और घोड़े के मल का रस, घी और क्षौद्र (मधु) - (यह) कास, श्वास, हिक्का और अभिष्यन्द के रोगियों के लिए शुभ (हितकर) है।
। ॥ ११६ ॥
अधिक कफ होने पर गधे, घोड़े, ऊँट, सूअर, मेष (भेड़) और हाथी के मल का रस, एक-एक करके, मधु के साथ पिए।
। ॥ ११७ ॥
मनुष्य अश्वगन्धा का क्षार भी क्षौद्र (मधु) और घी के साथ चाटे। अथवा मयूर (मोर) के पैर की नाल (नली), अथवा शल्लक का शकल (टुकड़ा)
। ॥ ११८ ॥
अथवा श्वाविध्, जाण्डक और चाष (नीलकण्ठ) के रोम, अथवा कुरर के (रोम), अथवा सींग वाले, एक खुर वाले और दो खुर वाले (पशुओं) के चमड़े और हड्डियाँ तथा खुर
। ॥ ११९ ॥
(इन) सबको (एक साथ), अथवा एक-एक करके भी, जलाकर (बने) चूर्ण को क्षौद्र (मधु) और घी मिलाकर चाटकर (रोगी) कास, हिक्का और दारुण (भयंकर) श्वास को जीत सकता है।
। ॥ १२० ॥
क्योंकि ये (कास, हिक्का और श्वास) कफ से रुकी हुई गति वाले प्राण (वायु) के प्रकोप से उत्पन्न होते हैं। इसलिए उस (प्राण) के मार्ग की शुद्धि के लिए लेह (चाटने वाली औषधियाँ) देने चाहिए; (परन्तु) जिसमें कफ न हो, उसे नहीं।
। ॥ १२१ ॥
बुद्धिमान् (वैद्य) कास वाले (रोगी) को और स्वरभङ्ग (आवाज़ बैठ जाने) में छर्दन (वमन) दे; परन्तु तमक (श्वास) में वात और श्लेष्मा (कफ) को हरने वाले (द्रव्यों) से युक्त विरेचन (दे)।
। ॥ १२२ ॥
जैसे बहता हुआ जल मार्ग रुक जाने से और भी अधिक वेग से ऊपर उठता है, वैसे ही अनिल (वायु भी उठती है); (इसलिए) उसके मार्ग को सदा शुद्ध करे।
। ॥ १२३ ॥
शटी, चोरक, जीवन्ती, त्वक् (दालचीनी), मुस्त (नागरमोथा), पुष्कर नाम वाली (औषधि, यानी पुष्करमूल), सुरस, तामलकी, एला (इलायची), पिप्पली, अगुरु (अगर), नागर (सोंठ)
। ॥ १२४ ॥
और वालक, (इन सबका) समान भाग वाला चूर्ण बनाकर, (उसमें चूर्ण से) आठ गुनी शर्करा (मिलाकर), तमकश्वास में और हिक्का में सब प्रकार से प्रयोग करे।
।॥ १२५ ॥
मुक्ता (मोती), प्रवाल (मूँगा), वैदूर्य (एक रत्न), शङ्ख, स्फटिक, अञ्जन (सम्भवतः सुरमा), (और इनके) साथ सार, गन्ध, काच, अर्क, सूक्ष्मैला (छोटी इलायची) और दो लवण
। ॥ १२६ ॥
ताम्र (ताँबे) और अयस् (लोहे) के रज (चूर्ण), रूप्य (चाँदी), सौगन्धिक के साथ सीसक (सीसा), जातीफल (जायफल), शण (सन) का बीज (और) अपामार्ग (चिरचिटा) के तण्डुल (दाने)
। ॥ १२७ ॥
बराबर-बराबर (मात्रा में लिए गए) इन (सब द्रव्यों) का एक पाणितल (भर) चूर्ण, क्षौद्र (मधु) और सर्पि (घी) के साथ चाटा जाने पर, हिक्का, श्वास और कास को शीघ्र रोक देता है।
। ॥ ।
अञ्जन के रूप में (आँखों में लगाने) से (यह चूर्ण) तिमिर, काच, नीलिका, पुष्पक, तम, मल्य, कण्डू (खुजली), अभिष्यन्द और अर्म को भी नष्ट करता है। इस प्रकार मुक्ताद्य चूर्ण (का वर्णन हुआ)।
। ॥ १२९ ॥
शटी और पुष्करमूल का, और आमलक (आँवले) का चूर्ण मधु के साथ मिलाकर चाटना चाहिए; अथवा काललोह (लोहे) से बना चूर्ण (चाटना चाहिए)।
। ॥ १३० ॥
शर्करा सहित तामलकी, द्राक्षा (दाख), गाय और घोड़े के शकृत् (गोबर और लीद) का रस, (तथा) बराबर मात्रा में गुड और नागर (सोंठ), (इन्हें) खिलाए, और उसी प्रकार नस्य भी दे।
। ॥ १३१ ॥
लशुन (लहसुन) का, या पलाण्डु (प्याज) का, या गृञ्जनक का मूल (कन्द), अथवा चन्दन भी, स्त्री के दूध के साथ मिलाकर नस्य के रूप में दे।
। ॥ १३२ ॥
अथवा सैन्धव (सेंधा नमक) का चूर्ण बुरका हुआ गुनगुना घृतमण्ड (घी का ऊपरी स्वच्छ भाग), अथवा अलक्तक के रस के साथ माक्षिकी विष्ठा (मक्खी की विष्ठा), नस्य के रूप में दे।
। ॥ १३३ ॥
स्त्री के दूध के साथ, अथवा मधुरक (मधुर द्रव्यों) के साथ भी सिद्ध किया हुआ सर्पि (घी), पीने पर या नाक में डालने पर, तुरन्त हिक्का को रोक देता है।
। ॥ १३४ ॥
हिक्का के रोगियों के लिए, शर्करा और मधु मिला हुआ पयस् (दूध), बारी-बारी से एक बार गरम और एक बार ठंडा, पीने में या नस्य-कर्म में (दिया जाए)।
। ॥ १३५ ॥
अधोभाग (विरेचक) द्रव्यों के साथ सिद्ध किया (पकाया) हुआ घृत तुरन्त हिक्का को रोकता है; अथवा पिप्पली और मधु मिलाए हुए धात्री (आँवला) और कपित्थ (कैथ) के रस (भी)।
। ॥ १३६ ॥
(रोगी) लाजा (खील), लाक्षा (लाख), मधु, द्राक्षा (अंगूर), पिप्पली और घोड़े की लीद के रस को चाटे; अथवा कोल (बेर), मधु, द्राक्षा, पिप्पली और नागर (सोंठ) को (चाटे)।
। ॥ १३७ ॥
ठण्डे जल का सेक (छिड़कना), अचानक त्रास (डराकर चौंका देना), विस्मापन (आश्चर्य में डालना), भय, क्रोध, हर्ष, प्रिय (बात) और उद्वेग (घबराहट): (ये) हिक्का को हटाने वाले माने गए हैं।
।॥ १३८ ॥
हिक्का और श्वास के विकारों (रोगों) का जो निदान (कारण) बताया गया है, आरोग्य (स्वास्थ्य) चाहने वाले हिक्का और श्वास के रोगियों को उसे त्याग देना चाहिए।
। ॥ १३९ ॥
जिनके साथ हिक्का और श्वास लगे रहते हैं, जिनकी छाती, कण्ठ और तालु सूखे हों, और जो प्रकृति से रूखे शरीर वाले हों, उनकी चिकित्सा (वैद्य) सर्पिष् (घृत के योगों) से करे।
।॥ १४० ॥
(वैद्य) दशमूल के रस (क्वाथ) में और दधिमण्ड (दही के ऊपर के पतले भाग) में घृत को सिद्ध करे (पकाए), कृष्णा, सौवर्चल (लवण), क्षार, वयःस्था, हिङ्गु (हींग), चोरक
। ॥ १४१ ॥
और कायस्था के साथ; वह (घृत) पीने पर हिक्का और श्वास को नष्ट करे। तेजोवती, अभया (हरीतकी), कुष्ठ, पिप्पली, कटुरोहिणी (कुटकी),
। ॥ १४२ ॥
भूतीक, पौष्कर मूल (पुष्करमूल), पलाश (ढाक), चित्रक, शटी, सौवर्चल (लवण), तामलकी, सैन्धव (सेंधा नमक), बिल्वपेशिका (बेल के गूदे के टुकड़े),
। ॥ १४३ ॥
तालीसपत्र, जीवन्ती, वचा (बच): उन (सब द्रव्यों) से, जो (प्रत्येक) एक अक्ष के माप के हों और जिनमें हिङ्गु (हींग) चौथाई (भाग) हो, एक प्रस्थ घृत को चार गुने जल में पकाए।
। ॥ ।
इसे (अपने) बल के अनुसार पीकर मनुष्य हिक्का और श्वास को जीत ले, और शोथ (सूजन), अनिल (वात के रोग), अर्श, ग्रहणी (रोग) तथा हृदय और पार्श्व की पीड़ा को भी। इस प्रकार तेजोवत्यादि घृत (पूरा हुआ)।
। ॥ १४५ ॥
मनःशिला, सर्जरस, लाक्षा (लाख), रजनी (हल्दी), पद्मक, मञ्जिष्ठा और एला (इलायची) से, (प्रत्येक) एक कर्ष भाग लेकर, सिद्ध किया हुआ घृत का एक प्रस्थ हितकर है।
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अथवा (वैद्य) जीवनीय (गण के द्रव्यों) के साथ सिद्ध किया हुआ घृत क्षौद्र (मधु) मिलाकर चटाए; या (रोगी) त्र्यूषण (घृत) अथवा दाधिक (घृत) भी, और उसी प्रकार वासाघृत पिए। इस प्रकार मनःशिलादि घृत (पूरा हुआ)।
। ॥ १४७ ॥
जो कुछ भी औषध, पान (पेय) या अन्न (भोजन) कफ और वात को नष्ट करने वाला, उष्ण (गर्म) और वात का अनुलोमन करने वाला हो, वह श्वास और हिक्का के रोगी के लिए हितकर है।
। ॥ १४८ ॥
(जो उपचार) या तो वात बढ़ाने वाला और कफ हरने वाला हो, या कफ बढ़ाने वाला और अनिल (वात) हरने वाला हो, (उसे) ऐकान्तिक रूप से (बिना अपवाद के नियम मानकर) नहीं करना चाहिए; उन दोनों में से प्रायः अनिल (वात) हरने वाला (उपचार) श्रेष्ठ है।
। ॥ १४९ ॥
क्योंकि सभी (रोगियों) के बृंहण (पुष्ट करने वाले उपचार) में अपाय (हानि) प्रायः थोड़ा और सँभाला जा सकने वाला होता है; शमन (दोषों को शान्त करने वाले उपचार) में अपाय बहुत अधिक नहीं होता; और कर्शन (शरीर को घटाने वाले उपचार) में (वह) भारी और न सँभाला जा सकने वाला होता है।
। ॥ १५० ॥
इसलिए हिक्का और श्वास से पीड़ित प्राणियों की, (चाहे वे) शुद्ध (जिनका शोधन हो चुका है) हों या अशुद्ध, (वैद्य) प्रायः शमन और बृंहण (उपचारों) से चिकित्सा करे।
- । ॥ १५१ ॥
इस विषय में (संग्रह का) श्लोक (है): हिक्काओं और श्वासों के दुर्जय (कठिनाई से जीते जाने वाले) होने का, (उनकी) उत्पत्ति का और (दोनों की) चिकित्सा एक होने का कारण, (उनके) लिङ्ग (लक्षण) और पथ्य (हितकर उपचार): (ये सब) यहाँ दिखाए गए हैं।
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इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित), और अप्राप्त (न मिलने) पर दृढबल द्वारा पूरे किए गए तन्त्र (ग्रन्थ) के चिकित्सास्थान में हिक्काश्वासचिकित्सित (हिक्का और श्वास की चिकित्सा) नामक सत्रहवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।