भूमिका
राजयक्ष्मचिकित्सित चरक संहिता के चिकित्सास्थान का आठवाँ अध्याय है, और इसका नाम इसके विषय से बना है: 'राजयक्ष्मा की चिकित्सा'। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। राजयक्ष्मा, जिसे अध्याय यक्ष्मा और शोष भी कहता है, वह रोग है जिसमें शरीर की धातुएँ, यानी रस, रक्त, मांस आदि वे तत्त्व जिनसे शरीर बनता और टिका रहता है, धीरे-धीरे क्षीण होती जाती हैं और शरीर सूखता जाता है। अध्याय इसे रोगराज (रोगों का राजा) और व्याधिसमूह (अनेक व्याधियों का समूह) भी कहता है। 'राजयक्ष्मा' नाम का कारण वह स्वयं बताता है: यह रोग सबसे पहले एक राजा, चन्द्र देव, को हुआ था।
अध्याय एक प्राचीन कथा से आरम्भ होता है, जो ऋषियों ने देवताओं से सुनी थी और जिसे वह काम-व्यसन (काम में अति-आसक्ति) से जुड़ी कथा कहता है। चन्द्र देव ने प्रजापति जी की अट्ठाईस पुत्रियों को पत्नी के रूप में स्वीकार किया, पर सबके साथ समान व्यवहार नहीं किया: वे रोहिणी जी में अत्यधिक आसक्त रहे, अपने शरीर की रक्षा नहीं की, और उनका शरीर क्षीण हो गया। शेष पुत्रियों के साथ उनके सहवास न करने से प्रजापति जी का क्रोध निःश्वास के रूप में, देह धारण करके, निकला, और दुर्बल हुए चन्द्र देव में यक्ष्मा प्रवेश कर गया; अध्याय क्रोध और यक्ष्मा को एक ही अर्थ वाले शब्द कहता है। तब चन्द्र देव देवताओं और देवर्षियों के साथ प्रजापति जी की शरण में गए। उनका मन शुद्ध जानकर प्रजापति जी प्रसन्न हुए, और अश्विनीकुमारों ने उनकी चिकित्सा करके उनका ओज बढ़ाया। अश्विनीकुमारों से धिक्कारा गया यक्ष्मा मनुष्य-लोक में आ गया, और अध्याय के अनुसार वह चार कारण पाकर मनुष्यों में प्रवेश करता है।
फिर आत्रेय ये चार कारण समझाते हैं: अपने बल से अधिक साहस के काम, जैसे युद्ध, अध्ययन, भारी बोझ, लम्बा मार्ग, गिरना या चोट; लज्जा, घृणा या भय से अधोवायु, मूत्र और मल के वेगों को रोकना; क्षय, यानी ईर्ष्या, भय, क्रोध, शोक, अत्यधिक मैथुन और उपवास आदि से शुक्र और ओज का घटना; और विषमाशन, यानी अनियमित ढंग से खाना-पीना। हर कारण से होने वाले यक्ष्मा के ग्यारह-ग्यारह लक्षण गिनाए गए हैं। इसके बाद पूर्वरूप आते हैं, यानी रोग के पूरी तरह प्रकट होने से पहले के संकेत, जैसे जुकाम, दुर्बलता, निर्दोष वस्तुओं में भी दोष देखना, भोजन से ग्लानि, स्त्री, मद्य और मांस की ओर झुकाव, और जलाशयों, पर्वतों, वनों और आकाश के प्रकाश-पिण्डों को सूखते, घटते या गिरते देखना। फिर अध्याय बताता है कि रोग भीतर कैसे बनता है: धातुएँ अपनी-अपनी ऊष्मा से पकती हैं और अपने-अपने स्रोतों (मार्गों) से होकर एक-दूसरी से पुष्ट होती हैं; स्रोतों के रुकने, धातुओं के घटने और उनकी ऊष्मा के क्षीण होने से राजयक्ष्मा होता है, और तब खाया हुआ अन्न अधिकतर मल बन जाता है और ओज के काम बहुत थोड़ा आता है। इसीलिए अध्याय कहता है कि ऐसे रोगी का बल उसके मल पर टिका है। रोग के प्रकट लक्षण ग्यारह या छह गिनाए गए हैं, और जुकाम से यक्ष्मा बनने का मार्ग, आवाज़ बिगड़ने के छह कारण, गले से रक्त और कफ का आना, श्वास, दस्त, अरुचि और उल्टी, सबका अलग वर्णन है। साध्य और असाध्य का निर्णय अध्याय लक्षणों की गिनती से नहीं, मांस और बल से करता है: मांस और बल क्षीण हो चुके हों तो थोड़े लक्षणों वाला रोगी भी चिकित्सा के लिए त्याज्य कहा गया है, और वे बने हों तो सब लक्षणों वाले रोगी की भी चिकित्सा की जा सकती है।
अध्याय के अनुसार हर यक्ष्मा तीनों दोषों से उत्पन्न होता है, और वैद्य को रोग की अवस्था के अनुसार दोषों का बलाबल परखकर चिकित्सा करने को कहा गया है। पहले जुकाम, सिर के दर्द, खाँसी, श्वास, आवाज़ के क्षीण होने और पसलियों के दर्द के साधारण उपाय आते हैं: स्वेद (सेंक), अभ्यङ्ग (मालिश), धूम, लेप, परिषेक, मांसरस और यूष, और सिर, पसलियों और कन्धों के शूल के लिए प्रदेह, उपनाह और दूषित रक्त निकालना। दोष अधिक हों तो वमन और विरेचन भी कहे गए हैं, पर ऐसे जो स्नेह से युक्त हों और रोगी को दुबला न करें, क्योंकि अध्याय के अनुसार शोष का रोगी मल निकलने मात्र से भी शिथिल हो जाता है। फिर अनेक घृत, लेह और चूर्ण आते हैं, जैसे सितोपला आदि का योग, यवानीषाडव और तालीशाद्य चूर्ण, और कफ के अधिक बहने, उल्टी, दस्त और मुँह के बिगड़े स्वाद के अलग-अलग उपाय। पोषण में मांस पर विशेष बल है: अध्याय मांसाहारी पशु-पक्षियों के मांस को मांस बढ़ाने में सबसे श्रेष्ठ कहता है, और कहता है कि रोगी घृणा से उसे छोड़ न दे, इसलिए वह परिचित प्राणियों के नाम से, पहचान छिपाकर, दिया जाए। मद्य को वह स्रोतों को खोलकर धातुओं को पुष्ट करने वाला बताता है। इसके बाद बाहरी उपचार आते हैं: स्नेह, दूध और जल में अवगाहन, मालिश, उबटन, स्नान, सुगन्ध, माला और वस्त्र, देवताओं, वैद्यों और ब्राह्मणों का पूजन, और प्रियजनों द्वारा परोसा गया मनचाहा भोजन।
अध्याय का अन्त उन उपायों की सूची से होता है जिनसे, उसके अनुसार, रोगराज लौट जाता है: अभ्यङ्ग, स्नान और बस्ति से लेकर मित्रों के दर्शन, गीत और वाद्य, प्रिय बातें सुनना, गुरुजनों की सेवा, ब्रह्मचर्य, दान, तप, सत्य, सदाचार और अहिंसा तक। फिर वेद में बताई गई उस इष्टि (यज्ञ) की बात है जिससे पूर्वकाल में राजयक्ष्मा जीता गया था, और दो संग्रह-श्लोक अध्याय के विषय गिनाते हैं। इस अध्याय से साथ ले जाने योग्य बातें ये हैं: चरक संहिता राजयक्ष्मा को धातुओं के पोषण की व्यवस्था बिगड़ने का रोग मानती है, इसलिए उसकी चिकित्सा का केन्द्र शरीर को पुष्ट करना और रोगी के मांस और बल को बचाना है, यहाँ तक कि शोधन भी ऐसा कहा गया है जो रोगी को दुबला न करे। अध्याय मन को भी चिकित्सा का अंग मानता है: प्रिय भोजन, स्नान और शृंगार, मित्रों का साथ और प्रसन्नता उसकी चिकित्सा में गिने गए हैं, और वह कहता है कि जो अन्न मन को हर्ष दे, वही सबसे अधिक पथ्य है। और उसके चार कारण बताते हैं कि यह रोग किन आदतों से आता है; साहस के प्रसंग में अध्याय स्वयं कहता है कि अपने को जानने वाला व्यक्ति साहस न करे।