॥ १ ॥
अब इसके बाद हम वातशोणितचिकित्सित (वातरक्त की चिकित्सा नामक अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
अध्याय २९
वातरक्त की चिकित्सा
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यह चरक संहिता के चिकित्सास्थान का उनतीसवाँ अध्याय है, जिसका नाम वातशोणितचिकित्सित है, यानी वातरक्त की चिकित्सा। नाम अपने विषय से ही बना है: वात (शरीर में गति और संचार करने वाला दोष) और शोणित (रक्त) जब मिलकर बिगड़ते हैं, तो उससे होने वाला रोग वातशोणित, या वातरक्त, कहलाता है। अध्याय के आरम्भ में अग्निवेश अग्निहोत्र कर चुके और ऋषियों के बीच बैठे अपने गुरु पुनर्वसु से इस विषय में पूछते हैं, और उत्तर भगवान् आत्रेय के कथन के रूप में आता है। गुरु इस रोग के हेतु (कारण), लक्षण और चिकित्सा, तीनों बताते हैं।
अध्याय पहले कारणों की सूची देता है: खान-पान की बातें, दिनचर्या की बातें, चोट और रक्त की अशुद्धि। फिर बताया जाता है कि बढ़ा हुआ वात अपने मार्ग में बढ़े हुए रक्त से रुक जाता है और रोग इसी से बनता है; वह हाथ-पैर से आरम्भ होकर जोड़ों में ठहरता और पीड़ा करता है। इसके बाद पूर्वरूप, यानी रोग के प्रकट होने से पहले के चिह्न, और रोग के दो प्रकार आते हैं: उत्तान, जो त्वचा और मांस तक रहता है, और गम्भीर, जो भीतर की धातुओं में बैठा होता है। आगे वात, रक्त, पित्त और कफ में से जो दोष बढ़ा हो, उसके अनुसार अलग-अलग लक्षण गिनाए गए हैं, और यह भी कि कौन-सा रोग साध्य है, कौन याप्य और कौन असाध्य, तथा किन उपद्रवों (साथ आने वाले कष्टों) के रहते रोग को छोड़ देने योग्य कहा गया है।
चिकित्सा का भाग पहले संक्षेप में आता है और ग्रन्थ स्वयं कहता है कि यही सब फिर विस्तार से कहा जाएगा। इसमें रक्त निकालना, विरेचन, स्नेहन, बस्ति, लेप, सेक और उपनाह जैसे उपाय आते हैं, और यह भी कि रक्त निकालते समय मात्रा का ध्यान रखना चाहिए। फिर घी और तैल के अनेक योग, दाह (जलन) को शान्त करने के बाहरी उपाय, वात, कफ या पित्त और रक्त की प्रधानता के अनुसार लेप और परिषेक, और परहेज़ की बातें गिनाई गई हैं। अध्याय के अन्त में एक सार-श्लोक आता है, जो गिनाता है कि इसमें क्या-क्या कहा गया।
इस अध्याय से जो बात साथ ले जानी चाहिए वह यह है कि वातरक्त में उपचार एक-सा नहीं रहता। वह रोग के स्थान (ऊपरी या गहरा), बढ़े हुए दोष और उसके बल के अनुसार बदलता है; जो उपाय एक अवस्था में हितकर कहा गया है, वही दूसरी अवस्था में हानि कर सकता है। इसी कारण ग्रन्थ वैद्य से कहता है कि वह रोग के स्थान-भेद और दोषों के बल को जानकर, तर्क और निराकरण के विकल्पों को समझकर चिकित्सा करे। इस अध्याय में आए नुस्खे और विधियाँ ग्रन्थ के कथन हैं; वे किसी के लिए चिकित्सकीय सलाह नहीं हैं।
तत्र श्लोकाः-हेतुः स्थानानि मूलं च यस्मात् प्रायेण सन्धिषु।कुप्यति प्राक् च यद्रूपं द्विविधस्य च लक्षणम्॥
श्लोक १६३ →वहाँ (इस विषय में) श्लोक ये हैं: हेतु (कारण), स्थान, मूल, तथा जिस कारण से (वातरक्त) प्रायः सन्धियों में कुपित होता है; कुपित होने से पहले जो रूप (पूर्वरूप) होता है; और दो प्रकार के (वातरक्त) का लक्षण
पृथग्भिन्नस्य लिङ्गं च दोषाधिक्यमुपद्रवाः।साध्यं याप्यमसाध्यं च क्रिया साध्यस्य चाखिला॥
श्लोक १६४ →अलग-अलग भेद वाले (वातरक्त) का लिङ्ग (लक्षण), दोषों की अधिकता, उपद्रव, साध्य, याप्य और असाध्य (अवस्था), और साध्य की सम्पूर्ण चिकित्सा
वातरक्तस्य निर्दिष्टा समासव्यासतस्तथा।महर्षिणाऽग्निवेशाय तथैवावस्थिकी क्रिया॥
श्लोक १६५ →वातरक्त की यह (सब बात) महर्षि (आत्रेय) ने अग्निवेश के लिए संक्षेप और विस्तार दोनों से बताई है, तथा अवस्था के अनुसार की जाने वाली चिकित्सा भी बताई है।
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।
चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।
अर्थ: कारण।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।
अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।
चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।
सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।
अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।
चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।
चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।
सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।
शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।
अर्थ: रोग दूर करने का साधन।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।
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॥ १ ॥
अब इसके बाद हम वातशोणितचिकित्सित (वातरक्त की चिकित्सा नामक अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
भगवान् आत्रेय ने ऐसा कहा।
। ॥ ३ ॥
अग्निहोत्र कर चुके, ऋषियों के बीच बैठे हुए, एकाग्र और अग्नि के समान तेजस्वी गुरु पुनर्वसु से अग्निवेश ने पूछा।
। ॥ ४ ॥
तब गुरु ने इस (अग्निवेश) को अग्नि और वायु के समान (तेज) वात और रक्त के संयोग के हेतु, लक्षण और चिकित्सा बताए।
।॥ ५ ॥
नमकीन, खट्टे, कटु (तीखे), क्षारीय, चिकने, गरम और अजीर्ण (न पचे) भोजनों से; क्लिन्न (गीले) और शुष्क (सूखे) जलचर तथा दलदली प्रदेश (आनूप) के प्राणियों के मांस, पिण्याक (तेल निकालने के बाद की खली) और मूली से,
।॥ ६ ॥
कुलत्थ, माष (उड़द), निष्पाव, शाक आदि, पलल (पिसे हुए तिल) और इक्षु (ईख) से; दही, आरनाल (काँजी), सौवीर, शुक्त (सिरका जैसा खट्टा किण्वित द्रव), तक्र (छाछ), सुरा और आसव से,
। ॥ ७ ॥
विरुद्ध (आपस में प्रतिकूल) भोजन, अध्यशन (पहले का खाया पचने से पहले फिर खाना), क्रोध, दिन में सोने और रात में जागने से; प्रायः सुकुमार (कोमल प्रकृति के) और मीठा अन्न सुख से खाने वाले लोगों में
। ॥ ८ ॥
अवङ्क्रमण-स्वभाव वाले (आदत का अर्थ अस्पष्ट) लोगों का वातशोणित कुपित होता है। चोट लगने से और अशुद्धि के कारण मनुष्यों का रक्त अत्यन्त दूषित हो जाने पर,
।॥ ९ ॥
कषाय, कटु और तिक्त (रस वाले), अल्प और रूक्ष आहार से, भोजन न करने से, घोड़े और ऊँट की सवारी तथा (अन्य) यानों की सवारी, जल-क्रीड़ा, तैरने और लाँघने-कूदने से,
। ॥ १० ॥
गर्मी में, अत्यधिक यात्रा और (चेष्टाओं की) विषमता से, मैथुन से और वेगों को रोकने से, बढ़ा हुआ वायु मार्ग में बढ़े हुए रक्त से रुक जाने पर
। ॥ ११ ॥
सम्पूर्ण रक्त को दूषित कर दे, उसे वातशोणित जानना चाहिए। नामों से (उसे) खुड, वातबलास और आढ्यवात (भी जानना चाहिए)।
। ॥ १२ ॥
इसके स्थान हाथ, पैर, अंगुलियाँ और सभी जोड़ हैं। पहले हाथ और पैर को मूल (आधार) बनाकर यह शरीर में फैलता है।
। ॥ १३ ॥
(वायु की) सूक्ष्मता और सर्वत्र चलने के स्वभाव से तथा रक्त की भी, और उस (रक्त) की द्रवता और गतिशीलता से, सिराओं के मार्गों से शरीर में जाता हुआ,
। ॥ १४ ॥
(वह) पर्वों (जोड़ों) में टकराकर क्षुब्ध होकर, (मार्ग की) टेढ़ाई के कारण वहीं ठहर जाता है। ठहरा हुआ और पित्त आदि (दोषों) से मिला हुआ वह उन-उन वेदनाओं को उत्पन्न करता है।
। ॥ १५ ॥
(वह) उन्हीं (जोड़ों में) दुःख उत्पन्न करता है; इसलिए प्रायः जोड़ों में मनुष्यों को वे-वे वेदनाएँ अत्यन्त असह्य होती हैं।
। ॥ १६ ॥
पसीना अत्यधिक (आना) या बिलकुल न (आना), कालापन, स्पर्श का ज्ञान न होना, घाव में अत्यन्त पीड़ा, जोड़ों का ढीलापन, आलस्य, सदन (अवसाद), फुंसियों का निकलना,
। ॥ १७ ॥
जानु (घुटने), जङ्घा (पिंडली), ऊरु (जाँघ), कटि (कमर), अंस (कंधे), हाथ, पैर और अङ्गों के जोड़ों में निस्तोद (चुभने जैसी पीड़ा), स्फुरण (फड़कन), भेद (फटने या टूटने जैसी पीड़ा), गुरुत्व (भारीपन) और सुप्ति (सुन्नपन),
। ॥ १८ ॥
जोड़ों में खुजली और पीड़ा बार-बार होकर मिट जाती है; रंग का बिगड़ना और मण्डल (गोल चकत्तों) का उठना - ये वातरक्त के पूर्वलक्षण (पहले दिखने वाले चिह्न) हैं।
। ॥ १९ ॥
उस (वातरक्त) को दो प्रकार का कहा जाता है: उत्तान और गम्भीर। उत्तान त्वचा और मांस के आश्रित है, और गम्भीर भीतर के (धातुओं के) आश्रित।
। ॥ २० ॥
बाहरी (उत्तान) में त्वचा खुजली, दाह, पीड़ा, खिंचाव, चुभन, फड़कन और सिकुड़न से युक्त होती है, तथा श्याव-रक्त (गहरी भूरी-लाल) या ताम्र (तांबे जैसे) रंग की मानी जाती है।
। ॥ २१ ॥
गम्भीर (प्रकार) में सूजन जकड़ी हुई, कठोर और भीतर तीव्र पीड़ा वाली होती है; वह श्याव (गहरी भूरी) या ताम्र रंग की होती है, अथवा दाह, चुभन, फड़कन और पकने से युक्त होती है।
। ॥ २२ ॥
पीड़ा और दाह से युक्त वायु बार-बार जोड़ों, हड्डियों और मज्जा में, मानो काटता हुआ और भीतर से टेढ़ा करता हुआ, वेग से चलता है।
। ॥ २३ ॥
(वात) शरीर में सब ओर चलता हुआ (मनुष्य को) लंगड़ा या पंगु कर देता है। सभी लक्षणों से वातरक्त को उभयाश्रय (दोनों के आश्रित) जानना चाहिए।
। ॥ २४ ॥
उस (वातरक्त) में वात अधिक हो, या रक्त, पित्त अथवा कफ अधिक हो, या (दो दोष) मिले हुए हों, या सभी (तीनों) हों, तब जो लक्षण होता है, उसे सुनो।
। ॥ २५ ॥
विशेषतः सिराओं में खिंचाव, शूल, फड़कन और चुभन; शोथ का काला पड़ना और रूखापन, तथा श्यावता (साँवलापन) और (सूजन का) बढ़ना-घटना होता है
। ॥ २६ ॥
धमनियों, अंगुलियों और जोड़ों का सिकुड़ना, अंगों का जकड़ना, अत्यन्त पीड़ा, कुञ्चन (सिकुड़न) और स्तम्भन (अकड़न), और शीत से अरुचि - ये वात के अधिक होने पर (होते हैं)।
। ॥ २७ ॥
रक्त (के अधिक होने) में सूजन, अत्यन्त पीड़ा वाली, चुभन से युक्त, ताम्र रंग की और चिमचिमाहट करती हुई होती है; वह स्निग्ध और रूक्ष (उपायों) से शान्त नहीं होती, और खुजली तथा क्लेद (गीलापन) से युक्त होती है।
। ॥ २८ ॥
विदाह (जलन), वेदना, मूर्च्छा, पसीना, प्यास, मद, भ्रम, राग (लालिमा), पाक (पकना), भेद (फटना) और शोष (सूखना) - ये पित्त वाले (वातरक्त) में कहे गए हैं।
।॥ २९ ॥
कफ में स्तैमित्य (जड़ता), भारीपन, चिकनाहट, सुन्नपन और मन्द पीड़ा होती है। हेतु (कारण) और लक्षणों के मेल से द्वन्द्वज (दो दोषों से) और त्रिदोषज (तीनों दोषों से उत्पन्न) को पहचानना चाहिए।
, । ॥ ३० ॥
एक दोष का अनुसरण करने वाला (वातरक्त), यदि नया हो, साध्य है; दो दोषों से उत्पन्न याप्य है; तीनों दोषों से उत्पन्न असाध्य है, और जिसके उपद्रव हों वह भी असाध्य है।
।॥ ३१ ॥
अनिद्रा, अरुचि, श्वास (साँस की कठिनाई), मांस का सड़ना, सिर का जकड़ना, मूर्च्छा, खिंचाव, मद, पीड़ा, प्यास, ज्वर, मोह और कम्पन
। ॥ ३२ ॥
हिचकी, पंगुता, वीसर्प, पाक, तोद (चुभन), भ्रम, क्लम (थकावट), अंगुलियों का टेढ़ापन, फफोले, दाह, मर्मों में जकड़न और अर्बुद (गाँठ)
। ॥ ३३ ॥
जो वातरक्त इन उपद्रवों से युक्त हो, या अकेले मोह (बेहोशी) से ही युक्त हो, और जो रिसने वाला, विवर्ण (रंग बिगड़ा हुआ), जकड़ा हुआ और अर्बुद (गाँठ) बनाने वाला हो, वह त्याग देने योग्य है।
। ॥ ३४ ॥
जो संकोच (अंगों का सिकुड़ना) करने वाला और इन्द्रियों को कष्ट देने वाला हो, उसे भी छोड़ देना चाहिए। जिसमें सभी उपद्रव पूरे न हों, वह याप्य है, और उपद्रव से रहित साध्य होता है।
। ॥ ३५ ॥
वायु शाखाओं (हाथ-पैरों) के जोड़ों में बैठकर रक्त के मार्ग को शीघ्र ही रोक देता है, और एक-दूसरे को ढककर वेदनाओं से प्राणों को हर लेता है।
। ॥ ३६ ॥
वहाँ दोष और बल के अनुसार रक्त को सींग, जोंक, सूई और तुम्बी (लौकी) के द्वारा, अथवा प्रच्छन (चीरे) से, अथवा सिराओं से निकालना चाहिए।
। ॥ ३७ ॥
रुजा (पीड़ा), दाह, शूल और तोद से पीड़ित होने पर रक्त को जोंक से निकालना चाहिए। सुन्नता, खुजली और चिमचिमाहट होने पर सींग और तुम्बी से निकालना चाहिए।
। ॥ ३८ ॥
जो एक स्थान से दूसरे स्थान को जा रहा हो, उसमें सिराओं से या प्रच्छन से रक्त निकालना चाहिए। परन्तु अंगों में ग्लानि (थकावट) हो, और जो रूखा तथा वात-प्रधान हो, उसमें रक्त नहीं निकालना चाहिए।
। ॥ ३९ ॥
रक्त के क्षय होने से वायु गहरी सूजन, जकड़न, कम्पन, स्नायु और सिराओं के रोग, तथा संकोच सहित ग्लानि भी उत्पन्न कर देता है।
। ॥ ४० ॥
अधिक रक्त निकालने से वायु खाञ्ज्य (लँगड़ापन) आदि वात रोग और मृत्यु भी कर सकता है। इसलिए स्निग्ध (स्नेहन किए हुए) व्यक्ति से उचित मात्रा में रक्त निकालना चाहिए।
। ॥ ४१ ॥
रोगी को पहले स्नेहन कराके, स्नेह से युक्त विरेचनों से, अथवा रूखे या मृदु विरेचनों से विरेचन देना चाहिए; और बार-बार बस्तिकर्म भी प्रशस्त है।
। ॥ ४२ ॥
सेक, अभ्यङ्ग, प्रदेह, अन्न और स्नेह, जो प्रायः दाह उत्पन्न न करने वाले हों, वातरक्त में प्रशस्त माने जाते हैं। अब विशेष बात मुझसे सुनो।
।॥ ४३ ॥
बाह्य (ऊपरी) वातरक्त का आलेपन, अभ्यङ्ग, परिषेक और उपनाह से, तथा गम्भीर (गहरे स्थित) का विरेचन, आस्थापन और स्नेहपान से उपचार करना चाहिए।
। ॥ ४४ ॥
घी, तेल, वसा और मज्जा के पान, अभ्यञ्जन और बस्तियों से, तथा सुखोष्ण (सहने योग्य गरम) उपनाहों से वात-प्रधान (वातरक्त) का उपचार करे।
। ॥ ४५ ॥
विरेचनों से, घी और दूध के पान से, सेकों से, बस्तियों सहित, तथा शीतल और निर्वापण (शान्त करने वाले) उपायों से रक्त और पित्त की प्रधानता वाले (वातरक्त) को जीतना चाहिए।
। ॥ ४६ ॥
कफ की प्रधानता वाले वातरक्त में मृदु वमन (जो अधिक तीव्र न हो), स्नेह और सेक, विलङ्घन (लंघन), तथा कुछ गरम लेप प्रशस्त हैं।
। ॥ ४७ ॥
कफ और वात की प्रधानता वाले वातशोणित में यदि शीतल (उपायों) से लेप कर दिया जाए, तो स्तम्भन (रोकने) के कारण दाह, शोथ, पीड़ा और खुजली बढ़ सकती है।
। ॥ ४८ ॥
रक्त और पित्त की प्रधानता वाले (वातरक्त) में गर्म (उपचारों) से जलन, क्लेद (गीलापन, रिसाव) और फटना हो जाता है। इसलिए वैद्य दोषों का बल जानकर चिकित्सा करे।
। ॥ ४९ ॥
दिन में सोना, ताप (धूप या आग की गर्मी) का सेवन, व्यायाम, मैथुन, तथा कटु (तीखा), गर्म, भारी, अभिष्यन्दी (स्रोतों को बन्द करने वाला) और नमकीन-खट्टा भोजन छोड़ दे।
। ॥ ५० ॥
पुराने जौ, गेहूँ, नीवार (जंगली चावल), शालि और साठी चावल भोजन के लिए, अथवा विष्किर और प्रतुद (वर्ग के पक्षी) रस (मांसरस) के लिए, हितकर हैं।
। ॥ ५१ ॥
अरहर (आढकी), चना, मूँग, मसूर और मकुष्ठक सहित (समकुष्ठक) - ये बहुत घी वाले, यूष (दाल के शोरबे) के लिए, वातशोणित में उत्तम कहे गए हैं।
। ॥ ५२ ॥
सुनिषण्णक, वेत्र का अग्र भाग (कोंपल), काकमाची (मकोय) और शतावरी, तथा वास्तुक (बथुआ) और उपोदिका (पोई) का शाक, और सौवर्चल शाक
।, ॥ ५३ ॥
(इन शाकों को) घी और मांसरस में भूनकर, शाक को सात्म्य (अनुकूल) बनाने के लिए दे। व्यञ्जन के लिए, तथा गाय, भैंस और बकरी का दूध हितकर है।
। ॥ ५४ ॥
इस प्रकार वातरक्त की चिकित्सा संक्षेप में कह दी गई। यही सब फिर विस्तार से कहा जाएगा।
। ॥ ५५ ॥
श्रावणी, क्षीरकाकोली, जीवक और ऋषभक - इनके समान मात्रा (के कल्कों) से तथा मधुक (मुलेठी) सहित सिद्ध किया हुआ, दूध मिला घी वातरक्त को नष्ट करने वाला है।
। ॥ ५६ ॥
बला, अतिबला, मेदा, आत्मगुप्ता (केवाँच), शतावरी, काकोली, क्षीरकाकोली, रास्ना और ऋद्धि को पीसे।
।॥ ५७ ॥
इनसे सिद्ध किया हुआ, चार गुना दूध वाला घी वातरक्त को नष्ट करने वाला है, तथा हृदय रोग, पाण्डुरोग, वीसर्प, कामला और ज्वर को भी नष्ट करता है।
। ॥ ५८ ॥
त्रायन्तिका, तामलकी, दोनों काकोली (काकोली और क्षीरकाकोली) और शतावरी - इन कल्कों के साथ और कशेरुका के कषाय (काढ़े) से घी पकाए
। ॥ ५९ ॥
परूषक, द्राक्षा, काश्मर्य (गम्भारी) और ईख के रस समान मात्रा में, तथा विदारी का स्वरस अलग से, और चार गुना दूध डालकर।
। ॥ ।
यह प्रयोग में आने वाला घी 'पारूषक' नाम से जाना गया है। (यह) वातरक्त, क्षत, क्षीण (दुर्बल) अवस्था, वीसर्प और पित्तज ज्वर में (प्रयुक्त होता है)। यह पारूषक घृत हुआ।
। ॥ ६१ ॥
दोनों पञ्चमूल, वर्षाभू, एरण्ड (अरण्ड), पुनर्नवा सहित, मुद्गपर्णी, महामेदा, माषपर्णी और शतावरी
। ॥ ६२ ॥
शङ्खपुष्पी, अवाक्पुष्पी, रास्ना, अतिबला और बला - प्रत्येक को दो-दो पल लेकर एक द्रोण जल में पकाए।
। ॥ ६३ ॥
(काढ़े के) चौथाई भाग शेष रहने पर, दूध, आँवला, ईख और बकरे (के मांस) के रसों को बराबर मात्रा में लेकर, एक आढक घी के साथ मिलाकर, धीरे-धीरे मन्द आँच पर पकाए
। ॥ ६४ ॥
(फिर) कल्क (पिसी हुई लुगदी) के रूप में दो मेदा, काश्मर्य (गम्भारी) का फल, उत्पल, त्वक्क्षीरी, पिप्पली, द्राक्षा, पद्मबीज और पुनर्नवा डालकर
। ॥ ६५ ॥
नागर (सोंठ), क्षीरकाकोली, पद्मक, दोनों बृहती, वीरा, शृङ्गाटक (सिंघाड़ा), भव्य, उरुमाण और निकोचक
। ॥ ६६ ॥
खजूर, अक्षोट (अखरोट), वाताम (बादाम), मुञ्जात और अभिषुक (भी डालकर); इनसे एक आढक घी सिद्ध हो जाने पर, ठण्डा होने पर शहद मिलवाए।
। ॥ ६७ ॥
भली-भाँति सिद्ध हुआ जानकर, उसे भली-भाँति सुरक्षित, रक्षा-विधि किया हुआ (और) शुद्ध (पात्र) में रखे; (फिर) एक अक्ष (कर्ष) के माप में पिलाए।
। ॥ ६८ ॥
(यह घृत) पाण्डुरोग, ज्वर, हिक्का, स्वरभेद, भगन्दर, पार्श्वशूल, क्षय, कास, प्लीहा (के रोग) और वातशोणित को
। ॥ ६९ ॥
क्षतशोष, अपस्मार, अश्मरी और शर्करा, तथा सर्वाङ्ग और एकाङ्ग के रोगों और मूत्रसङ्ग को नष्ट करता है।
। ॥ ७० ॥
(यह) घृत बल और वर्ण को बढ़ाने वाला, धन्य, झुर्रियों और बाल पकने (सफेद बाल) का नाश करने वाला, जीवनीय, वृष्य और बाँझ (स्त्री) को पुत्र देने वाला है।
। ॥ ७१ ॥
अथवा द्राक्षा और मधुक (पाठान्तर: मधूक) के जल से मिश्री सहित सिद्ध किया हुआ घृत पिए, तथा गिलोय (गुडूची) के स्वरस में पकाया हुआ दूध भी।
। ॥ ७२ ॥
जीवक और ऋषभक, मेदा, ऋष्यप्रोक्ता, शतावरी, मधुक, मधुपर्णी और दोनों काकोली
। ॥ ७३ ॥
मुद्गपर्णी और माषपर्णी (मुद्ग और माष नामक दोनों पर्णियाँ), दशमूल, पुनर्नवा, बला, अमृता (गुडूची), विदारी, अश्वगन्धा के साथ अश्मभेदक
। ॥ ७४ ॥
इनके कषाय (काढ़े) और कल्क से घी और तेल सिद्ध करे, और जैसा मिल सके, धन्व, प्रतुद और विष्किर (वर्गों के प्राणियों) की वसा और मज्जा भी (डाले)।
। ॥ ७५ ॥
चार गुने दूध के साथ सिद्ध किया हुआ वह (घृत-तैल) पूरे शरीर में स्थित वातशोणित को और वात से उत्पन्न भयंकर रोगों को नष्ट करता है।
। ॥ ७६ ॥
स्थिरा, श्वदंष्ट्रा, बृहती, सारिवा, शतावरी के साथ, काश्मर्य के फल, आत्मगुप्ता, वृश्चीर और दोनों बला
।॥ ७७ ॥
इनके क्वाथ में चार गुना दूध, अलग से तेल (और) अलग से घी, तथा मेदा, शतावरी, यष्टी, जीवन्ती, जीवक और ऋषभक (के कल्कों) के साथ (पकाए)
। ॥ ७८ ॥
(औषध को) पकाकर, फिर उचित मात्रा में, तिगुने दूध और डेढ़ गुनी शर्करा के साथ, खज (मथानी) से मथकर, त्रिदोष से उत्पन्न वातरक्त में पीना चाहिए।
। ॥ ७९ ॥
तेल, दूध और शर्करा को भली-भाँति मिलाकर पिलाए; अथवा घी, तेल, मिश्री और शहद से मिला हुआ दूध पिए।
। ॥ ८० ॥
अंशुमती के साथ पकाया हुआ एक प्रस्थ दूध, जिसमें दो (भाग) मिश्री मिली हो, पीने के लिए उत्तम कहा गया है; उसी प्रकार पिप्पली और नागर (सोंठ) के साथ पकाया हुआ (दूध भी)।
। ॥ ८१ ॥
बला, शतावरी, रास्ना, दशमूल, पीलु, श्यामा, एरण्ड और स्थिरा के साथ पकाया हुआ दूध वात की पीड़ा को नष्ट करने वाला है।
। ॥ ८२ ॥
धारोष्ण (दुहने के तुरन्त बाद का गर्म) दूध, अथवा मूत्र मिला हुआ, दोषों को अनुकूल दिशा में निकालने वाला दूध; या त्रिवृत् के चूर्ण सहित (दूध) वह पीए, जिसका वात पित्त और रक्त से ढका हुआ हो।
। ॥ ८३ ॥
बहुत दोष वाला मनुष्य विरेचन के लिए दूध के साथ अथवा विधिपूर्वक एरण्ड का तेल पीए; (औषध के) पच जाने पर दूध-भात खाए।
। ॥ ८४ ॥
मनुष्य अभया (हरीतकी) का घी में भुना हुआ कषाय (काढ़ा) पीए, दूध के अनुपान के साथ; अथवा त्रिवृता का चूर्ण द्राक्षा के रस के साथ (पीए)।
। ॥ ८५ ॥
काश्मर्य, त्रिवृता, द्राक्षा, त्रिफला और परूषक सहित पकाया हुआ (क्वाथ), नमक और शहद मिलाकर, विरेचन के लिए पीए।
। ॥ ८६ ॥
त्रिफला का कषाय (काढ़ा) शहद मिलाकर पीए; अथवा जिसमें कफ अधिक हो, वह धात्री, हरिद्रा और मुस्ता का कषाय पीए।
। ॥ ८७ ॥
और कल्प में बताए गए, मृदु तथा स्नेह (घी-तेल) मिले हुए योगों से उसे बार-बार विरेचन कराए, वात को मल से ढका हुआ जानकर।
। ॥ ८८ ॥
अथवा उसके मल को घी सहित क्षीरबस्तियों से निकाले; क्योंकि वातरक्त की चिकित्सा में बस्ति के समान कुछ भी नहीं है।
। ॥ ८९ ॥
बस्ति (निचले पेट), वंक्षण (जाँघ के जोड़), पार्श्व (पसली-क्षेत्र), ऊरु (जाँघ), पर्व (जोड़), अस्थि (हड्डी) और जठर (पेट) की पीड़ाओं में तथा उदावर्त में अनुवासन सहित निरूह बस्तियाँ प्रशस्त हैं।
। ॥ ९० ॥
बुद्धिमान (वैद्य) बस्ति-कर्म में, तथा नस्य, अभ्यञ्जन और सेक में, दाह और शूल की शान्ति के लिए इन तेलों को दे।
। ॥ ९१ ॥
मधुयष्टि के एक तुला (माप) के कषाय को चौथाई शेष रहने तक पकाने पर, उसमें बराबर दूध मिलाकर एक आढक तेल को, एक-एक पल के कल्कों के साथ पकाए
।॥ ९२ ॥
शतपुष्पा, वरी, मूर्वा, पयस्या, अगुरु और चन्दन; तथा स्थिरा, हंसपदी, मांसी, दो मेदा और मधुपर्णी (के कल्कों के साथ)
।॥ ९३ ॥
काकोली, क्षीरकाकोली, तामलकी, ऋद्धि और पद्मक, तथा जीवक, ऋषभक, जीवन्ती, त्वक्, पत्र, नख और वालक (इन औषधियों के कल्क) से
। ॥ ९४ ॥
प्रपौण्डरीक, मञ्जिष्ठा, सारिवा, ऐन्द्री और वितुन्नक (के कल्क) से, चार प्रकार के प्रयोग द्वारा वह तैल मारुतशोणित (वातरक्त) को नष्ट करता है।
। ॥ ।
(वह तैल) उपद्रवों सहित, अंगों की पीड़ा सहित और पूरे शरीर में फैले हुए (वातरक्त) को (नष्ट करता है)। वह वातरक्त, पित्त, दाह, पीड़ा और ज्वर को नष्ट करने वाला है तथा बल और वर्ण करने वाला है। यह मधुपर्ण्यादि तैल है।
। ॥ ९६ ॥
मधुक का सौ (पल), द्राक्षा, खजूर, परूषक, मधूक और ओदनपाकी, और मुञ्जातक का एक प्रस्थ
। ॥ ९७ ॥
काश्मर्य का एक आढक - इसे चार द्रोण जल में पकाए। आठवाँ भाग शेष रहने पर और (काढ़े के) छान लिए जाने पर उसमें एक आढक तैल पकाए।
। ॥ ९८ ॥
तथा आमलक, काश्मर्य, विदारी और ईख के रसों से, (जो) समान (मात्रा में हों), चार द्रोण दूध के साथ, और एक पल माप का कल्क डालकर
। ॥ ९९ ॥
(कल्क में) कदम्ब, आमलक, आक्षोट, पद्मबीज और कशेरुक, शृङ्गाटक (सिंघाड़ा), शृङ्गवेर (अदरक), लवण, पिप्पली और सिता (मिश्री भी डालकर)
। ॥ १०० ॥
और जीवनीय (गण की औषधियों) से भली-भाँति सिद्ध (पकाए हुए उस तैल) को एक प्रस्थ शहद से मिलाए। उसका प्रयोग नस्य, अभ्यञ्जन और पान में तथा बस्ति में भी करे।
। ॥ १०१ ॥
सभी वातव्याधियों में, मन्यास्तम्भ में, हनुग्रह में, सर्वाङ्ग वात और एकाङ्ग वात में, तथा क्षत से क्षीण (हुए) में और क्षतज्वर में
। ॥ ।
यह 'सुकुमारक' (तैल) वातरक्त रोग को नष्ट करने वाला है, स्वर और वर्ण करने वाला है, तथा आरोग्य, बल और पुष्टि देने वाला तैल है। यह सुकुमारक तैल है।
। ॥ १०३ ॥
गुडूची, मधुक, ह्रस्व (लघु) पञ्चमूल, पुनर्नवा, रास्ना और एरण्ड की जड़, और जीवनीय (गण की औषधियाँ) जैसी प्राप्त हों (वैसी लें)
।॥ १०४ ॥
सौ-सौ पलों के भागों में (इन्हें लें), और बला पाँच सौ (पल), तथा कोल, बिल्व, यव, माष और कुलत्थ आढक-आढक माप में
। ॥ १०५ ॥
भली-भाँति सूखे हुए काश्मर्य (फलों) का एक द्रोण, जर्जर (मोटा कुटा) और धोया हुआ, सौ द्रोण जल में पकाए, और चार द्रोण शेष रखे।
। ॥ १०६ ॥
उस (काढ़े) के साथ एक द्रोण तैल पकाए, पाँच गुना दूध डालकर, और चन्दन, उशीर तथा केशर को तीन-तीन पल पीसकर (डालकर)
। ॥ १०७ ॥
पत्र, एला, अगुरु और कुष्ठ, तगर, मधुयष्टिका, तथा आठ पल मञ्जिष्ठा (डालकर)। वह सिद्ध (पका हुआ तैल) सार्वयोगिक (सब प्रयोगों में काम आने वाला) है।
। ॥ १०८ ॥
वातरक्त में, क्षत (चोट या घाव) से क्षीण हुए, भार (बोझ) से पीड़ित, क्षीण शुक्र वाले, तथा कम्पन, आक्षेप (ऐंठन) और भग्न (टूटे अंग) से पीड़ित, सर्वाङ्ग अथवा एकाङ्ग रोग वाले रोगियों के
। ॥ ।
यह श्रेष्ठ तैल, जिसका नाम अमृत है, योनिदोष, अपस्मार, उन्माद, खञ्जता और पङ्गुता को नष्ट करे, और प्रसवकारक (प्रसव कराने वाला) भी है। यह अमृताद्य तैल है।
।॥ ११० ॥
पद्म, वेतस, यष्ट्याह्व (मुलेठी), फेनिला, पद्मक और उत्पल, तथा दर्भ, बला, चन्दन और किंशुक, इन द्रव्यों में से प्रत्येक पाँच-पाँच पल लेकर
।॥ १११ ॥
जल में पकाए (उबाले) हुए इन द्रव्यों के साथ, तथा लोध्र, कालीयक, उशीर, जीवक, ऋषभक और केशर के साथ, सौवीर के बराबर, एक प्रस्थ तैल पकाए
।॥ ११२ ॥
मदयन्ती लता के पत्ते, पद्मकेशर, पद्मक, प्रपौण्डरीक, काश्मर्य, मांसी, मेदा और प्रियङ्गु के साथ
। ॥ ।
कुङ्कुम का आधा पल और मञ्जिष्ठा का एक पल (मिलाने से बना) यह महापद्म (तैल) वातरक्त और ज्वर को नष्ट करने वाला है। यह महापद्म तैल है।
। ॥ ११४ ॥
(तैल) पद्म, उशीर, यष्ट्याह्व (मुलेठी) और रजनी के क्वाथ में सिद्ध किया हुआ, तथा पीसे हुए सर्ज, मञ्जिष्ठा, वीरा, काकोली और चन्दन से (युक्त) होना चाहिए।
। । ॥ ११५ ॥
यह खुड्डूकपद्मक तैल वातरक्त के दाह को नष्ट करने वाला है। यह खुड्डूकपद्मक तैल है। सौ (पल) यष्टिमधु से दस गुना पय (जल) साधित करना चाहिए।
। ॥ ११६ ॥
उस चार द्रोण तैल में, एक पल मधुक के साथ, अथवा मधुक और काश्मर्य के रसों से सिद्ध किया हुआ (तैल) वातरक्त को नष्ट करने वाला है।
। ॥ ११७ ॥
मधुपर्णी का एक पल पीसकर, चार गुने दूध में एक प्रस्थ तैल पकाए; (यह क्रिया) सौ बार करके, वैसे ही मधुक से सौ (बार)
।॥ ।
इस प्रकार सिद्ध किया हुआ (तैल) त्रिदोष में और वातरक्त में देना चाहिए; (वह) श्वास और कास को नष्ट करने वाला है तथा हृदय के रोग, पाण्डुरोग, वीसर्प, कामला और दाह का नाशक है। यह शतपाक मधुक तैल है।
। ॥ ११९ ॥
बला के कषाय (क्वाथ) और कल्क से, दूध के बराबर तैल पकाए; सहस्र बार अथवा सौ बार (पकाया हुआ वह तैल) वातरक्त और वात के रोगों को नष्ट करने वाला है।
। ॥ ।
यह श्रेष्ठ रसायन है, इन्द्रियों को प्रसन्न (निर्मल) करने वाला, जीवन देने वाला, बृंहण, स्वर के लिए हितकर, और शुक्र तथा रक्त के दोषों को नष्ट करने वाला है। यह सहस्रपाक अथवा शतपाक बलातैल है।
। ॥ १२१ ॥
गुडूची के रस और दूध से, अथवा द्राक्षा के रस से, अथवा मधुक और काश्मर्य के रसों से सिद्ध किया हुआ तैल वातरक्त को नष्ट करने वाला है।
। ॥ १२२ ॥
एक आढक आरनाल (काँजी) में, चौथाई भाग सर्जरस के साथ पकाया हुआ तैल, बहुत जल में मथा हुआ, ज्वर, दाह और पीड़ा को अत्यन्त नष्ट करने वाला है।
। ॥ ।
मधूच्छिष्ट (मोम) और मञ्जिष्ठा के साथ, राल (सर्जरस) और सारिवा के साथ (सिद्ध किया हुआ) पिण्डतैल है; उसकी मालिश से वह वातरक्त की पीड़ा को दूर करने वाला है। यह पिण्डतैल है।
। ॥ १२४ ॥
दशमूल के साथ पकाया हुआ दूध तुरन्त शूल (पीड़ा) को दूर करने वाला है। वात की प्रधानता होने पर परिषेक (धार बाँधकर सींचना) किया जाए; उसी प्रकार गुनगुने घी से भी।
। ॥ १२५ ॥
अथवा मधुर द्रव्यों से सिद्ध किए हुए चारों स्नेहों से (रोगी को) सींचे। जकड़न, ऐंठन (आक्षेप) और शूल से पीड़ित को गुनगुने (स्नेहों) से, परन्तु दाह में शीतल (स्नेहों) से।
। ॥ १२६ ॥
उसी प्रकार गाय, भेड़ और बकरी के तैल मिले हुए दूधों से, अथवा जीवनीय गण (के द्रव्यों) के या पञ्चमूल के क्वाथों से, वैद्य (सींचे)।
। ॥ १२७ ॥
सींचने के लिए द्राक्षा और ईख का रस, मद्य, दही, दही का पानी (मस्तु), खट्टी काञ्जी, तथा चावल, शहद और शर्करा से बना जल प्रशंसित है।
। ॥ १२८ ॥
कुमुद, उत्पल, पद्म आदि (पुष्पों) से, चन्दन सहित मणियों के हारों से, तथा शीतल जल से सम्बद्ध (शब्द का पाठ अस्पष्ट) साधनों से दाह में प्रोक्षण (छिड़कना) और स्पर्श करना हितकर है।
। ॥ १२९ ॥
चन्द्रमा की किरणों (से शीतल) जल से सींची हुई, रेशमी वस्त्र और कमल के पत्तों के बिछौने वाली शय्या पर, जो नदी-तट की रेत (पुलिन) के स्पर्श से शीतल हुई वायु से हवा की जा रही हो
। ॥ १३० ॥
चन्दन से गीले स्तनों और हाथों वाली, प्रिय, मीठा बोलने वाली, स्पर्श में शीतल और सुखद स्पर्श वाली स्त्रियाँ दाह, पीड़ा और थकान को दूर करती हैं।
।॥ १३१ ॥
लालिमा और पीड़ा वाले दाह में रक्त निकालकर (उस स्थान पर) मुलेठी, पीपल की छाल, जटामांसी, वीर, गूलर और हरी घास (शाद्वल) से लेप करे
। ॥ १३२ ॥
अथवा जलज (जल में उत्पन्न होने वाले द्रव्य) और जौ के चूर्णों से, मुलेठी, दूध और घी सहित; या घी के साथ जीवनीय (द्रव्यों) को पीसकर बनाया हुआ लेप पीड़ा और दाह को नष्ट करने वाला है।
। ॥ १३३ ॥
तिल, प्रियाल, मुलेठी, बिस (कमलनाल) और वेतस की जड़ - इन्हें बकरी के दूध के साथ पीसकर बनाया हुआ लेप दाह और लालिमा को दूर करने वाला है।
।॥ १३४ ॥
प्रपौण्डरीक, मञ्जिष्ठा, दार्वी, मुलेठी और चन्दन से, मिश्री से, अका (पाठ अस्पष्ट), सत्तू, मसूर, उशीर और पद्मक से (बना)
। , ॥ १३५ ॥
(यह) लेप पीड़ा, दाह, वीसर्प, लालिमा और शोथ को दूर करने वाला है। ये (लेप) पित्त और रक्त की प्रधानता वाले (रोग) में हैं; वात की प्रधानता वाले (रोग) में लेपों को सुनो।
। ॥ १३६ ॥
वातनाशक (द्रव्यों) से सिद्ध किया हुआ, स्निग्ध, दूध सहित मूँग का पायस; अथवा तिल और सरसों की पिण्डी (लोई) से भी बना उपनाह पीड़ा को दूर करने वाला है।
। ॥ १३७ ॥
जलचर, प्रसह और अनूप (प्राणियों के मांस) के वेशवार, जीवनीय औषधियों से भलीभाँति संस्कारित और स्नेह से युक्त, उपनाहन में प्रयुक्त होने चाहिए,
। ॥ १३८ ॥
(ये) जकड़न, चुभने वाली पीड़ा, दर्द, खिंचाव, सूजन और अंगों की जकड़न को नष्ट करने वाले हैं। अथवा जीवनीय औषधियों से सिद्ध की हुई, दूध सहित वसा भी (उपनाह के लिए)।
। ॥ १३९ ॥
घी, सहचर की जड़, जीवन्ती और बकरी का दूध - इन्हें (पीसकर) लेप (बनाए)। इसी प्रकार पीसे हुए तिल, या भूनकर दूध में बुझाए (शीतल किए) हुए तिल भी (लेप के लिए लिए जाते हैं)।
। ॥ १४० ॥
दूध में पिसी उमा का लेप और एरण्ड के फल भी, शूल (पीड़ा) दूर करने के लिए, अनल (जलन) की अधिकता होने पर, शताह्वा के साथ करे।
। ॥ १४१ ॥
जड़, अग्रभाग और पत्तों सहित एरण्ड के क्वाथ में, प्रत्येक दो-दो प्रस्थ घी, तेल, वसा और आनूप (जल-दलदल वाले) पशु-पक्षियों की मज्जा (डाले)
।॥ १४२ ॥
कल्क (लुगदी) के लिए जीवनीय औषधियाँ, गाय का दूध और बकरी का दूध, तथा हल्दी, उत्पल, कुष्ठ, इलायची, शताह्वा और अश्वहन के पत्ते
। ॥ १४३ ॥
(इन सबको) बिल्व (एक पल) के परिमाण में अलग-अलग और काकुभ (ककुभ) का फूल भी लेकर पकाए। आग से उतारने पर ठण्डा हो जाने पर आठ पल मधूच्छिष्ट (मोम) डाले।
। ॥ १४४ ॥
यह लेप शूल (पीड़ा) से पीड़ित अंगों के लिए, सन्धि में गई हुई वायु में, वातरक्त में, (अंग के) अपने स्थान से हट जाने, टूट जाने, लंगड़ेपन और कुबड़ेपन में प्रशस्त (श्रेष्ठ) बताया जाता है।
। ॥ १४५ ॥
और जब यह (वातरक्त) कफ की अधिकता वाला हो तथा शोफ (सूजन), भारीपन, खुजली आदि लक्षणों से युक्त हो, तब मूत्र, क्षार और सुरा के साथ पकाया हुआ घी अभ्यञ्जन (मालिश) में हितकर है।
। ॥ १४६ ॥
पद्मक, त्वक्, मधुक सहित और सारिवा - इनसे सिद्ध किया हुआ घी, मधुशुक्त मिलाकर, कफ की प्रधानता में सेचन और अभ्यङ्ग के लिए (उपयुक्त) हो।
। ॥ १४७ ॥
क्षार, तेल, गायों का मूत्र और जल, कटु (तीखी) औषधियों के साथ पकाए हुए को, कफ की प्रधानता वाले वातरक्त में परिषेक (ऊपर से सींचने) के लिए (विद्वान) श्रेष्ठ कहते हैं।
। ॥ १४८ ॥
सरसों, नीम, अर्क, हिंस्रा, दूध और तिल से बना लेप हितकर है; कपित्थ की छाल, घी, दूध और सत्तू के साथ सिद्ध (पकाया हुआ लेप) श्रेष्ठ है।
। ॥ १४९ ॥
गृहधूम, वचा, कुष्ठ, शताह्वा और रजनीद्वय (दो रजनी) - यह प्रलेप शूल (पीड़ा) दूर करने वाला है, वात और कफ की प्रधानता वाले वातरक्त में।
। ॥ १५० ॥
तगर, त्वक्, शताह्वा, इलायची, कुष्ठ, मुस्ता, हरेणुका, दारु और व्याघ्रनख को अम्ल (खट्टे द्रव) में पीसा हुआ (लेप) वात, कफ और रक्त (अस्र) के विकार को दूर करने वाला है।
। ॥ १५१ ॥
मधुशिग्रु का (बीज या छाल) हितकर है; उसी प्रकार धान्याम्ल से मिला हुआ बीज। एक मुहूर्त तक लेप किए हुए (अंग) को अम्ल (खट्टे द्रवों) से सींचे, जो वात-कफ की प्रधानता वाला हो।
। ॥ १५२ ॥
त्रिफला, व्योष, पत्र, इलायची, त्वक्, क्षीरी, चित्रक, वचा, विडंग, पिप्पलीमूल, रोमश और वृषक की छाल
। ॥ १५३ ॥
ऋद्धि, तामलकी और चव्य, (ये सब) बराबर भाग लेकर पीसे। प्रातःकाल (इसे) लोहे के पात्र में लेप किया हुआ रखकर, तब मध्याह्न में खाए।
। ॥ १५४ ॥
दही, खट्टी (किण्वित) वस्तुएँ, दूध और विरुद्ध आहार का त्याग करना चाहिए। वातरक्त में, सभी दोषों के रहने पर भी, शूल (तीव्र पीड़ा) से पीड़ित रोगी के लिए यह परम हितकर है।
। ॥ १५५ ॥
रोग के स्थान-भेदों को और दोषों के बल तथा निर्बलता को जानकर, ऊह (तर्क) और अपोह (निराकरण) के विकल्पों को जानने वाला वैद्य इस चिकित्सा को करे।
। ॥ १५६ ॥
मेद अथवा कफ की अत्यधिक वृद्धि से मार्ग के रुक जाने के कारण जब वात कुपित हो, तब आरम्भ में स्नेहन और बृंहण (चिकित्सा) प्रशस्त नहीं है।
। ॥ १५७ ॥
व्यायाम, शोधन, अरिष्ट, मूत्र-पान और विरेचनों से तथा तक्र (छाछ) और अभया (हरीतकी) के प्रयोगों से कफ और मेद को क्षीण करे।
। ॥ १५८ ॥
बोधिवृक्ष (पीपल) का कषाय (क्वाथ) मधु के साथ पीना चाहिए। वह भयंकर त्रिदोषज वातरक्त को भी शीघ्र जीत लेता है।
। ॥ १५९ ॥
पुराने जौ और गेहूँ (के आहार), सीधु, अरिष्ट, सुरा और आसव से; शिलाजतु के प्रयोगों से; तथा गुग्गुलु और माक्षिक के (प्रयोग) से भी।
। ॥ १६० ॥
यदि गहरे (स्थान) में रक्त (वात से) आक्रान्त हो, तो उसे वात के समान जीते। बाद में वात (शान्त) होने पर वातरक्त को प्रसन्न (निर्मल) करने वाली क्रिया करे।
। ॥ १६१ ॥
रक्त और पित्त की अत्यधिक वृद्धि से (वह शोथ) शीघ्र ही पाक (पकने) को प्राप्त होता है। फूटकर वह रक्त बहाता है, या विदग्ध (पका हुआ) रक्त, अथवा पूय (मवाद) ही बहाता है।
। ॥ १६२ ॥
उन दोनों की क्रिया भेदन, शोधन और रोपण से करनी चाहिए। उपद्रवों की क्रिया भी अपनी-अपनी चिकित्सा के अनुसार करे।
- । ॥ १६३ ॥
वहाँ (इस विषय में) श्लोक ये हैं: हेतु (कारण), स्थान, मूल, तथा जिस कारण से (वातरक्त) प्रायः सन्धियों में कुपित होता है; कुपित होने से पहले जो रूप (पूर्वरूप) होता है; और दो प्रकार के (वातरक्त) का लक्षण
। ॥ १६४ ॥
अलग-अलग भेद वाले (वातरक्त) का लिङ्ग (लक्षण), दोषों की अधिकता, उपद्रव, साध्य, याप्य और असाध्य (अवस्था), और साध्य की सम्पूर्ण चिकित्सा
। ॥ १६५ ॥
वातरक्त की यह (सब बात) महर्षि (आत्रेय) ने अग्निवेश के लिए संक्षेप और विस्तार दोनों से बताई है, तथा अवस्था के अनुसार की जाने वाली चिकित्सा भी बताई है।
॥॥
इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संस्कारित तन्त्र में, जो भाग प्राप्त नहीं था उसे दृढबल द्वारा पूरा किए जाने पर, चिकित्सास्थान में वातशोणितचिकित्सित नामक उनतीसवाँ अध्याय (समाप्त)। २९