भारत संहिता

अध्याय ८

राजयक्ष्मचिकित्सितम्

राजयक्ष्मा की चिकित्सा

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भूमिका

राजयक्ष्मचिकित्सित चरक संहिता के चिकित्सास्थान का आठवाँ अध्याय है, और इसका नाम इसके विषय से बना है: 'राजयक्ष्मा की चिकित्सा'। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। राजयक्ष्मा, जिसे अध्याय यक्ष्मा और शोष भी कहता है, वह रोग है जिसमें शरीर की धातुएँ, यानी रस, रक्त, मांस आदि वे तत्त्व जिनसे शरीर बनता और टिका रहता है, धीरे-धीरे क्षीण होती जाती हैं और शरीर सूखता जाता है। अध्याय इसे रोगराज (रोगों का राजा) और व्याधिसमूह (अनेक व्याधियों का समूह) भी कहता है। 'राजयक्ष्मा' नाम का कारण वह स्वयं बताता है: यह रोग सबसे पहले एक राजा, चन्द्र देव, को हुआ था।

अध्याय एक प्राचीन कथा से आरम्भ होता है, जो ऋषियों ने देवताओं से सुनी थी और जिसे वह काम-व्यसन (काम में अति-आसक्ति) से जुड़ी कथा कहता है। चन्द्र देव ने प्रजापति जी की अट्ठाईस पुत्रियों को पत्नी के रूप में स्वीकार किया, पर सबके साथ समान व्यवहार नहीं किया: वे रोहिणी जी में अत्यधिक आसक्त रहे, अपने शरीर की रक्षा नहीं की, और उनका शरीर क्षीण हो गया। शेष पुत्रियों के साथ उनके सहवास न करने से प्रजापति जी का क्रोध निःश्वास के रूप में, देह धारण करके, निकला, और दुर्बल हुए चन्द्र देव में यक्ष्मा प्रवेश कर गया; अध्याय क्रोध और यक्ष्मा को एक ही अर्थ वाले शब्द कहता है। तब चन्द्र देव देवताओं और देवर्षियों के साथ प्रजापति जी की शरण में गए। उनका मन शुद्ध जानकर प्रजापति जी प्रसन्न हुए, और अश्विनीकुमारों ने उनकी चिकित्सा करके उनका ओज बढ़ाया। अश्विनीकुमारों से धिक्कारा गया यक्ष्मा मनुष्य-लोक में आ गया, और अध्याय के अनुसार वह चार कारण पाकर मनुष्यों में प्रवेश करता है।

फिर आत्रेय ये चार कारण समझाते हैं: अपने बल से अधिक साहस के काम, जैसे युद्ध, अध्ययन, भारी बोझ, लम्बा मार्ग, गिरना या चोट; लज्जा, घृणा या भय से अधोवायु, मूत्र और मल के वेगों को रोकना; क्षय, यानी ईर्ष्या, भय, क्रोध, शोक, अत्यधिक मैथुन और उपवास आदि से शुक्र और ओज का घटना; और विषमाशन, यानी अनियमित ढंग से खाना-पीना। हर कारण से होने वाले यक्ष्मा के ग्यारह-ग्यारह लक्षण गिनाए गए हैं। इसके बाद पूर्वरूप आते हैं, यानी रोग के पूरी तरह प्रकट होने से पहले के संकेत, जैसे जुकाम, दुर्बलता, निर्दोष वस्तुओं में भी दोष देखना, भोजन से ग्लानि, स्त्री, मद्य और मांस की ओर झुकाव, और जलाशयों, पर्वतों, वनों और आकाश के प्रकाश-पिण्डों को सूखते, घटते या गिरते देखना। फिर अध्याय बताता है कि रोग भीतर कैसे बनता है: धातुएँ अपनी-अपनी ऊष्मा से पकती हैं और अपने-अपने स्रोतों (मार्गों) से होकर एक-दूसरी से पुष्ट होती हैं; स्रोतों के रुकने, धातुओं के घटने और उनकी ऊष्मा के क्षीण होने से राजयक्ष्मा होता है, और तब खाया हुआ अन्न अधिकतर मल बन जाता है और ओज के काम बहुत थोड़ा आता है। इसीलिए अध्याय कहता है कि ऐसे रोगी का बल उसके मल पर टिका है। रोग के प्रकट लक्षण ग्यारह या छह गिनाए गए हैं, और जुकाम से यक्ष्मा बनने का मार्ग, आवाज़ बिगड़ने के छह कारण, गले से रक्त और कफ का आना, श्वास, दस्त, अरुचि और उल्टी, सबका अलग वर्णन है। साध्य और असाध्य का निर्णय अध्याय लक्षणों की गिनती से नहीं, मांस और बल से करता है: मांस और बल क्षीण हो चुके हों तो थोड़े लक्षणों वाला रोगी भी चिकित्सा के लिए त्याज्य कहा गया है, और वे बने हों तो सब लक्षणों वाले रोगी की भी चिकित्सा की जा सकती है।

अध्याय के अनुसार हर यक्ष्मा तीनों दोषों से उत्पन्न होता है, और वैद्य को रोग की अवस्था के अनुसार दोषों का बलाबल परखकर चिकित्सा करने को कहा गया है। पहले जुकाम, सिर के दर्द, खाँसी, श्वास, आवाज़ के क्षीण होने और पसलियों के दर्द के साधारण उपाय आते हैं: स्वेद (सेंक), अभ्यङ्ग (मालिश), धूम, लेप, परिषेक, मांसरस और यूष, और सिर, पसलियों और कन्धों के शूल के लिए प्रदेह, उपनाह और दूषित रक्त निकालना। दोष अधिक हों तो वमन और विरेचन भी कहे गए हैं, पर ऐसे जो स्नेह से युक्त हों और रोगी को दुबला न करें, क्योंकि अध्याय के अनुसार शोष का रोगी मल निकलने मात्र से भी शिथिल हो जाता है। फिर अनेक घृत, लेह और चूर्ण आते हैं, जैसे सितोपला आदि का योग, यवानीषाडव और तालीशाद्य चूर्ण, और कफ के अधिक बहने, उल्टी, दस्त और मुँह के बिगड़े स्वाद के अलग-अलग उपाय। पोषण में मांस पर विशेष बल है: अध्याय मांसाहारी पशु-पक्षियों के मांस को मांस बढ़ाने में सबसे श्रेष्ठ कहता है, और कहता है कि रोगी घृणा से उसे छोड़ न दे, इसलिए वह परिचित प्राणियों के नाम से, पहचान छिपाकर, दिया जाए। मद्य को वह स्रोतों को खोलकर धातुओं को पुष्ट करने वाला बताता है। इसके बाद बाहरी उपचार आते हैं: स्नेह, दूध और जल में अवगाहन, मालिश, उबटन, स्नान, सुगन्ध, माला और वस्त्र, देवताओं, वैद्यों और ब्राह्मणों का पूजन, और प्रियजनों द्वारा परोसा गया मनचाहा भोजन।

अध्याय का अन्त उन उपायों की सूची से होता है जिनसे, उसके अनुसार, रोगराज लौट जाता है: अभ्यङ्ग, स्नान और बस्ति से लेकर मित्रों के दर्शन, गीत और वाद्य, प्रिय बातें सुनना, गुरुजनों की सेवा, ब्रह्मचर्य, दान, तप, सत्य, सदाचार और अहिंसा तक। फिर वेद में बताई गई उस इष्टि (यज्ञ) की बात है जिससे पूर्वकाल में राजयक्ष्मा जीता गया था, और दो संग्रह-श्लोक अध्याय के विषय गिनाते हैं। इस अध्याय से साथ ले जाने योग्य बातें ये हैं: चरक संहिता राजयक्ष्मा को धातुओं के पोषण की व्यवस्था बिगड़ने का रोग मानती है, इसलिए उसकी चिकित्सा का केन्द्र शरीर को पुष्ट करना और रोगी के मांस और बल को बचाना है, यहाँ तक कि शोधन भी ऐसा कहा गया है जो रोगी को दुबला न करे। अध्याय मन को भी चिकित्सा का अंग मानता है: प्रिय भोजन, स्नान और शृंगार, मित्रों का साथ और प्रसन्नता उसकी चिकित्सा में गिने गए हैं, और वह कहता है कि जो अन्न मन को हर्ष दे, वही सबसे अधिक पथ्य है। और उसके चार कारण बताते हैं कि यह रोग किन आदतों से आता है; साहस के प्रसंग में अध्याय स्वयं कहता है कि अपने को जानने वाला व्यक्ति साहस न करे।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक १९०-१९१)

तत्र श्लोकौ-प्रागुत्पत्तिर्निमित्तानि प्राग्रूपं रूपसंग्रहः।समासाद् व्यासतश्चोक्तं भेषजं राजयक्ष्मणः॥

श्लोक १९० →

इस विषय में (सार के) दो श्लोक (हैं): (राजयक्ष्मा की) पूर्वकाल में हुई उत्पत्ति, निमित्त (कारण), प्राग्रूप (पूर्वलक्षण), रूपों (लक्षणों) का संग्रह, संक्षेप से और विस्तार से कही गई राजयक्ष्मा की चिकित्सा (भेषज)

नामहेतुरसाध्यत्वं साध्यत्वं कृच्छ्रसाध्यता।

श्लोक १९१ →

(इसके) नाम का हेतु (कारण), असाध्यता (ठीक न हो सकना), साध्यता (ठीक हो सकना) और कृच्छ्रसाध्यता (कठिनाई से ठीक होना)

मुख्य शब्द (२७) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

आरोग्य
आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार

शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।

अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।

चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।

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च. चि. ८/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम राजयक्ष्मचिकित्सित (राजयक्ष्मा की चिकित्सा सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. चि. ८/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. चि. ८/३

। ॥ ३ ॥

जब दिवौकस (स्वर्ग में रहने वाले देवता) कह रहे थे, तब ऋषियों ने शशी (चन्द्रमा) के विषय में एक प्राचीन कथा सुनी थी, जो काम-व्यसन (काम में अति-आसक्ति के दोष) से जुड़ी है।

च. चि. ८/४

। ॥ ४ ॥

रोहिणी में अत्यधिक आसक्त और (अपने) शरीर की रक्षा न करने वाले इन्दु (चन्द्रमा) की देह स्नेह के परिक्षय (सब ओर से घट जाने) से अल्पता (क्षीणता) को प्राप्त हो गई।

च. चि. ८/५

। ॥ ५ ॥

और प्रजापति की शेष पुत्रियों के साथ (चन्द्रमा के) सम्भोग न करने से, (प्रजापति का) क्रोध निःश्वास (गहरी साँस) के रूप में मूर्तिमान् (देहधारी) होकर मुख से निकला।

च. चि. ८/६

। ॥ ६ ॥

क्योंकि अंशुमान् (किरणों वाले चन्द्रमा) ने प्रजापति की अट्ठाईस पुत्रियों को पत्नी के रूप में ग्रहण किया था, और सबके साथ (समान) व्यवहार नहीं किया।

च. चि. ८/७

। ॥ ७ ॥

गुरु (प्रजापति) द्वारा तिरस्कृत, पत्नियों के प्रति असमान व्यवहार करने वाले, रजस् से घिरे हुए और बलहीन उस शशी (चन्द्रमा) में यक्ष्मा ने प्रवेश किया।

च. चि. ८/८

। ॥ ८ ॥

गुरु के अत्यन्त बड़े क्रोध से अभिभूत (दबा हुआ) और निष्प्रभ (कान्तिहीन) वह (चन्द्रमा) देवताओं और देवर्षियों के साथ गुरु की शरण में गया।

च. चि. ८/९

। ॥ ९ ॥

तब प्रजापति ने चन्द्रमा की शुद्ध मति (मन के भाव) को जानकर प्रसाद (कृपा) किया; फिर दोनों अश्विनों ने सोम (चन्द्रमा) की चिकित्सा की।

च. चि. ८/१०

। ॥ १० ॥

ग्रह (रोग की पकड़) से मुक्त हुआ वह चन्द्र विशेष रूप से चमक उठा, और दोनों अश्विनों द्वारा ओज से बढ़ाए गए (उस चन्द्र) ने शुद्ध सत्त्व (निर्मल मन) भी प्राप्त किया।

च. चि. ८/११

। ॥ ११ ॥

क्रोध, यक्ष्मा, ज्वर और रोग एक ही अर्थ वाले हैं, (सब) दुःख नाम वाले हैं। क्योंकि वह (यक्ष्मा) पहले राजा को हुआ था, इसलिए (वह) राजयक्ष्मा माना गया।

च. चि. ८/१२

। ॥ १२ ॥

दोनों अश्विनों द्वारा हुंकार से धिक्कारा गया वह यक्ष्मा मनुष्य-लोक में आ गया; (वह) चार प्रकार के हेतु (कारण) को पाकर मनुष्यों में प्रवेश करता है।

च. चि. ८/१३

। ॥ १३ ॥

अयथाबल आरम्भ (बल से बढ़कर किया गया परिश्रम), वेग-संधारण (स्वाभाविक वेगों को रोकना), क्षय और चौथा विषमाशन (अनियमित भोजन), (इन्हें) यक्ष्मा का कारण जानना चाहिए।

च. चि. ८/१४

। ॥ १४ ॥

युद्ध, अध्ययन, भार (ढोना), अध्व (मार्ग चलना), लङ्घन (कूदना), प्लवन (तैरना) आदि से, गिरने से या अभिघातों (चोटों) से, या साहस के कामों से, और इसी तरह के अन्य (कामों) से,

च. चि. ८/१५

। ॥ १५ ॥

(इन) बल से बढ़कर किए गए आरम्भों (परिश्रमों) से जब प्राणी की छाती (उरस्) में क्षत (घाव) हो जाता है, तब प्रकुपित वायु दोनों दोषों (पित्त और कफ) को उभारकर (शरीर में) दौड़ता है।

च. चि. ८/१६

। ॥ १६ ॥

वह (वायु) सिर में स्थित होकर शिरःशूल (सिर का तेज़ दर्द) करता है; गले में आश्रय लेकर कण्ठोद्ध्वंस (गले में ख़राश), कास (खाँसी), स्वरभेद (आवाज़ का बदलना) और अरोचक (भोजन में अरुचि) (करता है),

च. चि. ८/१७

। ॥ १७ ॥

और पार्श्व (पसलियों वाले बगल के भाग) में स्थित होकर पार्श्वशूल, गुद में स्थित होकर वर्चोभेद (मल का पतला होकर टूटना), सन्धियों (जोड़ों) में स्थित होकर जृम्भा (जम्हाई) और ज्वर, और उरस् (छाती) में स्थित होकर छाती की रुजा (पीड़ा) (करता है)।

च. चि. ८/१८

। ॥ १८ ॥

छाती में क्षत (चोट) होने के कारण (रोगी) खाँसी से रक्त-मिला कफ थूकता है; जर्जर हुई छाती के साथ, छाती के शूल (तीखे दर्द) से अत्यन्त पीड़ित होकर, (वह) कठिनाई से (थूकता है)।

च. चि. ८/१९

। ॥ १९ ॥

इस प्रकार साहसिक (साहस से होने वाला) यक्ष्मा इन ग्यारह रूपों (लक्षणों) के साथ प्रकट होता है। इसलिए आत्मज्ञ (अपने आप को जानने वाला) मनुष्य साहस न करे।

च. चि. ८/२०

। ॥ २० ॥

जब मनुष्य लज्जा के कारण, या घृणा (घिन) के कारण, या भय के कारण, वात (अधोवायु), मूत्र और पुरीष (मल) के आए हुए वेग को रोकता है,

च. चि. ८/२१

। ॥ २१ ॥

तब वेग के रोके जाने से अनिल (वात) कफ और पित्त को प्रेरित करता हुआ ऊपर, तिरछे और नीचे भी (ये) विकार उत्पन्न करता है

च. चि. ८/२२

। ॥ २२ ॥

प्रतिश्याय (जुकाम) और कास (खाँसी), स्वरभेद (आवाज़ का बिगड़ना), अरोचक (भोजन में अरुचि), पार्श्वशूल (पसलियों में तीखा दर्द), शिरःशूल (सिर का दर्द), ज्वर, कन्धों का अवमर्दन (मसले जाने जैसी पीड़ा),

च. चि. ८/२३

। ॥ २३ ॥

अङ्गमर्द (अंगों का टूटना), बार-बार छर्दि (उल्टी) और तीन लक्षणों वाला वर्चोभेद (मल का पतला आना); ये ग्यारह रूप (लक्षण) हैं, जिनसे महान् यक्ष्मा बताया जाता है।

च. चि. ८/२४

। ॥ २४ ॥

ईर्ष्या, उत्कण्ठा (व्याकुल लालसा), भय, त्रास (घबराहट), क्रोध, शोक और अतिकर्शन (शरीर को बहुत दुबला करने) से, तथा अति व्यवाय (अत्यधिक मैथुन) और अनशन (भोजन न करने) से शुक्र और ओज क्षीण होते हैं।

च. चि. ८/२५

। ॥ २५ ॥

तब स्नेह (शरीर की चिकनाई) के क्षय से बढ़ा हुआ वायु (वात) दोनों दोषों (कफ और पित्त) को उभारता हुआ प्रतिश्याय (जुकाम), ज्वर, कास (खाँसी), अङ्गमर्द (अंगों का टूटना), सिर की पीड़ा,

च. चि. ८/२६

। ॥ २६ ॥

श्वास (साँस फूलना), विड्भेद (मल का पतला आना), अरुचि, पार्श्वशूल (पसलियों में दर्द), स्वरक्षय (आवाज़ का क्षीण होना) और कन्धों में संताप (जलन), इन ग्यारह गदों (रोगों) को उत्पन्न करता है।

च. चि. ८/२७

। ॥ २७ ॥

ये ग्यारह लिङ्ग (लक्षण) क्षय से उत्पन्न हुए, प्राणों का क्षय करने वाले महान् रोग राजयक्ष्मा को सूचित करते हैं।

च. चि. ८/२८

। ॥ २८ ॥

अनेक प्रकार के अन्न-पान (खाने-पीने की वस्तुओं) को विषम ढंग से (अनियमित रूप से) खाने वाले (मनुष्य) के मारुत (वात) आदि (दोष) घोर और विषम रोगों को उत्पन्न करते हैं।

च. चि. ८/२९

। ॥ २९ ॥

(वे वात आदि दोष) विषमता के कारण विषम (अवस्था) को प्राप्त होकर, रुधिर (रक्त) आदि (धातुओं) के स्रोतों को रोककर रोग के कारण बनते हैं, और धातुएँ पुष्ट नहीं होतीं।

च. चि. ८/३०

। ॥ ३० ॥

प्रतिश्याय (जुकाम), प्रसेक (मुँह में पानी भर आना), कास (खाँसी), छर्दि (उल्टी), अरोचक (भोजन में अरुचि), ज्वर, कन्धों में अभिताप (जलन) और रुधिर (रक्त) की उल्टी,

च. चि. ८/३१

। ॥ ३१ ॥

पार्श्वशूल (पसलियों में दर्द), शिरःशूल (सिर का दर्द) और स्वरभेद (आवाज़ का बिगड़ना) भी; (इन) लक्षणों को क्रम से कफ, पित्त और अनिल (वात) से उत्पन्न हुआ जानना चाहिए।

च. चि. ८/३२

। ॥ ३२ ॥

इस प्रकार व्याधियों के समूह (रूप) रोगराज (राजयक्ष्मा) का (प्रत्येक) हेतु से उत्पन्न ग्यारह प्रकार का रूप (लक्षण), और चार प्रकार का हेतु (कारण) कहा गया।

च. चि. ८/३३

। ॥ ३३ ॥

(राजयक्ष्मा का) पूर्वरूप (यह है): प्रतिश्याय (जुकाम), दुर्बलता, दोषरहित वस्तुओं में भी दोष देखना, शरीर में बीभत्सता (घिनौनापन) दिखना,

च. चि. ८/३४

। ॥ ३४ ॥

और भोजन करते हुए (व्यक्ति) को घृणा (ग्लानि) होना भी, बल और मांस का क्षय, स्त्री, मद्य और मांस में प्रियता (रुचि), और अवगुण्ठन (अपने को ढके रखने) में प्रियता,

च. चि. ८/३५

। ॥ ३५ ॥

अन्नपान (भोजन और पेय) में प्रायः मक्खियों, घुनों, बालों और तिनकों का गिरना, और बालों तथा नाखूनों का अधिक बढ़ना,

च. चि. ८/३६

। ॥ ३६ ॥

पक्षियों, पतंगों (उड़ने वाले कीटों) और हिंस्र पशुओं द्वारा आक्रमण, और स्वप्न में बालों और हड्डियों के ढेरों पर तथा राख पर चढ़ना,

च. चि. ८/३७

। ॥ ३७ ॥

और जलाशयों, पर्वतों, वनों और ज्योतियों (आकाश के प्रकाश-पिण्डों) को भी सूखते, क्षीण होते और गिरते हुए जो देखना (है),

च. चि. ८/३८

। ॥ ३८ ॥

वह अनेक रूपों वाले राजयक्ष्मा का प्राग्रूप (पूर्वरूप) जानना चाहिए। परन्तु इसका रूप (प्रकट लक्षण) मैं उद्देश (संक्षिप्त गिनती) के अनुसार, भेषज (चिकित्सा) सहित बताऊँगा।

च. चि. ८/३९

। ॥ ३९ ॥

शरीर की धातुएँ अपनी-अपनी ऊष्मा से पाक (परिपाक) को प्राप्त होती हैं, और धातु अपने-अपने स्रोत (मार्ग) के द्वारा (दूसरी) धातु से पुष्ट होती है।

च. चि. ८/४०

। ॥ ४० ॥

स्रोतों के संनिरोध (रुक जाने) से, रक्त आदि (धातुओं) के क्षय से, और धातुओं की ऊष्मा के घटने से राजयक्ष्मा उत्पन्न होता है।

च. चि. ८/४१

। ॥ ४१ ॥

उस समय (रोग की उस अवस्था में) कोष्ठ में स्थित जिस अन्न को अग्नि पचाती है, वह अधिकतर मल बन जाता है; (उसका) थोड़ा-सा (भाग ही) ओज के काम आता है।

च. चि. ८/४२

। ॥ ४२ ॥

इसलिए, विशेष रूप से सब धातुओं के क्षय से पीड़ित राजयक्ष्मा के रोगी के पुरीष (मल) की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि उसका बल विड्बल (मल पर टिका बल) है।

च. चि. ८/४३

। ॥ ४३ ॥

स्रोतों के रुक जाने पर रस अपने ही स्थान में रहकर विदग्ध हो जाता है (गर्मी से बिगड़ जाता है)। वह खाँसी के वेग से अनेक रूपों में ऊपर की ओर निकलता है।

च. चि. ८/४४

। ॥ ४४ ॥

और इससे छह, या फिर ग्यारह, व्याधियाँ (रोग) उत्पन्न होती हैं, जिनके समूह रूप में मिलने से (इस रोग को) 'राजयक्ष्मा' कहा जाता है।

च. चि. ८/४५

। ॥ ४५ ॥

कास (खाँसी), अंसताप (कन्धों में जलन), वैस्वर्य (स्वर का बिगड़ना), ज्वर, पार्श्व (छाती के बगल) और सिर में पीड़ा, रक्त और कफ का छर्दन (मुँह से निकलना), श्वास और मल के विकार, तथा अरुचि,

च. चि. ८/४६

। ॥ ४६ ॥

ये यक्ष्मा के ग्यारह रूप (लक्षण) हैं; अथवा ये छह: कास (खाँसी), ज्वर, पार्श्वशूल (बगल में पीड़ा), स्वर और मल के विकार, तथा अरुचि।

च. चि. ८/४७

। ॥ ४७ ॥

मांस और बल का क्षय होने पर, सभी, आधे या तीन लक्षणों से भी युक्त (रोगी) वर्ज्य (चिकित्सा के लिए त्याज्य) है; परन्तु इससे अन्यथा (मांस और बल का क्षय न होने पर) सभी रूपों (लक्षणों) वाला (रोगी) भी चिकित्स्य (चिकित्सा के योग्य) है।

च. चि. ८/४८

। ॥ ४८ ॥

जिसका सिर मारुत (वात) से आध्मात (फूला हुआ) है, (उसकी) नाक की जड़ में स्थित श्लेष्मा (कफ), रुधिर (रक्त) अथवा पित्त मारुत की ओर बहता है।

च. चि. ८/४९

। ॥ ४९ ॥

तब शरीर को कृश करने वाला घोर प्रतिश्याय (जुकाम) उत्पन्न होता है। उसका रूप (लक्षण) है: शिरःशूल (सिर का दर्द), भारीपन, घ्राण में विकार,

च. चि. ८/५०

। ॥ ५० ॥

ज्वर, कास (खाँसी), कफ का उत्क्लेश, स्वरभेद, अरुचि, क्लम (थकान) और इन्द्रियों की असमर्थता; और इसी से यक्ष्मा उत्पन्न होता है।

च. चि. ८/५१

। ॥ ५१ ॥

खाँसता हुआ यक्ष्मी (यक्ष्मा का रोगी) कफ के साथ आने वाले रस को थूकता है, जो पिच्छिल (चिपचिपा), गाढ़ा, कच्चे मांस जैसी गन्ध वाला, हरा और सफ़ेद-पीला होता है।

च. चि. ८/५२

। ॥ ५२ ॥

कंधों और पार्श्वों में तपन, हाथों और पैरों में संताप (जलन) और सारे अंगों में फैला ज्वर: यह राजयक्ष्मा का लक्षण है।

च. चि. ८/५३

। ॥ ५३ ॥

स्वरभेद वात से, पित्त से, कफ से, रक्त से, कास (खाँसी) के वेग से और पीनस से होता है। वात से (हुए स्वरभेद में) स्वर रूखा, क्षाम (क्षीण) और चल (अस्थिर) होता है।

च. चि. ८/५४

। ॥ ५४ ॥

पित्त से (हुए स्वरभेद में) तालु और कण्ठ में जलन होती है, (और रोगी) बोलने से खीझता है। कफ से (हुए) भेद में स्वर विबद्ध (रुका हुआ) होता है और खुरखुराता है।

च. चि. ८/५५

। ॥ ५५ ॥

रक्त से विबद्ध (अवरुद्ध) होने के कारण स्वर सन्न (बैठा हुआ) होता है और कठिनाई से निकलता है। कास के अति वेग से (स्वर) कषण (खुरदरा, छिला-सा) होता है, (और) पीनस से कफवातिक (कफ और वात वाला)।

च. चि. ८/५६

। ॥ ५६ ॥

यक्ष्मी (यक्ष्मा के रोगी) का पार्श्वशूल तो अनियत (एक-सा न रहने वाला) होता है, जिसमें संकोच (सिकुड़न) और आयाम (खिंचाव) होते हैं; और (उसका) शिरःशूल (सिर का दर्द) संताप (जलन) और भारीपन के साथ होता है।

च. चि. ८/५७

। ॥ ५७ ॥

विषम (अनियमित) भोजन के कारण यक्ष्मी (यक्ष्मा के रोगी) का शरीर अभिसन्न हो जाने पर तो कण्ठ से रक्त निकलता है, और संचित होकर उत्क्लिष्ट (उभरा हुआ) कफ भी।

च. चि. ८/५८

। ॥ ५८ ॥

मार्गों के विबद्ध (अवरुद्ध) होने के कारण रक्त मांस आदि (धातुओं) तक नहीं पहुँचता, और आमाशय में स्थित, उत्क्लिष्ट (उभरा हुआ) वह (रक्त) अधिकता के कारण कण्ठ तक आ जाता है।

च. चि. ८/५९

। ॥ ५९ ॥

वात और कफ से छाती के विबद्ध (अवरुद्ध) होने के कारण (रोगी को) श्वास (रोग) हो जाता है; और दोषों से अग्नि के उपहत (दुर्बल) होने पर (उसे) पिच्छा (चिपचिपे स्राव) के साथ अतिसार होता है।

च. चि. ८/६०

। ॥ ६० ॥

आहार में अरुचि अलग-अलग या सब मिले हुए, जिह्वा और हृदय में आश्रित दोषों से, और द्विष्ट (अप्रिय) विषयों से, जो मानसिक (कारण) हैं, उत्पन्न होती है।

च. चि. ८/६१

। ॥ ६१ ॥

वात आदि (दोषों) से उत्पन्न अरुचि को क्रम से मुँह के कषाय (कसैले), तिक्त (कड़वे) और मधुर (मीठे) स्वाद से जाने, और मानसिक (अरुचि) को दोषदर्शन से।

च. चि. ८/६२

। ॥ ६२ ॥

अरोचक (अरुचि) से, कास के वेग से, दोषों के उत्क्लेश से और भय से भी जो छर्दि (उल्टी) होती है, वह अन्य विकारों का भी उपद्रव है।

च. चि. ८/६३

। ॥ ६३ ॥

सारा यक्ष्मा त्रिदोषज (तीनों दोषों से उत्पन्न) होता है; परन्तु वैद्य दोषों के आवस्थिक (अवस्था के अनुसार) बलाबल की परीक्षा करके शोषी (शोष के रोगी) की चिकित्सा करे।

च. चि. ८/६४

। ॥ ६४ ॥

प्रतिश्याय (जुकाम), शिरःशूल (सिरदर्द), कास (खाँसी), श्वास (साँस फूलना), स्वरक्षय (आवाज़ का क्षीण होना) और पार्श्वशूल (पसलियों के पास का दर्द) में (काम आने वाली) विविध साधारण क्रियाएँ (उपचार) सुनो।

च. चि. ८/६५

। ॥ ६५ ॥

पीनस (जुकाम) में स्वेद (पसीना लाने का उपचार), अभ्यङ्ग (मालिश), धूम (औषधीय धुआँ) और आलेपन (लेप), परिषेक (औषधीय द्रव की धार) और अवगाह (औषधीय द्रव में बैठकर स्नान), तथा यावक और वाट्य (जौ से बने भोज्य) भी

च. चि. ८/६६

। ॥ ६६ ॥

और लाव, तित्तिरि (तीतर), दक्ष और वर्तक (पक्षियों) के रसों (मांसरसों) की, जो लवण (नमकीन), अम्ल (खट्टे), कटु (तीखे) और उष्ण (गरम) हों तथा स्नेह (घी, तेल आदि) से पुष्ट किए गए हों, व्यवस्था करे।

च. चि. ८/६७

। ॥ ६७ ॥

पिप्पली, यव (जौ), कुलत्थ (कुलथी) और नागर (सोंठ) सहित, दाडिम (अनार) और आमलक (आँवला) से युक्त, बकरे (के मांस) का स्निग्ध (चिकनाई युक्त) रस पिए।

च. चि. ८/६८

। ॥ ६८ ॥

उससे पीनस आदि छह विकार दूर हो जाते हैं, अथवा मूलक (मूली) और कुलत्थ (कुलथी) के भली-भाँति तैयार किए गए यूषों से।

च. चि. ८/६९

। ॥ ६९ ॥

यव (जौ), गोधूम (गेहूँ) और शालि (धान) के अन्न से, जैसा (रोगी के लिए) सात्म्य (अनुकूल) हो, (वैसे) उपचार करे। वारुणी (एक प्रकार की मदिरा) का प्रसाद (ऊपर का निथरा हुआ स्वच्छ भाग) पिए, अथवा पाञ्चमूलिक (पञ्चमूल से बना) जल

च. चि. ८/७०

। ॥ ७० ॥

अथवा धान्य (धनिया) और नागर (सोंठ) से सिद्ध किया हुआ, अथवा तामलकी से या चार पर्णिनियों से शृत (उबाला हुआ) (जल पिए); और उसी (जल) से अन्न (भोजन) तैयार करे।

च. चि. ८/७१

। ॥ ७१ ॥

कृशरा (खिचड़ी), उत्कारिका, माष (उड़द), कुलत्थ (कुलथी), यव (जौ) और पायस (खीर) से, संकरस्वेद की विधि से, कण्ठ (गले), पार्श्व (पसलियों वाले भाग), छाती और सिर को

च. चि. ८/७२

। ॥ ७२ ॥

पत्रभङ्ग (तोड़े हुए पत्तों) से स्वेदन करे (सेंके), और सिर पर परिषेक करे (धार डाले), अथवा बला, गुडूची (गिलोय) और मधुक (मुलेठी) से उबाले गए सुखद (गुनगुने) जलों से।

च. चि. ८/७३

। ॥ ७३ ॥

अथवा बस्त (बकरे) और मत्स्य (मछली) के सिरों से कण्ठ, सिर और पार्श्व पर नाडीस्वेद का प्रयोग करे, अथवा वातिक (वात सम्बन्धी) द्रव्यों सहित दूध से।

च. चि. ८/७४

। ॥ ७४ ॥

औदक (जलचर) और आनूप (दलदली प्रदेश के) प्राणियों के मांस, पाञ्चमूलिक (पञ्चमूल से बना) जल, अथवा स्नेह सहित आरनाल (काँजी), इनका नाडीस्वेद में प्रयोग करे।

च. चि. ८/७५

। ॥ ७५ ॥

जीवन्ती के, शतपुष्पा के, बला के और मधुक (मुलेठी) के, वचा के, वेशवार के, विदारी के और मूलक (मूली) के

च. चि. ८/७६

। ॥ ७६ ॥

औदक (जलचर) और आनूप (दलदली प्रदेश के) प्राणियों के मांसों के, भली-भाँति तैयार किए गए, चारों स्नेहों सहित उपनाह (गरम पुल्टिस) सिर, पार्श्व और कन्धों के शूल वाले (रोगियों) के लिए प्रशंसित हैं।

च. चि. ८/७७

। ॥ ७७ ॥

शतपुष्पा, मधुक (मुलेठी) सहित कुष्ठ (कूठ), तगर और चन्दन, इनका घी सहित आलेपन (लेप) सिर, पार्श्व और कन्धों के शूल को दूर करने वाला होता है।

च. चि. ८/७८

। ॥ ७८ ॥

बला, रास्ना, तिल, सर्पि (घी), मधुक (मुलेठी) और नीला उत्पल (कमल); पलङ्कषा, देवदारु, चन्दन, केशर और घृत (घी)

च. चि. ८/७९

। ॥ ७९ ॥

वीरा, बला, विदारी, कृष्णगन्धा और पुनर्नवा; शतावरी, पयस्या, कत्तृण, मधुक (मुलेठी) और घृत (घी)

च. चि. ८/८०

। ॥ ८० ॥

आधे-आधे श्लोकों में कहे गए ये चार प्रदेह (लेप) संसृष्ट (मिले हुए) दोषों वाले और सिर, पार्श्व तथा कंधों के शूल से पीड़ित (रोगियों) के लिए प्रशस्त हैं।

च. चि. ८/८१

। ॥ ८१ ॥

नावन (नाक में औषधि डालना), धूमपान (औषधि का धुआँ लेना), भोजन के बाद लिए जाने वाले स्नेह, अभ्यङ्ग (मालिश) में प्रयोग होने वाले तैल, तथा उत्तम बस्तिकर्म (भी इन रोगियों के लिए प्रशस्त हैं)।

च. चि. ८/८२

। ॥ ८२ ॥

सिर, पार्श्व और कंधों के शूलों में (वैद्य) उस (रोगी) के दूषित रक्त को शृङ्ग (सींग), अलाबु (तुम्बी) और जलौका (जोंक) से, या व्यधन (शिरा बेधने) से निकाले।

च. चि. ८/८३

। ॥ ८३ ॥

पद्मक (पद्माख), उशीर (खस) और चन्दन से (बना) घृत सहित प्रदेह भी इष्ट (हितकर) है, या घी में भिगोए हुए दूर्वा (दूब), मधुक (मुलेठी), मञ्जिष्ठा (मजीठ) और केशर से (बना प्रदेह)।

च. चि. ८/८४

। ॥ ८४ ॥

प्रपौण्डरीक, निर्गुण्डी, पद्मकेशर (कमल का केसर), उत्पल (नीलकमल), कशेरुक (कसेरू) और पयस्या: (इनसे बना) घी सहित प्रलेपन (लेप)।

च. चि. ८/८५

।, ॥ ८५ ॥

चन्दनाद्य तैल से या सौ बार धोए हुए घी से अभ्यङ्ग (मालिश), और दूध से तथा मधुक (मुलेठी) के जल से सेक (सिंचन) प्रशस्त है।

च. चि. ८/८६

। ॥ ८६ ॥

बहुत ठंडे माहेन्द्र (आकाश से बरसे) जल से, या चन्दन आदि (द्रव्यों) के साथ उबाले हुए (जल) से परिषेक करना चाहिए। यह संशमनी (दोषों को शान्त करने वाली) चिकित्सा है।

च. चि. ८/८७

। ॥ ८७ ॥

जिनके दोष अधिक (बढ़े हुए) हैं और जिन्हें स्नेहन तथा स्वेदन दिया जा चुका है, उनके लिए विरेचन सहित वमन प्रशस्त माना जाता है, (परन्तु ऐसा) जो स्नेह से युक्त हो और (शरीर को) कृश न करे।

च. चि. ८/८८

। ॥ ८८ ॥

शोषी (शोष का रोगी) तो मल के निकलने से भी (अपने) अंगों को छोड़ देता है (उसके अंग शिथिल हो जाते हैं); फिर उसका क्या (कहना) जिसे (उसके) बल का ध्यान न रखने वाली मात्रा से विरेचन कराया जाता है।

च. चि. ८/८९

। ॥ ८९ ॥

(वैद्य) जिनका कोष्ठ भली-भाँति शुद्ध हो चुका है, उनके कास (खाँसी), श्वास, स्वरक्षय (आवाज़ बैठना) और सिर, पार्श्व तथा कंधों के शूलों में इन सिद्ध (परखे हुए) योगों का प्रयोग करे।

च. चि. ८/९०

। ॥ ९० ॥

बला, विदारिगन्धा आदि (द्रव्यों) से, या विदारी से, या मधुक (मुलेठी) से सिद्ध किया हुआ, लवण (नमक) सहित घी स्वर के लिए हितकर उत्तम नस्य होगा।

च. चि. ८/९१

। ॥ ९१ ॥

प्रपौण्डरीक, मधुक (मुलेठी), पिप्पली, बृहती (बड़ी कटेरी), बला और दूध, और इनसे सिद्ध किया हुआ घी स्वर के लिए हितकर उत्तम नावन होगा।

च. चि. ८/९२

। ॥ ९२ ॥

और भोजन के बाद लिया जाने वाला घृत, बार-बार प्रयोग किए जाने पर, सिर, पार्श्व और कंधों के शूल को नष्ट करता है और कास (खाँसी) तथा श्वास को दूर करता है।

च. चि. ८/९३

। ॥ ९३ ॥

दशमूल, दूध और मांसरस से सिद्ध किया हुआ, बला के गर्भ (कल्क) वाला घृत इन रोगों को शीघ्र दूर करता है।

च. चि. ८/९४

। ॥ ९४ ॥

भोजन के ऊपर (बाद में) या (भोजन के) बीच में, अग्नि (पाचन-शक्ति) के अनुसार दिया गया, दूध सहित रास्नाघृत, या दूध सहित बलाघृत (भी इन रोगों को दूर करता है)।

च. चि. ८/९५

। ॥ ९५ ॥

अब इसके बाद कास को दूर करने वाले, स्वर के लिए हितकर, श्वास और हिक्का को नष्ट करने वाले तथा सिर, पार्श्व और कंधों के शूल को नष्ट करने वाले लेहों और स्नेहों को सुनो।

च. चि. ८/९६

। ॥ ९६ ॥

खर्जूर (खजूर), मृद्वीका (अंगूर), शर्करा और क्षौद्र (मधु) से युक्त तथा पिप्पली सहित घृत वैस्वर्य (स्वर का बिगड़ना), कास, श्वास और ज्वर को दूर करने वाला है।

च. चि. ८/९७

। ॥ ९७ ॥

दशमूल से उबाले गए क्षीर (दूध) से जो नया सर्पि (घी) निकले, वह पिप्पली और क्षौद्र (मधु) के साथ स्वर को जगाने वाला सबसे उत्तम (योग) है।

च. चि. ८/९८

। ॥ ९८ ॥

अथवा पाँच पञ्चमूलों से उबाले गए (दूध) से जो घृत निकले, (वह) सिर, पार्श्व और कंधों के शूल को नष्ट करने वाला तथा कास, श्वास और ज्वर को दूर करने वाला है।

च. चि. ८/९९

। ॥ ९९ ॥

पाँचों पञ्चमूलों के रस (क्वाथ) में, जिसमें चार गुना क्षीर (दूध) हो, सिद्ध किया गया (पकाया गया) यह सर्पि (घी) यक्ष्मा के सप्तक (सात के समूह वाले) बल को जीत लेता है।

च. चि. ८/१००

। ॥ १०० ॥

खर्जूर (खजूर), पिप्पली, द्राक्षा (अंगूर), पथ्या (हरीतकी), शृङ्गी और दुरालभा; त्रिफला, पिप्पली, मुस्त (नागरमोथा), शृङ्गाट (सिंघाड़ा), गुड और शर्करा;

च. चि. ८/१०१

। ॥ १०१ ॥

वीरा, शटी, पुष्कर नामक (द्रव्य), सुरस, शर्करा और गुड; नागर (सोंठ), चित्रक, लाजा (भुने धान की खीलें), पिप्पली, आमलक (आँवला) और गुड

च. चि. ८/१०२

।॥ १०२ ॥

आधे-आधे श्लोक में बताए गए इन (लेहों) को, जो कास और श्वास को दूर करने वाले, स्वर के लिए हितकर तथा पार्श्व के शूल को दूर करने वाले हैं, मनुष्य मधु और सर्पि (घी) के साथ चाटे।

च. चि. ८/१०३

। ॥ १०३ ॥

सितोपला (मिश्री), तुगाक्षीरी (वंशलोचन), पिप्पली, बहुला (इलायची) और त्वक् (दालचीनी) को, अन्तिम से ऊपर की ओर (हर एक को) दुगुना करके, मधु और सर्पि (घी) के साथ चटाए।

च. चि. ८/१०४

। ॥ १०४ ॥

अथवा उस (योग) का चूर्ण बनाकर उसे ऐसे (रोगी) को खिलाए जो श्वास, कास और कफ से पीड़ित हो, जिसकी जीभ सुन्न हो और जिसे अरोचक (भोजन में अरुचि) हो, जिसकी अग्नि अल्प हो और जिसे पार्श्वशूल हो।

च. चि. ८/१०५

। ॥ १०५ ॥

हाथ, पैर और अंगों की जलन में, ज्वर में, तथा ऊर्ध्वग (ऊपर की ओर जाने वाले) रक्त में वासा (अडूसा) का घृत, अथवा शतावरी से सिद्ध किया गया (घृत), परम हितकर है।

च. चि. ८/१०६

। ॥ १०६ ॥

दुरालभा, श्वदंष्ट्रा, चारों पर्णिनियों और बला के एक-एक पल के भाग करके, और पर्पटक का भी एक पल (लेकर),

च. चि. ८/१०७

। ॥ १०७ ॥

(उन्हें) दस गुने जल में पकाए; (जल का) दसवाँ भाग शेष रहने पर, भली प्रकार छाने हुए (उस) रस (क्वाथ) में इन द्रव्यों के कल्क डाले

च. चि. ८/१०८

। ॥ १०८ ॥

शठी, पुष्करमूल, पिप्पली और त्रायमाणा, तामलकी, किरातों के तिक्त (किराततिक्त, चिरायता) और कुटज के

च. चि. ८/१०९

। ॥ १०९ ॥

फलों के और सारिवा के, भली प्रकार पीसे हुए, एक-एक कर्ष के बराबर (कल्क)। फिर उस (कल्क मिले रस) के साथ एक प्रस्थ घृत को, दुगुने क्षीर (दूध) के साथ, पकाए।

च. चि. ८/११०

। ॥ ११० ॥

यह सर्पि (घी) ज्वर, दाह (जलन), भ्रम (चक्कर), कास (खाँसी), कन्धों, पार्श्वों (बगलों) और सिर की पीड़ा, तृष्णा (प्यास), छर्दि (वमन) और अतीसार को दूर करता है।

च. चि. ८/१११

। ॥ १११ ॥

जीवन्ती, मधुक (मुलेठी), द्राक्षा (अंगूर), कुटज के फल, शटी, पुष्करमूल, व्याघ्री, गोक्षुरक (गोखरू) और बला को

च. चि. ८/११२

। ॥ ११२ ॥

नीलोत्पल (नीला कमल), तामलकी, त्रायमाणा, कुरालभा (सम्भवतः दुरालभा) और पिप्पली को समान मात्रा में पीसकर वैद्य (उनके साथ) घृत पकाए।

च. चि. ८/११३

। ॥ ११३ ॥

यह श्रेष्ठ सर्पि (घी) व्याधियों के समूह, रोगों के स्वामी (राजयक्ष्मा) के उत्पन्न हुए ग्यारह प्रकार के रूप (लक्षणों) को दूर करता है।

च. चि. ८/११४

। ॥ ११४ ॥

बला, स्थिरा (शालपर्णी), पृश्निपर्णी और निदिग्धिका सहित बृहती को (जल में) पकाकर, उस रस (क्वाथ) में नागर (सोंठ) सहित गाय का दूध

च. चि. ८/११५

। ॥ ११५ ॥

द्राक्षा (अंगूर), खर्जूर (खजूर), सर्पि (घी) और पिप्पली के साथ पकाए गए, क्षौद्र (मधु) सहित, ज्वर और कास (खाँसी) को नष्ट करने वाले तथा स्वर (आवाज़) के लिए हितकर इस (दूध) का प्रयोग करे।

च. चि. ८/११६

। ॥ ११६ ॥

इसी प्रकार बकरी के दूध का भी प्रयोग (किया जाता है); जाङ्गल (पशु-पक्षियों के मांस के) रस (भी दिए जाते हैं); और यूष (दाल के सूप) के लिए चणक (चना), मुद्ग (मूँग) और मकुष्ठ (मोठ) निर्धारित किए गए हैं।

च. चि. ८/११७

। ॥ ११७ ॥

ज्वरों को शान्त करने वाली जो क्रियाविधि (चिकित्सा की विधि) पहले कही गई है, (वही) सर्पि (घी) सहित यक्ष्मा के रोगियों के ज्वर और दाह (जलन) में प्रशस्त (उत्तम) मानी जाती है।

च. चि. ८/११८

। ॥ ११८ ॥

कफप्रसेक (कफ के अधिक बहने) में बलवान्, श्लैष्मिक (कफ-प्रधान) मनुष्य फल (सम्भवतः मदनफल) से युक्त दूध से अथवा मधुक (मुलेठी) के रस से वमन करे

च. चि. ८/११९

। ॥ ११९ ॥

अथवा वमनीय (वमन कराने वाले) द्रव्यों के साथ सिद्ध की गई (पकाई गई), सर्पि (घी) से युक्त यवागू (पतली लपसी) से (वमन करे)। वमन हो जाने पर (वह) भोजन के समय दीपन (अग्नि को जगाने वाले द्रव्यों) सहित हल्का अन्न ग्रहण करे।

च. चि. ८/१२०

। ॥ १२० ॥

यव (जौ), गोधूम (गेहूँ), माध्वीक, सीधु, अरिष्ट, सुरा और आसव का, तथा शूल (सलाख) पर भुने हुए जाङ्गल (पशु-पक्षियों के मांस) का सेवन करता हुआ (रोगी) कफ को जीते।

च. चि. ८/१२१

। ॥ १२१ ॥

श्लेष्मा (कफ) के अति प्रसेक (अत्यधिक बहने) से वायु श्लेष्मा को (बाहर) फेंकता है। उस कफप्रसेक को विद्वान् (वैद्य) स्निग्ध और उष्ण (उपचार) से ही जीते।

च. चि. ८/१२२

। ॥ १२२ ॥

कफप्रसेक में जो चिकित्सा (बताई गई) है, वही वमि (उल्टी के रोग) में प्रशस्त (उत्तम) मानी जाती है; और हृद्य (मन को प्रिय), वात को नष्ट करने वाले तथा लघु (हल्के) अन्न-पान (भी)।

च. चि. ८/१२३

। ॥ १२३ ॥

प्रायः अग्नि के उपहत (मन्द) हो जाने के कारण (रोगी को) पिच्छा (चिकने, लसलसे पदार्थ) सहित अतिसार होता है; (उसके) मुख का स्वाद बिगड़ जाता है, और (वह) अन्न को पसन्द नहीं करता।

च. चि. ८/१२४

। ॥ १२४ ॥

उस (रोगी) के लिए (वैद्य) ऐसे योग बनाए जो अग्नि को दीप्त करने वाले, अतीसार को नष्ट करने वाले, मुख को शुद्ध करने वाले और अरुचि को दूर करने वाले हों।

च. चि. ८/१२५

। ॥ १२५ ॥

(रोगी को) नागर (सोंठ) सहित इन्द्रयव (इन्द्रजौ) तण्डुलाम्बु (चावल के जल) के साथ पिलाए; और (उसके) पच जाने पर चाङ्गेरी, तक्र (छाछ) और दाडिम (अनार) से सिद्ध की गई यवागू (पिलाए)।

च. चि. ८/१२६

। ॥ १२६ ॥

पाठा, बिल्व (बेल) और यमानी (अजवाइन) को तक्र (छाछ) के साथ मिलाकर पीना चाहिए; और दुरालभा, शृङ्गवेर (अदरक) और पाठा को सुरा के साथ (पीना चाहिए)।

च. चि. ८/१२७

। ॥ १२७ ॥

अतीसार (बार-बार पतले दस्त) को रोकने के लिए जम्बू (जामुन) और आम्र (आम) का मध्य भाग तथा बिल्व (बेल), कपित्थ (कैथ) और नागर (सोंठ) सहित, पेयामण्ड (पेया के माँड़) के साथ पीना चाहिए।

च. चि. ८/१२८

। ॥ १२८ ॥

और इन्हीं पाठा आदि तीन योगों से, सूप्य धान्य (दालों), स्नेह और अम्ल (खट्टे द्रव्य) सहित, अत्यन्त संग्रहण (मल को बाँधने वाले) खड बनवाए।

च. चि. ८/१२९

। ॥ १२९ ॥

वेतस, अर्जुन और जम्बू (जामुन) के, मृणाली और कृष्णगन्धा के, श्रीपर्णी के, मदयन्ती के और यूथिका के पल्लवों (कोमल पत्तों) के,

च. चि. ८/१३०

। ॥ १३० ॥

और मातुलुङ्ग (बिजौरा), धातकी तथा दाडिम (अनार) के (पल्लवों के) स्नेह, अम्ल और लवण से युक्त, अत्यन्त सांग्राहिक (मल को बाँधने वाले) खड बनवाए।

च. चि. ८/१३१

। ॥ १३१ ॥

चाङ्गेरी, चुक्रिका और दुग्धिका के, दधिसर (दही की मलाई) से युक्त तथा सर्पि (घी) और दाडिम (अनार) सहित खड बनवाए।

च. चि. ८/१३२

। ॥ १३२ ॥

सांग्राहिक (मल को बाँधने वाले) द्रव्यों से युक्त, लघु पाक वाले (सहज पचने वाले) मांसों के रस व्यञ्जन (साथ में खाए जाने वाले पदार्थ) के लिए प्रशस्त माने जाते हैं, और भोज्य (मुख्य भोजन) के लिए रक्तशालि (लाल शालि चावल)।

च. चि. ८/१३३

। ॥ १३३ ॥

पीने के लिए स्थिरादि पञ्चमूल (स्थिरा आदि पाँच मूलों) से शृत (उबाला हुआ) जल प्रशस्त है; (अथवा) तक्र (छाछ), चुक्रीका सहित सुरा, अथवा दाडिम (अनार) का रस।

च. चि. ८/१३४

। ॥ १३४ ॥

इस प्रकार भिन्नशकृत् (पतले मल वाले रोगियों) के लिए दीपन (अग्नि को प्रदीप्त करने वाली) और ग्राही (मल को बाँधने वाली) औषध कही गई। इसके आगे, मुख के वैरस्य (बिगड़े हुए स्वाद) को नष्ट करने वाली रोचन (रुचि जगाने वाली) (औषध) सुनो।

च. चि. ८/१३५

। ॥ १३५ ॥

दो समय मुख को धोने (साफ़ करने) वाला दन्तपवन (दातुन) चबाए; उसी प्रकार मुँह को धोए और कवलग्रह (मुँह में द्रव भरकर रखना) धारण करे।

च. चि. ८/१३६

। ॥ १३६ ॥

धूम (औषधीय धुआँ) पिए; फिर मृष्ट (स्वादिष्ट), दीपन-पाचन (अग्नि को जगाने वाले और पचाने वाले), हितकर और रुचि के अनुसार तैयार किए गए औषध, पेय और अन्न का सेवन करे।

च. चि. ८/१३७

। ॥ १३७ ॥

त्वक् (दालचीनी), मुस्त (नागरमोथा), एला (इलायची) और धान्य (धनिया); मुस्त, आमलक (आँवला) और त्वक्; दार्वी (दारुहल्दी) की छाल और यवानी (अजवाइन); तेजोह्वा तथा पिप्पली;

च. चि. ८/१३८

। ॥ १३८ ॥

यवानी (अजवाइन) और तिन्तिडीक - श्लोक के पादों में कहे गए ये पाँच मुखधावन (मुख को धोने वाले योग) रोचन (रुचि जगाने वाले) और मुख को शुद्ध करने वाले हैं।

च. चि. ८/१३९

। ॥ १३९ ॥

(इनकी) गुटिका (गोली) मुँह में रखे, अथवा (इनके) चूर्णों से मुख को शुद्ध करे, अथवा (द्रव में) घोले हुए इन (द्रव्यों) के कवलग्रह धारण करे।

च. चि. ८/१४०

। ॥ १४० ॥

सुरा, माध्वीक और सीधु (नामक मद्यों) के, तैल के, मधु (शहद) और सर्पि (घी) के, तथा क्षीर (दूध) और इक्षुरस (गन्ने के रस) के मनचाहे कवल (मुँह में) धारण करे।

च. चि. ८/१४१

। ॥ १४१ ॥

यवानी (अजवाइन), तिन्तिडीक, अम्लवेतस के साथ नागर (सोंठ), दाडिम (अनार) और खट्टा बदर (बेर), (इनमें से प्रत्येक) एक-एक कर्ष जुटाए,

च. चि. ८/१४२

। ॥ १४२ ॥

और धान्य (धनिया), सौवर्चल (काला नमक), अजाजी और वराङ्ग, (प्रत्येक) आधा-आधा कर्ष; पिप्पली एक सौ, और मरिच (काली मिर्च) दो सौ,

च. चि. ८/१४३

। ॥ १४३ ॥

और शर्करा (चीनी) चार पल, (इन सबको) एक साथ चूर्ण करे (पीस ले)। वह चूर्ण जिह्वा (जीभ) को शुद्ध करने वाला, हृद्य (हृदय को प्रिय) और भक्त (भोजन) में रुचि जगाने वाला,

च. चि. ८/१४४

। ॥ ।

हृदय, प्लीहा (तिल्ली) और पार्श्व (पसलियों) के शूल को नष्ट करने वाला, विबन्ध (मल की रुकावट) और आनाह (पेट का फूलना) मिटाने वाला, कास (खाँसी) और श्वास को हरने वाला, ग्राही (मल को बाँधने वाला) और ग्रहणी तथा अर्श (बवासीर) के विकारों को दूर करने वाला है। इस प्रकार यह यवानीषाडव है।

च. चि. ८/१४५

। ॥ १४५ ॥

तालीशपत्र, मरिच (काली मिर्च), नागर (सोंठ), पिप्पली और शुभा, (ये) क्रम से एक-एक भाग बढ़ाकर (लिए जाएँ), और त्वक् (दालचीनी) तथा एला (इलायची) आधा-आधा भाग।

च. चि. ८/१४६

। ॥ १४६ ॥

और इसमें पिप्पली से आठ गुनी सित शर्करा (सफ़ेद चीनी) डालनी चाहिए। वह चूर्ण कास (खाँसी), श्वास और अरुचि को हरने वाला, श्रेष्ठ दीपन (पाचन की अग्नि को जगाने वाला),

च. चि. ८/१४७

। ॥ १४७ ॥

हृदय के रोग, पाण्डु, ग्रहणीदोष, शोष, प्लीहा (तिल्ली) के रोग और ज्वर को दूर करने वाला, वमि (उल्टी), अतीसार (दस्त) और शूल को नष्ट करने वाला, और मूढ (रुके हुए) वात का अनुलोमन करने वाला है।

च. चि. ८/१४८

। ॥ ।

और सितोपला (मिश्री) को पकाकर इस चूर्ण की गुटिका (गोली) बनाए; क्योंकि गुटिकाएँ अग्नि के संयोग के कारण चूर्ण से अधिक लघु (हल्की) मानी गई हैं। इस प्रकार यह तालीशाद्य चूर्ण और (उसकी) गुटिकाएँ हैं।

च. चि. ८/१४९

। ॥ १४९ ॥

विधि को जानने वाला (वैद्य) सूखते जा रहे और क्षीण मांस वाले (रोगियों) के लिए मांसाद (मांस खाने वाले) पशु-पक्षियों के, (विधि से) तैयार किए हुए मांस दे, (जो) विशेष रूप से बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाले) हैं।

च. चि. ८/१५०

। ॥ १५० ॥

शोष के रोगी को बार्हिण (मोर का मांस) दे; और दूसरे (पक्षियों), गृध्रों (गिद्धों), उलूकों (उल्लुओं) और चाषों को, विधि के अनुसार भली-भाँति तैयार करके, बर्हि (मोर) के नाम से (दे)।

च. चि. ८/१५१

। ॥ १५१ ॥

काकों (कौओं) को तित्तिरि (तीतर) के नाम से, उरगों (साँपों) को वर्मि (एक प्रकार की मछली) के नाम से, और भुने हुए गण्डूपदों (केंचुओं) को भी मत्स्यान्त्र (मछली की आँतों) के नाम से दे।

च. चि. ८/१५२

। ॥ १५२ ॥

लोपाकों, बड़े नकुलों (नेवलों) और बिडालों (बिल्लियों) को, (विधि से) तैयार करके, और शृगाल (सियार) के बच्चों को वैद्य शश (खरगोश) के नाम से दिलवाए।

च. चि. ८/१५३

। ॥ १५३ ॥

सिंहों, ऋक्षों (भालुओं), तरक्षुओं, व्याघ्रों (बाघों) और इसी प्रकार के (दूसरे) मांसाद (मांस खाने वाले) पशुओं को मांस बढ़ाने के लिए मृग (हिरण) के नाम से दे।

च. चि. ८/१५४

। ॥ १५४ ॥

वैद्य गज (हाथी), खड्गी (गैंडा) और तुरङ्ग (घोड़ा) के मांस को वेशवार बनाकर, मांस बढ़ाने के लिए महिष (भैंसे) के नाम से दे।

च. चि. ८/१५५

। ॥ १५५ ॥

मांस से पुष्ट अङ्गों वाले (मांसाहारी प्राणियों) का मांस, मांस बढ़ाने में सबसे श्रेष्ठ है। तीक्ष्णता, उष्णता और लघुता के कारण (वह) प्रशस्त है, विशेषकर मृगों (वन्य पशुओं) और पक्षियों का (मांस)।

च. चि. ८/१५६

।, ॥ १५६ ॥

अभ्यास (आदत) न होने के कारण अप्रिय लगने वाले जिन मांसों का (वैद्य) प्रयोग कराए, उनके विषय में उपधा (छल) (की जाए); क्योंकि उस प्रकार वे सुख से खाए जा सकते हैं।

च. चि. ८/१५७

। ॥ १५७ ॥

जानते हुए (रोगी) घृणा के मारे (उसे) खाएगा ही नहीं, अथवा खाए हुए को फिर उगल देगा। इसलिए (वैद्य) इन मांसों को छद्म से (उनकी पहचान छिपाकर) तैयार करवाकर दिलवाए।

च. चि. ८/१५८

। ॥ १५८ ॥

बर्हि (मोर), तित्तिरि (तीतर) और दक्ष का, हंसों का, शूकर (सूअर) और उष्ट्र (ऊँट) का, तथा खर (गधे), गो (गाय) और महिष (भैंसे) का मांस, मांस बढ़ाने में सबसे श्रेष्ठ है।

च. चि. ८/१५९

। ॥ १५९ ॥

और मांसों की योनि (उत्पत्ति के वर्ग) अन्नपान (सम्बन्धी अध्याय) में आठ प्रकार की कही गई है; उसे परखकर विद्वान् वैद्य शोष के रोगी को मांस दे।

च. चि. ८/१६०

। ॥ १६० ॥

प्रसह, भूशय, आनूप, वारिज और वारिचारी (प्राणी) वात (प्रधान) शोष के रोगी को आहार के लिए उचित मात्रा में दिए जाने चाहिए।

च. चि. ८/१६१

। ॥ १६१ ॥

प्रतुद और विष्किर भी, तथा धन्व (सूखे, जाङ्गल प्रदेश) में उत्पन्न पशु और पक्षी, कफ और पित्त से ग्रस्त शोष के रोगियों के लिए प्रयोग किए जाने चाहिए।

च. चि. ८/१६२

। ॥ १६२ ॥

विधि के अनुसार अच्छी तरह पकाए गए, मन को भाने वाले और कोमल, रसीले (और) सुगन्धित इन मांसों को (रोगी) खाए।

च. चि. ८/१६३

। ॥ १६३ ॥

मांस ही खाने वाले, और माध्वीक पीने वाले भी, (तथा) नियत (संयमित) और अनल्प (बड़े, दृढ़) चित्त वाले (व्यक्ति) के शरीर में शोष देर तक नहीं टिकता।

च. चि. ८/१६४

। ॥ १६४ ॥

जो नित्य वारुणी का मण्ड (लेता) है, बहिर्मार्जन (शरीर की बाहरी सफाई) का सेवन करता है (और) वेगों को नहीं रोकता, उसमें यक्ष्मा अन्तर (प्रवेश का अवसर) नहीं पाता।

च. चि. ८/१६५

। ॥ १६५ ॥

मांस खाते हुए (रोगी) अनुपान के लिए यथायोग्य प्रसन्ना, वारुणी, सीधु, अरिष्ट, आसव (और) मधु पिए।

च. चि. ८/१६६

। ॥ १६६ ॥

मद्य (अपनी) तीक्ष्णता, उष्णता, विशदता और सूक्ष्मता के कारण स्रोतों के मुख को मथकर शीघ्र खोल देता है; उनके खुलने से सात धातुएँ

च. चि. ८/१६७

। ॥ १६७ ॥

पुष्ट होती हैं, और धातुओं के पोषण से शोष शीघ्र शान्त हो जाता है। मांसाद (मांसाहारी प्राणियों) के मांस के स्वरस में सिद्ध किया (पकाया) हुआ सर्पि (घी) प्रयोग करे

च. चि. ८/१६८

, । ॥ १६८ ॥

क्षौद्र (शहद) के साथ। अथवा दस गुने दूध के साथ सिद्ध किया हुआ सर्पि (प्रयोग करे); (अथवा) मधुरक द्रव्यों (और) दशमूल के कषायों (काढ़ों) से सिद्ध किया हुआ

च. चि. ८/१६९

।॥ १६९ ॥

क्षीर (दूध) और मांसरस से युक्त (उन कषायों से सिद्ध किया हुआ) घृत शोष को दूर करने वाला श्रेष्ठ (योग) है। पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और नागर (सोंठ) से

च. चि. ८/१७०

।॥ १७० ॥

(उन्हीं पिप्पली आदि से,) यावशूक (जौ का क्षार) सहित और दूध सहित (सिद्ध किया गया) घृत स्रोतों का शोधन करने वाला है। रास्ना, बला, गोक्षुरक (गोखरू), स्थिरा और वर्षाभू (पुनर्नवा) से साधित,

च. चि. ८/१७१

। ॥ १७१ ॥

जीवन्ती और पिप्पली के गर्भ (कल्क) वाला, दूध सहित घृत शोष को दूर करने वाला है। (घृत की) मात्रा या तो यवागू (पतली लपसी) के साथ पिए, या मधु के साथ चाटे,

च. चि. ८/१७२

। ॥ १७२ ॥

या इन सिद्ध घृतों में से (किसी की मात्रा) अन्न के साथ खाए। (शोष से) सूखते हुए (रोगियों) के लिए यह आभ्यवहारिक (खाने-पीने से सम्बन्धित) विधि बताई गई।

च. चि. ८/१७३

। ॥ १७३ ॥

इसके आगे बहिःस्पर्शन (शरीर पर बाहर से किए जाने वाले उपचार) का आश्रय लेकर विधि कही जाएगी। अच्छी तरह अभ्यङ्ग (तेल आदि की मालिश) किए हुए (रोगी) को स्नेह, दूध और जल के कोष्ठों (पात्रों) में अवगाहन कराए (डुबोकर बैठाए)।

च. चि. ८/१७४

। ॥ १७४ ॥

(यह) स्रोतों की रुकावट से छुटकारे के लिए और बल तथा पुष्टि के लिए ही (है)। (कोष्ठ से) बाहर निकले हुए (रोगी) को, मिश्रक (मिले हुए) स्नेहों से फिर से चुपड़े हुए, सुखद हाथों से

च. चि. ८/१७५

। ॥ १७५ ॥

सुख से बैठे हुए (उस) मनुष्य का मर्दन करे (उसे मले), और सुखपूर्वक (उसका) उत्सादन (उबटन) करे। जीवन्ती, शतवीर्या और विकसा, पुनर्नवा सहित,

च. चि. ८/१७६

। ॥ १७६ ॥

अश्वगन्धा, अपामार्ग (चिरचिटा), तर्कारी, मधुक (मुलेठी), बला, विदारी, सर्षप (सरसों), कुष्ठ, तण्डुल (चावल के दाने), अतसी (अलसी) का फल (बीज),

च. चि. ८/१७७

। ॥ १७७ ॥

माष (उड़द), तिल और किण्व (खमीर), (इन) सबको एक साथ चूर्ण करे। जौ के चूर्ण से तीन गुना किया हुआ, दही से युक्त और माक्षिक (मधु) सहित

च. चि. ८/१७८

। ॥ १७८ ॥

पुष्टि, वर्ण और बल देने वाला यह उत्सादन (उबटन) करना चाहिए। गौरसर्षप (सफ़ेद सरसों) के कल्क से, और सुगन्धित कल्कों से भी,

च. चि. ८/१७९

। ॥ १७९ ॥

ऋतु के अनुसार सुखद, जीवनीय औषधों के साथ शृत (उबाले हुए) जल से स्नान करे। गन्धों (सुगन्धित द्रव्यों) और मालाओं, वस्त्रों और आभूषणों से विभूषित (होकर),

च. चि. ८/१८०

। ॥ १८० ॥

स्पृश्य (छूने योग्य) वस्तुओं को छूकर, वैद्यों और द्विजों (ब्राह्मणों) सहित देवताओं की पूजा करके, इष्ट (मनचाहे) वर्ण, रस, स्पर्श और गन्ध वाला पान-भोजन (पेय और भोजन),

च. चि. ८/१८१

। ॥ १८१ ॥

प्रिय जनों द्वारा परोसे गए, मनचाहे और सुख देने वाले (उस पान-भोजन) को सुखपूर्वक खाए। (शोष से) सूखते हुए (रोगियों) के लिए एक वर्ष पुराने धान्य (अनाज) तैयार किए जाने चाहिए,

च. चि. ८/१८२

। ॥ १८२ ॥

(जो) लघु (हल्के), अहीनवीर्य (जिनका वीर्य घटा न हो), स्वादु और सुगन्धित (हों)। जो प्रहर्ष (प्रसन्नता) करने वाले हैं, वे निश्चय ही सबसे अधिक पथ्य हैं।

च. चि. ८/१८३

। ॥ १८३ ॥

और क्षतक्षीणचिकित्सित (अध्याय) में जो पथ्य बताया जाएगा, वह (भी) यक्ष्मा के रोगी के लिए, बल और मांस की वृद्धि के लिए, प्रयोग करना चाहिए।

च. चि. ८/१८४

। ॥ १८४ ॥

अभ्यङ्ग और उत्सादन से भी, अहत (नए, बिना पहने) और प्रिय वस्त्रों से, ऋतु के अनुसार विहित स्नान, अवगाहन और विमार्जन से,

च. चि. ८/१८५

। ॥ १८५ ॥

बस्तियों से, दूध और घी से, मांस से, मांसरस (मांस के शोरबे) के साथ ओदन (भात) से, मनपसन्द मद्यों से, मन को भाने वाली सुगन्धों के सेवन से

च. चि. ८/१८६

। ॥ १८६ ॥

मित्रों और मनोहर प्रमदाओं (युवा स्त्रियों) के दर्शन से, गीत और वाद्यों (बाजों) की ध्वनियों से, और प्रिय बातें सुनने से भी

च. चि. ८/१८७

। ॥ १८७ ॥

सदा हर्षित करने और आश्वासन (ढाढ़स) देने से, गुरुजनों की सेवा (समुपासना) से, ब्रह्मचर्य से, दान से, तप से, देवताओं के अर्चन (पूजा) से

च. चि. ८/१८८

। ॥ १८८ ॥

सत्य से, आचारयोग (सदाचार के पालन) से, मङ्गल्य (शुभ) उपायों से, अहिंसा से भी, और वैद्यों तथा विप्रों (ब्राह्मणों) के अर्चन (सत्कार) से भी रोगराज (राजयक्ष्मा) लौट जाता है।

च. चि. ८/१८९

। ॥ १८९ ॥

और जिस इष्टि (वैदिक यज्ञ) का प्रयोग करने से पूर्वकाल में राजयक्ष्मा जीता गया था, आरोग्य चाहने वाला वेद में विहित (बताई गई) उस इष्टि का प्रयोग करे।

च. चि. ८/१९०

- । ॥ १९० ॥

इस विषय में (सार के) दो श्लोक (हैं): (राजयक्ष्मा की) पूर्वकाल में हुई उत्पत्ति, निमित्त (कारण), प्राग्रूप (पूर्वलक्षण), रूपों (लक्षणों) का संग्रह, संक्षेप से और विस्तार से कही गई राजयक्ष्मा की चिकित्सा (भेषज)

च. चि. ८/१९१

।

(इसके) नाम का हेतु (कारण), असाध्यता (ठीक न हो सकना), साध्यता (ठीक हो सकना) और कृच्छ्रसाध्यता (कठिनाई से ठीक होना)

च. चि. ८

॥

इस प्रकार राजयक्ष्मचिकित्सित (अध्याय) में (कहे गए विषयों का) सम्पूर्ण संग्रह कहा गया।

च. चि. ८

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र (ग्रन्थ) के चिकित्सास्थान में राजयक्ष्मचिकित्सित (राजयक्ष्मा की चिकित्सा) नामक आठवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।