भारत संहिता

अध्याय ९

उन्मादचिकित्सितम्

उन्माद की चिकित्सा

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भूमिका

उन्मादचिकित्सित चरक संहिता के चिकित्सास्थान का नौवाँ अध्याय है, और इसका नाम इसके विषय से बना है: उन्माद की चिकित्सा। अध्याय उन्माद को बुद्धि, मन और स्मृति का समुद्भ्रम कहता है, यानी इन तीनों का अपने ठीक मार्ग से भटक जाना, जिसे बोलचाल में पागलपन कहते हैं। यह दो तरह से उत्पन्न होता है: निज, यानी शरीर के अपने दोषों (वात, पित्त और कफ) के बिगड़ने से, और आगन्तु, यानी बाहर से आए कारणों से। अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय का है: आरम्भ में कहा गया है कि बुद्धि, स्मृति, ज्ञान और तप के निवास पुनर्वसु (आत्रेय) ने अग्निवेश के पूछने पर उन्माद के हेतु, लक्षण और औषध बताए।

अध्याय पहले निज उन्माद के कारण गिनाता है: विरुद्ध, दूषित और अपवित्र भोजन, देवताओं, गुरुओं और द्विजों का अपमान, भय या हर्ष से मन पर लगी चोट, और विषम चेष्टाएँ। इनसे दुर्बल मन वाले व्यक्ति के दोष बिगड़कर बुद्धि के निवास, हृदय, को दूषित करते हैं, मन को वहन करने वाले स्रोतों में जा बैठते हैं और चित्त को मोहित कर देते हैं। हर उन्माद में बुद्धि का विभ्रम, मन की चंचलता, व्याकुल दृष्टि, अधीरता, असम्बद्ध वाणी और हृदय का सूनापन मिलते हैं। वात से हुए उन्माद में रोगी बिना अवसर के हँसता, नाचता, गाता और रोता है, और रूखा और दुबला हो जाता है; पित्त से हुए में वह असहनशील और क्रोधी रहता है, नग्न रहना चाहता है और छाया, ठण्डा अन्न और जल चाहता है; कफ से हुए में उसकी वाणी और चेष्टा धीमी पड़ जाती है, भोजन में अरुचि होती है, नींद बहुत आती है और लार बहती है। तीनों दोषों के एक साथ बिगड़ने (सन्निपात) से हुआ उन्माद सबसे घोर है: उसमें सबके लक्षण होते हैं, उसकी चिकित्सा की विधियाँ आपस में विरुद्ध पड़ती हैं, और अध्याय उसे त्याग देने योग्य कहता है।

आगन्तु उन्माद का कारण देवताओं, ऋषियों, गन्धर्वों, पिशाचों, यक्षों, राक्षसों और पितरों का आक्रमण बताया गया है, और साथ में नियम और व्रत आदि का गलत ढंग से पालन और पिछले जन्म का कर्म। ऐसे रोगी की वाणी, पराक्रम, ज्ञान और बल मनुष्य से परे दिखते हैं, और उन्माद का समय निश्चित नहीं रहता। अध्याय के अनुसार ये ग्रह, यानी पकड़ने वाले, देह को दूषित किए बिना और अदृश्य रहकर उसमें वैसे ही प्रवेश करते हैं जैसे प्रतिबिम्ब दर्पण में और धूप सूर्यकान्त मणि में। फिर आठ ग्रहों से हुए उन्माद की पहचान दी गई है, जो देवताओं, गुरुओं और ऋषियों, पितरों, गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों, ब्रह्मराक्षसों और पिशाचों से होता है, और यह भी कि इनमें से कौन प्रायः किस तिथि को, किस स्वभाव के मनुष्य पर आता है; ग्रह असंख्य कहे गए हैं, पर ये आठ सबसे अधिक प्रकट हैं। जो ग्रह हिंसा चाहते हैं, उनसे हुआ उन्माद असाध्य बताया गया है, जिसे वैद्य छोड़ दे; जो रति (आनन्द-क्रीड़ा) या अर्चना (पूजा) चाहते हैं, उनसे हुए उन्माद की चिकित्सा मन्त्र, औषध, उपहार और बलि से बताई गई है।

चिकित्सा निज उन्माद से आरम्भ होती है। वात से हुए उन्माद में पहले स्नेहपान कहा गया है; कफ और पित्त से हुए में स्नेहन और स्वेदन के बाद वमन और विरेचन, फिर संसर्जन क्रम (हल्के आहार से धीरे-धीरे सामान्य भोजन पर लौटना), और उसके बाद निरूह, स्नेहबस्ति और सिर का विरेचन। अध्याय के अनुसार हृदय, इन्द्रियाँ, सिर और कोष्ठ शुद्ध होने पर मन निर्मल होता है और स्मृति और होश लौट आते हैं; तब भी आचरण न सुधरे, तो तीक्ष्ण नस्य और अञ्जन, ताडन, और बाँधकर अँधेरे कमरे में रखना कहा गया है। फिर औषधियों के योग आते हैं: हींग और गोमूत्र वाला एक घृत, कल्याणक, महाकल्याणक और महापैशाचिक घृत, दो लशुनाद्य घृत, और अनेक नस्य, अञ्जन, वर्तियाँ, एक अगद और धूम। पुराने घी की विशेष प्रशंसा है: दस वर्ष रखा घी पुराण कहलाता है, उससे अधिक पुराना प्रपुराण, और सौ वर्ष रखे घी के लिए कोई रोग असाध्य नहीं बताया गया है। पित्त वाले उन्माद के लिए तिक्तक और जीवनीय घृत, मिश्रक स्नेह और ठण्डा, मीठा अन्न-पान अलग से कहे गए हैं, और कनपटी के पास सिरा खोलकर रक्त निकालना भी। मन पर सीधे काम करने वाले उपाय भी हैं: मित्र का ढाढ़स, किसी प्रिय के नाश की बात, अद्भुत वस्तुएँ दिखाना, और बाँधने, कोड़े मारने और वध की धमकी से डराने जैसे कठोर उपाय, जिनका कारण अध्याय यह देता है कि शरीर के कष्ट के भय से प्राणों का भय बड़ा है; और काम, शोक, भय, क्रोध, हर्ष, ईर्ष्या और लोभ से हुए उन्माद को इन्हीं भावों को एक-दूसरे के विरोध में रखकर शान्त करने को कहा गया है।

देवताओं, ऋषियों, पितरों और गन्धर्वों से हुए उन्माद में तीक्ष्ण अञ्जन और कठोर उपाय वर्जित हैं; वहाँ घृत-पान जैसी मृदु चिकित्सा, पूजा, बलि, मन्त्र, होम, जप, स्वस्त्ययन, नियम और प्रायश्चित्त बताए गए हैं, और भूतों के अधिपति देव की और रुद्र जी के प्रमथ नामक गणों की पूजा भी। अपस्मार की चिकित्सा में जो कहा जाएगा, वह भी उन्माद में करने को कहा गया है, क्योंकि दोनों के हेतु और दूष्य समान हैं। अध्याय के अनुसार जो मांस और मद्य से दूर रहता है, हितकर आहार लेता है, संयमी, पवित्र और सत्त्ववान् है, उसे न निज उन्माद होता है न आगन्तु; और इन्द्रियों, बुद्धि, आत्मा और मन का निर्मल होना और धातुओं का स्वाभाविक अवस्था में लौटना उन्माद के चले जाने की पहचान है। इस प्रकार अध्याय की चिकित्सा में शरीर का शोधन और घृत, मन को सँभालने वाले उपाय, और आगन्तु उन्माद में पूजा और मन्त्र, सब साथ चलते हैं। पुष्पिका बताती है कि यह अध्याय चरक के संस्करण में नहीं मिलता था और दृढबल ने इसे पूरा किया।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ९८)

तत्र श्लोकः-उन्मादानां समुत्थानं लक्षणं सचिकित्सितम्।निजागन्तुनिमित्तानामुक्तवान् भिषगुत्तमः॥

श्लोक ९८ →

इस विषय में (संग्रह का) श्लोक (है): श्रेष्ठ भिषक् (वैद्य) ने निज और आगन्तु निमित्तों (कारणों) से होने वाले उन्मादों का समुत्थान (उत्पत्ति), लक्षण और चिकित्सा कही।

मुख्य शब्द (२६) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

स्वस्थ
स्वस्थ - अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित; निरोगी
विस्तार

शब्द-रचना: स्व (अपने) + स्थ (स्थित)।

अर्थ: जो अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो, अर्थात् निरोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ का भी आश्रय है (सू. १/२४), और कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त - स्वास्थ्य की रक्षा - के लिए माने गए हैं (सू. १/६७)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

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च. चि. ९/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम उन्मादचिकित्सित (उन्माद की चिकित्सा सम्बन्धी अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. चि. ९/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. चि. ९/३

। ॥ ३ ॥

बुद्धि, स्मृति, ज्ञान और तप के निवास (-स्थान), प्राणियों को शरण देने वाले पुनर्वसु ने, पूछे जाने पर, (उचित) समय पर अग्निवेश को उन्माद के हेतु, आकृति (लक्षण) और भेषज (औषध) बताए।

च. चि. ९/४

। ॥ ४ ॥

विरुद्ध, दुष्ट (दूषित) और अशुचि (अपवित्र) भोजन, देवताओं, गुरुओं और द्विजों का प्रधर्षण (अपमान), भय और हर्ष से होने वाला मन का अभिघात (आघात), और विषम चेष्टाएँ - (ये) उन्माद के हेतु हैं।

च. चि. ९/५

। ॥ ५ ॥

उन (कारणों) से अल्पसत्त्व (दुर्बल मन वाले) व्यक्ति के मल (दोष) प्रदुष्ट (बिगड़े हुए) होकर, बुद्धि के निवास (-स्थान) हृदय को दूषित करके और मनोवह (मन को वहन करने वाले) स्रोतों में स्थित होकर, (उस) मनुष्य के चित्त को शीघ्र मोहित कर देते हैं।

च. चि. ९/६

। ॥ ६ ॥

बुद्धि का विभ्रम, सत्त्व (मन) की चंचलता, व्याकुल दृष्टि, अधीरता, असम्बद्ध वाणी और हृदय का शून्य होना - (यह) उन्माद रोग का सामान्य लक्षण है।

च. चि. ९/७

। ॥ ७ ॥

वह मूढ चित्त वाला (व्यक्ति) न सुख पाता है, न दुःख, न आचार और धर्म, फिर शान्ति तो कहाँ से (पाए)? स्मृति, बुद्धि और संज्ञा (चेतना) से रहित यह (व्यक्ति) इधर-उधर भटकता है, और (इसका) चित्त भी।

च. चि. ९/८

। ॥ ८ ॥

बुद्धि, मन और स्मृति के समुद्भ्रम (भारी विचलन) को, (जो) आगन्तु (बाहरी) और निज (भीतरी) कारणों से उत्पन्न होता है, उन्माद कहते हैं। उसकी पाँच प्रकार की उत्पत्ति, लक्षण और चिकित्सा तो मैं अलग-अलग बताऊँगा।

च. चि. ९/९

। ॥ ९ ॥

रूक्ष (रूखे), अल्प और शीत अन्न, विरेक (विरेचन), धातुओं के क्षय और उपवास से अत्यधिक बढ़ा हुआ अनिल (वात), चिन्ता आदि से ग्रस्त हृदय को दूषित करके, बुद्धि और स्मृति को भी शीघ्र बिगाड़ देता है।

च. चि. ९/१०

। ॥ १० ॥

बिना अवसर के हँसना, मुस्कराना, नाचना, गाना, वाणी और अंगों का विक्षेपण (बेतहाशा बोलना और अंग इधर-उधर फेंकना) और रोना; पारुष्य (रूखापन), कार्श्य (दुबलापन) और अरुण (लाल-भूरा) वर्ण; और (भोजन) पच जाने पर (रोग का) बल - (ये) अनिलज (वात से उत्पन्न उन्माद) के लक्षण हैं।

च. चि. ९/११

। ॥ ११ ॥

अजीर्ण (अपच), कटु, अम्ल, विदाही और अशीत (गरम) भोज्य पदार्थों से संचित हुआ, बढ़े हुए वेग वाला पित्त, अनात्मक (अपने पर वश न रखने वाले) व्यक्ति के हृदय में आश्रय लेकर, पहले की तरह शीघ्र ही अत्यन्त उग्र उन्माद उत्पन्न कर देता है।

च. चि. ९/१२

। ॥ १२ ॥

अमर्ष (असहनशीलता), संरम्भ (आवेश), नग्न रहने की प्रवृत्ति, संतर्जन (डाँटना-धमकाना), अतिद्रवण (बहुत भागना-दौड़ना), (शरीर की) उष्णता, रोष (क्रोध), घनी छाया, शीतल अन्न और जल की इच्छा, और पीली आभा - (ये) पित्त से उत्पन्न (उन्माद) के लक्षण हैं।

च. चि. ९/१३

। ॥ १३ ॥

सम्पूरण (अधिक खा-पीकर शरीर को भर देने) से, मन्द चेष्टा वाले (कम परिश्रम करने वाले) व्यक्ति के मर्म में ऊष्मा सहित बहुत बढ़ा हुआ कफ, बुद्धि और स्मृति को भी बिगाड़कर, चित्त को मोहित करता हुआ विकार (उन्माद) उत्पन्न कर देता है।

च. चि. ९/१४

। ॥ १४ ॥

वाणी और चेष्टा का मन्द (धीमा) होना, अरोचक (भोजन में अरुचि), स्त्रियों और एकान्त का प्रिय लगना, अति निद्रा, छर्दि (उल्टी), लाला (लार का बहना), और (वह) बल भोगता है, और नख आदि की सफ़ेदी: (ये) कफात्मक (कफ से होने वाले उन्माद) के (लक्षण हैं)।

च. चि. ९/१५

। ॥ १५ ॥

जो (उन्माद) सन्निपात से उत्पन्न होता है, अत्यन्त घोर (भयंकर) है, और वह सभी हेतुओं के एक साथ मिलने से होता है, (वह) सभी रूपों (लक्षणों) को धारण करता है। ऐसा (उन्माद), जिसके भैषज्य (उपचार) की विधियाँ (आपस में) विरुद्ध हैं, विवर्ज्य (त्याग देने योग्य) है।

च. चि. ९/१६

। ॥ १६ ॥

देवताओं, ऋषियों, गन्धर्वों, पिशाचों, यक्षों, राक्षसों और पितरों के अभिधर्षण (आक्रमण), (तथा) मिथ्या (गलत ढंग से) किए गए नियम, व्रत आदि, और पूर्व देह (पिछले जन्म) में (किया गया) कर्म, (ये उन्माद के) आगन्तु (बाहरी) हेतु (हैं)।

च. चि. ९/१७

। ॥ १७ ॥

जो (व्यक्ति) वाणी, विक्रम (पराक्रम), वीर्य (शक्ति) और चेष्टा में अमर्त्य (मनुष्य से परे) हो, (और) ज्ञान आदि, विज्ञान और बल आदि में (भी), और जिसके उन्माद का काल (समय) अनियत (निश्चित नहीं) हो, उसके उस (उन्माद) को भूतोत्थ (भूतों से उत्पन्न) उन्माद कहना चाहिए।

च. चि. ९/१८

। ॥ १८ ॥

देव आदि पुरुष (मनुष्य) की देह को दूषित किए बिना, बल्कि अपने गुणों और प्रभावों से, अदृश्य (रहकर) वेग से (उसमें) प्रवेश करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे छाया (प्रतिबिम्ब) और आतप (धूप) दर्पण और सूर्यकान्त (मणि) में (प्रवेश करते हैं)।

च. चि. ९/१९

। ॥ १९ ॥

आघात (आक्रमण) का काल (समय), पूर्वरूप सहित, निदान (स्थान) में कहा ही जा चुका है। अब सुर (देवता) आदि से (होने वाले) उन्माद के रूपों (लक्षणों) को, और उनके काल (आक्रमण के समय) को और उनके गम्य पुरुषों (जिन पुरुषों पर वे आक्रमण करते हैं) को अलग-अलग जानो।

च. चि. ९/२०

; ; ; ( ) ; ; ; ; ॥ २० ॥

वह इस प्रकार है - जिसकी दृष्टि सौम्य (शान्त) हो, जो गम्भीर और अधृष्य (जिसे दबाया न जा सके) हो, क्रोध न करे, जिसे नींद और भोजन की इच्छा न हो, जिसके पसीना, मूत्र, मल और वात थोड़े हों, जिसकी गन्ध शुभ हो और मुख खिले कमल जैसा हो, उसे (वैद्य) देव से उन्मत्त जाने; जिसकी चेष्टा, आहार और वाणी गुरुओं, वृद्धों, सिद्धों और ऋषियों के अभिशाप, अभिचार और अभिध्यान के अनुरूप हों, उसे उन (गुरु आदि) से उन्मत्त जाने; जिसकी दृष्टि अप्रसन्न हो, जो (किसी की ओर) न देखे, उनींदा रहे, जिसकी वाणी रुकी हुई हो, जिसे अन्न की इच्छा न हो और जो अरोचक और अविपाक से घिरा हो, उसे पितरों से उन्मत्त जाने; (जो उग्र, दुस्साहसी, तीखे स्वभाव वाला, गम्भीर और अधृष्य हो,) जिसे मुखवाद्य, नृत्य, गीत, अन्न-पान, स्नान, माला, धूप और सुगन्ध में रुचि हो, जिसे लाल वस्त्र, बलिकर्म, हास्य, कथा और अनुयोग प्रिय हों और जिसकी गन्ध शुभ हो, उसे गन्धर्व से उन्मत्त जाने; जो बार-बार सोए, रोए और हँसे, जिसे नृत्य, गीत, वाद्य, पाठ, कथा, अन्न-पान, स्नान, माला, धूप और सुगन्ध में रुचि हो, जिसकी आँखें लाल और चंचल हों, जो द्विजातियों और वैद्यों की निन्दा करे और रहस्य की बातें कहे, उसे यक्ष से उन्मत्त जाने; जिसकी नींद नष्ट हो गई हो, जो अन्न-पान से द्वेष करे, भोजन न करने पर भी अत्यन्त बलवान् हो, जिसे शस्त्र, रक्त, मांस और लाल मालाओं की इच्छा हो और जो (दूसरों को) डराए-धमकाए, उसे राक्षस से उन्मत्त जाने; जिसमें अट्टहास और नृत्य प्रधान हों, उसे देवों, विप्रों और वैद्यों के प्रति द्वेष और अवज्ञा से, स्तुति, वेद, मन्त्र और शास्त्र के वचन बोलने से, तथा लकड़ी आदि से अपने को पीड़ा देने से ब्रह्मराक्षस से उन्मत्त जाने; जिसका चित्त अस्वस्थ हो, जो कहीं ठिकाना न पाए, नाचे, गाए और हँसे, सम्बद्ध-असम्बद्ध बकता रहे, जिसे कूड़े के ढेरों, गलियों के मैले चिथड़ों, तिनकों, पत्थरों और लकड़ियों पर चढ़ने में रुचि हो, जिसका स्वर फटा और रूखा हो, जो नंगा रहे, इधर-उधर दौड़े, एक जगह न ठहरे, अपने दुःख सुनाता रहे और जिसकी स्मृति नष्ट हो गई हो, उसे पिशाच से उन्मत्त जाने।

च. चि. ९/२१

, , , , , , ; ॥ २१ ॥

इस विषय में (यह जानना चाहिए कि) पवित्र आचरण वाले, तप और स्वाध्याय में निपुण मनुष्य पर प्रायः शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को और त्रयोदशी को, छिद्र (कोई चूक या अवसर) देखकर, देवता आक्रमण करते हैं; स्नान, पवित्रता और एकान्त का सेवन करने वाले, धर्मशास्त्र और श्रुति के वचनों में कुशल (मनुष्य) पर प्रायः षष्ठी और नवमी को ऋषि; माता, पिता, गुरु, वृद्धों, सिद्धों और आचार्यों की सेवा करने वाले (मनुष्य) पर प्रायः दशमी और अमावस्या को पितर; गन्धर्व स्तुति, गीत और वाद्य में रुचि रखने वाले, पराई स्त्री, सुगन्ध और माला के प्रेमी, पवित्र आचरण वाले (मनुष्य) पर प्रायः द्वादशी और चतुर्दशी को; सत्त्व, बल, रूप, गर्व और शौर्य से युक्त, माला, अनुलेपन और हँसी-विनोद के प्रेमी, बहुत बोलने वाले (मनुष्य) पर प्रायः शुक्ल पक्ष की एकादशी को और सप्तमी को यक्ष; स्वाध्याय, तप, नियम, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा देवता, यति और गुरु की पूजा में अरुचि रखने वाले, पवित्रता से भ्रष्ट, ब्राह्मण या ब्राह्मण न होकर भी अपने को ब्राह्मण कहने वाले, अपने को शूर मानने वाले, देवालय के जल में क्रीड़ा करने में रुचि रखने वाले (मनुष्य) पर प्रायः शुक्ल पक्ष की पञ्चमी को और पूर्ण चन्द्रमा के दर्शन के समय ब्रह्मराक्षस; और राक्षस तथा पिशाच तो हीन सत्त्व वाले, चुगलखोर, स्त्रियों में आसक्त, लोभी और धूर्त (मनुष्य) पर प्रायः द्वितीया, तृतीया और अष्टमी को (आक्रमण करते हैं); इस प्रकार असंख्य ग्रहों में से ये आठ, जो सबसे अधिक प्रकट हैं, बताए गए हैं।

च. चि. ९/२२

; ; ॥ २२ ॥

परन्तु इन सभी (उन्मादों) में भी, जो (रोगी) क्रोध के आवेग से दोनों हाथ उठाकर बेझिझक दूसरों पर या अपने ऊपर (उन्हें) गिराए (यानी प्रहार करे), उसे निश्चय ही असाध्य जानना चाहिए; इसी प्रकार जिसकी आँखें आँसुओं से भरी हों, जिसके मेढ्र (लिङ्ग) से रक्त बह रहा हो, जिसकी जीभ कटी हुई हो, जिसकी नाक बह रही हो, जिसकी चमड़ी कट-फट रही हो, जिसकी वाणी रुकती न हो, जो लगातार कराहता रहे, जिसका रंग बिगड़ गया हो, जो प्यास से पीड़ित हो और जिससे दुर्गन्ध आती हो, उसे हिंसा चाहने वाले (ग्रह) से उन्मत्त हुआ जानना चाहिए; (वैद्य) उसे छोड़ दे।

च. चि. ९/२३

।॥ २३ ॥

परन्तु रति (आनन्द-क्रीड़ा) और अर्चना (पूजा) की कामना वाले (ग्रहों) से उन्मत्त हुए दोनों (प्रकार के रोगियों) को वैद्य (उनके) अभिप्राय और आचरण से पहचानकर, उस (कामना) के अङ्गरूप उपहार और बलि से युक्त मन्त्र और भैषज्य (औषध) की विधि से (उनकी) चिकित्सा करे।

च. चि. ९/२४

॥ २४ ॥

अब हम निज और आगन्तु कारणों से होने वाले दोनों ही (प्रकार के) उन्मादों की भेषज-विधि (चिकित्सा की विधि) की संक्षेप और विस्तार से आगे व्याख्या करेंगे।

च. चि. ९/२५

। ॥ २५ ॥

वातज (वात से उत्पन्न) उन्माद में विशेषवित् (भेदों को जानने वाला वैद्य) पहले स्नेहपान कराए; परन्तु जिसमें मार्ग आवृत (ढका हुआ) हो, उसमें स्नेह सहित मृदु शोधन करे।

च. चि. ९/२६

। ॥ २६ ॥

कफ और पित्त से उत्पन्न (उन्माद) में भी आरम्भ में, स्निग्ध और स्विन्न किए गए (रोगी) का विरेचन सहित वमन करना चाहिए; (उसके) शुद्ध हो जाने पर संसर्जन क्रम (अपनाना चाहिए)।

च. चि. ९/२७

। ॥ २७ ॥

उसके बाद दोष के अनुसार निरूह, स्नेहबस्ति और सिर का विरेचन करे; (और) इनका अधिकता से (बार-बार) प्रयोग करे।

च. चि. ९/२८

। ॥ २८ ॥

वमन आदि से हृदय, इन्द्रियाँ, सिर और कोष्ठ भली-भाँति शुद्ध हो जाने पर (रोगी) मन की प्रसन्नता (निर्मलता) पाता है, और स्मृति तथा संज्ञा (होश) को प्राप्त करता है।

च. चि. ९/२९

। ॥ २९ ॥

शुद्ध हुए (रोगी) का आचरण (फिर भी) बिगड़ा रहने पर तीक्ष्ण नावन और अञ्जन, तथा मन, बुद्धि और देह को झकझोरने वाला ताडन हितकर है।

च. चि. ९/३०

। ॥ ३० ॥

जो (रोगी) अविनय (अनुचित आचरण) में लगा रहे, उसे अत्यन्त दृढ़ (परन्तु) सुखद पट्टों से बाँधकर, लोहे, लकड़ी आदि से रहित अँधेरे कमरे में रोककर भी रखना चाहिए।

च. चि. ९/३१

। ॥ ३१ ॥

तर्जन (धमकाना), त्रासन (डराना), दान (कुछ देना), हर्षण (प्रसन्न करना), सान्त्वन (ढाढ़स बँधाना), भय और विस्मय (आश्चर्य), विस्मृति के कारण मन को (उसकी) प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) में ले आते हैं।

च. चि. ९/३२

। ॥ ३२ ॥

प्रदेह (गाढ़ा लेप), उत्सादन (उबटन), अभ्यङ्ग (मालिश) और धूम (औषधियों का धुआँ), तथा मन, बुद्धि, स्मृति और संज्ञा को जगाने वाला सर्पि (घृत) का पान प्रयोग करना चाहिए।

च. चि. ९/३३

। ॥ ३३ ॥

आगन्तु (उन्माद) के लिए सर्पि (घृत) का पान आदि और मन्त्र आदि की विधि मानी गई है। इसलिए (अब) उन्माद का नाश करने वाले सिद्धतम (सबसे अधिक परखे हुए) योगों को सुनो।

च. चि. ९/३४

। ॥ ३४ ॥

(प्रत्येक) दो पल के भाग वाले हिङ्गु (हींग), सौवर्चल और व्योष (त्रिकटु) के साथ, (घृत से) चार गुने गोमूत्र (गायों के मूत्र) में सिद्ध (पकाया गया) एक आढक घृत उन्माद का नाश करने वाला है।

च. चि. ९/३५

। ॥ ३५ ॥

विशाला, त्रिफला, कौन्ती, देवदारु (देवदार), एलवालुक, स्थिरा, नत, दोनों रजनी (हरिद्रा और दारुहरिद्रा), दोनों सारिवा, प्रियङ्गुका,

च. चि. ९/३६

। ॥ ३६ ॥

नीलोत्पल (नीला कमल), एला (इलायची), मञ्जिष्ठा (मजीठ), दन्ती, दाडिम (अनार), केशर, तालीशपत्र, बृहती (बड़ी कटेरी), मालती का नया (ताज़ा) फूल,

च. चि. ९/३७

। ॥ ३७ ॥

विडङ्ग (वायविडंग) और पृश्निपर्णी, कुष्ठ (कूठ), चन्दन और पद्मक (पद्माख): (प्रत्येक) एक अक्ष (मात्रा) वाले इन अट्ठाईस कल्कों से

च. चि. ९/३८

। ॥ ३८ ॥

चार गुने जल में एक प्रस्थ घृत को भली-भाँति पकाए। (यह घृत) अपस्मार, ज्वर, कास (खाँसी), शोष, अनल (पाचन की अग्नि) के मन्द होने पर, (और) क्षय में,

च. चि. ९/३९

। ॥ ३९ ॥

वातरक्त, प्रतिश्याय (जुकाम), तृतीयक और चतुर्थक (ज्वर) में, छर्दि (उल्टी), अर्श (बवासीर) और मूत्रकृच्छ्र में, और विसर्प से पीड़ित (रोगियों) में,

च. चि. ९/४०

। ॥ ४० ॥

कण्डू (खुजली), पाण्डु रोग, उन्माद, विष और मेह के रोगों में, और उन (लोगों) के लिए जिनका चित्त भूतों से पीड़ित है, जो गद्गद (रुँधे स्वर वाले) हैं और जो अचेत हैं

च. चि. ९/४१

। ॥ ४१ ॥

तथा वन्ध्या स्त्रियों के लिए (यह घी) प्रशस्त है; यह धन्य (मंगलकारी) है, आयु और बल देने वाला है, अलक्ष्मी (दुर्भाग्य), पाप और राक्षसों का नाश करने वाला है, (और) सब ग्रहों का विनाश करने वाला है।

च. चि. ९/४२

। । ॥ ४२ ॥

यह कल्याणक (नामक) घी पुंसवनों (पुत्र-प्राप्ति के उपायों) में भी श्रेष्ठ है। इस प्रकार कल्याणक घृत (कहा गया)। इन्हीं (द्रव्यों) में से स्थिरा आदि इक्कीस (द्रव्यों) को जल में पकाकर

च. चि. ९/४३

।॥ ४३ ॥

उस रस (काढ़े) में, (घी से) चार गुने गृष्टि के दूध (एक बार ब्याई गाय के दूध) में घी पकाए, वीरा, आर्द्र (ताज़ा) माष, काकोली, स्वयंगुप्ता (कौंच), ऋषभक, ऋद्धि

च. चि. ९/४४

। ॥ ।

और मेदा के, (इन सब) समान (मात्रा वाले) कल्कों के साथ; वह महान् कल्याणक (महाकल्याणक) होगा। यह विशेष रूप से बृंहणीय (शरीर को पुष्ट करने वाला) है और सन्निपात को दूर करने में उत्तम है। इस प्रकार महाकल्याणक घृत (कहा गया)।

च. चि. ९/४५

। ॥ ४५ ॥

जटिला, पूतना, केशी, चारटी, मर्कटी, वचा (वच), त्रायमाणा, जया, वीरा, चोरक, कटुरोहिणी (कुटकी)

च. चि. ९/४६

। ॥ ४६ ॥

वयःस्था, शूकरी, छत्रा, अतिच्छत्रा, पलङ्कषा, महापुरुषदन्ता और कायस्था, दोनों नाकुली

च. चि. ९/४७

। ॥ ४७ ॥

कटम्भरा, वृश्चिकाली और स्थिरा को लाकर, उनसे सिद्ध किया गया घी चातुर्थक (ज्वर), उन्माद, ग्रह और अपस्मार का नाश करने वाला है।

च. चि. ९/४८

। ॥ ।

महापैशाचिक नाम का यह घी अमृत के समान है; यह बुद्धि और स्मृति को बढ़ाने वाला है, और बच्चों के अंगों को बढ़ाने वाला भी है। इस प्रकार महापैशाचिक घृत (कहा गया)।

च. चि. ९/४९

। ॥ ४९ ॥

सौ लशुन, तीस अभया (हरीतकी), त्र्यूषण (त्रिकटु) का एक पल, गायों के चमड़े की मसी (जलाकर बनी राख) का एक प्रस्थ, (और) दूध तथा मूत्र का दो आढक

च. चि. ९/५०

। ॥ ५० ॥

पुराने घी का एक प्रस्थ इन (द्रव्यों) के साथ सिद्ध करके, और ठण्डा होने पर (उसमें) एक पल हिङ्गु (हींग) का चूर्ण तथा एक माणिका मधु डालकर, (उसका) प्रयोग करे।

च. चि. ९/५१

। ॥ ।

वह (घी) पीने, अभ्यञ्जन (शरीर पर मलने) और नावन (नाक में डालने) के द्वारा दोषों से और आगन्तु (बाहरी कारणों) से उत्पन्न उन्मादों को, विषम ज्वरों को और अपस्मारों को शीघ्र नष्ट करता है। इस प्रकार लशुनाद्य घृत (कहा गया)।

च. चि. ९/५२

। ॥ ५२ ॥

अविनष्ट (जो खराब न हुआ हो ऐसे) लशुन की आधी तुला, छिलका उतारकर, (और) उसका आधा दशमूल, दो आढक जल में पकाए।

च. चि. ९/५३

। ॥ ५३ ॥

(काढ़े के) चौथाई शेष रह जाने पर, एक प्रस्थ घी तथा लशुन का रस, कोल, मूलक (मूली), वृक्षाम्ल, मातुलुङ्ग और आर्द्रक (अदरक) के रसों के साथ

च. चि. ९/५४

।॥ ५४ ॥

(साथ ही) दाडिम (अनार) के रस, सुरा, मस्तु और काञ्जिक, इन अम्ल (खट्टे) द्रवों से, जो उसके आधे-आधे परिमाण में हों, और त्रिफला, दारु, लवण, व्योष तथा दीप्यक से (उस घृत को) पकाए

च. चि. ९/५५

। ॥ ५५ ॥

और यवानी (अजवाइन), चव्य, हिङ्गु (हींग) तथा अम्लवेतस से, जो आधा-आधा पल हों, (पकाए)। इस (प्रकार) सिद्ध किए हुए (घृत) को पिए, जो शूल, गुल्म, अर्श और जठर (उदर रोग) को दूर करने वाला है

च. चि. ९/५६

। ॥ ।

(यह घृत) ब्रध्न, पाण्डु रोग, प्लीहा (तिल्ली) के रोग, योनि-दोष, ज्वर और कृमियों को, वात और श्लेष्मा (कफ) के सब रोगों को, तथा उन्मादों को दूर करता है। इस प्रकार दूसरा लशुनाद्य घृत (कहा गया)।

च. चि. ९/५७

। ॥ ५७ ॥

हिङ्गु (हींग) से, और कायस्था तथा वयःस्था सहित हिङ्गुपर्णी से सिद्ध (पकाया हुआ) सर्पि (घृत) हितकर है; वैसे ही वयःस्था, हिङ्गु और चोरक से (सिद्ध घृत भी हितकर है)।

च. चि. ९/५८

। ॥ ५८ ॥

(रोगी को) पुराना घृत पिलाए, केवल (अकेला) या इन (औषधियों) से सिद्ध किया हुआ। उत्तम (सबसे बड़ी) मात्रा पिलाकर (उसे) श्वभ्र (गड्ढे) में, अथवा घर में भी, बन्द करके रखे।

च. चि. ९/५९

। ॥ ५९ ॥

और वैद्य उस (रोगी) को विशेष रूप से पुराना घृत पिलाए। (वह घृत) त्रिदोष का नाश करने वाला है, और पवित्र होने के कारण विशेष रूप से ग्रहों का नाश करने वाला है।

च. चि. ९/६०

। ॥ ६० ॥

जो घृत दस वर्ष तक रखा रहा हो, वह पुराण (पुराना) होता है; वह पीने पर गुण और कर्म में अधिक, चखने पर कटु और तिक्त, और उग्र (तीव्र) गन्ध वाला होता है।

च. चि. ९/६१

। ॥ ६१ ॥

वह लाक्षा (लाख) के रस जैसा और शीत होता है; वह निश्चय ही सब ग्रहों को दूर करता है, मेध्य है, और विरेचनों में श्रेष्ठ है। इससे आगे (अधिक समय तक रखा घृत) प्रपुराण (बहुत पुराना) होता है।

च. चि. ९/६२

। ॥ ६२ ॥

जो (घृत) सौ वर्ष तक रखा रहा हो, उसके लिए कोई भी (रोग) असाध्य नहीं है। देखे, छुए या सूँघे जाने पर वह निश्चय ही सब ग्रहों को दूर करता है।

च. चि. ९/६३

। ॥ ६३ ॥

(यह घृत) अपस्मार, ग्रह और उन्माद वाले (रोगियों) के लिए विशेष रूप से प्रशस्त है। अथवा, (रोगी के) वश में न आने पर, इन औषध-योगों को

च. चि. ९/६४

। ॥ ६४ ॥

अञ्जन, उत्सादन, आलेप, नावन आदि में प्रयुक्त करे। शिरीष (सिरस), मधुक, हिङ्गु (हींग), लशुन (लहसुन), तगर, वचा (वच)

च. चि. ९/६५

। ॥ ६५ ॥

और कुष्ठ, बस्त (बकरे) के मूत्र में पीसा हुआ (यह योग) नावन और अञ्जन हो। उसी प्रकार व्योष, दोनों हरिद्रा (हल्दी और दारुहल्दी), मञ्जिष्ठा (मजीठ), हिङ्गु (हींग), सर्षप (सरसों)

च. चि. ९/६६

। ॥ ६६ ॥

और शिरीष के बीज, (यह योग) उन्माद, ग्रह और अपस्मार का नाश करने वाला है। अपामार्ग (चिरचिटा), हिङ्गु (हींग), आल और हिङ्गुपत्रिका को बराबर (मात्रा में) पीसकर

च. चि. ९/६७

।॥ ६७ ॥

जिसमें मरिच (काली मिर्च) आधा भाग हो, ऐसी वर्ति (बत्ती) गाय और शृगाल (सियार) के पित्त के साथ बनाई जाए। उस (वर्ति) से अञ्जन लगाए: अपस्मार, भूत, उन्माद और ज्वर से पीड़ित (रोगियों) को

च. चि. ९/६८

। ॥ ६८ ॥

भूतों से पीड़ित और अमरों (देवों) से पीड़ित (लोगों) को, और नेत्र-रोग में मनुष्यों को भी। मरिच (काली मिर्च) और पित्त सहित मांस, धूप में रखा हुआ, अञ्जन है।

च. चि. ९/६९

। ॥ ६९ ॥

(वह अञ्जन) विकृत (असामान्य) रूप देखने वाले और दोष या भूत के कारण नष्ट हुई स्मृति वाले (रोगी) के लिए प्रयोग करना चाहिए। सिद्धार्थक (सफ़ेद सरसों), वचा (वच), हिङ्गु (हींग), करञ्ज और देवदारु,

च. चि. ९/७०

। ॥ ७० ॥

मञ्जिष्ठा (मजीठ), त्रिफला, श्वेता, कटभी की छाल, कटुत्रिक, प्रियङ्गु, शिरीष (सिरस) और दोनों रजनी (हल्दी और दारुहल्दी), (ये सब) समान भाग में (लिए जाएँ)।

च. चि. ९/७१

। ॥ ७१ ॥

बकरे के मूत्र के साथ पीसा गया यह अगद पीने, अञ्जन, नस्य और आलेपन (लेप) के लिए, तथा स्नान और उद्वर्तन (उबटन) के लिए (प्रयोग होता है),

च. चि. ९/७२

। ॥ ७२ ॥

(यह अगद) अपस्मार, विष, उन्माद, कृत्या, अलक्ष्मी और ज्वर को दूर करने वाला है, भूतों से (होने वाले) भय को नष्ट करता है, और राजद्वार (राजा के दरबार) में (भी) प्रशस्त माना जाता है।

च. चि. ९/७३

। ॥ ७३ ॥

अथवा इस (अगद) से गोमूत्र के साथ सिद्ध किया (पकाया) गया घी भी वही काम करता है। प्रसेक और पीनस में गन्ध-द्रव्यों से बनाई गई धूमवर्ति (धुएँ की बत्ती) का (धुआँ) पिए,

च. चि. ९/७४

।॥ ७४ ॥

अथवा वैरेचनिक धूम के लिए कहे गए श्वेता आदि (द्रव्यों) से, हिङ्गु मिलाकर, (बनाई गई धूमवर्ति का धुआँ पिए)। शल्लक (साही), उलूक (उल्लू), मार्जार (बिल्ली), जम्बूक (सियार), वृक (भेड़िया) और बकरे से प्राप्त

च. चि. ९/७५

। ॥ ७५ ॥

(उनके) मूत्र, पित्त, मल, रोम, नखों और चर्म से भी (वैद्य) सेक, अञ्जन, प्रधमन, नस्य और धूम का प्रयोग कराए।

च. चि. ९/७६

। ॥ ७६ ॥

(ये उपाय) प्रायः वात-श्लेष्मा (कफ) स्वरूप वाले (उन्माद) में (हैं); परन्तु पैत्तिक (उन्माद) में तिक्तक और जीवनीय घृत तथा मिश्रक स्नेह प्रशस्त माने जाते हैं,

च. चि. ९/७७

। । ॥ ७७ ॥

और शीतल, मधुर और मृदु अन्न-पान (भी)। अथवा जानकार वैद्य शङ्ख (कनपटी) और केशान्त (माथे पर बालों की सीमा) के सन्धि-स्थान पर सिरा खोले (रक्त निकाले), उन्माद में, विषम ज्वर में और अपस्मार में भी।

च. चि. ९/७८

। ॥ ७८ ॥

अथवा घी और मांस से भली-भाँति तृप्त (रोगी) को वायु-रहित स्थान में सुखपूर्वक रखे; (तब वह) मति और स्मृति के भ्रंश को छोड़कर, संज्ञा (होश) पाकर (रोग से) मुक्त हो जाता है।

च. चि. ९/७९

। ॥ ७९ ॥

अथवा कोई मित्र धर्म और अर्थ से युक्त वचनों से उसे आश्वासन दे (ढाढ़स बँधाए); अथवा (उसे) किसी प्रिय (वस्तु या जन) के नाश (की बात) कहे, अथवा अद्भुत (आश्चर्यजनक) वस्तुएँ दिखाए।

च. चि. ९/८०

। ॥ ८० ॥

अथवा (उसे) बाँधकर, सरसों के तेल से चुपड़कर, धूप में उत्तान (पीठ के बल) लिटा दे; अथवा कपिकच्छू (कौंच) से, या तपाए हुए लोहे, तेल और जल से (उसे) स्पर्श करे।

च. चि. ९/८१

। ॥ ८१ ॥

अथवा कोड़ों से पीटकर, (उसे) अच्छी तरह बाँधकर निर्जन घर में रोक रखे; क्योंकि इस प्रकार इसका भटका हुआ चित्त शान्ति को प्राप्त होता है।

च. चि. ९/८२

। ॥ ८२ ॥

(वैद्य) उसे विषदन्त निकाले हुए सर्प से, सधाए हुए सिंहों और हाथियों से, अथवा हाथ में शस्त्र लिए हुए चोरों और शत्रुओं से डराए।

च. चि. ९/८३

। ॥ ८३ ॥

अथवा राजपुरुष (राजा के कर्मचारी) उसे अच्छी तरह बाँधकर बाहर ले जाकर, राजा की आज्ञा से धमकाते हुए, वध (के भय) से इसे डराएँ।

च. चि. ९/८४

। ॥ ८४ ॥

क्योंकि शरीर के कष्ट के भयों से प्राणों का भय बढ़कर माना गया है; उससे उस (रोगी) का सब ओर से विप्लुत (विचलित) मन शान्त हो जाता है।

च. चि. ९/८५

। ॥ ८५ ॥

परन्तु जिसका मन (किसी) इष्ट (प्रिय) वस्तु के नाश से आहत हो जाता है, उसके (मन) को उसके समान (वस्तु) की प्राप्ति (कराकर), सान्त्वना और आश्वासन (देकर) शान्त करे।

च. चि. ९/८६

। ॥ ८६ ॥

काम, शोक, भय, क्रोध, हर्ष, ईर्ष्या और लोभ से उत्पन्न (उन्मादों) को इन्हीं (भावों) से, जो परस्पर प्रतिद्वन्द्वी (एक-दूसरे के विरोधी) हैं, शान्त करे।

च. चि. ९/८७

। ॥ ८७ ॥

देश, वय (आयु), सात्म्य (जो अनुकूल पड़ता हो), दोष, काल (समय) और बलाबल (बल और दुर्बलता) को जानकर भूत और दोष से उत्पन्न उन्माद में यह चिकित्सा करे।

च. चि. ९/८८

। ॥ ८८ ॥

परन्तु देवों, ऋषियों, पितरों और गन्धर्वों द्वारा उन्मत्त किए गए (रोगी) के लिए बुद्धिमान् (वैद्य) तीक्ष्ण अञ्जन आदि और क्रूर कर्म (कठोर उपाय) छोड़ दे।

च. चि. ९/८९

। ॥ ८९ ॥

यहाँ (ऐसी अवस्था में) उसके लिए सर्पिष्पान (घृत पिलाना) आदि मृदु (कोमल) भैषज्य (चिकित्सा) करे, (और) पूजा, बलि और उपहार, तथा मन्त्र और अञ्जन की विधियाँ (करे)।

च. चि. ९/९०

। ॥ ९० ॥

और शान्ति-क्रम (शान्ति की विधियाँ), इष्टि (यज्ञ) और होम, जप और स्वस्त्ययन (मंगल की विधियाँ), वेद में कहे गए नियम और प्रायश्चित्त भी करे।

च. चि. ९/९१

। ॥ ९१ ॥

भूतों के अधिपति (स्वामी), देव, ईश्वर (और) जगत् के प्रभु की प्रयत (संयत और पवित्र) होकर नित्य पूजा करता हुआ (व्यक्ति) उन्माद से उत्पन्न भय को जीत लेता है।

च. चि. ९/९२

। ॥ ९२ ॥

रुद्र के प्रमथ नाम के जो गण लोक में विचरते हैं, उनकी पूजा भी करता हुआ (व्यक्ति) उन्मादों से मुक्त हो जाता है।

च. चि. ९/९३

।॥ ९३ ॥

बलियों, मंगल (कर्मों), होमों, ओषधियों और अगदों (औषधियों) के धारण से, (और) सत्य, आचार, तप, ज्ञान, प्रदान (दान), नियमों और व्रतों से

च. चि. ९/९४

। ॥ ९४ ॥

और देवों, गायों, ब्राह्मणों और गुरुओं के पूजन से, तथा सिद्ध मन्त्रों और औषधों से आगन्तु (उन्माद) शान्त हो जाता है।

च. चि. ९/९५

। ॥ ९५ ॥

और अपस्मारचिकित्सित (अध्याय) में जो कुछ भी बताया जाएगा, वह भी उन्माद में करना चाहिए, क्योंकि (दोनों के) हेतु और दूष्य समान हैं।

च. चि. ९/९६

। ॥ ९६ ॥

जो आमिष (मांस) और मद्य से निवृत्त (दूर) है, हिताशी (हितकर आहार खाने वाला), प्रयत (संयमी) और शुचि (पवित्र) है, वह सत्त्ववान् (दृढ़ मन वाला व्यक्ति) निज और आगन्तु उन्मादों से युक्त (ग्रस्त) नहीं होता।

च. चि. ९/९७

। ॥ ९७ ॥

इन्द्रियों और (उनके) अर्थों (विषयों) का, तथा बुद्धि, आत्मा और मन का प्रसाद (निर्मल और प्रसन्न होना), और धातुओं का प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) में स्थित होना: (यह) उन्माद के चले जाने का लक्षण है।

च. चि. ९/९८

- । ॥ ९८ ॥

इस विषय में (संग्रह का) श्लोक (है): श्रेष्ठ भिषक् (वैद्य) ने निज और आगन्तु निमित्तों (कारणों) से होने वाले उन्मादों का समुत्थान (उत्पत्ति), लक्षण और चिकित्सा कही।

च. चि. ९

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित), और (चरक के संस्करण में) अप्राप्त (न मिलने) पर दृढबल द्वारा पूरे किए गए तन्त्र (ग्रन्थ) के चिकित्सास्थान में उन्मादचिकित्सित (उन्माद की चिकित्सा) नामक नौवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।